23 सूरए मूमिनून

23 सूरए  मूमिनून

अठ्ठारहवाँ पारा – क़द अफ़लहा

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ

قَدْ أَفْلَحَ ٱلْمُؤْمِنُونَ
ٱلَّذِينَ هُمْ فِى صَلَاتِهِمْ خَٰشِعُونَ
وَٱلَّذِينَ هُمْ عَنِ ٱللَّغْوِ مُعْرِضُونَ
وَٱلَّذِينَ هُمْ لِلزَّكَوٰةِ فَٰعِلُونَ
وَٱلَّذِينَ هُمْ لِفُرُوجِهِمْ حَٰفِظُونَ
إِلَّا عَلَىٰٓ أَزْوَٰجِهِمْ أَوْ مَا مَلَكَتْ أَيْمَٰنُهُمْ فَإِنَّهُمْ غَيْرُ مَلُومِينَ
فَمَنِ ٱبْتَغَىٰ وَرَآءَ ذَٰلِكَ فَأُو۟لَٰٓئِكَ هُمُ ٱلْعَادُونَ
وَٱلَّذِينَ هُمْ لِأَمَٰنَٰتِهِمْ وَعَهْدِهِمْ رَٰعُونَ
وَٱلَّذِينَ هُمْ عَلَىٰ صَلَوَٰتِهِمْ يُحَافِظُونَ
أُو۟لَٰٓئِكَ هُمُ ٱلْوَٰرِثُونَ
ٱلَّذِينَ يَرِثُونَ ٱلْفِرْدَوْسَ هُمْ فِيهَا خَٰلِدُونَ
وَلَقَدْ خَلَقْنَا ٱلْإِنسَٰنَ مِن سُلَٰلَةٍۢ مِّن طِينٍۢ
ثُمَّ جَعَلْنَٰهُ نُطْفَةًۭ فِى قَرَارٍۢ مَّكِينٍۢ
ثُمَّ خَلَقْنَا ٱلنُّطْفَةَ عَلَقَةًۭ فَخَلَقْنَا ٱلْعَلَقَةَ مُضْغَةًۭ فَخَلَقْنَا ٱلْمُضْغَةَ عِظَٰمًۭا فَكَسَوْنَا ٱلْعِظَٰمَ لَحْمًۭا ثُمَّ أَنشَأْنَٰهُ خَلْقًا ءَاخَرَ ۚ فَتَبَارَكَ ٱللَّهُ أَحْسَنُ ٱلْخَٰلِقِينَ
ثُمَّ إِنَّكُم بَعْدَ ذَٰلِكَ لَمَيِّتُونَ
ثُمَّ إِنَّكُمْ يَوْمَ ٱلْقِيَٰمَةِ تُبْعَثُونَ
وَلَقَدْ خَلَقْنَا فَوْقَكُمْ سَبْعَ طَرَآئِقَ وَمَا كُنَّا عَنِ ٱلْخَلْقِ غَٰفِلِينَ
وَأَنزَلْنَا مِنَ ٱلسَّمَآءِ مَآءًۢ بِقَدَرٍۢ فَأَسْكَنَّٰهُ فِى ٱلْأَرْضِ ۖ وَإِنَّا عَلَىٰ ذَهَابٍۭ بِهِۦ لَقَٰدِرُونَ
فَأَنشَأْنَا لَكُم بِهِۦ جَنَّٰتٍۢ مِّن نَّخِيلٍۢ وَأَعْنَٰبٍۢ لَّكُمْ فِيهَا فَوَٰكِهُ كَثِيرَةٌۭ وَمِنْهَا تَأْكُلُونَ
وَشَجَرَةًۭ تَخْرُجُ مِن طُورِ سَيْنَآءَ تَنۢبُتُ بِٱلدُّهْنِ وَصِبْغٍۢ لِّلْءَاكِلِينَ
وَإِنَّ لَكُمْ فِى ٱلْأَنْعَٰمِ لَعِبْرَةًۭ ۖ نُّسْقِيكُم مِّمَّا فِى بُطُونِهَا وَلَكُمْ فِيهَا مَنَٰفِعُ كَثِيرَةٌۭ وَمِنْهَا تَأْكُلُونَ
وَعَلَيْهَا وَعَلَى ٱلْفُلْكِ تُحْمَلُونَ

सूरए मूमिनून मक्का में उतरी, इसमें 118 आयतें, 6 रूकू हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)

-पहला रूकू

(1)  सूरए मूमिनून मकका में उतरी, इसमें 6 रूकू, एक सौ अठ्ठारह आयतें, एक हज़ार आठ सौ चालीस कलिमे और चार हज़ार आठ सौ दो अक्षर हैं.

बेशक मुराद को पहुंचे{1} ईमान वाले जो अपनी नमाज़ में गिड़गिड़ाते हैं(2){2}
(2) उनके दिलों में ख़ुदा का ख़ौफ़ होता है और उनके अंग साकित होत हैं. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि नमाज़ में एकाग्रता यह है कि उसमें दिल लगा हो और दुनिया से ध्यान हटा हुआ हो और नज़र सज्दे की जगह से बाहर न जाए और  आँखों के कोनों से किसी तरफ़ न देखे और कोई बेज़रूरत काम न करे और कोई कपड़ा शानों पर न लटकाए, इस तरह कि उसके दोनों किनारे लटकते हों और आपस में मिले न हों और उंगलियाँ न चटखाए और इस क़िस्म की हरकतों से दूर रहे. कुछ ने फ़रमाया कि एकाग्रता यह है कि आसमान की तरफ़ नज़र न उठाए.

और वो जो किसी बेहूदा बात की तरफ़ मुंह नहीं करते(3){3}
(3) हर बुराई और बुरी बात से दूर रहते हैं.

और वो कि ज़कात देने का काम करते हैं(4){4}
(4) यानी उसके पाबन्द हैं और हमेशा उसकी अदायगी करते हैं.

और वो जो अपनी शर्मगाहों की हिफ़ाज़त करते हैं{5} मगर अपनी बीबियों या शरई दासियों पर, जो उनके हाथ की मिल्क हैं कि उनपर कोई मलामत नहीं(5){6}
(5) अपनी बीबीयों और दासियों के साथ जाइज़ तरीक़े पर क़ुर्बत करने में.

तो जो इन दो के सिवा कुछ और चाहे, वही हद से बढ़ने वाले हैं(6) {7}
(6) कि हलाल से हराम की तरफ़ बढ़ते हैं, इससे मालूम हुआ कि हाथ से शहवत निकालना या हस्तमैथुन करना हराम है. सईद बिन जुबैर रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया, अल्लाह तआला ने एक उम्मत को अज़ाब किया जो अपनी शर्मगाहों से खेल करते थे.

और वो जो अपनी अमानतों और अपने एहद की रिआयत (लिहाज़) करते हैं(7){8}
(7) चाहे वो अमानतें अल्लाह की हों या लोगों की. और इसी तरह एहद ख़ुदा के साथ हों या बन्दों के साथ, सब को पूरा करना लाज़िम है.

और वो जो अपनी नमाज़ों की निगहबानी करते हैं(8){9}
(8)  और उन्हें उनके वक़्तों में उनकी शर्तों और संस्कारों के साथ अदा करते हैं और फ़रायज़, वाजिबात, सुन्नत और  नफ़्ल सबकी निगहबानी करते हैं.

यही लोग वारिस हैं{10} कि फ़िरदौस की मीरास पाएंगे, वो उसमें हमेशा रहेंगे{11} और बेशक हमने आदमी को चुनी हुई मिट्टी से बनाया (9){12}
(9) मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि इन्सान से मुराद यहाँ हज़रत आदम है.

फिर, उसे (10)
(10)  यानी उसकी नस्ल को.

पानी की बूंद किया एक मज़बूत ठहराव में(11){13}
(11)यानी गर्भाशय में

फिर हमने उस पानी की बूंद को ख़ून की फुटक किया, फिर ख़ून की फुटक को गोश्त की बोटी फिर गोश्त की बोटी को हड्डियाँ, फिर उन हड्डियों पर गोश्त पहनाया, फिर उसे और सूरत में उठान दी(12)
(12) यानी उसमें रूह डाली. उस बेजान को जानदार किया, बोलने, सुनने और देखने क शक्ति अता की.

तो बड़ी बरकत वाला है अल्लाह, सब से बेहतर बनाने वाला{14} फिर उसके बाद तुम ज़रूर(13)
(13) अपनी उम्रें पूरी होने पर.

मरने वाले हो{15} फिर तुम सब क़यामत के दिन(14)
(14) हिसाब और  बदले के लिये.

उठाए जाओगे {16} और बेशक हमने तुम्हारे ऊपर सात राहें बनाई(15)
(15) इनसे मुराद सात आसमान हैं जो फ़रिश्तों के चढ़ने उतरने के रास्ते हैं.

और हम ख़ल्क़ से ग़ाफ़िल नहीं(16){17}
(16) सब की कहनी, करनी और अन्त:करण को जानते हैं. कोई चीज़ हम से छुपी नहीं.

और हमने आसमान से पानी उतारा(17)
(17) यानी पानी बरसाया.

एक अंदाज़े पर (18)
(18) जितना हमारे इल्म और  हिकमत में सृष्टि की हाजतों के लिये चाहिये.

