34 सूरए सबा

34  सूरए सबा

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
الْحَمْدُ لِلَّهِ الَّذِي لَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ وَلَهُ الْحَمْدُ فِي الْآخِرَةِ ۚ وَهُوَ الْحَكِيمُ الْخَبِيرُ
يَعْلَمُ مَا يَلِجُ فِي الْأَرْضِ وَمَا يَخْرُجُ مِنْهَا وَمَا يَنزِلُ مِنَ السَّمَاءِ وَمَا يَعْرُجُ فِيهَا ۚ وَهُوَ الرَّحِيمُ الْغَفُورُ
وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لَا تَأْتِينَا السَّاعَةُ ۖ قُلْ بَلَىٰ وَرَبِّي لَتَأْتِيَنَّكُمْ عَالِمِ الْغَيْبِ ۖ لَا يَعْزُبُ عَنْهُ مِثْقَالُ ذَرَّةٍ فِي السَّمَاوَاتِ وَلَا فِي الْأَرْضِ وَلَا أَصْغَرُ مِن ذَٰلِكَ وَلَا أَكْبَرُ إِلَّا فِي كِتَابٍ مُّبِينٍ
لِّيَجْزِيَ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ ۚ أُولَٰئِكَ لَهُم مَّغْفِرَةٌ وَرِزْقٌ كَرِيمٌ
وَالَّذِينَ سَعَوْا فِي آيَاتِنَا مُعَاجِزِينَ أُولَٰئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ مِّن رِّجْزٍ أَلِيمٌ
وَيَرَى الَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ الَّذِي أُنزِلَ إِلَيْكَ مِن رَّبِّكَ هُوَ الْحَقَّ وَيَهْدِي إِلَىٰ صِرَاطِ الْعَزِيزِ الْحَمِيدِ
وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا هَلْ نَدُلُّكُمْ عَلَىٰ رَجُلٍ يُنَبِّئُكُمْ إِذَا مُزِّقْتُمْ كُلَّ مُمَزَّقٍ إِنَّكُمْ لَفِي خَلْقٍ جَدِيدٍ
أَفْتَرَىٰ عَلَى اللَّهِ كَذِبًا أَم بِهِ جِنَّةٌ ۗ بَلِ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْآخِرَةِ فِي الْعَذَابِ وَالضَّلَالِ الْبَعِيدِ
أَفَلَمْ يَرَوْا إِلَىٰ مَا بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَمَا خَلْفَهُم مِّنَ السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ ۚ إِن نَّشَأْ نَخْسِفْ بِهِمُ الْأَرْضَ أَوْ نُسْقِطْ عَلَيْهِمْ كِسَفًا مِّنَ السَّمَاءِ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَةً لِّكُلِّ عَبْدٍ مُّنِيبٍ

सूरए सबा मक्का में उतरी, इसमें 54 आयतें और 6 रूकू हैं,
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला (1)
पहला रूकू

(1) सूरए सबा मक्का में उतरी सिवाय आयत “व यरल्लज़ीना ऊतुल इल्मो” (आयत -6). इसमें छ रूकू चौवन आयतें, आठ सौ, तैंतीस कलिमे और एक हज़ार पाँच सौ बारह अक्षर हैं.

सब ख़ूबियाँ अल्लाह को कि उसी का माल है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में(2)
(2) यानी हर चीज़ का मालिक, ख़ालिक़ और हाकिम अल्लाह तआला है और हर नेअमत उसी की तरफ़ है तो वही तारीफ़, प्रशंसा और स्तुति के लायक़ है.

और आख़िरत में उसी की तारीफ़ है(3)
(3) यानी जैसा दुनिया में प्रशंसा का मुस्तहिक़ अल्लाह तआला है वैसा ही आख़िरत में भी हम्द का मुस्तहिक़ वही है क्योंकि दोनों जगत उसी की नेअमतों से भरे हुए हैं. दुनिया में तो बन्दों पर उसकी प्रशंसा और स्तुति वाजिब है क्योंकि यह दारूल तकलीफ़ हैं. और आख़िरत में जन्नत वाले नेअमतें की ख़ुशी और राहतों की प्रसन्नता में उसकी प्रशंसा करेंगे.

और वही है हिकमत (बोध) वाला ख़बरदार {1} जानता है जो कुछ ज़मीन में जाता है (4)
(4) यानी ज़मीन के अन्दर दाख़िल होता है जैसे कि बारिश का पानी और मुर्दे और दफ़ीने.

और जो ज़मीन से निकलता है (5)
(5) जैसे कि सब्ज़ा और दरख़्त और चश्मे और खानें और हश्र के वक़्त मुर्दे.

और जो आसमान से उतरता है (6)
(6) जैसे कि बारिश, बर्फ़, औले और तरह तरह की बरकतें और फ़रिश्ते.

और जो उसमें चढ़ता है(7)
(7)  जैसे कि फ़रिश्ते, दुआएं और बन्दों के कर्म.

और वही है मेहरबान बख़्शने वाला {2} और काफ़िर बोले हम पर क़यामत न आएगी(8)
(8) यानी उन्होंने क़यामत के आने का इन्कार किया.

तुम फ़रमाओ क्यों नहीं मेरे रब की क़सम बेशक ज़रूर तुम पर आएगी ग़ैब जानने वाला(9)
(9) यानी मेरा रब ग़ैब का जानने वाला है उससे कोई चीज़ छुपी नहीं, तो क़यामत का आना और उसके क़ायम होने का वक़्त भी उसके इल्म में है.

उससे ग़ायब नहीं ज़र्रा भर कोई चीज़ आसमानों में और न ज़मीन में और न उससे छोटी और न बड़ी मगर एक साफ़ बताने वाली किताब में है (10){3}
(10) यानी लौहे मेहफ़ूज़ में.

ताकि सिला दे उन्हें जो ईमान लाए और अच्छे काम किये, ये हैं जिनके लिये बख़्शिश है और इज़्ज़त की रोज़ी (11) {4}
(11) जन्नत में.

और जिन्होंने हमारी आयतों में हराने की कोशिश की (12)
(12) और उनमें तअने करके और उनको शायरी और जादू वग़ैरह बता कर लोगों को उनसे रोकना चाहा. (इसका अधिक बयान इसी सूरत के आख़िरी रूकू पाँच में आएगा.)

उनके लिये सख़्त अज़ाब दर्दनाक में से अज़ाब है {5} और जिन्हें इल्म मिला (13)
(13) यानी रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सहाबा या किताब वालों के ईमान वाले, जैसे अब्दुल्लाह बिन सलाम और उनके साथियों.

वो जानते हैं कि जो कुछ तुम्हारी तरफ़ रब के पास से उतरा(14)
(14)यानी क़ुरआने मजीद.

वही हक़ (सत्य) है और इज़्ज़त वाले सब ख़ूबियों सराहे की राह बताता है {6} और काफ़िर बोले(15)
(15) यानी काफ़िरों ने आपस में आश्चर्य चकित होकर कहा.

क्या हम तुम्हें ऐसा मर्द बता दें (16)
(16) यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

जो तुम्हें ख़बर दे कि जब तुम पूर्जा होकर बिल्कुल रेज़ा रेज़ा (कण कण) हो जाओ तो फिर तुम्हें नया बनना है {7} क्या अल्लाह पर उसने झूट बांधा या उसे सौदा (पागलपन) है(17)
(17) जो वो ऐसी अजीबो ग़रीब बातें कहते है।. अल्लाह तआला ने काफ़िरों के इस क़ौल का रद फ़रमाया कि ये दोनों बातें नहीं. हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम इन दोनों से पाक है.

बल्कि वो जो आख़िरत पर ईमान नहीं लाते (18)
(18) यानी काफ़िर, मरने के बाद उठाए जाने और हिसाब का इन्कार करने वाले.

अज़ाब और दूर की गुमराह में है {8} तो क्या उन्होंने न देखा जो उनके आगे और पीछे है आसमान और ज़मीन (19)
(19) यानी क्या वो अन्धे हैं कि उन्हों ने आसमान व ज़मीन की तरफ़ नज़र ही नहीं डाली और अपने आगे पीछे देखा ही नहीं जो उन्हें मालूम होता कि वो हर तरफ़ से घेरे में हैं और ज़मीन व आसमान के दायरे या घेरे से बाहर नहीं जा सकते और अल्लाह की सल्तनत से नहीं नि कल सकते और उन्हें भागने की कोई जगह नहीं. उन्हों ने आयतों और रसूल को झुटलाया और इन्कार के भयानक जुर्म को करते हुए ख़ौफ़ न ख़ाया और अपनी इस हालत का ख़याल करके न डरे.

