28 – सूरए क़सस- पहला रूकू

28 – सूरए क़सस- पहला रूकू

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
طسم  تِلْكَ آيَاتُ الْكِتَابِ الْمُبِينِ
نَتْلُو عَلَيْكَ مِن نَّبَإِ مُوسَىٰ وَفِرْعَوْنَ بِالْحَقِّ لِقَوْمٍ يُؤْمِنُونَ
إِنَّ فِرْعَوْنَ عَلَا فِي الْأَرْضِ وَجَعَلَ أَهْلَهَا شِيَعًا يَسْتَضْعِفُ طَائِفَةً مِّنْهُمْ يُذَبِّحُ أَبْنَاءَهُمْ وَيَسْتَحْيِي نِسَاءَهُمْ ۚ إِنَّهُ كَانَ مِنَ الْمُفْسِدِينَ
وَنُرِيدُ أَن نَّمُنَّ عَلَى الَّذِينَ اسْتُضْعِفُوا فِي الْأَرْضِ وَنَجْعَلَهُمْ أَئِمَّةً وَنَجْعَلَهُمُ الْوَارِثِينَ
وَنُمَكِّنَ لَهُمْ فِي الْأَرْضِ وَنُرِيَ فِرْعَوْنَ وَهَامَانَ وَجُنُودَهُمَا مِنْهُم مَّا كَانُوا يَحْذَرُونَ
وَأَوْحَيْنَا إِلَىٰ أُمِّ مُوسَىٰ أَنْ أَرْضِعِيهِ ۖ فَإِذَا خِفْتِ عَلَيْهِ فَأَلْقِيهِ فِي الْيَمِّ وَلَا تَخَافِي وَلَا تَحْزَنِي ۖ إِنَّا رَادُّوهُ إِلَيْكِ وَجَاعِلُوهُ مِنَ الْمُرْسَلِينَ
فَالْتَقَطَهُ آلُ فِرْعَوْنَ لِيَكُونَ لَهُمْ عَدُوًّا وَحَزَنًا ۗ إِنَّ فِرْعَوْنَ وَهَامَانَ وَجُنُودَهُمَا كَانُوا خَاطِئِينَ
وَقَالَتِ امْرَأَتُ فِرْعَوْنَ قُرَّتُ عَيْنٍ لِّي وَلَكَ ۖ لَا تَقْتُلُوهُ عَسَىٰ أَن يَنفَعَنَا أَوْ نَتَّخِذَهُ وَلَدًا وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
وَأَصْبَحَ فُؤَادُ أُمِّ مُوسَىٰ فَارِغًا ۖ إِن كَادَتْ لَتُبْدِي بِهِ لَوْلَا أَن رَّبَطْنَا عَلَىٰ قَلْبِهَا لِتَكُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ
وَقَالَتْ لِأُخْتِهِ قُصِّيهِ ۖ فَبَصُرَتْ بِهِ عَن جُنُبٍ وَهُمْ لَا يَشْعُرُونَ
۞ وَحَرَّمْنَا عَلَيْهِ الْمَرَاضِعَ مِن قَبْلُ فَقَالَتْ هَلْ أَدُلُّكُمْ عَلَىٰ أَهْلِ بَيْتٍ يَكْفُلُونَهُ لَكُمْ وَهُمْ لَهُ نَاصِحُونَ
فَرَدَدْنَاهُ إِلَىٰ أُمِّهِ كَيْ تَقَرَّ عَيْنُهَا وَلَا تَحْزَنَ وَلِتَعْلَمَ أَنَّ وَعْدَ اللَّهِ حَقٌّ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ

सूरए क़सस मक्का में उतरी, इसमें 88 आयतें, 9 रूकू हैं.
पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए क़सस मक्के में उतरी सिवाय चार आयतों के जो “अल्लज़ीना आतैनाहुमुल किताब”  से शुरू होकर “ला नब्तग़िल जाहिलीन” पर ख़त्म होती हैं. इस सूरत में एक आयत “इन्नल लज़ी फ़रदा” ً ऐसी है जो मक्कए मुकर्रमा और मदीनए तैय्यिबह के बीच उतरी. इस सूरत में नौ रूकू अठासी आयतें चार सौ इक्तालीस कलिमे और पांच हज़ार आठ सौ अक्षर हैं.

तॉ-सीन मीम{1} ये आयतें हैं रौशन किताब की(2){2}
(2) जो सत्य को असत्य से अलग करती है.

हम तुम पर पढ़ें मूसा और फ़िरऔन की सच्ची ख़बर उन लोगों के लिये जो ईमान रखते हैं{3} बेशक फ़िरऔन ने ज़मीन में ग़ल्बा पाया था (3)
(3) यानी मिस्र प्रदेश में उसका क़ब्ज़ा था और वह अत्याचार और घमण्ड में चरम सीमा को पहुंच गया था. यहाँ तक कि उसने अपना बन्दा होना भी भुला दिया था.

और उसके लोगों को अपना ताबे (फ़रमांबरदार) बनाया उनमें एक गिरोह को(4)
(4) यानी बनी इस्राईल को.

कमज़ोर देखता उनके बेटों को ज़िब्ह करता और उनकी औरतों को ज़िन्दा रखता(5)
(5) यानी लड़कियों को ख़िदमतगारी के लिये ज़िन्दा छोड़ देता और बेटों को ज़िब्ह करने का कारण यह था कि तांत्रिकों ने उससे कह दिया था कि बनी इस्राईल में एक बच्चा पैदा होगा जो तेरे मुल्क के पतन का कारण होगा. इसलिये वह ऐसा करता था और यह उसकी अत्यन्त मूर्खता थी क्योंकि वह अगर अपने ख़याल में तांत्रिकों को सच्चा समझता था तो यह बात होनी ही थी. लड़कों को क़त्ल कर देने से क्या फ़ायदा था और अगर वह सच्चा नहीं जानता था तो ऐसी बात का क्या लिहाज़ था और क़त्ल करना क्या मानी रखता था.

बेशक वह फ़सादी था {4} और हम चाहते थे कि उन कमज़ोरों पर एहसान फ़रमाएं और उनको पेशवा बनाएं(6)
(6) कि वो लोगों को नेकी की राह बताएं और लोग नेकी में उनका अनुकरण करें.

और उनके मुल्क व माल का उन्हीं को वारिस बनाएं (7){5}
(7) यानी फ़िरऔन और उसकी क़ौम की माल मत्ता इन कमज़ोर बनी इस्राईल को दे दें.

और उन्हें(8)
(8) मिस्र और शाम की.

ज़मीन में क़ब्ज़ा दें और फ़िरऔन और हामान और उनके लश्करों को वही दिखा दें जिसका उन्हें उनकी तरफ़ से ख़तरा है(9){6}
(9)  कि बनी इस्राईल के एक बेटे के हाथ से उसके मुल्क का पतन और उनकी हलाकत हो.

और हमने मूसा की माँ को इल्हाम फ़रमाया(10)
(10) हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की वालिदा का नाम यूहानिज़ है. आप लावी बिन यअक़ूब की नस्ल से हैं. अल्लाह तआला ने उनको ख़्वाब में या फ़रिश्ते के ज़रीये या उनके दिल में डाल कर इल्हाम फ़रमाया.

कि इसे दूध पिला(11)
(11)   चुनांन्चे वह कुछ दिन आपको दूध पिलाती रहीं. इस अर्से में न आप रोते थे न उनकी गोद में कोई हरकत करते थे, न आप की बहन के सिवा और किसी को आपकी विलादत की सूचना थी.

फिर जब तुझे इस से अन्देशा(डर) हो(12)
(12) यानी पड़ोसी जान गए है, तो चुग़लख़ोरी करेंगे और फ़िरऔन इस मुबारक बेटे के क़त्ल के पीछे पड़ जाएगा.

तो इसे दरिया में डाल दें और न डर(13)
(13) यानी मिस्र की नील नदी में बिना डर के डाल दे और उसके डूबने और हलाक होने का अन्देशा न कर.

और न ग़म कर(14)
(14) उसकी जुदाई का.

बेशक हम उसे तेरी तरफ़ फेर लाएंगे और उसे रसूल बनाएंगे(15) {7}
(15) तो उन्हों ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को तीन माह दूध पिलाया और जब आप को फ़िरऔन की तरफ़ से अन्देशा हुआ तो एक सन्दूक़ में रखकर (जो ख़ास तौर पर मक़सद के लिये बनाया गया था) रात के वक़्त नील नदी में बहा दिया.

तो उसे उठा लिया फ़िरऔन के घर वालों ने(16)
(16) उस रात की सुब्ह को, और उस सन्दूक़ को फ़िरऔन के सामने रखा और वह खोला गया और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम निकले जो अपने अंगूठे से दूध चूसते थे.

कि वह उनका दुश्मन और उनपर ग़म हो(17)
(17) आख़िरकार.

बेशक फ़िरऔन और हामान  (18)
(18) जो उसका वज़ीर था.

और उनके लश्कर ख़ताकार थे(19){8}
(19)  यानी नाफ़रमान, तो अल्लाह तआला ने उन्हें यह सज़ा दी कि उनके हलाक करने वाले दुश्मन की उन्हीं से परवरिश कराई.

और फ़िरऔन की बीबी ने कहा(20)
(20) जबकि फ़िरऔन ने अपनी क़ौम के लोगों के उकसाने से मूसा अलैहिस्सलाम के क़त्ल का इरादा किया.

यह बच्चा मेरी और तेरी आंखों की ठण्डक है, इसे क़त्ल न करो शायद यह हमें नफ़ा दे या हम इसे बेटा बना ले(21)
(21) क्योंकि यह इसी क़ाबिल है. फ़िरऔन की बीबी आसिया बहुत नेक बीबी थीं. नबियों की नस्ल से थीं. ग़रीबों और दरिद्रों पर मेहरबानी करती थीं. उन्होंने फ़िरऔन से कहा कि यह बच्चा साल भर से ज़्यादा उम्र का मालूम होता है और तूने इस साल के अन्दर पैदा होने वाले बच्चों के क़त्ल का हुक्म दिया है. इसके अलावा मालूम नहीं यह बच्चा नदी में किस प्रदेश से आया. तुझे जिस बच्चे का डर है वह इसी मुल्क के बनी इस्राईल का बताया गया है. आसिया की यह बात उन लोगों ने मान ली.

और बेख़बर थे(22){9}
(22) उससे जो परिणाम होने वाला था.

और सुबह को मूसा की माँ का दिल बेसब्र हो गया(23)
(23) जब उन्होंने सुना कि उनके सुपुत्र फ़िरऔन के हाथों में पहुंच गए.

ज़रूर क़रीब था कि वह उसका हाल खोल देती(24)
(24) और ममता के जोश में हाय बेटे हाय बेटे पुकारती थीं.