फिर उसे ज़मीन में ठहराया और बेशक हम उसके ले जाने पर क़ादिर (सक्षम) हैं(19){18}
(19) जैसा अपनी क़ुदरत से उतार, ऐसा ही इसपर भी क़ुदरत रखते हैं कि उसको मिटा दें. तो बन्दों को चाहिये कि इस नेअमत की शुक्रगुज़ारी से हिफ़ाज़त करें.

तो उस से हमने तुम्हारे बाग़ पैदा किये खजूरों और अंगूरों के तुम्हारे लिये उनमें बहुत से मेवे हैं(20)
(20) तरह तरह के.

और उनमें से खाते हो(21){19}
(21) जाड़े और  गर्मी वग़ैरह मौसमों में, और  ऐश करते हो.

और वह पेड़ पैदा किया कि तूरे सीना से निकलता है(22)
(22)  इस दरख़्त से मुराद ज़ैतून है

लेकर उगता है तेल और खाने वालों के लिये सालन (23){20}
(23) यह उस में अजीब गुण है कि वह तेल भी है कि तेल के फ़ायदे उससे हासिल किये जाते हैं, जलाया भी जाता है, दवा के तरीक़े पर भी काम में लाया जाता है और  सालन का काम भी देता है कि अकेले उससे रोटी खाई जा सकती है.

और बेशक तुम्हारे लिये चौपायों में समझने का मक़ाम है, हम तुम्हें पिलाते हैं उसमें से जो उनके पेट में है(24)
(24) यानी दूध ख़ुशगवार, जो अच्छा आहार होता है.

और तुम्हारे लिये उनमें बहुत फ़ायदे हैं(25)
(25) कि उनके बात, खाल, ऊन वग़ैरह से काम लेते हो.

और उन से तुम्हारी ख़ुराक है(26){21}
(26) कि उन्हें ज़िब्ह करके खा लेते हो.

और उनपर(27)
(27) ख़ुश्की में.

और किश्ती पर(28)
(28) दरियाओं में.
सवार किये जाते हो{22}

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23 सूरए मूमिनून-दूसरा रूकू

23 सूरए  मूमिनून-दूसरा रूकू

وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا إِلَىٰ قَوْمِهِۦ فَقَالَ يَٰقَوْمِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُۥٓ ۖ أَفَلَا تَتَّقُونَ
فَقَالَ ٱلْمَلَؤُا۟ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ مِن قَوْمِهِۦ مَا هَٰذَآ إِلَّا بَشَرٌۭ مِّثْلُكُمْ يُرِيدُ أَن يَتَفَضَّلَ عَلَيْكُمْ وَلَوْ شَآءَ ٱللَّهُ لَأَنزَلَ مَلَٰٓئِكَةًۭ مَّا سَمِعْنَا بِهَٰذَا فِىٓ ءَابَآئِنَا ٱلْأَوَّلِينَ
إِنْ هُوَ إِلَّا رَجُلٌۢ بِهِۦ جِنَّةٌۭ فَتَرَبَّصُوا۟ بِهِۦ حَتَّىٰ حِينٍۢ
قَالَ رَبِّ ٱنصُرْنِى بِمَا كَذَّبُونِ
فَأَوْحَيْنَآ إِلَيْهِ أَنِ ٱصْنَعِ ٱلْفُلْكَ بِأَعْيُنِنَا وَوَحْيِنَا فَإِذَا جَآءَ أَمْرُنَا وَفَارَ ٱلتَّنُّورُ ۙ فَٱسْلُكْ فِيهَا مِن كُلٍّۢ زَوْجَيْنِ ٱثْنَيْنِ وَأَهْلَكَ إِلَّا مَن سَبَقَ عَلَيْهِ ٱلْقَوْلُ مِنْهُمْ ۖ وَلَا

تُخَٰطِبْنِى فِى ٱلَّذِينَ ظَلَمُوٓا۟ ۖ إِنَّهُم مُّغْرَقُونَ
فَإِذَا ٱسْتَوَيْتَ أَنتَ وَمَن مَّعَكَ عَلَى ٱلْفُلْكِ فَقُلِ ٱلْحَمْدُ لِلَّهِ ٱلَّذِى نَجَّىٰنَا مِنَ ٱلْقَوْمِ ٱلظَّٰلِمِينَ
وَقُل رَّبِّ أَنزِلْنِى مُنزَلًۭا مُّبَارَكًۭا وَأَنتَ خَيْرُ ٱلْمُنزِلِينَ
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَٰتٍۢ وَإِن كُنَّا لَمُبْتَلِينَ
ثُمَّ أَنشَأْنَا مِنۢ بَعْدِهِمْ قَرْنًا ءَاخَرِينَ
فَأَرْسَلْنَا فِيهِمْ رَسُولًۭا مِّنْهُمْ أَنِ ٱعْبُدُوا۟ ٱللَّهَ مَا لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرُهُۥٓ ۖ أَفَلَا تَتَّقُونَ

और बेशक हमने नूह को उसकी क़ौम की तरफ़ भेजा तो उसने कहा ऐ मेरी क़ौम अल्लाह को पुजो उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं, तो क्या तुम्हें डर
नहीं(1){23}
(1) उसके अज़ाब का, जो उसके सिवा औरों को पूजते हो.

उसकी क़ौम के जिन सरदारों ने कुफ़्र किया बोले(2)
(2) अपनी क़ौम के लोगों से, कि.

यह तो नहीं मगर तुम जैसा आदमी चाहता है कि तुम्हारा बड़ा बने(3)
(3) और तुम्हें अपना ताबअ बनाए.

और अल्लाह चाहता (4)
(4)  कि रसूल को भेजे और मख़लूक़ परस्ती की मुमानिअत फ़रमाए.

तो फ़रिश्ते उतारता, हमने तो यह अगले बाप दादाओ में न सुना(5){24}
(5) कि बशर भी रसूल होता है, यह उनकी अत्यन्त मूर्खता थी कि बशर का रसूल होना तो न माना, पत्थरों को ख़ुदा मान लिया और उन्होंने हज़रत नूह
अलैहिस्सलाम की निस्बत यह भी कहा.

वह तो नहीं मगर एक दीवाना मर्द तो कुछ ज़माने तक उसका इन्तिज़ार किये रहो(6){25}
(6) यहाँ तक कि उसका जुनून दूर हो, ऐसा हुआ तो ख़ैर, वरना उसको क़त्ल कर डालना, जब हज़रत नूह अलैहिस्सलाम उन लोगों के ईमान लाने से
मायूस हुए और उनके हिदायत पाने की उम्मीद न रही तो हज़रत.

नूह ने अर्ज़ की ऐ मेरे रब मेरी मदद फ़रमा(7)
(7) और उस क़ौम को हलाक कर.

इसपर कि उन्होंने मुझे झुटलाया {26} तो हमने उसे वही (देववाणी) भेजी की हमारी निगाह के सामने(8)
(8)  यानी हमारी हिमायत और हिफ़ाजत में.

और हमारे हुक्म से किश्ती बना फिर जब हमारा हुक्म आए(9)
(9) उनकी हलाकत का, और अज़ाब के निशान नमूदार हों.

और  तनूर उबले(10)
(10) और उससे पानी निकालतें, तो यह अलामत है अज़ाब के शुरू होने की.

तो उसमें बिठा ले (11)
(11)  यानी किश्ती में पशु पक्षियों के.

हर जोड़े में से दो(12)
(12) नर और मादा.

और अपने घर वाले(13)
(13) यानी अपनी ईमानदार बीबी और ईमानदार औलाद या सारे ईमान रखने वाले.

मगर इनमें से वो जिनपर बात पहले पड़ चुकी(14)
(14) और अल्लाह तआला के लिखे हुए में उनका अज़ाब और हलाकत निश्चित हो चुकी. वह आपका एक बेटा था कनआन नाम का और एक औरत कि
ये दोनों काफ़िर थे. आपने अपने तीन बेटों साम, हाम, याफ़स और उनकी बीबियों को और दूसरें ईमान वालों को सवार किया. कुल लोग जो किश्ती में
थे, उनकी तादाद अठहत्तर थी, आधे मर्द और आधी औरतें.

और इन ज़ालिमों के मामले में मुझ से बात न करना (15)
(15) और उनके लिये निजात तलब न करना, दुआ न फ़रमाना.

ये ज़रूर डुबोए जाएंगे{27} फिर जब ठीक बैठ ले किश्ती पर तू और तेरे साथ वाले तो कह सब ख़ूबियाँ अल्लाह को जिसने हमें उन ज़ालिमों से निजात
दी{28} और अर्ज़ कर(16)
(16) किश्ती से उतरते वक़्त या उसमें सवार होते वक़्त.

कि ऐ मेरे रब मुझे बरकत वाली जगह उतार और तू सबसे बेहतर उतारने वाला है{29} बेशक इसमें(17)
(17) यानी हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के वाक़ए में और उसमें वो सच्चाई के दुश्मनों के साथ किया गया.

ज़रूर निशानियां हैं (18)
(18) और इब्रतें और नसीहतें और अल्लाह की क़ुदरत के परिणाम हैं.

और बेशक ज़रूर हम जांचने वाले थे (19){30}
(19) उस क़ौम के, हज़रत नूह अलैहिस्सलाम को उसमें भेज कर और उनको हिदायत और नसीहत का ज़िम्मेदार बनाकर ताकि ज़ाहिर हो जाए कि
अज़ाब उतरने से पहले कौन नसीहत क़ुबूल करता और फ़रमाँबरदारी की पुष्टि करता है और कौन नाफ़रमान झुटलाने और विरोध पर अड़ा रहता है.

