36 सूरए यासीन

36  सूरए यासीन

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
يسٓ وَٱلْقُرْءَانِ ٱلْحَكِيمِ
إِنَّكَ لَمِنَ ٱلْمُرْسَلِينَ
عَلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ
تَنزِيلَ ٱلْعَزِيزِ ٱلرَّحِيمِ
لِتُنذِرَ قَوْمًۭا مَّآ أُنذِرَ ءَابَآؤُهُمْ فَهُمْ غَٰفِلُونَ
لَقَدْ حَقَّ ٱلْقَوْلُ عَلَىٰٓ أَكْثَرِهِمْ فَهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ
إِنَّا جَعَلْنَا فِىٓ أَعْنَٰقِهِمْ أَغْلَٰلًۭا فَهِىَ إِلَى ٱلْأَذْقَانِ فَهُم مُّقْمَحُونَ
وَجَعَلْنَا مِنۢ بَيْنِ أَيْدِيهِمْ سَدًّۭا وَمِنْ خَلْفِهِمْ سَدًّۭا فَأَغْشَيْنَٰهُمْ فَهُمْ لَا يُبْصِرُونَ
وَسَوَآءٌ عَلَيْهِمْ ءَأَنذَرْتَهُمْ أَمْ لَمْ تُنذِرْهُمْ لَا يُؤْمِنُونَ
إِنَّمَا تُنذِرُ مَنِ ٱتَّبَعَ ٱلذِّكْرَ وَخَشِىَ ٱلرَّحْمَٰنَ بِٱلْغَيْبِ ۖ فَبَشِّرْهُ بِمَغْفِرَةٍۢ وَأَجْرٍۢ كَرِيمٍ
إِنَّا نَحْنُ نُحْىِ ٱلْمَوْتَىٰ وَنَكْتُبُ مَا قَدَّمُوا۟ وَءَاثَٰرَهُمْ ۚ وَكُلَّ شَىْءٍ أَحْصَيْنَٰهُ فِىٓ إِمَامٍۢ مُّبِينٍۢ

सूरए यासीन मक्का में उतरी, इसमें 83 आयतें और पांच रूकू हैं.
पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए यासीन मक्के में उतरी. इसमें पाँच रूकू, तिरासी आयतें, सात सौ उनतीस कलिमे और तीन हज़ार अक्षर हैं. तिरमिज़ी की हदीस शरीफ़ में है कि हर चीज़ के लिये दिल है और क़ुरआन का दिल यासीन है और जिसने यासीन पढ़ी, अल्लाह तआला उसके लिये दस बार क़ुरआन पढ़ने का सवाब लिखता है. यह हदीस ग़रीब है और इसकी असनाद में एक रावी मजहूल है. अबू दाऊद की हदीस में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया अपने मरने वालों पर यासीन पढो. इसी लिये मौत के वक़्त सकरात की हालत में मरने वाले के पास यासीन पढ़ी जाती है.

यासीन {1} हिकमत वाले क़ुरआन की क़सम {2} बेशक तुम(2){3}
(2) ऐ नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम.

सीधी राह पर भेजे गए हो(3) {4}
(3) जो मंज़िले मक़सूद को पहुंचाने वाली है यह राह तौहीद और हिदायत की राह है, तमाम नबी इसी पर रहे हैं. इस आयत में काफ़िरों का रद है जो हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहते थे “लस्ता मुरसलन” तुम रसूल नहीं हो. इसके बाद क़ुरआने करीम की निस्बत इरशाद फ़रमाया.

ज़्ज़त वाले मेहरबान का उतारा हुआ {5} ताकि तुम उस क़ौम को डर सुनाओ जिसके बाप दादा न डराए गए (4) {6}
(4) यानी उनके पास कोई नबी न पहुंचे और क़ुरैश की क़ौम का यह हाल है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से पहले उनमें कोई रसूल नहीं आया.

तो वो बेख़बर है, बेशक उनमें अक्सर पर बात साबित हो चुकी है (5)
(5) यानी अल्लाह के हुक्म और उसका लिखा उनके अज़ाब पर जारी हो चुका है और अल्लाह तआला का इरशाद “लअमलअन्ना जहन्नमा मिनल जिन्नते वन्नासे अजमईन” यानी बेशक ज़रूर जहन्नम भर दूंगा जिन्नों और आदमियों को मिलाकर. (सूरए हूद, आयत 119) उनके हक़ में साबित हो चुका है और अज़ाब का उनके लिये निश्चित हो जाना इस कारण से है कि वो कुफ़्र और इनकार पर अपने इख़्तियार से अड़े रहने वाले हैं.

तो वो ईमान न लाएंगे(6) {7}
(6) इसके बाद उनके कुफ़्र में पक्के होने की एक तमसील (उपमा) इरशाद फ़रमाई.

हमने उनकी गर्दनों में तौक़ कर दिये हैं कि वो ठोड़ियों तक रहें तो ये ऊपर को मुंह उठाए रह गए (7){8}
(7) यह तमसील है उनके कुफ़्र में ऐसे पुख़्ता होने की कि डराने और चेतावनी वाली आयतों और नसीहत और हिदायत के अहकामात किसी से वो नफ़ा नहीं उठा सकते जैसे कि वो व्यक्ति जिन की गर्दनों में “ग़िल” की क़िस्म का तौक़ पड़ा हो जो ठोड़ी तक पहुंचता है और उसकी वजह से वो सर नहीं झुका सकते. यही हाल उनका है कि किसी तरह उनको हक़ की तरफ़ रूचि नहीं होती और उसके हुज़ूर सर नहीं झुकाते. और कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया है कि यह उनके हाल की हक़ीक़त् है. जहन्नम में उन्हें इसी तरह का अज़ाब किया जाएगा जैसा की दूसरी आयत में इरशाद फ़रमाया : “इंज़िल अग़लालो फ़ी अअनाक़िहम” जब उनकी गर्दनों में तौक़ होंगे और ज़ंजीरें, घसीटे जाएंगे (सूरए अल-मूमिन, आयत 71) . यह आयत अबू जहल और उसके दो मख़ज़ूमी दोस्तों के हक़ में उतरी. अबू जहल ने क़सम खाई थी कि अगर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को नमाज़ पढ़ते देखेगा तो पत्थर से सर कुचल डालेगा. जब उसने हु़जूर को नमाज़ पढ़ते देखा तो वह इसी ग़लत इरादे से एक भारी पत्थर लाया. जब उस पत्थर को उठाया तो उसके हाथ गर्दन में चिपके रह गए और पत्थर हाथ को लिपट गया. यह हाल देखकर अपने दोस्तों की तरफ़ वापस हुआ और उनसे वाक़िआ बयान किया तो उसके दोस्त वलीद बिन मुग़ीरह ने कहा कि यह काम मैं करूंगा और मैं उनका सर कुचल कर ही आऊंगा. चुनांन्चे पत्थर ले आया. हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अभी नमाज़ ही पढ़ रहे थे, जब यह क़रीब पहुंचा, अल्लाह तआला ने उसकी बीनाई यानी दृष्टि छीन ली. हुज़ूर की आवाज़ सुनता था, आँखों से देख नहीं सकता था. यह भी परेशान होकर अपने यारों की तरफ़ लौटा, वो भी नज़र न आए. अब अबू जहल के तीसरे दोस्त ने दावा किया कि वह इस काम को अंजाम देगा और बड़े दावे के साथ वह हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तरफ़ चला था. पर उलटे पाँव ऐसा बदहवास होकर भागा कि औंधे मुंह गिर गया.  उसके दोस्तों ने हाल पूछा तो कहने लगा कि मेरा दिल बहुत सख़्त है मैं ने एक बहुत बड़ा सांड देखा जो मेरे और मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) के बीच आ गया. लात और उज़्ज़ा की क़स्म. अगर मैं ज़रा भी आगे बढ़ता तो मुझे खा ही जाता इसपर यह आयत उतरी. (ख़ाज़िन व जुमल)

और हमने उनके आगे दीवार बनादी और उनके पीछे एक दीवार और उन्हें ऊपर से ढांक दिया तो उन्हें कुछ नहीं सूझता (8){9}
(8) यह भी तमसील है कि जैसे किसी शख़्स के लिये दोनों तरफ़ दीवारें हों और हर तरफ़ से रास्ता बन्द कर दिया गया हो वह किसी मंज़िले मक़सूद तक नहीं पहुंच सकता. यही हाल इन काफ़िरों का है कि उन पर हर तरफ़ से ईमान की राह बन्द है. सामने उनके सांसारिक घमण्ड की दीवारें हैं और  उनके पीछे आख़िरत को झुटलाने की, और वो अज्ञानता के कै़दख़ाने में क़ैद हैं, दलीलों पर नज़र करना उन्हें मयस्सर नहीं.