अगर हम ढारस न बंधाते उसके दिल पर कि उसे हमारे वादे पर यक़ीन रहे(25){10}
(25) जो वादा हम कर चुके हैं कि तेरे इस बेटे को तेरी तरफ़ फेर लाएंगे.

और उसकी माँ ने उसकी बहन से कहा(26)
(26) जिनका नाम मरयम था, कि हाल मालूम करने के लिये.

उसके पीछे चली जा, तो वह उसे दूर से देखती रही और उनको ख़बर न थी(27){11}
(27) कि यह उस बच्चे की बहन है और उसकी निगरानी करती है.

और हमने पहले ही सब दाइयां उसपर हराम कर दी थीं(28)
(28) चुनांन्चे जितनी दाइयाँ हाज़िर की गई उनमें से किसी की छाती आपने मुंह में न ली. इससे उन लोगों को बहुत चिन्ता हुई कि कहीं से कोई ऐसी दाई मिले जिसका दूध आप पी लें. दाइयों के साथ आपकी बहन भी यह हाल देखने चली गई थीं. अब उन्होंने मौक़ा पाया.

तो बोली क्या मैं तुम्हे बतादूं ऐसे घर वाले कि तुम्हारे इस बच्चे को पाल दें और वो इसके ख़ैरख़्वाह (शुभचिंतक) हैं(29){12}
(29) चुनांन्चे वह उनकी ख़्वाहिश पर अपनी वालिदा को बुला लाई. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम फ़िरऔन की गोद में थे और दूध के लिये रोते थे. फ़िरऔन आपको शफ़्क़त के साथ बहलाता था. जब आपकी वालिदा आई और आपने उनकी ख़ुश्बू पाई तो आपको क़रार आया और आपने उनका दूध मुंह में लिया. फ़िरऔन ने कहा तू इस बच्चे की कौन है कि उसने तेरे सिवा किसी के दूध को मूंह भी न लगाया. उन्होंने कहा मैं एक औरत हूँ, पाक साफ़ रहती हूँ, मेरा दूध ख़ुशगवार है, जिस्म ख़ुश्बूदार है, इसलिये जिन बच्चों के मिज़ाज में नफ़ासत होती है वो और औरतों का दूध नहीं लेते हैं. मेरा दूध पी लेते हैं. फ़िरऔन ने बच्चा उन्हें दिया और दूध पिलाने पर उन्हें मुक़र्रर करके बेटे को अपने घर ले जाने की आज्ञा दी. चुनांन्चे आप अपने मकान पर ले आई और अल्लाह तआला का वादा पूरा हुआ. उस वक़्त उन्हें पूरा इत्मीनान हो गया कि ये बेटा ज़रूर नबी होगा. अल्लाह तआला उस वादे का ज़िक्र फ़रमाता है.

तो हमने उसे उसकी माँ की तरफ़ फेरा कि माँ की आँख ठण्डी हो और ग़म न खाए और जान ले कि अल्लाह का वादा सच्चा है, लेकिन अक्सर लोग नहीं जानते(30){13}
(30) और शक में रहते हैं. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम अपनी वालिदा के पास दूध पीने के ज़माने तक रहे  इस ज़माने में फ़िरऔन उन्हें एक अशरफ़ी रोज़ देता रहा. दूध छूटने के बाद आप हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को फ़िरऔन के पास ले आई और आप वहाँ पलते रहे.

28 – सूरए क़सस- दूसरा रूकू

28 – सूरए क़सस- दूसरा रूकू

وَلَمَّا بَلَغَ أَشُدَّهُ وَاسْتَوَىٰ آتَيْنَاهُ حُكْمًا وَعِلْمًا ۚ وَكَذَٰلِكَ نَجْزِي الْمُحْسِنِينَ
وَدَخَلَ الْمَدِينَةَ عَلَىٰ حِينِ غَفْلَةٍ مِّنْ أَهْلِهَا فَوَجَدَ فِيهَا رَجُلَيْنِ يَقْتَتِلَانِ هَٰذَا مِن شِيعَتِهِ وَهَٰذَا مِنْ عَدُوِّهِ ۖ فَاسْتَغَاثَهُ الَّذِي مِن شِيعَتِهِ عَلَى الَّذِي مِنْ عَدُوِّهِ فَوَكَزَهُ مُوسَىٰ فَقَضَىٰ عَلَيْهِ ۖ قَالَ هَٰذَا مِنْ عَمَلِ الشَّيْطَانِ ۖ إِنَّهُ عَدُوٌّ مُّضِلٌّ مُّبِينٌ
قَالَ رَبِّ إِنِّي ظَلَمْتُ نَفْسِي فَاغْفِرْ لِي فَغَفَرَ لَهُ ۚ إِنَّهُ هُوَ الْغَفُورُ الرَّحِيمُ
قَالَ رَبِّ بِمَا أَنْعَمْتَ عَلَيَّ فَلَنْ أَكُونَ ظَهِيرًا لِّلْمُجْرِمِينَ
فَأَصْبَحَ فِي الْمَدِينَةِ خَائِفًا يَتَرَقَّبُ فَإِذَا الَّذِي اسْتَنصَرَهُ بِالْأَمْسِ يَسْتَصْرِخُهُ ۚ قَالَ لَهُ مُوسَىٰ إِنَّكَ لَغَوِيٌّ مُّبِينٌ
فَلَمَّا أَنْ أَرَادَ أَن يَبْطِشَ بِالَّذِي هُوَ عَدُوٌّ لَّهُمَا قَالَ يَا مُوسَىٰ أَتُرِيدُ أَن تَقْتُلَنِي كَمَا قَتَلْتَ نَفْسًا بِالْأَمْسِ ۖ إِن تُرِيدُ إِلَّا أَن تَكُونَ جَبَّارًا فِي الْأَرْضِ وَمَا تُرِيدُ أَن تَكُونَ مِنَ الْمُصْلِحِينَ
وَجَاءَ رَجُلٌ مِّنْ أَقْصَى الْمَدِينَةِ يَسْعَىٰ قَالَ يَا مُوسَىٰ إِنَّ الْمَلَأَ يَأْتَمِرُونَ بِكَ لِيَقْتُلُوكَ فَاخْرُجْ إِنِّي لَكَ مِنَ النَّاصِحِينَ
فَخَرَجَ مِنْهَا خَائِفًا يَتَرَقَّبُ ۖ قَالَ رَبِّ نَجِّنِي مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ

और जब अपनी जवानी को पहुंचा और पूरे ज़ोर पर आया(1)
(1) उम्र शरीफ़ तीस साल से ज़्यादा हो गई.

हमने उसे हुक्म और इल्म अता फ़रमाया ,(2)
(2) यानी दीन और दुनिया की मसलिहतों का इल्म.

और हम ऐसा ही सिला देते हैं नेकों को{14} और उस शहर में दाख़िल हुआ(3)
(3) वह शहर या तो मनफ़ था जो मिस्र की सीमाओं में है. अस्ल उसकी माफ़ह है. क़िब्ती ज़बान में लफ़्ज़ के मानी है तीस. यह पहला शहर है जो तूफ़ाने नूह के बाद आबाद हुआ. इस प्रदेश में हाम के बेटे मिस्र ने निवास किया. ये निवास करने वाले कुल तीस थे इसलिये इसका नाम माफ़ह हुआ. फिर इसकी अरबी मनफ़ हुई. या वह हाबीन था जो मिस्र से दो फ़रसंग (छ मील) की दूरी पर था. एक क़ौल यह भी है कि वह शहर ऐने शम्स था. (जुमल व खाज़िन)

जिस वक़्त शहर वाले दोपहर के ख़्वाब में बेख़बर थे(4)
(4) और हज़रत मूसा अलैहिस्सलातो वस्सलाम के छुपवाँ तौर पर दाख़िल होने का कारण यह था कि जब हज़रत मूसा अलेहिस्सलाम जवान हुए तो आपने हक़ का बयान और फ़िरऔन और उसके लोगों की गुमराही का रद शुरू किया. बनी इस्राईल के लोग आपकी बात सुनते और आपका अनुकरण करते. आप फ़िरऔनियों के दीन का विरोध फ़रमाते. होते होते इसका चर्चा हुआ और फ़िरऔनी जुस्तजू में हुए. इसलिये आप जिस बस्ती में दाख़िल होते, ऐसे वक़्त दाख़िल होते जब वहाँ के लोग ग़फ़लत में हो. हज़रत अली रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि वह दिन ईद का था, लोग अपने खेल तमाशे में लगे हुए थे. (मदारिक व ख़ाजिन)

तो उसमें दो मर्द लड़ते पाए, एक मूसा के गिरोह से था (5)
(5) बनी इस्राईल में से.

और दूसरा उसके दुश्मनों से(6)
(6) यानी क़िब्ती क़ौमे फ़िरऔन से. यह इस्राईली पर ज़बरदस्ती कर रहा था ताकि उसपर लकड़ी का बोझ लाद कर फ़िरऔन की रसोई में ले जाए.

तो वह जो उसके गिरोह से था(7)
(7) यानी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के.

उसने मूसा से मदद मांगी उस पर जो उसके दुश्मनों से था, तो मूसा ने उसके घूंसा मारा(8)
(8) पहले आपने क़िब्ती से कहा कि इस्राईली पर ज़ुल्म न करो, उसे छोड़ दो. लेकिन वह न माना और बुरा भला कहने लगा तो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उसको उस ज़ुल्म से रोकने के लिये घूंसा मारा.

तो उसका काम कर दिया(9)
(9) यानी वह मर गया और आपने उसको रेत में दफ़्न कर दिया. आपका इरादा क़त्ल करने का न था.

कहा यह काम शैतान की तरफ़ से हुआ(10)
(10) यानी उस क़िब्ती का इस्राईली पर ज़ुल्म करना, जो उसकी हलाकत का कारण हुआ. (खाज़िन)

बेशक वह दुश्मन है खुला गुमराह करने वाला{15}अर्ज़ की ऐ मेरे रब मैंने अपनी जान पर ज़ियादती की(11)
(11) यह कलाम हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का विनम्रता के तौर पर है क्योंकि आप से कोई गुनाह सर्ज़द नहीं हुआ और नबी मअसूम हैं उन से गुनाह नहीं होते. क़िब्ती का मारना ज़ुल्म को दबाने और मज़लूम की मदद करने के लिये था. यह किसी क़ौम में भी गुनाह नहीं. फिर भी अपनी तरफ़ गुनाह की निस्बत करना और माफ़ी चाहना, ये अल्लाह के मुक़र्रब बन्दों का दस्तूर ही है.

तो मुझे बख़्श दे तो रब ने उसे बख़्श दिया, बेशक वही बख़्शने वाला मेहरबान है{16} अर्ज़ की ऐ मेरे रब, जैसा तूने मुझ पर एहसान किया तो अब(12)
(12) यह करम भी कर कि मुझे फ़िरऔन की सोहबत और उसके यहाँ रहने से भी बचा कि उसी वर्गे में गिना जाना, यह भी एक तरह का मददगार होना है.

