7-सूरतुल अअराफ़

7-सूरतुल अअराफ़  
सूरए अअराफ़ मक्का में उतरी, इसमें दो सौ छ आ़यतें और चौबीस रूकू हैं.

सूरए अअराफ़ – पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
अलिफ़-लाम-मीम-सॉद, {1} ऐ मेहबूब! एक किताब तुम्हारी तरफ़ उतारी गई तो तुम्हारा जी उससे न रूके (2)
इसलिये कि तुम उससे डर सुनाओ और मुसलमानों को नसीहत {2} ऐ लोगो उसपर चलो जो तुम्हारी तरफ़ तुम्हारे रब के पास से उतरा(3)
और उसे छोड़कर और हाकिमों के पीछे न जाओ बहुत ही कम समझते हो {3} और कितनी ही बस्तियां हमने हलाक कीं (4)
तो उनपर हमारा अज़ाब रात में आया या जब वो दोपहर को सोते थे (5){4}
तो उनके मुंह से कुछ न निकला जब हमारा अज़ाब उनपर आया मगर यही बोले कि हम ज़ालिम थे (6){5}
तो बेशक ज़रूर हमें पूछना है जिनके पास रसूल गए (7)
और बेशक हमें पूछना है रसूलों से (8){6}
तो ज़रूर हम उनको बता देंगे(9)
अपने इल्म से और हम कुछ ग़ायब न थे {7} और उस दिन तौल ज़रूर होनी है(10)
तो जिनके पल्ले भारी हुए(11)
वही मुराद को पहुंचे {8} और जिनके पल्ले हलके हुए (12)
तो वही हैं जिन्होंने अपनी जान घाटे में डाली उन ज़ियादतियों का बदला जो हमारी आयतों पर करते थे (13) {9} और बेशक हमने तुम्हें ज़मीन में जमाव बनाए (14)
बहुत ही कम शुक्र करते हो (15) {10}

तफ़सीर सूरए-अअराफ़

(1) यह सूरत मक्कए मुकर्रमा में उतरी. एक रिवायत में है कि यह सूरत मक्की है, सिवाय पाँच आयतों के, जिनमें से पहली “व असअलुहुम अनिल क़रय़तिल्लती” है. इस सूरत में दो सौ छ आयतें, चौबीस रूकू, तीन हज़ार तीन सौ पच्चीस कलिमे और चौदह हज़ार दस हुरूफ़ हैं.

(2) इस ख़याल से कि शायद लोग न मानें और इससे अलग रहें और इसे झुटलाने पर तुले हों.

(3) यानी क़ुरआन शरीफ़, जिसमें हिदायत व नूर का बयान है. ज़ुजाज ने कहा कि अनुकरण करो क़ुरआन का और उस चीज़ का जो नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम लाए, क्योंकि यह सब अल्लाह का उतारा हुआ है, जैसा कि क़ुरआन शरीफ़ में फ़रमाया “मा आताकुमुर्रसूलो फ़ख़ज़ूहो. “ यानी जो कुछ रसूल तुम्हारे पास लाएं उसे अपना लो और जिससे मना फ़रमाएं उससे बाज़ रहो.

(4) अब अल्लाह के हुक्म का अनुकरण छोड़ने और उससे आँख फेरने के नतीजे पिछली क़ौमों के हालात में दिखाए जाते हैं.

(5) मानी ये हैं कि हमारा अज़ाब ऐसे वक़्त आया जबकि उन्हें ख़याल भी न था. या तो रात का वक़्त था, और वो आराम की नींद सोते थे, या दिन में क़ैलूले का वक़्त था, और वो राहत में मसरूफ़ थे. न अज़ाब उतरने की कोई निशानी थी, न क़रीना, कि पहले से अगाह होते. अचानक आ गया. इससे काफ़िरों को चेतावनी दी जाती है कि वो अम्न और राहत के साधनों पर घमण्ड न करें. अल्लाह का अज़ाब जब आता है तो अचानक आता है.

(6) अज़ाब आने पर उन्होंने अपने जुर्म का ऐतिराफ़ किया और उस वक़्त का ऐतिराफ़ भी कोई फ़ायदा नहीं देता.

(7) कि उन्होंने रसूलों की दअवत का क्या जवाब दिया और उनके हुक्म की क्या तामील अर्थात अनुकरण किया.

(8) कि उन्होंने अपनी उम्मतों को हमारे संदेश पहुंचाए और उन उम्मतों ने उन्हें क्या जवाब दिया.

(9) रसूलों को भी और उनकी उम्मतों को भी कि उन्होंने दुनिया में क्या किया.

(10) इस तरह कि अल्लाह तआला एक तराज़ू क़ायम फ़रमाएगा जिसका हर पलड़ा इतना विस्तृत होगा जितना पूर्व और पश्चिम के बीच विस्तार है. इब्ने जौज़ी ने कहा कि हदीस में आया है कि हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम ने तराज़ू (मीज़ान) देखने की दरख़्वास्त की. जब मीज़ान दिखाई गई और आपने उसके पलड़ों का विस्तार देखा तो अर्ज़ किया यारब, किसकी ताक़त है कि इनको नेकियों से भर सके. इरशाद हुआ कि ऐ दाऊद, मैं जब अपने बन्दों से राज़ी होता हूँ तो एक खजूर से इसको भर देता हूँ. यानी थोड़ी सी नेकी भी क़ुबूल हो जाए तो अल्लाह के फ़ज़्ल से इतनी बढ़ जाती है कि मीज़ान को भर दे.

(11) नेकियाँ ज़्यादा हुई.

(12) और उनमें कोई नेकी न हुई. यह काफ़िरों का हाल होगा जो ईमान से मेहरूम है और इस वजह से उनका कोई अमल मक़बूल नहीं.

(13) कि उनको छोड़ते थे, झुटलाते थे, उनकी इताअत से मुंह मोड़ते थे.

(14) और अपनी मेहरबानी से तुम्हें राहतें दीं, इसके बावुजूद तुम…

(15) शुक्र की हक़ीक़त, नेअमत का तसव्वुर और उसका इज़हार है और नाशुक्री, नेअमत को भूल जाना और उसको छुपाना.

