सूरए माइदा – पहला रूकू

सूरए माइदा – पहला रूकू
सूरए माइदा मदीना में उतरी और इसमें एक सौ आयतें और सोलह रूकू हैं .

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
ऐ ईमान वालो अपने क़ौल (वचन)पूरे करो (2)
तुम्हारे लिये हलाल हुए बे ज़बान मवेशी मगर वो जो आगे सुनाया जाएगा तुमको (3)
लेकिन शिकार हलाल न समझो जब तुम एहराम में हो (4)
बेशक अल्लाह हुक्म फ़रमाता है जो चाहे (1)
ऐ ईमान वालो हलाल न ठहरा लो अल्लाह के निशान (5)
और न अदब वाले महीने (6)
और न हरम को भेजी हुई क़ुर्बानियां और न (7)
जिनके गले में अलामतें (चिन्ह) लटकी हुई (8)
और न उनका माल और आबरू जो इज़्ज़त वाले घर का इरादा करके आएं (9)
अपने रब का फ़ज़्ल और उसकी ख़ुशी चाहते और जब एहराम से निकलो तो शिकार कर सकते हो (10)
और तुम्हें किसी क़ौम की दुश्मनी, कि उन्होंने तुम को मस्जिदे हराम से रोका था, ज़ियादती करने पर न उभारे (11)
और नेकी और परहेज़गारी पर एक दूसरे की मदद करो और गुनाह और ज़ियादती पर आपस में मदद न दो (12)
और अल्लाह से डरते रहो, बेशक अल्लाह का अज़ाब सख़्त है (2) तुमपर हराम है (13)
मुर्दार और ख़ून और सुअर का गोश्त और वह जिसके ज़िब्ह में ग़ैर ख़ुदा का नाम पुकारा गया और वो जो गला घोंटनें से मरे और बेधार की चीज़ से मारा हुआ और जो गिर कर मरा और जिसे किसी जानवर ने सींग मारा और जिसे कोई दरिन्दा खा गया, मगर जिन्हें तुम ज़िब्ह कर लो और जो किसी थान पर ज़िब्ह किया गया और पाँसे डाल कर बाँटा करना यह गुनाह का काम है आज तुम्हारे दीन की तरफ़ काफ़िरों की आस टूट गई (14)
तो उनसे न डरो और मुझसे डरो आज मैंने तुम्हारे लिये तुम्हारा दीन कामिल (पूर्ण) कर दिया (15)
और तुमपर अपनी नेमत पूरी करी (16)
और तुम्हारे लिये इस्लाम को दीन पसन्द किया (17)
तो जो भूख प्यास की शिद्दत (तेज़ी) में नाचार हो यूं कि गुनाह की तरफ़ न झुकें (18)
तो बेशक अल्लाह बख़्श्ने वाला मेहरबान है (3) ऐ मेहबूब, तुम से पूछते हैं कि उनके लिये क्या हलाल हुआ तुम फ़रमादो कि हलाल की गईं तुम्हारे लिये पाक चीज़ें(19)
और जो शिकारी जानवर तुम ने सधा लिये (20)
उन्हें शिकार पर दौङाते जो इल्म तुम्हें ख़ुदा ने दिया उसमें से उन्हें सिखाते तो खाओ उस में से जो वो मारकर तुम्हारे लिये रहने दें (21)8817988717
और उसपर अल्लाह का नाम लो (22)
और अल्लाह से डरते रहो बेशक अल्लाह को हिसाब करते देर नहीं लगती (4)
आज तुम्हारे लिये पाक चीज़ें हलाल हुईं और किताबियों का खाना (23)
तुम्हारे लिये हलाल है और तुम्हारा खाना उनके लिये हलाल है और पारसा औरतें मुसलमान (24)
और पारसा औरतें उनमें से जिनको तुम से पहले किताब मिली जब तुम उन्हें उनके मेहर दो क़ैद में लाते हुए (25)
न मस्ती निकालते हुए और न आशना बनाते (26)
और जो मुसलमान से काफ़िर हो उसका किया धरा सब अकारत गया और वह आख़िरत में घाटे वाला है (27)(5)

तफ़सीर :
सूरए माइदा – पहला रूकू

(1) सुरए माइदा मदीनए तैय्यिबह में उतरी, सिवाय आयत “अल यौमा अकमल्तो लकुम दीनकुम” के. यह आयत हज्जतुल वदाअ में अरफ़े के दिन उतरी और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ख़ुत्बे में इसको पढ़ा. इस सूरत में सोलह रूकू, एक सौ बीस आयतें और बारह हज़ार चारसौ चौसठ अक्षर हैं.

(2) “क़ौल” के मानी में मुफ़स्सिरों के कुछ क़ौल हैं. इब्ने जरीर ने कहा कि किताब वालों को ख़िताब फ़रमाया गया है. मानी यह हैं कि ऐ किताब वालों में के ईमान वालो, हमने पिछली किताबों में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाने और आपकी फ़रमाँबरदारी करने के सम्बन्ध में जो एहद लिये हैं वो पूरे करो. कुछ मुफ़स्सिरों का क़ौल है कि ख़िताब ईमान वालों को है, उन्हें क़ौल के पूरे करने का हुक्म दिया गया है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया, कि इस क़ौल से मुराद ईमान और वो एहद हैं जो हलाल और हराम के बारे में क़ुरआने पाक मे लिये गये हैं. कुछ मुफ़स्सिरों का कहना है कि इसमें ईमान वालों के आपसी समझौते मुराद हैं.

(3) यानि जिनकी हुरमत शरीअत में आई है. उनके सिवा तमाम चौपाये तुम्हारे लिये हलाल किये गये.

(4) कि ख़ुश्की का शिकार एहराम की हालत में हराम है, और दरियाई शिकार जायज़ है, जैसे कि इस सूरत के आख़री में आयेगा.

(5) उसके दीन की बातें, मानी ये हैं कि जो चीज़े अल्लाह ने फ़र्ज़ कीं और जो मना फ़रमाई, सबकी हुरमत का लिहाज़ रखो.

(6) हज के महीने, जिनमें क़िताल यानी लड़ाई वग़ैरह जाहिलियत के दौर में भी माना था, और इस्लाम में भी यह हुक्म बाकि रखा.

(7) वो क़ुरबानियाँ

(8) अरब के लोग क़ुरबानियों के गले में हरमशरीफ़ के दरख़्तों के छल वगैरह से गुलूबन्द बुनकर डालते थे ताकि देखने वाले जान लें कि ये हरम को भेजी हुई क़ुरबानियाँ हैं और उनसे न उलझें.

(9) हज और उमरा करने के लिये, शरीह बिन हिन्द एक मशहूर शक़ी (दुश्मन) था. वह मदीनए तैय्यिबह मे आया और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर कहने लगा कि आप ख़ल्क़े ख़ुदा को क्या दावत देते हैं. फ़रमाया, अपने रब के साथ ईमान लाने और अपनी रिसालत की तस्दीक़ करने और नमाज़ क़ायम रखने और ज़कात देने की. कहने लगा, बहुत अच्छी दावत है. मैं अपने सरदारों से राय ले लूं तो मैं भी इस्लाम ले आऊंगा और उन्हें भी लाऊंगा. यह कहकर चला गया. हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उसके आने से पहले ही अपने सहाबा को ख़बर दे दी थी कि रबीआ क़बीले का एक शख़्स आने वाला है जो शैतानी ज़बान बोलेगा. उसके चले जाने के बाद हुज़ूर ने फ़रमाया कि काफ़िर का चेहरा लेकर आया था और ग़द्दार और बदएहद की तरह पीठ फेरकर चला गया. यह इस्लाम लाने वाला नहीं. चुनांचे उसने बहाना किया और मदीना शरीफ़ से निकलते हुए वहाँ के मवेशी और माल ले गया. अगले साल यमामा के हाजियों के साथ तिजारत का बहुत सा सामान और हज की क़लावा पोश क़ुरबानियाँ लेकर हज के इरादे से निकला. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अपने सहाबा के साथ तशरीफ़ ले जा रहे थे. राह में सहाबा ने शरीह को देखा और चाहा कि मवेशी उससे वापस ले लें. रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने मना फ़रमाया. इस पर यह आयत उतरी और हुक्म दिया गया कि जिसकी ऐसी हालत हो उससे तआरूज़ नहीं  करना चाहिये.

(10) यह बयाने अबाहत है कि एहराम के बाद शिकार मुबाह हो जाता है.

(11) यानी मक्का वालों ने रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को और आपके सहाबा को हुदैबिया के दिन उमरे से रोका. उनके इस दुश्मनी वाले काम का तुम बदला न लो.

(12) कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया, जिसका हुक्म दिया गया उसका बजा लाना बिर, और जिससे मना फ़रमाया गया उसको छोड़ देना तक़वा, और जिसका हुक्म दिया गया उसको न करना “इस्म” (गुनाह), और जिससे मना किया गया उसको करना उदवान (ज़ियादती) कहलाता है.