हरगिज़ मैं मुजरिमों का मददगार न हूंगा{17} तो सुब्ह की उस शहर में डरते हुए इन्तिज़ार में कि क्या होता है(13)
(13) कि ख़ुदा जाने उस क़िब्ती के मारे जाने का क्या नतीजा निकले और उसकी क़ौम के लोग क्या करें.

जभी देखा कि वह जिसने कल उनसे मदद चाही थी फ़रियाद कर रहा है(14)
(14)हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि फ़िरऔन की क़ौम के लोगों ने फ़िरऔन को सूचना दी कि किसी बनी इस्राईल ने हमारे एक आदमी को मार डाला है. इसपर फ़िरऔन ने कहा कि क़ातिल और गवाहों को तलाश करो. फ़िरऔनी गश्त करते फिरते थे और उन्हें कोई सबूत नहीं मिलता था. दूसरे दिन जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को फिर ऐसा इत्तिफ़ाक़ पेश आया कि वह बनी इस्राईल जिसने एक दिन पहले उनसे मदद चाही थी, आज फिर एक फ़िरऔनी से लड़ रहा है और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को देखकर उनसे फ़रियाद करने लगा तब हज़रत….

मूसा ने उससे फ़रमाया बेशक तू खुला गुमराह है(15) {18}
(15) मुराद यह थी कि रोज़ लोगों से लड़ता है अपने आप को भी मुसीबत और परेशानी में डालता है और अपने मददगारों को भी. क्यों ऐसे अवसरों से नहीं बचता और क्यों एहतियात नहीं करता. फिर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को रहम आया और आपने चाहा कि फ़िरऔनी के ज़ुल्म के पंजे से रिहाई दिलाएं.

तो जब मूसा ने चाहा कि उस पर गिरफ़्त करे जो उन दोनों का दुश्मन है(16)
(16) यानी फ़िरऔनी पर, तो इस्राईली ग़लती से यह समझा कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम मुझ से ख़फ़ा हैं, मुझे पकड़ना चाहते हैं. यह समझकर.

वह बोला ऐ मूसा क्या तुम मुझ वैसा ही क़त्ल करना चाहते हो जैसा तुमने कल एक व्यक्ति को क़त्ल कर दिया तुम यही चाहते हो कि ज़मीन में सख़्तगीर बनो और इस्लाम (सुधार) करना नहीं चाहते(17){19}
(17) फ़िरऔनी ने यह बात सुनी और जाकर फ़िरऔन को सूचना दी कि कल के फ़िरऔनी मक़तूल के क़ातिल हज़रत मूसा हैं. फ़िरऔन ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के क़त्ल का हुक्म दिया और लोग हज़रत मूसा को ढूंढने निकले.

और शहर के परले किनारे से एक व्यक्ति (18)
(18) जिसको मूमिन आले फ़िरऔन कहते हैं, यह ख़बर सुनकर क़रीब की राह से—

दौड़ता आया कहा ऐ मूसा बेशक दरबार वाले (19)
(19) फ़िरऔन के.

आपके क़त्ल का मशवरा कर रहे हैं तो निकल जाइये(20)
(20) शहर से.

मैं आपका भला चाहने वाला हूँ(21){20}
(21) यह बात शूभेच्छा और मसलिहत अन्देशी से कहता हूँ.

तो उस शहर से निकला डरता हुआ इस इन्तिज़ार में कि अब क्या होता है, अर्ज़ की ऐ मेरे रब मुझे सितमगारों से बचा ले(22){21}
(22) यानी फ़िरऔन और क़ौम से.

28 – सूरए क़सस- तीसरा रूकू

28 – सूरए क़सस- तीसरा रूकू

وَلَمَّا تَوَجَّهَ تِلْقَاءَ مَدْيَنَ قَالَ عَسَىٰ رَبِّي أَن يَهْدِيَنِي سَوَاءَ السَّبِيلِ
وَلَمَّا وَرَدَ مَاءَ مَدْيَنَ وَجَدَ عَلَيْهِ أُمَّةً مِّنَ النَّاسِ يَسْقُونَ وَوَجَدَ مِن دُونِهِمُ امْرَأَتَيْنِ تَذُودَانِ ۖ قَالَ مَا خَطْبُكُمَا ۖ قَالَتَا لَا نَسْقِي حَتَّىٰ يُصْدِرَ الرِّعَاءُ ۖ وَأَبُونَا شَيْخٌ كَبِيرٌ
فَسَقَىٰ لَهُمَا ثُمَّ تَوَلَّىٰ إِلَى الظِّلِّ فَقَالَ رَبِّ إِنِّي لِمَا أَنزَلْتَ إِلَيَّ مِنْ خَيْرٍ فَقِيرٌ
فَجَاءَتْهُ إِحْدَاهُمَا تَمْشِي عَلَى اسْتِحْيَاءٍ قَالَتْ إِنَّ أَبِي يَدْعُوكَ لِيَجْزِيَكَ أَجْرَ مَا سَقَيْتَ لَنَا ۚ فَلَمَّا جَاءَهُ وَقَصَّ عَلَيْهِ الْقَصَصَ قَالَ لَا تَخَفْ ۖ نَجَوْتَ مِنَ الْقَوْمِ الظَّالِمِينَ
قَالَتْ إِحْدَاهُمَا يَا أَبَتِ اسْتَأْجِرْهُ ۖ إِنَّ خَيْرَ مَنِ اسْتَأْجَرْتَ الْقَوِيُّ الْأَمِينُ
قَالَ إِنِّي أُرِيدُ أَنْ أُنكِحَكَ إِحْدَى ابْنَتَيَّ هَاتَيْنِ عَلَىٰ أَن تَأْجُرَنِي ثَمَانِيَ حِجَجٍ ۖ فَإِنْ أَتْمَمْتَ عَشْرًا فَمِنْ عِندِكَ ۖ وَمَا أُرِيدُ أَنْ أَشُقَّ عَلَيْكَ ۚ سَتَجِدُنِي إِن شَاءَ اللَّهُ مِنَ الصَّالِحِينَ
قَالَ ذَٰلِكَ بَيْنِي وَبَيْنَكَ ۖ أَيَّمَا الْأَجَلَيْنِ قَضَيْتُ فَلَا عُدْوَانَ عَلَيَّ ۖ وَاللَّهُ عَلَىٰ مَا نَقُولُ وَكِيلٌ

और जब मदयन की तरफ़ मूतवज्जेह हुआ(1)
(1) मदयन वह स्थान है जहाँ हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम तशरीफ़ रखते थे. उसको मदयन इब्ने इब्राहीम कहते हैं. मिस्र से यहाँ तक आठ रोज़ की दूरी थी. यह शहर फ़िरऔन की सल्तनत की सीमाओं से बाहर था. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उसका रास्ता भी न देखा था, न कोई सवारी साथ थी, न तोशा, न कोई हमराही. राह में दरख़्तों के पत्तों और ज़मीन के सब्ज़े के सिवा खाने की और कोई चीज़ न मिलती थी.

कहा क़रीब है कि मेरा रब मुझे सीधी राह बताए (2){22}
(2) चुनांन्चे अल्लाह तआला ने एक फ़रिश्ता भेजा जो आपको मदयन तक ले गया.

और जब मदयन के पानी पर आया(3)
(3)  यानी कुंवें पर, जिस से वहाँ के लोग पानी लेते और अपने जानवरों को पिलाते थे. यह कुँवां शहर के किनारे था.

वहाँ लोगों के एक गिरोह को देखा कि अपने जानवरों को पानी पिला रहे हैं और उनसे उस तरफ़(4)
(4) यानी मर्दों से अलग.

दो औरतें देखी कि अपने जानवरों को रोक रही हैं(5)
(5) इस प्रतीक्षा में कि लोग फ़ारिग़ हो और कुंवाँ खाली हो, क्योंकि कुँवें को मज़बूत और ज़ोर – आवर लोगों ने घेर रखा था. उनकी भीड़ में औरतों से संभव न था कि अपने जानवरों को पानी पिला सकतीं.

मूसा ने फ़रमाया तुम दोनो का क्या हाल है(6)
(6) यानी अपने जानवरों को पानी क्यों नहीं पिलातीं.

वो बोलीं हम पानी नहीं पिलाते जब तक सब चरवाहे पिलाकर फेर न ले जाएं(7)
(7) क्योंकि न हम मर्दों की भीड़ में जा सकते हैं न पानी खींच सकते हैं. जब ये लोग अपने जानवरों को पानी पिलाकर वापस हो जाते हैं तो हौज़ में जो पानी बच रहता है वह हम अपने जानवरों को पिला लेते हैं.

और हमारे बाप बहुत बूढे है(8){23}
(8) कमज़ोर हैं, ख़ुद यह काम नहीं कर सकते, इसलिये जानवरों को पानी पिलाते की ज़रूरत हमें पेश आई. जब मूसा अलैहिस्सलाम ने उनकी बातें सुनीं तो दिल भर आया और रहम आया और वहीं दूसरा कुंवाँ जो उसके क़रीब था और एक बहुत भारी पत्थर उसपर ढका हुआ था जिसको बहुत से आदमी मिल कर न हटा सकते थे, आपने अकेले उसे हटा दिया.

तो मूसा ने उन दोनों के जानवरों को पानी पिलाया फिर साए की तरफ़ फिरा (9)
(9) धूप और गर्मी की सख़्ती थी और आपने कई रोज़ से खाना नहीं खाया था, भूख का ग़ल्बा था इसलिये आराम हासिल करने की ग़रज़ से एक दरख़्त के साए में बैठ गए और अल्लाह की बारगाह में.

अर्ज़ की ऐ मेरे रब में उस खाने का जो तू मेरे लिये उतारे मोहताज हूँ (10){24}
(10) हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को खाना देखे पूरा हफ़्ता गुज़र चुका था. इस बीच में एक निवाला न खाया था. आपका पेट पीठ से मिल गया था. इस हालत में अपने रब से ग़िज़ा तलब की और इसके बावुजूद कि अल्लाह की बारगाह में अत्यंत क़ुर्ब और बुज़ुर्गी रखते हैं, इस विनम्रता के साथ रोटी का एक टुकड़ा तलब किया. जब वो लड़कियाँ उस रोज़ बहुत जल्द अपने मकान वापस हो गई तो उनके वालिद ने फ़रमाया कि आज इतनी जल्दी वापस आने का कारण क्या हुआ? अर्ज़ किया कि हमने एक नेक मर्द पासा उसने हम पर रहम किया और हमारे जानवरों को सैराब कर दिया. इसपर उनके वालिद ने एक बेटी से फ़रमाया कि जाओ और उस नेक आदम को मेरे पास बुला लाओ.