हम चाहें तो उन्हें (20)
(20) उनका झुटलाना और इन्कार की सज़ाएं क़ारून की तरह.

ज़मीन में धंसा दें या उनपर आसामान का टुकड़ा गिरा दे, बेशक उसमें(21)
(21) नज़र और फ़िक्र, दृष्टि और सोच.

निशानी है हर रूजू लाने वाले बन्दे के लिये(22){9}
(22) जो प्रमाण है कि अल्लाह तआला मरने के बाद दोबारा उठाने और इसका करने वाले के अज़ाब पर और हर चीज़ पर क़ादिर है.

34 सूरए सबा- दूसरा रूकू

34  सूरए सबा- दूसरा रूकू

۞ وَلَقَدْ آتَيْنَا دَاوُودَ مِنَّا فَضْلًا ۖ يَا جِبَالُ أَوِّبِي مَعَهُ وَالطَّيْرَ ۖ وَأَلَنَّا لَهُ الْحَدِيدَ
أَنِ اعْمَلْ سَابِغَاتٍ وَقَدِّرْ فِي السَّرْدِ ۖ وَاعْمَلُوا صَالِحًا ۖ إِنِّي بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ
وَلِسُلَيْمَانَ الرِّيحَ غُدُوُّهَا شَهْرٌ وَرَوَاحُهَا شَهْرٌ ۖ وَأَسَلْنَا لَهُ عَيْنَ الْقِطْرِ ۖ وَمِنَ الْجِنِّ مَن يَعْمَلُ بَيْنَ يَدَيْهِ بِإِذْنِ رَبِّهِ ۖ وَمَن يَزِغْ مِنْهُمْ عَنْ أَمْرِنَا نُذِقْهُ مِنْ عَذَابِ السَّعِيرِ
يَعْمَلُونَ لَهُ مَا يَشَاءُ مِن مَّحَارِيبَ وَتَمَاثِيلَ وَجِفَانٍ كَالْجَوَابِ وَقُدُورٍ رَّاسِيَاتٍ ۚ اعْمَلُوا آلَ دَاوُودَ شُكْرًا ۚ وَقَلِيلٌ مِّنْ عِبَادِيَ الشَّكُورُ
فَلَمَّا قَضَيْنَا عَلَيْهِ الْمَوْتَ مَا دَلَّهُمْ عَلَىٰ مَوْتِهِ إِلَّا دَابَّةُ الْأَرْضِ تَأْكُلُ مِنسَأَتَهُ ۖ فَلَمَّا خَرَّ تَبَيَّنَتِ الْجِنُّ أَن لَّوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ الْغَيْبَ مَا لَبِثُوا فِي الْعَذَابِ الْمُهِينِ
لَقَدْ كَانَ لِسَبَإٍ فِي مَسْكَنِهِمْ آيَةٌ ۖ جَنَّتَانِ عَن يَمِينٍ وَشِمَالٍ ۖ كُلُوا مِن رِّزْقِ رَبِّكُمْ وَاشْكُرُوا لَهُ ۚ بَلْدَةٌ طَيِّبَةٌ وَرَبٌّ غَفُورٌ
فَأَعْرَضُوا فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ سَيْلَ الْعَرِمِ وَبَدَّلْنَاهُم بِجَنَّتَيْهِمْ جَنَّتَيْنِ ذَوَاتَيْ أُكُلٍ خَمْطٍ وَأَثْلٍ وَشَيْءٍ مِّن سِدْرٍ قَلِيلٍ
ذَٰلِكَ جَزَيْنَاهُم بِمَا كَفَرُوا ۖ وَهَلْ نُجَازِي إِلَّا الْكَفُورَ
وَجَعَلْنَا بَيْنَهُمْ وَبَيْنَ الْقُرَى الَّتِي بَارَكْنَا فِيهَا قُرًى ظَاهِرَةً وَقَدَّرْنَا فِيهَا السَّيْرَ ۖ سِيرُوا فِيهَا لَيَالِيَ وَأَيَّامًا آمِنِينَ
فَقَالُوا رَبَّنَا بَاعِدْ بَيْنَ أَسْفَارِنَا وَظَلَمُوا أَنفُسَهُمْ فَجَعَلْنَاهُمْ أَحَادِيثَ وَمَزَّقْنَاهُمْ كُلَّ مُمَزَّقٍ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّكُلِّ صَبَّارٍ شَكُورٍ
وَلَقَدْ صَدَّقَ عَلَيْهِمْ إِبْلِيسُ ظَنَّهُ فَاتَّبَعُوهُ إِلَّا فَرِيقًا مِّنَ الْمُؤْمِنِينَ
وَمَا كَانَ لَهُ عَلَيْهِم مِّن سُلْطَانٍ إِلَّا لِنَعْلَمَ مَن يُؤْمِنُ بِالْآخِرَةِ مِمَّنْ هُوَ مِنْهَا فِي شَكٍّ ۗ وَرَبُّكَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ حَفِيظٌ

और बेशक हमने दाऊद को अपना बड़ा फ़ज़्ल (कृपा) दिया(1)
(1) यानी नबुव्वत और किताब, और कहा गया है कि मुल्क और एक क़ौल यह है कि सौंदर्य वग़ैरह तमाम चीज़ें जो आपको विशेषता के साथ अता फ़रमाई गई, और अल्लाह तआला ने पहाड़ों और पक्षियों को हुक्म दिया.

ऐ पहाड़ों उस के साथ अल्लाह की तरफ़ रूजू करो और ऐ परिन्दो(2)
(2) जब वो तस्बीह करें, उनके साथ तस्बीह करो. चुनांन्चे जब हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम तस्बीह करते तो पहाड़ों से भी तस्बीह सुनी जाती थी और पक्षी झुक आते, यह आपका चमत्कार था.

और हमने उसके लिये लोहा नर्म किया(3){10}
(3) कि आपके मुबारक हाथ में आकर मोम या गूंधे आटे की तरह नर्म हो जाता हो और आप उससे जो चाहते बग़ैर आग और बिना ठोँके पीटे बना लेते. इसका कारण यह बयान किया गया है कि जब आप बनी इस्राईल के बादशाह हुए तो आपका तरीक़ा यह था कि आप लोगों के हालात की खोज में इस तरह निकलते कि वो आपको पहचानें नहीं और जब कोई मिलता और आपको न पहचानता तो उससे आप पूछते कि दाऊद कैसा व्यक्ति है. सब लोग तारीफ़ करते. अल्लाह तआला ने एक फ़रिश्ता इन्सान की सूरत भेजा. हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम ने अपनी आदत के अनुसार उससे भी यही सवाल किया तो फ़रिश्ते ने कहा कि दाऊद हैं तो बहुत अच्छे, काश उनमें एक ख़सलत न होती. इसपर आप चौकन्ने हुए और फ़रमाया ऐ ख़ुदा के बन्दे कौन सी ख़सलत ? उसने कहा कि वह अपना और अपने घर वालों का खर्च बेतुलमाल यानी सरकारी ख़ज़ाने से लेते हैं.  यह सुनकर आपके ख़याल में आया कि अगर आप बैतूल माल से वज़ीफ़ा न लेते तो ज़्यादा बेहतर होता. इसलिये आपने अल्लाह की बारगाह में दुआ की कि उनके लिये कोई ऐसा साधन कर दे जिससे आप अपने घर वालों का गुज़ारा करें और शाही ख़ज़ाने से आपको बेनियाज़ी हो जाए. आपकी यह दुआ क़ुबूल हुई और अल्लाह तआला ने आपके लिये लौहे को नर्म कर दिया और आपको ज़िरह बनाने का इल्म दिया. सबसे पहले ज़िरह बनाने वाले आप ही हैं. आप रोज़ एक ज़िरह बनाते थे. वह चार हज़ार की बिकती थी. उसमें से अपने और घर वालों पर भी ख़्रर्च फ़रमाते और फ़क़ीरों और दरिद्रों पर भी सदक़ा करते. इसका बयान आयत में है, अल्लाह तआला फ़रमाता है कि हमने दाऊद के लिये लोहा नर्म करके उनसे फ़रमाया.

