सूरए – रअद रूकू

सूरए   – रअद रूकू

सूरए रअद मदीने में उतरी, इसमें 43 आयतें, 6 रूकू हैं.

पहला रूकू


अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)

(1) सूरए रअद मक्की है और एक रिवायत हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से यह है कि दो आयतों “ला यज़ालुल लज़ीना कफ़रू तुसबहुम” और “यक़ूलुल लज़ीना कफ़रू लस्ता मुरसलन” के सिवा बाक़ी सब मक्की हैं. दूसरा क़ौल यह है कि यह सूरत मदनी है. इसमें छ: रूकू, तैंतालीस या पैंतालीस आयतें, आठ सौ पचपन कलिमे और तीन हज़ार पांच सो छ: अक्षर हैं.

ये किताब की आयतें हैं(2)
(2) यानी क़ूरआन शरीफ़ की.

और वो जो तुम्हारी तरफ़ तुम्हारे रब के पास से उतरा(3)
(3) यानी क़ुरआन शरीफ़

हक़ है(4)
(4) कि इसमें कुछ शुबह नहीं.

मगर अक्सर आदमी ईमान नहीं लाते(5){1}
(5) यानी मक्का के मुश्रिक यह कहते हैं कि यह कलाम मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) का है. उन्होंने ख़ुद बनाया. इस आयत में उनका रद फ़रमाया. इसके बाद अल्लाह तआला ने अपने रब होने की दलीलें और अपनी क़ुदरत के चमत्कार बयान फ़रमाए जो उसके एक होने को प्रमाणित करते हैं.

अल्लाह है जिसने आसमानों को बलन्द किया बे सुतूनों {खम्भों} के कि तुम देखो(6)
(6) इसके दो मानी हो सकते हैं, एक यह कि आसमानों को बिना सुतूनों के बलन्द किया जैसा कि तुम उनको देखते हो यान हक़ीक़त में  कोई सुतून ही नहीं हैं. ये मानी भी हो सकते हैं कि तुम्हारे देखने में आने वाले सुतूनों के बग़ैर बलन्द किया. इस तक़दीर  पर मानी ये होंगे कि सुतून तो हैं मगर तुम्हारे देखने में नहीं आते. पहला क़ौल ज़्यादा सही है इसी पर सहमति है, (ख़ाज़िन व जुमल)

फिर अर्श पर इस्तिवा फ़रमाया जैसा उसकी शान के लायक़ है और सूरज और चांद को मुसख़्खर {वशीभूत} किया(7)
(7) अपनो बन्दों के मुनाफ़े और अपने इलाकों के फ़ायदे के लिये वो आज्ञानुसार घूम रहे हैं.

हर एक एक ठहराए हुए वादे तक चलता है (8)
(8) यानी दुनिया के नाश के समय तक, हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि “अजले मुसम्मा” यानी “ठहराए हुए वादे” से उनके दर्ज़ें और मंज़िलें मुराद है यानी वो अपनी मंज़िलों और दर्जों में एक हद तक गर्दिश करते हैं जिस से उल्लंघन नहीं कर सकते, सूरज और चांद में से हर एक के लिये सैरे ख़ास यानी विशेष दिशा की तरफ़ तेज़ या सुस्त रफ़्तार और हरकत की ख़ास मात्रा निर्धारित की है.

अल्लाह काम की तदबीर फ़रमाता और तफ़सील से निशानियां बताता है(9)
(9) अपनी वहदानियत और भरपूर क़ुदरत की.

कहीं तुम अपने रब का मिलना यक़ीन करो(10){2}
(10) और जानो कि जो इन्सान को शून्य के बाद फिर से मौजूद करने में सक्षम है वो उसको मौत के बाद भी ज़िन्दा करने पर क़ादिर है.

और वही है जिसने ज़मीन को फैलाया और उसमें लंगर(11)
(11) यानी मज़बूत पहाड़.

और नहरें बनाई और ज़मीन में हर क़िस्म के फल दो दो तरह के बनाए(12)
(12) काले सफ़ेद, कड़वे मीठे छोटे बड़े, खुश्क और तर, गर्म और सर्द वग़ैरह.

रात से दिन को छुपा लेता है, बेशक इसमें निशानियाँ हैं ध्यान करने वालों को(13){3}
(13) जो समझें कि ये सारी निशानियाँ बनाने वाले और संभाल रखने वाले के अस्तित्व का प्रमाण देती है.

और ज़मीन के मुख़्तलिफ़ {विभिन्न} क़तए {खंड} हैं और हैं पास पास (14)
(14) एक दूसरे से मिले हुए. उनमें से कोई खेती के क़ाबिल है कोई नहीं, कोई पथरीला कोई रतीला.

और बाग़ है अंगूर के और खेती और खजूर के पेड़ एक थाले से आगे और अलग अलग सब को एक ही पानी दिया जाता है, और फलों में हम एक को दूसरे से बेहतर करते हैं, बेशक इसमें निशानियाँ हैं अक़्लमन्दों के लिये(15){4}
(15) हसन बसरी रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया इस में बनी आदम के दिलों की एक मिसाल है कि जिस तरह ज़मीन एक थी, उसके विभिन्न टुकड़े हुए, उनपर आसमान से एक ही पानी बरसा, उससे मुख़्तलिफ़ क़िस्म के फल फुल, बेल बूटे, अच्छे बुरे पैदा हुए. इसी तरह आदमी हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से पैदा किये गए. उनपर आसमान से हिदायत उतरी. इस से कुछ लोग नर्म दिल हुए उनमें एकाग्रता और लगन पैदा हुई. कुछ सख़्त हो गए, वो खेल तमाशों बुराईयों में गिरफ़्तार हुए तो जिस तरह ज़मीन के टुकड़े अपने फूल फल में अलग अलग हैं उसी तरह इन्सानी दिल अपनी भावनाओं और रहस्यों में अलग हैं.

और अगर तुम अचंभा करो(16)
(16)  ऐ मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, काफ़िरों के झुटलाने से, जबकि आप उनमें सच्चे और अमानत वाले मशहुर थे.

तो अचंभा तो उनके इस कहने का है कि क्या हम मिट्टी होकर फिर नए बनेंगे(17)
(17)  और उन्होंने कुछ न समझा कि जिसने शुरू में बग़ैर मिसाल के पैदा कर दिया उसको दोबारा पैदा करना क्या मुश्किल है.

वो हैं जो अपने रब से इन्कारी हुए और वो हैं जिन की गर्दनों में तौक़ होंगे(18)
(18)  क़यामत के दिन.