फिर उनके(20)
(20) यानी नूह की क़ौम के अज़ाब और हलाकत के.

बाद हमने और संगत (क़ौम) पैदा की(21){31}
(21) यानी आद और क़ौमे हूद.

तो उनमें एक रसूल उन्हीं में से भेजा(22)
(22)  यानी हूद अलैहिस्सलाम. और उनकी मअरिफ़त उस क़ौम को हुक्म दिया.

कि अल्लाह की बन्दगी करो उसके सिवा तुम्हारा कोई ख़ुदा नहीं तो क्या तुम्हें डर नहीं(23){32}
(23)  उसके अज़ाब का कि शिर्क छोड़ों और ईमान लाओ.

23 सूरए मूमिनून-तीसरा रूकू

23 सूरए  मूमिनून-तीसरा रूकू

وَقَالَ ٱلْمَلَأُ مِن قَوْمِهِ ٱلَّذِينَ كَفَرُوا۟ وَكَذَّبُوا۟ بِلِقَآءِ ٱلْءَاخِرَةِ وَأَتْرَفْنَٰهُمْ فِى ٱلْحَيَوٰةِ ٱلدُّنْيَا مَا هَٰذَآ إِلَّا بَشَرٌۭ مِّثْلُكُمْ يَأْكُلُ مِمَّا تَأْكُلُونَ مِنْهُ وَيَشْرَبُ مِمَّا تَشْرَبُونَ
وَلَئِنْ أَطَعْتُم بَشَرًۭا مِّثْلَكُمْ إِنَّكُمْ إِذًۭا لَّخَٰسِرُونَ
أَيَعِدُكُمْ أَنَّكُمْ إِذَا مِتُّمْ وَكُنتُمْ تُرَابًۭا وَعِظَٰمًا أَنَّكُم مُّخْرَجُونَ
۞ هَيْهَاتَ هَيْهَاتَ لِمَا تُوعَدُونَ
إِنْ هِىَ إِلَّا حَيَاتُنَا ٱلدُّنْيَا نَمُوتُ وَنَحْيَا وَمَا نَحْنُ بِمَبْعُوثِينَ
إِنْ هُوَ إِلَّا رَجُلٌ ٱفْتَرَىٰ عَلَى ٱللَّهِ كَذِبًۭا وَمَا نَحْنُ لَهُۥ بِمُؤْمِنِينَ
قَالَ رَبِّ ٱنصُرْنِى بِمَا كَذَّبُونِ
قَالَ عَمَّا قَلِيلٍۢ لَّيُصْبِحُنَّ نَٰدِمِينَ
فَأَخَذَتْهُمُ ٱلصَّيْحَةُ بِٱلْحَقِّ فَجَعَلْنَٰهُمْ غُثَآءًۭ ۚ فَبُعْدًۭا لِّلْقَوْمِ ٱلظَّٰلِمِينَ
ثُمَّ أَنشَأْنَا مِنۢ بَعْدِهِمْ قُرُونًا ءَاخَرِينَ
مَا تَسْبِقُ مِنْ أُمَّةٍ أَجَلَهَا وَمَا يَسْتَـْٔخِرُونَ
ثُمَّ أَرْسَلْنَا رُسُلَنَا تَتْرَا ۖ كُلَّ مَا جَآءَ أُمَّةًۭ رَّسُولُهَا كَذَّبُوهُ ۚ فَأَتْبَعْنَا بَعْضَهُم بَعْضًۭا وَجَعَلْنَٰهُمْ أَحَادِيثَ ۚ فَبُعْدًۭا لِّقَوْمٍۢ لَّا يُؤْمِنُونَ
ثُمَّ أَرْسَلْنَا مُوسَىٰ وَأَخَاهُ هَٰرُونَ بِـَٔايَٰتِنَا وَسُلْطَٰنٍۢ مُّبِينٍ
إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَإِي۟هِۦ فَٱسْتَكْبَرُوا۟ وَكَانُوا۟ قَوْمًا عَالِينَ
فَقَالُوٓا۟ أَنُؤْمِنُ لِبَشَرَيْنِ مِثْلِنَا وَقَوْمُهُمَا لَنَا عَٰبِدُونَ
فَكَذَّبُوهُمَا فَكَانُوا۟ مِنَ ٱلْمُهْلَكِينَ
وَلَقَدْ ءَاتَيْنَا مُوسَى ٱلْكِتَٰبَ لَعَلَّهُمْ يَهْتَدُونَ
وَجَعَلْنَا ٱبْنَ مَرْيَمَ وَأُمَّهُۥٓ ءَايَةًۭ وَءَاوَيْنَٰهُمَآ إِلَىٰ رَبْوَةٍۢ ذَاتِ قَرَارٍۢ وَمَعِينٍ

और बोले उस क़ौम के सरदार जिन्हों ने कुफ्र किया और आख़िरत की हाज़िरी(1)
(1)  और वहाँ के सवाब और अज़ाब वग़ैरह.

को झुटलाया और हमने उन्हें दुनिया की ज़िन्दगी में चैन दिया(2)
(2) यानि कुछ काफ़िर जिन्हें अल्लाह तआला ने राहत, ऐश और दुनिया की नेअमत अता फ़रमाई थी, अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की निस्बत
अपनी क़ौम के लोगों से कहने लगे.

कि यह तो नहीं मगर तुम जैसा आदमी जो तुम खाते हो उसी में से खाता है और जो तुम पीते हो उसी में से पीता है(3){33}
(3)  यानी ये अगर नबी होते तो फ़रिश्तों की तरह खाने पीने से पाक होते- इन अन्दर के अंधों ने नबुव्वत के कमालों को न देखा, और खाने पीने के गुण देखकर नबी को अपनी तरह बशर कहने लगे. ये बुनियाद उनकी गुमराही की हुई चुनांचे इसी से उन्होंने ये नतीजा निकाला कि आपस में कहने
लगे.

और अगर तुम किसी अपने जैसे आदमी की इताअत(आज्ञा पालन)करो जब तो तुम ज़रूर घाटे में हो{34} क्या तुम्हें यह वादा देता है कि तुम जब मर
जाओगे और मिट्टी और हड्डियाँ हो जाओगे उसके बाद फिर (4)
(4) कब्रों से ज़िन्दा.

निकाले जाओगे {34} कितनी दूर है, कितनी दूर है जो तुम्हें वादा दिया जाता है(5){36}
(5) यानी उन्होंने मरने के बाद ज़िन्दा होने को बहुत दूर जाना और समझा कि ऐसा कभी होने वाला ही नहीं और इसी झूटे ख़्याल के आधार पर कहने
लगे.

वो तो नहीं मगर हमारी दुनिया की ज़िन्दगी(6)
(6) इससे उनका मतलब ये था कि इस दुनिया की ज़िन्दगी के सिवा और कोई ज़िन्दगी नहीं सिर्फ़ इतना ही है.

कि हम मरते जीते हैं (7)
(7) कि हममें से कोई मरता है कोई पैदा होता है.

और हमें उठना नहीं (8){37}
(8) मरने के बाद, और अपने रसूल अलैहिस्सलाम की निस्बत उन्होंने ये कहा.

वह तो नहीं मगर एक मर्द जिसने अल्लाह पर झूठ बांधा(9)
(9) कि अपने आपको उसका नबी बताया और मरने के बाद ज़िन्दा किये जाने की ख़बर दी.

और हम उसे मानने के नहीं(10){38}
(10) पैग़म्बर अलैहिस्सलाम जब उनके ईमान से मायूस हुए और उन्होंने देखा कि क़ौम अत्यन्त सरकशी पर है तो उनके लिये बद् दुआ की और अल्लाह
की बारगाह में….

अर्ज़ की कि ऐ मेरे रब मेरी मदद फ़रमा इसपर की उन्होंने मुझे झुटलाया{39} अल्लाह ने फ़रमाया कि कुछ देर जाती है कि ये सुब्ह करेंगे पछताते
हुए(11){40}
(11)  अपने कुफ़्र और झुटलाने पर, जबकि अल्लाह का अज़ाब देखेंगे.

तो उन्हें आ लिया सच्ची चिंघाड़ ने(12)
(12) यानी वो अज़ाब और हलाकत में डाले गये.

तो हमने उन्हें घांस कुड़ा कर दिया(13)
(13) यानी वो हलाक होकर घास कुड़े की तरह हो गये.

तो दूर हो (14)
(14) यानी ख़ुदा की रहमत से दूर हों नबियों को झुटलाने वाले.

ज़ालिम लोग{41} फिर उनके बाद हमने और संगतें (क़ौमें) पैदा की(15) {42}
(15) जैसे क़ौमे सालेह और क़ौमे लूत और क़ौमे शुएब वग़ैरह.

कोई उम्मत अपनी मिआद से न पहले जाए न पीछे रहे(16){43}
(16) जिसके लिये हलाकत का जो समय निर्धारित है वो ठीक उसी वक़्त हलाक होगा, उसमें कुछ आगे पीछे नहीं हो सकता.

फिर हमने अपने रसूल भेजे एक पीछे दूसरा, जब किसी उम्मत के पास उसका रसूल आया उन्होंने उसे झुटलाया(17)
(17) और उसकी हिदायत को न माना और उस पर ईमान न लाए.

तो हमने अगलों से पिछले मिला दिये  (18)
(18) और बाद वालों को पहलों की तरह हलाक कर दिया.