सूरए अअराफ़ – दूसरा रूकू

सूरए अअराफ़ – दूसरा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और बेशक हमने तुम्हें पैदा किया फिर तुम्हारे नक़्शे बनाए फिर हमने फ़रिश्तों से फ़रमाया कि आदम को सज्दा करो तो वो सब सज्दे में गिरे मगर इब्लीस, यह सज्दे वालों में न हुआ{11} फ़रमाया किस चीज़ ने तुझे रोका कि तूने सज्दा न किया जब मैंने हुक्म दिया था (1)
बोला मैं उससे बेहतर हूँ तूने मुझे आग से बनाया और उसे मिट्टी से बनाया (2){12}
फ़रमाया तू यहाँ से उतर जा तुझे नहीं पहुंचता कि यहां रहकर घमण्ड करे निकल (3)
तू है ज़िल्लत वालों में (4){13}
बोला मुझे फ़ुरसत दे उस दिन तक कि लोग उठाए जाएं {14} फ़रमाया तुझे मोहलत है (5){15}
बोला तो क़सम इसकी कि तूने मुझे गुमराह किया मैं ज़रूर तेरे सीधे रास्ते पर उनकी ताक में बैठूंगा (6){16}
फिर ज़रूर मैं उनके पास आऊंगा उनके आगे और उनके पीछे और उनके दाऐं और उनके बाएं से(7)
और तू उनमें से अक्सर को शुक्रगुज़ार न पाएगा (8){17}
फ़रमाया यहाँ से निकल जा रद किया गया, रोंदा हुआ, ज़रूर जो उनमें से तेरे कहे पर चला मैं तुम सबसे जहन्नम भर दूंगा (9){18}
और ऐ आदम तू और तेरा जोड़ा (10)
जन्नत में रहो तो उससे जहां चाहो खाओ और उस पेड़ के पास न जाना कि हद से बढ़ने वालों में होगे {19} फिर शैतान ने उनके जी में ख़तरा डाला कि उनपर खोलदे उनकी शर्म की चीज़े (11)
जो उनसे छुपी थीं (12)
और बोला तुम्हें तुम्हारे रब ने इस पेड़ से इसलिये मना फ़रमाया है कि कहीं तुम दो फ़रिश्ते हो जाओ या हमेशा जीने वाले (13) {20}
और उनसे क़सम खाई कि मैं तुम दोनो का भला चाहने वाला हूँ {21} तो उतार लाया उन्हें धोखे से (14)
फिर जब उन्होंने वह पेड़ चखा उनपर उनकी शर्म की चीज़ें खुल गईं (15)
और अपने बदन पर जन्नत के पत्ते चिपटाने लगे, और उन्हें उनके रब ने फ़रमाया क्या मैं ने तुम्हें इस पेड़ से मना न किया और न फ़रमाया था कि शैतान तुम्हारा खुला दुश्मन है {22} दोनों ने अर्ज़ की ऐ रब हमारे हमने अपना आप बुरा किया तो अगर तू हमें बख़्शे और हमपर रहम न करें तो हम ज़रूर नुक़सान वालों में हुए {23} फ़रमाया उतरो (16)
तुम में एक दूसरे का दुश्मन है और तुम्हें ज़मीन में एक वक़्त तक ठहरना और बरतना है {24} फ़रमाया उसी में जियोगे और उसी में उठाए जाओगे (17){25}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – दूसरा रूकू

(1) इससे साबित होता है कि हुक्म अनिवार्यता के लिये होता है और सज्दा न करने का कारण दरियाफ़्त फ़रमाना तौबीख़ के लिये है, और इसलिये कि शैतान की दुश्मनी और उसका कुफ़्र और घमण्ड और अपनी अस्ल पर गर्व करना और हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के अस्ल का निरादर करना ज़ाहिर हो जाए.

(2) इससे उसकी मुराद यह थी कि आग मिट्टी से उत्तम और महान है तो जिसकी अस्ल आग होगी वह उससे उत्तम होगा जिसकी अस्ल मिट्टी हो. और उस ख़बीस का यह ख़याल ग़लत और बातिल है, क्योंकि अफ़ज़ल वह है जिसे मालिक व मौला फ़ज़ीलत दे. फ़ज़ीलत का आधार अस्ल व जौहर पर नहीं. बल्कि मालिक की फ़रमाँबरदारी पर है. और आग का मिट्टी से उत्तम होना, यह भी सही नहीं है, क्योंकि आग में क्रोध और तेज़ी और ऊंचाई छूने की हविस है. यह कारण घमण्ड का होता है. और मिट्टी से इल्म, हया और सब्र का आदर प्राप्त होता है. मिट्टी से मुल्क आबाद होते हैं, आग से नष्ट, मिट्टी अमानतदार है, जो चीज़ उसमें रखी जाए, उसको मेहफूज़ रखे और बढ़ाए. आग फ़ना कर देती है. इसके बावुजूद लुत्फ़ यह है कि मिट्टी आग को बुझा देती है और आग मिट्टी को फ़ना नहीं कर सकती. इसके अलावा इब्लीस की मूर्खता और कटुता यह कि उसने खुले प्रमाण के होते हुए उसके मुक़ाबले में अपने अन्दाज़े से काम लेना चाहा और जो अन्दाज़ा खुले हुक्म और प्रमाण के खिलाफ़ हो वह ज़रूर मरदूद हैं.

(3) जन्नत से, कि यह जगह फ़रमाँबरदारी और विनम्रता वालों के लिये है, इन्कार और सरकशी करने वालों की नहीं.

(4) कि इन्सान तेरा त्रस्कार करेगा और हर ज़बान तुझपर लअनत करेगी और यही घमण्ड वाले का अंजाम है.

(5) और इस मुद्दत की मोहलत सूरए हिज्र मे बयान फ़रमाई गई “इन्नका मिनल मुन्ज़रीना इला यौमिल वक़्तिल मअलूम” तू उनमें है जिनको उस मअलूम वक़्त के दिन तक मोहलत है. (सूरए हिज्र, आयत 37). और यह वक़्त पहली बार के सूर फूंके जाने का है, जब सब लोग मर जाएंगे. शैतान ने मुर्दों के ज़िन्दा होने के वक़्त तक की मोहलत चाही थी और इससे उसका मतलब यह था कि मौत की सख़्ती से बच जाए. यह क़ुबूल न हुआ और पहले सूर तक की मोहलत दी गई.

(6) कि बनी आदम के दिल में वसवसे डालूं और उन्हें बातिल की तरफ़ माइल करूं, गुनाहों की रूचि दिलाऊं, तेरी इताअत और इबादत से रोकूं, और गुमराही में डालूं.

(7) यानी चारों तरफ़ से उन्हें घेर कर सीधी राह से रोकूंगा.