तो उन दोनों में से एक उसके पास आई शर्म से चलती हुई (11)
(11) चेहरा आस्तीन से ढके, जिस्म छुपाए. यह बड़ी बेटी थी, इनका नाम सफ़ूरा है और एक क़ौल यह भी है कि छोटी बेटी थीं.

बोली मेरा बाप तुम्हें बुलाता है कि तुम्हें मज़दूरी दे उसकी जो तुम ने हमारे जानवरों को पानी पिलाया है(12)
(12) हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम उजरत लेने पर तो राज़ी न हुए लेकिन हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम की ज़ियारत और उनकी मुलाक़ात के इरादे से चले और उन ख़ातून से फ़रमाया कि आप मेरे पीछे रह कर रास्ता बताती जाइये. यह आपने पर्दे के एहतिमाम के लिये फ़रमाया और इस तरह तशरीफ़ लाए. जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम के पास पहुंचे तो खाना हाज़िर था. हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया, बैठिये खाना खाइये. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने मंज़ूर न किया और अऊज़ो बिल्लाह फ़रमाया. हज़रत शुऐब ने फ़रमाया क्या कारण, खाने में क्या उज्र है, क्या आप को भूख नहीं है. फ़रमाया कि मुझे डर है कि यह खाना मेरे उस काम का बदला न हो जो मैंने आपके जानवरों को पानी पिलाकर अंजाम दिया है. क्योंकि हम वो लोग है कि अच्छे काम पर उजरत क़ुबूल नहीं करते. हज़रत शुऐब ने फ़रमाया, जवान, ऐसा नहीं है, यह खाना आपको काम के बदले में नहीं बल्कि मेरी और मेरे बाप दादा की आदत है कि हम मेहमान की ख़ातिर करते  हैं, खाना खिलाते हैं, तो आप बैठे और आपने खाना खाया.

जब मूसा उसके पास आया और उसे बातें कह सुनाई (13)
(13) और सारी घटनाएं और हालात जो फ़िरऔन के साथ गुज़रे थे, अपनी पैदायश से लेकर क़िब्ती के क़त्ल और फ़िरऔनियों के आपके जान के पीछे पड़ने तक के, सब हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम से बयान कर दिये.

उसने कहा डरिये नहीं आप बच गए ज़ालिमों से(14){25}
(14)यानी फ़िरऔन की हुकूमत और सल्तनत नहीं, इस से साबित हुआ कि एक शख़्स की ख़बर पर अमल करना जायज़ है चाहे वह ग़ुलाम हो या औरत हो. और यह भी साबित हुआ कि अजनबी औरत के साथ एहतियात से चलना जायज़ है.

उनमें की एक बोली(15)
(15) जो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को बुलाने के लिये भेजी गई थी, बड़ी या छोटी.

ऐ मेरे बाप इनको नौकर रख लो(16)
(16) कि यह हमारी बकरियाँ चराया करें, यह काम हमें न करना पड़े.

बेशक बेहतर नौकर वह जो ताक़तवर अमानतदार हो(17){26}
(17) हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने बेटी से पूछा कि तुम्हें उन की क़ुव्वत और अमानत का क्या इल्म. उन्होंने अर्ज़ किया कि क़ुव्वत तो इस से ज़ाहिर है कि उन्होंने अकेले कुँवें पर से वह पत्थर उठा लिया जिस को दस से कम आदमी नहीं उठा सकते और अमानत इससे ज़ाहिर है कि उन्होंने हमें देखकर सर झुका लिया और नज़र न उठाई और हम से कहा कि तुम पीछे चलो, ऐसा न हो कि हवा से तुम्हारा कपड़ा उड़े और बदन का कोई हिस्सा ज़ाहिर हो. यह सुनकर हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से.

कहा मैं चाहता हूँ कि अपनी दोनो बेटियों में से एक तुम्हें ब्याह दूं (18)
(18)यह निकाह का वादा था. अक़्द के अल्फ़ाज़ न थे क्योंकि अक़्द के लिये माज़ी यानी भूतकाल का सीग़ा ज़रूरी है और ऐसे ही मन्कूहा निर्धारण भी ज़रूरी है.

इस मेहर पर कि तुम आठ बरस मेरी चाकरी करो (19)
(19)आज़ाद मर्द का आज़ाद औरत से निकाह किसी दूसरे आज़ाद शख़्स की ख़िदमत करने या बकरीयाँ चराने को मेहर क़रार देकर जायज़ है. अगर आज़ाद मर्द ने किसी मुद्दत तक औरत की ख़िदमत करने को या क़ुरआन की तालीम को मेहर क़रार देकर निकाह किया तो निकाह जायज़ है. और ये चीज़ें मेहर न हो सकेंगी बल्कि उस सूरत में मेहरें मिस्ल लाज़िम होगा. (हिदायह व अहमदी)

फिर अगर पूरे दस बरस कर लो तो तुम्हारी तरफ़ से है(20)
(20) यानी यह तुम्हारी मेहरबानी होगी और तुमपर वाजिब न होगा.

और मैं तुम्हें मशक़्क़त (मेहनत) में डालना नहीं चाहता (21)
(21)  कि तुम पर पूरे दस साल लाज़िम कर दूं.

क़रीब है इन्शाअल्लाह तुम मुझे नेको में पाओगे(22){27}
(22) तो मेरी तरफ़ से अच्छा मामला और एहद की पूर्ति ही होगी. और “इन्शाअल्लाह तआला” आपने अल्लाह तआला की तौफ़ीक़ और मदद पर भरोसा करने के लिये फ़रमाया.

मूसा ने कहा यह मेरे और आपके बीच इक़रार हो चुका में इन दोनो में जो मीआद पूरी कर दूं(23)
(23) चाहे दस साल की या आठ साल की.

तो मुझ पर कोई मुतालिबा (मांग) नहीं, और हमारे इस कहे पर अल्लाह का ज़िम्मा है(24){28}
(24) फिर जब आपका अक़्द हो चुका तो हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने अपनी बेटी को हुक्म दिया कि वह हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को एक लाठी दें जिस से वह बकरियों की निगहबानी करें और ख़तरनाक जानवरों को भगाए. हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम के पास नबियों की कई लाठियाँ थीं. साहिबज़ादे साहिब का हाथ हज़रत आदम अलैहिस्सलाम की लाठी पर पड़ा जो आप जन्नत से लाए थे और  नबी उसके वारिस होते चले आए थे और वह हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम को पहुंची थी. हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने यह लाठी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को दी.

28 – सूरए क़सस- चौथा रूकू

28 – सूरए क़सस- चौथा रूकू

۞ فَلَمَّا قَضَىٰ مُوسَى الْأَجَلَ وَسَارَ بِأَهْلِهِ آنَسَ مِن جَانِبِ الطُّورِ نَارًا قَالَ لِأَهْلِهِ امْكُثُوا إِنِّي آنَسْتُ نَارًا لَّعَلِّي آتِيكُم مِّنْهَا بِخَبَرٍ أَوْ جَذْوَةٍ مِّنَ النَّارِ لَعَلَّكُمْ تَصْطَلُونَ
فَلَمَّا أَتَاهَا نُودِيَ مِن شَاطِئِ الْوَادِ الْأَيْمَنِ فِي الْبُقْعَةِ الْمُبَارَكَةِ مِنَ الشَّجَرَةِ أَن يَا مُوسَىٰ إِنِّي أَنَا اللَّهُ رَبُّ الْعَالَمِينَ
وَأَنْ أَلْقِ عَصَاكَ ۖ فَلَمَّا رَآهَا تَهْتَزُّ كَأَنَّهَا جَانٌّ وَلَّىٰ مُدْبِرًا وَلَمْ يُعَقِّبْ ۚ يَا مُوسَىٰ أَقْبِلْ وَلَا تَخَفْ ۖ إِنَّكَ مِنَ الْآمِنِينَ
اسْلُكْ يَدَكَ فِي جَيْبِكَ تَخْرُجْ بَيْضَاءَ مِنْ غَيْرِ سُوءٍ وَاضْمُمْ إِلَيْكَ جَنَاحَكَ مِنَ الرَّهْبِ ۖ فَذَانِكَ بُرْهَانَانِ مِن رَّبِّكَ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَمَلَئِهِ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا قَوْمًا فَاسِقِينَ
قَالَ رَبِّ إِنِّي قَتَلْتُ مِنْهُمْ نَفْسًا فَأَخَافُ أَن يَقْتُلُونِ
وَأَخِي هَارُونُ هُوَ أَفْصَحُ مِنِّي لِسَانًا فَأَرْسِلْهُ مَعِيَ رِدْءًا يُصَدِّقُنِي ۖ إِنِّي أَخَافُ أَن يُكَذِّبُونِ
قَالَ سَنَشُدُّ عَضُدَكَ بِأَخِيكَ وَنَجْعَلُ لَكُمَا سُلْطَانًا فَلَا يَصِلُونَ إِلَيْكُمَا ۚ بِآيَاتِنَا أَنتُمَا وَمَنِ اتَّبَعَكُمَا الْغَالِبُونَ
فَلَمَّا جَاءَهُم مُّوسَىٰ بِآيَاتِنَا بَيِّنَاتٍ قَالُوا مَا هَٰذَا إِلَّا سِحْرٌ مُّفْتَرًى وَمَا سَمِعْنَا بِهَٰذَا فِي آبَائِنَا الْأَوَّلِينَ
وَقَالَ مُوسَىٰ رَبِّي أَعْلَمُ بِمَن جَاءَ بِالْهُدَىٰ مِنْ عِندِهِ وَمَن تَكُونُ لَهُ عَاقِبَةُ الدَّارِ ۖ إِنَّهُ لَا يُفْلِحُ الظَّالِمُونَ
وَقَالَ فِرْعَوْنُ يَا أَيُّهَا الْمَلَأُ مَا عَلِمْتُ لَكُم مِّنْ إِلَٰهٍ غَيْرِي فَأَوْقِدْ لِي يَا هَامَانُ عَلَى الطِّينِ فَاجْعَل لِّي صَرْحًا لَّعَلِّي أَطَّلِعُ إِلَىٰ إِلَٰهِ مُوسَىٰ وَإِنِّي لَأَظُنُّهُ مِنَ الْكَاذِبِينَ
وَاسْتَكْبَرَ هُوَ وَجُنُودُهُ فِي الْأَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّ وَظَنُّوا أَنَّهُمْ إِلَيْنَا لَا يُرْجَعُونَ
فَأَخَذْنَاهُ وَجُنُودَهُ فَنَبَذْنَاهُمْ فِي الْيَمِّ ۖ فَانظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الظَّالِمِينَ
وَجَعَلْنَاهُمْ أَئِمَّةً يَدْعُونَ إِلَى النَّارِ ۖ وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ لَا يُنصَرُونَ
وَأَتْبَعْنَاهُمْ فِي هَٰذِهِ الدُّنْيَا لَعْنَةً ۖ وَيَوْمَ الْقِيَامَةِ هُم مِّنَ الْمَقْبُوحِينَ

फिर जब मूसा ने अपनी मीआद पूरी कर दी(1)
(1) हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम. इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि आपने बड़ी मीआद यानी पूरे दस साल पूरे किये फिर हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम से मिस्र की तरफ़ वापस जाने की इजाज़त चाही. आपने इजाज़त दी.