और उन्हें कहानियाँ कर डाला (19)
(19) कि बाद वाले अफ़साने की तरह उनका हाल बयान किया करे. और उनके अज़ाब और हलाकत का बयान इब्रत का कारण हो.

तो दूर हो वो लोग कि ईमान नहीं लाते{44} फिर हमने मूसा और उसके भाई हारून को अपनी आयतों और रौशन सनद (प्रमाण) (20)
(20) जैसे लाठी और चमकती हथेली वग़ैरह चमत्कार.

के साथ भेजा{45} फ़िरऔन और उसके दरबारियों की तरफ़ तो उन्होंने घमण्ड किया (21)
(21) और अपने घमण्ड के कारण ईमान न लाए.

और वो लोग ग़ल्बा पाये हुए थे(22){46}
(22)  बनी इस्राईल पर अपने अत्याचार से,  जब हज़रत मूसा और हज़रत हारून अलैहिस्सलाम ने उन्हें ईमान की दावत दी.

तो बोले क्या हम ईमान ले आए अपने जैसे दो आदमियों पर (23)

(23)  यानी हज़रत मूसा और हज़रत हारून पर.

और उनकी क़ौम हमारी बन्दगी कर रही है(24){47}
(24) यानी बनी इस्राईल हमारे हुक्म के तहत है, तो यह कैसे गवारा हो कि उसी क़ौम के दो आदमियों पर ईमान लाकर उनके फ़रमाँबरदार बन जाएं

तो उन्होंने उन दोनों को झुटलाया तो हलाक किये हुओ में हो गये(25){48}
(25) और डुबो दिये गये.

और बेशक हमने मूसा को किताब अता फ़रमाई (26)
(26) यानी तौरात शरीफ़, फ़िरऔन और उसकी क़ौम की हलाकत के बाद.

कि उनको (27)
(27) यानी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की क़ौम बनी इस्राईल को.

हिदायत हो{49} और हमने मरयम और उसके बेटे को (28)
(28) यानी हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को बग़ैर बाप के पैदा फ़रमा कर अपनी क़ुदरत की—

निशानी किया और उन्हें ठिकाना दिया एक बलन्द ज़मीन (29)
(29) इस से मुराद या बैतुल मक़दिस है या दमिश्क़ या फ़लस्तीन, कई क़ौल है.

जहाँ बसने का मक़ाम (30)
(30) यानी हमवार, समतल, लम्बी चौड़ी, फलों वाली ज़मीन, जिसमें रहने वाले राहत के साथ हंसी खुशी बसर करते हैं.
और निगाह के सामने बहता पानी. {50}

23 सूरए मूमिनून-चौथा रूकू

23 सूरए  मूमिनून-चौथा रूकू

يَٰٓأَيُّهَا ٱلرُّسُلُ كُلُوا۟ مِنَ ٱلطَّيِّبَٰتِ وَٱعْمَلُوا۟ صَٰلِحًا ۖ إِنِّى بِمَا تَعْمَلُونَ عَلِيمٌۭ
وَإِنَّ هَٰذِهِۦٓ أُمَّتُكُمْ أُمَّةًۭ وَٰحِدَةًۭ وَأَنَا۠ رَبُّكُمْ فَٱتَّقُونِ
فَتَقَطَّعُوٓا۟ أَمْرَهُم بَيْنَهُمْ زُبُرًۭا ۖ كُلُّ حِزْبٍۭ بِمَا لَدَيْهِمْ فَرِحُونَ
فَذَرْهُمْ فِى غَمْرَتِهِمْ حَتَّىٰ حِينٍ
أَيَحْسَبُونَ أَنَّمَا نُمِدُّهُم بِهِۦ مِن مَّالٍۢ وَبَنِينَ
نُسَارِعُ لَهُمْ فِى ٱلْخَيْرَٰتِ ۚ بَل لَّا يَشْعُرُونَ
إِنَّ ٱلَّذِينَ هُم مِّنْ خَشْيَةِ رَبِّهِم مُّشْفِقُونَ
وَٱلَّذِينَ هُم بِـَٔايَٰتِ رَبِّهِمْ يُؤْمِنُونَ
وَٱلَّذِينَ هُم بِرَبِّهِمْ لَا يُشْرِكُونَ
وَٱلَّذِينَ يُؤْتُونَ مَآ ءَاتَوا۟ وَّقُلُوبُهُمْ وَجِلَةٌ أَنَّهُمْ إِلَىٰ رَبِّهِمْ رَٰجِعُونَ
أُو۟لَٰٓئِكَ يُسَٰرِعُونَ فِى ٱلْخَيْرَٰتِ وَهُمْ لَهَا سَٰبِقُونَ
وَلَا نُكَلِّفُ نَفْسًا إِلَّا وُسْعَهَا ۖ وَلَدَيْنَا كِتَٰبٌۭ يَنطِقُ بِٱلْحَقِّ ۚ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
بَلْ قُلُوبُهُمْ فِى غَمْرَةٍۢ مِّنْ هَٰذَا وَلَهُمْ أَعْمَٰلٌۭ مِّن دُونِ ذَٰلِكَ هُمْ لَهَا عَٰمِلُونَ
حَتَّىٰٓ إِذَآ أَخَذْنَا مُتْرَفِيهِم بِٱلْعَذَابِ إِذَا هُمْ يَجْـَٔرُونَ
لَا تَجْـَٔرُوا۟ ٱلْيَوْمَ ۖ إِنَّكُم مِّنَّا لَا تُنصَرُونَ
قَدْ كَانَتْ ءَايَٰتِى تُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ فَكُنتُمْ عَلَىٰٓ أَعْقَٰبِكُمْ تَنكِصُونَ
مُسْتَكْبِرِينَ بِهِۦ سَٰمِرًۭا تَهْجُرُونَ
أَفَلَمْ يَدَّبَّرُوا۟ ٱلْقَوْلَ أَمْ جَآءَهُم مَّا لَمْ يَأْتِ ءَابَآءَهُمُ ٱلْأَوَّلِينَ
أَمْ لَمْ يَعْرِفُوا۟ رَسُولَهُمْ فَهُمْ لَهُۥ مُنكِرُونَ
أَمْ يَقُولُونَ بِهِۦ جِنَّةٌۢ ۚ بَلْ جَآءَهُم بِٱلْحَقِّ وَأَكْثَرُهُمْ لِلْحَقِّ كَٰرِهُونَ
وَلَوِ ٱتَّبَعَ ٱلْحَقُّ أَهْوَآءَهُمْ لَفَسَدَتِ ٱلسَّمَٰوَٰتُ وَٱلْأَرْضُ وَمَن فِيهِنَّ ۚ بَلْ أَتَيْنَٰهُم بِذِكْرِهِمْ فَهُمْ عَن ذِكْرِهِم مُّعْرِضُونَ
أَمْ تَسْـَٔلُهُمْ خَرْجًۭا فَخَرَاجُ رَبِّكَ خَيْرٌۭ ۖ وَهُوَ خَيْرُ ٱلرَّٰزِقِينَ
وَإِنَّكَ لَتَدْعُوهُمْ إِلَىٰ صِرَٰطٍۢ مُّسْتَقِيمٍۢ
وَإِنَّ ٱلَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِٱلْءَاخِرَةِ عَنِ ٱلصِّرَٰطِ لَنَٰكِبُونَ
۞ وَلَوْ رَحِمْنَٰهُمْ وَكَشَفْنَا مَا بِهِم مِّن ضُرٍّۢ لَّلَجُّوا۟ فِى طُغْيَٰنِهِمْ يَعْمَهُونَ
وَلَقَدْ أَخَذْنَٰهُم بِٱلْعَذَابِ فَمَا ٱسْتَكَانُوا۟ لِرَبِّهِمْ وَمَا يَتَضَرَّعُونَ
حَتَّىٰٓ إِذَا فَتَحْنَا عَلَيْهِم بَابًۭا ذَا عَذَابٍۢ شَدِيدٍ إِذَا هُمْ فِيهِ مُبْلِسُونَ

ऐ पैग़म्बरों, पाकीज़ा चीज़ें खाओ (1)
(1) यहाँ पैग़म्बरों से मुराद या तमाम रसूल हैं और हर एक रसूल को उनके ज़माने में यह पुकार की गई, या रसूलों से मुराद ख़ास सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हैं, या हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम. कई क़ौल हें.

और अच्छे काम करो, मैं तुम्हारे कामों को जानता हूँ(2){51}
(2) उनका बदला अता फ़रमांऊगा.

और बेशक यह तुम्हारा दीन एक ही दीन है(3)
(3) यानी इस्लाम.

और मैं तुम्हारा रब हूँ तो मुझसे डरो{52} तो उनकी उम्मतों ने अपना काम आपस में टुकड़े टुकड़े कर लिया(4)
(4) और अलग अलग सम्प्रदाय हो गए, यहूदी, ईसाई, मजूसी वग़ैरह.

हर गिरोह जो उसके पास है उस पर ख़ुश हे(5){53}
(5) और अपने ही आपको सच्चाई पर जानता है और दूसरों को बातिल पर समझता है. इस तरह उनके बीच दीन का इख़्तिलाफ़ है. अब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को सम्बोधन होता है.

तो तुम उनको छोड़ दो उनके नशे में (6)
(6) यानी उनके कुफ़्र और गुमराही और उनकी जिहालत और ग़फ़लत में.

एक वक़्त तक(7){54}
(7) यानी उनकी मौत के वक़्त तक.

