26 – सूरए शुअरा

26 – सूरए शुअरा

بِسْمِ ٱللَّهِ ٱلرَّحْمَٰنِ ٱلرَّحِيمِ
طسٓمٓ  تِلْكَ ءَايَٰتُ ٱلْكِتَٰبِ ٱلْمُبِينِ
لَعَلَّكَ بَٰخِعٌۭ نَّفْسَكَ أَلَّا يَكُونُوا۟ مُؤْمِنِينَ
إِن نَّشَأْ نُنَزِّلْ عَلَيْهِم مِّنَ ٱلسَّمَآءِ ءَايَةًۭ فَظَلَّتْ أَعْنَٰقُهُمْ لَهَا خَٰضِعِينَ
وَمَا يَأْتِيهِم مِّن ذِكْرٍۢ مِّنَ ٱلرَّحْمَٰنِ مُحْدَثٍ إِلَّا كَانُوا۟ عَنْهُ مُعْرِضِينَ
فَقَدْ كَذَّبُوا۟ فَسَيَأْتِيهِمْ أَنۢبَٰٓؤُا۟ مَا كَانُوا۟ بِهِۦ يَسْتَهْزِءُونَ
أَوَلَمْ يَرَوْا۟ إِلَى ٱلْأَرْضِ كَمْ أَنۢبَتْنَا فِيهَا مِن كُلِّ زَوْجٍۢ كَرِيمٍ
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ

सूरए शुअरा मक्का में उतरी, इसमें 227 आयतें, 11 रूकू हैं.
– पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए शुअरा मक्के में उतरी, सिवाय आख़िर की चार आयतों के जो “वश्शुअराओ यत्तबिउहुम” से शुरू होती है. इस सूरत में ग्यारह रूकू, दो सौ सत्ताईस आयतें, एक हज़ार दो सौ उनासी कलिमे  और पाँच हज़ार पाँच सौ चालीस अक्षर हें.

तॉ-सीन-मीम {1} ये आयतें हैं रौशन किताब की(2){2}
(2) यानी क़ुरआने पाक की, जिसका चमत्कार ज़ाहिर है और जो सच्चाई को बातिल से अलग करने वाला हे. इसके बाद सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से मेहरबानी और करम के अन्दाज़ में सम्बोधन होता है.

कहीं तुम अपनी जान पर खेल जाओगे उनके ग़म में कि वो ईमान नहीं लाए(3){3}
(3) जब मक्का वाले ईमान न लाए और उन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को झुटलाया तो हुज़ूर पर उनकी मेहरूमी बहुत भारी गुज़री. इसपर अल्लाह तआला ने यह आयत उतारी कि आप इस क़दर ग़म न करें.

अगर हम चाहें तो आसमान से उनपर कोई निशानी उतारें कि उनके ऊंचे ऊंचे उसके हुज़ूर झुके रह जाएं (4){4}
(4) और कोई गुमराही और नाफ़रमानी के साथ गर्दन न उठा सके.

और नहीं आती उनके पास रहमान की तरफ़ से कोई नई नसीहत मगर उससे मुंह फेर लेते हैं (5){5}
(5) यानी दम-ब-दम उनका कुफ़्र बढ़ता जाता है कि जो नसीहत, ज़िक्र और जो वही उतरती है वो उसका इनकार करते चले जाते हैं.

तो बेशक उन्होंने झुटलाया तो अब आया चाहती हैं ख़बरें उनके ठट्टे की(6){6}
(6) यह चेतावनी है और इसमें डराना है कि बद्र के दिन या क़यामत के दिन रोज़ जब उन्हें अज़ाब पहुंचेगा तब उन्हें ख़बर होगी कि क़ुरआन और रसूल के झुटलाने का यह परिणाम है.

क्या उन्होंने ज़मीन को न देखा हमने उसमें कितने इज़्ज़त वाले जोड़े उगाए(7){7}
(7) यानी तरह तरह के बेहतरीन और नफ़ा देने वाले पेड़ पौधे पैदा किये. शअबी ने कहा कि आदमी ज़मीन की पैदावर है. जो जन्नती है वह इज़्ज़त वाला और करीम, और जो जहन्नमी है वो बदबख़्त और मलामत पाया हुआ है.