और अपनी बीबी को लेकर चला(2)
(2) उनके वालिद की इजाज़त से मिस्र की तरफ़

तूर की तरफ़ से एक आग देखी(3)
(3) जबकि आप जंगल में थे, अंधेरी रात थी, सर्दी सख़्त पड़ रही थी, रास्ता खो गया था, उस वक़्त आप ने आग देखकर.

अपनी घर वाली से कहा तुम ठहरो मुझे तूर की तरफ़ से एक आग नज़र पड़ी है शायद मैं वहाँ से कुछ ख़बर लांऊ (4)
(4) राह की, कि किस तरफ़ है.

या तुम्हारे लिये कोई आग की चिंगारी लाऊं कि तुम तापो {29} फिर जब आग के पास हाज़िर हुआ पुकार की गई मैदान के दाएं किनारे से (5)
(5) जो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के सीधे हाथ की तरफ़ था.

बरकत वाले मक़ाम में पेड़ से(6)
(6) वह दरख़्त उन्नाब (अंगूर) का था या उसज का (उसज एक काँटेदार दरख़्त है जो जंगल में होता है).

कि ऐ मूसा बेशक मैं ही हूँ अल्लाह, रब सारे जगत का(7){30}
(7) जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने हरे भरे दरख़्त में आग देखी तो जान लिया कि अल्लाह तआला के सिवा किसी की यह क़ुदरत नहीं और बेशक इस कलाम का कहने वाला अल्लाह तआला ही हैं. यह भी नक़्ल किया गया है कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने यह कलाम सिर्फ़ कानों ही से नहीं बल्कि अपने मुबारक जिस्म के हर अंग से सुना.

और यह कि डाल दे अपना असा (8)
(8) चुनांन्चे आपने अपनी लाठी डाल दी और वह साँप बन गई.

फिर जब मूसा ने उसे देखा लहराता हुआ मानो सांप है पीठ फेर कर चला और मुड़ कर न देखा(9)
(9) तब पुकारा गया.

ऐ मूसा सामने आओ और डर नहीं, बेशक तुझे आमान है(10){31}
(10) कोई ख़तरा नहीं.

अपना हाथ(11)
(11) अपनी क़मीज़ के.

गिरेबान (कुर्ते के गले) में डाल, निकलेगा सफ़ेद चमकता हुआ बेऐब (12)
(12) सू्र्य किरण की तरह. तो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अपना मुबारक हाथ गले में डाल कर निकाला तो उसमें ऐसी तेज़ रौशनी थी जिससे आँखें झपकें.

और अपना हाथ अपने सीने पर रख ले डर दूर करने को(13)
(13) ताकि हाथ अपनी असली हालत पर आए और डर दूर हो जाए. इब्ने अब्बास रदियल्लाह अन्हुमा ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को सीने पर हाथ रखने का हुक्म दिया ताकि जो डर साँप देखने के वक़्त पैदा हो गया था, दूर हो जाए और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के बाद जो डरा हुआ अपना हाथ सीने पर रखेगा उसका डर दूर हो जाएगा.

तो ये हुज्जतें हैं तेरे रब की(14)
(14)यानी लाठी और चमकता हुआ हाथ तुम्हारी रिसालत की निशानियाँ हैं.

फ़िरऔन और उसके दरबारियों की तरफ़, बेशक वो बेहुक्म लोग हैं {32}अर्ज़ की ऐ मेरे रब मैं ने उनमें एक जान मार डाली है(15)
(15) यानी क़िब्ती मेरे हाथ से मारा गया है.

तो डरता हूँ मुझे क़त्ल कर दें{33} और मेरा भाई हारून उसकी ज़बान मुझसे ज़्यादा साफ़ है तो उसे मेरी मदद के लिये रसूल बना कि मेरी तस्दीक़ करे, मुझे डर है कि वो(16)
(16) यानी फ़िरऔन और उसकी क़ौम.

मुझे झुटलाएंगे {34} फ़रमाया, क़रीब है कि हम तेरे बाज़ू को तेरे भाई से कुव्वत देंगे और तुम दोनों को ग़ल्बा अता फ़रमाएंगे तो वो तुम दोनों का कुछ नुक़सान न कर सकेंगे हमारी निशानियों के कारण, तुम दोनों और जो तुम्हारी पैरवी करेंगे ग़ालिब (विजयी) आओगे(17){35}
(17) फ़िरऔन और उसकी क़ौम पर.

फिर जब मूसा उनके पास हमारी रौशन निशानियां लाया बोले यह तो नहीं मगर बनावट का जादू (18)
(18) उन बदनसीबों ने चमत्कारों का इन्कार कर दिया उनको जादू बताया. मतलब यह कि जिस तरह सारे क़िस्म के जादू झूठे होते हैं उसी तरह मआज़ल्लाह यह भी है.

और हमने अपने अगले बाप दादाओ में ऐसा न सुना(19){36}
(19) यानी आप से पहले ऐसा कभी नहीं किया गया, या ये मानी हैं कि जो दावत आप हमें देते हैं वह ऐसी नई है कि हमारे बाप दादा में भी ऐसी नहीं सुनी गई थी.

और मूसा ने फ़रमाया मेरा रब ख़ूब जानता है जो उसके पास से हिदायत लाया(20)
(20) यानी जो हक़ पर है और जिसको अल्लाह तआला ने नबुव्वत से नवाज़ा.

और जिसके लिये आख़िरत का घर होगा(21)
(21) और वह वहाँ की नेअमतों और रहमतों के साथ नवाज़ा जाएगा.

बेशक ज़ालिम मुराद को नहीं पहुंचते(22){37}
(22) यानी काफ़िरों को आख़िरत की भलाई उपलब्ध नहीं.

और फ़िरऔन बोला ऐ दरबारियों, मैं तुम्हारे लिये अपने सिवा कोई ख़ुदा नहीं जानता, तो ऐ हामान मेरे लिये गारा पकाकर(23)
(23) ईंट तैयार कर. कहते हैं कि यही दुनिया में सबसे पहले ईंटें बनाने वाला है. यह व्यवसाय इससे पहले न था.

एक महल बना(24)
(24) बहुत ऊंची.

कि शायद मैं मूसा के ख़ुदा को झांक आऊं (25)
(25) चुनांन्चे हामान ने हज़ारों कारीगरों और मज़दूरों को जमा किया, ईंटें बनवाई और इमारती सामान जमा किया और इतनी ऊंची इमारत बनवाई कि दुनिया में उसके बराबर कोई इमारत ऊंची न थी. फ़िरऔन ने यह ख़याल किया कि (मआज़ल्लाह) अल्लाह तआला के लिये भी मकान है और वह जिस्म है कि उस तक पहुंचना उसके लिये सम्भव होगा.

और बेशक मेरे गुमान मैं तो वह(26)
(26) यानी मूसा अलैहिस्सलाम.

झूटा है(27){38}
(27) अपने इस दावे में कि उसका एक मअबूद है जिसने उसे अपना रसूल बनाकर हमारी तरफ़ भेजा है.

और उसने और  उसके लशकारियों ने ज़मीन में बेजा बड़ाई चाही(28)
(28) और सच्चाई को न माना और असत्य पर रहे.

और समझे कि उन्हें हमारी तरफ़ फिरना नहीं{39} तो हमने उसे और उसके लश्कर को पकड़ कर दरिया में फैंक दिया(29)
(29) और सब डूब गए.

तो देखो कैसा अंजाम हुआ सितमगारों का{40} और उन्हें हमने (30)
(30) दुनिया में.

दोज़खियों का पेशवा बनाया कि आग की तरफ़ बुलाते हैं(31)
(31) यानी कुफ़्र और गुनाहों की दावत देते हैं जिस से जहन्नम के अज़ाब के मुस्तहिक़ हों और जो उनकी इताअत करे वो भी जहन्नमी हो जाए.

और क़यामत के दिन उनकी मदद न होगी{41} और इस दुनिया में हमने उनके पीछे लअनत लगाई(32)और क़यामत के दिन उनका बुरा है{42}
(32) यानी रूस्वाई और रहमत से दूरी.

28 – सूरए क़सस- पाँचवां रूकू

28 – सूरए क़सस-  पाँचवां रूकू

وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ مِن بَعْدِ مَا أَهْلَكْنَا الْقُرُونَ الْأُولَىٰ بَصَائِرَ لِلنَّاسِ وَهُدًى وَرَحْمَةً لَّعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ
وَمَا كُنتَ بِجَانِبِ الْغَرْبِيِّ إِذْ قَضَيْنَا إِلَىٰ مُوسَى الْأَمْرَ وَمَا كُنتَ مِنَ الشَّاهِدِينَ
وَلَٰكِنَّا أَنشَأْنَا قُرُونًا فَتَطَاوَلَ عَلَيْهِمُ الْعُمُرُ ۚ وَمَا كُنتَ ثَاوِيًا فِي أَهْلِ مَدْيَنَ تَتْلُو عَلَيْهِمْ آيَاتِنَا وَلَٰكِنَّا كُنَّا مُرْسِلِينَ
وَمَا كُنتَ بِجَانِبِ الطُّورِ إِذْ نَادَيْنَا وَلَٰكِن رَّحْمَةً مِّن رَّبِّكَ لِتُنذِرَ قَوْمًا مَّا أَتَاهُم مِّن نَّذِيرٍ مِّن قَبْلِكَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ
وَلَوْلَا أَن تُصِيبَهُم مُّصِيبَةٌ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ فَيَقُولُوا رَبَّنَا لَوْلَا أَرْسَلْتَ إِلَيْنَا رَسُولًا فَنَتَّبِعَ آيَاتِكَ وَنَكُونَ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ
فَلَمَّا جَاءَهُمُ الْحَقُّ مِنْ عِندِنَا قَالُوا لَوْلَا أُوتِيَ مِثْلَ مَا أُوتِيَ مُوسَىٰ ۚ أَوَلَمْ يَكْفُرُوا بِمَا أُوتِيَ مُوسَىٰ مِن قَبْلُ ۖ قَالُوا سِحْرَانِ تَظَاهَرَا وَقَالُوا إِنَّا بِكُلٍّ كَافِرُونَ
قُلْ فَأْتُوا بِكِتَابٍ مِّنْ عِندِ اللَّهِ هُوَ أَهْدَىٰ مِنْهُمَا أَتَّبِعْهُ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
فَإِن لَّمْ يَسْتَجِيبُوا لَكَ فَاعْلَمْ أَنَّمَا يَتَّبِعُونَ أَهْوَاءَهُمْ ۚ وَمَنْ أَضَلُّ مِمَّنِ اتَّبَعَ هَوَاهُ بِغَيْرِ هُدًى مِّنَ اللَّهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي الْقَوْمَ الظَّالِمِينَ

और बेशक हमने मूसा को किताब अता फ़रमाई(1)
(1) यानी तौरात.