और वो दोज़ख़ वाले हैं, उन्हें उसी में रहना{5} और तुम से अज़ाब की जल्दी करते हैं रहमत से पहले(19)
(19)  मक्का के मुश्रिक, और यह जल्दी करना हंसी के तौर पर था. और रहमत से सलामती और आफ़ियत मुराद है.

और उनसे अगलों की सज़ाएं हो चुकीं(20)
(20) वो भी रसूलों को झुटलाते और अज़ाब की हंसी उड़ाते थे. उनका हाल देखकर  सबक़ हासिल करना चाहिये.

और बेशक तुम्हारा रब तो लोगों के ज़ुल्म पर भी उन्हें एक तरह की माफ़ी देता है(21)
(21) कि उनके अज़ाब में जल्दी नहीं फ़रमाता और उन्हें मोहलत देता है.

और बेशक तुम्हारे रब का अज़ाब सख़्त है(22){6}
(22)  जब अज़ाब फ़रमाए.

और काफ़िर कहते हैं उनपर उनकी तरफ़ से कोई निशानी क्यों नहीं उतरी(23)
(23) क़ाफ़िरों का यह क़ौल अत्यन्त बेईमानी का क़ौल था. जितनी आयतें उतर चुकी थीं और चमत्कार दिखाए जा चुके थे सबको उन्होंने शून्य क़रार दे दिया. यह पहले दर्ज़े की नाइन्साफ़ी और सत्य से दुश्मनी हैं. जब हुज्जत क़ायम हो चुके, तर्क पुरा हो जाए और खुले और साफ़ प्रमाण पेश कर दिये जाएं और ऐसी दलीलों से मतलब साबित कर दिया जाए जिनके जवाब से मुख़ालिफ़िन के सारे इल्म वाले हुनर वाले आश्चर्य चकित और विवश रह जाएं और उन्हें मुंह खोलना और ज़बान हिलाना असम्भव हो जाए, ऐसी खुली निशानियाँ और साफ़ प्रमाण और ज़ाहिर चमत्कार देखकर यह कह देना कि कोई निशानी क्यों नहीं उतरती, चमकते दिन में उजाले का इन्कार कर देने से भी ज़्यादा ख़राब और बातिल है और हक़ीक़त में यह सच्चाई को पहचान कर उससे मुंह मोड़ लेना और दुश्मनी है. किसी बात पर जब मज़बूत प्रमाण क़ायम हो जाए, फिर उसपर दोबारा दलील क़ायम करनी ज़रूरी नहीं रहती. ऐसी हालत में दलील तलब करना मात्र दुश्मनी होती है. जब तक कि दलील को ज़ख़्मी न कर दिया जाए, कोई शख़्स दूसरी दलील के तलब करने का हक़ नहीं रखता. अगर यह सिलसिला क़ायम कर दिया जाए कि हर शख़्स के लिये नई दलील नया प्रमाण क़ायम किया जाय जिसको वह मांगे और वही निशानी लाई जाय जो वह तलब करे, तो निशानियों का सिलसिला कभी ख़त्म न होगा. इसलिये अल्लाह की हिकमत यह है कि नबियों को ऐसे चमत्कार दिये जाते हैं जिन से हर व्यक्ति उनकी सच्चाई और नबुव्वत का यक़ीन कर सके. उनके दौर के लोग ज़्यादा अभ्यास और महारत रखते हैं जैसे कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के ज़माने में जादू का इल्म अपने कमाल को पहुंचा हुआ था और उस ज़माने के लोग जादू के बड़े माहिर कामिल थे तो हज़रत मूसा अलैहिसलाम को वह चमत्कार अता हुआ जिसने जादू को बातिल कर दिया और जादूगरों को यक़ीन दिला दिया कि जो कमाल हज़रत मूसा ने दिखाया वह अल्लाह की निशानी है, जादू से उसका मुक़ाबला संभव नहीं. इसी तरह हज़रत ईसा अलैहिस्सलातो वसल्लाम के ज़माने में चिकित्सा विद्या यानी डाक्टरी का इल्म चरम सीमा पर था. हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को बीमारियाँ अच्छा करने और मुर्दे ज़िन्दा करने का वह चमत्कार अता फ़रमाया गया जिससे तिब के माहिर आजिज़ हो गए. वो इस यक़ीन पर मजबूर थे कि यह काम तिब से नामुमकिन है. ज़रूर यह अल्लाह की क़ुदरत का ज़बरदस्त निशान है इसी तरह सैयदे आलम सल्लल्लाहे अलैहे वसल्लम के मुबारक ज़माने में अरब की ज़बान दानी, फ़साहत और बलाग़त बलन्दी पर थी. वो लोग बोल चाल में सारी दुनिया पर छाए हुए थे. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को वह चमत्कार अता फ़रमाया गया जिसने आपके मुख़ालिफ़ों को आजिज़ और हैरान कर दिया. उनके बड़े से बड़े लोग और उनके एहले कमाल की जमाअतें क़ुरआन शरीफ़ के मुकाबले में एक छोटी सी इबारत न पेश कर सके और क़ुरआन शरीफ़ के इस कमाल ने साबित कर दिया कि बेशक यह अल्लाह का कलाम और उसकी महान निशानी है. और इस जैसा बना लाना इन्सान के बस की बात नहीं. इसके अलावा और सैंकड़ों चमत्कार सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने पेश फ़रमाए जिन्होंने हर तबक़े के इन्सानों को आपकी सच्चाई और रिसालत का यक़ीन दिला दिया. इन चमत्कारों के होते हुए यह कह देना कि कोई निशानी क्यों नहीं उतरी, किस क़द्र हटधर्मी, दुश्मनी और सच्चाई से मुकरना है.

तुम तो डर सुनाने वाले हो और हर क़ौम के हादी(24){7}
(24)अपनी नबुव्वत की दलील पेश करने और संतोषजनक चमत्कार दिखाकर अपनी रिसालत साबित कर देने के बाद अल्लाह के अहकाम पहुंचाने और ख़ुदा का ख़ौफ़ दिलाने के सिवा आप पर कुछ लाज़िम नहीं. हर हर शख़्स के लिये उसकी तलब की हुई अलग अलग निशानिशां पेश करना आप पर ज़रूरी नहीं जैसा कि आप से पहले हादियों यानी नबियों का तरीक़ा रहा है.

सूरए – रअद दूसरा रूकू

सूरए   – रअद  दूसरा रूकू


अल्लाह जानता है जो कुछ किसी मादा के पेट में है(1)
(1) नर मादा, एक या ज़्यादा.