और उन्हें एक सा है तुम उन्हे डराओ वो ईमान लाने के नहीं {10} तुम तो उसी को डर सुनाते हो (9)
(9) यानी आपके डर सुनाने से वहीं लाभ उठाता है.

जो नसीहत पर चले और रहमान से बेदेखे डरे, तो उसे बख़्शिश और इज़्ज़त के सवाब की बशारत दो (10){11}
(10) यानी जन्नत की.

बेशक हम मुर्दों को जिलाएंगे और हम लिख रहे हैं जो उन्होंने आगे भेजा(11)
(11) यानी दुनिया की ज़िन्दगी मे जो नेकी या बदी की, ताकि उसपर बदला दिया जाए.

और जो निशानियाँ पीछे छोड़ गए(12)
(12) यानी और हम उनकी वो निशानियाँ वो तरीक़े भी लिखते हैं जो वो अपने बाद छोड़  गए चाहे वो तरीक़े नेक हों या बुरे. जो नेक तरीक़े उम्मती निकालते हैं उनको बिदअते हसना कहते हैं और उस तरीक़े को निकालने वालों और अमल करने वालों दोनों को सवाब मिलता है. और जो बुरे तरीक़े निकालते हैं उनके बिदअते सैयिअह कहते हैं. इस तरीक़े के निकालने वाले और अमल करने वाले दोनों गुनाहगार होते हैं. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया जिस शख़्स ने इस्लाम में नेक तरीक़ा निकाला उसको तरीक़ा निकालने का भी सवाब मिलेगा और उसपर अमल करने वालों का भी सवाब. बग़ैर इसके कि अमल करने वालों के सवाब में कुछ कमी की जाए. और जिसने इस्लाम में बुरा तरीक़ा निकाला तो उस पर वह तरीक़ा निकालने का भी गुनाह और उस तरीक़े पर अमल करने वालों के भी गुनाह बग़ैर इसके कि उन अमल करने वालों के गुनाहों में कुछ कमी की जाए. इससे मालूम हुआ कि सैंकड़ों भलाई के काम जैसे फ़ातिहा, ग्यारहवीं व तीजा व चालीसवाँ व उर्स व तोशा व ख़त्म व ज़िक्र की मेहफ़िलें, मीलाद  व शहादत की मजलिसें जिनको बदमज़हब लोग बिदअत कहकर मना करते हैं और लोगों को इन नेकियों से रोकते हैं, ये सब दुरूस्त और अज्र और सवाब के कारण हैं और इनको बिदअते सैयिअह बताना ग़लत और बातिल है. ये ताआत और नेक अमल जो ज़िक्र व तिलावत और सदक़ा व ख़ैरात पर आधारित हैं बिदअते सैयिअह नहीं. बिदअते सैयिअह वो बुरे तरीक़े हैं जिन से दीन को नुक़सान पहुंचता है और जो सुन्नत के विरूद्ध हैं जैसा कि हदीस शरीफ़ में आया है कि जो क़ौम बिदअत निकालती है उससे एक सुन्नत उठ जाती है. तो बिदअत सैयिअह वही है जिससे सुन्नत उठती हो जैसे कि रिफ़्ज़ व ख़ारिजियत और वहाबियत, ये सब इन्तिहा दर्जे की ख़राब बिदअतें हैं.  राफ़ज़ियत और ख़ारिजियत जो सहाबा और अहले बैते रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की दुशमनी पर आधारित हैं, उनसे सहाबा और एहले बैत के साथ महब्बत और नियाज़मन्दी रखने की सुन्नत उठ जाती है जिसके शरीअत में ताकीदी हुक्म हैं. वहाबियत की जड़ अल्लाह के मक़बूल बन्दों, नबियों, वलियों की शान में बेअदबी और गुस्ताख़ी और  तमाम मुसलमानों को मुश्रिक ठहराना है. इससे बुज़ुर्गाने दीन की हुर्मत और इज़्ज़त और आदर सत्कार और मुसलमानों के साथ भाई चारे और महब्बत की सुन्नतें उठ जाती हैं जिनकी बहुत सख़्त ताकीदें हैं और जो दीन में बहुत ज़रूरी चीज़ें हैं. और इस आयत की तफ़सीर में यह भी कहा गया है कि आसार से मुराद वो क़दम हैं जा नमाज़ी मस्जिद की तरफ़ चलने में रखता है और इस मानी पर आयत के उतरने की परिस्थिति यह बयान की गई है कि बनी सलमा मदीनए तैय्यिबह के किनारे पर रहते थे. उन्होंने चाहा कि मस्जिद शरीफ़ के क़रीब आ बसें. इसपर यह आयत उतरी और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि तुम्हारे क़दम लिखे जाते हैं, तुम मकान न बदलो, यानी जितनी दूर आओगे उतने ही क़दम ज़्यादा पड़ेंगे और अज्र व सवाब ज़्यादा होगा.

और हर चीज़ हमने गिन रखी है एक बताने वाली किताब में (13){12}
(13) यानी लौहे मेहफ़ूज़ में.

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36 सूरए यासीन- दूसरा रूकू

36  सूरए यासीन- दूसरा रूकू


وَٱضْرِبْ لَهُم مَّثَلًا أَصْحَٰبَ ٱلْقَرْيَةِ إِذْ جَآءَهَا ٱلْمُرْسَلُونَ
إِذْ أَرْسَلْنَآ إِلَيْهِمُ ٱثْنَيْنِ فَكَذَّبُوهُمَا فَعَزَّزْنَا بِثَالِثٍۢ فَقَالُوٓا۟ إِنَّآ إِلَيْكُم مُّرْسَلُونَ
قَالُوا۟ مَآ أَنتُمْ إِلَّا بَشَرٌۭ مِّثْلُنَا وَمَآ أَنزَلَ ٱلرَّحْمَٰنُ مِن شَىْءٍ إِنْ أَنتُمْ إِلَّا تَكْذِبُونَ
قَالُوا۟ رَبُّنَا يَعْلَمُ إِنَّآ إِلَيْكُمْ لَمُرْسَلُونَ
وَمَا عَلَيْنَآ إِلَّا ٱلْبَلَٰغُ ٱلْمُبِينُ
قَالُوٓا۟ إِنَّا تَطَيَّرْنَا بِكُمْ ۖ لَئِن لَّمْ تَنتَهُوا۟ لَنَرْجُمَنَّكُمْ وَلَيَمَسَّنَّكُم مِّنَّا عَذَابٌ أَلِيمٌۭ
قَالُوا۟ طَٰٓئِرُكُم مَّعَكُمْ ۚ أَئِن ذُكِّرْتُم ۚ بَلْ أَنتُمْ قَوْمٌۭ مُّسْرِفُونَ
وَجَآءَ مِنْ أَقْصَا ٱلْمَدِينَةِ رَجُلٌۭ يَسْعَىٰ قَالَ يَٰقَوْمِ ٱتَّبِعُوا۟ ٱلْمُرْسَلِينَ
ٱتَّبِعُوا۟ مَن لَّا يَسْـَٔلُكُمْ أَجْرًۭا وَهُم مُّهْتَدُونَ
وَمَا لِىَ لَآ أَعْبُدُ ٱلَّذِى فَطَرَنِى وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
ءَأَتَّخِذُ مِن دُونِهِۦٓ ءَالِهَةً إِن يُرِدْنِ ٱلرَّحْمَٰنُ بِضُرٍّۢ لَّا تُغْنِ عَنِّى شَفَٰعَتُهُمْ شَيْـًۭٔا وَلَا يُنقِذُونِ
إِنِّىٓ إِذًۭا لَّفِى ضَلَٰلٍۢ مُّبِينٍ
إِنِّىٓ ءَامَنتُ بِرَبِّكُمْ فَٱسْمَعُونِ
قِيلَ ٱدْخُلِ ٱلْجَنَّةَ ۖ قَالَ يَٰلَيْتَ قَوْمِى يَعْلَمُونَ
بِمَا غَفَرَ لِى رَبِّى وَجَعَلَنِى مِنَ ٱلْمُكْرَمِينَ
۞ وَمَآ أَنزَلْنَا عَلَىٰ قَوْمِهِۦ مِنۢ بَعْدِهِۦ مِن جُندٍۢ مِّنَ ٱلسَّمَآءِ وَمَا كُنَّا مُنزِلِينَ
إِن كَانَتْ إِلَّا صَيْحَةًۭ وَٰحِدَةًۭ فَإِذَا هُمْ خَٰمِدُونَ
يَٰحَسْرَةً عَلَى ٱلْعِبَادِ ۚ مَا يَأْتِيهِم مِّن رَّسُولٍ إِلَّا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ
أَلَمْ يَرَوْا۟ كَمْ أَهْلَكْنَا قَبْلَهُم مِّنَ ٱلْقُرُونِ أَنَّهُمْ إِلَيْهِمْ لَا يَرْجِعُونَ
وَإِن كُلٌّۭ لَّمَّا جَمِيعٌۭ لَّدَيْنَا مُحْضَرُونَ

और उनसे निशानियाँ बयान करो उस शहर वालों की (1)
(1)  इस शहर से मुराद अन्ताकियह है. यह एक बड़ा शहर है इसमें चश्में हैं, कई पहाड़ हैं एक पथरीली शहर पनाह यानी नगर सीमा है. बारह मील के घेरे में बसता है.