(13) आयत “इल्ला मा युतला अलैकुम” में जो ज़िक्र  फ़रमाया गया था. यहाँ उसका बयान है और ग्यारह चीज़ों की हुरमत का ज़िक्र किया गया. एक मुर्दार यानी जिस जानवर के लिये शरीअत में ज़िबह का हुक्म हो और वह बेज़िबहं मर जाए, दूसरे बहने वाला ख़ून तीसरे सुअर का गोश्त और उसके तमाम अंग, चौथे वह जानवर जिसके ज़िबह के वक़्त ग़ैर ख़ुदा का नाम लिया गया हो जैसा कि जाहिलियत के ज़माने में लोग बुतों के नाम पर ज़िबह करते थे और जिस जानवर को ज़िबह तो सिर्फ़ अल्लाह के नाम पर किया गया हो मगर दूसरे औक़ात में वह ग़ैर ख़ुदा की तरफ़ मन्सूब रहा वह हराम नहीं जैसे कि अब्दुल्लाह की गाय, अक़ीक़े का बकरा, वलीमे का जानवर या वह जानवर जिनसे वलियों की आत्माओं को सवाब पहुंचाना मन्ज़ूर हो, उनको ग़ैर वक़्ते ज़िबह में वलियों के नामों के साथ नामज़द किया जाए मगर ज़िबह उनका फ़क़त अल्लाह के नाम पर हो, उस वक़्त किसी दूसरे का नाम न लिया जाए वो हलाल और पाक हैं. इस आयत में सिर्फ़ उसी को हराम फ़रमाया गया है जिसको ज़िबह करते वक़्त ग़ैरख़ुदा का नाम लिया गया हो. वहाबी जो ज़िबह की क़ैद नहीं लगाते वो आयत के मानी में ग़लती करते हैं और उनका क़ौल तमाम जानी मानी तफ़सीरों के ख़िलाफ़ है.  और ख़ुद आयत उनके मानी को बनने नहीं देती क्योंकि “मा उहिल्ला बिही” को अगर ज़िबहके वक़्त के साथ सीमित न करे तो “इल्ला मा ज़क्कैतुम” की छूट उसको लाहिक़ होगी और वो जानवर जो ग़ैर वक़्त ज़िबह ग़ैर ख़ुदा के नाम से मौसुम रहा हो वह “इल्ला मा ज़क्कैतुम” से हलाल होगा. ग़रज़ वहाबी को आयत से सनद लाने की कोई सबील नहीं. पाँचवां गला घोंट कर मारा हुआ जानवर, छटे वह जानवर जो लाठी, पत्थर, ढेले, गोली, छर्रे, यानि बिना धारदार चीज़ से मारा गया हो, सातवें जो गिरकर मरा हो चाहे पहाड़ से या कुएं वगैरह में, आठवें वह जानवर जिसे दूसरे जानवर ने सिंग मारा हो और वह उसके सदमें से मर गया हो, नवें वह जिसे किसी दरिन्दें ने थोड़ा सा खाया हो और वह उसके जख़्म की तक़लीफ़ से मर गया हो लेकिन अगर ये जानवर मर गये हों और ऐसी घटनाओ के बाद जिन्दा बच रहे हो फिर तुम उन्हें बाका़यदा ज़िब्ह कर लो तो वो हलाल हैं, दसवें वह जो किसी थान पर पूजा की तरह ज़िबह किया गया हो जैसे कि ज़ाहिलियत वालों ने काबे के चार तरफ़ 360 पत्थर नसब किये थे जिनकी वो इबादत करते थे और उनके लिये ज़िबह करते थे, ग्यारहवें, हिस्सा और हुक्म जानने के लिये पाँसा डालना. जाहिलियत के दौर के लोगों को जब सफ़र या जंग या तिजारत या निकाह वग़ैरह के काम दरपेश होते तो वो तीरों से पाँसे डालते और जो निकलता उसके मुताबिक़ अमल करते और उसको ख़ुदा का हुक़्म मानते. इन सब से मना फ़रमाया गया.

(14) यह आयत अरफ़े के दिन जो जुमे का था, अस्र बाद नाज़िल हुई. मानी ये है कि काफ़िर तुम्हारे दीन पर ग़ालिब आने से मायूस हो गये.

(15) और उमूरे तकलीफ़ा में हराम और हलाल के जो एहकाम हैं वो और क़यास के क़ानून सब मुकम्मल कर दिये. इसीलिये इस आयत के उतरने के बाद हलाल व हराम के बयान की कोई आयत नाज़िल न हुई. अगरचे “वत्तक़ू यौमन तुरजऊना फ़ीहे इलल्लाह” नाज़िल हुई मगर वह आयत नसीहत और उपदेश की है. कुछ मुफ़स्सिरों का क़ौल है कि दीन कामिल करने के मानी इस्लाम को ग़ालिब करना है, जिसका यह असर है कि हज्जतुल वदाअ में जब यह आयत उतरी, कोई मुश्रिक मुसलमानों के साथ हज में शरीक न हो सका.एक क़ौल यह भी है कि दीन का पूरा होना यह है कि वह पिछली शरीअतों की तरह स्थगित न होगा और क़यामत तक बाक़ी रहेगा. बुख़ारी व मुस्लिम की हदीस में है कि हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो के पास एक यहूदी आया और उसने कहा कि ऐ अमीरूल मूमिनीन, आप की किताब में एक आयत है अगर वह हम यहूदियों पर उतरी होती तो हम उसके उतरने वाले दिन ईद मनाते. फ़रमाया, कौनसी आयत, उसने यही आयत “अलयौमा अकमल्तु लकुम” पढ़ी. आपने फ़रमाया, मैं उस दिन को जानता हूँ जिस दिन यह उतरी थी और इसके उतरने की जगह को भी पहचानता हूँ वह जगह अरफ़ात की थी और दिन जुमे का, आप की मुराद इससे यह थी कि हमारे लिये वह दिन ईद है. तिरमिज़ी शरीफ़ में हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है, आप से भी एक यहूदी ने ऐसा ही किया. आपने फ़रमाया कि जिस दिन यह आयत उतरी उस दिन दो ईदें थी. जुमा और अरफ़ा, इससे मालूम हुआ कि किसी दीनी कामयाबी के दिन को ख़ुशी का दिन मनाना जायज़ और सहाबा से साबित है, वरना हज़रत उमर व इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा साफ़ फ़रमा देते कि जिस दिन कोई ख़ुशी का वाक़िया हो उसकी यादगार क़ायम करना और उस रोज़ को ईद मानना हम बिदअत जानते हैं. इससे साबित हुआ कि ईद मीलाद मनाना जायज़ है क्योंकि वह अल्लाह की सबसे बड़ी नेमत की यादगार और शुक्र गुज़ारी है.

(16) मक्कए मुकर्रमा फ़त्ह फ़रमाकर.

(17) कि उसके सिवा कोई और दीन क़ुबूल नहीं.

(18) मानी ये है कि ऊपर हराम चीज़ों का बयान कर दिया गया है, लेकिन जब खाने पीने की कोई हलाल चीज़ मयस्सर ही न आए और भूख प्यास की सख़्ती से जान पर बन जाए, उस वक़्त जान बचाने के लिये ज़रूरी भर का खाने पीने की इजाज़त है, इस तरह कि गुनाह की तरफ़ मायल न हो यानी ज़रूरत से ज़्यादा न खाए और ज़रूरत उसी क़दर खाने से रफ़ा हो जाती है जिससे जान का ख़तरा जाता रहे.

(19) जिनकी हुरमत क़ुरआन व हदीस, इजमाअ और क़यास से साबित नहीं है. एक क़ौल यह भी है कि तैय्यिवात वो चीज़े है जिनको अरब और पाक तबीअत लोग पसन्द करते हैं और ख़बीस वो चीज़ें है जिनसे पाक तबीअतें नफ़रत करती हैं. इससे मालूम हुआ कि किसी चीज़ की हुरमत पर दलील न होना भी उसके हलाल होने के लिये काफ़ी है, यह आयत अदी इब्ने हातिम और ज़ैद बिन महलहल के बारे में उतरी जिनका नाम रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ज़ैदुल ख़ैर रखा था. इन दोनो साहिबों ने अर्ज़ की, या रसूलल्लाह, हम लोग कुत्ते और बाज़ के ज़रिये से शिकार करते हैं, तो क्या हमारे लिये हलाल है. तो इस पर यह आयत उतरी.

(20) चाहे वह दरिन्दों में से हो, कुत्तें और चीते जैसे, या शिकारी परिन्दों में से, शिकारे, बाज़, शाहीन वग़ैरह जैसे जब उन्हें इस तरह सधा लिया जाए कि जो शिकार करें उसमें से न खाएं और जब शिकारी उनको छोड़े तब शिकार पर जाएं, जब बुलाए, वापस आजाएं, ऐसे शिकारी जानवरों को मुअल्लम कहते हैं.

(21) और ख़ुद उसमें से न खाएं.

(22) आयत से जो निष्कर्ष निकलता है उसका खुलासा यह है कि जिस शख़्स ने कुत्ता या शिकरा वग़ैरह कोई शिकारी  जानवर शिकार पर छोड़ा तो उसका शिकार कुछ शर्तों से हलाल है (1) शिकारी जानवर मुसलमान का हो और सिखाया हुआ (2) उसने शिकार को ज़ख़्म लगाकर मारा हो. (3) शिकारी जानवर बिस्मिल्लाहे अल्लाहो अकबर कहकर छोड़ा गया हो,  (4) अगर शिकारी  के पास शिकार ज़िन्दा पहुंचा हो तो उसको बिस्मिल्लाहे अल्लाहो अकबर कहकर ज़िबह करे. अगर इन शर्तों में से कोई शर्त न पाई गई, तो हलाल न होगा. मसलन , अगर शिकारी  जानवर मुअल्लम  (सिखाया हुआ) न हो या उसने ज़ख़्म न किया हो या शिकार पर छोड़ते वक़्त बिस्मिल्लाहे अल्लाहो अकबर न पढ़ा  हो या शिकार ज़िन्दा पहुंचा हो और उसको ज़िबह न किया हो या सधाए हुए शिकारी जानवर के साथ बिना सिखाया हुआ जानवर शिकार में शरीक हो गया हो या ऐसा शिकारी जानवर शरीक हो गया हो जिसको छोड़ते वक़्त बिस्मिल्लहे अल्लाहो अकबर न पढ़ा गया हो या वह शिकारी जानवर मजूसी काफ़िर का हो, इन सब सूरतों में वह शिकार हराम है. तीर से शिकार करने का भी यही हुक्म है, अगर बिस्मिल्लाहे अल्लाहो अकबर कहकर तीर मारा और उससे शिकार ज़ख्मी हो कर गिर गया तो हलाल है और अगर न मरा तो दोबारा उसको बिस्मिल्लाहे अल्लाहो अकबर पढ़कर फिर से ज़िब्ह करे. अगर उसपर बिस्मिल्लाह न पढ़े या तीर का ज़ख़्म उस को न लगा या ज़िन्दा पाने के बाद उसको ज़िब्ह न किया, इन सब सूरतों में हराम है.

