52-Surah At-Tur

52 सूरए तूर

52|1|بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ وَالطُّورِ
52|2|وَكِتَابٍ مَّسْطُورٍ
52|3|فِي رَقٍّ مَّنشُورٍ
52|4|وَالْبَيْتِ الْمَعْمُورِ
52|5|وَالسَّقْفِ الْمَرْفُوعِ
52|6|وَالْبَحْرِ الْمَسْجُورِ
52|7|إِنَّ عَذَابَ رَبِّكَ لَوَاقِعٌ
52|8|مَّا لَهُ مِن دَافِعٍ
52|9|يَوْمَ تَمُورُ السَّمَاءُ مَوْرًا
52|10|وَتَسِيرُ الْجِبَالُ سَيْرًا
52|11|فَوَيْلٌ يَوْمَئِذٍ لِّلْمُكَذِّبِينَ
52|12|الَّذِينَ هُمْ فِي خَوْضٍ يَلْعَبُونَ
52|13|يَوْمَ يُدَعُّونَ إِلَىٰ نَارِ جَهَنَّمَ دَعًّا
52|14|هَٰذِهِ النَّارُ الَّتِي كُنتُم بِهَا تُكَذِّبُونَ
52|15|أَفَسِحْرٌ هَٰذَا أَمْ أَنتُمْ لَا تُبْصِرُونَ
52|16|اصْلَوْهَا فَاصْبِرُوا أَوْ لَا تَصْبِرُوا سَوَاءٌ عَلَيْكُمْ ۖ إِنَّمَا تُجْزَوْنَ مَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
52|17|إِنَّ الْمُتَّقِينَ فِي جَنَّاتٍ وَنَعِيمٍ
52|18|فَاكِهِينَ بِمَا آتَاهُمْ رَبُّهُمْ وَوَقَاهُمْ رَبُّهُمْ عَذَابَ الْجَحِيمِ
52|19|كُلُوا وَاشْرَبُوا هَنِيئًا بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
52|20|مُتَّكِئِينَ عَلَىٰ سُرُرٍ مَّصْفُوفَةٍ ۖ وَزَوَّجْنَاهُم بِحُورٍ عِينٍ
52|21|وَالَّذِينَ آمَنُوا وَاتَّبَعَتْهُمْ ذُرِّيَّتُهُم بِإِيمَانٍ أَلْحَقْنَا بِهِمْ ذُرِّيَّتَهُمْ وَمَا أَلَتْنَاهُم مِّنْ عَمَلِهِم مِّن شَيْءٍ ۚ كُلُّ امْرِئٍ بِمَا كَسَبَ رَهِينٌ
52|22|وَأَمْدَدْنَاهُم بِفَاكِهَةٍ وَلَحْمٍ مِّمَّا يَشْتَهُونَ
52|23|يَتَنَازَعُونَ فِيهَا كَأْسًا لَّا لَغْوٌ فِيهَا وَلَا تَأْثِيمٌ
52|24|۞ وَيَطُوفُ عَلَيْهِمْ غِلْمَانٌ لَّهُمْ كَأَنَّهُمْ لُؤْلُؤٌ مَّكْنُونٌ
52|25|وَأَقْبَلَ بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ يَتَسَاءَلُونَ
52|26|قَالُوا إِنَّا كُنَّا قَبْلُ فِي أَهْلِنَا مُشْفِقِينَ
52|27|فَمَنَّ اللَّهُ عَلَيْنَا وَوَقَانَا عَذَابَ السَّمُومِ
52|28|إِنَّا كُنَّا مِن قَبْلُ نَدْعُوهُ ۖ إِنَّهُ هُوَ الْبَرُّ الرَّحِيمُ

सूरए तूर मक्के में उतरी, इसमें 49 आयतें, दो रूकू हैं.
-पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए तूर मक्की है इस में दो रूकू, उनचास आयतें, तीन सौ बारह कलिमे और एक हज़ार पाँच सौ अक्षर हैं.

तूर की क़सम (2){1}
(2) यानी उस पहाड़ की क़सम जिस पर अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से कलाम फ़रमाया.