कि वसीअ (बड़ी) ज़िरहें बना और बनाने में अन्दाज़े का लिहाज़ रख (4)
(4) कि उसके छल्ले एक से और मध्यम हो, न बहुत तंग न बहुत चौड़े.

और तुम सब नेकी करो,  बेशक मैं तुम्हारे काम देख रहा हूँ {11} और सुलैमान के बस में हवा कर दी उसकी सुब्ह की मंज़िल एक महीने की राह और शाम की मंज़िल एक महीने की राह(5)
(5) चुनांन्चे आप सुब्ह को दमिश्क़ से रवाना होते तो दोपहर को खाने के बाद का आराम उस्तख़ूर में फ़रमाते जो फ़ारस प्रदेश में है और दमिश्क़ से एक महीने की राह पर और शाम को उस्तख़ूर से रवाना होते तो रात को काबुल में आराम फरमाते, यह भी तेज़ सवार के लिये एक माह का रस्ता है.

और हमने उसके लिये पिघले हुए तांबे का चश्मा बहाया(6)
(6) जो तीन रोज़ यमन प्रदेश में पानी की तरह जारी रहा और एक क़ौल् यह है कि हर माह में तीन रोज़ जारी रहता और एक क़ौल यह है कि अल्लाह तआला ने हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम के लिये तांबे को पिघला दिया जैसा कि हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम के लिये लौहे को नर्म किया था.

और जिन्नों में से वो जो उसके आगे काम करते उसके रब के हुक्म से(7)
(7) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम के लिये जिन्नों को मुतीअ किया.

और उनमें जो हमारे हुक्म से फिरे (8)
(8) और हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम की फ़रमाँबरदारी न करे.

हम उसे भड़कती आग का अज़ाब चखाएंगे {12} उसके लिये बनाते जो वह चाहता ऊंचे ऊंचे महल(9)
(9) और आलीशान इमारतें और मस्जिदें, और उन्हीं में से बैतुल मक़दिस भी है.

और तस्वीरें(10)
(10) दरिन्दों और पक्षियों वग़ैरह की तांबे और बिल्लौर और पत्थर वग़ैरह से, और उस शरीअत में तस्वीरें बनाना हराम न था.

और बड़े हौज़ों के बराबर लगन(11)
(11) इतने बड़े कि एक लगन में हज़ार हज़ार आदमी खाते.

और लंगरदार देंगे (12)
(12) जो अपने पायों पर क़ायम थीं और बहुत बड़ी थीं, यहाँ तक कि अपनी जगह से हटाई नहीं जा सकती थी. सीढियाँ लगाकर उनपर चढ़ते थे. ये यमन में थीं. अल्लाह तआला फ़रमाता है कि हमने फ़रमाया कि….

ऐ दाऊद वालो शुक्र करो(13)
(13) अल्लाह तआला का उन नेअमतों पर जो उसने तुम्हें अता फ़रमाई, उसकी फ़रमाँबरदारी करके.

और मेरे बन्दों में कम हैं शुक्र वाले {13} फिर जब हमने उस पर मौत का हुक्म भेजा (14)
(14) हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की बारगाह में दुआ की थी कि उनकी वफ़ात का हाल  जिन्नों पर ज़ाहिर न हो ताकि इन्सानों को मालूम हो जाए कि जिन्न ग़ैब नहीं जानते. फिर आप मेहराब में दाख़िल हुए और आदत के अनुसार नमाज़ के लिये अपनी लाठी पर टेक लगाकर खड़े हो गए. जिन्नात हस्बे दस्तूर अपने कामें में लगे रहे और समझते रहे कि हज़रत जिन्दा हैं. और हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम का लम्बे अर्से तक उसी हालत पर रहना उनके लिये कुछ आश्चर्य का कारण न हुआ क्योंकि वो अक्सर देखते थे कि आप एक माह दो माह और इससे ज़्यादा समय तक इबादत में मशग़ूल रहते हैं और आपकी नमाज़ लम्बी होती है यहाँ तक कि आपकी वफ़ात का पता न चला और अपनी ख़िदमतों में लगे रहे यहाँ  तक कि अल्लाह के हुक्म से दीमक ने आपकी लाठी खा ली और आपका मुबारक जिस्म, जो लाठी के सहारे से क़ायम था, ज़मीन पर आ रहा. उस वक़्त जिन्नात को आपकी वफ़ात की जानकारी हुई.

जिन्नों को उसकी मौत न बताई मगर ज़मीन की दीमक ने कि उसका असा खाती थी, फिर जब सुलैमान ज़मीन पर आया जिन्नों की हक़ीक़त खुल गई(15)
(15) कि वो ग़ैब नहीं जानते.

अगर ग़ैब जानते होते(16)
(16) तो हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम की वफ़ात से सूचित होते.

तो इस ख़्वारी के अज़ाब में न होते(17){14}
(17) और एक साल तक इमारत के कामों में कठिन परिश्रम न करते रहते. रिवायत है कि हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम ने बैतुल मक़दिस की नीव उस स्थान पर रखी थी जहाँ हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का ख़ैमा लगाया गया था. इस इमारत के पूरा होने से पहले हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की वफ़ात का वक़्त आ गया तो आपने अपने सुपुत्र हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम को इसके पूरा करने की वसीयत फ़रमाई. चुनांन्चे आपने शैतानों को इसके पूरा करने का हुक्म दिया. जब आपकी वफ़ात का वक़्त क़रीब पहुंचा तो आपने दुआ की कि आपकी वफ़ात शैतानों पर ज़ाहिर न हो ताकि वो इमारत के पूरा होने तक काम में लगे रहे और उन्हें जो इल्मे ग़ैब का दावा है वह झूठा हो जाए. हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम की उम्र शरीफ़ तिरपन साल की हुई. तेरह साल की उम्र में आप तख़्त पर जलवा अफ़रोज़ हुए, चालीस साल राज किया.

बेशक सबा(18)
(18) सबा अरब का एक क़बीला है जो अपने दादा के नाम से मशहूर है और वह दादा सबा बिन यशजब बिन यअरब बिन क़हतान हैं.

के लिये उनकी आबादी में (19)
(19) जो यमन की सीमाओं में स्थित थी.

निशानी थी(20)
(20) अल्लाह तआला की वहदानियत और क़ुदरत पर दलील लाने वाली और वह निशानी क्या थी इसका आगे बयान होता है.

दो बाग़ दाएं और बाएं(21)
(21) यानी उनकी घाटी के दाएं और बाएं दूर तक चले गए और उनसे कहा गया था.

अपने रब का रिज़्क़ खाओ (22)
(22) बाग़ इतने अधिक फलदार थे कि जब कोई व्यक्ति सर पर टोकरा लिये गुज़रता तो बग़ैर हाथ लगाए तरह तरह के मेवों से उसका टोकरा भर जाता.

और उसका शुक्र अदा करो(23)
(23) यानी इस नेअमत पर उसकी ताअत बजा लाओ-

पाकीज़ा शहर और (24)
(24) अच्छी जलवायु, साफ़ सुथरी ज़मीन, न उसमें मच्छर, न मक्खी, न खटमल, न साँप, न बिच्छू, हवा की पाकीज़गी ऐसी कि अगर कहीं और का कोई व्यक्ति इस शहर में गुज़र जाए और उसके कपड़ों में जुएं हों तो सब मर जाएं. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि सबा शहर सनआ से तीन फ़रसंग के फ़ासले पर था.

बख़्शने वाला रब (25) {15}
(25)  यानी अगर तुम रब की रोज़ी पर शुक्र करो और ताअत बजा लाओ तो वह बख़्शिश फ़रमाने वाला है.

तो उन्हों ने मुंह फेरा(26)
(26)  उसकी शुक्रगुज़ारी से और नबियों को झुटलाया. वहब का क़ौल है कि अल्लाह तआला ने उनकी तरफ़ तेरह नबी भेजे जिन्होंने उनको सच्चाई की तरफ़ बुलाया और अल्लाह तआला की नेअमतें याद दिलाई और उसके अज़ाब से डराया मगर वो ईमान न लाए और उन्होंने नबियों को झुटलाया और कहा कि हम नहीं जानते कि हम पर ख़ुदा की कोई भी नेअमत हो. तुम अपने रब से कह दो कि उस से हो सके तो वो इन नेअमतों को रोक ले.