क्या ये ख़याल कर रहे हैं कि वो जो हम उनकी मदद कर रहे हैं माल और बेटों से(8){55}
(8)  दुनिया में.

ये जल्द जल्द उनको भलाइयां देते है(9)
(9) और हमारी ये नेअमतें उनके कर्मों का बदला हैं, या हमारे राज़ी होने के प्रमाण हैं, ऐसा ख़याल करना ग़लत है, वास्तविकता यह नहीं है.

बल्कि उन्हें ख़बर नहीं(10){56}
(10) कि हम उन्हें ढील दे रहे हैं.

बेशक वो जो अपने रब के डर से सहमे हुए हैं(11){57}
(11)  उन्हें उसके अज़ाब का डर है. हज़रत हसन बसरी रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि मूमिन नेकी करता है और ख़ुदा से डरता है और काफ़िर बुराई करता है और निडर रहता है.

और वो जो अपने रब की आयतों पर ईमान लाते हैं(12){58}
(12) और उसकी किताबों को मानते हैं.

और वो जो अपने रब का कोई शरीक नहीं करते{59} और वो जो देते हैं जो कुछ दें(13)
(13)ज़कात और सदक़ात, या ये मानी हैं कि नेक कर्म करते हैं.

और उनके दिल डर रहे हैं यूं कि उनको अपने रब की तरफ़ फिरना है(14){60}
(14)तिरमिज़ी की हदीस में है कि हज़रत उम्मुल मूमिनीन आयशा सिद्दीक़ा रदियल्लाहो अन्हा ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से पूछा कि क्या इस आयत में उन लोगों का बयान है जो शराब पीते हैं और चोरी करते हैं. फ़रमाया ऐ सिद्दीक़ा की आँखों के नूर, ऐसा नहीं. यह उन लोगो का विवरण है जो रोज़े रखते हैं, सदक़े देते हैं और डरते रहते हैं कि कहीं ये कर्म ठुकरा न दिये जाएं.

ये लोग भलाइयों में जल्दी करते हैं और यही सब से पहले उन्हें पहुंचे(15) {61}
(15)यानी नेकियों को, मानी ये हैं कि वो नेकियों में और उम्मतों पर पहल करते हैं.

और हम किसी जान पर बोझ नहीं रखते मगर उसकी तक़त भर और हमारे पास एक किताब है कि हक़ (सच) बोलती है(16)
(16) उसमें हर व्यक्ति के कर्मों का लेखा है, और वह लोहे मेहफ़ूज़ है.

और उनपर ज़ुल्म न होगा(17){62}
(17)न किसी की नेकी घटाई जाएगी न बदी बढाई जाएगी, इसके बाद काफ़िरों का ज़िक्र किया जाता है.

बल्कि उनके दिल उससे(18)
(18) यानी क़ुरआन शरीफ़ से.

ग़फ़लत में हैं और उनके काम उन कामों से जुदा हैं (19)
(19) जो ईमानदारों के ज़िक्र किये गए.

जिन्हें वो कर रहे हैं{63} यहाँ तक कि जब हमने उनके अमीरों को अज़ाब में पकड़ा (20)
(20) और वह दिन प्रतिदिन क़त्ल किये गए और एक क़ौल यह है कि इस अज़ाब से मुराद फ़ाक़ों और भुखमरी की वह मुसीबत है जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की दुआ से उनपर डाली गई थी और उस अकाल से उनकी हालत यहाँ तक पहुंच गई थी कि वो कुत्ते और मुर्दार तक खा गए थे.

तो जभी वो फ़रियाद करने लगे(21){64}
(21) अब उनका जवाब यह है कि—-

आज फ़रियाद न करो, हमारी तरफ़ से तुम्हारी मदद न होगी{65} बेशक मेरी आयतें (22)
(22) यानी क़ुरआन शरीफ़ की आयतें.

तुम पर पढ़ी जाती थीं तो तुम अपनी एड़ियों के बल उलटे पलटते थे(23){66}
(23) और इन आयतों को न मानते थे और उनपर ईमान न लाते थे.

हरम की ख़िदमत पर बड़ाई मारते हो(24)
(24) और यह कहते हुए कि हम हरम वाले हैं और अल्लाह के घर के पड़ोसी हैं, हम पर कोई ग़ालिब न होगा, हमें किसी का डर नहीं.

रात को वहाँ बेहूदा कहानियाँ बकते(25){67}
(25) काबे के चारों तरफ़ जमा होकर, और उन कहानियों में अक्सर क़ुरआन शरीफ़ की बुराई और उसको जादू और शायरी कहना और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की शान में बेजा बातें कहना होता था.

हक़ को छोड़े हुए(26)
(26) यानी नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को और आप पर ईमान लाने को और क़ुरआन को.

क्या उन्होंने बात को सोचा नहीं(27)
(27) यानी क़ुरआन शरीफ़ में ग़ौर नहीं किया और इसके चमत्कार पर नज़र नहीं डाली जिससे उन्हें मालूम होता कि यह रब का कलाम है, इसकी तस्दीक़ लाज़िम है और जो कुछ इसमें कहा गया है वह सब सच है और मानने की चीज़ है. और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की सच्चाई होने पर इसमें खुले प्रमाण है.

या उनके पास वह आया जो उनके बाप दादा के पास न आया था(28){68}
(28) यानी रसूल का तशरीफ़ लाना ऐसी निराली बात नहीं है जो कभी पहले ज़माने में हुई ही न हो और वो यह कह सकें कि हमें ख़बर ही न थी कि ख़ुदा की तरफ़ से रसूल आया भी करते हैं. पहले कभी कोई रसूल आया होता और हमने उसका ज़िक्र सुना होता तो हम क्यों इस रसूल (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) को न मानते, यह बहाना करने का मौक़ा भी नहीं, क्योंकि पहली उम्मतों में रसूल आचुके हैं और ख़ुदा की किताबें उतर चुकी हैं.

या उन्होंने अपने रसूल को न पहचाना(29)
(29) और हुज़ूर की उम्र शरीफ़ के कुल हालात को न देखा और आपके ऊंचे ख़ानदान, सच्चाई और अमानदारी और असाधारण सूझ बूझ, सदचरित्र, सदव्यवहार और विनम्रता और मेहरबानी वग़ैरह पाकीज़ा विशेषताओ और गुणों और बिना किसी से सीखे आपके इल्म में कामिल और तमाम सृष्टि से ज़्यादा जानकार और सर्वोत्तम होने को न जाना, क्या ऐसा है?

तो वो उसे बेगाना (पराया) समझ रहे हैं(30){69}
(30) हक़ीक़त में यह बात तो नहीं बल्कि वो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को और आपके गुणों और चमत्कारों को ख़ूब जानते हैं और आपकी बुज़ुर्गी वाली विशेषताएं ज़माने भर में मशहूर हैं.

या कहते हैं उसे सौदा (जुनून) है(31)
(31) यह भी सरासर ग़लत है, क्योंकि वो जानते हैं कि आप जेसा सूझ बूझ वाला और सम्पूर्ण बुद्वि का मालिक व्यक्ति उनके देखने में नहीं आया.

बल्कि वो तो उनके पास हक़ (सत्य) लाए(32)
(32) यानी क़ुरआन शरीफ़, जो अल्लाह की तौहीद और दीन के अहकाम पर आधारित है.

और उनमें अक्सर को हक़ बुरा लगता है(33){70}
(33) क्योंकि इसमें नफ़्सानी ख़्वाहिशों का विरोध है इसलिये वो रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और उनकी विशेषताओं और कमालात को जानने के बावुज़ूद सच्चाई का विरोध करते हैं. अक्सर की क़ैद से साबित होता है कि यह हाल उनमें बहुत से लोगों का है चुनांचे उनमें कुछ ऐसे भी थे जो आपको सच्चाई पर जानते थे और सच्चाई उन्हें बुरी भी नहीं लगती थी लेकिन वो अपनी क़ौम की तरफ़दारी या उनके तअनों के डर से ईमान न लाए जैसे कि अबू तालिब.

और अगर हक़(34)
(34) यानी क़ुरआन शरीफ़.

उनकी ख़्वाहिशों का पालन करता(35)
(35) इस तरह कि इसमें वो विषय बयान होते हैं जिनकी काफ़िर ख़्वाहिश करते हैं जैसे कि चन्द ख़ुदा होना और ख़ुदा के बेटीयाँ और बेटा होना, वग़ैरह कुफ़्र की बातें.

तो ज़रूर आसमान और ज़मीन और जो कोई उनमें हैं सब तबाह हो जाते(36)
(36)और  सारे जगत का निज़ाम बिगड़ जाता, उलट पुलट हो जाता.

बल्कि हम उनके पास वह चीज़ लाए(37)
(37) यानी क़ुरआने पाक.

जिस में उनकी नामवरी थी तो वो अपनी इज़्ज़त से ही मुंह फेरे हुए हैं {71} क्या तुम उनसे कुछ उजरत मांगते हो(38)
(38) उन्हें हिदायत करने और सच्ची राह बताने पर, ऐसा तो नहीं और वो क्या है और आपको क्या दे सकते हैं, तुम अगर अज्र चाहो उनकी क्या चिन्ता. फिर जब वो आपके गुणों और चमत्कारों से वाक़िफ़ भी हैं, क़ुरआन शरीफ़ का चमत्कार भी उनकी निगाहों के सामने है और आप उनसे हिदायत और नसीहत का कोई बदला भी तलब नहीं करते तो अब उन्हे ईमान लाने में क्या मजबूरी रही.