और उस नविश्ते (लिखे) की (3){2}
(3) इस नविश्ते से मुराद या तौरात है या क़ुरआन या लौहे मैहफ़ूज़ या कर्मलेखा लिखने वाले फ़रिश्ते के दफ़्तर.

जो खुले दफ़्तर में लिखा है{3} और बेते मअमूर (4) {4}
(4) बैतुल मअमूर सातवें आसमान में अर्श के सामने काबा शरीफ़ के बिल्कुल ऊपर है. यह आसमान वालों का क़िबला है हर रोज़ सत्तर हज़ार फ़रिश्ते इसमें तवाफ़ और नमाज़ के लिये दाख़िल होते हैं फिर भी उन्हें लौटने का मौक़ा नहीं मिलता. हर रोज़ नए सत्तर हज़ार हाज़िर होते हैं. मेअराज़ की हदीस में साबित हुआ कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने सातवें आसमान में बैतुल मअमूर को देखा.

और बलन्द छत (5){5}
(5) इससे मुराद आसमान है जो ज़मीन के लिये छत की तरह है या अर्श जो जन्नत की छत है. (क़रतबी)

और सुलगाए हुए समन्दर की(6){6}
(6) रिवायत है कि अल्लाह तआला क़यामत के दिन तमाम समन्दरों को आग कर देगा जिससे जहन्नम की आग में और भी ज़ियादती हो जाएगी .(ख़ाज़िन)

बेशक तेरे रब का अज़ाब ज़रूर होना है(7){7}
(7) जिसका काफ़िरों को वादा दिया गया है.

उसे कोई टालने वाला नहीं {8} जिस दिन आसमान हिलना सा हिलना हिलेंगे(8){9}
(8) चक्की की तरह घूमेंगे और इस तरह हरकत में आएंगे कि उनके हिस्से अलग अलग बिखर जाएंगे.

और पहाड़ चलना सा चलना चलेंगे(9){10}
(9) जैसे कि धूल हवा में उड़ती है. यह दिन क़यामत का दिन होगा.

तो उस दिन झुटलाने वालों की ख़राबी है(10){11}
(10) जो रसूलों को झुटलाते थे.

वो जो मश्ग़ले में(11)
(11) कुफ़्र और बातिल के.

खेल रहे हैं {12} जिस दिन जहन्नम की तरफ़ धक्का देकर धकेले जाएंगे (12) {13}
(12) और जहन्नम के ख़ाज़िन काफ़िरों के हाथ गर्दनों और पाँव पेशानियों से मिलाकर बाधेंगे और उन्हें मुंह के बल जहन्नम में धकेल देंगे और उनसे कहा जाएगा–

यह है वह आग जिसे तुम झुटलाते थे (13){14}
(13) दुनिया में.

तो क्या यह जादू है या तुम्हें सूझता नहीं(14) {15}
(14) यह उनसे इसलिये कहा जाएगा कि वो दुनिया में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तरफ़ जादू की निस्बत करते थे और कहते थे कि हमारी नज़र बन्दी कर दी है.

इस में जाओ अब चाहे सब्र करो या न करो, सब तुम पर एक सा है(15)
(15) न कहीं भाग सकते हो, न अ़जाब से बच सकते हो, और यह अज़ाब.

तुम्हें उसी का बदला जो तुम करते थे(16){16}
(16) दुनिया में कुफ़्र और झुटलाना.

बेशक परहेज़गार बाग़ों और चेन में हैं {17} अपने रब की देन पर शाद शाद ख़ुश ख़ुश(17)
(17) उसकी अता व नेअमतें ख़ैरी करामत पर.

और उन्हे उनके रब ने आग के अज़ाब से बचा लिया (18){18}
(18) और उनसे कहा जाएगा.

खाओ और पियो ख़ुशगवारी से सिला (इनआम) अपने कर्मों का (19) {19}
(19) जो तुमने दुनिया में किये कि ईमान लाए और ख़ुदा और रसूल की इताअत इख़्तियार की.