(8) चूंकि शैतान बनी आदम को गुमराह करने और वासनाओं तथा बुराइयों में गिरफ़्तार करने में अपनी अत्यन्त कोशिश ख़र्च करने का इरादा कर चुका था, इसलिये उसे गुमान था कि वह बनी आदम को बहका लेगा, उन्हें धोखा देकर अल्लाह की नेअमतों के शुक्र और उसकी फ़रमाँबरदारी से रोक देगा.

(9) तूझको भी और तेरी सन्तान को भी, और तेरा अनुकरण करने वाले आदमियों को भी, सबको जहन्नम में दाख़िल किया जाएगा. शैतान को जन्नत से निकाल देने के बाद हज़रत आदम को ख़िताब फ़रमाया जो आगे आता है.

(10) यानी हज़रत हव्वा.

(11) यानी ऐसा वसवसा डाला कि जिसका नतीजा यह हो कि वो दोनों आपस में एक दूसरे के सामने नंगे हो जाएं. इस आयत से यह मसअला साबित हुआ कि वह जिस्म जिसको औरत कहते हैं उसका छुपाना ज़रूरी और खोलना मना है. और यह भी साबित हुआ कि उसका खोलना हमेशा से अक़्ल के नज़दीक ख़राब और तबीअत के नागवार रहा है.

(12) इससे मालूम हुआ कि इन दोनों साहिबों ने अबतक एक दूसरे का मुंह न देखा था.

(13) कि जन्नत में रहो और कभी न मरो.

(14) मानी ये हैं कि इब्लीस मलऊन ने झूठी क़सम खाकर हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को धोखा दिया और पहला झूठी क़सम खाने वाला इब्लीस ही है. हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को गुमान भी न था कि कोई अल्लाह की क़सम खाकर झूठ बोल सकता है.

(15) और जन्नती लिबास जिस्म से अलग हो गए और उनमें एक दूसरे से अपना बदन छुपा न सका. उस वक़्त तक उनमें से किसी ने ख़ुद भी अपना छुपा हुआ बदन न देखा था और न उस वक़्त तक इसकी ज़रूरत ही पेश आई थी.

(16) ऐ आदम और हव्वा, अपनी सन्तान समेत जो तुम में है.

(17) क़यामत के दिन हिसाब के लिये.

सूरए अअराफ़ – तीसरा रूकू

सूरए अअराफ़ – तीसरा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

ऐ आदम की औलाद बेशक हमने तुम्हारी तरफ़ एक लिबास वह उतारा कि तुम्हारी शर्म की चीज़ें छुपाए और एक वह कि तुम्हारी आरायश (सजावट) हो(1)
और परहेज़गारी का लिबास वह सबसे भला (2)
यह अल्लाह की निशानीयों में से है कि कहीं वो नसीहत मानें {26} ऐ आदम की औलाद(3)
ख़बरदार तुम्हें शैतान फ़ितने (मुसीबत) में न डाले जैसा तुम्हारे मां बाप को बहिश्त (स्वर्ग) से निकाला उतरवा दिये उनके लिबास कि उनकी शर्म की चीज़ें उन्हें नज़र पड़ीं, बेशक वह और उसका कुम्बा तुम्हें वहां से देखते हैं कि तुम उन्हें नहीं देखते(4)
बेशक हमने शैतानों को उनका दोस्त किया है जो ईमान नहीं लाते {27} और जब कोई बेहयाई करें(5)
तो कहते हैं हमने इसपर अपने बाप दादा को पाया और अल्लाह ने हमें इसका हुक्म दिया(6)
तो फ़रमाओ बेशक अल्लाह बेहयाई का हुक्म नहीं देता, क्या अल्लाह पर वह बात लगाते हो जिसकी तुम्हें ख़बर नहीं {28} तुम फ़रमाओ मेरे रब ने इन्साफ़ का हुक्म दिया है और अपने मुंह सीधे करो हर नमाज़ के वक़्त और उसकी इबादत करो निरे उसके वैसे होकर जैसे उसने तुम्हारा आगाज़ (आरम्भ) किया वैसे ही पलटोगे (7){29}
एक फ़िरके (समुदाय)को राह दिखाई (8)
और एक फ़िरके की गुमराही साबित हुई (9)
उन्होंने अल्लाह को छोड़कर शैतान को वाली (सरपरस्त) बनाया (10)
और समझते यह हैं कि वो राह पर हैं {30} ऐ आदम की औलाद, अपनी ज़ीनत (सजावट) लो जब मस्जिद में आओ (11)
और खाओ पियो (12)
और हद से न बढ़ो, बेशक हद से बढने वाले उसे पसन्द नहीं {31}

सूरए अअराफ़ – तीसरा रूकू

(1) यानी एक लिबास तो वह है जिससे बदन छुपाया जाए और गुप्तांग ढके जाएं और एक लिबास वह है जिससे ज़ीनत और श्रंगार हो और यह भी उचित कारण है.

(2) परहेज़गारी का लिबास ईमान, शर्म, नेक आदतें, अच्छे कर्म हैं. यह बेशक ज़ाहिरी श्रंगार के लिबास से बेहतर हैं.
(3) शैतान की हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के साथ दुश्मनी का बयान फ़रमाकर बनी आदम को चेतावनी दी जा रही है और होशियार किया जा रहा है कि वह शैतान के वसवसे और उसके छलकपट और बहकावे से बचते रहें. जो हज़रत आदम के साथ ऐसा धोखा कर चुका है वह उनकी औलाद के साथ कब चूकने वाला है.

(4) अल्लाह तआला ने जिन्नों को ऐसी समझ दी है कि वो इन्सानों को देखते हैं और इन्सानों को ऐसी दृष्टि नहीं मिली कि वो जिन्नों को देख सकें. हदीस शरीफ़ में है कि शैतान इन्सान के जिस्म में ख़ून की राहों में पैर जाता है. हज़रत ज़ुन्नून मिस्त्री रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि अगर शैतान ऐसा है कि वह तुम्हें देखता है तुम उसे नहीं देख सकते, तो तुम ऐसे से मदद चाहो जो उसको देखता है और वह उसे न देख सके यानी अल्लाह करीम, सत्तार, रहीम, ग़फ़्फ़ार से मदद चाहो.