तो हमने उनपर ज़ोर का अहला (सैलाब) भेजा(27)
(27) बड़ी बाढ़ जिससे उनके बाग़, अमवाल, सब डूब गए और उनके मकान रेत में दफ़्न हो गए और इस तरह तबाह हुए कि उनकी तबाही अरब के लिये कहावत बन गई.

और उनके बाग़ों के एवज़ दो बाग़ उन्हें बदल दिये जिन में बकटा मेवा(28)
(28) अत्यन्त बुरे मज़े का.

और झाऊ और थोड़ी सी बेरियां(29) {16}
(29) जैसी वीरानों में जम आती हैं. इस तरह की झाड़ियों और भयानक जंगल को जो उनके सुन्दर बाग़ों की जगह पैदा हो गया था. उपमा के तौर पर बाग़ फ़रमाया.

हमने उन्हें यह बदला दिया उनकी नाशुक्री(30)
(30) और उनके कुफ्र.

की सज़ा, और हम किसे सज़ा देते हैं उसी को जो नाशुक्रा है {17} और हमने किये थे उनमें(31)
(31)यानी सबा शहर में.

और उन शहरों में जिन में हमने बरकत रखी(32)
(32) कि वहाँ रहने वालों को बहुत सी नेअमतें और पानी और दरख़्त और चश्मे इनायत किये. उन से मुराद शाम के शहर हैं.

सरे राह कितने शहर(33)
(33) क़रीब क़रीब, सबा से शाम तक के सफ़र करने वालों को उस राह में तोशे और पानी साथ लेजाने की ज़रूरत न होती.

और उन्हें मंज़िल के अन्दाज़े पर रखा(34)
(34) कि चलने वाला एक जगह से सुबह चले तो दोपहर को एक आबादी में पहुंच जाए जहाँ ज़रूरत के सारे सामान हों और जब दोपहर को चले तो शाम को एक शहर में पहुंच जाए. यमन से शाम तक का सारा सफ़र इसी आसायश के साथ तय हो सके और हमने उनसे कहा कि—-

उनमें चलो रातों और दिनों अम्न व अमान से(35) {18}
(35) न रातों में कोई खटका, न दिनों में कोई तकलीफ़. न दुश्मन का अन्देशा, न भूख प्यास का ग़म, मालदारों में हसद पैदा हुआ कि हमारे और ग़रीबों के बीच कोई फ़र्क़ ही न रहा, क़रीब क़रीब की मंज़िलें हैं, लोग धीमे हवा खोरी करते चले आते है. थोड़ी देर के बाद दूसरी आबादी आ जाती है. वहाँ आराम करते हैं, न सफ़र में थकन है, न कोफ़्त, अगर मंज़िलें दूर होतीं, सफ़र की मुद्दत लम्बी होती, राह में पानी न मिलता, जंगलों और बयाबानों में गुज़र होता, तो हम तोशा साथ लेते, पानी का प्रबन्ध करते, सवारियाँ और सेवक साथ रखते, सफ़र का मज़ा आता और अमीर ग़रीब का फर्क़ ज़ाहिर होता. यह ख़्याल करके उन्होंने कहा.

तो बोले ऐ हमारे रब हमारे सफ़र में दूरी डाल(36)
(36) यानी हमारे और शाम के बीच जंगल और बयाबान कर दे कि बग़ैर तोशे और सवारी के सफ़र न हो सके.

और उन्होंने ख़ुद अपना ही नुक़सान किया तो हमने उन्हें कहानियां कर दिया(37)
(37) बाद वालों के लिये कि उन के हालात से इब्रत हासिल करें.

और उन्हें पूरी परेशानी से परागन्दा कर दिया(38)
(38) क़बीला क़बीला बिखर गया, वो बस्तियाँ डूब गई और लोग बेघर होकर अलग अलग शहरों में पहुंचे. ग़स्सान शाम में और अज़ल अम्मान में और ख़ुज़ाजह तिहामा में और आले ख़ुज़ैमह इराक़ में और औस ख़जरिज का दादा अम्र बिन आमिर मदीने में.

बेशक उसमें ज़रूर निशानियां हैं हर बड़े सब्र वाले हर बड़े शुक्र वाले के लिये(39)  {19}
(39) और सब्र और शुक्र मूमिन की सिफ़त है कि जब वह बला में गिरफ़्तार होता है, सब्र करता है और जब नेअमत पाता है, शुक्र बजा लाता है.

और बेशक इबलीस ने उन्हें अपना गुमान सच कर दिखाया(40)
(40) यानी  इब्लीस जो गुमान रखता था कि बनी आदम को वह शहवत, लालच और ग़ज़ब के ज़रीये गुमराह कर देगा. यह गुमान उसने सबा प्रदेश वालों पर बल्कि सारे काफ़िरों पर सच्चा कर दिखाया कि वो उसके मानने वाले हो गए और उसकी फ़रमाँबरदारी करने लगे. हसन रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि शैतान ने ना किसी पर तलवार खींची ना किसी पर कोड़े मारे, झूटे वादों और बातिल आशाओ से झूट वालों को गुमराह कर दिया.

तो वो उसके पीछे हो लिये मगर एक गिरोह कि मुसलमान था(41){20}
(41) उन्होंने उसका अनुकरण न किया.

और शैतान का उनपर (42)
(42) जिनके हक़ में उसका गुमान पूरा हुआ.

कुछ क़ाबू न था मगर इसलिये कि हम दिखा दें कि कौन आख़िरत पर ईमान लाता है और कौन इससे शक में है, और तुम्हारा रब हर चीज़ पर निगहबान है{21}

34 सूरए सबा- तीसरा रूकू

34  सूरए सबा- तीसरा रूकू

قُلِ ادْعُوا الَّذِينَ زَعَمْتُم مِّن دُونِ اللَّهِ ۖ لَا يَمْلِكُونَ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ فِي السَّمَاوَاتِ وَلَا فِي الْأَرْضِ وَمَا لَهُمْ فِيهِمَا مِن شِرْكٍ وَمَا لَهُ مِنْهُم مِّن ظَهِيرٍ
وَلَا تَنفَعُ الشَّفَاعَةُ عِندَهُ إِلَّا لِمَنْ أَذِنَ لَهُ ۚ حَتَّىٰ إِذَا فُزِّعَ عَن قُلُوبِهِمْ قَالُوا مَاذَا قَالَ رَبُّكُمْ ۖ قَالُوا الْحَقَّ ۖ وَهُوَ الْعَلِيُّ الْكَبِيرُ
۞ قُلْ مَن يَرْزُقُكُم مِّنَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۖ قُلِ اللَّهُ ۖ وَإِنَّا أَوْ إِيَّاكُمْ لَعَلَىٰ هُدًى أَوْ فِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ
قُل لَّا تُسْأَلُونَ عَمَّا أَجْرَمْنَا وَلَا نُسْأَلُ عَمَّا تَعْمَلُونَ
قُلْ يَجْمَعُ بَيْنَنَا رَبُّنَا ثُمَّ يَفْتَحُ بَيْنَنَا بِالْحَقِّ وَهُوَ الْفَتَّاحُ الْعَلِيمُ
قُلْ أَرُونِيَ الَّذِينَ أَلْحَقْتُم بِهِ شُرَكَاءَ ۖ كَلَّا ۚ بَلْ هُوَ اللَّهُ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ
وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا كَافَّةً لِّلنَّاسِ بَشِيرًا وَنَذِيرًا وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا الْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
قُل لَّكُم مِّيعَادُ يَوْمٍ لَّا تَسْتَأْخِرُونَ عَنْهُ سَاعَةً وَلَا تَسْتَقْدِمُونَ

तुम फ़रमाओ (1)
(1) ऐ मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम! मक्कए मुकर्रमा के काफ़िरों से.

पुकारो उन्हें जिन्हें अल्लाह के सिवा(2)
(2) अपना मअबूद.

समझे बैठे हो(3)
(3) कि वो तुम्हारी मुसीबतें दूर करें लेकिन ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि नफ़ा और नुक़सान में.