(23) यानी उनके ज़बीहे, मुसलमान और किताबी का ज़िब्ह किया हुआ जानवर हलाल है चाहे वह मर्द हो, औरतें हो, या बच्चा.

(24) निकाह करने में औरत को पारसाई का लिहाज़ मुस्तहब है लेकिन निकाह की सेहत के लिए शर्त नहीं.

(25) निकाह करके.

(26) नाजायज़ तरीके से मस्ती निकालने से बेधड़क ज़िना करना, और आशना बनाने से छुपवाँ ज़िना मुराद है.

(27) क्योंकि इस्लाम लाकर उससे फिर जाने से सारे अमल अकारत हो जाते हैं.

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सूरए माइदा – दूसरा रूकू

सूरए माइदा – दूसरा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
ऐ ईमान वालो जब नमाज़ को खङे होना चाहो (1)
तो अपना मुंह धोओ और कोहनियों तक हाथ (2)
और सरों का मसह करो (3)
और गट्टों तक पाँव धोओ (4)
और अगर तुम्हें नहाने की हालत जो तो ख़ूब सुथरे हो लो (5)
और अगर तुम बीमार हो या सफ़र में हो या तुम में से कोई पेशाब पाख़ाने से आया या तुमने औरतों से सोहबत की और उन सूरतों में पानी न पाया तो पाक मिट्टी से तयम्मुम करो तो अपने मुंह और हाथों का उससे मसह करो अल्लाह नहीं चाहता कि तुम पर कुछ तंगी रखे, हाँ यह चाहता है कि तुम्हें ख़ूब सुथरा कर दे और अपनी नेमत तुम पर पूरी कर दे कि कहीं तुम एहसान मानो (6)
और याद करो अल्लाह का एहसान अपने ऊपर (6)
और वह एहद जो उसने तुम से लिया (7)
जब कि तुमने कहा हमने सुना और माना (8)
और अल्लाह से डरो बेशक अल्लाह दिलों की बात जानता है (7)
ऐ ईमान वालो अल्लाह के हुक्म पर ख़ूब क़ायम हो जाओ इन्साफ़ के साथ गवाही देते (9)
और तुम को किसी क़ौम की दुश्मनी इसपर न उभारे कि इन्साफ़ न करो, इन्साफ़ करो वह परहेज़गारी से ज़्यादा क़रीब है और अल्लाह से डरो बेशक अल्लाह को तुम्हारे कामों की ख़बर है (8)
ईमान वाले नेकी करने वालों से अल्लाह का वादा है कि उनके लिये बख़्शिश और बङा सवाब है (9)
और जिन्होंने कुफ़्र किया और हमारी आयतें झुटलाई, वही दोज़ख़ वाले हैं (10) (10)
ऐ ईमान वालो, अल्लाह का एहसान अपने ऊपर याद करो जब एक क़ौम ने चाहा कि तुम पर दस्तदराज़ी (अत्याचार) करें तो उसने हाथ तुमपर से रोक दिये (11)
और अल्लाह से डरो और मुसलमानों को अल्लाह ही पर भरोसा चाहिये (11)

तफ़सीर :
सूरए माइदा – दूसरा रूकू

(1) और तुम बेवज़ू हो तो तुम पर वुज़ू फ़र्ज़ है और वुज़ू के फ़राइज़ ये चार हैं जो आगे बयान किए जाते हैं. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और आपके सहाबा हर नमाज़ के लिए ताज़ा वुज़ू करते थे. अगरचे एक वुज़ू से भी बहुत सी नमाज़े, फर्ज़ हों या नफ़्ल, पढ़ी जा सकती हैं मगर हर नमाज़ के लिए अलग वुज़ू करना ज़्यादा बरकत और सवाब दिलाता है. कुछ मुफ़स्सिरों का कहना है कि इस्लाम की शुरूआत में हर नमाज़ के लिए अलग वुज़ू फ़र्ज़ था, बाद में मनसूख़ यानी स्थगित किया गया और जब तक हदस वाक़े न हो, एक ही वुज़ू से फ़र्ज़ और नफ़्ल नमाज़ अदा करना जायज़ हुआ.

(2) कोहनियाँ भी धोने के हुक्म में दाख़िल हैं जैसा कि हदीस से साबित है. अकसर उलमा इसी पर हैं.

(3) चौथाई सर का मसह फ़र्ज़ है. यह मिक़दार हदीसे मुग़ीरा से साबित है और यह हदीस आयत का बयान है.

(4) यह वुज़ू का चौथा फ़र्ज़ है. सही हदीस में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने कुछ लोगों को पाँव पर मसह करते देखा तो मना फरमाया और अता से रिवायत है वह कसम खाकर फ़रमाते हैं कि मेरी जानकारी में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सहाबा में से किसी ने भी वुज़ू में पाँव का मसह न किया.

(5) जनाबत यानी शारीरिक तौर से नापाक हो जाने से पूरी तहारत लाज़िम होती है. जनाबत कभी जागते में जोश या वासना के साथ वीर्य के निकलने से होती है और कभी नींद में वीर्य निकलने से. जिसके बाद असर पाया जाए. यहाँ तक कि अगर ख़्वाब याद आया मगर तरी न पाई तो गुस्ल वाजिब न होगा. और कभी आगे पीछे की जगहों में लिंग के अगले भाग के दाख़िल किये जाने से काम करने वाले दोनों व्यक्तियों के हक़ में, चाहे वीर्य निकले या न निकले, ये तमाम सूरतें जनाबत (नापाकी) में दाख़िल हैं. इनमें ग़ुस्ल वाजिब हो जाता है. हैज़ (माहवारी) और ज़चगी के बाद की नापाकी से भी ग़ुस्ल वाजिब हो जाता है. माहवारी का मसअला सूरए बक़रह में गुज़र चुका और ज़चगी की नापाकी का मूजिबे ग़ुस्ल होना इजमाअ से साबित है. तयम्मुम का बयान सूरए निसा में गुज़र चुका.

(6) कि तुम्हें मुसलमान किया.

(7) नबिये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से बैअत करते वक़्त अक़बा की रात और बैअते रिज़वान में.

(8) नबिये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का हर हुक्म हर हाल में.

(9) इस तरह कि क़राबत और दुश्मनी का कोई असर तुम्हें इन्साफ़ से न हटा सके.

(10) यह आयत पुख़्ता प्रमाण है इस पर कि दौज़ख़ में दाख़ला सिवाए काफ़िर के और किसी के लिये नहीं.

(11) एक बार नबिये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने एक मन्ज़िल में क़याम किया. सहाबा अलग अलग दरख़्तों के साए में आराम करने लगे. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अपनी तलवार एक पेड़ में लटका दी. एक अअराबी मौक़ा पाकर आया और छुपकर उसने तलवार ली और तलवार खींच कर हुज़ूर से कहने लगा, ऐ मुहम्मद, तुम्हें मुझसे कौन बचाएगा. हुज़ूर ने फ़रमाया, अल्लाह. यह फ़रमाना था कि हज़रत जिब्रील ने उसके हाथ से तलवार गिरा दी. नबिये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने तलवार लेकर फ़रमाया कि तुझे मुझसे कौन बचाएगा. कहने लगा, कोई नहीं. मैं गवाही देता हूँ कि अल्लाह के सिवा कोई मअबूद नहीं और गवाही देता हूँ कि मुहम्मद मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उसके रसूल हैं. (तफ़सीरे अबुस्सऊद)

सूरए माइदा – तीसरा रूकू

सूरए माइदा – तीसरा रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
और बेशक अल्लाह ने बनी इस्त्राईल से एहद लिया (1)
और हमने उनमें बारह सरदार क़ायम किये (2)
और अल्लाह ने फ़रमाया बेशक मैं (3)
तुम्हारे साथ हूँ ज़रूर अगर तुम नमाज़ क़ायम रखो और ज़कात दो और मेरे रसूलों पर ईमान लाओ और उनकी ताज़ीम (आदर) करो और अल्लाह को क़र्ज़े हसन दो (4)
बेशक मैं तुम्हारे गुनाह उतार दूंगा और ज़रूर तुम्हें बागों में ले जाऊंगा जिनके नीचे नेहरें बहें फिर उसके बाद जो तुम में से कुफ़्र करे वह ज़रूर सीधी राह से बहका (5)(12)
तो उनकी कैसी बद-एहदीयों (वचन भंग) (6)
पर हमने उन्हें लअनत की और उनके दिल सख़्त कर दिये अल्लाह की बातों को (7)
उनके ठिकानों से बदलते हैं और भुला बैठे बङा हिस्सा उन नसीहतों का जो उन्हें दी गईं (8)
और तुम हमेशा उनकी एक न एक दग़ा पर मुत्तला (सूचित) होते रहोगे (9)
सिवा थोङों के (10)
तो उन्हें माफ़ करदो और उनसे दरगुज़रो (क्षमा करो) (11)
बेशक एहसान वाले अल्लाह को मेहबूब हैं (13)
और वो जिन्हों ने दावा किया कि हम नसारा (ईसाई) हैं हमने उनसे एहद किया (12)
तो वो भुला बैठे बङा हिस्सा उन नसीहतों का जो उन्हें दी गईं (13)
तो हमने उनके आपस में क़यामत के दिन तक बैर और बुग़्ज़ (द्वेष) डाला दिया (14)
और बहुत जल्द अल्लाह उन्हें बता देगा जो कुछ करते थे (15) (14)
ऐ किताब वालो (16)
बेशक तुम्हारे पास हमारे यह रसूल (17)
तसरीफ़ लाए कि तुमपर ज़ाहिर फ़रमाते हैं बहुत सी वो चीज़ें जो तुमने किताब में छुपा डाली थीं (18)
और बहुत सी माफ़ फ़रमाते हैं (19)
बेशक तुम्हारे पास अल्लाह की तरफ़ से एक नूर आया (20)
और रौशन किताब (21) (15)
अल्लाह उससे हिदायत देता है उसे जो अल्लाह की मर्जी़ पर चला सलामती के रास्ते और उन्हें अंधेरियों से रौशनी की तरफ़ ले जाता है अपने हुक्म से और उन्हें सीधी राह दिखाता है(16)
बेशक काफ़िर हुए वो जिन्होंने कहा कि अल्लाह मसीह मरयम का बेटा ही है (22)
तुम फ़रमा दो फिर अल्लाह का कोई क्या कर सकता है अगर वह चाहे कि हलाक करदे मसीह मरयम के बेटे और उसकी माँ और तमाम ज़मीन वालों को (23)
और अल्लाह ही के लिये है सल्तनत आसमानों और ज़मीन और उनके दरमियान की जो चाहे पैदा करता है और अल्लाह सब कुछ कर सकता है (17)
और यहुदी और ईसाई बोले कि हम अल्लाह के बेटे और उनके प्यारे हैं (24)
तुम फ़रमादो फिर तुम्हें क्यों तुम्हारे गुनाहों पर अज़ाब फ़रमाता है (25)
बल्कि तुम आदमी हो उसकी मख़लूक़ात (सृष्टि) से जिसे चाहे बख़्श्ता है और जिसे चाहे सज़ा देता है और अल्लाह के लिये है सल्तनत आसमानों और ज़मीन और इन के दरमियान की और उसीकी तरफ़ फिरना है(18)
ऐ किताब वालो बेशक तुम्हारे पास हमारे यह रसूल (26)
तशरीफ़ लाए कि तुमपर हमारे आदेश ज़ाहिर फ़रमाते हैं बाद इसके कि रसूलों का आना मुद्दतों (लम्बे समय तक) बन्द रहा था (27)
कि कभी कहो कि हमारे पास कोई ख़ुशी और डर सुनाने वाला न आया तो ये ख़ुशी और डर सुनाने वाले तुम्हारे पास तशरीफ़ लाए हैं और अल्लाह को सब क़ुदरत है (19)