(5) और कोई बुरा काम या गुनाह उनसे हो, जैसा कि जिहालत के दौर में लोग, मर्द और औरत, नंगे होकर काबे का तवाफ़ करते थे. अता का कौल है कि बेहयाई शिर्क है और हकीक़त यह है कि हर बुरा काम और तमाम गुनाह छोटे बड़े इसमें दाख़िल हैं. अगरचे यह आयत ख़ास नंगे होकर तवाफ़ करने के बारे में आई हो. जब काफ़िरों की ऐसी बेहयाई के कामों पर उनकी कटु आलोचना की गई तो इस पर उन्होंने जो कहा वह आगे आता है.

(6) काफ़िरों ने अपने बुरे कामों के दो बहाने बयान किये, एक तो यह कि उन्होंने अपने बाप दादा को यही काम करते पाया, लिहाज़ा उनके अनुकरण में ये भी करते हैं. यह तो जाहिल बदकार का अनुकरण हुआ और यह किसी समझ वाले के नज़दीक जायज़ नहीं. अनुकरण किया जाता है इल्म और तक़वा वालों का, न कि जाहिल गुमराह का. दूसरा बहाना उनका यह था कि अल्लाह ने उन्हें इन कामों का हुक्म दिया है. यह केवल झूठ और बोहतान था. चुनांचे अल्लाह तआला रद फ़रमाता है.

(7)यानी जैसे उसने तुम्हें शून्य से अस्तित्व दिया ऐसे ही मौत के बाद ज़िन्दा फ़रमाएगा. ये आख़िरत की ज़िन्दगी का इन्कार करने वालों पर तर्क है और इससे यह भी मालूम होता है कि जब उसीकी तरफ़ पलटना है और वह कर्मों को बदला देगा तो फ़रमाँबरदारी और इबादतों को उसके लिये विशेष करना ज़रूरी है.

(8) ईमान और अल्लाह की पहचान की और उन्हें फ़रमाँबरदारी और इबादत की तौफ़ीक़ दी.

(9) वो काफ़िर है.

(10) उनकी फ़रमाँबरदारी की, उनके कहे पर चले, उनके हुक्म से कुफ़्र और गुनाहों का रास्ता अपनाया.

(11) यानी सजधज और श्रंगार का लिबास. और एक कथन यह है कि कंघी करना, खुश्बू लगाना श्रंगार में दाख़िल है. और सुन्नत यह है कि आदमी अच्छी सूरत के साथ नमाज़ के लिये हाज़िर हो क्योंकि नमाज़ में रब से मांगना होता है, तो इसके लिये श्रंगार करना, इत्र लगाना मुस्तहब, जैसा कि गुप्तांग ढाँपना और पाकी वाजिब है. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है, जाहिलियत के दौर में दिन में मर्द और औरतें नंगे होकर तवाफ़ करते थे. इस आयत में गुप्तांग छुपाने और कपड़े पहनने का हुक्म दिया गया और इसमें दलील है कि गुप्तांग का ढाँपना नमाज़ व तवाफ़ और हर हाल में वाजिब है.

(12) कल्बी का क़ौल है कि बनी आमिर हज के ज़माने में अपनी ख़ुराक बहुत ही कम कर देते थे और गोश्त व चिकनाई तो बिल्कुल ही न छुते थे और इसको हज का आदर जानते थे. मुसलमानों ने उन्हें देखकर अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह, हमें ऐसा करने का ज़्यादा हक़ है. इस पर उतरा कि खाओ और पियो, गोश्त हो या सिर्फ़ चिकनाई. और फ़ुज़ूल ख़र्ची न करो और वह यह है कि पेट भर जाने के बाद भी खाते रहो या हराम की पर्वाह न करो और यह भी फ़ुज़ूल ख़र्ची है कि जो चीज़ अल्लाह तआला ने हराम नहीं की, उसको हराम कर लो. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अनहुमा ने फ़रमाया जो चाहे खा और जो चाहे पहन, फ़ुज़ूल ख़र्ची और घमण्ड से बचता रह. इस आयत में दलील है कि खाने पीने की तमाम चीज़ें हलाल हैं, सिवाय उनके जिनपर शरीअत में हुरमत की दलील क़ायम हो क्योंकि यह क़ायदा निश्चत और सर्वमान्य है कि अस्ल तमाम चीज़ों में अबाहत है मगर जिसपर शरीअत ने पाबन्दी लगाई हो और उसकी हुरमत दलीले मुस्तक़िल से साबित हो.

सूरए अअराफ़ – चौथा रूकू

सूरए अअराफ़ – चौथा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

तुम फ़रमाओ, किस ने हराम की अल्लाह की वह ज़ीनत जो उसने अपने बन्दों के लिये निकाली(1)
और पाक रिज़्क़(रोज़ी) (2)
तुम फ़रमाओ कि वह ईमान वालों के लिये है दुनिया में और क़यामत में तो ख़ास उन्हीं की है हम यूंही मुफ़स्सल(विस्तार से) आयतें बयान करते हैं (3)
इल्म वालो के लिये(4) {32}
तुम फ़रमाओ, मेरे रब ने तो बेहयाइयां हराम फ़रमाई हैं (5)
जो उनमें खुली हैं और जो छुपी और गुनाह और नाहक़ ज़ियादती और यह (6)
कि अल्लाह का शरीक करो जिसकी उसने सनद न उतारी और यह(7)
कि अल्लाह पर यह बात कहो जिसका इल्म नहीं रखते {33} और हर गिरोह का एक वादा है (8)
तो जब उनका वादा आएगा एक घड़ी न पीछे हो न आगे {34} ऐ आदम की औलाद अगर तुम्हारे पास तुम में के रसूल आएं (9)
मेरी आयतें पढ़ते तो जो परहेज़गारी करे (10)
और संवरे (11)
तो उसपर न कुछ डर और न कुछ ग़म{35} और जिन्होंने हमारी आयतें झुटलाई और उनके मुक़ाबले घमण्ड किया वो दोज़ख़ी हैं, उन्हें उसमें हमेशा रहना {36} तो उससे बढ़कर ज़ालिम कौन जिसने अल्लाह पर झूट बांधा या उसकी आयतें झुटलाई उन्हें उनके नसीब का लिखा पहुंचेगा (12)
यहां तक कि जब उनके पास हमारे भेजे हुए (13)
उनकी जान निकालने आएं तो उनसे कहते हैं कहां है वो जिनको तुम अल्लाह के सिवा पूजते थे, कहते हैं वो हम से गुम गए (14)
और अपनी जानों पर आप गवाही देते हैं कि वो काफ़िर थे {37} अल्लाह उनसे (15)
फ़रमाता है कि तुमसे पहले जो और जमाअतें (दल) थीं जिन्न और आदमियों की आग में गई उन्हीं में जाओ जब एक दल(16)
दाख़िल होता है दूसरे पर लअनत करता है (17)
यहां तक कि जब सब उसमें जा पड़े तो पिछले पहलों को कहेंगे (18)
ऐ रब हमारे, इन्होंने हमको बहकाया था तो उन्हें आग का दूना अज़ाब दे, फ़रमाएगा सबको दूना है(19)
मगर तुम्हें ख़बर नहीं(20) {38}
और पहले पिछलों से कहेंगे, तो तुम कुछ हमसे अच्छे न रहे (21)
तो चखो अज़ाब, बदला अपने किये का(22){39}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – चौथा रूकू

(1) चाहे लिबास हो या और ज़ीनत व श्रंगार का सामान.