और पेट जो कुछ घटते और बढ़ते हैं(2)
(2)  यानी मुद्दत में किसी का गर्भ जल्दी बाहर आएगा किसी का देर में. गर्भ की कम से कम मुद्दत जिसमें बच्चा पैदा होकर ज़िन्दा रह सके, छ: माह  है और ज़्यादा से ज़्यादा दो साल. यह हज़रत आयशा रदियल्लाहो अन्हा ने फ़रमाया और इसी के हज़रत इमामे आज़म अबू हनीफ़ा रहमतुल्लाह अलैह क़ायल हैं. कुछ मुफ़स्सिरों ने यह भी कहा है कि पेट के घटने बढ़ने से बच्चे का मज़बूत, पूरा बनना या अधूरा बनना मुराद है.

और हर चीज़ उसके पास एक अन्दाज़े से है(3){8}
(3) कि इससे घट बढ़ नहीं है.

हर छुपे और खुले का जानने वाला सबसे बड़ा बलन्दी वाला(4){9}
(4)  हर दोष से पाक.

बराबर हैं जो तुम में बात आहिस्ता कहे और जो आवाज़ से और जो रात में छुपा है और जो दिन में राह चलता है(5){10}
(5)  यानी दिल की छुपी बातें और ज़बान से खुल्लमखुल्ला कही हुई और रात को छुपकर किये हुए काम और दिन को ज़ाहिर तौर पर किये हुए काम, सब अल्लाह तआला जानता है, कोई उसके इल्म से बाहर नहीं है.

आदमी के लिये बदली वाले फ़रिश्ते हैं उसके आगे और पीछे(6)
(6)  बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है कि तुम में फ़रिश्ते नौबत ब नौबत यानी बारी बारी आते हैं. रात और दिन में और नमाज़ें फ़ज़्र और नमाज़े अस्र में जमा होते हैं. नए फ़रिश्ते रह जाते हैं और जो फ़रिश्ते रह चुके हैं वो चले जाते हैं. अल्लाह तआला उनसे दरियाफ़्त फ़रमाता है कि तुमने मेरे बन्दे को किस हाल में छोड़ा. वो अर्ज़ करते हैं कि नमाज़ पढ़ते पाया और नमाज़ पढ़ते छोड़ा.

कि ख़ुदा के हुक्म से उसकी हिफ़ाज़त करते हैं(7)
(7)  मुजाहिद ने कहा, हर बन्दे के साथ एक फ़रिश्ता हिफ़ाज़त के लिये है जो सोते जागते जिन्न व इन्स और मूज़ी जानवरों से उसकी हिफ़ाज़त करता है और हर सताने वाली चीज़ को उसे रोक देता है सिवाय उसके जिसका पहुंचना अल्लाह के हुक्म से हो.

बेशक अल्लाह किसी क़ौम से अपनी नेअमत नहीं बदलता जब तक वह ख़ुद(8)
(8) गुनाहों में जकड़ कर.

अपनी हालत न बदलें और जब अल्लाह किसी क़ौम से बुराई चाहे(9)
(9)  उसके अज़ाब और हलाक का इरादा फ़रमाए.

तो वह फिर नहीं सकती और उसके सिवा उसका कोई हिमायती नहीं(10){11}
(10)  जो उसके अज़ाब को रोक सके.

वही है तुम्हें बिजली दिखाता है डर को और उम्मीद को(11)
(11)  कि उससे गिर कर नुक़सान पहुंचाने का ख़ौफ़ होता है और बारिश से नफ़ा उठाने की उम्मीद या कुछ को ख़ौफ़ होता है. जैसे मुसाफ़िरों को जो सफ़र में हों और कुछ को फ़ायदे की उम्मीद जैसे कि काश्तकार वग़ैरह.

और भारी बदलियाँ उठाता है{12} और गरज उसे सराहती हुई उसकी पाकी बोलती है(12)
(12)  गरज यानी बादल से जो आवाज़ होती है उसके तस्बीह करने के मानी ये हैं कि उस आवाज़ का पैदा होना क़ुदरत वाले पैदा, करने वाले, और हर दोष और कमी से पाक के वुजूद यानी अस्तित्व की दलील है.कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि तस्बीहे रअद से वह मुराद है कि उस आवाज़ को सुनकर अल्लाह के बन्दे उसकी तस्बीह करते हें. कुछ मुफ़स्सिरों का क़ौल है कि रअद एक फ़रिश्ता है जो बादल पर तैनात है उसको चलाता है.

और फ़रिश्ते उसके डर से(13)
(13) यानी उसकी हैबत और जलाल से उसकी तस्बीह करते हैं.

और कड़क भेजता है(14)
(14)  सायक़ा (कड़क)  वह सख़्त आवाज़ है जो आसमान और ज़मीन के बीच से उतरती है फिर उसमें आग पैदा हो जाती है. या अज़ाब या मौत और वह अपनी ज़ात में एक ही चीज़ है और ये तीनों चीज़ें उसी से पैदा होती हैं. (ख़ाज़िन)

तो उसे डालता है जिस पर चाहे, और वो अल्लाह में झगड़ते होते हैं(15)
(15)  हसन रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अरब के एक अत्यन्त सरकश काफ़िर को इस्लाम की दावत देने के लिये अपने सहाबा की एक जमाअत भेजी. उन्होंने उसको दावत दी. कहने लगा, मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) का रब कौन है जिसकी तुम दावत देते हो, क्या वह सोने या चांदी या लोहे का या तांबे का है. मुसलमानों को यह बात बहुत बुरी लगी और उन्होंने वापस आकर हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अर्ज़ किया कि ऐसा काफ़िर दिल सरकश देखने में नहीं आया. हुज़ूर ने फ़रमाया, उसके पास फिर जाओ. उसने फिर वही बात की और इतना और कहा कि मैं मुहम्मद की दावत क़ुबूल करके ऐसे रब को मान लूं जिसे न मैंने देखा है न पहचाना. ये हज़रात फिर वापस हुए और उन्होंने अर्ज़ किया कि हुज़ूर उसकी ख़बासत तो और तरक़्क़ी पर है. फ़रमाया फिर जाओ, ये फिर गए. जिस वक़्त उससे बातें कर रहे थे और वह ऐसी ही काले दिल की बातें बक रहा था, एक बादल आया, उससे बिजली चमकी और कड़क हुई और बिजली गिरी और उस काफ़िर को जला दिया. ये लोग उसके पास बैठे रहे. जब वहाँ से वापस हुए तो राह में उन्हें सहाबए किराम की एक और जमाअत मिली. वो कहने लगे, कहिये वह शख़्स जल गया. उन लोगों ने कहा कि आप लोगों को  कैसे मालूम हो गया. उन्होंने कहा सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के पास वही आई है “व युर सिलुस सवाइक़ा फ़युसीबो बिहा मैंय यशाओ वहुम युजादिलूना फ़िल्लाह” (और कड़क भेजता है तो उसे डालता है जिस पर चाहे और वह अल्लाह में झगड़ते होते हैं. सूरए रअद, आयत 13) कुछ मुफस्सिरों ने ज़िक्र किया है  कि आमिर बिन तुफ़ैल ने अरबद बिन रबीअ से कहा कि मुहम्मदें मुस्तफ़ा (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) के पास चलो, मैं उन्हें बातों में लगाऊंगा तू पीछे से तलवार मारना. यह सलाह करके वो हुज़ूर के पास आए और आमिर ने बात शुरू की. बहुत लम्बी बात चीत के बाद कहने लगा कि अब हम जाते हैं और एक बड़ा भारी लश्कर आप पर लाएंगे, यह कहकर चला गया. बाहर आकर अरबद से कहने लगा कि तुने तलवार क्यों नहीं मारी. उसने कहा कि जब मैं तलवार मारने का इरादा करता था तो तू बीच में आ जाता था, सैयदे आदम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उन लोगो के निकलते वक़्त यह दुआ फ़रमाई. “अल्लाहुम्मक फ़िहिम विमा शिअता”. जब ये दोनो मदीने शरीफ़ से बाहर आए तो उनपर बिजली गिरी. अरबद जल गया और आमिर भी उसी राह में बड़ी दुर्दशा में मरा (हुसैनी)