तफसीर
सूरए माइदा – तीसरा रूकू

(1) कि अल्लाह की इबादत करेंगे, उसके साथ किसी को शरीक न करेंगे. तौरात के आदेशों का पालन करेंगे.

(2) हर गिरोह पर एक सरदार, जो अपनी क़ौम का ज़िम्मेदार हो कि वो एहद पूरा करेंगे और हुक्म पर चलेंगे.

(3) मदद और सहायता से.

(4) यानी उसकी राह में ख़र्च करो.

(5) वाक़िआ यह था कि अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से वादा फ़रमाया था कि उन्हें और उनकी क़ौम को पाक सरज़मीन का वारिस बनाएगा जिसमें कनआनी जब्बार यानी अत्याचारी रहते थे. तो फ़िरऔन के हलाक के बाद हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को अल्लाह का हुक्म हुआ कि बनी इस्त्राईल को पाक सरज़मीन की तरफ़ ले जाओ, मैं ने उसको तुम्हारे लिये सुकून की जगह बनाया है तो वहाँ जाओ और जो दुश्मन वहाँ हैं उनपर जिहाद करो. मैं तुम्हारी मदद फ़रमाऊंगा . और ऐ मूसा, तुम अपनी क़ौम के हर हर गिरोह में से एक एक सरदार बनाओ इस तरह बारह सरदार मुक़र्रर करो. हर एक उनमें से अपनी क़ौम के हुक्म मानने और एहद पूरा करने का ज़िम्मेदार हो. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम सरदार चुनकर बनी इस्त्राईल को लेकर रवाना हुए. जब अरीहा के क़रीब पहुंचे तो जासूसों को हालात का जायज़ा लेने के लिये भेजा. वहाँ उन्होंने देखा कि लोग बहुत लम्बे चौड़े, ताक़तवर, दबदबे और रोब वाले हैं. ये उनसे डर कर वापस आ गए और आकर उन्होंने अपनी क़ौम से सारा हाल कहा. जबकि उनको इससे मना किया गया था. लेकिन सब ने एहद तोड़ा, सिवाय कालिब बिन यूक़न्ना और यूशअ बिन नून के कि ये एहद पर क़ायम रहे.

(6) कि उन्होंने अल्लाह का एहद तोड़ा और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के बाद आने वाले नबियों को झुटलाया और क़त्ल किया, किताब के आदेशों की अवहेलना की.

(7) जिसमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तारीफ़ और गुणगान है और जो तौरात में बयान की गई हैं.

(8) तौरात में, कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का अनुकरण करें और उनपर ईमान लाएं.

(9) क्योंकि दग़ा और ख़यानत और एहद तोड़ना और नबियों के साथ बदएहदी उनकी और उनके पूर्वजों की पुरानी आदत है.

(10) जो ईमान लाए.

(11) और जो कुछ उनसे पहले हुआ उसपर पकड़ न करो. कुछ मुफ़स्सिरों का कहना है कि यह आयत उस क़ौम के बारे में उतरी जिन्होंने पहले तो नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से एहद किया फिर तोड़ा. फिर अल्लाह तआला ने अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को उसपर सूचित किया और यह आयत उतारी. उस सूरत में मानी ये हैं कि उनके इस एहद तोड़ने से दरग़ुज़र कीजिये जबतक कि वो जंग से रूके रहें और जिज़िया अदा करने से मना न करें.

(12) अल्लाह तआला और उसके रसूलों पर ईमान लाने का.

(13) इन्जील में, और उन्होंने एहद तोड़ा.

(14) क़तादा ने कहा कि जब ईसाईयों ने अल्लाह की किताब (इंजील) पर अमल करना छोड़ दिया, और रसूलों की नाफ़रमानी की, फ़र्ज़ अदा न किये, हुदूद की परवाह न की, तो अल्लाह तआला ने उनके बीच दुश्मनी डाल दी.

(15) यानी क़यामत के दिन वो अपने चरित्र का बदला पाएंगे.

(16) यहूदियों और ईसाईयों.

(17) सैयदे आलम, मुहम्मदे मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम)

(18) जैसे कि आयते रज्म और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के गुण और हुज़ूर का इसको बयान फ़रमाना चमत्कार है.

(19) और उनका ज़िक्र भी नहीं करते, न उनकी पकड़ करते हैं. क्योंकि आप उसी चीज़ का ज़िक्र फ़रमाते हैं जिसमें मसलिहत हो.

(20) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को नूर फ़रमाया गया क्योंकि आपसे कुफ़्र का अंधेरा दूर हुआ और सच्चाई का रास्ता खुला.

(21) यानी क़ुरआन शरीफ़.

(22) हज़रत इब्ने अब्बास (रदियल्लाहो अन्हुमा) ने फ़रमाया कि नजरान के ईसाईयों से यह कथन निकला. और ईसाईयों के याक़ूबिया व मल्कानिया (सम्प्रदायों) का यह मज़हब है कि वो हज़रत मसीह को अल्लाह बताते हैं क्योंकि वो हुलूल के क़ायल हैं. और उनका झूठा अक़ीदा यह है कि अल्लाह तआला ने हज़रत ईसा के बदन में प्रवेश किया. अल्लाह तआला ने इस आयत में इस अक़ीदे पर कुफ़्र का हुक्म दिया और उनके मज़हब का ग़लत होना बयान फ़रमाया.

(23) इसका जवाब यही है कि कोई कुछ नहीं कर सकता तो फिर हज़रत मसीह को खुदा बताना कितनी खुली ग़लती है.
(24) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के पास किताब वाले आए और उन्होंने दीन के मामले में आपसे बात चीत शुरू की. आपने उन्हें इस्लाम की दावत दी और अल्लाह की नाफ़रमानी करने से उसके अज़ाब का डर दिलाया तो वो कहने लगे कि ऐ मुहम्मद ! आप हमें क्या डराते हैं ? हम तो अल्लाह के बेटे और उसके प्यारे हैं. इस पर यह आयत उतरी और उनके इस दावे का ग़लत होना ज़ाहिर फरमाया गया.

(25) यानी इस बात का तुम्हें भी इक़रार है कि गिन्ती के दिन तुम जहन्नम में रहोगे, तो सोचो कोई बाप अपने बेटे की या कोई शख़्स अपने प्यारे को आग में जलाता है ? जब ऐसा नहीं, तो तुम्हारे दावे का ग़लत होना तुम्हारे इक़रार से साबित है.

(26) मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

(27) हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बाद, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ज़माने तक 569 बरस की मुद्दत नबी से ख़ाली रही. इसके बाद हुज़ूर के तशरीफ़ लाने की मिन्नत का इज़हार फ़रमाया जाता है कि निहायत ज़रूरत के वक़्त तुम पर अल्लाह तआला की बड़ी नेमत भेजी गई और अब ये कहने का मौक़ा न रहा कि हमारे पास चेतावनी देने वाले तशरीफ़ न लाए.