तख़्तों पर तकिया लगाए जो क़तार लगाकर बिछे हैं और हमने उन्हें ब्याह दिया बड़ी आँखों वाली हूरों से {20} और जो ईमान लाए और उनकी औलाद ने ईमान के साथ उनकी पैरवी की, हमने उनकी औलाद उनसे मिला दी(20)
(20) जन्नत में अगरचे बाप दादा के दर्जे बलन्द हों तो भी उनकी ख़ुशी के लिये उनकी औलाद उनके साथ मिला दी जाएगी और अल्लाह तआला अपने फ़ज़्लों करम से उस औलाद को भी वह दर्जा अता फ़रमाएगा.

और उनके कर्म में उन्हें कुछ कमी न दी(21)
(21) उन्हें उनके कर्मों का पूरा सवाब दिया और औलाद के दर्जे अपने फ़ज़्लों करम से बलन्द किये.

सब आदमी अपने किये में गिरफ़्तार हैं(22){21}
(22) यानी हर काफ़िर अपने कुफ़्री अमल में दोज़ख़ के अन्दर गिरफ़्तार है. (ख़ाज़िन)

और हमने उनकी मदद फ़रमाई मेवे और गोश्त से जो चाहें (23){22}
(23) यानी जन्नत वालों को हमने अपने एहसान से दमबदम ज़्यादा नेअमतें अता फ़रमाई.

एक दूसरे से लेते हैं वह जाम जिसमें न बेहूदगी और न गुनहगारी(24){23}
(24) जैसा कि दुनिया की शराब में क़िस्म क़िस्म की बुराइयाँ थीं क्योंकि जन्नत की शराब पीने से न अक़्ल भ्रष्ट होती है न ख़सलतें ख़राब होती है न पीने वाला बेहूदा बकता है न गुनहगार होता है.

और उनके ख़िदमतगार (सेवक) लड़के उनके गिर्द फिरेंगे(25)
(25) ख़िदमत के लिये और उनके हुस्नो सफ़ा और पाकीज़गी का यह हाल है.

मानो वो मोती हैं छुपा कर रखे गए(26){24}
(26) जिन्हें कोई हाथ ही न लगा. हज़रत इब्ने उमर रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि किसी जन्नती के पास ख़िदमत में दौड़ने वाले ग़ुलाम हज़ार से कम न होंगे और हर ग़ुलाम अलग अलग ख़िदमत पर मुक़र्रर होगा.

और उनमें एक ने दूसरे की तरफ़ मुंह किया पूछते हुए(27){25}
(27) यानी जन्नती जन्नत में एक दूसरे से पूछेंगे कि दुनिया में किस हाल में थे और क्या अमल करते थे. और यह पूछना अल्लाह की नेअमत के ऐतिराफ़ के लिये होगा.

बोले बेशक हम इस से पहले अपने घरों में सहमे हुए थे (28) {26}
(28) अल्लाह तआला के ख़ौफ़ से और इस डर से कि नफ़्स और शैतान ईमान की ख़राबी का कारण न हों और नेकियों के रोके जाने और गुनाहों पर पकड़ किये जाने का भी डर था.

तो अल्लाह ने हमपर एहसान किया(29)
(29) रहमत और मग़फ़िरत फ़रमा कर.

और हमें लू के अज़ाब से बचा लिया(30) {27}
(30) यानी जहन्नम की आग के अज़ाब से, जो ज़िस्मों में दाख़िल होने के कारण समूम यानी लू के नाम से मौसूम की गई.

बेशक हमने अपनी पहली ज़िन्दगी में(31)उसकी इबादत की थी, बेशक वही एहसान फ़रमाने वाला मेहरबान है {28}
(31) यानी दुनिया में इख़लास के साथ सिर्फ़–

