56.Surah Al-Waqia

56 सूरए वाक़िआ

56|1|بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ إِذَا وَقَعَتِ الْوَاقِعَةُ
56|2|لَيْسَ لِوَقْعَتِهَا كَاذِبَةٌ
56|3|خَافِضَةٌ رَّافِعَةٌ
56|4|إِذَا رُجَّتِ الْأَرْضُ رَجًّا
56|5|وَبُسَّتِ الْجِبَالُ بَسًّا
56|6|فَكَانَتْ هَبَاءً مُّنبَثًّا
56|7|وَكُنتُمْ أَزْوَاجًا ثَلَاثَةً
56|8|فَأَصْحَابُ الْمَيْمَنَةِ مَا أَصْحَابُ الْمَيْمَنَةِ
56|9|وَأَصْحَابُ الْمَشْأَمَةِ مَا أَصْحَابُ الْمَشْأَمَةِ
56|10|وَالسَّابِقُونَ السَّابِقُونَ
56|11|أُولَٰئِكَ الْمُقَرَّبُونَ
56|12|فِي جَنَّاتِ النَّعِيمِ
56|13|ثُلَّةٌ مِّنَ الْأَوَّلِينَ
56|14|وَقَلِيلٌ مِّنَ الْآخِرِينَ
56|15|عَلَىٰ سُرُرٍ مَّوْضُونَةٍ
56|16|مُّتَّكِئِينَ عَلَيْهَا مُتَقَابِلِينَ
56|17|يَطُوفُ عَلَيْهِمْ وِلْدَانٌ مُّخَلَّدُونَ
56|18|بِأَكْوَابٍ وَأَبَارِيقَ وَكَأْسٍ مِّن مَّعِينٍ
56|19|لَّا يُصَدَّعُونَ عَنْهَا وَلَا يُنزِفُونَ
56|20|وَفَاكِهَةٍ مِّمَّا يَتَخَيَّرُونَ
56|21|وَلَحْمِ طَيْرٍ مِّمَّا يَشْتَهُونَ
56|22|وَحُورٌ عِينٌ
56|23|كَأَمْثَالِ اللُّؤْلُؤِ الْمَكْنُونِ
56|24|جَزَاءً بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
56|25|لَا يَسْمَعُونَ فِيهَا لَغْوًا وَلَا تَأْثِيمًا
56|26|إِلَّا قِيلًا سَلَامًا سَلَامًا
56|27|وَأَصْحَابُ الْيَمِينِ مَا أَصْحَابُ الْيَمِينِ
56|28|فِي سِدْرٍ مَّخْضُودٍ
56|29|وَطَلْحٍ مَّنضُودٍ
56|30|وَظِلٍّ مَّمْدُودٍ
56|31|وَمَاءٍ مَّسْكُوبٍ
56|32|وَفَاكِهَةٍ كَثِيرَةٍ
56|33|لَّا مَقْطُوعَةٍ وَلَا مَمْنُوعَةٍ
56|34|وَفُرُشٍ مَّرْفُوعَةٍ
56|35|إِنَّا أَنشَأْنَاهُنَّ إِنشَاءً
56|36|فَجَعَلْنَاهُنَّ أَبْكَارًا
56|37|عُرُبًا أَتْرَابًا
56|38|لِّأَصْحَابِ الْيَمِينِ

सूरए वाक़िआ मक्का में उतरी, इसमें 96 आयतें, तीन रूकू हैं.
-पहला रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए वाक़िआ मक्की है सिवाय आयत “अफ़-बिहाज़ल हदीसे” और आयत “सुल्लतुम मिनल अव्वलीना” के. इस सूरत में तीन रूकू और छियानवे या सत्तानवे या निनानवे आयतें, तीन सौ अठहत्तर कलिमे और एक हज़ार सात सौ तीन अक्षर हैं. इमाम बग़वी ने एक हदीस रिवायत की है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि जो शख़्स हर रात सूरए वाक़िआ को पढ़े वह फ़ाक़े से हमेशा मेहफ़ूज़ रहेगा. (ख़ाज़िन)

जब होलेगी वह होने वाली(2){1}
(2) यानी जब क़यामत क़ायम हो जो ज़रूर होने वाली है.

उस वक़्त उसके होने में किसी इन्कार की गुन्जायश न होगी {2} किसी को पस्त करने वाली(3)
(3) जहन्नम में गिरा कर.