और उसकी पकड़ सख़्त है{13} उसी का पुकारना सच्चा है(16)
(16)  मअबूद जानकर यानी काफ़िर जो बुतों की इबादत करते हैं और उनसे मुरादें मांगते हैं.

और उसके सिवा जिनको पुकारते हैं वो(17)
(17) तो हथेलियाँ फैलाने और बुलाने से पानी कुंएं से निकल कर उसके मुंह में न आएगा क्योंकि पानी को न इल्म है न शऊर जो उसकी प्यास की ज़रूरत को जाने और उसके बुलाने को समझे और पहचाने न उसमें यह क़ुदरत है कि अपनी जगह से हरकत करे और प्रकृति के विपरीत ऊपर चढ़कर बुलाने वाले के मुंह में पहुंच जाए. यही हाल बुतों का है कि न उन्हें बुत परस्तों के पुकारने की ख़बर है न उनकी हाजत का शऊर . न वो उसके नफ़े पर कुछ क़ुदरत रखते हैं.

उनकी कुछ नहीं सुनते मगर उसकी तरह जो पानी के सामने अपनी हथेलियां फैलाए बैठा है कि उसके मुंह में पहुंच जाए(18)

और वह कभी न पहुंचेगा और क़ाफ़िरों की हर दुआ भटकती फिरती है{14} और अल्लाह ही को सज्दा करते हैं जितने आसमानों और ज़मीन में हैं ख़ुशी से(19)
(19)  जैसे मूमिन.

चाहे मजबूरी से(20)
(20) जैसे कि मुनाफ़िक़ और काफ़िर.

और उनकी परछाइयां हर सुब्ह शाम (21){15}
(21)  अल्लाह को सज़्दा करती हैं. ज़ुजाज ने कहा कि काफ़िर ग़ैर-अल्लाह को सज्दा करता है और उसका साया अल्लाह को. इब्ने अंबारी ने कहा कि कुछ बईद नहीं कि अल्लाह तआला परछाईयों में ऐसी समझ पैदा करे कि वो उसको सज्दा करें. कुछ कहते हैं सिजदे से साए का एक तरफ़ से दूसरी तरफ़ माइल होना और आफ़ताब चढ़ने और उतरने के साथ लम्बा और छोटा होना मुराद है.(ख़ाजिन)

तुम फ़रमाओ कौन रब है आसमानों और ज़मीन का, तुम ख़ुद ही फ़रमाओ अल्लाह(22)
(22)  क्योंकि इस सवाल का इसके सिवा और कोई जवाब ही नहीं और मुश्रिक ग़ैरूल्लाह की इबादत करने के बावुज़ूद इसके इक़रारी हैं कि आसमान और ज़मीन का पैदा करने वाला अल्लाह है. जब यह बात सबको मान्य है तो.

तुम फ़रमाओ तो क्या उसके सिवा तुम ने वो हिमायती बना लिये हैं जो भला बुरा नहीं कर सकते हैं(23)
(23)  यानी बुत, जब उनकी यह बेबसी और बेचारगी हे तो दूसरों को क्या नफ़ा नुक़सान पहुंचा सकते हैं. ऐसो को मअबूद बनाना और हक़ीक़ी पैदा करने वाले, रिज़्क़ देने वाले, क़वी और सक्षम को छोड़ना अव्वल दर्जे़ की गुमराही है.

तुम फ़रमाओ क्या बराबर हो जाएंगे अंधा और अंखियारा(24)
(24)  यानी काफ़िर और मूमिन.

या क्या बराबर हो जाएंगी अंधेरियां और उजाला(25)
(25) यानी कुफ़्र और ईमान.

क्या अल्लाह के लिये ऐसे शरीक ठहराए हैं जिन्होंने अल्लाह की तरह कुछ बनाया तो उन्हें उनका और उसका बनाना एक सा मालूम हुआ(26)
(26)  और इस वजह से हक़ उनपर मुश्तहब हो गया और वो बुत परस्ती करने लगे. ऐसा तो नहीं है बल्कि जिन बुतों को वो पूजते हैं अल्लाह की मख़लूक़ की तरह कुछ बनाना तो दूर, वो बन्दों की चीज़ों की तरह भी कुछ बना नहीं सकते. विवश और निकम्मे हैं. ऐसे पत्थरों का पूजना अक़ल और समझ के बिल्कुल ख़िलाफ़ है.

तुम फ़रमाओ अल्लाह हर चीज़ का बनाने वाला है(27)
(27)  तो मख़लूक होने की सलाहियत रखे उस सब का ख़ालिक़ अल्लाह ही है और कोई नहीं तो दूसरे को इबादत में शरीक करना समझ वाला किस तरह गवारा कर सकता है.

और वह अकेला सब पर ग़ालिब है(28){16}
(28)  सब उसके इख़्तियार और क़ुदरत के अन्तर्गत है.

उसने आसमान से पानी उतारा तो नाले अपने अपने लायक़ बह निकले तो पानी की रौ{धारा} उस पर उभरे हुए झाग उठा लाई, और जिस पर आग दहकाते हैं(29)
(29)  जैसे कि सोना चांदी तांबा वग़ैरह.