और वो ज़र्रा भर के मालिक नहीं आसमानों में और न ज़मीन में और न उनका इन दोनों में कुछ हिस्सा और न अल्लाह का उनमें से कोई मददगार {22} और उसके पास शफ़ाअत काम नहीं देती मगर जिसके लिये वह इ़ज्न (आज्ञा) फ़रमाए, यहाँ तक कि जब इज़्न देकर उनके दलों की घबराहट दूर फ़रमा दी जाती है एक दूसरे से (4)
(4) ख़ुशख़बरी के तौर पर

कहते हैं तुम्हारे रब ने क्या ही बात फ़रमाई, वो कहते हैं जो फ़रमाया हक़(सत्य) फ़रमाया (5){23}
(5) यानी शफ़ाअत करने वालों को ईमानदारों की शफ़ाअत की इजाज़त दी.

और वही है बलन्द बड़ाई वाला, तुम फ़रमाओ कौन जो तुम्हें रोज़ी देता है आसमानों और ज़मीन से(6)
(6) यानी आसमान से मेंह बरसा कर और ज़मीन से सब्ज़ा उगाकर.

तुम ख़ुद ही फ़रमाओ अल्लाह(7)
(7) क्योंकि इस सवाल का इसके सिवा और कोई जवाब ही नहीं.

और बेशक हम या तुम(8)
(8) यानी दोनों पक्षों में से हर एक के लिये इन दोनो हालों में से एक हाल ज़रूरी है.

या तो ज़रूर हिदायत पर हैं या खुली गुमराही में(9){24}
(9) और यह ज़ाहिर है कि वो शख़्स सिर्फ़ अल्लाह तआला को रोज़ी देने वाला, पानी बरसाने वाला, सब्ज़ा उगाने वाला जानते हुए भी बुतों को पूजे जो किसी एक कण भर चीज़ के मालिक नहीं (जैसा कि ऊपर की आयतों में बयान हो चुका), वो यक़ीनन खुली गुमराही में है.

तुम फ़रमाओ हमने तुम्हारे गुमान में अगर कोई जुर्म किया तो उसकी तुमसे पूछ नहीं न तुम्हारे कौतुकों का हमसे सवाल(10){25}
(10) बल्कि हर शख़्स से उसके अमल का सवाल होगा और हर एक अपने अमल की जज़ा पाएगा.

तो फ़रमाओ हमारा रब हम सब को जमा करेगा(11)
(11) क़यामत के दिन.

फिर हम में सच्चा फ़ैसला फ़रमा देगा(12)
(12) तो सच्चाई वालों को जन्नत में और बातिल वालों को जहन्नम में दाख़िल करेगा.

और वही है बड़ा न्याव चुकाने वाला सब कुछ जानता {26} तुम फ़रमाओ मुझे दिखाओ तो वो शरीक जो तुमने उससे मिलाए हैं (13)
(13) यानी जिन बुतों को तुमने इबादत में शरीक किया है, मुझे दिखाओ तो किस क़ाबिल हैं. क्या वो कुछ पैदा करते हैं, रोज़ी देते हैं, और जब यह कुछ नहीं तो उनको ख़ुदा का शरीक बनाना और उनकी इबादत करना कैसी भरी ख़ता है, उससे बाज़ आओ.

हिश्त, बल्कि वही है अल्लाह इज़्ज़त वाला हिकमत (बोध) वाला {27} और ऐ मेहबूब हमने तुमको न भेजा मगर ऐसी रिसालत से जो तमाम आदमियों को घेरने वाली है(14)
(14) इस आयत से मालूम हुआ कि हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की रिसालत सार्वजनिक है, सारे इन्सान उसके घेरे में हैं, गोरे हों या काले, अरबी हों या अजमी, पहले हों या पिछले, सब के लिये आप रसूल हैं और वो सब आपके उम्मती. बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम फ़रमाते हैं मुझे पाँच चीज़ें ऐसी अता फ़रमाई गई जो मुझसे पहले किसी नबी को न दी गई – एक माह की दुरी के रोअब से मेरी मदद की गई, तमाम ज़मीन मेरे लिय मस्जिद और पाक की गई कि जहाँ मेरे उम्मती को नमाज़ का वक़्त हो नमाज़ पढ़े और मेरे लिये ग़नीमतें हलाल की गईं जो मुझ से पहले किसी के लिये हलाल न थीं और मुझे शफ़ाअत का दर्जा अता किया गया. दूसरे नबी ख़ास अपनी क़ौम की तरफ़ भेजे जाते थे और मैं तमाम इन्सानों की सार्वजनिक रिसालत है जो तमाम जिन्न और इन्सानों को शामिल है. ख़ुलासा यह कि हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम तमाम सृष्टि के रसूल हैं और यह दर्जा ख़ास आपका है जो क़ुरआने करीम की आयतों और बहुत सी हदीसों से साबित है. सूरए फ़ुरक़ान के शुरू में भी इसका बयान गुज़र चुका है. (ख़ाज़िन)

ख़ुशख़बरी देता(15)
(15) ईमान वालों को अल्लाह तआला के फ़ज़्ल की.

और डर सुनाता(16)
(16) काफ़िरों को उसके इन्साफ़ का.

लेकिन बहुत लोग नहीं जानते(17){28}
(17) और अपनी जिहालत की वजह से आपकी मुख़ालिफ़त करते हैं.

और कहते हैं ये वादा कब आएगा (18)
(18) यानी क़यामत का वादा.

अगर तुम सच्चे हो {29} तुम फ़रमाओ तुम्हारे लिये एक ऐसे दिन का वादा जिससे तुम न एक घड़ी पीछे हट सको और न आगे बढ़ सको(19) {30}
(19) यानी अगर तुम मोहलत चाहो तो ताख़ीर संभव नहीं और अगर जल्दी चाहो तो पहल मुमकिन नहीं, हर हाल में इस वादे का अपने वक़्त पर पूरा होना.

34 सूरए सबा- चौथा रूकू

34  सूरए सबा- चौथा रूकू

وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لَن نُّؤْمِنَ بِهَٰذَا الْقُرْآنِ وَلَا بِالَّذِي بَيْنَ يَدَيْهِ ۗ وَلَوْ تَرَىٰ إِذِ الظَّالِمُونَ مَوْقُوفُونَ عِندَ رَبِّهِمْ يَرْجِعُ بَعْضُهُمْ إِلَىٰ بَعْضٍ الْقَوْلَ يَقُولُ الَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا لِلَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا لَوْلَا أَنتُمْ لَكُنَّا مُؤْمِنِينَ
قَالَ الَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا لِلَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا أَنَحْنُ صَدَدْنَاكُمْ عَنِ الْهُدَىٰ بَعْدَ إِذْ جَاءَكُم ۖ بَلْ كُنتُم مُّجْرِمِينَ
وَقَالَ الَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا لِلَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا بَلْ مَكْرُ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ إِذْ تَأْمُرُونَنَا أَن نَّكْفُرَ بِاللَّهِ وَنَجْعَلَ لَهُ أَندَادًا ۚ وَأَسَرُّوا النَّدَامَةَ لَمَّا رَأَوُا الْعَذَابَ وَجَعَلْنَا الْأَغْلَالَ فِي أَعْنَاقِ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ هَلْ يُجْزَوْنَ إِلَّا مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
وَمَا أَرْسَلْنَا فِي قَرْيَةٍ مِّن نَّذِيرٍ إِلَّا قَالَ مُتْرَفُوهَا إِنَّا بِمَا أُرْسِلْتُم بِهِ كَافِرُونَ
وَقَالُوا نَحْنُ أَكْثَرُ أَمْوَالًا وَأَوْلَادًا وَمَا نَحْنُ بِمُعَذَّبِينَ
قُلْ إِنَّ رَبِّي يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ وَيَقْدِرُ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ

और काफ़िर बोले हम हरगिज़ न ईमान लाएंगे इस क़ुरआन पर और उन किताबों पर जो इससे आगे थीं(1)
(1) तौरात और इंजील वग़ैरह.

और किसी तरह तू देखें जब ज़ालिम अपने रब के पास खड़े किये जाएंगे, जो उनमें एक दूसरे पर बात डालेगा वो जो दबे थे(2)
(2) यानी ताबे और अनुयायी थे.