बाद इसके कि अगल संगतें (कौमें)(2)
(2)  नूह, आद और समूद वग़ैरह क़ौमों की तरह.

हलाक फ़रमा दीं जिसमें लोगों के दिल की आँखें खोलने वाली बाते और हिदायत और रहमत ताकि वो नसीहत मानें{43} और तुम (3)
(3) ऐ नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

तूर की जानिब मग़रिब में न थे(4)
(4) वह हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का मीक़ात था.

जब कि हमने मूसा को रिसालत का हुक्म भेजा(5)
(5) और उनसे कलाम फ़रमाया और उन्हें मुक़र्रब किया.

और उस वक़्त तुम हाजिर न थे{44} मगर हुआ यह कि हमने संगतें (क़ौमें) पैदा की(6)
(6) यानी बहुत सी उम्मतें हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के बाद.

कि उनपर लम्बा ज़माना गुज़रा (7)
(7) तो वो अल्लाह का एहद भूल गए और उन्होंने उसकी फ़रमाँबरदारी छोड़ दी. इसकी हक़ीक़त यह है कि अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और उनकी क़ौम से सैयदे आलम हबीबे मुकर्रम मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हक़ में और आप परईमान लाने के सम्बन्ध में एहद लिये थे. जब लम्बा ज़माना गुज़रा और उम्मतों के बाद उम्मतें गुज़रती चली गई तो वो लोग उन एहदों को भूल गए और उसकी वफ़ा छोड़ दी.

और न तुम मदयन वालों में मुक़ीम (ठहरे हुए) थे उनपर हमारी आयतें पढ़ते हुए हाँ हम रसूल बनाने वाले हुए(8){45}
(8) तो हम ने आप को इल्म दिया और पहलों के हालात से सूचित किया.

और न तुम तूर के किनारे थे जब हमने निदा फ़रमाई(9)
(9) हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को तौरात अता फ़रमाने के वक़्त.

हाँ तुम्हारे रब की मेहर है (कि तुम्हें ग़ैब के इल्म दिये) (10)
(10) जिन से तुम उनके हालात बयान फ़रमाते हो. आप का इन बातों की ख़बर देना आपकी नबुव्वत की ज़ाहिर दलील है.

कि तुम ऐसी क़ौम को डर सुनाओ जिसके पास तुम से पहले कोई डर सुनाने वाला न आया(11)
(11) इस क़ौम से मुराद मक्के वाले हैं जो उस ज़माने में थे जो जो हज़रत सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बीच पाँच सौ बरस की मुद्दत का है.

यह उम्मीद करते हुए कि उनको नसीहत हो{46} और अगर न होता कि कभी पहुंचती उन्हें कोई मुसीबत (12)
(12) अज़ाब और सज़ा.

उसके कारण जो उनके हाथों ने आगे भेजा(13)
(13) यानी जो कुफ़्र और गुनाह उन्होंने किया.

तो कहते ऐ हमारे रब तूने क्यों न भेजा हमारी तरफ़ काई रसूल कि हम तेरी आयतों की पैरवी करते और ईमान लाते(14){47}
(14) मानी आयत के ये हैं कि रसूलों का भेजना ही हुज्जत के लिये है कि उन्हें यह बहाना बनाने की गुन्जाइश न रहे कि हमारे पास रसूल नहीं भेजे गए इसलिये गुमराह हो गए. अगर रसूल आते तो हम ज़रूर फ़रमाँबरदार होते और ईमान लाते.

फिर जब उनके पास हक़ आया(15)
(15) यानी सैयद आलम मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

हमारी तरफ़ से, बोले(16)
(16)मक्का के काफ़िर.

उन्हें क्यों न दिया गया जो मूसा को दिया गया(17)
(17) यानी उन्हें क़ुरआने करीम एक साथ क्यों नहीं दिया गया जैसा कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को पूरी तौरात एक ही बार में अता की गई थी. या ये मानी हैं कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को लाठी और चमकती हथैली जैसे चमत्कार क्यों न दिये गए. अल्लाह तआला फ़रमाता है.

क्या उसके इन्कारी न हुए थे जो पहले मूसा को दिया गया (18)
(18) यहूदियों ने क़ुरैश को सन्देश भेजा कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के चमत्कार तलब करें. इसपर यह आयत उतरी और फ़रमाया गया कि जिन यहूदियों ने यह सवाल किया है क्या वो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के और जो उन्हें अल्लाह की तरफ़ से दिया गया है उसके इन्कारी न हुए.

बोले दो जादू है एक दूसरे की पुश्ता (सहायता) पर और बोले हम दोनों के इन्कारी हैं(19){48}
(19) यानी तौरात के भी और क़ुरआन के भी. इन दोनों को उन्होंने जादू कहा और एक क़िरअत में “साहिरान” है. उस सूरत में मानी ये होंगे कि दोनों जादूगर हैं यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम. मक्का के मुश्रि कों ने मदीना के यहूदियों के सरदारों के पास एलची भेजकर पूछा कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के बारे में पिछली किताबों में कोई ख़बर हैं. उन्होंने जवाब दिया कि हाँ हुज़ूर की तारीफ़ और गुणगान उनकी किताब तौरात में मौजूद है. जब यह ख़बर क़ुरैश को पहुंची तो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की निस्बत कहने लगे कि वो दोनों जादूगर हैं. उन में एक दूसरे का सहायक और मददगार है. इसपर अल्लाह तआला ने फ़रमाया.

तुम फ़रमाओ तो अल्लाह के पास से कोई किताब ले आओ जो इन दोनों किताबों से ज़्यादा हिदायत की हो(20)
(20) यानी तौरात और क़ुरआन से.

मैं उसकी पैरवी (अनुकरण) करूंगा अगर तुम सच्चे हो(21){49}
(21) अपने इस क़ौल में कि ये दोनों जादूगर हैं. इसमें चेतावनी है कि वो इसकी जैसी किताब लाने से मजबूर हैं चुनांन्चे आगे इरशाद फ़रमाया जाता है.

फिर अगर वो तुम्हारा फ़रमाना क़ुबूल न करें(22)
(22) और ऐसी किताब न ला सकें.

तो जान लो कि (23)
(23) उनके पास कोई तर्क, कोई  हुज्जत नहीं है.
बस वो अपनी ख़्वाहिशों के पीछे है, और उससे बढकर गुमराह कौन जो अपनी ख़्वाहिश की पैरवी (अनुकरण) करे अल्लाह की हिदायत से जुदा, बेशक अल्लाह हिदायत नहीं फ़रमाता ज़ालिम लोगों को{50}

28 – सूरए क़सस- छटा रूकू

28 – सूरए क़सस- छटा रूकू


۞ وَلَقَدْ وَصَّلْنَا لَهُمُ الْقَوْلَ لَعَلَّهُمْ يَتَذَكَّرُونَ
الَّذِينَ آتَيْنَاهُمُ الْكِتَابَ مِن قَبْلِهِ هُم بِهِ يُؤْمِنُونَ
وَإِذَا يُتْلَىٰ عَلَيْهِمْ قَالُوا آمَنَّا بِهِ إِنَّهُ الْحَقُّ مِن رَّبِّنَا إِنَّا كُنَّا مِن قَبْلِهِ مُسْلِمِينَ
أُولَٰئِكَ يُؤْتَوْنَ أَجْرَهُم مَّرَّتَيْنِ بِمَا صَبَرُوا وَيَدْرَءُونَ بِالْحَسَنَةِ السَّيِّئَةَ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ
وَإِذَا سَمِعُوا اللَّغْوَ أَعْرَضُوا عَنْهُ وَقَالُوا لَنَا أَعْمَالُنَا وَلَكُمْ أَعْمَالُكُمْ سَلَامٌ عَلَيْكُمْ لَا نَبْتَغِي الْجَاهِلِينَ
إِنَّكَ لَا تَهْدِي مَنْ أَحْبَبْتَ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ يَهْدِي مَن يَشَاءُ ۚ وَهُوَ أَعْلَمُ بِالْمُهْتَدِينَ
وَقَالُوا إِن نَّتَّبِعِ الْهُدَىٰ مَعَكَ نُتَخَطَّفْ مِنْ أَرْضِنَا ۚ أَوَلَمْ نُمَكِّن لَّهُمْ حَرَمًا آمِنًا يُجْبَىٰ إِلَيْهِ ثَمَرَاتُ كُلِّ شَيْءٍ رِّزْقًا مِّن لَّدُنَّا وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
وَكَمْ أَهْلَكْنَا مِن قَرْيَةٍ بَطِرَتْ مَعِيشَتَهَا ۖ فَتِلْكَ مَسَاكِنُهُمْ لَمْ تُسْكَن مِّن بَعْدِهِمْ إِلَّا قَلِيلًا ۖ وَكُنَّا نَحْنُ الْوَارِثِينَ
وَمَا كَانَ رَبُّكَ مُهْلِكَ الْقُرَىٰ حَتَّىٰ يَبْعَثَ فِي أُمِّهَا رَسُولًا يَتْلُو عَلَيْهِمْ آيَاتِنَا ۚ وَمَا كُنَّا مُهْلِكِي الْقُرَىٰ إِلَّا وَأَهْلُهَا ظَالِمُونَ
وَمَا أُوتِيتُم مِّن شَيْءٍ فَمَتَاعُ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَزِينَتُهَا ۚ وَمَا عِندَ اللَّهِ خَيْرٌ وَأَبْقَىٰ ۚ أَفَلَا تَعْقِلُونَ

और बेशक हमने उनके लिये बात मुसलसल उतारी(1)
(1) यानी क़ुरआन शरीफ़ उनके पास धीरे-धीरे लगातार आया, वादे और डर, और क़िस्से और नसीहतें और उपदेश ताकि समझें और ईमान लाएं.