गहना या और असबाब (30)
(30)  बर्तन वग़ैरह.

बनने को उससे भी कैसे ही झाग उठते हैं अल्लाह बताता है कि हक़ और बातिल की यही मिसाल है, तो झाग तो फुक कर दूर हो जाता है, और वह जो लोगों के काम आए ज़मीन में रहता है(31)
(31)  ऐसे बातिल अगरचे कितना ही उभर जाए और कभी कभी झाग की तरह हद से ऊंचा हो जाए मगर आख़िर मिट जाता है और सच्चाई अस्ल चीज़ और साफ़ जौहर की तरह बाक़ी और सलामत रहती है.

अल्लाह यूंही मिसालें बयान फ़रमाता है{17} जिन लोगों ने अपने रब का हुक्म माना उन्हीं के लिये भलाई(32)
(32)  यानी जन्नत.

और जिन्होंने उसका हुक्म न माना(33)
(33)  और कुफ़्र किया.

अगर ज़मीन में जो कुछ है व सब और उस जैसा और इसकी मिल्क में होता तो अपनी जान छुड़ाने को दे देते, यही हैं जिनका बुरा हिसाब होगा(34) और उनका ठिकाना और क्या ही बुरा बिछौना{18}
(34)  कि हर बात पर पकड़ की जाएगी और उसमें से कुछ बख़्शा न जाएगा. (जलालैन व ख़ाजिन)

सूरए – रअद तीसरा रूकू

सूरए   – रअद  तीसरा रूकू

तो क्या वह जो जानता है जो कुछ तुम्हारी तरफ़ तुम्हारे रब के पास से उतरा हक़ है(1)
(1) और उसपर ईमान लाता है और उसके मुताबिक़ अमल करता है.

वह उस जैसा होगा जो अन्धा है(2)
(2) हक़ को नहीं जानता, क़ुरआन पर ईमान नहीं लाता, उसके मुताबिक़ अमल नहीं करता. यह आयत हज़रत हमज़ा इब्ने अब्दुल मुत्तलिब और अबू जहल के बारे में उतरी.

नसीहत वही मानते हैं जिन्हें अक़्ल है{19} वो जो अल्लाह का एहद पूरा करते हैं(3)
(3) उसके रब होने की गवाही देते हैं और उसका हुक्म मानते हैं.

और क़ौल (वचन) बांधकर फिरते नहीं{20} और वो कि जोड़ते है उसे जिसके जोड़ने का अल्लाह ने हुक्म दिया(4)
(4) यानी अल्लाह की तमाम किताबों और उसके कुल रसूलों पर ईमान लाते हैं और कुछ मान कर और कुछ से इन्कार करके उनमें फ़र्क़ नहीं करते. या ये मानी हैं कि रिश्तेदारी के हक़ का ख़्याल रखते हैं और रिश्ता काटते नहीं. इसी में रसूलुल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की रिश्तेदारियाँ और ईमानी रिश्ते भी दाख़िल हैं. सैयदो का आदर और मुसलमानों के साथ दोस्ती और एहसान और उनकी मदद और उनकी तरफ़ से मुदाफ़िअत यानी बचाव और उनके साथ शफ़क़त और सलाम दुआ और मुसलमान मरीज़ों की देखभाल और अपने दोस्तों ख़ादिमों पड़ोसियों और सफ़र के साथियों के अधिकारों का ख़याल रखना भी इसमें दाख़िल है. शरीअत में इसका लिहाज़ रखने पर बहुत जग काफ़ी जोर दिया गया है. अक्सर सही हदीसें भी इस विषय में आई हैं.

और अपने रब से डरते हैं और हिसाब की बुराई से अन्देशा(शंका)रखते हैं(5){21}
(5)  और हिसाब के वक़्त से पहले ख़ुद अपने अन्दर का हिसाब करते हैं.

और वो जिन्होंने सब्र किया (6)
(6)  ताअतों और मुसीबतों पर, और गुनाहों से रूके रहे.

अपने रब की रज़ा चाहने को और नमाज़ क़ायम रखी और हमारे दिये से हमारी राह में छुपे और ज़ाहिर कुछ ख़र्च किया (7)
(7)  नवाफ़िल का छुपाना और फ़र्ज़ का ज़ाहिर करना अफ़ज़ल है.

और बुराई के बदले भलाई करके टालते है (8)
(8) बदकलामी का जवाबी मीठे बोलो  से देते हैं और जो उन्हें मेहरूम करता है उसपर अता करते हैं. जब उनपर ज़ुल्म किया जाता है, माफ़ करते हैं. जब उनसे पैबन्द काटा जाता है, मिलाते हैं और जब गुनाह करते हैं, तौबह करते हैं, जब नाजायज़ काम देखते हैं, उसे बदलते हैं. जिहालत के बदले हिल्म और तक़लीफ़ के बदले सब्र करते हैं.

उन्हीं के लिये पिछले घर का नफ़ा है{22} बसने के बाग़ जिनमें वो दाख़िल होंगे और जो लायक़ हों(9)
(9)यानी मूमिन हों.

उनके बाप दादा और बीबियों और औलाद में (10)
(10) अगरचे लोगों ने उनके से अमल न किये हो जब भी अल्लाह तआला उनके सम्मान के लिये उनको उनके दर्ज़े में दाख़िल फ़रमाएगा.

और फ़रिश्ते (11)
(11) हर एक रोज़ो शब में तोहफ़ों और रज़ा की ख़ुशख़बरी लेकर जन्नत के.

हर दरवाज़े से उनपर (12)
(12)  आदर और सम्मान के तौर पर.

यह कहते आएंगे {23}  सलामती हो तुमपर, तुम्हारे सब्र का बदला तो पिछला घर क्या ही ख़ूब मिला {24}  और वो जो अल्लाह का एहद उसके पक्के होने (13)
(13)  और उसको क़ुबूल कर लेने.

के बाद तोड़ते और जिसके जोड़ने को अल्लाह ने फ़रमाया उसे क़ता करते (काटते) और ज़मीन में फ़साद फैलाते हैं (14)
(14)  कुफ़्र और गुनाह के काम करके.

उनका हिस्सा लअनत ही है और उनका नसीब बुरा घर (15){25}
(15) यानी जहन्नम.

अल्लाह जिसके लिये चाहे रिज़्क कुशादा और (16)
(16) जिसके लिये चाहे.