किसी को बलन्दी देने वाली (4){3}
(4) जन्नत में दाख़िले के साथ. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि जो लोग दुनिया में ऊंचे थे क़यामत उन्हें पस्त करेगी और जो दुनिया में पस्त में थे उनके दर्जे बलन्द करेगी और यह भी कहा गया है कि गुनाहगारों को पस्त करेगी और फ़रमाँबरदारों को बलन्द.

जब ज़मीन कांपेगी थरथरा कर (5){4}
(5) यहाँ तक कि उसकी सारी इमारतें गिर जाएंगी.

और पहाड़ रेज़ा रेज़ा हो जाएंगे चूरा होकर {5} तो हो जाएंगे जैसे रौज़न की धूप में ग़ुबार के बारीक ज़र्रे फैले हुए {6} और तुम तीन क़िस्म के हो जाओगे {7} तो दाएं तरफ़ वाले(6)
(6) यानी जिनके आमालनामें उनके दाएं हाथ में दिये जाएंगे.

कैसे दाएं तरफ़ वाले(7){8}
(7) यह उनकी शान की ताज़ीम के लिये फ़रमाया. वो बड़ी शान रखते हैं, सईद हैं, जन्नत में दाख़िल होंगे.

और बाईं तरफ़ वाले(8)
(8) जिनके आमालनामे बाएं हाथ में दिये जाएंगे.

कैसे बाई तरफ़ वाले(9){9}
(9) यह उनकी ज़िल्लत के लिये फ़रमाया कि वो शक़ी हैं जहन्नम में दाख़िल होंगे.

और जो सबक़त ले गए(10)
(10) नेकियों में.

वो तो सबक़त ही ले गए(11) {10}
(11) जन्नत में दाख़िल होने में. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि वो हिजरत में पहल करने वाले हैं कि आख़िरत में जन्नत की तरफ़ पहल करेंगे. एक क़ौल यह है कि वो इस्लाम की तरफ़ पहल करने वाले हैं और एक क़ौल यह है कि वो मुहाजिरीन और अन्सार हैं, जिन्होंने दोनों क़िबलों की तरफ़ नमाज़ें पढ़ीं.

वही बारगाह के मुक़र्रब है {11} चैन के बाग़ों में {12} अगलों में से एक गिरोह {13} और पिछलों में से थोड़े (12){14}
(12) यान साबिक़ीन. अगलों में से बहुत हैं और पिछलों में से थोड़े और अगलों में से मुराद या तो पहली उम्मतें हैं हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के ज़माने से हमारे हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ज़माने तक की, जैसा कि अक्सर मुफ़स्सिरों का क़ौल है. लेकिन यह क़ौल निहायत ज़ईफ़ है. अगरचे मुफ़स्सिरों ने इसके ज़ईफ़ होने के कारण में बहुत सी तौजीहात की हैं. सही बात तफ़सीर में यह है कि अगलों से उम्मतें मुहम्मदिया ही के पहले लोग, मुहाजिरीन व अन्सार में से जो साबिक़ीने अव्वलीन हैं वो मुराद है और पिछलों से उनके बाद वाले. हदीसों से भी इसकी ताईद होती है. मरफ़ूअ हदीस में है कि अव्वलीन व आख़िरीन यहाँ इसी उम्मत के पहले और पिछले हैं और यह भी रिवायत है कि हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि दोनों गिरोह मेरी ही उम्मत के हैं. (तफ़सीरे कबीर, वहरूल-उलूम वग़ैरह)

जड़ाऊ तख़्तों पर होंगे(13){15}
(13) जिनमें लअल, याक़ूत, मोती वग़ैरह जवाहिरात जड़े होंगे.

उनपर तकिया लगाए हुए आमने सामने (14) {16}
(14) बड़े आराम के साथ, शान व शौकत से एक दूसरे को देखकर ख़ुश होंगे.

उनके गिर्द लिये फिरेंगे(15)
(15)ख़िदमत के आदाब के साथ.

हमेशा रहने वाले लड़के (16) {17}
(16) जो न मरें न बूढें हो न उनमें बदलाव आए. यह अल्लाह तआला ने जन्नत वालों की ख़िदमत के लिये जन्नत में पैदा फ़रमाए.

कूज़े और आफ़ताबे और जाम और आँखों के सामने बहती शराब की उससे न उन्हें सरदर्द हो {18} न होश में फ़र्क़ आए(17){19}
(17) दुनिया की शराब के विपरीत कि उसके पीने से होश व हवास बिगड़ जाते हैं.