जब उनके पास भेजे हुए (रसूल) आए (2){13}
(2) हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के वाक़ए का संक्षिप्त बयान यह है कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने अपने दो हवारियों सादिक़ और सुदूक़ को अन्ताकियह भेजा ताकि वहाँ के लोगों को जो बुत परस्त थे सच्चे दीन की तरफ़ बुलाएं. जब ये दोनों शहर के क़रीब पहुंचे तो उन्होंने एक बूढ़े व्यक्ति को देखा कि बकरियाँ चरा रहा है. उसका नाम हबीब नज्जार था. उसने उनका हाल पूछा. उन दोनों ने कहा कि हम हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के भेजे हुए हैं तुम्हें सच्चे दीन की तरफ़ बुलाने आए हैं कि बुत परस्ती छोड़कर ख़ुदा परस्ती इख़्तियार करो. हबीब नज्जार ने निशानी पूछी. उन्होंने कहा कि निशानी यह है कि हम बीमारों को अच्छा करते हैं. अंधों को आँख वाला करते हैं, सफ़ेद दाग़ वालों का रोग दूर करते हैं. हबीब नज्जार का बेटा दो साल से बीमार था उन्होंने उस पर हाथ फेरा वह स्वस्थ हो गया. हबीब ईमान ले आए और इस घटना की ख़बर मशहूर हो गई यहाँ तक कि बहुत सारे लोगों ने उनके हाथों अपनी बीमारियों से सेहत पाई. यह ख़बर पहुंचने पर बादशाह ने उन्हें बुला कर कहा कि क्या हमारे मअबूदों के सिवा और कोई मअबूद भी है. उन दोनों ने कहा हाँ वही जिसने तुझे और तेरे मअबूदों को पैदा किया. फिर लोग उनके पीछे पड़ गए और उन्हें मारा, दोनों क़ैद कर लिये गए. फिर हज़रत ईसा ने शमऊन को भेजा. वह अजनबी बन कर शहर में दाख़िल हुए और बादशाह के मुसाहिबों और क़रीब के लोगों से मेल जोल पैदा करके बादशाह तक पहुंचे और उसपर अपना असर पैदा कर लिया. जब देखा कि बादशाह उनसे ख़ूब मानूस हो चुका है तो एक दिन बादशाह से ज़िक्र किया कि दो आदमी जो क़ैद किये गये हैं क्या उनकी बात सुनी गई थी कि वो क्या कहते थे. बादशाह ने कहा कि नहीं. जब उन्होंने नए दीन का नाम लिया फ़ौरन ही मुझे ग़ुस्सा आ गया. शमऊन ने कहा अगर बादशाह की राय हो तो उन्हें बुलाया जाए देखें उनके पास क्या है. चुनांन्चे वो दोनों बुलाए गए. शमऊन उनसे पूछा तुम्हें किस ने भेजा है. उन्हों ने कहा उस पर अल्लाह ने जिसने हर चीज़ को पैदा किया और हर जानदार को रोज़ी दी और जिसका कोई शरीक नहीं. शमऊन ने कहा कि उसकी संक्षेप में विशेषताएं बयान करो. उन्होंने कहा वह जो चाहता है करता है जो चाहता है हुक्म देता है. शमऊन ने कहा तुम्हारी निशानी क्या है. उन्होंने कहा जो बादशाह चाहे. तो बादशाह ने एक अंधे लड़के को बुलाया उन्होंने दुआ की वह फ़ौरन आँख वाला हो गया. शमऊन ने बादशाह से कहा कि अब मुनासिब यह है कि तू अपने मअबूदों से कह कि वो भी ऐसा ही करके दिखाएं ताकि तेरी और उनकी इज़्ज़त ज़ाहिर हो. बादशाह ने शमऊन से कहा कि तुम से कुछ छुपाने की बात नहीं है. हमारा मअबूद न देखे न सुने न कुछ बिगाड़ सके न बना सके. फिर बादशाह ने उन दोनों हवारियों से कहा कि अगर तुम्हारे मअबूद को मुर्दे के ज़िन्दा कर देन की ताक़त हो तो हम उसपर ईमान ले आएं. उन्होंने कहा हमारा मअबूद हर चीज़ पर क़ादिर है. बादशाह ने एक किसान के लड़के को मंगाया जिसे मरे हुए सात दिन हो चुके थे और जिस्म ख़राब हो गया था, बदबू फैल रही थी. उनकी  दुआ से अल्लाह तआला ने उसको ज़िन्दा किया और वह उठ खड़ा हुआ और कहने लगा मैं मुश्रिक मरा था मुझे जहन्नम की सात घाटियों में दाख़िल किया गया. मैं तुम्हें आगाह करता हूँ कि जिस दीन पर तुम हो वह बहुत हानिकारक है. ईमान ले आओ और कहने लगा कि आसमान के दर्वाज़े खुले और एक सुन्दर जवान मुझे नज़र आया जो उन तीनों व्यक्तियों की सिफ़ारिश करता है बादशाह ने कहा कौन तीन, उसने कहा एक शमऊन और दो ये. बादशाह को आश्चर्य हुआ. जब शमऊन ने देखा कि उसकी बात बादशाह पर असर कर गई तो उसने बादशाह को नसीहत की वह ईमान ले आया और उसकी क़ौम के कुछ लोग ईमान लाए और कुछ ईमान न लाए और अल्लाह के अज़ाब से हलाक किये गए.

जब हमने उनकी तरफ़ दो भेजे(3)
(3) यानी दो हवारी. वहब ने कहा उनके नाम यूहन्ना और बोलस थे और कअब का क़ौल है कि  सादिक़ व सदूक़.

फिर उन्होंने उनको झुटलाया तो हमने तीसरे से ज़ोर दिया(4)
(4) यानी शमऊन से तक़बियत और ताईद पहुंचाई.

अब उन सबने कहा (5)
(5) यानी तीनों फ़रिस्तादों यानी एलचियों ने.

कि बेशक हम तुम्हारी तरफ़ भेजे गए हैं {14} बोले तुम तो नहीं मगर हम जैसे आदमी और रहमान ने कुछ नहीं उतारा तुम निरे झूटे हो {15} वो बोले हमारा रब जानता है कि बेशक ज़रूर हम तुम्हारी तरफ़ भेजे गए हैं {16} और हमारे ज़िम्मे नहीं मगर साफ़ पहुंचा देना (6) {17}
6) खुली दलीलों के साथ और वह अन्धों और बीमारों को अच्छा करता और मुर्दों को ज़िन्दा करता है.

बोले हम तुम्हें मनहूस समझते हैं (7)
(7) जब से तुम आए बारिश ही नहीं हुई.

बेशक तुम अगर बाज़ न आए (8)
(8) अपने दीन की तबलीग़ से.

तो ज़रूर हम तुम्हें संगसार करेंगे और बेशक हमारे हाथों तुम पर दुख की मार पड़ेगी {18} उन्होंने फ़रमाया तुम्हारी नहूसत तो तुम्हारे साथ है (9)
(9) यानी तुम्हारा कुफ़्र.

क्या इस पर बिदकते हो कि तुम समझाए गए (10)
(10) और तुम्हें इस्लाम की दावत दी गई.

बल्कि तुम हद से बढ़ने वाले लोग हो(11) {19}
(11)  गुमराही और सरकशी में और यही बड़ी नहूसत है.

और शहर के पर्ले किनारे से एक मर्द दौड़ता आया (12)
(12) यानी हबीब नज्ज़ार जो पहाड़ के ग़ार में इबादत में मसरूफ़ था जब उसने सुना कि क़ौम ने इन एलचियों को झुटलाया.