कि वो ध्यान करें{51} जिनको हमने इससे पहले(2)
(2) यानी क़ुरआन शरीफ़ से, या सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से पहले. यह आयत किताब वालों के मूमिन लोगों हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम और उनके सहाबा के हक़ में उतरी और एक क़ौल यह है कि यह उन इंजील वालों के हक़ में उतरी जो हबशा से आकर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाए. ये चालीस लोग थे जो जअफ़र बिन अबी तालिब के साथ आए थे. जब उन्होंने मुसलमानो की हाजत और रोज़ी की तंगी देखी तो बारगाहे रिसालत में अर्ज़ किया कि हमारे पास माल हैं, हुज़ूर इजाज़त दें तो हम वापस जाकर अपने माल ले आएं और उनसे मुसलमानों की ख़िदमत करें. हुज़ूर ने इजाज़त दे दी और वो जाकर अपने माल ले आए और उनसे मुसलमानों की ख़िदमत की. उनके हक़ में यह आयतें “मिम्मा रज़क़नाहुम युनफ़िक़ून” तक उतरीं. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि ये आयतें अस्सी एहले किताब के हक़ में उतरीं जिन में चालीस नजरान के और बत्तीस हबशा के और आठ शाम के थे.

किताब दी वो इसपर ईमान लाते हैं{52} और जब उनपर ये आयतें पढ़ी जाती हैं कहते हैं हम इसपर ईमान लाए बेशक यही सत्य है हमारे रब के पास से हम इससे पहले ही गर्दन रख चुके थे(3){53}
(3) यानी क़ुरआन उतरने से पहले ही हम अल्लाह के हबीब मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान रखते थे कि वो सच्चे नबी हें क्योंकि तौरात और इंजील में उनका ज़िक्र है.

उनको उनका बदला दोबाला दिया जाएगा (4)
(4) क्योंकि वह पहली किताब पर भी ईमान लाए और क़ुरआने पाक पर भी.

बदला उनके सब्र का (5)
(5) कि उन्होंने अपने दीन पर सब्र किया और मुश्रिकों की तकलीफ़ पर भी. बुखारी और मुस्लिम की हदीस में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि तीन क़िस्म के लोग ऐसे हैं जिन्हें दो अज्र मिलेंगे. एक पहले किताब का वह व्यक्ति जो अपने नबी पर भी ईमान लाया और मुझ पर भी. दूसरा वह ग़ुलाम जिसने अल्लाह का हक़ भी अदा किया और अपने मालिक का भी, तीसरा वह जिसके पास दासी थी जिससे क़ुर्बत करता था फिर उसको अच्छी तरह अदब सिखाया, अच्छी तालीम दी और आज़ाद करके उससे निकाह किया, उसके लिये भी दो अज्र हैं.

और वो भलाई से बुराई को टालते हैं(6)
(6) ताअत से गुनाह को और इल्म से यातना या तकलीफ़ को. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि तौहीद की शहादत यानी अशहदो अन ला इलाहा इल्लल्लाह से शिर्क को.

और हमारे दिये से कुछ हमारी राह में ख़र्च करते हैं(7){54}
(7) ताअत में यानी सदक़ा करते हैं.

और जब बेहूदा बात सुनते हैं उससे तग़ाफ़ुल करते (मुंह फेरते) हैं(8)
(8) मुश्रिक लोग मक्कए मुकर्रमा ईमानदारों को उनका दीन छोड़ने और इस्लाम क़ुबूल करने पर गालियाँ देते और बुरा कहते. ये लोग उनकी बेहूदा बातें सुनकर टाल जाते.

और कहते हैं हमारे लिये हमारे कर्म और तुम्हारे लिये तुम्हारे कर्म, बस तुम पर सलाम(9)
(9) यानी हम तुम्हारी बेहूदा बातों और गालियों के जवाब में गालियाँ नहीं देंगे. यह आयत जिहाद की आयत द्वारा स्थगित कर दी गई.

हम ज़ाहिलों के गर्ज़ी (चाहने वाले) नहीं (10){55}
(10) उनके साथ मेल जोल उठना बैठना नहीं चाहते, हमें जिहालत की हरकतें गवारा नहीं.

बेशक यह नहीं कि तुम जिसे अपनी तरफ़े से चाहो हिदायत कर दो, हाँ अल्लाह हिदायत फ़रमाता है जिसे चाहे और वह ख़ूब जानता है हिदायत वालों को (11){56}
(11)  जिनके लिये उसने हिदायत लिख दी जो दलीलों से सबक़ लेने और सच बात मानने वाले हैं. मुस्लिम शरीफ़ में हज़रत अबू हुरैरह रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि यह आयत अबू तालिब के हक़ में उतरी. नबी करीम सल्लल्लाहो अलैहक वसल्लम ने उनसे उनकी मौत के वक़्त फ़रमाया ऐ चचा कहो लाइलाहा इल्लल्लाहा. मैं तुम्हारे लिये क़यामत के दिन गवाह रहूंगा. उन्होंने कहा कि अगर मुझे क़ुरैश के शर्म दिलाने का डर न होता तो मैं ज़रूर ईमान लाकर तुम्हारी आँखें ठण्डी करता. इसके बाद उन्होंने यह शेअर पढे.

    व लक़द अलिम्तो विअन्ना दीना मुहम्मदिन
मिन खै़रे अदियानिल बरिय्यते दीना
लौलल मलामतो औ हिज़ारों मुसव्वतिन
ल-वजद-तनी समुहम विज़ाका मुबीना.

यानी मैं यक़ीन से जानता हूँ कि मुहम्मद का दीन सारे जगत के दीनों से बेहतर है. अगर मलामत  और बदगोई का अन्देशा न होता तो मैं निहायत सफ़ाई के साथ इस दीन को क़ुबूल करता. इसके बाद अबू तालिब का इन्तिक़ाल हो गया. इस पर यह आयत उतरी.

और कहते हैं अगर हम तुम्हारे साथ हिदायत का अनुकरण करें तो लोग हमारे मुल्क से हमें उचक ले जाएंगे(12)
(12) यानी अरब प्रदेश से एक दम निकाल देंगे, यह आयत हारिस बिन उस्मान बिन नौफ़ल बिन अब्दे मनाफ़ के हक़ में उतरी. उसने रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा था कि हम यह तो यक़ीन से जानते हैं कि जो आप फ़रमाते हैं वह सत्य है लेकिन अगर हम आपका अनुकरण करें तो  हमें डर है कि अरब के लोग हमें शहर से निकाला देंगे और हमारे वतन में न रहने देंगे. इस आयत में इसका जवाब दिया गया.

क्या हमने उन्हें जगह न दी अमान वाली, हरम में(13)
(13) जहाँ के रहने वाले मार काट से अम्न में हैं और जहाँ जानवरों और हरियाली तक को अम्न है.

जिस की तरफ़ हर चीज़ के फल लाए जाते हैं हमारे पास की रोज़ी लेकिन उनमें बहुतों को इल्म नहीं (14){57}
(14) और वो अपनी जिहालत से नहीं जानते कि यह रोज़ी अल्लाह तआला की तरफ़ से है और अगर समझ होती तो जानते कि ख़ौफ़ और अम्न भी उसी की तरफ़ से है और ईमान लोने में शहर निकाले का ख़ौफ़ न करते.

और कितने शहर हमने हलाक कर दिये जो अपने ऐश (विलास) पर इतरा गए थे, (15)
(15) और उन्हों ने सरकशी इख़्तियार की थी कि अल्लाह तआला की दी गई रोज़ी खाते हैं और पूजते हैं बुतों को. मक्का वालों को ऐसी क़ौम के बुरे परिणाम से डर दिलाया जाता है, जिनका हाल उनकी तरह था कि अल्लाह तआला की नेअमतें पाते और शुक्र न करते. इन नेअमतों पर इतराते, वो हलाक कर दिये गए.

तो ये हैं उनके मकान(16)
(16) जिनके निशान बाक़ी हैं और अरब के लोग अपनी यात्राओं में उन्हें देखते हैं.

कि उनके बाद इन में सुकूनत न हुई मगर कम(17)
(17) कि कोई मुसाफ़िर या राहगीर उनमें थोड़ी देर के लिये ठहर जाता है फिर खाली पड़े रहते हैं.

और हमीं वारिस हैं (18){58}
(18)उन मकानों के, यानी वहाँ के रहने वाले ऐसे हलाक हुए कि उनके बाद उनका कोई उत्तराधिकारी बाक़ी न रहा. अब अल्लाह के सिवा उन मकानों का कोई वारिस नहीं. ख़ल्क़ (सृष्टि) की फ़ना के बाद वही सब का वारिस है.

और तुम्हारा रब शहरों को हलाक नहीं करता जब तक उनके अस्ल मरजेअ(केन्द्र) में रसूल न भेजे (19)
(19) यानी केन्द्रीय स्थान में, कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा कि उम्मुल क़ुरा से मुराद मक्कए मुकर्रमा है और रसूल से मुराद ख़ातिमून नबीय्यीन सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

जो उनपर हमारी आयतें पढ़े(20)
(20) और उन्हें तब्लीग़ करे और ख़बर दे कि अगर वो ईमान न लाएं तो उनपर अज़ाब किया जाएगा ताकि उनपर हुज्जत लाज़िम हो और उनके लिये बहाने की कोई गुंजाइश बाक़ी न रहे.

और हम शहरों को हलाक नहीं करते मगर जब उनके (साकिन) निवासी सितमगर (अत्याचारी) हों(21){59}
(21) रसूल को झुटलाते हों, अपेन कुफ़्र पर अड़े हों और इस कारण अज़ाब के मुस्तिहिक़ हों.

और जो कुछ चीज़ तुम्हें दी गई है वह दुनियावी ज़िन्दगी का बर्तावा और उसका सिंगार हैं(22)

(22) जिसकी बक़ा बहुत थोड़ी और जिसका अंजाम फ़ना.

और जो अल्लाह के पास है (23)
(23) यानी आख़िरत के फ़ायदे.

वह बेहतर और ज़्यादा बाक़ी रहने वाला(24)
(24) तमाम बुराईयों से खाली, कभी न टूटने वाला.

तो क्या तुम्हें अक़्ल नहीं(25) {60}
(25) कि इतना समझ सको कि बाक़ी, फ़ानी से बेहतर है. इसीलिये कहा गया है कि जो शख़्स आख़िरत को दुनिया पर प्राथमिकता न दे, वह नासमझ है.