तो तुम्हारे रब का अज्र (बदला) सब से भला और वह सब से बेहतर रोज़ी देने वाला(39){72}
(39) और उसका फ़ज़्ल आप पर बहुत बड़ा और जो नेअमतें उसने आपको अता फ़रमाई वो बहुतात से और उत्तम, तो आपको उनकी क्या चिन्ता, फिर जब वो आपके गुणों और चमत्कारों से वाक़िफ़ भी हैं, क़ुरआन शरीफ़ का चमत्कार भी उनकी निगाहों के सामने है और आप उनसे हिदायत और नसीहत का कोई बदला भी तलब नहीं करते तो अब उन्हें ईमान लाने में क्या मजबूरी रही.

और बेशक तुम उन्हें सीधी राह की तरफ़ बुलाते हो(40){73}
(40) तो उनपर लाज़िम है कि आपकी दावत क़ुबूल करें और इस्लाम में दाख़िल हों.

और बेशक जो आख़िरत पर ईमान नहीं लाते ज़रूर सीधी राह से(41)
(41) यानी सच्चे दीन से.

कतराए हुए हैं {74} और अगर हम उनपर रहम करें और जो मुसीबत (42)
(42) सात साल के दुष्काल की.

उनपर पड़ी है टाल दें तो ज़रूर भटपना(एहसान-फ़रामोशी) करें अपनी सरकशी में बहकते हुए (43){75}
(43) यानी अपने कुफ़्र और दुश्मनी और सरकशी की तरफ़ लौट जाएंगे और यह चापलूसी जाती रहेगी और रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और ईमान वालों की दुश्मनी और घमण्ड को उनका पहला तरीक़ा था वही अपना लेंगे. जब क़ुरैश सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की दुआ से सात साल के दुष्काल में जकड़े गए और हालत बहुत ख़राब हो गई तो अबू सूफ़ियान उनकी तरफ़ से नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया कि क्या आप अपने ख़याल में सारे जगत के लिये रहमत बना कर नहीं भेजे गए. आपने फ़रमाया, बेशक. तो अबू सुफ़ियान ने कहा कि बड़ों को तो आपने बद्र में क़त्ल कर डाला, औलाद जो रही वह आपकी बद दुआ से इस हालत को पहुंची कि दुष्काल  की मुसीबत में गिरफ़्तार हुई, भुखमरी से तंग आ गई, लोग भूख की बेताबी से हड्डियाँ चाब गये, मुर्दार तक खा गए हैं. मैं आपको अल्लाह की क़सम देता हूँ और कराबत की, आप अल्लाह से दुआ कीजिये कि हम से दुष्काल दूर फ़रमाए. हुज़ूर ने दुआ फ़रमाई और उन्होंने इस बला से छुटकारा पाया. इस घटना के बारे में ये आयत उतरीं.

और बेशक हमने उन्हें अज़ाब में पकड़ा(44)
(44) दुष्काल के या क़त्ल के.

तो न वो अपने रब के हुज़ूर में झुके न गिड़गिड़ाते हैं(42){76}
(45) बल्कि अपनी हटधर्मी और सरकशी पर हैं.

यहाँ तक कि जब हमने उनप खोला किसी सख़्त अज़ाब का दरवाज़ा (46)
(46) इस अज़ाब से या दुष्काल मुराद है जैसा कि ऊपर की रिवायत में आया या बद्र के दिन का क़त्ल. यह इस क़ौल की बुनियाद पर है कि दुष्काल बद्र से पहले हुआ. और कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा कि इस सख़्त अज़ाब से मौत मुराद है. कुछ ने कहा कि क़यामत.
तो वो अब उसमें नाउम्मीद पड़े हैं{77}

23 सूरए मूमिनून-पांचवाँ रूकू

23 सूरए  मूमिनून-पांचवाँ रूकू

وَهُوَ ٱلَّذِىٓ أَنشَأَ لَكُمُ ٱلسَّمْعَ وَٱلْأَبْصَٰرَ وَٱلْأَفْـِٔدَةَ ۚ قَلِيلًۭا مَّا تَشْكُرُونَ
وَهُوَ ٱلَّذِى ذَرَأَكُمْ فِى ٱلْأَرْضِ وَإِلَيْهِ تُحْشَرُونَ
وَهُوَ ٱلَّذِى يُحْىِۦ وَيُمِيتُ وَلَهُ ٱخْتِلَٰفُ ٱلَّيْلِ وَٱلنَّهَارِ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ
بَلْ قَالُوا۟ مِثْلَ مَا قَالَ ٱلْأَوَّلُونَ
قَالُوٓا۟ أَءِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًۭا وَعِظَٰمًا أَءِنَّا لَمَبْعُوثُونَ
لَقَدْ وُعِدْنَا نَحْنُ وَءَابَآؤُنَا هَٰذَا مِن قَبْلُ إِنْ هَٰذَآ إِلَّآ أَسَٰطِيرُ ٱلْأَوَّلِينَ
قُل لِّمَنِ ٱلْأَرْضُ وَمَن فِيهَآ إِن كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
سَيَقُولُونَ لِلَّهِ ۚ قُلْ أَفَلَا تَذَكَّرُونَ
قُلْ مَن رَّبُّ ٱلسَّمَٰوَٰتِ ٱلسَّبْعِ وَرَبُّ ٱلْعَرْشِ ٱلْعَظِيمِ
سَيَقُولُونَ لِلَّهِ ۚ قُلْ أَفَلَا تَتَّقُونَ
قُلْ مَنۢ بِيَدِهِۦ مَلَكُوتُ كُلِّ شَىْءٍۢ وَهُوَ يُجِيرُ وَلَا يُجَارُ عَلَيْهِ إِن كُنتُمْ  تَعْلَمُونَ
سَيَقُولُونَ لِلَّهِ ۚ قُلْ فَأَنَّىٰ تُسْحَرُونَ
بَلْ أَتَيْنَٰهُم بِٱلْحَقِّ وَإِنَّهُمْ لَكَٰذِبُونَ
مَا ٱتَّخَذَ ٱللَّهُ مِن وَلَدٍۢ وَمَا كَانَ مَعَهُۥ مِنْ إِلَٰهٍ ۚ إِذًۭا لَّذَهَبَ كُلُّ إِلَٰهٍۭ بِمَا خَلَقَ
وَلَعَلَا بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍۢ ۚ سُبْحَٰنَ ٱللَّهِ عَمَّا يَصِفُونَ
عَٰلِمِ ٱلْغَيْبِ وَٱلشَّهَٰدَةِ فَتَعَٰلَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ

और वही है जिसने बनाए तुम्हारे लिये कान और आँखें और दिल(1)
(1) ताकि सुनो और देखो और समझो और दीन और दुनिया का मुनाफ़ा हासिल करो.

(2)
तुम बहुत ही कम हक़ मानते हो(2) {78}
(2) कि तुम ने उन नेअमतों की क़द्र न जानी और उनसे फ़ायदा न उठाया और कानों, आँखों और दिलों से अल्लाह की आयतों के सुनने, देखने, समझने और अल्लाह को जानने और उसका हक़ पहचान कर शुक्रगुज़ार बनने का नफ़ा न उठाया.

और वही है जिसने तुम्हें ज़मीन में फैलाया और उसी की तरफ़ उठना है(3){79}
(3) क़यामत के दिन.

और वही जिलाए और मारे और उसी के लिये हैं रात और दिन की तबदीलियाँ  (4)
(4) उनमें से हर एक का दूसरे के बाद आना और अंधेरे और उजाले और कमी बेशी में हर एक का दूसरे से विभिन्न होना ये सब क़ुदरत के निशान हैं.

तो क्या तुम्हें समझ नहीं (5){80}
(5) कि उनमें नसीहत पकड़ों और उनमें ख़ुदा की क़ुदरत देख कर मरने के बाद ज़िन्दा किये जाने को स्वीकार करो और ईमान लाओ.

बल्कि उन्होंने वही कही जो अगले(6)
(6) यानी उनसे पहले काफ़िर.

कहते थे{81} बोले क्या जब हम मर जाएं और मिट्टी और हड्डियां हो जाएं क्या फिर निकाले जाएंगे{82} बेशक यह वादा हम को और हम से पहले हमारे बाप दादा को दिया गया यह तो नहीं मगर वही अगली दास्तानें(7){83}
(7) जिनकी कुछ भी हक़ीक़त नहीं. काफ़िरों के इस कथन का रद फ़रमाने और उनपर हुज्जत क़ायम फ़रमाने के लिये अल्लाह तआला ने अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से इरशाद फ़रमाया.

तुम फ़रमाओ किसका माल है ज़मीन और जो कुछ इसमें है अगर तुम जानते हो(8){84}
(8) उसके ख़ालिक और मालिक को तो बताओ.

अब कहेंगे कि अल्लाह का(9)
(9) क्योंकि इसके सिवा कोई जवाब ही नहीं और मुश्रिक अल्लाह तआला की ख़ालिक़ीयत को मानते भी हैं. जब वो यह जवाब दें.

तुम फ़रमाओ फिर क्यों नहीं सोचते (10){85}
(10) कि जिसने ज़मीन को और उसकी सृष्टि को शुरू में पैदा फ़रमाया, वह ज़रूर मुर्दों को ज़िन्दा करने पर क़ादिर है.