बोला ऐ मेरी क़ौम भेजे हुओं की पैरवी करो {20} ऐसों की पैरवी करो जो तुम से कुछ नेग नहीं मांगते और वो राह पर हैं (13){21}
(13)हबीब नज्ज़ार की यह बात सुनकर क़ौम ने कहा कि क्या तू उनके दीन पर है और तू उनके मअबूद पर ईमान लाया, इसके जवाब में हबीब नज्ज़ार ने कहा.

पारा बाईस समाप्त

तेईसवाँ पारा – वमालिया
(सूरए यासीन जारी)

और मुझे क्या है कि उसकी बन्दगी न करूं जिसने मुझे पैदा किया और उसी की तरफ़ तुम्हे पलटना है(14) {22}
(14) यानी इब्तिदाए हस्ती से जिसकी हम पर नेअमतें हैं और आख़िरकार भी उसी की तरफ़ पलटना है. उस हक़ीक़ी मालिक की इबादत न करना क्या मानी और उसकी निस्बत ऐतिराज़ कैसा. हर व्यक्ति अपने वुजूद पर नज़र करके उसके हक्के नेअमत और एहसान को पहचान सकता है.

क्या अल्लाह के सिवा और ख़ुदा ठहराऊं? (15)
(15) यानी क्या बुतों को मअबूद बनाऊं.

कि अगर रहमान मेरा कुछ बुरा चाहे तो उनकी सिफ़ारिश मेरे कुछ काम न आए और न वो मुझे बचा सके {23} बेशक जब तो मैं खुली गुमराही में हूँ  (16) {24}
(16) जब हबीब नज्ज़ार ने अपनी क़ौम से ऐसा नसीहत भरा कलाम किया तो वो लागे उनपर अचानक टूट पड़े और उनपर पथराव शुरू कर दिया और पाँव से कुचला यहाँ तक कि क़त्ल कर डाला. उनकी क़ब्र अन्ताकियह में है जब क़ौम ने उनपर हमला शुरू किया तो उन्होंने हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के एलचियों से बहुत जल्दी करके यह कहा.

मुक़र्रर में तुम्हारे रब पर ईमान लाया तो मेरी सुनो (17) {25}
(17) यानी मेरे ईमान के गवाह रहो जब वो क़त्ल हो चुके तो इकराम (आदर) के तौर पर—

उससे फ़रमाया गया कि जन्नत में दाख़िल हो(18)
(18) जब वो जन्नत में दाख़िल हुए और वहाँ की नेअमतें देखीं.

कहा किसी तरह मेरी क़ौम जानती {26} जैसी मेरे रब ने मेरी मग़फ़िरत की और मुझे इज़्ज़त वालों में किया (19) {27}
(19) हबीब नज्ज़ार ने यह तमन्ना की कि उनकी क़ौम को मालूम हो जाए कि अल्लाह तआला ने हबीब नज्ज़ार की मग़फ़िरत की और मेहरबानी फ़रमाई ताकि क़ौम को रसूलों के दीन की तरफ़ रग़बत हो. जब हबीब क़त्ल कर दिये गए तो अल्लाह तआला का उस क़ौम पर ग़ज़ब हुआ और उनकी सज़ा में देर फ़रमाई गई. हज़रत जिब्रईल को हुक्म हुआ और उनकी एक ही हौलनाक आवाज़ से सब के सब मर गए चुनांन्चे इरशाद फ़रमाया जाता है.

और हमने उसके बाद उसकी क़ौम पर आसमान से कोई लश्कर न उतारा (20)
(20) इस क़ौम की हलाकत के लिये.

और न हमें वहाँ कोई लश्कर उतारना था {28} वह तो बस एक ही चीख़ थी जभी वो बुझ कर रह गए (21){29}
(21) फ़ना हो गए जैसे आग बुझ जाती है.

और कहा गया कि हाय अफ़सोस उन बन्दों पर (22)
(22) उन पर और उनकी तरह और सब पर जो रसूलों को झुटलाकर हलाक हुए.

जब उनके पास कोई रसूल आता है तो उससे ठट्टा ही करते हैं {30} क्या उन्होंने न देखा (23)
(23) यानी मकका वालों ने जो नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को झुटलाते है कि–

हमने उनसे पहले कितनी संगतें हलाक फ़रमाई कि वो अब उनकी तरफ़ पलटने वाले नहीं(24){31}
(24) यानी दुनिया की तरफ़ लौटने वाले नहीं. क्या ये लोग उनके हाल से इब्रत हासिल नहीं करते.

और जितने भी हैं सब के सब हमारे हुज़ूर हाज़िर लाए जाएंगे (25) {32}
(25) यानी सारी उम्मतें क़यामत के दिन हमारे हुज़ूर हिसाब के लिये मैदान में हाज़िर की जाएंगी.

36 सूरए यासीन- तीसरा रूकू

36  सूरए यासीन- तीसरा रूकू

وَءَايَةٌۭ لَّهُمُ ٱلْأَرْضُ ٱلْمَيْتَةُ أَحْيَيْنَٰهَا وَأَخْرَجْنَا مِنْهَا حَبًّۭا فَمِنْهُ يَأْكُلُونَ
وَجَعَلْنَا فِيهَا جَنَّٰتٍۢ مِّن نَّخِيلٍۢ وَأَعْنَٰبٍۢ وَفَجَّرْنَا فِيهَا مِنَ ٱلْعُيُونِ
لِيَأْكُلُوا۟ مِن ثَمَرِهِۦ وَمَا عَمِلَتْهُ أَيْدِيهِمْ ۖ أَفَلَا يَشْكُرُونَ
سُبْحَٰنَ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلْأَزْوَٰجَ كُلَّهَا مِمَّا تُنۢبِتُ ٱلْأَرْضُ وَمِنْ أَنفُسِهِمْ وَمِمَّا لَا يَعْلَمُونَ
وَءَايَةٌۭ لَّهُمُ ٱلَّيْلُ نَسْلَخُ مِنْهُ ٱلنَّهَارَ فَإِذَا هُم مُّظْلِمُونَ
وَٱلشَّمْسُ تَجْرِى لِمُسْتَقَرٍّۢ لَّهَا ۚ ذَٰلِكَ تَقْدِيرُ ٱلْعَزِيزِ ٱلْعَلِيمِ
وَٱلْقَمَرَ قَدَّرْنَٰهُ مَنَازِلَ حَتَّىٰ عَادَ كَٱلْعُرْجُونِ ٱلْقَدِيمِ
لَا ٱلشَّمْسُ يَنۢبَغِى لَهَآ أَن تُدْرِكَ ٱلْقَمَرَ وَلَا ٱلَّيْلُ سَابِقُ ٱلنَّهَارِ ۚ وَكُلٌّۭ فِى فَلَكٍۢ يَسْبَحُونَ
وَءَايَةٌۭ لَّهُمْ أَنَّا حَمَلْنَا ذُرِّيَّتَهُمْ فِى ٱلْفُلْكِ ٱلْمَشْحُونِ
وَخَلَقْنَا لَهُم مِّن مِّثْلِهِۦ مَا يَرْكَبُونَ
وَإِن نَّشَأْ نُغْرِقْهُمْ فَلَا صَرِيخَ لَهُمْ وَلَا هُمْ يُنقَذُونَ
إِلَّا رَحْمَةًۭ مِّنَّا وَمَتَٰعًا إِلَىٰ حِينٍۢ
وَإِذَا قِيلَ لَهُمُ ٱتَّقُوا۟ مَا بَيْنَ أَيْدِيكُمْ وَمَا خَلْفَكُمْ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ
وَمَا تَأْتِيهِم مِّنْ ءَايَةٍۢ مِّنْ ءَايَٰتِ رَبِّهِمْ إِلَّا كَانُوا۟ عَنْهَا مُعْرِضِينَ
وَإِذَا قِيلَ لَهُمْ أَنفِقُوا۟ مِمَّا رَزَقَكُمُ ٱللَّهُ قَالَ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ لِلَّذِينَ ءَامَنُوٓا۟ أَنُطْعِمُ مَن لَّوْ يَشَآءُ ٱللَّهُ أَطْعَمَهُۥٓ إِنْ أَنتُمْ إِلَّا فِى ضَلَٰلٍۢ مُّبِينٍۢ
وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا ٱلْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَٰدِقِينَ
مَا يَنظُرُونَ إِلَّا صَيْحَةًۭ وَٰحِدَةًۭ تَأْخُذُهُمْ وَهُمْ يَخِصِّمُونَ
فَلَا يَسْتَطِيعُونَ تَوْصِيَةًۭ وَلَآ إِلَىٰٓ أَهْلِهِمْ يَرْجِعُونَ

और उनके लिये एक निशानी मु्र्दा ज़मीन है(1)
(1) जो इसको साबित करती है कि अल्लाह तआला मुर्दे को ज़िन्दा फ़रमाएगा.