सूरए माइदा – चौथा रूकू

सूरए माइदा –  चौथा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
और जब मूसा ने कहा अपनी क़ौम से ऐ मेरी क़ौम, अल्लाह का एहसान अपने ऊपर याद करो कि तुम में से पैग़म्बर किये (1)
और तुम्हें बादशाह किया (2)
और तुम्हें वह दिया जो आज सारे संसार में किसी को न दिया (3)(20)
ऐ क़ौम उस पाक ज़मीन में दाख़िल हो जो अल्लाह ने तुम्हारे लिये लिखा है और पीछे न पलटो (4)
कि नुक़सान पर पलटोगे (21) बोले ऐ मूसा उसमें तो बङे ज़बरदस्त लोग हैं और हम उसमें हरगिज़ दाख़िल न होंगे जबतक वो वहाँ से निकल न जाएं, हाँ वो वहां से निकल जाएं तो हम वहां जाएं (22) दो मर्द कि अल्लाह से डरने वालों में से थे (5)
अल्लाह ने उन्हें नवाज़ा (प्रदान किया) (6)
बोले कि ज़बरदस्ती दर्वाज़े में (7)
उनपर दाख़िल हो अगर तुम दर्वाज़े में दाख़िल हो जाओगे तो तुम्हारा ही ग़ल्बा है (8)
और अल्लाह ही पर भरोसा करो अगर तुम्हें ईमान है (23) बोले (9)
ऐ मूसा हम तो वहां (10)
कभी न जाएंगे जबतक वो वहां हैं तो आप जाइये और आपका रब, तुम दोनों लङो हम यहां बैठे हैं (24)
मूसा ने अर्ज़ की कि ऐ रब मेरे मुझे इख़्तियार नहीं मगर अपना और अपने भाई का तो तू हमको उन बेहु्कमों से अलग रख (11)(25)
फ़रमाया तो वह ज़मीन उनपर हराम है(12)
चालीस बरस तक भटकते फिरें ज़मीन में (13) तो तुम उन बेहुकमों का अफ़सोस न खाओ (26)

तफसीर
सूरए माइदा –  चौथा रूकू

(1) इस आयत से मालूम हुआ कि नबियों की तशरीफ़ आवरी नेमत है. और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम को उसके ज़िक्र करने का हुक्म दिया कि वह बरकतों और इनाम का सबब है. इससे मीलाद की मेहफ़िलों के अच्छी और बरकत वाली होने की सनद मिलती है.

(2) यानी आज़ाद और शान व इज़्ज़त वाले होने और फ़िरऔनियों के हाथों क़ैद होने के बाद उनकी गुलामी से छुटकारा हासिल करके ऐश व आराम की ज़िन्दगी पाना बड़ी नेमत है. हज़रत अबू सईद ख़ुदरी रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि बनी इस्त्राईल में जो ख़ादिम और औरत और सवारी रखता, वह मलक कहलाया जाता.

(3) जैसे कि दरिया में रास्ता बनाना, दुश्मन को डूबो देना, मन्न और सलवा उतरना, पत्थर से चश्मे जारी करना, बादल को सायबान बनाना वग़ैरह.

(4) हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी क़ौम को अल्लाह की नेमतें याद दिलाने के बाद उनको अपने दुश्मनों पर जिहाद के लिये निकलने का हुक्म दिया और फ़रमाया कि ऐ क़ौम, पाक सरज़मीन में दाख़िल हो जाओ. उस ज़मीन को पाक इसलिये कहा गया कि वह नबियों की धरती थी. इससे मालूम हुआ कि नबियों के रहने से ज़मीनों को भी इज़्ज़त मिलती है और दूसरों के लिये वह बरक़त का कारण होती है. कलबी से मन्क़ूल है कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम लबनान पर्वत पर चढ़े तो आप से कहा गया, देखिये जहां तक आपकी नज़र पहुंचे वह जगह पाक है. और आपकी जूर्रियत की मीरास है. यह सरज़मीन तूर और उसके आसपास की थी और एक क़ौल यह है कि तमाम मुल्के शाम.

(5) कालिब बिन यूक़न्ना और यूशअ बिन नून जो उन नक़ीबों में से थे जिन्हें हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने जब्बारों का हाल दरियाफ़्त करने के लिये भेजा था.

(6) हिदायत और एहद पूरा करने के साथ. उन्होंने जब्बारों का हाल सिर्फ़ हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से अर्ज़ किया और इसको ज़ाहिर न किया. दूसरे नक़ीबों के विपरीत कि उन्होंने ज़ाहिर कर दिया था.

(7) शहर के.

(8) क्योंकि अल्लाह तआला ने मदद का वादा किया है और उसका वादा ज़रूर पूरा होना, तुम जब्बारीन के बड़े बड़े जिस्मों से मत डरो, हमने उन्हें देखा है. उनके जिस्म बड़े हैं और दिल कमज़ोर है. उन दोनों ने जब यह कहा तो बनी इस्त्राईल बहुत क्रुद्ध हुए और उन्होंने चाहा कि उनपर पत्थर बरसाएं.

(9) बनी इस्त्राईल.

(10) जब्बारीन के शहर में.

(11) और हमें उनकी सोहबत और क़ुर्ब से बचाया, यह मानी कि हमारे उनके बीच फ़ैसला फ़रमाया.

(12) उसमें दाख़िल न हो सकेंगे.

(13) वह ज़मीन जिसमें ये लोग भटकते फिरे, नौ फ़रसगं थी और क़ौम छ लाख जंगी जो अपने सामान लिये तमाम दिन चलते थे. जब शाम होती तो अपने को वहीं पाते जहाँ से चले थे. यह उनपर उक़ूबत थी सिवाय हज़रत मूसा व हारून व यूशअ व कालिब के, कि उनपर अल्लाह तआला ने आसानी फ़रमाई और उनकी मदद की, जैसा कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के लिये आग को ठण्डा और सलामती बनाया और इतनी बड़ी जमाअत का इतनी छोटी ज़मीन में चालीस बरस आवारा और हैरान फिरना और किसी का वहाँ से निकल न सकना, चमत्कारों में से है. जब बनी इस्त्राईल ने उस जंगल में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से खाने पीने वग़ैरह ज़रूरतों और तकलीफ़ों की शिकायत की तो अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा की दुआ से उनको आसमानी ग़िज़ा मन्नो सलवा अता फ़रमाया और लिबास ख़ुद उनके बदन पर पैदा किया जो जिस्म के साथ बढ़ता था और एक सफ़ेद पत्थर तूर पर्वत का इनायत किया कि जब सफ़र से रूकते और कहीं ठहरते तो हज़रत उस पत्थर पर लाठी मारते, इससे बनी इस्त्राईल के बारह गिराहों के लिये बारह चश्मे जारी हो जाते और साया करने के लिये एक बादल भेजा और तीह में जितने लोग दाख़िल हुए थे उनमें से चौबीस साल से ज़्यादा उम्र के थे, सब वहीं मर गए, सिवाय यूशअ बिन नून और कालिब बिन यूक़न्ना के, और जिन लोगों ने पाक सरज़मीन में दाख़िल होने से इन्कार किया उनमें से कोई भी दाख़िल न हो सका और कहा गया है कि तीह में ही हज़रत दाऊद और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की वफ़ात हुई. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की वफ़ात से चालीस बरस बाद हज़रत यूशअ को नबुव्वत अता की गई और जब्बारीन पर जिहाद का हुक्म दिया गया. आप बाक़ी बचे बनी इस्त्राईल को साथ लेकर गए और जब्बारीन पर जिहाद किया.

सूरए माइदा- पाँचवा रूकू

सूरए माइदा- पाँचवा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
और उन्हें पढ़कर सुनाओ आदम के दो बेटों की सच्ची ख़बर (1)
जब दोनों ने एक नियाज़ (भेंट) पेश की तो एक की क़ुबूल हुई और दूसरे की क़ुबूल न हुई बोलो क़सम है मैं तुझे क़त्ल कर दूंगा (2)
कहा अल्लाह उसी से क़ुबूल करता है जिसे डर है (3)(27)
बेशक अगर तू अपना हाथ मुझपर बढ़ाऊंगा कि मुझे क़त्ल करे तो मैं अपना हाथ तुमपर न बढ़ाऊंगा कि तुझे क़त्ल करूं (4)
मैं अल्लाह से डरता हूँ जो मालिक है सारे संसार का (28) मैं तो यह चाहता हूँ कि मेरा (5)
और तेरे गुनाह (6)
दोनों तेरे ही पल्ले पङे तो तू दोज़ख़ी हो जाए और बेइन्साफ़ों की यही सज़ा है (29) तो उसके नफ़्स ने उसे भाई के क़त्ल का चाव दिलाया तो उसे क़त्ल करदिया तो रह गया नुक़सान में (7)(30)
तो अल्लाह ने एक कौवा भेजा ज़मीन कुरेदता कि उसे दिखाए कैसे अपने भाई की लाश छुपाए (8)
बोला हाय ख़राबी, मैं इस कौवे जैसा भी न होसका कि मैं अपने भाई की लाश छुपाता तो पछताता रह गया (9)(31)
इस सबब से हमने बनी इस्त्राईल पर लिख दिया कि जिसने कोई जान क़त्ल की बग़ैर जान के बदले या ज़मीन में फ़साद किये (10)
तो जैसे उसने सब लोगों को क़त्ल किया (11)
और जिसने एक जान को जिला लिया उसने जैसे सब लोगों को जिला लिया (12)
और बेशक उनके (13)
पास हमारे रसूल रौशन दलिलों के साथ आए (13)
फिर बेशक उनमें बहुत उसके बाद ज़मीन में ज़ियादती करने वाले हैं (14)(32)
वो कि अल्लाह और उसके रसूल से लङते (15)
और मुल्क में फ़साद करते फिरते हैं उनका बदला यही है कि गिन गिन कर क़त्ल किये जाएं या सूली दिये जाएं या उनके एक तरफ़ के हाथ और दूसरी तरफ़ के पाँव काटे जाएं या ज़मीन से दूर कर दिये जाएं, यह दुनिया में उनकी रूस्वाई है और आख़िरत में उनके लिये बङा अज़ाब (33)
मगर वो जिन्होंने तौबह करली इससे पहले कि तुम उनपर क़ाबू पाओ (16)
तो जान लो कि अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है (34)

तफसीर
सूरए माइदा – पाँचवा रूकू

(1)  जिनका नाम हाबील और क़ाबील था. इस ख़बर को सुनाने से मक़सद यह है कि हसद की बुराई मालूम हो और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से हसद करने वालों को इस से सबक़ हासिल करने का मौक़ा मिले. सीरत वग़ैरह के उलमा का बयान है कि हज़रत हव्वा के हमल में एक लड़का एक लड़की पैदा होते थे और एक हमल के लड़के का दूसरे हमल की लड़की के साथ निकाह किया जाता था और जबकि आदमी सिर्फ़ हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की औलाद में सीमित थे, तो निकाह की और कोई विधि ही न थी. इसी तरीके़ के अनुसार हज़रत आदम अलैहिस्सलाम ने क़ाबील का निकाह ल्यूज़ा से, जो हाबील के साथ पैदा हुई थी, और हाबील का इक़लीमा से, जो क़ाबील के साथ पैदा हुई थी, करना चाहा. क़ाबील इस पर राज़ी न हुआ और चूंकि इक़लीमा ज़्यादा ख़ूबसूरत थी इसलिये उसका तलबगार हुआ. हज़रत आदम अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि वह तेरे साथ पैदा हुई है, इसलिये तेरी बहन है, उसके साथ तेरा निकाह हलाल नहीं है. कहने लगा यह तो आपकी राय है. अल्लाह ने यह हुक्म नहीं दिया. आपने फ़रमाया, तो तुम दोनों क़ुरबानीयाँ लाओ जिसकी क़ुरबानी क़ुबूल हो जाए वही इक़लीमा का हक़दार है. उस ज़माने में जो क़ुरबानी मक़बूल होती थी, आसमान से एक आग उतरकर उसको खा लिया करती थी. क़ाबील ने एक बोरी गेहूँ और हाबील ने एक बकरी क़ुरबानी के लिये पेश की. आसमानी आग ने हाबील की क़ुरबानी को ले लिया और क़ाबील के गेहूँ छोड़ गई. इस पर क़ाबील के दिल में बहुत जलन और हसद पैदा हुआ.