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52 Surah-At-Tur

52 सूरए तूर -दूसरा रूकू

52|29|فَذَكِّرْ فَمَا أَنتَ بِنِعْمَتِ رَبِّكَ بِكَاهِنٍ وَلَا مَجْنُونٍ
52|30|أَمْ يَقُولُونَ شَاعِرٌ نَّتَرَبَّصُ بِهِ رَيْبَ الْمَنُونِ
52|31|قُلْ تَرَبَّصُوا فَإِنِّي مَعَكُم مِّنَ الْمُتَرَبِّصِينَ
52|32|أَمْ تَأْمُرُهُمْ أَحْلَامُهُم بِهَٰذَا ۚ أَمْ هُمْ قَوْمٌ طَاغُونَ
52|33|أَمْ يَقُولُونَ تَقَوَّلَهُ ۚ بَل لَّا يُؤْمِنُونَ
52|34|فَلْيَأْتُوا بِحَدِيثٍ مِّثْلِهِ إِن كَانُوا صَادِقِينَ
52|35|أَمْ خُلِقُوا مِنْ غَيْرِ شَيْءٍ أَمْ هُمُ الْخَالِقُونَ
52|36|أَمْ خَلَقُوا السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ ۚ بَل لَّا يُوقِنُونَ
52|37|أَمْ عِندَهُمْ خَزَائِنُ رَبِّكَ أَمْ هُمُ الْمُصَيْطِرُونَ
52|38|أَمْ لَهُمْ سُلَّمٌ يَسْتَمِعُونَ فِيهِ ۖ فَلْيَأْتِ مُسْتَمِعُهُم بِسُلْطَانٍ مُّبِينٍ
52|39|أَمْ لَهُ الْبَنَاتُ وَلَكُمُ الْبَنُونَ
52|40|أَمْ تَسْأَلُهُمْ أَجْرًا فَهُم مِّن مَّغْرَمٍ مُّثْقَلُونَ
52|41|أَمْ عِندَهُمُ الْغَيْبُ فَهُمْ يَكْتُبُونَ
52|42|أَمْ يُرِيدُونَ كَيْدًا ۖ فَالَّذِينَ كَفَرُوا هُمُ الْمَكِيدُونَ
52|43|أَمْ لَهُمْ إِلَٰهٌ غَيْرُ اللَّهِ ۚ سُبْحَانَ اللَّهِ عَمَّا يُشْرِكُونَ
52|44|وَإِن يَرَوْا كِسْفًا مِّنَ السَّمَاءِ سَاقِطًا يَقُولُوا سَحَابٌ مَّرْكُومٌ
52|45|فَذَرْهُمْ حَتَّىٰ يُلَاقُوا يَوْمَهُمُ الَّذِي فِيهِ يُصْعَقُونَ
52|46|يَوْمَ لَا يُغْنِي عَنْهُمْ كَيْدُهُمْ شَيْئًا وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ
52|47|وَإِنَّ لِلَّذِينَ ظَلَمُوا عَذَابًا دُونَ ذَٰلِكَ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
52|48|وَاصْبِرْ لِحُكْمِ رَبِّكَ فَإِنَّكَ بِأَعْيُنِنَا ۖ وَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ حِينَ تَقُومُ
52|49|وَمِنَ اللَّيْلِ فَسَبِّحْهُ وَإِدْبَارَ النُّجُومِ

तो ऐ मेहबूब तुम नसीहत फ़रमाओ (1)
(1) मक्के के काफ़िरों को और उनके तांत्रिक और दीवाना कहने की वजह से आप नसीहत से बाज़ न रहें इसलिये.

कि तुम अपने रब के फ़ज़्ल से न काहिन हो न मजनून {29} या कहते हैं (2)
(2) ये मक्के के काफ़िर आपकी शान में.

ये शायर हैं हमे इन पर ज़माने के हादसों का इन्तिज़ार है(3){30}
(3) कि जैसे इनसे पहले शायर मर गए और उनके जत्थे टूट गए यही हाल इनका होना है (मआज़ल्लाह) और वो काफ़िर यह भी कहते थे इनके वालिद की मौत जवानी में हुई है इन की भी ऐसी ही होगी. अल्लाह तआला अपने हबीब से फ़रमाता है.

तुम फ़रमाओ इन्तिज़ार किये जाओ (4)
(4) मेरी मौत का.

मैं भी तुम्हारे इन्तिज़ार में हूँ (5){31}
(5) कि तुम पर अल्लाह का अज़ाब आए. चुनांन्चे यह हुआ और वो काफ़िर बद्र में क़त्ल और क़ैद के अज़ाब में गिरफ़्तार किये गए.