(2) और खाने पीने की मज़ेदार चीज़ें. आयत में आम बयान है. हर खाने की चीज़ इसमें दाख़िल है कि जिसके हराम होने पर कोई खुला हुक्म न आया हो (ख़ाज़िन). तो जो लोग तोशा ग्यारहवीं, मीलाद शरीफ़, बुज़ुर्गों की फ़ातिहा, उर्स, शहादत की मजलिसों वग़ैरह की शीरीनी, सबील के शरबत को वर्जित कहते हैं, वो इस आयत का ख़िलाफ़ करके गुनाहगार होते हैं और इसको अवैध कहना अपनी राय को दीन में दाख़िल करना है और यही बिदअत और गुमराही है.

(3) जिनसे हालात और हराम के अहकाम मालूम हों.

(4) जो ये जानते हैं कि अल्लाह एक है, उसका कोई शरीक नहीं है, वह जो हराम करे वही हराम है.

(5) यह सम्बोधन मुश्रिकों से है जो नंगे होकर काबे का तवाफ़ करते थे और अल्लाह तआला की हलाल की हुई पाक चीज़ों को हराम कर लेते थे. उनसे फ़रमाया जाता है कि अल्लाह तआला ने ये चीज़ें हराम नहीं की और उनसे अपने बन्दों को नहीं रोका. जिन चीज़ों को उसने हराम फ़रमाया वो ये हैं जो अल्लाह तआला बयान फ़रमाता है. इनमें से बेहयाइयाँ है जो खुली हुई हों या छुपी हुई. यानी जिनका सम्बन्ध बातों से है या कर्मों से.

(6) हराम किया.

(7) हराम किया.

(8) निशिचित समय, जिसपर मोहलत ख़त्म हो जाती है.

(9) मुफ़स्सिरों के इसमें दो क़ौल हैं. एक तो यह कि “रूसुल” से तमाम रसूल मुराद हैं. दूसरा यह कि ख़ास सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मुराद हैं जो तमाम सृष्टि की तरफ़ रसूल बनाए गए और बहुवचन सम्मान के लिये है.

(10) मना की हुई चीज़ों से बचे.

(11) आज्ञा का पालन करे और इबादते पूरी करे.

(12) यानी जितनी उम्र और रोज़ी अल्लाह ने उनके लिये लिख दी है, उनको पहुंचेगी.

(13) मौत का फ़रिश्ता और उसके सहायक, इन लोगों की उम्रें और रोज़ियाँ पूरी होने के बाद.

(14) उनका कहीं नाम निशान ही नहीं.

(15) उन काफ़िरों से क़यामत के दिन.

(16) दोज़ख़ में.

(17) जो उसके दीन पर था तो मुश्रिकों पर लानत करेंगे और यहूदी यहूदीयों पर और ईसाई ईसाइयों पर.

(18) यानी पहलों की निस्बत अल्लाह तआला से कहेंगे.

(19) क्योंकि पहले ख़ुद भी गुमराह हुए और उन्होंने दूसरों को भी गुमराह किया और पिछले भी ऐसे ही हैं कि ख़ुद गुमराह हुए और गुमराहों का ही अनुकरण करते रहे.

(20) कि तुम में से हर पक्ष के लिये कैसा अज़ाब है.

(21) कुफ्र और गुमराही में दोनों बराबर है.

(22) कुफ़्र का और बुरे कर्मों का.

सूरए अअराफ़ – पाँचवां रूकू

सूरए अअराफ़ – पाँचवां रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

वो जिन्होंने हमारी आयतें झुटलाई और उनके मुक़ाबले में घमण्ड किया उनके लिये आसमान के दर्वाज़े न खोले जाएंगे (1)
और न वो जन्नत में दाख़िल हों जब तक सुई के नाके ऊंट दाख़िल न हो(2)
और मुजरिमों को हम ऐसा ही बदला देते हैं (3){40}
उन्हें आग ही बिछौना और आग ही ओढ़ना (4)
और ज़ालिमों को हम ऐसा ही बदला देते हैं{41} और वो जो ईमान लाए और ताक़त भर अच्छे काम किये हम किसी पर ताक़त से ज़्यादा बोझ नहीं रखते, वो जन्नत वाले हैं उन्हें हमेशा उसी मे रहना{42} और हमने उनके सीनों मे से कीने (द्वेष) खींच लिये (5)
उनके नीचे नेहरें बहेंगी और कहेंगे (6)
सब ख़ूबियां अल्लाह को जिसने हमें इसकी राह दिखाई (7)
और हम राह न पाते अगर अल्लाह हमें राह न दिखाता बेशक हमारे रब के रसूल हक़ लाए (8)
और निदा (पुकार) हुई कि यह जन्नत तुम्हें मीरास मिली (9)
सिला (इनाम) तुम्हारे कर्मों का {43} और जन्नत वालों ने दोज़ख़ वालों को पुकारा कि हमें तो मिल गया जो सच्चा वादा हमसे हमारे रब ने किया था (10)
तो क्या तुमने भी पाया जो तुम्हारे रब ने (11)
सच्चा वादा तुम्हें दिया था, बोले हां और बीच में मनादी (उदघोषक) ने पुकार दिया कि अल्लाह की लअनत ज़ालिमों पर {44} जो अल्लाह की राह से रोकते हैं (12)
और उससे कजी (टेढ़ापन) चाहते हैं (13)
और आख़िरत का इन्कार रखते हैं {45} और जन्नत व दोज़ख़ के बीच में एक पर्दा हैं (14)
और अअराफ़ (ऊंचाइयों) पर कुछ मर्द होंगे (15)
कि दोनों फ़रीक़ (पक्षों) को उनकी परेशानियों से पहचानेंगे (16)
और वो जन्नतियों को पुकारेंगे कि सलाम तुमपर ये (17)
जन्नत में न गए और इसका लालच रखते हैं {46} और जब उनकी (18)
आंखें दोज़ख़ियों की  तरफ़ फिरेंगी कहेंगे ऐ रब हमारे हमें ज़ालिमों के साथ न कर {47}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – पाँचवां रूकू