28 – सूरए क़सस- सातवाँ रूकू

28 – सूरए क़सस- सातवाँ रूकू

أَفَمَن وَعَدْنَاهُ وَعْدًا حَسَنًا فَهُوَ لَاقِيهِ كَمَن مَّتَّعْنَاهُ مَتَاعَ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ثُمَّ هُوَ يَوْمَ الْقِيَامَةِ مِنَ الْمُحْضَرِينَ
وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ فَيَقُولُ أَيْنَ شُرَكَائِيَ الَّذِينَ كُنتُمْ تَزْعُمُونَ
قَالَ الَّذِينَ حَقَّ عَلَيْهِمُ الْقَوْلُ رَبَّنَا هَٰؤُلَاءِ الَّذِينَ أَغْوَيْنَا أَغْوَيْنَاهُمْ كَمَا غَوَيْنَا ۖ تَبَرَّأْنَا إِلَيْكَ ۖ مَا كَانُوا إِيَّانَا يَعْبُدُونَ
وَقِيلَ ادْعُوا شُرَكَاءَكُمْ فَدَعَوْهُمْ فَلَمْ يَسْتَجِيبُوا لَهُمْ وَرَأَوُا الْعَذَابَ ۚ لَوْ أَنَّهُمْ كَانُوا يَهْتَدُونَ
وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ فَيَقُولُ مَاذَا أَجَبْتُمُ الْمُرْسَلِينَ
فَعَمِيَتْ عَلَيْهِمُ الْأَنبَاءُ يَوْمَئِذٍ فَهُمْ لَا يَتَسَاءَلُونَ
فَأَمَّا مَن تَابَ وَآمَنَ وَعَمِلَ صَالِحًا فَعَسَىٰ أَن يَكُونَ مِنَ الْمُفْلِحِينَ
وَرَبُّكَ يَخْلُقُ مَا يَشَاءُ وَيَخْتَارُ ۗ مَا كَانَ لَهُمُ الْخِيَرَةُ ۚ سُبْحَانَ اللَّهِ وَتَعَالَىٰ عَمَّا يُشْرِكُونَ
وَرَبُّكَ يَعْلَمُ مَا تُكِنُّ صُدُورُهُمْ وَمَا يُعْلِنُونَ
وَهُوَ اللَّهُ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ لَهُ الْحَمْدُ فِي الْأُولَىٰ وَالْآخِرَةِ ۖ وَلَهُ الْحُكْمُ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِن جَعَلَ اللَّهُ عَلَيْكُمُ اللَّيْلَ سَرْمَدًا إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ مَنْ إِلَٰهٌ غَيْرُ اللَّهِ يَأْتِيكُم بِضِيَاءٍ ۖ أَفَلَا تَسْمَعُونَ
قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِن جَعَلَ اللَّهُ عَلَيْكُمُ النَّهَارَ سَرْمَدًا إِلَىٰ يَوْمِ الْقِيَامَةِ مَنْ إِلَٰهٌ غَيْرُ اللَّهِ يَأْتِيكُم بِلَيْلٍ تَسْكُنُونَ فِيهِ ۖ أَفَلَا تُبْصِرُونَ
وَمِن رَّحْمَتِهِ جَعَلَ لَكُمُ اللَّيْلَ وَالنَّهَارَ لِتَسْكُنُوا فِيهِ وَلِتَبْتَغُوا مِن فَضْلِهِ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ فَيَقُولُ أَيْنَ شُرَكَائِيَ الَّذِينَ كُنتُمْ تَزْعُمُونَ
وَنَزَعْنَا مِن كُلِّ أُمَّةٍ شَهِيدًا فَقُلْنَا هَاتُوا بُرْهَانَكُمْ فَعَلِمُوا أَنَّ الْحَقَّ لِلَّهِ وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا يَفْتَرُونَ

तो कहा वह जिसे हमने अच्छा वादा दिया(1)
(1) जन्नत का सवाब.

तो वह उससे मिलेगा उस जैसा हमने दुनियावी ज़िन्दगी का बर्ताव बरतने दिया फिर वह क़यामत के दिन गिरफ़्तार करके हाज़िर लाया जाएगा(2){61}
(2) ये दोनों हरगिज़ बराबर नहीं हो सकते. इन में पहला, जिसे अच्छा वादा दिया गया, मूमिन है और दूसरा काफ़िर.

और जिस दिन उन्हें पुकारेगा(3)
(3) अल्लाह तआला, धिक्कार के तौर पर.

तो फ़रमाएगा कहाँ है मेरे वो शरीक जिन्हें तुम(4)
(4) दुनिया में मेरा शरीक़.

गुमान करते थे {62} कहेंगे कि वो जिनपर बात साबित हो चुकी(5)
(5)  यानी अज़ाब वाजिब हो चुका और वो लोग गुमराहों के सरदार और कुफ़्र के अगुवा है.

ऐ हमारे रब ये हैं वो जिन्हें हमने गुमराह किया हमने इन्हें गुमराह किया जैसे ख़ुद गुमराह हुए थे(6)
(6) यानी वो लोग हमारे बहकाने से, अपनी मर्ज़ी से गुमराह हुए. हमारी उनकी गुमराही में कोई फ़र्क नहीं, हमने उन्हें मजबूर न किया था.

हम इन से बेज़ार होकर तेरी तरफ़ रूजु लाते (पलटते) हैं वो हम को न पूजते थे(7){63}
(7)  बल्कि वो अपनी ख़्वाहिशों के पुजारी और अपनी वासनाओं के आधीन थे.

और उनसे फ़रमाया जाएगा अपने शरीकों को पुकारो(8)
(8) यानी काफ़िरों से फ़रमाया जाएगा कि अपने बुतों को पुकारों, वो तुम्हें अज़ाब से बचाएं.

तो वो पुकारेंगे तो वो उनकी न सुनेंगे और देखेंगे अज़ाब, क्या अच्छा होता अगर वो राह पाते(9){64}
(9) दुनिया में, ताकि आख़िरत में अज़ाब न देखते.

और जिस उन्हें पुकारेगा वो फ़रमाएगा(10)
(10) यानी काफ़िरों से पूछेगा.

तुमने रसूलों को क्या जवाब दिया(11){65}
(11)  जो तुम्हारी तरफ़ भेजे गए थे और सत्य की तरफ़ बुलाते थे.

तो उस दिन उनपर ख़बरें अंधी हो जाएगी(12)
(12) और कोई बहाना और तर्क उन्हें नज़र न आएगा.

कि वो कुछ पूछ गछ न करेंगे (13){66}
(13) और अत्यन्त दहशत से साकित रह जाएंगे या कोई किसी से इसलिये न पूछेगा कि जवाब से लाचार होने में सब के सब बराबर हैं, फ़रमाँबरदार हों या फ़रमान वाले, काफ़िर हों या काफ़िर बनाने वाले.

तो वह जिसने तौबह की(14)
(14) शिर्क से.

और ईमान लाया(15)
(15) अपने रब पर और उस तमाम पर जो रब की तरफ़ से आया.

और अच्छा काम किया क़रीब है कि वह राह पा जाए{67} और तुम्हारा रब पैदा करता है जो चाहे और पसन्द फ़रमाता है(16)
(16) यह आयत मुश्रिकों के जवाब में उतरी जिन्होंने कहा था कि अल्लाह तआला ने हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को नबुव्वत के लिये क्यों बुज़ुर्गी दी. यह क़ुरआन मक्का और ताइफ़ के किसी बड़े व्यक्ति पर क्यों न उतरा. इस क़लाम का क़ायल वलीद बिन मुग़ीरा था और बड़े आदमी से वह अपेन आप को और अर्वा बिन मसऊद सक़फ़ी को मुराद लेता था. और फ़रमाया गया कि रसूलों का भेजना उन लोगों के इख़्तियार से नहीं है. अल्लाह तआला की मर्ज़ी है, अपनी हिकमत वही जानता है. उन्हें उसकी मर्ज़ी में दख़्ल की क्या मजाल.

उनका (17)
(17) यानी मुश्रिकों का.

कुछ इख़्तियार नहीं, पाकी और बरतरी है अल्लाह को उनके शिर्क से{68} और तुम्हारा रब जानता है जो उनके सीनों में छुपा है (18)
(18) यानी कुफ़्र और रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की दुश्मनी, जिसको ये लोग छुपाते हैं.

और जो ज़ाहिर करते हैं (19){69}
(19) अपनी ज़बानों से ख़िलाफ़े वाक़े जैसे कि नबुव्वत में तअने देना और क़ुरआने पाक को झुटलाना.

और वही है अल्लाह कि कोई ख़ुदा नहीं उसके सिवा, उसी की तारीफ़ है दुनिया (20)
(20) कि उसके औलिया दुनिया में भी उसकी हम्द करते हैं और आख़िरत में भी उसकी हम्द से लज़्ज़त उठाते हैं.

और आख़िरत में और उसी का हुक्म है(21)
(21) उसी की मर्ज़ी हर चीज़ में लागू और ज़ारी है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि अपने फ़रमाँबरदारों के लिये मग़फ़िरत का और नाफ़रमानों के लिये शफ़ाअत का हुक्म फ़रमाता है.

और उसी की तरफ़ फिर जाओगे{70} तुम फ़रमाओ (22)
(22) ऐ हबीब सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, मक्का वालों से.

भला देखो तो अगर अल्लाह हमेशा तुमपर क़यामत तक रात रखे(23)
(23) और दिन निकाले ही नहीं.

तो अल्लाह के सिवा कौन ख़ुदा है जो तुम्हें रौशनी ला दे(24)
(24) जिसमें तुम अपनी रोज़ी के काम कर सको.

तो क्या तुम सुनते नहीं(25){71}
(25) होश के कानों से, कि शिर्क से बाज़ आओ.

तुम फ़रमाओ भला देखो तो अगर अल्लाह क़यामत तक हमेशा दिन रखे(26)
(26) रात होने ही न दे.

तो अल्लाह के सिवा कौन ख़ुदा है जो तुम्हें रात लादे जिसमें आराम करो(27)
(27) और दिन में जो काम और मेहनत की थी उसकी थकन दूर करो.

तो क्या तुम्हें सूझता नहीं(28){72}
(28) कि तुम कितनी बड़ी ग़लती में हो जो उसके साथ और को शरीक करते हो.

और उसने अपनी कृपा से तुम्हारे लिये रात और दिन बनाए कि रात में आराम करो और दिन में उसकी मेहरबानी ढूंढो(29)
(29) रोज़ी हासिल करने की कोशिश करो.

और इसलिये कि तुम सत्य मानो(30){73}
(30) और उसकी नेअमतों का शुक्र बजा लाओ.

और जिस दिन उन्हें पुकारेगा तो फ़रमाएगा कि कहाँ है मेरे वो शरीक जो तुम बकते थे{74} और हर गिरोह में से हम एक गवाह निकाल कर(31)
(31) यहाँ गवाह से रसूल मुराद है जो अपनी अपनी उम्मतों पर शहादत देंगे कि उन्हों ने उन्हें रब के संदेश पहुंचाए और नसीहतें कीं.

फ़रमाएंगे अपनी दलील लाओ (32)
(32) यानी शिर्क और रसूलों का विरोध तुम्हारा तरीक़ा था, इसपर क्या दलील है, पेश करो.

तो जान लेंगे(33)
(33) रब होने और मअबूद होने का….

कि  हक़ अल्लाह का है और उन से खोई जाएंगी जो बनावटें करते थे(34){75}
(34) दुनिया में कि अल्लाह तआला के साथ शरीक ठहराते थे.