तंग करता है और क़ाफ़िर दुनिया की ज़िन्दगी पर इतरा गए (17) और दुनिया की ज़िन्दगी आख़िरत के मुक़ाबले नहीं मगर कुछ दिन बरत लेना {26}
(17) और शुक्रगुज़ार न हुए. दुनिया की दौलत पर इतराना और घमण्ड करना हराम है.

सूरए – रअद चौथा रूकू

सूरए   – रअद  चौथा रूकू

और क़ाफ़िर कहते उनपर कोई निशानी उनके रब की तरफ़ से क्यों न उतरी, तुम फ़रमाओ बेशक अल्लाह जिसे चाहे गुमराह करता है(1)
(1)कि वह आयाते और चमत्कार उतरने के बाद भी यह कहता रहता है कि कोई निशानी क्यों नहीं उतरी, कोई चमत्कार क्यों नहीं आया! अनेक चमत्कारों के  बावजूद गुमराह रहता है.

और अपनी राह उसे देता है जो उसकी तरफ़ रूजू लाए {27} वो जो ईमान लाए और उनके दिल अल्लाह की याद से चैन पाते हैं सुन लो अल्लाह की याद ही में दिलों का चैन है(2){28}  
(2)उसकी रहमत और फ़ज़्ल और उसके एहसान और करम याद करके बेकरार दिलों को क़रार और इत्मीनान हासिल होता है. अगरचे उसके इन्साफ़ और प्रकोप की याद दिलों को डरा देती है जैसा कि दूसरी आयत में फ़रमाया “इन्नमल मूमिनूनल्लज़ीना इज़ा ज़ुकिरल्लाहो वजिलत क़ुलूबुहुम ” (यानी ईमान वाले वही हैं कि जब अल्लाह याद किया जाए, उनके दिल डर जाएं- सूरए अन्फ़ाल , आयत 2) हज़रत इब्ने अब्बास रज़ियल्लाहु अन्हुमा ने इस आयत की तफ़सीर में फ़रमाया कि मुसलमान जब अल्लाह का नाम लेकर क़सम खात है दूसरे मुसलमान उसपर यक़ीन कर लेते हैं और उनके दिलों को इत्मीनान हो जाता है.

वो जो ईमान लाए और अच्छे काम किये उनको ख़ुशी है और अच्छा अंजाम(3){29}
(3) तूबा बशारत है राहत  व नेअमत और ख़ुशी और खुशहाली की. सईद बिन जुबेर रदियल्लाहो अन्हो ने कहा कि तूबा हबशी ज़बान में जन्नत का नाम है. हज़रत अबू हुरैरा और दूसरे सहाबा से रिवायत है कि तूबा जन्नत के एक दरख़्त का नाम है जिसका साया हर जन्नत में पहुंचेगा, यह दरख़्त जन्नते अदन में है और इसकी असली जड़ सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के बदल्द मकान में इसकी शाखें जन्नत के हर घर हर महल में.इसमें  स्याही को छोड़कर हर किस्म के रंग खुशनुमाईयाँ हैं हर तरह के फल और मेवे इसमें फलते हैं, इसकी जड़ से काफ़ुर और  सलसबील की नहरें जारी हैं.

इसी तरह हमने तुमको इस उम्मत में भेजा जिससे पहले उम्मतें हो गुज़री(4)
(4)तो तुम्हारी उम्मत सबसे पिछली उम्मत है और तुम नबियो के सिलसिले को ख़त्म करने वाले हो, तुम्हें बड़ी शान से नबुव्वत अता की.

कि तुम उन्हें पढ़कर सुनाओ (5)
(5)वह महान किताब.

 जो हमने तुम्हारी तरफ़ वही (देववाणी) की और वो रहमान के इन्कारी हो रहे हैं(6)
(6) क़तादा और मक़ातिल वग़ैरह का क़ौल है कि आयत सुलह हुदैबियह में उतरी जिसका संक्षिप्त वाक़िआ यह है कि सुहैल बिन अम्र जब सुलह के लिए आया और सुलहनामा लिखने पर सहमति हो गयी तो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हज़रत अली मुर्तज़ा रदियल्लाहो अन्हो से फ़रमाया लिखो “बिस्मिल्लाहिर रहमानिर रहीम” काफ़िरों ने इसमें झगड़ा किया और कहा कि आप हमारे तरीक़े के अनुसार “बिस्मिकल्लाहुम्मा” लिखवाइये. . इसके बारे में आयत में इरशाद होता है कि वह रहमान के इन्कारी हो रहे हैं.

तुम फ़रमाओ वह मेरा रब है उसके सिवा किसी की बन्दगी नहीं मैं ने उसी पर भरोसा किया और उसी की तरफ़ मेरी रूजू है {30}  और अगर कोई ऐसा क़ुरआन आता जिससे पहाड़ टल जाते (7)
(7)अपनी जगह से.

या ज़मीन फट जाती या मुर्दे बातें करते जब भी ये काफ़िर न मानते(8)
(8) क़ुरैश के काफ़िरों  ने सैयद आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा था कि अगर आप चाहें कि  हम आपकी नबुव्वत मानें और आपका अनुकरण करें तो आप कुरआन पढ़कर इसकी तासीर से मक्का के पहाड़ हटा दीजिए ताकि हमें खेतयाँ करने के लिए विस्तृत मैदान मिल जाएं और ज़मीन फाड़कर चश्मे जारी कीजिये ताकि हम खेतों और बाग़ों को उनसे सींच सकें और कुसई  बिन क्लाब वग़ैरह हमारे मरे हुए बाप दादा को ज़िन्दा कर दीजिए वह हमसे कह जाएं कि आप नबी हैं. इसके जवाब में आयत उतरी और बता दिया गया कि हीले हवाले करने वाले किसी हाल में भी ईमान लाने वाले नहीं.

बल्कि सब काम अल्लाह ही के इख़्तियार में हैं (9)
(9) तो ईमान वही लाएगा जिसको अल्लाह चाहे और तौफ़ीक़ दे. उसके सिवा और कोई ईमान लाने  वाला नहीं अगरचे उन्हें वही निशान दिखा दिए जाएं जो वो तलब करें.

तो क्या मुसलमान इससे नाउम्मीद न हुए (10)
(10)यानी काफ़िरों के ईमान लाने से चाहे उन्हें कितनी ही निशानियाँ दिखला दी जाएं और क्या मुसलमानों को इसका यक़ीनी इल्म नहीं.