और मेवे जो पसन्द करें {20} और परिन्दों का गोश्त जो चाहें (18){21}
(18) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया अगर जन्नती को परिन्दों के गोश्त की ख़्वाहिश होगी तो उसकी इच्छानुसार पक्षी उड़ता हुआ सामने आएगा और रकाबी में आकर पेश होगा, उसमें से जितना चाहे खाएगा फिर वह उड़ जाएगा.(ख़ाज़िन)

और बड़ी आँख वालियाँ हूरें (19){22}
(19) उनके लिये होंगे.

जैसे छुपे रखे हुए मोती(20){23}
(20) यानी जैसा मोती सीपी में छुपा होता है कि न तो उसे किसी के हाथ ने छुआ न धूप और हवा लगी. उसकी सफ़ाई अपनी चरम सीमा पर है. इस तरह वो हूरें अछूती होंगी. यह भी रिवायत है कि हूरों की मुस्कान से जन्नत में नूर चमकेगा और जब वो चलेंगी तो उनके हाथों और पाँव के ज़ेवरों से तक़दीस व तमजीद की आवाज़ें आएंगी और याक़ूती हार उनकी गर्दनों के सौंदर्य से ख़ूब हंसेंगे.

सिला उनके कर्मों का (21){24}
(21) कि दुनिया में उन्होंने फ़रमाँबरदारी की.

उसमें न सुनेंगे न कोई बेकार बात न गुनहगारी (22){25}
(22) यानी जन्नत में कोई नागवार और ग़लत बात सुनने में न आएगी.

हाँ यह कहना होगा सलाम सलाम (23) {26}
(23) जन्नती आपस में एक दूसरे को सलाम करेंगे. फ़रिश्ते जन्नत वालों को सलाम करेंगे. अल्लाह तआला की तरफ़ से उनकी तरफ़ सलाम आएगा. यह हाल तो साबिक़ीन मुक़र्रबीन का था. इसके बाद जन्नतियों के दूसरे गिरोह असहाबे यमीन का ज़िक्र फ़रमाया जाता है.

और दाहिनी तरफ़ वाले, कैसे दाहिनी तरफ़ वाले(24) {27}
(24) उनकी अनोखी शान है कि अल्लाह के हुज़ूर इज़्ज़त और बुज़ुर्गी वाले हैं.

बेकाँटे की बेरियों में {28} और केले के गुच्छों में (25){29}
(25) जिनके दरख़्त जड़ से चोटी तक फलों से भरे होंगे.

और हमेशा के साए में {30} और हमेशा जारी पानी में {31} और बहुत से मेवों में {32} जो न ख़त्म हों (26)
(26) जब कोई फल तोड़ा जाए, फ़ौरन उसकी जगह वैसे ही दो मौजूद.

और न रोके जाएं (27){33}
(27) जन्नत वाले फ़लों के लेने से.

और बलन्द बिछौनों में (28){34}
(28) जो सजे सजाए ऊंचे तख़्तों पर होंगे और यह भी कहा गया है कि बिछौनों से मुराद औरतें हैं. इस सूरत में मानी ये होंगे कि औरतें फ़ज़्ल और जमाल में बलन्द दर्जा रखती होंगी.

बेशक हमने उन औरतों को अच्छी उठान उठाया {35} तो उन्हें बनाया कुंवारियाँ {36} अपने शौहर पर प्यारियाँ, उन्हें प्यार दिलातियाँ एक उम्र वालियाँ (29){37} दाईं तरफ़ वालों के लिये{38}
(29) जवान और उनके शौहर भी जवान और यह जवानी हमेशा क़ायम रहने वाली.