हमने उसे ज़िन्दा किया(2)
(2) यानी बरसा कर.

और फिर उससे अनाज़ निकाला तो उसमें से खाते हैं {33} और हमने उसमें(3)
(3) यानी ज़मीन में.

बाग़ बनाए खजूरों और अंगूरों के और हमने उसमें कुछ चश्मे बहाए{34} कि उसके फलों में से खाएं और ये उनके हाथ के बनाए नहीं तो क्या हक़ न मानेंगे(4) {35}
(4) और अल्लाह तआला की नेअमतों का शुक्र अदा न करेंगे.

पाकी है उसे जिसने सब जोड़े बनाए (5)
(5) यानी तरह तरह, क़िस्म क़िस्म.

उन चीज़ों से जिन्हें ज़मीन उगाती है(6)
(6) ग़ल्ले फल वग़ैरह.

और ख़ुद उनसे(7)
(7) औलाद, नर और माद.

और उन चीज़ों से जिनकी उन्हैं ख़बर नहीं(8){36}
(8) ख़ुश्क़ी और तरी की अजीबो ग़रीब मख़लूक़ात में से, जिसकी इन्सानों को ख़बर भी नहीं है.

और उनके लिये एक निशानी(9)
(9) हमारी ज़बरदस्त क़ुदरत को प्रमाणित करने वाली.

रात है हम उसपर से दिन खींच लेते हैं(10)
(10) तो बिल्कुल अंधेरी रह जाती है जिस तरह काले भुजंगे हबशी का सफ़ेद लिबास उतार लिया जाए तो फिर वह काला ही रह जाता है. इस से मालूम हुआ कि आसमान और ज़मीन के बीच की फ़ज़ा अस्ल में तारीक़ है. सूरज की रौशनी उसके लिये एक सफ़ेद लिबास की तरह है. जब सूरज डूब जाता है तो यह लिबास उतर जाता है और फ़ज़ा अपनी अस्ल हालत में तारीक रह जाती है.

जभी वो अंधेरों में हैं {37} और सूरज चलता है अपने एक ठहराव के लिये(11)
(11) यानी जहाँ तक उसकी सैर की हद मुक़र्रर फ़रमाई गई है और वह क़यामत का दिन है. उस वक़्त तक वह चलता ही रहेगा या ये मानी हैं कि वह अपनी मंज़िलों में चलता है और जब सबसे दूर वाले पश्चिम में पहुंचता है तो फिर लौट पड़ता है क्योंकि यही उसका ठिकाना है.

यह हुक्म है ज़बरदस्त इल्म वाले का(12) {38}
(12) और यह निशानी है जो उसकी भरपूर क़ुव्वत और हिकमत को प्रमाणित करती है.

और चांद के लिये हमने मंज़िलें मुक़र्रर कीं(13)
(13) चांद की 28 मंज़िलें हैं, हर रात एक मंज़िल में होता है और पूरी मंज़िल तय कर लेता है, न कम चले न ज़्यादा. निकलने की तारीख़ से अठ्ठाईसवीं तारीख़ तक सारी मंज़िलें तय कर लेता है. और अगर महीना तीस दिन का हो तो दो रात और उन्तीस का हो तो एक रात छुपता है और जब अपनी अन्तिम मंज़िलों में पहुंचता है तो बारीक और कमान की तरह बाँका और पीला हो जाता है.

यहां तक कि फिर हो गया जैसे खजूर की पुरानी डाली (टहर्नी) (14) {39}
(14) जो सूख कर पतली और बाँकी और पीली हो गई हो.

सूरज को नहीं पहुंचता कि चांद को पकड़ ले(15)
(15) यानी रात में, जो उसकी शौकत के ज़हूर का वक़्त है, उसके साथ जमा होकर, उसके नूर को मग़लूब करके, क्योंकि सूरज और चांद में से हर एक की शौकत के ज़हूर के लिये एक वक़्त मुक़र्रर है. सूरज के लिये दिन, और चाँद के लिये रात.

और न रात दिन पर सबक़त ले जाए(16)
(16) कि दिन का वक़्त पूरा होने से पहले आ जाए, ऐसा भी नहीं, बल्कि रात और दिन दोनों निर्धारित हिसाब के साथ आते जाते हैं. कोई उनमें से अपने वक़्त से पहले नहीं आता और सूरज चाँद में से कोई दूसरे की शौकत की सीमा में दाख़िल नहीं होता न आफ़ताब रात में चमके, न चाँद दिन में.

और हर एक एक घेरे में पैर रहा है {40} और उनके लिये एक निशानी यह है कि उन्हे उनके बुज़ुर्गों की पीठ में हमने भरी किश्ती में सवार किया(17){41}
(17) जो सामान अस्बाब वग़ैरह से भरी हुई थी, मुराद इससे किश्तीये नूह है जिसमें उनके पहले पूर्वज सवार किये गए थे और ये और इनकी सन्तानें उनकी पीठ में थीं.

और उनके लिये वैसी ही किश्तियां बना दीं जिनपर सवार होते हैं {42} और हम चाहें तो उन्हें डुबो दें (18)
(18) किश्तियों के बावुज़ूद.

तो न कोई उनकी फ़रियाद को पहुंचने वाला हो और न वो बचाए जाएं {43} मगर हमारी तरफ़ की रहमत और एक वक़्त तक बरतने देना (19) {44}
(19) जो उनकी ज़िन्दगी के लिये मुक़र्रर फ़रमाया है.

और जब उनसे फ़रमाया जाता है डरो तुम उससे जो तुम्हारे सामने है(20)
(20) यानी अज़ाबे दुनिया.

और जो तुम्हारे पीछे आने वाला है (21)
(21) यानी आख़िरत का अज़ाब.

इस उम्मीद पर कि तुम पर मेहर (दया) हो तो मुंह फेर लेते हैं {45} और जब कभी उनके रब की निशानियों से कोई निशानी उनके पास आती है तो उससे मुंह ही फेर लेते हैं(22){46}
(22) यानी उनका दस्तूर और काम का तरीक़ा ही यह है कि वो हर आयत और नसीहत से मुंह फेर लिया करते हैं.

और जब उनसे फ़रमाया जाए अल्लाह के दिये में से कुछ उसकी राह में खर्च करो तो काफ़िर मुसलमानों के लिये कहते हैं कि क्या हम उसे खिलाएं, जिसे अल्लाह चाहता तो खिला देता(23)
(23) यह आयत क़ुरैश के काफ़िरों के हक़ में उतरी जिनसे मुसलमानों ने कहा था कि तुम अपने मालों का वह हिस्सा मिस्कीनों पर ख़र्च करो जो तुमने अपनी सोच में अल्लाह तआला के लिये निकाला है. इसपर उन्होंने कहा कि क्या हम उन्हें खिलाएं जिन्हें अल्लाह खिलाना चाहता तो खिला देता. मतलब यह था कि ख़ुदा ही को दरिद्रों का मोहताज़ रखना मंज़ूर है तो उन्हें खाने को देना उसकी मर्ज़ी के ख़िलाफ़ होगा. यह बात उन्होंने कंजूसी से, हंसी मज़ाक़ के तौर पर कही थी पर बिल्कुल ग़लत थी क्योंकि दुनिया परीक्षा की जगह है. फ़क़ीरी और अमीरी दोनों आज़मायशें हैं. फ़क़ीर की परीक्षा सब्र से और मालदार की अल्लाह की रहा में खर्च करने से. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि मक्कए मुकर्रमा में ज़िन्दीक़ लोग थे जब उनसे कहा जाता था कि मिस्कीनों को सदक़ा दो तो कहते थे कि हरगिज़ नहीं. यह कैसे हो सकता है कि जिसको अल्लाह तआला मोहताज करे, हम खिलाएं.

तुम तो नहीं मगर खुली गुमराही में {47} और कहते हैं कब आएगा ये वादा (24)
(24) दोबारा ज़िन्दा होने और क़यामत का.

अगर तुम सच्चे हो (25) {48}
(25) अपने दावे में. उनका यह ख़िताब नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और आपके सहाबा से था. अल्लाह तआला उनके हक़ में फ़रमाता है.

राह नहीं देखते मगर एक चीख़ की(26)
(26) यानी सूर के पहले फूंके जाने की, जो हज़रत इस्राफ़ील अलैहिस्सलाम फूंकेंगे.