उनसे कहेंगे जो ऊंचे खिंचते थे(3)
(3) यानी अपने सरदारों से.

अगर तुम न होते(4)
(4) और हमें ईमान लाने से न रोकते.

तो हम ज़रूर ईमान ले आते {31} वो जो ऊंचे खिंचते थे उनसे कहेंगे जो दबे हुए थे क्या हम ने तुम्हें रोक दिया हिदायत से बाद इसके कि तुम्हारे पास आई बल्कि तुम ख़ुद मुजरिम थे {32} और कहेंगे वो जो दबे हुए थे उनसे जो ऊंचे खिंचते थे बल्कि रात दिन का दाँव था (5)
(5) यानी तुम रात दिन हमारे लिये छलकपट करते थे और हमें हर वक़्त शिर्क पर उभारते थे.

जब कि तुम हमें हुक्म देते थे कि अल्लाह का इन्कार करें और उसके बराबर वाले ठहराएं, और दिल ही दिल में पछताने लगे(6)
(6) दोनों पक्ष, ताबे भी और मतबूअ भी और उनके बहकाने वाले भी ईमान न लाने पर.

जब अज़ाब देखा(7)
(7) जहन्नम का.

और हमने तौक़ डाले उनकी गर्दनों में जो इन्कारी थे(8)
(8) चाहे बहकाने वाले हों या उनके कहने में आने वाले, तमाम काफ़िरों की यही सज़ा है.

वो क्या बदला पाएंगे मगर वही जो कुछ करते थे(9){33}
(9) दुनिया में कुफ़्र और गुमराही.

और हमने जब कभी किसी शहर में कोई डर सुनाने वाला भेजा वहाँ के आसूदों ने यही कहा कि तुम जो लेकर भेजे गए हम उसके इन्कारी हैं(10){34}
(10) इसमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली फ़रमाई गई कि आप उन काफ़िरों के झुटलाने और इन्कार से दुखी न हों. काफ़िरों का नबियों के साथ यही तरीक़ा रहा है और मालदार लोग इसी तरह अपने माल व औलाद के घमण्ड में नबियों को झुटलाते रहे हैं. दो व्यक्ति तिजारत में शरीक थे. उनमें से एक शाम प्रदेश को गया और एक मक्कए मुकर्रमा में रह, जब नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम तशरीफ़ लाए और उसने शाम प्रदेश में हुज़ूर की ख़बर सुनी तो अपने शरीक को ख़त लिखा और उससे हुज़ूर का पूरा हाल पूछा. उस शरीक ने जवाब लिखा कि मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अपनी नबुव्वत का ऐलान तो किया है लेकिन सिवाय छोटे दर्जे के हक़ीर और ग़रीब लोगों के और किसी ने उनका अनुकरण नहीं किया. जब यह ख़त उसके पास पहुंचा तो वह अपने तिजारती काम छोड़कर मक्कए मुकर्रमा आया और आते ही अपने शरीक से कहा कि मुझे सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का पता बताओ और मालूम करके हुज़ूर की ख़िदमत में हाज़िर हुआ और अर्ज़ किया कि आप दुनिया को क्या दावत देते हैं और हम से क्या चाहते हैं. फ़रमाया बुत परस्ती छोड़कर एक अल्लाह तआला की इबादत करना और आपने इस्लाम के आदेश बताए, ये बातें उसके दिल में असर कर गईं और वह शख़्स पिछली किताबों का आलिम था कहने लगा कि मैं गवाही देता हूँ कि आप बेशक अल्लाह तआला के रसूल हैं. हुज़ूर ने फ़रमाया तुम ने यह कैसे जाना उसने कहा कि जब कभी कोई नबी भेजा गया, पहले छोटे दर्जे के ग़रीब लोग ही उसके ताबे हुए यह अल्लाह की सुन्नत हमेशा ही जारी रही. इसपर यह आयत उतरी.

और बोले हम माल और औलाद में बढ़ कर हैं और हम पर अज़ाब होना नहीं(11) {35}
(11) यानी जब दुनिया में हम ख़ुशहाल हैं तो हमारे अअमाल और अफ़आल अल्लाह तआला को पसन्द होंगे और ऐसा हुआ तो आख़िरत में अज़ाब नहीं होगा. अल्लाह तआला ने उनके इस बातिल ख़याल का रद फ़रमाया कि आख़िरत के सवाब को दुनिया की मईशत पर क़यास करना ग़लत है.

तुम फ़रमाओ बेशक मेरा रब रिज़्क़ वसीअ करता है जिसके लिये चाहे और तंगी फ़रमाता है (12)
(12) आज़माइश और परीक्षा के तौर पर, तो दुनिया में रोज़ी की कुशायश अल्लाह की रज़ा की दलील नहीं और ऐसे ही उसकी तंगी अल्लाह तआला की नाराज़ी की दलील नहीं. कभी गुनाहगार पर वुसअत करता है, कभी फ़रमाँबरदार पर तंगी, यह उसकी हिकमत है. आख़िरत के सवाब को इसपर क़यास करना ग़लत और बेजा है.
लेकिन बहुत लोग नहीं जानते {36}

34 सूरए सबा- पाचँवां रूकू

34  सूरए सबा- पाचँवां रूकू

وَمَا أَمْوَالُكُمْ وَلَا أَوْلَادُكُم بِالَّتِي تُقَرِّبُكُمْ عِندَنَا زُلْفَىٰ إِلَّا مَنْ آمَنَ وَعَمِلَ صَالِحًا فَأُولَٰئِكَ لَهُمْ جَزَاءُ الضِّعْفِ بِمَا عَمِلُوا وَهُمْ فِي الْغُرُفَاتِ آمِنُونَ
وَالَّذِينَ يَسْعَوْنَ فِي آيَاتِنَا مُعَاجِزِينَ أُولَٰئِكَ فِي الْعَذَابِ مُحْضَرُونَ
قُلْ إِنَّ رَبِّي يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ وَيَقْدِرُ لَهُ ۚ وَمَا أَنفَقْتُم مِّن شَيْءٍ فَهُوَ يُخْلِفُهُ ۖ وَهُوَ خَيْرُ الرَّازِقِينَ
وَيَوْمَ يَحْشُرُهُمْ جَمِيعًا ثُمَّ يَقُولُ لِلْمَلَائِكَةِ أَهَٰؤُلَاءِ إِيَّاكُمْ كَانُوا يَعْبُدُونَ
3قَالُوا سُبْحَانَكَ أَنتَ وَلِيُّنَا مِن دُونِهِم ۖ بَلْ كَانُوا يَعْبُدُونَ الْجِنَّ ۖ أَكْثَرُهُم بِهِم مُّؤْمِنُونَ
فَالْيَوْمَ لَا يَمْلِكُ بَعْضُكُمْ لِبَعْضٍ نَّفْعًا وَلَا ضَرًّا وَنَقُولُ لِلَّذِينَ ظَلَمُوا ذُوقُوا عَذَابَ النَّارِ الَّتِي كُنتُم بِهَا تُكَذِّبُونَ
وَإِذَا تُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ آيَاتُنَا بَيِّنَاتٍ قَالُوا مَا هَٰذَا إِلَّا رَجُلٌ يُرِيدُ أَن يَصُدَّكُمْ عَمَّا كَانَ يَعْبُدُ آبَاؤُكُمْ وَقَالُوا مَا هَٰذَا إِلَّا إِفْكٌ مُّفْتَرًى ۚ وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لِلْحَقِّ لَمَّا جَاءَهُمْ إِنْ هَٰذَا إِلَّا سِحْرٌ مُّبِينٌ
وَمَا آتَيْنَاهُم مِّن كُتُبٍ يَدْرُسُونَهَا ۖ وَمَا أَرْسَلْنَا إِلَيْهِمْ قَبْلَكَ مِن نَّذِيرٍ
وَكَذَّبَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ وَمَا بَلَغُوا مِعْشَارَ مَا آتَيْنَاهُمْ فَكَذَّبُوا رُسُلِي ۖ فَكَيْفَ كَانَ نَكِيرِ

और तुम्हारे माल और तुम्हारी औलाद इस क़ाबिल नहीं कि तुम्हें हमारे करीब तक पहुंचाएं मगर वो जो ईमान लाए और नेकी की(1)
(1) यानी माल किसी के लिये क़ुर्ब का कारण नहीं सिवाय नेक मूमिन के, जो उसको ख़ुदा की राह में ख़र्च करे. और औलाद के लिये क़ुर्ब का कारण नहीं, सिवाय उस मूमिन के जो उन्हे नेक इल्म सिखाए, दीन की तालीम दे, और नेक और तक़वा वाला बनाए.