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56-Surah Al-Waqia

56 सूरए वाक़िआ -दूसरा रूकू

56|39|ثُلَّةٌ مِّنَ الْأَوَّلِينَ
56|40|وَثُلَّةٌ مِّنَ الْآخِرِينَ
56|41|وَأَصْحَابُ الشِّمَالِ مَا أَصْحَابُ الشِّمَالِ
56|42|فِي سَمُومٍ وَحَمِيمٍ
56|43|وَظِلٍّ مِّن يَحْمُومٍ
56|44|لَّا بَارِدٍ وَلَا كَرِيمٍ
56|45|إِنَّهُمْ كَانُوا قَبْلَ ذَٰلِكَ مُتْرَفِينَ
56|46|وَكَانُوا يُصِرُّونَ عَلَى الْحِنثِ الْعَظِيمِ
56|47|وَكَانُوا يَقُولُونَ أَئِذَا مِتْنَا وَكُنَّا تُرَابًا وَعِظَامًا أَإِنَّا لَمَبْعُوثُونَ
56|48|أَوَآبَاؤُنَا الْأَوَّلُونَ
56|49|قُلْ إِنَّ الْأَوَّلِينَ وَالْآخِرِينَ
56|50|لَمَجْمُوعُونَ إِلَىٰ مِيقَاتِ يَوْمٍ مَّعْلُومٍ
56|51|ثُمَّ إِنَّكُمْ أَيُّهَا الضَّالُّونَ الْمُكَذِّبُونَ
56|52|لَآكِلُونَ مِن شَجَرٍ مِّن زَقُّومٍ
56|53|فَمَالِئُونَ مِنْهَا الْبُطُونَ
56|54|فَشَارِبُونَ عَلَيْهِ مِنَ الْحَمِيمِ
56|55|فَشَارِبُونَ شُرْبَ الْهِيمِ
56|56|هَٰذَا نُزُلُهُمْ يَوْمَ الدِّينِ
56|57|نَحْنُ خَلَقْنَاكُمْ فَلَوْلَا تُصَدِّقُونَ
56|58|أَفَرَأَيْتُم مَّا تُمْنُونَ
56|59|أَأَنتُمْ تَخْلُقُونَهُ أَمْ نَحْنُ الْخَالِقُونَ
56|60|نَحْنُ قَدَّرْنَا بَيْنَكُمُ الْمَوْتَ وَمَا نَحْنُ بِمَسْبُوقِينَ
56|61|عَلَىٰ أَن نُّبَدِّلَ أَمْثَالَكُمْ وَنُنشِئَكُمْ فِي مَا لَا تَعْلَمُونَ
56|62|وَلَقَدْ عَلِمْتُمُ النَّشْأَةَ الْأُولَىٰ فَلَوْلَا تَذَكَّرُونَ
56|63|أَفَرَأَيْتُم مَّا تَحْرُثُونَ
56|64|أَأَنتُمْ تَزْرَعُونَهُ أَمْ نَحْنُ الزَّارِعُونَ
56|65|لَوْ نَشَاءُ لَجَعَلْنَاهُ حُطَامًا فَظَلْتُمْ تَفَكَّهُونَ
56|66|إِنَّا لَمُغْرَمُونَ
56|67|بَلْ نَحْنُ مَحْرُومُونَ
56|68|أَفَرَأَيْتُمُ الْمَاءَ الَّذِي تَشْرَبُونَ
56|69|أَأَنتُمْ أَنزَلْتُمُوهُ مِنَ الْمُزْنِ أَمْ نَحْنُ الْمُنزِلُونَ
56|70|لَوْ نَشَاءُ جَعَلْنَاهُ أُجَاجًا فَلَوْلَا تَشْكُرُونَ
56|71|أَفَرَأَيْتُمُ النَّارَ الَّتِي تُورُونَ
56|72|أَأَنتُمْ أَنشَأْتُمْ شَجَرَتَهَا أَمْ نَحْنُ الْمُنشِئُونَ
56|73|نَحْنُ جَعَلْنَاهَا تَذْكِرَةً وَمَتَاعًا لِّلْمُقْوِينَ

56|74|فَسَبِّحْ بِاسْمِ رَبِّكَ الْعَظِيمِ

अगलों में से एक गिरोह {39} और पिछलों में से एक गिरोह (1){40}
(1) यह असहाबे यमीन के दो गिरोहो का बयान है कि वो इस उम्मत के पहले पिछले दोनों गिरोहों में से होंगे. पहले गिरोह तो असहाबे रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हैं और पिछले उनके बाद वाले. इससे पहले रूकू में साबिक़ीने मुकर्रबीन की दो जमाअतों का ज़िक्र था और इस आयत में असहाबे यमीन के दो गिरोहों का बयान है.

और बाईं तरफ़ वाले(2)
(2) जिनके आमालनामें बाएं हाथ में दिये जाएंगे.

कैसे बाईं तरफ़ वाले(3){41}
(3) उनका हाल शक़ावत में अजीब है. उनके अज़ाब का बयान फ़रमाया जाता है कि वो इस हाल में होंगे.