(2) जब हज़रत आदम अलैहिस्सलाम हज के लिये मक्कए मुकर्रमा तशरीफ़ ले गए तो क़ाबील ने हाबील से कहा, मैं तुझको क़त्ल करूंगा. हाबिल ने कहा क्यों ? कहने लगा, इसलिये कि तेरी क़ुरबानी क़ुबूल हुई, मेरी न हुई और तू इक़लीमा का हक़दार ठहरा, इसमें मेरी ज़िल्लत है.

(3) हाबील के इस कहने का यह मतलब है कि क़ुरबानी का कुबूल फ़रमाना अल्लाह का काम है. वह परहेज़गारों की क़ुरबानी क़ुबूल फ़रमाता है. तू परहेज़गार होता तो तेरी क़ुरबानी क़ुबूल होती. यह ख़ुद तेरे कर्मों का नतीजा है, इसमें मेरा क्या दख़ल है.

(4) और मेरी तरफ़ से शुरूआत हो जबकि मैं तुझ से ज़्यादा मज़बूत और ताक़त वाला हूँ, यह सिर्फ इसलिये है कि……

(5) यानी मुझे क़त्ल करने का.

(6) जो इससे पहले तूने किया कि वालिद की नाफ़रमानी की, हसद किया और अल्लाह के फ़ैसले को न माना.

(7) और परेशानी में पड़ा कि इस लाश को क्या करें क्योंकि उस वक़्त तक कोई इन्सान मरा ही न था. एक मुद्दत तक लाश को पीठ पर लादे फिरा.

(8) रिवायत है कि दो कौए आपस में लड़े उनमें से एक ने दूसरे को मार डाला फिर ज़िन्दा कौए ने अपनी चोंच से ज़मीन कुरेद कर गढ़ा किया, उसमें मरे हुए कौए को डाल कर मिट्टी से दबा दिया. यह देखकर क़ाबील को मालूम हुआ कि लाश को दफ़्न करना चाहिये. चुनांचे उसने ज़मीन खोद कर दफ़्न कर दिया. (ज़लालैन, मदारिक वग़ैरह)

(9) अपनी नादानी और परेशानी पर, और यह शर्मिन्दगी गुनाह पर न थी कि तौबह में शुमार हो सकती या शर्मिन्दगी का तौबह होना सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की उम्मत के साथ ख़ास हो. (मदारिक)

(10) यानी नाहक़ ख़ून किया कि न तो मक़तूल को किसी ख़ून के बदले क़िसास के तौर पर मारा न शिर्क व कुफ़्र या कानून तोड़ने वग़ैरह किसी सख़्त जुर्म के कारण मारा.

(11) क्योंकि उसने अल्लाह तआला की रिआयत और शरीअत की हदों का लिहाज़ न रखा.

(12) इस तरह कि क़त्ल होने या डूबने या जलाने जैसे हलाकत के कारणों से बचाया.

(13) यानी बनी इस्त्राईल के.

(14) खुले चमत्कार भी लाए और अल्लाह के एहकाम और शरीअत भी.

(15) कि कुफ़्र और क़त्ल वग़ैरह जुर्म करके सीमाओ का उल्लंघन करते हैं.

(16) अल्लाह तआला से लड़ना यही है कि उसके वलियों से दुश्मनी करे जैसे कि हदीस शरीफ़ में आया. इस आयत में डाकुओं की सज़ा का बयान है. सन 6 हिजरी में अरीना के कुछ लोग मदीनए तैय्यिबह आकर इस्लाम लाए और बीमार हो गए. उनके रंग पीले हो गए, पेट बढ़ गए. हुज़ूर ने हुक्म दिया कि सदक़े के ऊंटों का दूध और पेशाब मिलाकर पिया करें. ऐसा करने से वो तन्दुरूस्त हो गए, अच्छे होकर वो मुर्तद हो गए और पन्द्रह ऊंट लेकर अपने वतन को चलते बने, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उनकी तलाश में हज़रत यसार को भेजा. उन लोगों ने उनके हाथ पाँव काटे और तकलीफ़े देकर उन्हें शहीद कर डाला, फिर जब ये लोग हुज़ूर की खिदमत में गिरफ़्तार करके हाज़िर किये गए तो उनके बारे में यह आयत उतरी. (तफ़सीरे अहमदी)

(17) यानी गिरफ़्तारी से पहले तौबह कर लेने से वह आख़िरत के अज़ाब और डकैती की सज़ा से तो बच जाएंगे मगर माल की वापसी और किसास बन्दों का हक़ है, यह बाक़ी रहेगा. (तफ़सीरे अहमदी)

सूरए माइदा – छटा रूकू

सूरए माइदा – छटा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
ऐ ईमान वालो अल्लाह से डरो और उसकी तरफ़ वसीला ढूंडो (1)
और उसकी राह में जिहाद करो इस उम्मीद पर कि फ़लाह (भलाई) पाओ (35) बेशक वा जो काफ़िर हुए जो कुछ ज़मीन में हैं सब और उसकी बराबर और अगर उनकी मिल्क हो कि उसे देकर क़यामत के अज़ाब से अपनी जान छुङाएं तो उनसे न किया जाएगा और उनके लिये दुख का अज़ाब है (2)(36)
दोज़ख़ से निकलना चाहेंगे और वो उससे न निकलेंगे और उनको दवामी (स्थाई) सज़ा है (37)और जो मर्द या औरत चोर हो (3)
तो उनके हाथ काटो (4)
उनके किये का बदला अल्लाह की तरफ़ से सज़ा और अल्लाह ग़ालिब हिकमत वाला  है (38) तो जो अपने ज़ुल्म के बाद तौबह करे और संवर जाए तो अल्लाह अपनी मेहर (अनुकम्पा) से उसपर रूजू फ़रमाएगा (5)
बेशक अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है (39) क्या तुझे मालूम नहीं कि अल्लाह के लिये है आसमानों और ज़मीन की बादशाही, सज़ा देता है जिसे चाहे और बख़्श्ता है जिसे चाहे और अल्लाह सब कुछ कर सकता है (6) (40)
ऐ रसूल तुम्हें ग़मगीन (दुखी) न करें वो जो कुफ्र पर दोड़ते हैं (7)
जो कुछ वो अपने मुंह से कहते हैं हम ईमान लाए और उनके दिल मुसलमान नहीं (8)
और कुछ यहूदी झूठ ख़ूब सुनते हैं (9)
और लोगों की ख़ूब सुनते हैं (10)
जो तुम्हारे पास हाज़िर न हुए अल्लाह की बातों को उनके ठिकानो के बाद बदल देते हैं कहते हैं यह हुक्म तुम्हें मिले तो मानो और यह न मिले तो बचो (11)
और जिसे अल्लाह गुमराह करना चाहे तो हरगिज़ तू अल्लाह से उसका कुछ बना न सकेगा वो हैं कि अल्लाह ने उनका दिल पाक करना न चाहा उन्हें दुनिया में रूस्वाई है और आख़िरत में बड़ा अज़ाब (41) बड़े झूठ सुनने वाले, बड़े हरामख़ोर (12)
तो अगर तुम्हारे हुज़ूर हाज़िर हों (13)
तो उनमें फैसला फ़रमाओ या उनसे मुंह फेर लो (14)
और अगर तुम उनसे मुंह फेर लोगे तो वो तुम्हारा कुछ न बिगाड़ेंगे  (15)
और अगर उनमें फैसला फ़रमाओ तो इन्साफ़ से फ़ैसला करो बेशक इन्साफ़ वाले अल्लाह को पसन्द हैं  (42) और वो तुमसे किस तरह फै़सला चाहेंगे हालांकि उनके पास तौरात है जिसमें अल्लाह का हुक्म मौजूद है (16)  फिर भी उसी से मुंह फेरते हैं (17)और वो ईमान लाने वाले नहीं (43)

तफसीर
सूरए माइदा –  छटा रूकू

(1) जिसकी बदौलत तुम्हें उसका क़ुर्ब हासिल हो.

(2) यानी काफ़िरों के लिये अज़ाब लाज़िम है और इससे रिहाई पाने का कोई रास्ता नहीं है.

(3) और उसकी चोरी दो बार के इक़रार या दो मर्दों की शहादत (गवाही) से हाकिम के सामने साबित हो और जो माल चुराया है, दस दरहम से कम का न हो. (इब्ने मसऊद की हदीस)

(4) यानी दायाँ, इसलिये कि हज़रत इब्ने मसऊद रदियल्लाहो अन्हो की क़िरअत में “ऐमानुहुमा” आया है. पहली बार की चोरी में दायाँ हाथ काटा जाएगा, फिर दोबारा अगर करे तो बायाँ पाँव. उसके बाद भी अगर चोरी करे, तो क़ैद किया जाए, यहाँ तक कि तौबह करे. चोर का हाथ काटना तो वाजिब है और चोरी गया माल मौजूद हो तो उसका वापस करना भी वाजिब और अगर वह ज़ाया हो गया हो तो ज़मान (मुआवज़ा) वाजिब नहीं (तफ़सीरे अहमदी)

(5) और आख़िरत के अज़ाब से उसको निजात देगा.