कि उन्हें आ लेगी जब वो दुनिया के झगड़े में फंसे होंगे (27) {49}
(27) ख़रीदों फ़रोख़्त में और खाने पीने में, और बाज़ारों और मजलिसों में, दुनिया के कामों में, कि अचानक क़यामत हो जाएगी. हदीस शरीफ़ में है कि नबिये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि ख़रीदार और विक्रेता के बीच कपड़ा फैला होगा, न सौदा पूरा होने पाएगा, न कपड़ा लपेटा जाएगा कि क़यामत हो जाएगी. यानी लोग अपने अपने कामों में लगे होंगे और वो काम वैसे ही अधूरे रह जाएंगे, न उन्हें ख़ुद पूरा कर सकेंगे, न किसी दूसरे से पूरा करने को कह सकेंगे और जो घर से बाहर गए हैं वो वापस न आ सकेंगे, चुनांन्चे इरशाद होता है.

तो न वसीयत कर सकेंगे और न अपने घर पलट कर जाएं (28) {50}
(28) वहीं मर जाएंगे और क़यामत फ़र्सत और मोहलत न देगी.

36 सूरए यासीन- चौथा रूकू

36  सूरए यासीन- चौथा रूकू

وَنُفِخَ فِى ٱلصُّورِ فَإِذَا هُم مِّنَ ٱلْأَجْدَاثِ إِلَىٰ رَبِّهِمْ يَنسِلُونَ
قَالُوا۟ يَٰوَيْلَنَا مَنۢ بَعَثَنَا مِن مَّرْقَدِنَا ۜ ۗ هَٰذَا مَا وَعَدَ ٱلرَّحْمَٰنُ وَصَدَقَ ٱلْمُرْسَلُونَ
إِن كَانَتْ إِلَّا صَيْحَةًۭ وَٰحِدَةًۭ فَإِذَا هُمْ جَمِيعٌۭ لَّدَيْنَا مُحْضَرُونَ
فَٱلْيَوْمَ لَا تُظْلَمُ نَفْسٌۭ شَيْـًۭٔا وَلَا تُجْزَوْنَ إِلَّا مَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
إِنَّ أَصْحَٰبَ ٱلْجَنَّةِ ٱلْيَوْمَ فِى شُغُلٍۢ فَٰكِهُونَ
هُمْ وَأَزْوَٰجُهُمْ فِى ظِلَٰلٍ عَلَى ٱلْأَرَآئِكِ مُتَّكِـُٔونَ
لَهُمْ فِيهَا فَٰكِهَةٌۭ وَلَهُم مَّا يَدَّعُونَ
سَلَٰمٌۭ قَوْلًۭا مِّن رَّبٍّۢ رَّحِيمٍۢ
وَٱمْتَٰزُوا۟ ٱلْيَوْمَ أَيُّهَا ٱلْمُجْرِمُونَ
۞ أَلَمْ أَعْهَدْ إِلَيْكُمْ يَٰبَنِىٓ ءَادَمَ أَن لَّا تَعْبُدُوا۟ ٱلشَّيْطَٰنَ ۖ إِنَّهُۥ لَكُمْ عَدُوٌّۭ مُّبِينٌۭ
وَأَنِ ٱعْبُدُونِى ۚ هَٰذَا صِرَٰطٌۭ مُّسْتَقِيمٌۭ
وَلَقَدْ أَضَلَّ مِنكُمْ جِبِلًّۭا كَثِيرًا ۖ أَفَلَمْ تَكُونُوا۟ تَعْقِلُونَ
هَٰذِهِۦ جَهَنَّمُ ٱلَّتِى كُنتُمْ تُوعَدُونَ
ٱصْلَوْهَا ٱلْيَوْمَ بِمَا كُنتُمْ تَكْفُرُونَ
ٱلْيَوْمَ نَخْتِمُ عَلَىٰٓ أَفْوَٰهِهِمْ وَتُكَلِّمُنَآ أَيْدِيهِمْ وَتَشْهَدُ أَرْجُلُهُم بِمَا كَانُوا۟ يَكْسِبُونَ
وَلَوْ نَشَآءُ لَطَمَسْنَا عَلَىٰٓ أَعْيُنِهِمْ فَٱسْتَبَقُوا۟ ٱلصِّرَٰطَ فَأَنَّىٰ يُبْصِرُونَ
وَلَوْ نَشَآءُ لَمَسَخْنَٰهُمْ عَلَىٰ مَكَانَتِهِمْ فَمَا ٱسْتَطَٰعُوا۟ مُضِيًّۭا وَلَا يَرْجِعُونَ

और फूंका जाएगा सूर(1)
(1) दूसरी बार. यह सूर का दूसरी बार फूंका जाना है जो मुर्दों को उठाने के लिये होगा और इन दोनों फूंकों के बीच चालीस साल का फ़ासला होगा.

जभी वो क़ब्रों से(2)
(2) ज़िन्दा होकर.

अपने रब की तरफ़ दौड़ते चलेंगें {51} कहेंगे हाय हमारी ख़राबी, किसने हमें सोते से जगा दिया(3)
(3) यह कहना काफ़िरों का होगा. इज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि वो यह बात इस लिये कहेंगे कि अल्लाह तआला दोनों फूंकों के बीच उनसे अज़ाब उठादेगा और इतना ज़माना वो सोते रहेंगे और सूर के दूसरी बार फूंके जाने के बाद उठाए जाएंगे और क़यामत की सख़्तियाँ देखेंगे तो इस तरह चीख़ उठेंगे और यह भी कहा गया है कि जब काफ़िर जहन्नम और उसका अज़ाब देखेंगे तो उसके मुक़ाबले में क़ब्र का अज़ाब उन्हें आसान मालूम होगा इसलिये वो अफ़सोस पुकार उठेंगे और उस वक़्त कहेंगे.

यह है वह जिसका रहमान ने वादा दिया था और रसूलों ने हक़ फ़रमाया (4) {52}
(4) और उस वक़्त का इक़रार उन्हें कुछ नफ़ा न देगा.

वह तो न होगी मगर एक चिंघाड़ (5)
(5) यानी सूर के आख़िरी बार फूंके जाने की एक हौलनाक आवाज़ होगी.

जभी वो सब के सब हमारे हुज़ूर हाजिर हो जाएंगे(6) {53}
(6) हिसाब के लिये, फिर उसे कहा जाएगा.

तो आज किसी जान पर कुछ ज़ुल्म न होगा और तुम्हें बदला न मिलेगा मगर अपने किये का {54} बेशक जन्नत वाले आज दिल के बहलावों में चैन करते हैं (7){55}
(7)  तरह तरह की नेअमतें और क़िस्म क़िस्म के आनन्द और अल्लाह तआला की तरफ़ से ज़ियाफ़तें, जन्नती नेहरों के किनारे जन्न्त के वृक्षों की दिलनवाज़ फ़ज़ाएं, ख़ुशी भरा संगीत, जन्नत की सुन्दरियों का क़ुर्ब और क़िस्म क़िस्म की नेअमतों के मज़े, ये उनके शग़ल होंगे.

वो और उनकी बीबियाँ सायों में हैं तख़्तों पर तकिया लगाए {56} उनेक लिये उसमें मेवा है और उनके लिये है उसमें जो मांगे {57} उन पर सलाम होगा मेहरबान रब का फ़रमाया हुआ (8){58}
(8) यानी अल्लाह तआला उनपर सलाम फ़रमाएगा चाहे सीधे सीधे या किसी ज़रिये से और यह सब से बड़ी और प्यारी मुराद है. फ़रिश्ते जन्नत वालों के पास हर दरवाज़े से आकर कहेंगे तुमपर तुम्हारे रहमत वाले रब का सलाम.

और आज अलग फट जाओ ऐ मुजरिमों (9){59}
(9) जिस वक़्त मूमिन जन्नत की तरफ़ रवाना किये जाएंगे, उस वक़्त काफ़िरों से कहा जाएगा कि अलग फट जाओ. मूमिनों से अलाहदा हो जाओ एक क़ौल यह भी है कि यह हुक्म काफ़िरों को होगा कि अलग अलग जहन्नम में अपने अपने ठिकाने पर जाएं.

ऐ आदम की औलाद क्या मैं ने तुम से एहद न लिया था (10)
(10) अपने नबियों की मअरिफ़त.

कि शैतान को न पूजना (11)
(11) उसकी फ़रमाँबरदारी न करना.

बेशक वह तुम्हारा खुला दुश्मन है {60} और मेरी बन्दगी करना(12)
(12) और किसी को इबादत में मेरा शरीक न करना.