उनके लिये दूनादूं सिला(2)
(2) एक नेकी के बदले दस से लेकर सात सौ गुना तक और इससे भी ज़्यादा, जितना ख़ुदा चाहे.

उनके अमल (कर्म) का बदला और वो बालाख़ानों (अट्टालिकाओ) में अम्न व अमान से हैं(3){37}
(3) यानी जन्नत की ऊंची मंज़िलों में.

और वो जो हमारी आयतों में हराने की कोशिश करते हैं(4)
(4) यानी क़ुरआने करीम पर आलोचना करते हैं और यह गुमान करते हैं कि अपनी इन ग़लत हरकतों से वो लोगों को ईमान लाने से रोक देंगे. और उनका यह छलकपट इस्लाम के हक़ में चल जाएगा और वो हमारे अज़ाब से बच रहेंगे कयोंकि उनका अक़ीदा यह है कि मरने के बाद उठना ही नहीं है तो अज़ाब सवाब कैसा.

वो अज़ाब में ला धरे जाएंगे (5){38}
(5) और उनकी मक्कारियाँ उनके कुछ काम न आएंगी.

तुम फ़रमाओ बेशक मेरा रब रिज़्क़ वसीअ (विस्तृत) फ़रमाता है अपने बन्दों में जिसके लिये चाहे और तंगी फ़रमाता है जिसके लिये चाहे  (6)
(6) अपनी हिकमत के अनुसार.

और जो चीज़ तुम अल्लाह की राह में ख़र्च करो वह उसके बदले और देगा (7)
(7)  दुनिया में या आख़िरत में.  बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है कि अल्लाह तआला फ़रमाता है ख़र्च करो तुम पर ख़र्च किया जाएगा. दूसरी हदीस में है सदक़े से माल कम नहीं होता, माफ़ करने से इज़्ज़त बढ़ती है, विनम्रता से दर्जे बलन्द होते हैं.

और वह सबसे बेहतर रिज़्क़ देने वाला (8){39}
(8) क्योंकि उसके सिवा जो कोई किसी को देता है चाहे बादशाह लश्कर को, या आक़ा ग़ुलाम को, या घर वाला अपने बीवी बच्चो को, वह अल्लाह तआला की पैदा की हुई और उसकी अता की हुई रोज़ी में से देता है. रिज़्क़ और उससे नफ़ा उठाने के साधनों का पैदा करने वाला अल्लाह तआला के सिवा कोई नहीं. वही सच्चा रिज़्क़ देने वाला है.

और जिस दिन उन सब को उठाएगा (9)
(9) यानी उन मुश्रिकों को.

फिर फ़रिश्तों से फ़रमाएगा क्या ये तुम्हें पूजते थे(10){40}
(10) दुनिया में.

वो अर्ज़ करेंगे पाकी है तुझ को तू हमारा दोस्त है न वो(11)
(11) यानी हमारी उनसे कोई दोस्ती नहीं तो हम किस तरह उनके पूजने से राज़ी हो सकते थे. हम उससे बरी हैं.

बल्कि वो जिन्नों को पूजते थे(12)
(12) यानी शैतानों को कि उनकी इताअत के लिये ग़ैर ख़ुदा को पूजते हैं.

उनमें अक्सर उन्हीं पर यक़ीन लाए थे(13){41}
(13) यानी शैतानों पर.

तो आज तुम में एक दूसरे के भले बुरे का कुछ इख़्तियार न रखेगा(14)
(14) और वो झूटे मअबूद अपने पुजारियों को कुछ नफ़ा नुक़सान न पहुंचा सकेंगे.

और हम फ़रमांगे ज़ालिमों से, उस आग का अज़ाब चखो जिसे तुम झुटलाते थे(15) {42}
(15) दुनिया में.

और जब उनपर हमारी रौशन आयतें(16)
(16) यानी क़ुरआन की आयतें, हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ज़बान से.

पढ़ीं जाएं तो कहते हैं(17)
(17)हज़रत सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की निस्बत.

ये तो नहीं मगर एक मर्द कि तुम्हें रोकना चाहते हैं तुम्हारे बाप दादा के मअबूदों से(18)
(18)यानी बुतों से.

और कहते हैं (19)
(19)क़ुरआन शरीफ़ की निस्बत.

ये तो नहीं बोहतान जोड़ा हुआ, और काफ़िरों ने हक़ को कहा(20)
(20) यानी कु़रआन शरीफ़ को.

जब उनके पास आया यह तो नहीं मगर खुला जादू {43} और हमने उन्हें कुछ किताबें न दीं जिन्हें पढ़ते हों न तुम से पहले उनके पास कोई डर सुनाने वाला आया (21){44}
(21) यानी आप से पहले अरब के मुश्रिकों के पास न कोई किताब आई न रसूल जिसकी तरफ़ अपने दीन की निस्बत कर सके तो ये जिस ख़याल पर हैं उनके पास उसकी कोई सनद नहीं वह उनके नफ़्स का धोखा है.

और उनसे अगलों ने(22)
(22) यानी पहली उम्मतों ने क़ुरैश की तरह रसूलों को झुटलाया और उनको.

झुटलाया और ये उसके दसवें को भी न पहुंचे जो हमने उन्हें दिया था (23)
(23) यानी जो क़ुव्वत और माल औलाद की बहुतात और लम्बी उम्र पहलों को दी गई थी, क़ुरैश के मुश्रिकों के पास से तो उसका दसवाँ हिस्सा भी नहीं, उनके पहले तो उनसे ताक़त और क़ुव्वत, माल दौलत में दस गुना से ज़्यादा थे.

फिर उन्होंने मेरे रसूलों को झुटलाया तो कैसा हुआ मेरा इन्कार करना (24) {45}
(24) यानी उनको नापसन्द रखना और अज़ाब देना और हलाक फ़रमाना यानी पहले झुटलाने वालों ने मेरे रसूलों को झुटलाया तो मैं ने अपने अज़ाब से उन्हें हलाक किया और उनकी ताक़त व क़ुव्वत और माल दौलत कोई भी चीज़ उनके काम न आई. इन लोगों की क्या हक़ीक़त है, इन्हे डरना चाहिये.

34 सूरए सबा- छटा रूकू

34  सूरए सबा- छटा रूकू

۞ قُلْ إِنَّمَا أَعِظُكُم بِوَاحِدَةٍ ۖ أَن تَقُومُوا لِلَّهِ مَثْنَىٰ وَفُرَادَىٰ ثُمَّ تَتَفَكَّرُوا ۚ مَا بِصَاحِبِكُم مِّن جِنَّةٍ ۚ إِنْ هُوَ إِلَّا نَذِيرٌ لَّكُم بَيْنَ يَدَيْ عَذَابٍ شَدِيدٍ
قُلْ مَا سَأَلْتُكُم مِّنْ أَجْرٍ فَهُوَ لَكُمْ ۖ إِنْ أَجْرِيَ إِلَّا عَلَى اللَّهِ ۖ وَهُوَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ
قُلْ إِنَّ رَبِّي يَقْذِفُ بِالْحَقِّ عَلَّامُ الْغُيُوبِ
قُلْ جَاءَ الْحَقُّ وَمَا يُبْدِئُ الْبَاطِلُ وَمَا يُعِيدُ
قُلْ إِن ضَلَلْتُ فَإِنَّمَا أَضِلُّ عَلَىٰ نَفْسِي ۖ وَإِنِ اهْتَدَيْتُ فَبِمَا يُوحِي إِلَيَّ رَبِّي ۚ إِنَّهُ سَمِيعٌ قَرِيبٌ
وَلَوْ تَرَىٰ إِذْ فَزِعُوا فَلَا فَوْتَ وَأُخِذُوا مِن مَّكَانٍ قَرِيبٍ
وَقَالُوا آمَنَّا بِهِ وَأَنَّىٰ لَهُمُ التَّنَاوُشُ مِن مَّكَانٍ بَعِيدٍ
وَقَدْ كَفَرُوا بِهِ مِن قَبْلُ ۖ وَيَقْذِفُونَ بِالْغَيْبِ مِن مَّكَانٍ بَعِيدٍ
وَحِيلَ بَيْنَهُمْ وَبَيْنَ مَا يَشْتَهُونَ كَمَا فُعِلَ بِأَشْيَاعِهِم مِّن قَبْلُ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا فِي شَكٍّ مُّرِيبٍ

तुम फ़रमाओ मैं तुम्हें एक नसीहत करता हूँ (1)
(1) अगर तुमने उस पर अमल किया तो तुम पर सच्चाई खुल जाएगी और तुम वसवसों, शुबह और गुमराही की मुसीबत से निजात पाओगे. वह नसीहत ये है—

कि अल्लाह के लिये खड़े रहो(2)
(2) केवल सत्य की तलब की नियत से, अपने आपको तरफ़दारी और तअस्सुब से ख़ाली करके.