क्या उनकी अक़्लें उन्हें यही बताती हैं(6)
(6) जो वो हुज़ूर की शान में कहते हैं शायर, जादूगर तांत्रिक, ऐसा कहना बिल्कुल अक़्ल के ख़िलाफ़ है और मज़े की बात यह कि पागल भी कहते जाएं और शायर और तांत्रिक भी और फिर अपने अक़्ल वाले होने का दावा.

या वो सरकश लोग हैं(7){32}
(7) कि दुश्मनीं में अंधे हो रहे हैं और कुफ़्र और सरकशी में हद से गुज़र गए.

या कहते हैं उन्होंने (8)
(8) यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अपने दिल से.

यह क़ुरआन बना लिया बल्कि वो ईमान नहीं रखते(9){33}
(9) और दुश्मनी और नफ़्स की बुराई से ऐसा बुरा भला कहते हैं. अल्लाह तआला उनपर हुज्जत क़ायम फ़रमाता है कि अगर उनके ख़याल में क़ुरआन जैसा कलाम कोई इन्सान बना सकता है.

तो उस जैसी एक बात तो ले आएं(10)
(10) वो हुस्नो ख़ूबी और फ़साहत व बलाग़त में इसकी तरह हो.

अगर सच्चे हैं {34} क्या वो किसी अस्ल से न बनाए गए(11)
(11) यानी क्या वो माँ बाप से पैदा नहीं हुए. पत्थर बेजान, बेअक़्ल हैं जिनपर हुज्जत क़ायम न की जाएगी. ऐसा नहीं. मानी ये हैं कि क्या वो नुत्फ़े से पैदा नहीं हुए और क्या उन्हें ख़ुदा ने नहीं बनाया.

या वही बनाने वाले हैं(12){35}
(12) कि उन्होंने अपने आपको ख़ुद ही बना लिया हो, यह भी मुहाल है. तो लामुहाला उन्हें इक़रार करना पड़ेगा कि उन्हें अल्लाह तआला ने ही पैदा किया और क्या कारण है कि वो उसकी इबादत नहीं करते और बुतों को पूजते हैं.

या आसमान और ज़मीन उन्हीं ने पैदा किये(13)
(13) यह भी नहीं और अल्लाह तआला के सिवा आसमान और ज़मीन पैदा करने की कोई क़ुदरत नहीं रखता तो क्या उसकी इबादत नहीं करते.

बल्कि उन्हें यक़ीन नहीं(14) {36}
(14) अल्लाह तआला की तौहीद और उसकी क़ुदरत और ख़ालिक़ होने का. अगर इसका यक़ीन होता तो ज़रूर उसके नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाते.

या उनके पास तुम्हारे रब के ख़ज़ाने हैं(15)
(15) नबुव्वत और रिज़्क़ वग़ैरह के कि उन्हें इख़्तियार हो जहाँ चाहे ख़र्च करें और जिसे चाहे दें.

या वो करोड़े (बड़े हाकिम) हैं(16){37}
(16) ख़ुद- मुख़्तार, जो चाहे करें कोई पूछने वाला नहीं.

या उनके पास कोई ज़ीना है(17)
(17) आसमान की तरफ़ लगा हुआ.

जिसमें चढ़कर सुन लेते हैं(18)
(18) और उन्हे मालूम हो जाता है कि कौन पहले हलाक होगा और किसकी फ़त्ह होगी. अगर इसका दावा हो.

तो उनका सुनने वाला कोई रौशन सन्द लाए {38} क्या उसको बेटियाँ और तुम को बेटे(19){39}
(19) यह उनकी मूर्खता का बयान है कि अपने लिये तो बेटे पसन्द करते हैं और अल्लाह तआला की तरफ़ बेटियों की निस्बत करते हैं. जिनको बुरा जानते हैं.

या तुम उनसे (20)
(20) दीन की तालीम पर.

कुछ उजरत (मजदूरी) मांगते हो तो वो चिट्टी के बोझ में दबे हैं(21){40}
(21) और तावान की ज़ेरबारी के कारण इस्लाम नहीं लाते. यह भी तो नहीं है, फिर इस्लाम लाने में उन्हें क्या उज्र है.