यह सीधी राह है {61} और बेशक उसने तुम में से बहुत सी ख़लक़त को बहका दिया, तो क्या तुम्हें अक़्ल न थी (13){62}
(13) कि तुम उसकी दुश्मनी और गुमराह गरी को समझते और जब वो जहन्नम के क़रीब पहुंचेंगे तो उनसे कहा जाएगा.

यह है वह जहन्नम जिसका तुम से वादा दिया था {63} आज उसी मैं जाओ बदला अपने कुफ़्र का {64} आज हम उनके मुंहों पर मोहर कर देंगे (14)
(14) कि वो बोल न सकेंगे और यह कृपा करना उनके यह कहने के कारण होगा कि हम मुश्रिक न थे, न हमने रसूलों को झुटलाया.

और उनके हाथ हम से बात करेंगे और उनके पाँव उनके किये की गवाही देंगे (15) {65}
(15) उनके अंग बोल उठेंगे और जो कुछ उनसे सादिर हुआ है, सब बयान कर देंगे.

और अगर हम चाहते तो उनकी आँखें मिटा देते (16)
(16) कि निशान भी बाक़ी न रहता. इस तरह का अंधा कर देते.

फिर लपक कर रस्ते की तरफ़ जाते तो उन्हें कुछ न सूझता(17){66}
(17) लेकिन हमने ऐसा न किया और अपने फ़ज़्लों करम से देखने की नेअमत उनके पास बाक़ी रखी तो अब उनपर हक़ यह कि वो शुक्रगुज़ारी करें, कुफ़ न करें.

और अगर हम चाहते तो उनके घर बैठे उनकी सूरतें बदल देते (18)
(18) और उन्हें बन्दर या सुअर बना देते.

न आगे बढ़ सकते न पीछे लौटते (19) {67}
(19) और उनके जुर्म इसी के क़ाबिल थे लेकिन हमने अपनी रहमत और करम और हिकमत के अनुसार अज़ाब में जल्दी न की और उनके लिये मोहलत रखी.

36 सूरए यासीन- पाँचवां रूकू

36  सूरए यासीन- पाँचवां रूकू

وَمَن نُّعَمِّرْهُ نُنَكِّسْهُ فِى ٱلْخَلْقِ ۖ أَفَلَا يَعْقِلُونَ
وَمَا عَلَّمْنَٰهُ ٱلشِّعْرَ وَمَا يَنۢبَغِى لَهُۥٓ ۚ إِنْ هُوَ إِلَّا ذِكْرٌۭ وَقُرْءَانٌۭ مُّبِينٌۭ
لِّيُنذِرَ مَن كَانَ حَيًّۭا وَيَحِقَّ ٱلْقَوْلُ عَلَى ٱلْكَٰفِرِينَ
أَوَلَمْ يَرَوْا۟ أَنَّا خَلَقْنَا لَهُم مِّمَّا عَمِلَتْ أَيْدِينَآ أَنْعَٰمًۭا فَهُمْ لَهَا مَٰلِكُونَ
وَذَلَّلْنَٰهَا لَهُمْ فَمِنْهَا رَكُوبُهُمْ وَمِنْهَا يَأْكُلُونَ
وَلَهُمْ فِيهَا مَنَٰفِعُ وَمَشَارِبُ ۖ أَفَلَا يَشْكُرُونَ
وَٱتَّخَذُوا۟ مِن دُونِ ٱللَّهِ ءَالِهَةًۭ لَّعَلَّهُمْ يُنصَرُونَ
لَا يَسْتَطِيعُونَ نَصْرَهُمْ وَهُمْ لَهُمْ جُندٌۭ مُّحْضَرُونَ
فَلَا يَحْزُنكَ قَوْلُهُمْ ۘ إِنَّا نَعْلَمُ مَا يُسِرُّونَ وَمَا يُعْلِنُونَ
أَوَلَمْ يَرَ ٱلْإِنسَٰنُ أَنَّا خَلَقْنَٰهُ مِن نُّطْفَةٍۢ فَإِذَا هُوَ خَصِيمٌۭ مُّبِينٌۭ
وَضَرَبَ لَنَا مَثَلًۭا وَنَسِىَ خَلْقَهُۥ ۖ قَالَ مَن يُحْىِ ٱلْعِظَٰمَ وَهِىَ رَمِيمٌۭ
قُلْ يُحْيِيهَا ٱلَّذِىٓ أَنشَأَهَآ أَوَّلَ مَرَّةٍۢ ۖ وَهُوَ بِكُلِّ خَلْقٍ عَلِيمٌ
ٱلَّذِى جَعَلَ لَكُم مِّنَ ٱلشَّجَرِ ٱلْأَخْضَرِ نَارًۭا فَإِذَآ أَنتُم مِّنْهُ تُوقِدُونَ
أَوَلَيْسَ ٱلَّذِى خَلَقَ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضَ بِقَٰدِرٍ عَلَىٰٓ أَن يَخْلُقَ مِثْلَهُم ۚ بَلَىٰ وَهُوَ ٱلْخَلَّٰقُ ٱلْعَلِيمُ
إِنَّمَآ أَمْرُهُۥٓ إِذَآ أَرَادَ شَيْـًٔا أَن يَقُولَ لَهُۥ كُن فَيَكُونُ
فَسُبْحَٰنَ ٱلَّذِى بِيَدِهِۦ مَلَكُوتُ كُلِّ شَىْءٍۢ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ

और जिसे हम बड़ी उम्र का करें उसे पैदाइश से उलटा फेरें(1),
(1) कि वो बचपन की सी कमज़ोरी की तरफ़ वापस आने लगे और दम बदम उसकी ताक़तें, क़ुव्वतें और ज़िस्म और अक़्लें घटने लगीं.

तो क्या समझते नहीं(2){68}
(2) कि जो हालतों के बदलने पर ऐसा क़ादिर हो कि बचपन की कमज़ोरी और शरीर के छोटे अंगों और नादानी के बाद शबाब की क़ुव्वतें और शक्ति और मज़बूत बदन और समझ अता फ़रमाता है और फिर बड़ी उम्र और आख़िरी उम्र में उसी मज़बूत बदन वाले जवान को दुबला और कमज़ोर कर देता है, अब न वह बदन बाक़ी है, न क़ुव्वत, उठने बैठने में मजबूरियाँ दरपेश हैं, अक़्ल काम नहीं करती, बात याद नहीं रहती, अज़ीज़ रिश्तेदार को पहचान नहीं सकता. जिस परवर्दिगार ने यह तबदीली की वह क़ादिर है कि आँखें देने के बाद मिटा दे और अच्छी सूरतें अता फ़रमाने के बाद उन्हें बिगाड़ दे और मौत देने के बाद फिर ज़िन्दा कर दे.

और हमने उनको शेअर (कविता) कहना न सिखाया(3)
(3) मानी ये हैं कि हम ने आपको शेअर कहने की महारत न दी, या यह कि क़ुरआन शायरी की तालीम नहीं है और शेअर से झूटे का कलाम मुराद है, चाहे मौजूं हो या ग़ैर मौजूं. इस आयत में इरशाद है कि हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को अल्लाह तआला की तरफ़ से अव्वल आख़िर का इल्म तालीम फ़रमाया गया जिनसे हक़ीक़तें खुलती हैं और आप की मालूमात वाक़ई और हक़ीक़ी हैं. शेअर का  झूट नहीं, जो हक़ीक़त में जिहालत है, वह आपकी शान के लायक़ नहीं और आपका दामने अक़दस इससे पाक है. इसमें मौजूं कलाम के अर्थ वाले शेअर के जानने और उसके सही या ख़राब को पहचानने का इन्कार नहीं. नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के इल्म में तअने देने वालों के लिये यह आयत किसी तरह सनद नहीं हो सकती. अल्लाह तआला ने हुज़ूर को सारे जगत के उलूम अता फ़रमाए, इसके इन्कार में इस आयत को पेश करना मात्र ग़लत है. क़ुरैश के काफ़िरों ने कहा था कि मुहम्मद शायर है और जो वो फ़रमाते हैं, यानी क़ुरआन शरीफ़, वह शेअर है. इससे उनकी मुराद यह थी कि मआज़ल्लाह यह कलाम झूटा है जैसा कि क़ुरआन शरीफ़ में उनका कहना नक़्ल फ़रमाया गया है “बलिफ़्तराहो बल हुवा शाइरून” यानी बल्कि उनकी मनघड़त है बल्कि ये शायर हैं, (सूरए अंबिया, आयत 5) उसी का इसमें रद फ़रमाया गया कि हमने अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को ऐसी बातिल-गोई की महारत ही नहीं दी और यह किताब शेअरों यानी झूटों पर आधारित नहीं. क़ुरैश के काफ़िर ज़बान से ऐसे बदज़ौक़ और नज़्में उरूज़ी से ऐसे अन्जान न थे कि नस्र यानी गद्य को नज़्म यानी पद्य कह देते और कलामे पाक को शेअरे उरूज़ी बता बैठते और कलाम का मात्र उरूज़ के वज़न पर होना ऐसा भी न था कि उस पर ऐतिराज़ किया जा सके. इससे साबित हो गया कि उन बेदीनों की मुराद शेअर से झूटे कलाम की थी (मदारिक, जुमल व रूहुल बयान) और हज़रत शैख़े अकबर ने इस आयत के मानी में फ़रमाया है कि मानी ये हैं कि हमने अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से मुअम्मे और इजमाल के साथ यानी घुमा फिराकर ख़िताब नहीं फ़रमाया जिसमें मानी या मतलब के छुपे रहने का संदेह हो बल्कि साफ़ और खुला कलाम फ़रमाया है जिसे सारे पर्दे उठ जाएं और उलूम रौशन हो जाएं.