जलती हवा और खौलते पानी में {42} और जलते धुंएं की छाँव में (4){43}
(4) जो अत्यन्त काला और अंधेरा होगा.

जो न ठण्डी न इज़्ज़त की {44} बेशक वो उससे पहले (5)
(5) दुनिया के अन्दर.

नेअमतों में थे {45} और उस बड़े गुनाह की(6)
(6) यानी शिर्क की.

हठ रखते थे {46} और कहते थे क्या जब हम मर जाएं और हड्डियाँ मिट्टी हो जाएं तो क्या ज़रूर हम उठाए जाएंगे {47} और क्या हमारे अगले बाप दादा भी {48} तुम फ़रमाओ बेशक सब अगले और पिछले {49} ज़रूर इकट्ठे किये जाएंगे, एक जाने हुए दिन की मीआद पर (7){50}
(7) वह क़यामत का दिन है.
फिर बेशक तुम ऐ गुमराहो(8)
(8) सच्चाई की राह से बहकने वालों और हक़ को.

झुटलाने वालो {51} ज़रूर थूहड़ के पेड़ में से खाओगे {52} फिर उससे पेट भरोगे {53} फिर उस पर खौलता पानी पियोगे {54} फिर ऐसा पियोगे जैसे सख़्त प्यासे ऊंट पियें(9){55}
(9) उनपर ऐसी भूल मुसल्लत की जाएगी कि वो बेचैन होकर जहन्नम का जलता थूहड़ खाएंगे फिर जब उससे पेट भर लेंगे तो उनपर प्यास मुसल्लत की जाएगी जिससे बेताब होकर ऐसा खौलता पानी पियेंगे जो आँते काट डालेगा.

यह उनकी मेहमानी है इन्साफ़ के दिन {56} हमने तुम्हें पैदा किया (10)
(10) नेस्त से हस्त किया यानी शून्य से अस्तित्व में लाया.

तो तुम क्यों नहीं सच मानते(11){57}
(11) मरने के बाद ज़िन्दा किये जाने को.

तो भला देखो तो वो मनी जो गिराते हो (12) {58}
(12) औरतों के गर्भ में.

क्या तुम उसका आदमी बनाते हो या हम बनाने वाले हैं (13){59}
(13) कि नुत्फ़े को इन्सानी सूरत देते हैं ज़िन्दगी अता फ़रमाते हैं तो मुर्दों को ज़िन्दा करना हमारी क़ुदरत से क्या दूर है.

हमने तुम में मरना ठहराया (14)
(14) अपनी हिकमत और मर्ज़ी के अनुसार उम्रें विभिन्न रखीं. कोई बचपन ही में मरजाता है कोई जवान होकर, कोई अधेड़ उम्र में, कोई बुढ़ापे तक पहुंचता है. जो हम मुक़द्दर करते हैं वही होता है.

और हम इससे हारे नहीं {60} कि तुम जैसे और बदल दें और तुम्हारी सूरतें वह कर दें जिसकी तुम्हें ख़बर नहीं (15) {61}
(15) यानी मस्ख़ करके बन्दर सुअर वग़ैरह की सूरत बना दीं यह सब हमारी क़ुदरत में है.

और बेशक तुम जान चुके हो पहली उठान(16)
(16) कि हमने तुम्हें शून्य से अस्तित्व में लाया.

फिर क्यों नहीं सोचते (17){62}
(17)कि जो नेस्त को हस्त कर सकता है वह यक़ीनन मुर्दे को ज़िन्दा करने पर क़ादिर है.

तो भला बताओ तो जो बोते हो {63} क्या तुम उसकी खेती बनाते हो या हम बनाने वाले हैं (18){64}
(18) इसमें शक नहीं कि बालें बनाना और उसमें दाने पैदा करना अल्लाह तआला ही का काम है और किसी का नहीं.

हम चाहें तो (19)
(19)जो तुम बोते हो.

उसे रौंदन (पामाल) कर दें(20)
(20) ख़ुश्क घास चूरा चूरा जो किसी काम की न रहे.

फिर तुम बातें बनाते रह जाओ (21){65}
(21) आश्चर्य चकित, शर्मिन्दा और दुखी.

कि हम पर चटी पड़ी(22){66}
(22) हमारा माल बेकार ज़ाया हो गया.