दो दो(3)
(3) ताकि आपस में सलाह कर सको और हर एक दूसरे से अपनी फ़िक्र का नतीज़ा बयान कर सके और दोनों इन्साफ़ के साथ ग़ौर कर सकें.

और अकेले अकेले(4)
(4) ताकि भीड़ से तबीअत न घबराए और तअस्सुब और तरफ़दारी और मुक़ाबला और लिहाज़ वग़ैरह से तबीअतें पाक रहे और अपने दिल में इन्साफ़ करने का मौक़ा मिले.

फिर सोचो(5)
(5) और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की निस्बत ग़ौर करो कि क्या जैसा कि काफ़िर आपकी तरफ़ जुनून की निस्बत करते हैं उसमें सच्चाई का कुछ भाग भी है. तुम्हारे अपने अनुभव में क़ुरैश में या मानव जाति में कोई व्यक्ति भी इस दर्जे का अक़्ल वाला नज़र आया है, क्या ऐसा ज़हीन, ऐसा सही राय वाला देखा है, ऐसा सच्चा, ऐसा पाक अन्त:करण वाला कोई और पाया है. जब तुम्हारा नफ़्स हुक्म कर दे और तुम्हारा ज़मीर मान ले कि हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम इन गुणों में यकता हैं तो तुम यक़ीन जानो.

कि तुम्हारे इन साहब में जिन्नों की कोई बात नहीं, वही तो नहीं मगर तुम्हें डर सुनाने वाले(6)
(6) अल्लाह तआला के नबी.

एक सख़्त अज़ाब के आगे(7){46}
(7) और वह आख़िरत का अज़ाब है.

तुम फ़रमाओ मैं ने तुमसे इस पर कुछ अज्र मांगा तो वह तुम्हीं को(8)
(8) यानी मैं नसीहत और हिदायत और रिसालत की तबलीग़ पर तुम से कोई उजरत नहीं तलब करता.

मेरा अज्र तो अल्लाह ही पर है, और वह हर चीज़ पर गवाह है {47} तुम फ़रमाओ बेशक मेरा रब हक़ (सत्य) का इल्क़ा फ़रमाता है(9)
(9) अपने नबियों की तरफ़.

बहुत जानने वाला सब ग़ैबों (अज्ञात) का {48} तुम फ़रमाओ हक़ (सत्य) आया(10)
(10) यानी क़ुरआन और इस्लाम.

और बातिल (असत्य) न पहल करे और न फिर कर आए(11) {49}
(11) यानी शिर्क और कुफ़्र मिट गया. उसकी शुरूआत रही न उसका पलट कर आना. मुराद यह है कि वह हलाक हो गया.

तुम फ़रमाओ अगर में बहका तो अपने ही बुरे को बहका(12)
(12) मक्के के काफ़िर हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहते थे कि आप गुमराह हो गए. अल्लाह तआला ने अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को हुक्म दिया कि आप उनसे फ़रमा दे कि अगर यह मान लिया जाए कि मैं बहका तो इसका वबाल मेरे नफ़्स पर है.

और अगर मैं ने राह पाई तो उसके कारण जो मेरा रब मेरी तरफ़ वही (देववाणी) फ़रमाता है(13)
(13) हिकमत और बयान की क्योंकि राह पाना उसकी तौफ़ीक़ और हिदायत पर है. नबी सब मअसूम होते हैं. गुनाह उनसे हो ही नहीं सकता और हुज़ूर तो नबियों के सरदार हैं. सृष्टि को नेकियों की राहें आपके अनुकरण से मिलती हैं. बुज़ुर्गी और ऊंचे दर्जे के बावुजूद आपको हुक्म दिया गया कि गुमराही की निस्बत सिर्फ़ मान लेने की हद तक अपो नफ़्स की तरफ़ फ़रमाएं ताकि ख़ल्क़ को मालूम हो कि गुमराही का मन्शा इन्सान का नफ़्स है जब उसको उसपर छोड़ दिया जाता है, उससे गुमराही पैदा होती है और हिदायत अल्लाह तआला की रेहमत और मेहरबानी और उसी के दिये से हासिल होती है, नफ़्स उसका मन्शा नहीं.

बेशक वह सुनने वाला नज़्दीक़ है(14) {50}
(14) हर राह पाए हुए और गुमराह को जानता है और उनके कर्मों और चरित्र से बाख़बर है. कोई कितना ही छुपाए किसी का हाल उससे छुप नहीं सकता. अरब के एक बड़े मशहूर शायर इस्लाम लाए तो काफ़िरों ने उनसे कहा कि तुम अपने दीन से फिर गए और इतने बड़े शायर और ज़बान वाले होकर मुहम्मद पर ईमान लाए. उन्होंने कहा हाँ, वह मुझ पर ग़ालिब आ गए. क़ुरआने करीम की तीन आयतें मैंने सुनीं और चाहा कि उनके काफ़िये पर तीन शेअर कहूँ बहुत मेहनत की, जान लड़ाई, अपनी सारी शक्ति लगा दी मगर यह संभव न हो सका. तब मुझे यक़ीन हो गया कि यह इन्सान का कलाम नहीं, वो आयतें इसी सूरत की 48वीं, 49वीं, और 50वीं आयतें हैं (रूहुल बयान)

और किसी तरह तू देखे (15)
(15) काफ़िरों को, मरने या क़ब्र से उठने के वक़्त या बद्र के दिन.

जब वो घबराहट में डाले जाएंगे फिर बचकर न निकल सकेंगे(16)
(16) और कोई जगह भागने और पनाह लेने की न पा सकेंगे.

और एक क़रीब जगह से पकड़ लिये जाएंगे (17){51}
(17) जहाँ भी होंगे  क्योंकि कहीं भी हों, अल्लाह तआला की पकड़ से दूर नहीं हो सकते. उस वक़्त हक़ की पहचान के लिये बेचैन होंगे.

और कहेंगे हम उसपर ईमान लाए (18)
(18) यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर.

और अब वो उसे कैसे पाएं इतनी दूर जगह से (19) {52}
(19) यानी जब मुकल्लफ़ होने के महल से दूर होकर तौबह और ईमान कैसे पा सकेंगे.

कि पहले (20)
(20) यानी अज़ाब देखने से पहले

तो उससे कुफ़्र कर चुके थे, और बे देखे फैंक मारते हैं(21)
(21) यानी बे जाने कह गुज़रते हैं जैसा कि उन्हों ने रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की शान में कहा था कि वह शायर हैं, जादूगर हैं, तांत्रिक हैं और उन्होंने कभी हुज़ूर से शेअर, व जादू व तंत्र विद्या का होना न देखा था.

दूर मकान से(22){53}
(22) यानी सच्चाई से दूर कि उन तअनों को सच्चाई से ज़रा भी नज़्दीक़ी नहीं.

और रोक कर दी गई उनमें और उसमें और उसमें जिसे चाहते हैं(23)
(23)  यानी तौबह और ईमान में.

जैसे उनके पहले गिरोहों से किया गया था(24)
(24)कि उनकी तौबह और ईमान यास के वक़्त क़ुबूल न फ़रमाई गई.

बेशक वो धोका डालने वाले शक में थे(25){54}
(25) ईमानियत के मुतअल्लिक़.