(6) इससे मालूम हुआ कि अज़ाब करना और रहमत फ़रमाना अल्लाह तआला की मर्ज़ी पर है. वह मालिक है, जो चाहे करे, किसी को ऐतिराज़ की हिम्मत नहीं. इससे क़दरिया और मोअतज़िला सम्प्रदायों की काट हो गई जो फ़रमाँबरदार पर रहमत और गुनहगार पर अज़ाब करना अल्लाह तआला पर वाजिब कहते हैं.

(7) अल्लाह तआला सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को “या अय्युहर रसूल” के इज़्ज़त वाले सम्बोधन के साथ मुख़ातब फ़रमाकर आपकी तस्कीन फ़रमाता है कि ऐ हबीब, मैं आपका मददगार और सहायक हूँ मुनाफ़िक़ों के कुफ़्र में जल्दी करने यानी उनके कुफ़्र ज़ाहिर करने और काफ़िरों के साथ दोस्ती और सहयोग कर लेने से आप दुखी न हों.

(8) यह उनकी दोग़ली प्रवृत्ति का बयान है.

(9) अपने सरदारों से और उनकी झूटी बातों को क़ुबूल करते है.

(10) माशाअल्लाह, आला हज़रत रहमतुल्लाह अलैह ने बहुत सही अनुवाद फ़रमाया. इस जगह आम मुफ़स्सिरों और अनुवादकों से ग़लती हुई कि उन्होंने आयत के ये मानी बयान किये कि मुनाफ़िक़ और यहूदी अपने सरदारों की झूटी बातें सुनते हैं. आपकी बातें दूसरी क़ौम की ख़ातिर कान धर कर सुनते हैं जिसके वो जासूस हैं. मगर ये मानी सही नहीं हैं और क़ुरआन का अन्दाज़ इससे बिल्कुल मेल नहीं खाता. यहाँ मुराद यह है कि ये लोग अपने सरदारों की झूटी बातें ख़ूब सुनते हैं और लोगों यानी ख़ैबर के यहूदियों की बातों को ख़ूब मानते हैं जिनके अहवाल का आयत में बयान आ रहा है.  (तफ़सीरे अबूसऊद, जुमल)

(11) ख़ैबर के यहूदियों के शरीफ़ों में से एक विवाहित मर्द और विवाहित औरत ने ज़िना किया. इसकी सज़ा तौरात में संगसार करना थी. यह उन्हें गवारा न था, इसलिये उन्होंने चाहा कि इस मुक़दमे का फैसला हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कराएं. चुनांचे इन दोनों मुजरिमों को एक जमाअत के साथ मदीनए तैय्यिबह भेजा और कह दिया कि अगर हुज़ूर हद का हुक्म दें तो मान लेना और संगसार करने का हुक्म दें तो मत मानना. वो लोग बनी क़ुरैज़ा और बनी नुज़ैर के यहूदियों के पास आए और ख़याल किया कि ये हुज़ूर के हम-वतन हैं और उनके साथ आपकी सुलह भी है, उनकी सिफ़ारिश से काम बन जाएगा. चुनांचे यहूदियों के सरदारों में से कअब बिन अशरफ़ व कअब बिन असद व सईद बिन अम्र व मालिक बिन सैफ़ व किनाना बिन अबिलहक़ीक वग़ैरह, उन्हें लेकर हुज़ूर की ख़िदमत में हाज़िर हुए और मसअला दरियाफ़्त किया. हुज़ूर ने फ़रमाया क्या मेरा फ़ैसला मानोगे ? उन्होंने इक़रार किया. और तब आयते रज्म उतरी और संगसार करने का हुक्म दिया गया. यहूदियों ने इस हुक्म को मानने से इन्कार किया. हुज़ूर ने फ़रमाया कि तुम में एक जवान गोरा काना फ़िदक का रहने वाला इब्ने सूरिया नाम का है, तुम उसको जानते हो. कहने लगे हाँ फ़रमाया वह कैसा आदमी है. कहने लगे कि आज धरती पर यहूदियों में उसकी टक्कर का आलिम नहीं. तौरात का अकेला आलिम है. फ़रमाया उसको बुलाओ. चुनांचे बुलाया गया. जब वह हाज़िर हुआ तो हुज़ूर ने फ़रमाया, यहूदियों में सबसे बड़ा आलिम तू ही है ? अर्ज़ किया लोग तो ऐसा ही कहते हैं. हुज़ूर ने यहूद से फ़रमाया, इस मामले में इसकी बात मानोगे ? सब ने इक़रार किया. तब हुज़ूर ने इब्ने सूरिया से फ़रमाया, मैं तुझे अल्लाह की क़सम देता हूँ जिसके सिवा कोई मअबूद नहीं, जिसने हज़रत मूसा पर तौरात उतारी और तुम लोगों को मिस्त्र से निकाला, तुम्हारे लिये दरिया में रास्ते बनाए, तुम्हें निजात दी, फिरऔनियों को डूबोया, तुम्हारे लिये बादल को सायबान बनाया, मन्न व सलवा उतारा, अपनी किताब नाज़िल फ़रमाई जिसमें हलाल हराम का बयान है, क्या तुम्हारी किताब में ब्याहे मर्द व औरत के लिये संगसार करने का हुक्म है. इब्ने सूरिया ने अर्ज़ किया, बेशक है, उसी की क़सम जिसका आपने मुझसे ज़िक्र किया. अज़ाब नाज़िल होने का डर न होता तो मैं इक़रार न करता और झूट बोल देता मगर यह फ़रमाइये कि आपकी किताब में इसका क्या हुक्म है, फ़रमाया जब चार सच्चे और भरोसे वाले गवाहों की गवाही से खुले तौर पर ज़िना साबित हो जाए तो संगसार करना वाजिब हो जाता है. इब्ने सूरिया ने अर्ज़ किया अल्लाह की क़सम ऐसा ही तौरात में है, फिर हुज़ूर ने इब्ने सूरिया से दरियाफ़्त कि अल्लाह के हुक्म में तबदीली किस तरह वाक़े  हुई. उसने अर्ज़ किया कि हमारा दस्तूर यह था कि हम किसी शरीफ़ को पकड़ते तो  छोड़ देते और ग़रीब आदमी पर हद क़ायम करते. इस तरह शरीफ़ों में ज़िना बहुत बढ़ गया, यहाँ तक कि एक बार बादशाह के चचाज़ाद भाई ने ज़िना किया तो हमने उसको संगसार न किया, फिर एक दूसरे शख़्स ने अपनी क़ौम की औरत के साथ ज़िना किया तो बादशाह ने उसको संगसार करना चाहा. उसकी क़ौम उठ खड़ी हुई और उन्होंने कहा कि जब तक बादशाह के भाई को संगसार न किया जाए उस वक़्त तक इसको हरगिज़ संगसार न किया जाएगा. तब हमने जमा होकर ग़रीब शरीफ़ सबके लिये संगसार करने के बजाय यह सज़ा सज़ा निकाली कि चालीस कोड़े मारे जाएं और मुंह काला करके गधे पर उलटा बिठाकर घुमाया जाए. यह सुनकर यहूदी बहुत बिगड़े और इब्ने सूरिया से कहने लगे, तूने हज़रत को बड़ी जल्दी ख़बर दे दी और हमने जितनी तेरी तारीफ़ की थी, तू उसका हक़दार नहीं. इब्ने सूरिया ने कहा कि हुज़ूर ने मुझे तौरात की क़सम दिलाई, अगर मुझे अज़ाब के नाज़िल होने का डर न होता तो मैं आपको ख़बर न देता. इसके बाद हुज़ूर के हुक्म से उन दोनों ज़िना करने वालों को संगसार किया गया. और यह आयत उतरी (खाज़िन).

(12) यह यहूदियों के हाकिमों के बारे में है जो रिशवतें लेकर हराम को हलाल करते और शरीअत के हुक्म बदल देते थे. रिशवत का लेना देना दोनों हराम हैं. हदीस शरीफ़ में रिशवत लेने देने वाले दोनों पर लअनत आई है.
(13) यानी किताब वाले.

(14) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को इख़्तियार दिया गया कि किताब वाले आपके पास कोई मुकदमा लाएं तो आपको इख़्तियार है, फ़ैसला फ़रमाएं या न फ़रमाएं.

(15) क्योंकि अल्लाह तआला आपका निगहबान है.

(16) कि विवाहित मर्द और शौहरदार औरत के ज़िना की सज़ा रज्म यानी संगसार करना है.

(17) इसके बावुज़ूद कि तौरात पर ईमान लाने के दावेदार भी हैं और उन्हें यह भी मालूम है कि तौरात में संगसार का हुक्म है, उसको न मानना और आपकी नबुव्वत के इन्कारी होते हुए भी आपसे फ़ैसला चाहना अत्यन्त आश्चर्य की बात है.