और न वह उनकी शान के लायक़ है, वह तो नहीं मगर नसीहत और रौशन क़ुरआन(4){69}
(4) साफ़ ख़ुला हक़ व हिदायत, कहाँ वह पाक आसमानी किताब, सारे उलूम की जामेअ, और कहाँ शेअर जैसा झूटा कलाम. (अल किबरियते अहमर लेखक शैख़े अक़बर)

कि उसे डराए जो ज़िन्दा हो (5)
(5) दिले ज़िन्दा रखता हो, कलाम और ख़िताब को समझे और यह शान ईमान वाले की है.

और काफ़िरों पर बात साबित हो जाए(6) {70}
(6) यानी अज़ाब की हुज्जत क़ायम हो जाए.

और क्या उन्होंने न देखा कि हम ने अपने हाथ के बनाए हुए चौपाए उनके लिये पैदा किये तो ये उनके मालिक हैं {71} और उन्हें उनके लिये नर्म कर दिया(7)
(7) यानी मुसख़्खर और हुक्म के अन्तर्गत कर दिया.

तो किसी पर सवार होते हैं और किसी को खाते हैं {72} और उनके लिये उनमें कई तरह के नफ़े(8)
(8) और फ़ायदे हैं कि उनकी खालों, बालों और ऊन वग़ैरह काम में लाते हैं.

और पीने की चीज़ें हैं(9)
(9) दूध और दूध से बनने वाली चीज़ें, दही मट्ठा वग़ैरह.

तो क्या शुक्र न करेंगे (10){73}
(10) अल्लाह तआला की इन नेअमतों का.

और उन्होंने अल्लाह के सिवा और खुदा ठहरा लिये(11)
(11)  यानी बुतों को पुजने लगे.

कि शायद उनकी मदद हो (12) {74}
(12) और मुसीबत के वक़्त काम आएं और अज़ाब से बचाएं, और ऐसा संभव नहीं.

वो उनकी मदद नहीं कर सकते(13)
(13) क्योंकि पत्थर बेजान और बेक़ुदरत और बेशऊर है.

और वो उनके लश्कर सब गिरफ़्तार हाज़िर आएंगे(14) {75}
(14) यानी काफ़िरों के साथ उनके बुत भी गिरफ़्तार करके हाज़िर किये जाएंगे और सब जहन्नम में दाख़िल होंगे, बुत भी और उनके पुजारी भी.

तो तुम उनकी बात का ग़म न करो(15)
(15) यह ख़िताब है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को. अल्लाह तआला अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली फ़रमाता है कि काफ़िरों के झुटलाने और इन्कार से और उनकी यातनाओं और अत्याचारों से आप दुखी न हों.

बेशक हम जानते हैं जो वो छुपाते हैं और ज़ाहिर करते हैं (16) {76}
(16) हम उन्हे उनके किरदार की जज़ा देंगे.

और क्या आदमी ने न देखा कि हमने उसे पानी की बूंद से बनाया जभी वह खुला झगड़ालू है(17){77}
(17) यह आयत आस बिन वाईल या अबू जहल और मशहूर यह है कि उबई बिन ख़लफ़ जमही के बारे मे उतरी जो मरने के बाद उठने के इन्कार में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से बहस और तक़रार करने आया था. उसके हाथ में एक गली हुई हड्डी थी, उसको तोड़ता जाता था और हुज़ूर से कहता जाता था कि क्या आपका ख़याल है कि इस हड्डी को गल जाने और टुकड़े टुकड़े हो जाने के बाद भी अल्लाह ज़िन्दा कर देगा. हु़ज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, हाँ और तुझे भी मरने के बाद उठाएगा और जहन्नम में दाख़िल फ़रमाएगा. इसपर यह आयत उतरी और उसकी जिहालत का इज़हार फ़रमाया कि गली हुई हड्डी का बिख़रने के बाद अल्लाह तआला की क़ुदरत से ज़िन्दगी क़ुबूल करना अपनी नादानी से असंभव समझता है कितना मुर्ख है. अपने आपको नहीं देखता कि शुरू में एक गन्दा नुत्फ़ा था, गली हुई हड्डी से भी तुच्छ. अल्लाह तआला की भरपूर क़ुदरत ने उसमें जान डाल दी, इन्सान बनाया तो ऐसा घमण्डी इन्सान हुआ कि उसकी क़ुदरत ही का इन्कारी होकर झगड़ने आ गया. इतना नहीं देखता कि जो सच्ची क़ुदरत वाला पानी की बूंद को मज़बूत इन्सान बना देता है, उसकी क़ुदरत से गली हुई हड्डी को दोबारा ज़िन्दगी बख़्श देना क्या दूर है, और इसको संभव समझना कितनी खुली हुई जिहालत है.

और हमारे लिये कहावत कहता है(18)
(18) यानी गली हुई हड्डी को हाथ से मलकर मसल बनाता है कि यह तो ऐसी बिखर गई, कैसे ज़िन्दा होगी.

और अपनी पैदाइश भूल गया(19)
(19)कि वीर्य की बूंद से पैदा किया गया है.

बोला ऐसा कौन हे कि हड्डियों को ज़िन्दा करे जब वो बिल्कुल गल गई {78} तुम फ़रमाओ उन्हे वह ज़िन्दा करेगा जिसने पहली बार उन्हें बनाया, और उसे हर पैदाइश की जानकारी है(20){79}
(20) पहली का भी और मौत के बाद वाली का भी.

जिसने तुम्हारे लिये हरे पेड़ में आग पैदा की जभी तुम उससे सुलगाते हो (21) {80}
(21)अरब में दो दरख़्त होते हैं जो वहाँ के जंगलों में बहुत पाए जाते हैं. एक का नाम मर्ख़ है, दूसरे का अफ़ार. उनकी ख़ासियत यह है कि जब उनकी हरी टहनियाँ काट कर एक दूसरे पर रगड़ी जाएं तो उनसे आग निकलती है. जब कि वह इतनी गीली होती है कि उनसे पानी टपकता होता है. इसमें क़ुदरत की कैसी अनोखी निशानी है कि आग और पानी दोनो एक दूसरे की ज़िद. हर एक एक जगह एक लकड़ी में मौजूद, न पानी आग को बुझाए न आग लकड़ी को जलाए. जिस क़ादिरे मुतलक की यह हिकमत है वह अगर एक बदन पर मौत के बाद ज़िन्दगी लाए तो उसकी क़ुदरत से क्या अज़ीब और उसको नामुमकिन कहना आसारे क़ुदरत देखकर जिहालत और दुश्मनी से इन्कार करना है.

और क्या वह जिसने आसमान और ज़मीन बनाए उन जैसे और नहीं बना सकता(22)
(22)  या उन्हीं को मौत के बाद ज़िन्दा नहीं कर सकता.

क्यों नहीं(23)
(23) बेशक वह इसपर क़ादिर है.

और वही है बड़ा पैदा करने वाला, सब कुछ जानता {81} उसका काम तो यही है कि जब किसी चीज़ को चाहे(24)
(24) कि पैदा करे.

तो उससे फ़रमाए हो जा, वह फ़ौरन हो जाती है(25) {82}
(25) यानी मख़लूक़ात का वुजूद उसके हुक्म के ताबे है.

तो पाकी है उसे जिसके हाथ हर चीज़ का क़ब्ज़ा है और उसी की तरफ़ फेरे जाओ(26){83}
(26) आख़िरत में.