बल्कि हम बेनसीब रहे {67} तो भला बताओ तो वह पानी जो पीते हो {68} क्या तुमने उसे बादल से उतारा या हम हैं उतारने वाले (23) {69}
(23) अपनी भरपूर क़ुदरत से.

हम चाहें तो उसे खारी कर दें(24)
(24) कि कोई पी न सके.

फिर क्यों नहीं शुक्र करते(25) {70}
(25) अल्लाह तआला की नेअमत और उसके एहसान और करम का.

तो भला बताओ तो वह आग जो तुम रौशन करते हो(26) {71}
(26) दो गीली लकड़ियों से जिनको ज़न्द व ज़न्दह कहते हैं उनके रगड़ने से आग निकलती है.

क्या तुमने उसका पेड़ पैदा किया(27)
(27) मख़ों ऐफ़ार जिनसे ज़न्द व ज़िन्दा ली जाती है.

या हम हैं पैदा करने वाले {72} हमने उसे (28)
(28) यानी आग को.

जहन्नम का यादगार बनाया(29)
(29) कि देखने वाला उसको देखकर जहन्नम की बड़ी आग को याद करे और अल्लाह तआला से और उसके अज़ाब से डरे.

और जंगल में मुसाफ़िरों का फ़ायदा (30){73} तो ऐ मेहबूब तुम पाकी बोलो अपने अज़मत वाले रब के नाम की {74}
(30) कि अपने सफ़रों में उससे नफ़ा उठाते हैं.

56-Surah Al-Waqia

56 सूरए वाक़िआ -तीसरा रूकू

۞ فَلَا أُقْسِمُ بِمَوَاقِعِ النُّجُومِ
وَإِنَّهُ لَقَسَمٌ لَّوْ تَعْلَمُونَ عَظِيمٌ
إِنَّهُ لَقُرْآنٌ كَرِيمٌ
فِي كِتَابٍ مَّكْنُونٍ
لَّا يَمَسُّهُ إِلَّا الْمُطَهَّرُونَ
تَنزِيلٌ مِّن رَّبِّ الْعَالَمِينَ
أَفَبِهَٰذَا الْحَدِيثِ أَنتُم مُّدْهِنُونَ
وَتَجْعَلُونَ رِزْقَكُمْ أَنَّكُمْ تُكَذِّبُونَ
فَلَوْلَا إِذَا بَلَغَتِ الْحُلْقُومَ
وَأَنتُمْ حِينَئِذٍ تَنظُرُونَ
وَنَحْنُ أَقْرَبُ إِلَيْهِ مِنكُمْ وَلَٰكِن لَّا تُبْصِرُونَ
فَلَوْلَا إِن كُنتُمْ غَيْرَ مَدِينِينَ
تَرْجِعُونَهَا إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
فَأَمَّا إِن كَانَ مِنَ الْمُقَرَّبِينَ
فَرَوْحٌ وَرَيْحَانٌ وَجَنَّتُ نَعِيمٍ
وَأَمَّا إِن كَانَ مِنْ أَصْحَابِ الْيَمِينِ
فَسَلَامٌ لَّكَ مِنْ أَصْحَابِ الْيَمِينِ
وَأَمَّا إِن كَانَ مِنَ الْمُكَذِّبِينَ الضَّالِّينَ
فَنُزُلٌ مِّنْ حَمِيمٍ
وَتَصْلِيَةُ جَحِيمٍ
إِنَّ هَٰذَا لَهُوَ حَقُّ الْيَقِينِ
فَسَبِّحْ بِاسْمِ رَبِّكَ الْعَظِيمِ

तो मुझे क़सम है उन जगहों की जहाँ तारे डूबते हैं(1){75}
(1) कि वो क़ुदरत के ज़ुहूर और अल्लाह के जलाल के मक़ाम हैं.

और तुम समझो तो वह बड़ी क़सम है {76} बेशक यह इज़्ज़त वाला क़ुरआन है(2){77}
(2) जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर उतारा गया क्योंकि यह अल्लाह का कलाम और वही है.

महफ़ूज़ नविश्ते में(3){78}
(3) जिसमें तबदील और तहरीफ़ यानी रद्दोबदल संभव नहीं.

उसे न छुए मगर बावुज़ू (4) {79}
(4) जिसको ग़ुस्ल की हाजत हो या जिसका वुज़ू न हो या हैज़ वाली औरत या निफ़ास वाली, इनमें से किसी को क़ुरआन शरीफ़ का ग़िलाफ़ वग़ैरह बिना कपड़े के छूना जायज़ नहीं. बे-वुज़ू को याद कर यानी मुंह ज़बानी क़ुरआन शरीफ़ पढ़ना जायज़ है लेकिन बेग़ुस्ल और हैज़ वाली को यह भी जायज़ नहीं.