तुम फ़रमाओ कौन है मालिक आसमानों का और बड़े अर्श का{86} अब कहेंगे यह अल्लाह ही की शान है तुम फ़रमाओ फिर क्यों नहीं डरते(11){87}
(11) उसके अलावा दूसरे को पूजने और शिर्क करने से और उसके मुर्दों को ज़िन्दा करने पर क़ादिर होने का इन्कार करने से.

तुम फ़रमाओ किस के हाथ है हर चीज़ का क़ाबू (12)
(12) और हर चीज़ पर हक़ीक़ी क़ुदरत और इख़्तियार किस का है.

और वह पनाह देता है और उसके ख़िलाफ़ कोई पनाह नहीं दे सकता अगर तुम्हें इल्म हो(13){88}
(13) तो जवाब दो.

अब कहेंगे यह अल्लाह ही की शान है, तुम फ़रमाओ फिर किस जादू के धोखे में पड़े हो(14){89}
(14) यानी किस शैतानी धोखे में हो कि तौहीद और फ़रमाँबरदारी को छोड़कर सच्चाई को झूट समझ रहे हो. जब तुम मानते हो कि हक़ीक़ी क़ुदरत उसी की है और उसके ख़िलाफ़ कोई किसी को पनाह नहीं दे सकता. तो दूसरे की इबादत बिल्कुल बेकार है.

बल्कि हम उनके पास सच्चाई लाए(15)
(15) कि अल्लाह के न औलाद हो सकती है, न उसका शरीक. ये दोनों बातें मुहाल है.

और वो बेशक झूटे हैं(16){90}
(16) जो उसके लिये शरीक और औलाद ठहराते हैं.

अल्लाह ने कोई बच्चा इख़्तियार न किया(17)
(17) वह इस से पाक है, क्योंकि आकार और जिन्स से पाक है और औलाद वही हो सकती है जो एक जिन्स हो.

और न उसके साथ कोई दूसरा ख़ुदा(18)
(18) जो ख़ुदा होने में शरीक हो.

यूं होता तो हर ख़ुदा अपनी मख़लूक़ ले जाता(19)
(19) और उसको दूसरे के क़ब्ज़े में न छोड़ता.

और ज़रूर एक दूसरे पर अपनी तअल्ली (महानता) चाहता(20)
(20) और दूसरे पर अपनी बरतरी और अपना ग़लबा पसन्द करता क्योंकि टक्कर हुकूमतों में यही होता है. इससे मालूम हुआ कि दो ख़ुदा होना बातिल है, ख़ुदा एक ही है हर चीज़ उसके तहत और क़ब्ज़े में है.

पाकी है अल्लाह को इन बातों से जो ये बनाते हैं(21){91}
(21) कि उसके लिये शरीक और औलाद ठहराते हैं.
जानने वाला हर छुपे और ज़ाहिर का तो उसे बलन्दी है उनके शिर्क से{92}

23 सूरए मूमिनून-छटा रूकू

23 सूरए  मूमिनून-छटा रूकू

رَبِّ فَلَا تَجْعَلْنِى فِى ٱلْقَوْمِ ٱلظَّٰلِمِينَ
وَإِنَّا عَلَىٰٓ أَن نُّرِيَكَ مَا نَعِدُهُمْ لَقَٰدِرُونَ
ٱدْفَعْ بِٱلَّتِى هِىَ أَحْسَنُ ٱلسَّيِّئَةَ ۚ نَحْنُ أَعْلَمُ بِمَا يَصِفُونَ
وَقُل رَّبِّ أَعُوذُ بِكَ مِنْ هَمَزَٰتِ ٱلشَّيَٰطِينِ
وَأَعُوذُ بِكَ رَبِّ أَن يَحْضُرُونِ
حَتَّىٰٓ إِذَا جَآءَ أَحَدَهُمُ ٱلْمَوْتُ قَالَ رَبِّ ٱرْجِعُونِ
لَعَلِّىٓ أَعْمَلُ صَٰلِحًۭا فِيمَا تَرَكْتُ ۚ كَلَّآ ۚ إِنَّهَا كَلِمَةٌ هُوَ قَآئِلُهَا ۖ وَمِن وَرَآئِهِم بَرْزَخٌ إِلَىٰ يَوْمِ يُبْعَثُونَ
فَإِذَا نُفِخَ فِى ٱلصُّورِ فَلَآ أَنسَابَ بَيْنَهُمْ يَوْمَئِذٍۢ وَلَا يَتَسَآءَلُونَ
فَمَن ثَقُلَتْ مَوَٰزِينُهُۥ فَأُو۟لَٰٓئِكَ هُمُ ٱلْمُفْلِحُونَ
وَمَنْ خَفَّتْ مَوَٰزِينُهُۥ فَأُو۟لَٰٓئِكَ ٱلَّذِينَ خَسِرُوٓا۟ أَنفُسَهُمْ فِى جَهَنَّمَ خَٰلِدُونَ
تَلْفَحُ وُجُوهَهُمُ ٱلنَّارُ وَهُمْ فِيهَا كَٰلِحُونَ
أَلَمْ تَكُنْ ءَايَٰتِى تُتْلَىٰ عَلَيْكُمْ فَكُنتُم بِهَا تُكَذِّبُونَ
قَالُوا۟ رَبَّنَا غَلَبَتْ عَلَيْنَا شِقْوَتُنَا وَكُنَّا قَوْمًۭا ضَآلِّينَ
رَبَّنَآ أَخْرِجْنَا مِنْهَا فَإِنْ عُدْنَا فَإِنَّا ظَٰلِمُونَ
قَالَ ٱخْسَـُٔوا۟ فِيهَا وَلَا تُكَلِّمُونِ
إِنَّهُۥ كَانَ فَرِيقٌۭ مِّنْ عِبَادِى يَقُولُونَ رَبَّنَآ ءَامَنَّا فَٱغْفِرْ لَنَا وَٱرْحَمْنَا وَأَنتَ خَيْرُ ٱلرَّٰحِمِينَ
فَٱتَّخَذْتُمُوهُمْ سِخْرِيًّا حَتَّىٰٓ أَنسَوْكُمْ ذِكْرِى وَكُنتُم مِّنْهُمْ تَضْحَكُونَ
إِنِّى جَزَيْتُهُمُ ٱلْيَوْمَ بِمَا صَبَرُوٓا۟ أَنَّهُمْ هُمُ ٱلْفَآئِزُونَ
قَٰلَ كَمْ لَبِثْتُمْ فِى ٱلْأَرْضِ عَدَدَ سِنِينَ
قَالُوا۟ لَبِثْنَا يَوْمًا أَوْ بَعْضَ يَوْمٍۢ فَسْـَٔلِ ٱلْعَآدِّينَ
قَٰلَ إِن لَّبِثْتُمْ إِلَّا قَلِيلًۭا ۖ لَّوْ أَنَّكُمْ كُنتُمْ تَعْلَمُونَ
أَفَحَسِبْتُمْ أَنَّمَا خَلَقْنَٰكُمْ عَبَثًۭا وَأَنَّكُمْ إِلَيْنَا لَا تُرْجَعُونَ
فَتَعَٰلَى ٱللَّهُ ٱلْمَلِكُ ٱلْحَقُّ ۖ لَآ إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ رَبُّ ٱلْعَرْشِ ٱلْكَرِيمِ
وَمَن يَدْعُ مَعَ ٱللَّهِ إِلَٰهًا ءَاخَرَ لَا بُرْهَٰنَ لَهُۥ بِهِۦ فَإِنَّمَا حِسَابُهُۥ عِندَ رَبِّهِۦٓ ۚ إِنَّهُۥ لَا يُفْلِحُ ٱلْكَٰفِرُونَ
وَقُل رَّبِّ ٱغْفِرْ وَٱرْحَمْ وَأَنتَ خَيْرُ ٱلرَّٰحِمِينَ

तुम अर्ज़ करो कि ऐ मेरे रब अगर तू मुझे दिखाए(1)
(1) वह अज़ाब.

जो उन्हें वादा दिया जाता है{93} तो ऐ मेरे रब मुझे इन ज़ालिमों के साथ  न करना(2){94}
(2) और उनका क़रीन और साथी न बनाना. यह दुआ तवाज़ो और बन्दगी के इज़हार के तरीक़े पर है, जब कि मालूम है कि अल्लाह तआला आपको उनका साथी न करेगा. इसी तरह मअसूम नबी इस्तिग़फ़ार किया करते हैं. जबकि उन्हें मोक्ष और अल्लाह की मेहरबानी का यक़ीनी इल्म होता है.  यह सब विनम्रता और बन्दगी का इज़हार है.

और बेशक हम क़ादिर (सक्षम) है कि तुम्हें दिखा दें जो उन्हें वादा दे रहे हैं(3){95}
(3) यह जवाब है उन काफ़िरों का जो अज़ाब का इन्कार करते और उसकी हंसी उड़ाते थे. उन्हें बताया गया कि अगर तुम ग़ौर करो तो समझ लोगे कि अल्लाह तआला इस वादे के पूरा करने में सक्षम है. फिर इन्कार की वजह और हंसी बनाने का कारण क्या?  और अज़ाब में जो विलम्ब हो रहा है उसमें अल्लाह की हिकमतें हैं कि उनमें से जो ईमान वाले हैं वो ईमान ले आएं और जिनकी नसलें ईमान लाने वाली हैं, उन से वो नस्लें पैदा हो लें.