(1) न उनके कर्मों के लिये, न उनकी आत्माओं के लिये, क्योंकि उनके कर्म और आत्माएं दोनों ख़बीस हैं. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि काफ़िरों की आत्माओं के लिये आसमान के दरवाज़े नहीं खोले जाते और ईमान वालों की आत्माओं के लिये खोले जाते हैं. इब्ने जरीह ने कहा कि आसमान के दरवाज़े न काफ़िरों के अमल के लिये खोले जाएं न आत्माओं के लिये यानी न ज़िन्दगी में उनका अमल ही आसमान पर जा सकता है, न मौत के बाद आत्मा. इस आयत की तफ़सीर में एक क़ौल यह भी है कि आसमान के दरवाज़े न खोले जाने के ये मानी हैं कि वह ख़ैर व बरकत और रहमत उतरने से मेहरूम रहते हैं.

(2) और यह असम्भव, तो काफ़िरों का जन्नत में दाख़िल होना असम्भव, क्योंकि असम्भव पर जो निर्भर हो वह असम्भव होता है. इससे साबित हुआ कि काफ़िरों का जन्नत से मेहरूम रहना यक़ीनी बात है.

(3) मुजरिमीन से यहाँ काफ़िर मुराद हैं क्योंकि ऊपर उनकी सिफ़त में अल्लाह की निशानियों को झुटलाने और उनसे घमण्ड करने का बयान हो चुका है.

(4) यानी ऊपर नीचे हर तरफ़ से आग उन्हें घेरे हुए है.

(5) जो दुनिया में उनके बीच थे और तबीअतें साफ़ कर दी गई और उनमें आपस में न बाक़ी रही मगर महब्बत और भाई चारगी. हज़रत अली मुरतज़ा रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि यह हम बद्र वालों के बारे में उतरा. और यह भी आप से रिवायत है कि आप ने फ़रमाया, मुझे उम्मीद है कि मैं और उस्मान और तलहा और ज़ुबैर उनमें से हों जिनके बारे में अल्लाह तआला ने “व नज़अना माफ़ी सुदूरिहिम मिन ग़िल्लिन” (और हमने उनके सीनों में से कीने खींच लिये) फ़रमाया. हज़रत अली मुरतज़ा के इस इरशाद ने राफ़ज़ियत की बुनियाद ही काटकर रख दी.

(6) ईमान वाले, जन्नत में दाख़िल होते वक़्त.

(7) और हमें ऐसे अमल की तोफ़ीक़ दी जिसका यह इनाम और सवाब है, और हम पर मेहरबानी और रहमत फ़रमाई और अपने करम से जहन्नम के अज़ाब से मेहफूज़ किया.

(8) और जो उन्होंने हमें दुनिया में सवाब की ख़बरें दीं वो सब हमने ज़ाहिर देख लीं. उनकी हिदायत हमारे लिये अत्यन्त लुत्फ़ और करम की बात थी.

(9) मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है, जब जन्नत में दाख़िल होंगे, एक पुकारने वाला पुकारेगा, तुम्हारे लिये ज़िन्दगानी है, कभी न मरोगे, तुम्हारे लिये तन्दुरूस्ती है, कभी बीमार न होगे, तुम्हारे लिये राहत है, कभी तंग हाल न होगे, जन्नत को मीरास फ़रमाया गया, इसमें इशारा है कि वह सिर्फ़ अल्लाह के करम से हासिल हुई.

(10) और रसूलों ने फ़रमाया था कि ईमान और फ़रमाँबरदारी पर इनाम और सवाब पाओगे.

(11) कुफ़्र और नाफ़रमानी पर अज़ाब का.

(12) और लोगों को इस्लाम में दाख़िल होने से मना करते हैं.

(13) यानी यह चाहते हैं कि अल्लाह के दीन को बदल दें और जो तरीक़ा अल्लाह तआला ने अपने बन्दों के लिये मुक़र्रर फ़रमाया है, उसमें परिवर्तन कर दें. (ख़ाज़िन)

(14) जिसको अअराफ़ कहते हैं.

(15) ये किस तबक़े के होंगे, इसमें विभिन्न कथन हैं. एक क़ौल तो यह है कि ये वो लोग होंगे जिनकी नेकियाँ और बुराइयाँ बराबर हों, वो आराम पर ठहरे रहेंगे. जब जन्नत वालों की तरफ़ देखेंगे तो उन्हें सलाम करेंगे और दोज़ख़ वालों की तरफ़ देखेंगे तो कहेंगे, यारब हमें ज़ालिम क़ौम के साथ न कर. आख़िरकार जन्नत में दाख़िल किये जाएंगे. एक क़ौल यह है कि जो लोग जिहाद में शहीद हुए मगर उनके माँ बाप उनसे नाराज़ थे, वो अअराफ़ में ठहराए जाएंगे. एक क़ौल यह है कि जो लोग ऐसे हैं कि उनके माँ बाप में से एक उनसे राज़ी हो, एक नाराज़, वो अअराफ़ में रखे जाएंगे. इन कथनों से मालूम होता है कि अअराफ़ वालों का दर्जा जन्नत वालों से कम है. मुजाहिद का क़ौल है कि अअराफ़ में नेक लोग, फ़कीर और उलमा होंगे और उनका वहाँ ठहरना इसलिये होगा कि दूसरे उनके दर्जें और बुज़ुर्गी को देखें. और एक क़ौल यह है कि अअराफ़ में नबी होंगे और वो उस ऊंचे मकाम में सारे क़यामत वालों पर विशिष्ट किये जाएंगे और उनकी फ़ज़ीलत और महानता का इज़हार किया जाएगा ताकि जन्नती और दोज़ख़ी उनको देखें और वो उन सबके अहवाल और सवाब व अज़ाब की मात्रा का अवलोकन करें. इन क़ौलों पर अअराफ़ वाले जन्नतियों से अफ़ज़ल लोग होंगे क्योंकि वो बाक़ियों से दर्जें में महान हैं. इन तमाम कथनों में कोई टकराव नहीं है. इसलिये कि हो सकता है कि हर तबक़े के लोग अअराफ़ में ठहराए जाएं और हर एक के ठहराए जाने की हिकमत अलग है.