कि अल्लाह चाहता तो सब आदमियों को हिदायत कर देता (11)
(11)बगैर किसी निशानी के, लेकिन वह जो चाहता है  और वही हिक़मत है. यह जवाब है उन मुसलमानों का जिन्होंने काफ़िरों के नई नई निशानियाँ तलब करने पर यह चाहा था कि जो काफ़िर भी कोई निशानी तलब करे वही उसको दिखादी जाए, इसमें उन्हें बता दिया गया कि जब ज़बरदस्त निशान आ चुके और शक और वहम की सारी हदें बंद कर दी गईं, दीन की सच्चाई चमकते दिन से ज़्यादा ज़ाहिर हो चुकी, इन खुले प्रमाणों के बावुजूद लोग मुकर गए सच्चाई को न माना, जाहिर हो गया कि वह दुश्मनी पर तुले हैं  और दुश्मन किसी दलील से भी नहीं माना नहीं करता. तो मुसलमानों को अब उनसे सच्चाई स्वीकार करने की क्या उम्मीद, क्या अब तक उनकी दुश्मनी देखकर और खुली और ज़ाहीर से निशानियों से उनके मुंह फेर लेने को देखकर भी उनसे सच्चाई के क़ुबूल करने की उम्मीद की जा सकती है. अलबत्ता अब उनके ईमान लाने और मान जाने की यही सूरत है कि अल्लाह तआला उन्हें मजबूर करे और उनका इख़्तियार छीन ले. इस तरह की हिदायत चाहता तो तमाम आदमियों को हिदायत फ़रमा देता और कोई काफ़िर न रहता. मगर आज़माइश और मुसीबतों से गुज़रने की हिकमत का यह तक़ाज़ा नहीं.

और क़ाफिरों को हमेशा उनके किये की सख़्त धमक पहुंचती रहेगी(12)
(12)यानी वो इस झुटलाने और दुश्मनी के कारण तरह तरह के हादसों और मुसीबतों और आफ़तों और बलाओं में जकड़े रहेंगे, कभी क़हत में, कभी लुटने में, कभी मारे जाने में, कभी क़ैद में.

या उनके घरों के नज़दीक उतरेगी(13)
(13) और उनकी बेचैनी और परेशानी का कारण होगा और उन तक मुसीबतों के नुक़सान पहुंचेंगे.

यहां तक कि अल्लाह का वादा आए (14)
(14) अल्लाह की तरफ से फ़त्ह और मदद आए और रसूल करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और उनका दीन ग़ालिब हो और मक्कए मुकर्रमा फ़त्ह किया जाए. कुछ मफ़स्सिरो ने कहा कि इस वादे से रोज़ क़यामत का दिन मुराद है जिसमें कर्मो का बदला दिया जाएगा.
बेशक अल्लाह वादा ख़िलाफ़ी नहीं करता (15){31}
(15)इसके बाद अल्लाह तआला रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली फ़रमाता है कि इस क़िस्म के बेहूदा सवाल हंसी ठट्ठे से आप दुखी न हों क्योंकि हादियों को हमेशा ऐसे वाक़िआत पेश आया ही करते हैं. चुनांचे इरशाद फ़रमाता है .

सूरए – रअद पांचवाँ रूकू

सूरए   – रअद  पांचवाँ रूकू

और बेशक तुम से अगले रसूलों से भी हंसी की गई तो मैंने काफ़िरों को कुछ दिनों ढील दी फिर उन्हें पकड़ा(1)
(1)और दुनिया में उन्हें क़हत व क़त्ल व कै़द में जकड़ा और आखिरत में उनके लिए जहन्नम का अजा़ब है.

तो मेरा अज़ाब कैसा था{32} तो क्या वह हर जान पर उसके कर्मों की निगहदाश्त रखता है(2)
(2)नेक की भी बद की भी यानी क्या अल्लाह तआला उन बुतों के जैसा हो सकता है जो ऐसे नहीं न उन्हें इल्म है न क़ुदरत, आज़िज़ का मजबूर और बे शऊर हैं.

और वो अल्लाह के शरीक ठहराते हैं, तुम फ़रमाओ उनका नाम तो लो(3)
(3)वो हैं कौन?

या उसे वह बताते हो जो उसके इल्म में सारी ज़मीन में नहीं(4)
(4)और जो उसके इल्म में न हो वह निरा झूट और बातिल है. हो ही नहीं सकता क्योंकि उसका इल्म हर चीज़ को घेरे हुए है लिहाज़ा उसके लिये शरीक होना बातिल और ग़लत है.

या यूं ही ऊपरी बात(5)
(5)  के दर पै होते हो जिसकी कुछ अस्ल और हक़ीक़त नहीं.

बल्कि क़ाफ़िरों की निगाह में उनका धोखा अच्छा ठहरा हे और राह से रोके गए(6)
(6)  यानी हिदायत और दीन की राह से.

और जिसे अल्लाह गुमराह करे उसे कोई हिदायत करने वाला नहीं{33} उन्हें दुनिया के जीते अज़ाब होगा(7)
(7)क़त्ल और कैद का.

और बेशक आख़िरत का अज़ाब सब से सख़्त है, और उन्हें अल्लाह से बचाने वाला कोई नहीं {34} अहवाल उस जन्नत का कि डर वालों के जिसका वादा है उसके नीचे नेहरें बहती हैं, उसके मेवे हमेशा और उसका साया (8)
(8)यानी उसके मेवे और उसका साया हमेशा का है, उसमें से कोई टूटने कटने और ख़त्म होने वाला नहीं. जन्नत का हाल अजीब है उसमें न सूरज है न चाँद न अन्धेरा है. बावुजूद कभी न दूर होने वाला साया है.

डर वालों का तो यह अंजाम है(9)
(9)यानी तक़वा वालों के लिए जन्नत है.

और काफ़िरों का अंजाम आग {35} और जिनको हमने किताब दी (10)
(10)यानी वह यहूदी व ईसाई जो इस्लाम लाए जैसे अब्दुल्लाह बिन सलाम वग़ैरह और हबशा और नजरान के ईसाई.

वो उसपर ख़ुश होते जो तुम्हारी तरफ़ उतरा और उन गिरोहो में (11)
(11)यहूदियों ईसाइयों और मश्रिकों के, जो आपकी दुश्मनी में डूबे हैं और उन्होंने ख़ुद ही चढ़ाईयाँ की है.

कुछ वो हैं कि उसके बाज़ (कुछ थोड़े) से इन्कारी हैं तुम फ़रमाओ मुझे तो यही हुक्म है कि अल्लाह की बन्दगी करूं और उसका शरीक न ठहराऊं में उसी की तरफ़ बुलाता हूँ और उसी की तरफ़ मुझे फिरना(12){36}
(12)इसमें क्या बात इन्कार के क़ाबिल है. क्यों नहीं मानते!