उतारा हुआ है सारे जगत के रब का {80} तो क्या इस बात में तुम सुस्ती करते हो (5){81}
(5) और नहीं मानते.

और अपना हिस्सा यह रखते हो कि झूटलाते हो(6){82}
(6) हज़रत हसन रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया वह बन्दा बड़े टोटे में है जिसका हिस्सा अल्लाह की किताब को झुटलाना हो.

फिर क्यों न हो जब जान गले तक पहुंचे {83} और तुम (7)
(7) ऐ मैयत वालों.

उस वक़्त देख रहे हो {84} और हम(8)
(8) अपने इल्म और क़ुदरत के साथ.

उसके ज़्यादा पास हैं तुमसे मगर तुम्हें निगाह नहीं(9){85}
(9) तुम बसीरत यानी दृष्टि नहीं रखते, तुम नहीं जानते.

तो क्यों न हुआ अगर तुम्हें बदला मिलना नहीं (10){86}
(10) मरने के बाद उठकर.

कि उसे लौटा लाते अगर तुम सच्चे हो(11){87}
(11) काफ़िरों से फ़रमाया गया कि अगर तुम्हारे ख़याल के मुताबिक तुम्हारे मरने के बाद उठना और कर्मो का हिसाब किया जाना और जज़ा देने वाला मअबूद. यह कुछ भी न हो तो फिर क्या कारण है कि जब तुम्हारे प्यारों की रूह हलक़ तक पहुंचती है तो तुम उसे लौटा क्यों नहीं लाते और जब यह तुम्हारे बस में नहीं तो समझ लो कि काम अल्लाह तआला के इख़्तियार में है. उस पर ईमान लाओ. इसके बाद मख़लूक़ के तबक़ों का मौत के वक़्त के हालात और उनके दर्जो का बयान फ़रमाया.

फिर वह मरने वाला अगर नज़्दीकों में से है(12) {88}
(12) साबिक़ीन में से जिनका ज़िक्र ऊपर हो चुका तो उसके लिये.

तो राहत है और फूल (13)
(13) अबुल आलिया ने कहा कि मुक़र्रबीन से जो कोई दुनिया से जुदा होता है उसके पास जन्नत के फूलों की डाली लाई जाती है वह उसकी ख़ुश्बू लेता है तब रूह क़ब्ज़ होती है.

और चैन के बाग़ (14) {89}
(14) आख़िरत में.

और अगर (15)
(15) मरने वाला.

दाईं तरफ़ वालों से हो {90} तो ऐ मेहबूब तुम पर सलाम हो दाईं तरफ़ वालों से (16){91}
(16) मानी ये है कि ऐ सैयदुल अम्बिया सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, आप उनका इस्लाम क़ुबूल फ़रमाएं और उनके लिये रंजीदा न हों वो अल्लाह तआला के अज़ाब से सलामत और मेहफ़ूज़ रहेंगे और आप उनको उसी हाल में देखेंगे जो आपको पसन्द हो.

और अगर(17)
(17) मरने वाला.

झुटलाने वाले गुमराहों में से हो (18) {92}
(18) यानी असहाबे शिमाल में से.

तो उसकी मेहमानी खौलता पानी {93} और भड़कती आग में धंसाना(19){94}
(19) जहन्नम की, और मरने वालों के हालात और जो मज़ामीन इस सूरत में बयान किये गए.

ये बेशक आला दर्जे की यक़ीनी बात है {95} तो ऐ मेहबूब तुम अपने अज़मत वाले रब के नाम की पाकी बोलो(20){96}
(20) हदीस में है जब यह आयत उतरी “फ़सब्बेह बि-इस्मे रब्बिकल अज़ीम” (सूरए वाक़िआ, आयत 74) तो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया इसको अपने रूकू में दाख़िल करलो और जब “सब्बेहिस्मा रब्बि कल आला” (सूरए आअला, आयत 1) उतरी तो फ़रमाया इसे अपने सज्दों में दाख़िल कर लो. (अबू दाऊद) इस आयत से साबित हुआ कि रूकू और सज्दे की तस्बीह क़ुरआन करीम से ली गई हैं.