(16) दोनों पक्षों से जन्नती और दोज़ख़ी मुराद हैं. जन्नतियों के चेहरे सफ़ेद और ताज़ा होंगे और दोज़ख़ियों के चेहरे काले और आँख़ें नीली, यही उनकी निशानियां हैं.

(17) अअराफ़ वाले अभी तक.

(18) अअराफ़ वालों की.

सूरए अअराफ़ – छटा रूकू

सूरए अअराफ़ – छटा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और अअराफ़ वाले कुछ मर्दों को (1)
पुकारेंगे जिन्हें उनकी पेशानी से पहचानते हैं कहेंगे तुम्हें क्या काम आया तुम्हारा जत्था और वह जो तुम घमण्ड करते थे(2){48}
क्या ये हैं वो लोग (3)
जिनपर तुम क़समें खाते थे कि अल्लाह इनपर अपनी रहमत कुछ न करेगा (4)
इनसे तो कहा गया कि जन्नत में जाओ न तुम को डर न कुछ ग़म {49} और दोज़ख़ वाले जन्नत वालों को पुकारेंगे कि हमें अपने पानी का कुछ फ़ैज़ (लाभ) दो या उस खाने का जो अल्लाह ने तुम्हें दिया (5)
कहेंगे बेशक अल्लाह ने इन दोनों को काफ़िरों पर हराम किया है {50} जिन्होंने अपने दीन को खेल तमाशा बना लिया (6)
और दुनिया की ज़िन्दगी में उन्हें धोखा दिया(7)
तो आज हम उन्हें छोड़ देंगे जैसा हमारी आयतों से इन्कार करते थे {51} और बेशक हम उनके पास एक किताब लाए (8)
जिसे हमने एक बड़े इल्म से मुफ़स्सल (विस्तृत) किया हिदायत व रहमत ईमान वालों के लिये {52} काहे की राह देखते हैं मगर इसकी कि इस किताब का कहा हुआ अनजाम सामने आए जिस दिन इसका बताया हुआ अंजाम वाक़े होगा(9)
बोल उठेंगे वो जो इसे पहले से भुलाए बैठे थे (10)
कि बेशक हमारे रब के रसूल हक़ लाए थे तो हैं कोई हमारे सिफ़ारिशी जो हमारी शफ़ाअत (सिफ़ारिश) करेंगे या हम वापस भेजे जाएं कि पहले कामों के ख़िलाफ़ करें (11)
बेशक उन्होंने अपनी जानें नुक़सान में डालीं और उनसे खोए गए जो बोहतान (लांछन) उठाते थे(12){43}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – छटा रूकू

(1) काफ़िरों में से.

(2) और अअराफ़ वाले ग़रीब मुसलमानों की तरफ़ इशारा करके काफ़िरों से कहेंगे.

(3) जिनको तुम दुनिया में हक़ीर या तुच्छ समझते थे, और………

(4) अब देख लो कि जन्नत के हमेशा के ऐश और राहत में किस इज़्ज़त और सम्मान के साथ हैं.

(5) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि जब अअराफ़ वाले जन्नत में चले जाएंगे तो दोज़ख़ियों को भी लालच आएगा और वो अर्ज़ करेंगे, यारब जन्नत में हमारे रिश्तेदार हैं इजाज़त अता फ़रमा कि हम उन्हें देख़ें, उनसे बात करें. इजाज़त दी जाएगी तो वो अपने रिश्तेदारों को जन्नत की नेअमतों में देखेंगे और पहचानेंगे. लेकिन जन्नत वाले उन दोज़ख़ी रिश्तेदारों को न पहचानेंगे क्योंकि दोज़ख़ियों के मुंह काले होंगे, सूरतें बिगडी हुई होंगी. तो वो जन्नतियों का नाम ले लेकर पुकारेंगे. कोई अपने बाप को पुकारेगा, कोई भाई को, और कोई कहेगा, मैं जल गया मुझपर पानी डालो और तुम्हें अल्लाह ने दिया है, खाने को दो, इस पर जन्नत वाले.

(6) कि हलाल और हराम में अपनी नफ़्सानियत के ग़ुलाम हुए, जब ईमान की तरफ़ उन्हें दअवत दी गई तो हंसी उड़ाने लगे.

(7) इसकी लज़्ज़तों में आख़िरत को भूल गए.

(8) क़ुरआन शरीफ़.

(9) और वह क़यामत का दिन है.

(10) न उसपर ईमान लाते थे न उसके अनुसार अमल करते थे.

(11) यानी बजाय कुफ़्र के ईमान लाएं और बजाय बुराई और नाफ़रमानी के ताअत और फ़रमाँबरदारी इख़्तियार करें. मगर न उन्हें शफ़ाअत मिलेगी न दुनिया में वापस भेजे जाएंगे.

(12) और झूठ बकते थे कि बुत ख़ुदा के शरीक हैं और अपने पुजारियों की शफ़ाअत करेंगे. अब आख़िरत में उन्हें मालूम हो गया कि उनके ये दावे झूठे थे.

सूरए अअराफ़ – सातवाँ रूकू

सूरए अअराफ़ – सातवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

बेशक तुम्हारा रब अल्लाह है जिसने आसमान और ज़मीन (1)
छ दिन में बनाए (2)
फिर अर्श पर इस्तिवा फ़रमाया जेसा उसकी शान के लायक़ है (3)
रात दिन को एक दूसरे से ढांकता है कि जल्द उसके पीछे लगा आता है और सूरज और चांद और तारों को बनाया सब उसके हुक्म के दबे हुए, सुन लो उसी के हाथ है पैदा करना और हुक्म देना बड़ी बरकत वाला है अल्लाह रब सारे जगत का {54} अपने रब से दुआ करो गिड़गिड़ाते और आहिस्ता बेशक हद से बढ़ने वाले उसे पसन्द नहीं (4){55}
और ज़मीन में फ़साद न फैलाओ (5)
उसके संवरने के बाद(6)
और उससे दुआ करो डरते और तमा(लालच) करते, बेशक अल्लाह की रहमत नेकों से क़रीब है {56} और वही है कि हवाएं भेजता है उसकी रहमत के आगे ख़ुशख़बरी सुनाती(7)
यहां तक कि जब उठा लाएं भारी बादल हमने उसे किसी मुर्दा शहर की तरफ़ चलाया(8)
फिर उससे पानी उतारा फिर उससे तरह तरह के फल निकाले, इसी तरह हम मुर्दों को निकालेंगे(9)
कहीं तुम नसीहत मानो {57} और जो अच्छी ज़मीन है उसका सब्ज़ा अल्लाह के हुक्म से निकलता है (10)
और जो ख़राब है उसमें नहीं निकलता मगर थोड़ा मुश्किल(11)
से हम यूंही तरह तरह से आयतें बयान करते हैं(12)
उनके लिये जो एहसान मानें {58}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – सातवाँ रूकू

