सूरए निसा – छटा रूकू

सूरए निसा – छटा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
मर्द अफ़सर हैं औरतों पर (1)
इसलिये कि अल्लाह ने उनमें एक को दूसरे पर बड़ाई दी  (2)
और इसलिये कि मर्दों ने उनपर अपने माल ख़र्च किये (3)
तो नेकबख़्त (ख़ुशनसीब) औरतें अदब वालियां हैं ख़ाविन्द (शौहर) के पीछे हिफ़ाज़त रखती हैं (4)
जिस तरह अल्लाह ने हिफ़ाज़त का हुक्म दिया और जिन औरतों की नाफ़रमानी का तुम्हें डर हो (5)
तो उन्हें समझाओ और उनसे अलग सोओ और उन्हें मारो(6)
फिर अगर वो तुम्हारे हुक्म में आजाएं तो उनपर ज़ियादती की कोई राह न चाहो बेशक अल्लाह बलन्द बड़ा है (7) (34) 
और अगर तुमको मियां बीबी के झगड़े का डर हो(8)
तो एक पंच मर्द वालों की तरफ़ से भेजो और एक पंच औरत वालों की तरफ़ से  (9)
ये दोनो अगर सुलह करना चाहे तो अल्लाह उनमें मेल कर देगा बेशक अल्लाह जानने वाला ख़बरदार है  (10) (35)
और अल्लाह की बन्दगी करो और उसका शरीक किसी को न ठहराओ (11)
और मां बाप से भलाई करो(12)
और रिश्तेदारों (13)
और यतीमों और मोहताजों (14)
और पास के पड़ोसी और दूर के पड़ोसी (15)
और करवट के साथी (16)
और राहगीर(17)
और अपनी बांदी (दासी) ग़ुलाम से(18)
बेशक अल्लाह को ख़ुश नहीं आता कोई इतराने वाला बड़ाई मारने वाला (19)(36)
जो आप कंजूसी करें और औरों से कंजूसी के लिये कहें (20)
और अल्लाह ने जो अपने फ़ज़्ल से दिया है उसे छुपाएं (21)
और काफ़िरों के लिये हमने ज़िल्लत का अज़ाब तैयार कर रखा है (37) और वो जो अपने माल लोगों के दिखावे को ख़र्च करते

हैं (22)
और ईमान नहीं लाते अल्लाह  और न क़यामत पर और जिसका साथी शैतान हुआ (23)
तो कितना बुरा साथी है (38) और उनका क्या नुक़सान था अगर ईमान लाते अल्लाह और क़यामत पर  और अल्लाह के दिये में से उसकी राह में ख़र्च करते (24)
और अल्लाह उनको जानता है (39) अल्लाह एक ज़र्रा भर ज़ुल्म नहीं फ़रमाता और अगर कोई नेकी हो तो उसे दूनी करता औरअपने पास से बड़ा सवाब देता है (40) तो कैसी होगी जब हम हर उम्मत से एक गवाह लाएं (25)
और ऐ मेहबूब, तुम्हें उनसब पर गवाह और निगहबान बनाकर लाएं (26)(41)
उस दिन तमन्ना करेंगे वो जिन्होने कुफ़्र किया और रसूल की नाफ़रमानी की काश उन्हें मिट्टी में दबाकर ज़मीन बराबर करदी जाए और कोई बात अल्लाह से न छुपा सकेंगे (27)(42)

तफसीर
सूरए निसा – छटा रूकू

(1) तो औरतों को उनकी इताअत लाज़िम है और मर्दों को हक़ है कि वो औरतों पर रिआया की तरह हुक्मरानी करें. हज़रत सअद बिन रबीअ ने अपनी बीबी हबीबा को किसी ख़ता पर एक थप्पड़ मारा. उनके वालिद सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में ले गए और उनके शौहर की शिकायत की. इस बारे में यह आयत उतरी.

(2) यानी मर्दों को औरतों पर अक़्ल और सूझबूझ और जिहाद व नबुव्वत, ख़िलाफ़त, इमामत, अज़ान, ख़ुत्बा, जमाअत, जुमुआ, तकबीर, तशरीक़ और हद व क़िसास की शहादत के, और विरासत में दूने हिस्से और निकाह व तलाक़ के मालिक होने और नसबों के उनकी तरफ़ जोड़े जाने और नमाज़ रोज़े के पूरे तौर पर क़ाबिल होने के साथ, कि उनके लिये कोई  ज़माना ऐसा नहीं है कि नमाज़ रोजे़ के क़ाबिल न हों, और दाढ़ियों और अमामों के साथ फ़ज़ीलत दी.

(3) इस आयत से मालूम हुआ कि औरतों की आजीविका मर्दों पर वाजिब है.

(4) अपनी पवित्रता और शौहरों के घर, माल और उनके राज़ों की.

(5) उन्हें शौहर की नाफ़रमानी और उसकी फ़रमाँबरदारी न करने और उसके अधिकारों का लिहाज़ न रखने के नतीजे समझओ, जो दुनिया और आख़िरत में पेश आते हैं और अल्लाह के अज़ाब का ख़ौफ़ दिलाओ और बताओ कि हमारा तुम पर शरई हक़ है. और हमारी आज्ञा का पालन तुम पर फ़र्ज़ है. अगर इस पर भी न मानें…..

(6) हल्की मार.

(7) और तुम गुनाह करते हो फिर भी वह तुम्हारी तौबह कुबूल फ़रमा लेता है. तो तुम्हारे हाथ के नीचे की औरतें अगर ग़लती करने के बाद माफ़ी चाहें तो तुम्हें ज़्यादा मेहरबानी से माफ़ करना चाहिये और अल्लाह की क़ुदरत और बरतरी का लिहाज़ रखकर ज़ुल्म से दूर रहना चाहिये.