सूरए माइदा – सातवाँ रूकू

सूरए माइदा –  सातवाँ  रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
बेशक हमने तौरात उतारी उसमें हिदायत और नूर है उसके मुताबिक़ यहूद को हुक्म देते थे हमारे फ़रमाँबरदार नबी और आलिम और फ़कीह (धर्मशास्त्री) कि उनसे अल्लाह की किताब की हिफ़ाज़त चाही गई थी (1)
और वो उसपर गवाह थे तो (2)
लोगों से न डरो और मुझसे डरो और मेरी आयतों के बदले ज़लील क़ीमत न लो (3)
और जो अल्लाह के उतारे पर हुक्म न करे  (4)
वही लोग काफ़िर हैं (44) और हमने तौरात में उनपर वाजिब किया (5)
कि जान के बदले जान (6)
और आँख के बदले आँख और नाक के बदले नाक और कान के बदले कान और दांत के बदले दांत और ज़ख़्मों में बदला है (7)
फिर जो दिल की ख़ुशी से बदला करा दे तो वह उसका गुनाह उतार देगा (8)
और जो अल्लाह के उतारे पर हुक्म न करे तो वही लोग ज़ालिम हैं (45) और हम उन नबियों के पीछे उनके निशाने क़दम (पदचिन्ह) पर ईसा मरयम के बेटे को लाए, तस्दीक़ (पुष्टि) करता हुआ तौरात की जो उससे पहले थी (9)
और हमने उसे इंजील दी जिसमें हिदायत और नूर है और तस्दीक़ फ़रमाती है तौरात की कि उससे पहले थे और हिदायत (10)
और नसीहत परहेज़गारी को (46) और चाहिये की इंजिल वाले हुक्म करें उसपर जो अल्लाह ने उसमें उतारा (11)
और जो अल्लाह के उतारे पर हुक्म न करें तो वही लोग फ़ासिक़ (दुराचारी) हैं (47) और ऐ मेहबूब हमने तुम्हारी तरफ़ सच्ची किताब उतारी अगली किताबों की तस्दीक़ फ़रमाती (12)
और उनपर मुहाफिज़ और गवाह तो उनमें फ़ैसला करो अल्लाह के उतारे से  (13)
और  ऐ सुनने वाले उनकी ख़्वाहिशों की पैरवी न करना अपने पास आया हुआ हक़ (सत्य) छोड़कर, हमने तुम सबके लिये एक एक शरीअत और रास्ता रखा  (14)
और अल्लाह चाहता तो तुम सबको एक ही उम्मत कर देता मगर मंजूर यह है कि जो कुछ तुम्हें दिया उसमें तुम्हें आज़माए (15)
तो भलाईयों की तरफ़ सबक़त (पहल करो) चाहो तुम सबका फिरना अल्लाह ही की तरफ़ है तो वह तुम्हें बता देगा जिस बात में तुम झगड़ते थे (48) और यह कि ऐ मुसलमान  अल्लाह के उतारे पर हुक्म कर और उनकी ख़्वाहिशों पर न चल और उनसे बचता रह कि कहीं तुझे लग़ज़िश  (डगमगा) न दे दें किसी हुक्म  में जो तेरी तरफ़ उतरा फिर अगर वो मुंह फेरें (16)
तो जान लो कि अल्लाह उनके कुछ गुनाहों की (17)
सज़ा उनको पहुंचाता है (18)
और बेशक बहुत आदमी बेहुक्म  (49) हैं तो क्या ज़ाहिलियत (अज्ञानता) का हुक्म चाहते हैं(19)
और अल्लाह से बेहतर किसका हुक्म यक़ीन वालों के लिये (50)

तफसीर
सूरए माइदा – सातवाँ रूकू

(1) कि इसको अपने सीनों मे मेहफ़ूज़ रख़ें और इसके पाठ में लगे है ताकि वह किताब भुलाई न जा सके और उसके आदेश ज़ाया न हों.(ख़ाज़िन) तौरात के मुताबकि़ नबियों का हुक्म देना जो इस आयत में आया है उससे साबित होता है कि हम से पहली शरीअतों के जो अहक़ाम अल्लाह और रसूल ने बयान फ़रमाए हों और उनके छोड़ने का हमें हुक्म न दिया हो, स्थगित न किये गए हों, वो हमपर लाज़िम होते हैं. (जुमल व अबूसऊद)

(2) ऐ यहूदियो, तुम सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की प्रशंसा और विशेषताओं और रज्म का हुक्म जो तौरात में आया है, उसके ज़ाहिर करने में.

(3) यानी अल्लाह के आदेशों में हेर फेर हर सूरत मना है, चाहे लोगों के डर और उनकी नाराज़ी के अन्देशे से हो, या माल दौलत और शान व शौकत के लालच से.

(4) इसका इन्कारी होकर.

(5)  इस आयत में अगरचे यह बयान है कि तौरात में यहूदियों पर किसास के ये अहकाम थे लेकिन चूंकि हमें उनके छोड़ देने का हुक्म नहीं दिया गया इसलिये हम पर ये अहकाम लाज़िम रहेंगे, क्योंकि पिछली शरीअतों के जो अहक़ाम ख़ुदा व रसूल के बयान से हम तक पहुंचे और स्थगित न हुए हों वो हमपर लाज़िम हुआ करते हैं जैसा कि ऊपर की आयत से साबित हुआ.

(6) यानी अगर किसी ने किसी को क़त्ल किया तो उसकी जान मक़तूल के बदले में ली जाएगी चाहे वह मक़तूल मर्द हो या औरत, आज़ाद हो या ग़ुलाम, मुस्लिम हो या ज़िम्मी. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि मर्द को औरत के बदले क़त्ल न करते थे. इसपर यह आयत उतरी.  (मदारकि)

(7) यानी एकसा होने और बराबरी की रिआयत ज़रूरी है.

(8) यानी जो क़ातिल या जनाबत करने वाला अपने जुर्म पर शर्मिन्दा होकर गुनाहों के वबाल से बचने के लिये ख़ुशी से अपने ऊपर शरीअत का हुक्म जारी कराए तो किसास उसके जुर्म का कफ़्फ़ारा हो जाएगा और आख़िरत में उसपर अज़ाब न होगा.  (जलालैन व जुमल). कुछ मुफ़स्सिरों ने इसके ये मानी बयान किये हैं कि जो हक़ वाला क़िसास (ख़ून के तावान) को माफ़ कर दे तो यह माफ़ी उसकी लिये कफ़्फ़ारा है. (मदारिक). तफ़सीरे अहमदी में है, यह तमाम क़िसास जब ही होंगे जब कि हक़ वाला माफ़ न करे. और अगर वह माफ़ करदे तो क़िसास साक़ित हो जाएगा.

(9) तौरात के अहकाम के बयान के बाद इंजील के अहकाम का ज़िक्र शुरू हुआ और बताया गया कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम तौरात की तस्दीक़ फ़रमाने वाले थे कि वह अल्लाह की तरफ़ से उतरी और स्थगन से पहले इसपर अमल वाजिब था. हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम  की शरीअत में इसके झूठ अहकाम स्थगित हुए.

(10) इस आयत में इंजील के लिये लफ़्ज़ “हुदन” (हिदायत) दो जगह इरशाद हुआ, पहली जगह गुमराही व जिहालत से बचाने के लिये रहनुमाई मुराद है, दूसरी जगह “हुदन” से नबियों के सरदार अल्लाह के हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तशरीफ़ आवरी की बशारत मुराद है. जो हुज़ूर अलैहिस्सलातो वस्सलाम की नबुव्वत की तरफ़ लोगो की राहयाबी का सबब है.

(11) यानी नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाने और आपकी नबुव्व्त की तस्दीक़ करने का हुक्म.

(12) जो इससे पहले नबियों पर उतरीं.

(13) यानी जब किताब वाले अपने मुक़दमे आपके पास लाएं तो आप क़ुरआने पाक से फ़ैसला फ़रमाएं.

(14) यानी व्यवहार और कर्म हर एक के ख़ास है और अस्ल दीन सबका एक. हज़रत अली मुर्तज़ा रदीयल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि ईमान हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के ज़माने से यही है कि “ला इलाहा इल्लल्लाह” की शहादत और जो अल्लाह तआला की तरफ़ से आया है उसका इक़रार करना और शरीअत व तरीक़ा हर उम्मत का ख़ास है.

(15) और इम्तिहान में डाले ताकि ज़ाहिर होजाए कि हर ज़माने के मुनासिब जो अहकाम दिये, क्या तुम उनपर इस यक़ीन और अक़ीदे के साथ अमल करते हो कि उनका विराध अल्लाह तआला की मर्ज़ी से हिकमत और दुनिया व आख़िरत की लाभदायक मसलिहतों पर आधारित है या सत्य को छोड़कर नफ़्सके बहकावे का अनुकरण करते हो. (तफ़सीरे अबूसऊद)

(16) अल्लाह के उतारे हुए हुक्म से.

(17) जिन में यह एराज़ यानी अवज़ा भी है.

(18) दुनिया में क़त्ल व गिरफ़्तारी और जिला – वतनी के साथ और तमाम गुनाहों की सज़ा आख़िरत में देगा.

(19) जो सरदार गुमराही और ज़ुल्म और अल्लाह के अहकाम के विरूद्ध होता था. बनी नुज़ैर और बनी क़ुरैज़ा यहुदियों के दो क़बीले थे. उनमें आपस में एक दूसरे का क़त्ल होता रहता था, जब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मदीनए तैय्यिबह तशरीफ़ लाए तो ये लोग अपना मुक़दमा हुज़ूर की ख़िदमत में लाए और बनी क़ुरैज़ा ने कहा कि बनी नूज़ैर हमारे भाई हैं. हम वो एक ही दादा की औलाद हैं. एक दीन रखते हैं, एक किताब  (तौरात) मानते हैं, लेकिन अगर बनी नुज़ैर हम में से किसी को क़त्ल करें तो उसके तावान में हम सत्तर वसक़ खजूरें देते हैं, और अगर हममें से कोई उनके किसी आदमी को क़त्ल करे तो हमसे उसके बदले में एक सौ चालीस वसक़ लेते हैं. आप इसका फ़ैसला फ़रमादें. हुज़ूर ने फ़रमाया, मैं हुक्म देता हूँ कि क़ुरैज़ा वालों और नुज़ैर वालों का ख़ून बराबर है. किसी को दूसरे पर बरतरी नहीं. इसपर बनी नुज़ैर बहुत नाराज़ हुए और कहने लगे हम आपके फ़ैसले से राज़ी नहीं हैं, आप हमारे दुश्मन हैं, हमें ज़लील करना चाहते हैं. इस पर यह आयत उतरी और फ़रमाया गया कि क्या जाहिलियत की गुमराही और ज़ुल्म का हुक्म चाहते हैं.