(1) उन तमाम चीज़ों समेत जो उनके बीच है, जैसा कि दूसरी आयत में आया “वलक़द ख़लक़नस समावाते वल अर्दा वमा बैनहुमा फ़ी सित्तते अय्यामिन” (बेशक हमने आसमानों और ज़मीन को और जो कुछ उनके बीच है छ: दिन में बनाया – सूरए क़ाफ़, आयत 38)

(2) छ: दिन से दुनिया के छ: दिनों की मिक़दार मुराद है क्योंकि ये दिन तो उस वक़्त थे नहीं. सूरज ही न था, जिससे दिन होता और अल्लाह तआला क़ादिर था कि एक क्षण में या उससे कम में पैदा फ़रमाता. लेकिन इतने अर्से में उनकी पैदाइश फ़रमाना उसकी हिकमत का तक़ाज़ा है और इससे बन्दों को अपने काम एक के बाद एक करने का सबक़ मिलता है.

(3) यह इस्तिवा मुतशाबिहात में से है, यानी क़ुरआन के वो राज़ जिनका इल्म सिर्फ़ अल्लाह तआला को और उसके बताए से किसी और को है. हम इसपर ईमान लाते हैं कि अल्लाह तआला की इस “इस्तिवा” से जो मुराद है, वह हक़ है. हज़रत इमाम अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया कि इस्तिवा मालूम है और उसकी कैफ़ियत मजहूल और उस पर ईमान लाना वाजिब. आला हज़रत रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया इसके मानी ये हैं कि आफ़रीनश का ख़ात्मा अर्श पर जा ठहरा. अपने कलाम के राज़ अल्लाह ही बेहतर जाने.

(4) दुआ अल्लाह तआला से भलाई तलब करने को कहते हैं और यह इबादत में दाख़िल है, क्योंकि यह दुआ करने वाला अपने आपको आजिज़ व मोहताज और अपने परवर्दिगार को हक़ीक़ी क़ुदरत वाला और हाजत पूरी करने वाला मानता है, इसीलिये हदीस शरीफ़ में आया “अद दुआओ मुख़्खुल इबादते” यानी दुआ इबादत का गूदा है. गिड़गिड़ाने से अपनी आजिज़ी और फ़रियाद मुराद है और दुआ का अदब यह है कि आहिस्ता दुआ करना, खुलेआम दुआ करने से सत्तर दर्जा ज़्यादा अफ़ज़ल है. इसमें उलमा का इख़्तिलाफ़ है कि इबादतों में इज़हार अफ़ज़ल है, या इख़फ़ा. कुछ कहते है कि इख़्फ़ा यानी छुपाना अफ़ज़ल है क्योंकि वह रिया यानी दिखावे से बहुत दूर है. कुछ कहते है कि इज़हार यानी ज़ाहिर करना, खोलना अफ़ज़ल है इसलिये कि इससे दूसरों को इबादत की रूचि पैदा होती है. तिरमिज़ी ने कहा कि अगर आदमी अपने नफ़्स पर रिया का अन्देशा रखता हो तो उसके लिये इख़्फ़ा यानी छुपाना अफ़ज़ल है. और अगर दिल साफ़ हो, रिया का अन्देशा न हो तो इज़हार अफ़ज़ल है. कुछ हज़रात ये फ़रमाते हैं कि फ़र्ज़ इबादतों में इज़हार अफ़ज़ल है. फ़र्ज़ नमाज़ मस्जिद ही में बेहतर है और ज़कात का इज़हार करके देना ही अफ़ज़ल और नफ़्ल इबादतों में, चाहे वह नमाज़ हो या सदक़ा वग़ैरह, इनमें इख़्फ़ा बेहतर है. दुआ में हद से बढ़ना कई तरह होता है, इसमें से एक यह भी है कि बहुत बलन्द आवाज़ से चीख़े.

(5) कुफ़्र और बुराई और ज़ुल्म करके.

(6) नबियों के तशरीफ़ लाने, हक़ की दअवत फ़रमाने, अहकाम बयान करने, इन्साफ़ क़ायम फ़रमाने के बाद.

(7) बारिश और रहमत से यहाँ मेंह मुराद है.

(8) जहाँ बारिश न हुई थी, सब्जा न जमा था.

(9) यानी जिस तरह मुर्दा ज़मीन को वीरानी के बाद ज़िन्दगी अता फ़रमाता और उसको हराभरा और तरो ताज़ा करता है और उसमें खेती, दरख़्त, फल फूल पैदा करता है, ऐसे ही मुर्दों को क़ब्रों से ज़िन्दा करके उठाएगा, क्योंकि जो ख़ुश्क लकड़ी से तरो ताज़ा फल पैदा करने पर क़ादिर है उसे मुर्दों का ज़िन्दा करना क्या मुश्किल है. क़ुदरत की निशानी देख लेने के बाद अक़्ल वाले और सही समझ वाले को मुर्दों के ज़िन्दा किये जाने में कोई शक बाक़ी नहीं रहता.

(10) यह ईमान वाले की मिसाल है. जिस तरह उमदा ज़मीन पानी से नफ़ा पाती है और उसमें फूल फल पैदा होते है उसी तरह जब मूमिन के दिल पर क़ुरआनी नूर की बारिश होती है तो वह उससे नफ़ा पाता है, ईमान लाता है, ताअतों और इबादतों से फलता फूलता है.

(11) यह काफ़िर की मिसाल है, जैसे ख़राब ज़मीन बारिश से नफ़ा नहीं पाती, ऐसे ही काफ़िर क़ुरआने पाक से फ़ायदा नहीं उठा पाता.

(12) जो तौहीद और ईमान पर तर्क और प्रमाण हैं.