सब से अच्छी भलाई से बुराई को दफ़ा करो (4)
(4) इस वाक्य के मानी बहुत फैले हुए हैं. इसके ये मानी भी हैं कि तौहीद जो आला बेहतरी है उससे शिर्क की बुराई को दफ़ा फ़रमाए, और यह भी कि फ़रमाँबरदारी और परहेज़गारी को रिवाज देकर गुनाह और बुराई दफ़ा कीजिये, और यह भी कि अपने सदव्यवहार से ख़ताकारों पर इस तरह मेहरबानी और रहमत फ़रमाए जिससे दीन में सुस्ती न हो.

हम ख़ूब जानते हैं जो बातें ये बनाते हैं (5){96}
(5) अल्लाह और उसके रसूल की शान में, तो हम उसका बदला देंगे.

और तुम अर्ज़ करो कि ऐ  मेरे रब तेरी पनाह शैतान के वसवसों से(6){97}
(6) जिनसे वो लोगो को धोखा देकर बुराई और पापों में जकड़ते हैं.

और ऐ मेरे रब तेरी पनाह कि वो मेरे पास आएं{98} यहां तक कि जब उनमें किसी को मौत आए(7)
(7) यानी काफ़िर मौत के वक़्त तक तो अपने कुफ्र और सरकशी और ख़ुदा और रसूल के झुटलाने और मरने के बाद दोबारा ज़िन्दा किये जाने के इन्कार पर अड़ा रहता है और जब मौत का वक़्त आता है और उसको जहन्नम में उसका जो स्थान है दिखाया जाता है और जन्नत का वह स्थान भी दिखाया जाता है जो ईमान लाने की सूरत में उसे मिल सकता था.

तो कहता है कि ऐ मेरे रब मुझे वापस फेर दीजिये (8){99}
(8) दुनिया की तरफ़.

शायद अब मैं कुछ भलाई कमाऊं उसमें जो छोड़ आया हूँ(9)
(9) और नेक कर्म करके अपने गुनाहों का प्रायश्चित करूं. इसपर उसको फ़रमाया जाएगा.

हिश्त! यह तो एक बात है जो वह अपने मुंह से कहता है(10)
(10) हसरत और शर्मिन्दगी से, यह होने वाली नहीं और इसका कुछ फ़ायदा नहीं.

और उनके आगे एक आड़ है(11)
(11) जो उन्हें दुनिया की तरफ़ वापस होने से रोकती है और वह मौत है. (खाज़िन) कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा कि बरजख़ मौत के वक़्त से ज़िन्दा उठाए जाने तक की मुद्दत की कहते हैं.

उस दिन तक जिसमें उठाए जाएंगे{100} तो जब सूर फूंका जाएगा(12)
(12) पहली बार, जिसे नफ़ख़ए ऊला (सूर का पहली बार फूँका जाना) कहते हैं, जैसा कि हज़रत इब्ने अब्बास से रिवायत है.

तो न उनमें रिश्ते रहेंगे(13)
(13) जिन पर दुनिया में गर्व किया करते थे और आपस के ख़ून और ख़ानदान के तअल्लुक़ात टूट जाएंगे और रिश्ते की महब्बतें बाक़ी न रहेंगी और यह हाल होगा कि आदमी अपने भाई और माँ बाप और बीबी और बेटों से भागेगा.

और न एक दूसरे की बात पूछे(14){101}
(14) जैसे कि दुनिया में पूछते थे, क्योंकि हर एक अपने ही हाल में जकड़ा होगा. फिर दूसरी बार सूर फूँका जाएगा और हिसाब के बाद लोग एक दूसरे का हाल पूछेंगे.

तो जिनकी तौलें(15)
(15) नेक कर्म और अच्छी बातों से.

भारी हो लीं वही मुराद को पहुंचे{102} और जिनकी तौलें हलकी पड़ीं (16)
(16) नेकियाँ न होने के कारण, और वो काफ़िर हैं.

वही है जिन्होंने अपनी जानें घाटे में डालीं हमेशा दोज़ख़ में रहेंगे{103} उनके मुंह पर आग लपट मारेगी और वो उसमें मुंह चिड़ाए होंगे(17){104}
(17) तिरमिज़ी की हदीस है कि आग उनको भून डालेगी और ऊपर का होंट सुकड़कर आधे सर तक पहुंचेगा और नीचे का नाफ़ तक लटक जाएगा, दांत खुले रह जाएंगे और उनसे फ़रमाया जाएगा.

क्या तुम पर मेरी आयतें न पढ़ी जाती थीं (18)
(18) दुनिया में.

तो तुम उन्हें झुटलाते थे{105} कहेंगे ऐ हमारे रब हम पर हमारी बदबख़्ती ग़लिब आई और हम गुमराह लोग थे{106} ऐ हमारे रब हमको दोज़ख़ से निकाल दे फिर अगर हम वैसे ही करें तो हम ज़ालिम हैं(19){107}
(19) तिरमिज़ी की हदीस है कि दोज़ख़ी लोग जहन्नम के दारोग़ा मालिक को चालीस बरस तक पुकारते रहेंगे. इसके बाद वह कहेगा कि तुम जहन्नम में ही पड़े रहोगे, फिर वो रब को पुकारेंगे और कहेंगे कि ऐ हमारे रब हमें दोज़ख़ से निकाल, और यह पुकार उनकी दुनिया से दूनी उम्र की मुद्दत तक जारी रहेगी. इसके बाद उन्हें यह जवाब दिया जाएगा जो अगली आयत में हैं. (ख़ाज़िन) और दुनिया की उम्र कितनी है इसमें कई क़ौल है. कुछ ने कहा कि दुनिया की उम्र सात हज़ार बरस है, कुछ ने कहा, बारह हज़ार बरस, कुछ ने कहा, तीन लाख साठ बरस, असल मुद्दत अल्लाह तआला को ही मालूम है. (तज़किरह क़र्तबी)

रब फ़रमाएगा दुत्कारे पड़े रहो इसमें और मुझसे बात न करो(20){108}
(20) अब उनकी उम्मीदें टूट जाएंगी और यह जहन्नम वालों का अन्तिम कलाम होगा, फिर इसके बाद उन्हें कलाम करना नसीब न होगा, रोते चीखते, डकराते, भौंकते रहेंगे.

बेशक मेरे बन्दों का एक गिरोह कहता था ऐ हमारे रब हम ईमान लाए तू हमें बख़्श दे और हम पर रहम कर और तू सबसे बेहतर रहम करने वाला है{109} तो तुमने उन्हें ठट्टा बना लिया(21)
(21) ये आयतें क़ुरैश के काफ़िरों के बारे में उतरीं जो हज़रत बिलाल और हज़रत अम्मार और हज़रत सुहैब और हज़रत ख़ब्बाब वग़ैरह रदियल्लाहो अन्हुम, ग़रीब सहाबा से ठठोल करते थे.

यहाँ तक कि उन्हें बनाने के शग़ल (काम) में(22)
(22) यानी उनके साथ ठठोल करने में इतने लीन हुए कि—-

मेरी याद भूल गए और तुम उनसे हंसा करते{110} बेशक आज मैं ने उनके सब्र का उन्हें यह बदला दिया कि वही कामयाब हैं{111} फ़रमाया(23)
(23)  अल्लाह तआला ने काफ़िरों से.

तुम ज़मीन में कितना ठहरे(24)
(24) यानी दुनिया में, और क़ब्र में.

बरसों की गिनती से{112} बोले हम एक दिन रहे या दिन का हिस्सा(25)
(25) यह जवाब इस वजह से देंगे कि उस दिन की दहशत और अज़ाब की हैबत से उन्हें अपने दुनिया में रहने की अवधि याद न रहेंगी और उन्हें शक हो जाएगा, इसीलिये कहेंगे.

तो गिनती वालों से दर्याफ्त फ़रमा(26){113}
(26) यानी उन फ़रिश्तों से , जिन को तूने बन्दों की उम्रें और उनके कर्म लिखने पर नियुक्त किया. इसपर अल्लाह तआला ने.

फ़रमाया तुम न ठहरे मगर थोड़ा(27)
(27) और आख़िरत की अपेक्षा.

अगर तुम्हे इल्म होता{114} तो क्या यह समझते हो कि हमने तुम्हें बेकार बनाया और तुम्हें हमारी तरफ़ फिरना नहीं(28){115}
(28)  और आख़िरत में जज़ा के लिये उठना नहीं बल्कि तुम्हें इबादत के लिये पैदा किया कि तुम पर इबादत लाज़िम करें और आख़िरत में तुम हमारी तरफ़ लौट कर आओ तो तुम्हारे कर्मों का बदला दें.

तो बहुत बलन्दी वाला है अल्लाह सच्चा बादशाह, कोई मअबूद नहीं सिवा उसके, इज़्ज़त वाले अर्श का मालिक {116}और जो अल्लाह के साथ किसी दूसरे ख़ुदा को पूजे जिस की उसके पास कोई सनद(प्रमाण) नहीं(29)
(29) यानी अल्लाह के सिवा किसी की पूजा मात्र बातिल और प्रमाण रहित है.

तो उसका हिसाब उसके रब के यहाँ है बेशक काफ़िरों का छुटकारा नहीं{117} और तुम अर्ज़ करो ऐ मेरे रब बख़्श दे (30)
(30) ईमान वालों को.
और रहम फ़रमा और तू सबसे बरतर रहम करने वाला{118}