या उनके पास ग़ैब हैं जिससे वो हुक्म लगाते हैं (22){41}
(22) कि मरने के बाद न उठेंगे और उठे भी तो अज़ाब न किये जाएंगे, यह बात भी नहीं है.

किसी दाँव के इरादे में हैं(23)
(23) दारून नदवा में जमा होकर अल्लाह तआला के नबी हादिये बरहक़ सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को तकलीफ़ें देने और उनके क़त्ल के षडयंत्र रचाते हैं.

तो काफ़िरों ही पर दाँव पड़ना है(24){42}
(24) उनके छलकपट का वबाल उन्हीं पर पड़ेगा. चुनांन्चे ऐसा ही हुआ अल्लाह तआला ने अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को उनके छलकपट से मेहफ़ूज़ रखा और उन्हें बद्र में हलाक किया.

या अल्लाह के सिवा उनका कोई और ख़ुदा है(25)
(25) जो उन्हें रोज़ी दे और अल्लाह के अज़ाब से बचा सके.

अल्लाह को पाकी उनके शिर्क से {43} और अगर आसमान से कोई टुकड़ा गिरते देखें तो कहेंगे तह ब तह बादल है (26) {44}
(26) यह जवाब है काफ़िरों के उस क़ौल का जो कहते थे कि हम पर आसमान का कोई टुकड़ा गिरा कर अज़ाब कीजिये. अल्लाह तआला उसी के जवाब में फ़रमाता है कि उनका कुफ़्र और दुश्मनी इस हद पर पहुंच गई हैं कि अगर उनपर ऐसा ही किया जाए कि आसमान का कोई टुकड़ा गिरा दिया जाए और आसमान से उसे गिरते हुए देखें तो भी कुफ़्र से बाज़ न आएं और दुश्मनी से यही कहें कि यह तो बादल है इससे हमें पानी मिलेगा.

तो तुम उन्हें छोड़ दो यहाँ तक कि वो अपने उस दिन से मिलें जिसमें बेहोश होंगे(27){45}
(27) इससे मुराद सूर के पहली बार फ़ूंके जाने का दिन है.
जिस दिन उनका दाँव कुछ काम न देगा और न उनकी मदद हो(28){46}
(28) ग़रज़ किसी तरह अज़ाबे आख़िरत से बच न सकेंगे.

और बेशक ज़ालिमों के लिये इससे पहले एक अज़ाब है(29)
(29) उनके कुफ़्र के कारण अज़ाबे आख़िरत से पहले और वह अज़ाब या तो बद्र से क़त्ल होना है या भूख़ और दुष्काल की सात साल की मुसीबत या क़ब्र का अज़ाब.

मगर उनमें अक्सर को ख़बर नहीं(30){47}
(30) कि वो अज़ाब में मुब्तिला होने वाले हैं.

और ऐ मेहबूब, तुम अपने रब के हुक्म पर ठहरे रहो(31)
(31) और जो मोहलत उन्हें दी गई है उस पर दिल तंग न हो.
कि बेशक तुम हमारी निगहदाश्त में हो(32)
(32) तुम्हें वो कुछ नुक़सान नहीं पहुंचा सकते.

और अपने रब की तारीफ़ करते हुए उसकी पाकी बोलो जब तुम खड़े हो(33){48}
(33) नमाज़ के लिये. इससे पहली तकबीर के बाद सना यानी सुब्हानकल्लाहुम्मा पढ़ना मुराद है या ये मानी हैं कि जब सोकर उठो तो अल्लाह तआला की हम्द और तस्बीह किया करो या ये मानी हैं कि हर मजलिस से उठते वक़्त हम्द व तस्बीह बजा लाया करो.

और कुछ रात में उसकी पाकी बोलों और तारों के पीठ देते(34){49}
(34) यानी तारो के छुपने के बाद. मुराद यह है कि उन औक़ात में अल्लाह तआला की तस्बीह और तारीफ़ करो. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि तस्बीह से मुराद नमाज़ है.