(8) और तुम देखो कि समझाना, अलग सोना, मारना कुछ भी कारामद न हो और दोनों के मतभेद दूर न हुए.

(9) क्योंकि क़रीब के लोग अपने रिश्तेदारों के घरेलू हालात से परिचित होते हैं और मियाँ बीबी के बीच मिलाप की इच्छा भी रखते हैं और दोनों पक्षों को उनपर भरोसा और इत्मीनान भी होता है और उनसे अपने दिल की बात कहने में हिचकिचाहट भी नहीं होती है.

(10) जानता है कि मियाँ बीवी में ज़ालिम कौन है. पंचों को मियाँ बीवी में जुदाई कर देने का इख़्तियार नहीं.

(11) न जानदार को न बेजान को, न उसके रब होने में, न उसकी इबादत में.

(12) अदब और आदर के साथ और उनकी ख़िदमत में सदा चौकस रहना और उन पर ख़र्च करने में कमी न करना. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने तीन बार फ़रमाया, उसकी नाक ख़ाक में लिपटे. हज़रत अबू हुरैरा ने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह किसकी ? फ़रमाया, जिसने बूढ़े माँ बाप पाए या उनमें से एक को पाया और जन्नती न हो गया.

(13) हदीस शरीफ़ में है, रिश्तेदारों के साथ अच्छा सुलूक करने वालों की उम्र लम्बी और रिज़्क़ वसीअ होता है. (बुख़ारी व मुस्लिम)

(14) हदीस में है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, मैं और यतीम की सरपरस्ती करने वाला ऐसे क़रीब होंगे जैसे कलिमे और बीच की उंगली (बुख़ारी शरीफ़). एक और हदीस में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, बेवा और मिस्कीन की इमदाद और ख़बरदारी करने वाला अल्लाह के रास्तें में जिहाद करने वाले की तरह है.

(15) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि जिब्रील मुझे हमेशा पड़ोसियों के साथ एहसान करने की ताकीद करते रहे, इस हद तक कि गुमान होता था कि उनको वारिस क़रार दे दें.

(16) यानी बीबी या जो सोहबत में रहे या सफ़र का साथी हो या साथ पढ़े या मजलिस और मस्जिद में बराबर बैठे.

(17) और मुसाफ़िर व मेहमान. हदीस में है, जो अल्लाह और क़यामत के दिन पर ईमान रखे उसे चाहिये कि मेहमान की इज़्ज़त करे. (बुख़ारी व मुस्लिम)

(18) कि उन्हें उनकी ताक़त से ज़्यादा तकलीफ़ न दो और बुरा भला न कहो और खाना कपड़ा उनकी ज़रूरत के अनुसार दो. हदीस में है, रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया जन्नत में बुरा व्यवहार करने वाला दाख़िल न होगा. (तिरमिज़ी)

(19) अपनी बड़ाई चाहने वाला घमण्डी, जो रिश्तेदारों और पड़ोसियों को ज़लील समझे.

(20) बुख़्ल यानी कंजूसी यह है कि ख़ुद खाए, दूसरे को न दे. “शेह” यह है कि न खाए न खिलाए. “सख़ा” यह है कि ख़ुद भी खाए दूसरों को भी खिलाए. “जूद” यह है कि आप न खाए दूसरे को खिलाए. यह आयत यहूदियों के बारे में उतरी जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तारीफ़ बयान करने में कंजूसी करते और आपके गुण छुपाते थे. इस से मालूम हुआ कि इल्म को छुपाना बुरी बात है.

(21) हदीस शरीफ़ में है कि अल्लाह को पसन्द है कि बन्दे पर उसकी नेअमत ज़ाहिर हो. अल्लाह की नेअमत का इज़हार ख़ूलूस के साथ हो तो यह भी शुक्र है और इसलिये आदमी को अपनी हैसियत के लायक़ जायज़ लिबासों में बेहतर लिबास पहनना मुस्तहब है.

(22) बुख़्ल यानी कंजूसी के बाद फ़ुज़ूल ख़र्ची की बुराई बयान फ़रमाई. कि जो लोग केवल दिखावे के लिये या नाम कमाने के लिये ख़र्च करते हैं और अल्लाह की ख़ुशी हासिल करना उनका लक्ष्य नहीं होता, जैसे कि मुश्रिक और मुनाफ़िक़, ये भी उन्हीं के हुक्म में हैं जिन का हुक्म ऊपर गुज़र गया.

(23) दुनिया और आख़िरत में, दुनिया में तो इस तरह कि वह शैतानी काम करके उसको ख़ुश करता रहा और आख़िरत में इस तरह कि हर काफ़िर एक शैतान के साथ आग की ज़ंजीर में जकड़ा होगा. (ख़ाज़िन)
(24) इसमें सरासर उनका नफ़ा ही था.

(25) उस नबी को, और वह अपनी उम्मत के ईमान और कुफ़्र पर गवाही दें क्योंकि नबी अपनी उम्मतों के कामों से बा-ख़बर होते हैं.

(26) कि तुम नबियों के सरदार हो और सारा जगत तुम्हारी उम्मत.

(27) क्योंकि जब वो अपनी ग़लती का इन्कार करेंगे और क़सम खाकर कहेंगे कि हम मुश्रिक न थे और हमने ख़ता न की थी तो उनके मुंहों पर मुहर लगा दी जाएगी और उनके शरीर के अंगों को ज़बान दी जाएगी, वो उनके ख़िलाफ़ गवाही देंगे.

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