और इसी तरह हमने उसे अरबी फ़ैसला उतारा (13)
(13)यानी जिस तरह पहले नबियों को उनकी ज़बनों में अहकाम दिए गये थे उसी तरह हम ने यह क़ुरआन ऐ नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम आप पर अरबी ज़बान में उतारा. क़ुरआने करीम को हुक्म (फैसला) इसलिए फ़रमाया कि इसमें अल्लाह की इबादत और उसके तौहीद और दीन की तरफ़ दावत और तमाम तक़लीफ़ों और अहकाम और हलाल और हराम का बयान है. कुछ उलमा ने फ़रमाया चूंकि अल्लाह तआला ने तममा खल्क़ पर कुरआन शरीफ को क़ुबूल करने और उसके मुताबिक़ अमल करने का हुक्म फ़रमाया इसलिए इसका नाम हुक्म रखा.

और ऐ सुनने वाले अगर तू उनकी ख़्वाहिशों पर चलेगा(14)बाद इसके कि तुझे इल्म आचुका तो अल्लाह के आगे न तेरा कोई हिमायती होगा न बचाने वाला{37}
(14)यानी काफिरों को जो अपने दीन की तरफ़ बुलाते हैं.

सूरए – रअद छटा रूकू

सूरए   – रअद  छटा रूकू


और बेशक हमने तुम से पहले रसूल भेजे और उनके लिये बीबियाँ(1)
(1)काफ़िरों ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर यह ऐब लगाया कि वह निकाह करते हैं और नबी होते तो दुनिया तर्क कर देते, बीबी बच्चो से कुछ वास्ता नहीं रखते.  इस पर यह आयत उतरी और उन्हें बताया गया कि बीबी बच्चे होना नबुव्वत के विरुद्ध नहीं हैं लिहाज़ा यह एतिराज़ बेजा है और पहले जो रसूल आ चुके हैं वह भी निकाह  करते थे, उनके भी बीबियां और बच्चे थे.

और बच्चे किये किसी रसूल का काम नहीं कि कोई निशानी ले आए मगर अल्लाह के हुक्म से हर वादे की एक लिखत है(2){38}
(2)उससे  पहले और बाद में नहीं हो सकता चाहे वह अज़ाब का वादा हो या कोई और.

अल्लाह जो चाहे मिटाता और साबित करता है(3)
(3)सईद बिन जुबैर और क़तादा ने इस आयत की तफ़सीर में कहा कि अल्लाह जिन अहकाम को चाहता है मन्सूख़ या स्थगित फ़रमाता है जिन्हें चाहता है बाकी रखता है. इन्हीं इब्ने जुबैर का एक क़ौल यह है कि बन्दों के गुनाहों में से अल्लाह जो चाहता है माफ़ फ़रमा कर मिटा देता है और जो चाहता है साबित रखता है. अकरमह का क़ौल है कि अल्लाह तआला तौबह से जिस गुनाह को चाहता है मिटाता है और उसकी जगह नेकियाँ क़ायम फ़रमाता है. इसकी तफ़सीर में और भी बहुत क़ौल हैं.

और अस्ल लिखा हुआ उसी के पास है(4){39}
(4)जिसको उसने आदिकाल में लिखा. यह अल्लाह का इल्म है उम्मुल किताब से लौहे मेहफ़ूज़ मुराद है जिसमें सारे जगत और सृष्टि में होने वाले सारे वाक़िआत और घटनाओं और सारी चीज़ो का हाल दर्ज़ हैं और इसमें हेरफेर या परिवर्तन नहीं हो सकता.

और अगर हम तुम्हें दिखा दें कोई वादा (5)
(5)अज़ाब का.

जो उन्हें दिया जाता है या पहले ही(6)
(6)हम तुम्हें.

अपने पास बुलाएं तो हर हाल में तुम पर तो सिर्फ़ पहुंचाना है और हिसाब लेना(7)
(7)और कर्मों का बदला देना.

हमारा जि़म्मा(8){40}
(8)तो आप काफ़िरों के इन्कार करने से रन्जीदा और दुखी न हों और अज़ाब की जल्दी न करें.

क्या उन्हें नहीं समझता कि हम हर तरफ़ से उनकी आबादी घटाते आ रहे हैं(9)
(9)और जमीनें शिर्क की वुसअत और फैलाव दम बदम  कर रहे हैं और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के लिए काफ़िरों के आस पास की ज़मीने एक के बाद एक फ़त्ह होती चली जाती है.और उनके लश्कर को विजयी करता है और उनके दीन को ग़ल्बा देता है.

और अल्लाह हुक्म फ़रमाता है उसका हुक्म पीछे डालने वाला कोई नहीं (10)
(10)उसका हुक्म लागू है किसी की मजाल नहीं कि इसमें क्यों  और क्या ,या फेर बदल कर सके. जब वह इस्लाम को ग़ल्बा देना चाहे और कुफ़्र को पस्त करना चाहे तो किसकी मज़ाल और ताक़त कि उसके हुक्म में दख़्ल दे सके.

और उसे हिसाब लेते देर नहीं लगती{41}और उनसे अगले (11)
(11)यानी गुजरी हुई उम्मतों के काफ़िर अपने नबियों के साथ.

धोख़ा कर चुके हैं तो सारी छुपवाँ तदबीर का मालिक तो अल्लाह ही है(12)
(12)फिर बगैर उसकी मर्ज़ी के किसी की क्या चल सकती है और जब हक़ीक़त यह है तो मख़लूक़ का क्या डर.

जानता है जो कुछ कोई जान कमाए (13)
(13)हर एक की कोशिश अल्लाह तआला को मालूम है, उसके नज़दीक उनका बदला भी निर्धारित है.

और अब जाना चाहते हैं काफ़िर किसे मिलता है पिछला घर(14){42}
(14)यानी काफ़िर बहुत जल्द जान लेंगे कि आख़िरत की राहत ईमान वालों के लिए है और वहाँ की ज़िल्लत और ख़्वारी क़ाफ़िरों के लिए है.

और काफ़िर कहते हैं तुम रसूल नहीं, तुम फ़रमाओ अल्लाह गवाह काफ़ी है मुझ में और तुम में(15)
(15)जिसने मेरे हाथों में खुले चमत्कार और मज़बूत निशानियाँ  ज़ाहिर फ़रमा कर मेरे नबी होने की गवाही दी.

और वह जिसे किताब का इल्म है(16){43}
(16)चाहे वह उलेमा यहूद से तौरात का जानने वाला हो या इसाईयों में से इंजील का आलिम, वह सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की रिसालत को अपनी किताबों में देखकर जानता है इन उलमा से अक्सर आपकी नबुव्वत की गवाही देते हैं.