बेशक उसमें ज़रूर निशानी है(8)
(8) अल्लाह तआला की भरपूर क़ुदरत पर.

और उनके अक्सर ईमान लाने वाले नहीं{8} और बेशक तुम्हारा रब ज़रूर वही इज़्ज़त वाला मेहरबान है(9){9}
(9) काफ़िरों से बदला लेता और ईमान वालों पर मेहरबानी फ़रमाता है.

26 – सूरए शुअरा – दूसरा रूकू

26 – सूरए शुअरा – दूसरा रूकू

وَإِذْ نَادَىٰ رَبُّكَ مُوسَىٰٓ أَنِ ٱئْتِ ٱلْقَوْمَ ٱلظَّٰلِمِينَ
قَوْمَ فِرْعَوْنَ ۚ أَلَا يَتَّقُونَ
قَالَ رَبِّ إِنِّىٓ أَخَافُ أَن يُكَذِّبُونِ
وَيَضِيقُ صَدْرِى وَلَا يَنطَلِقُ لِسَانِى فَأَرْسِلْ إِلَىٰ هَٰرُونَ
وَلَهُمْ عَلَىَّ ذَنۢبٌۭ فَأَخَافُ أَن يَقْتُلُونِ
قَالَ كَلَّا ۖ فَٱذْهَبَا بِـَٔايَٰتِنَآ ۖ إِنَّا مَعَكُم مُّسْتَمِعُونَ
فَأْتِيَا فِرْعَوْنَ فَقُولَآ إِنَّا رَسُولُ رَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ
أَنْ أَرْسِلْ مَعَنَا بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ
قَالَ أَلَمْ نُرَبِّكَ فِينَا وَلِيدًۭا وَلَبِثْتَ فِينَا مِنْ عُمُرِكَ سِنِينَ
وَفَعَلْتَ فَعْلَتَكَ ٱلَّتِى فَعَلْتَ وَأَنتَ مِنَ ٱلْكَٰفِرِينَ
قَالَ فَعَلْتُهَآ إِذًۭا وَأَنَا۠ مِنَ ٱلضَّآلِّينَ
فَفَرَرْتُ مِنكُمْ لَمَّا خِفْتُكُمْ فَوَهَبَ لِى رَبِّى حُكْمًۭا وَجَعَلَنِى مِنَ ٱلْمُرْسَلِينَ
وَتِلْكَ نِعْمَةٌۭ تَمُنُّهَا عَلَىَّ أَنْ عَبَّدتَّ بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ
قَالَ فِرْعَوْنُ وَمَا رَبُّ ٱلْعَٰلَمِينَ
قَالَ رَبُّ ٱلسَّمَٰوَٰتِ وَٱلْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَآ ۖ إِن كُنتُم مُّوقِنِينَ
الَ لِمَنْ حَوْلَهُۥٓ أَلَا تَسْتَمِعُونَ
قَالَ رَبُّكُمْ وَرَبُّ ءَابَآئِكُمُ ٱلْأَوَّلِينَ
قَالَ إِنَّ رَسُولَكُمُ ٱلَّذِىٓ أُرْسِلَ إِلَيْكُمْ لَمَجْنُونٌۭ
قَالَ رَبُّ ٱلْمَشْرِقِ وَٱلْمَغْرِبِ وَمَا بَيْنَهُمَآ ۖ إِن كُنتُمْ تَعْقِلُونَ
قَالَ لَئِنِ ٱتَّخَذْتَ إِلَٰهًا غَيْرِى لَأَجْعَلَنَّكَ مِنَ ٱلْمَسْجُونِينَ
قَالَ أَوَلَوْ جِئْتُكَ بِشَىْءٍۢ مُّبِينٍۢ
قَالَ فَأْتِ بِهِۦٓ إِن كُنتَ مِنَ ٱلصَّٰدِقِينَ
فَأَلْقَىٰ عَصَاهُ فَإِذَا هِىَ ثُعْبَانٌۭ مُّبِينٌۭ
وَنَزَعَ يَدَهُۥ فَإِذَا هِىَ بَيْضَآءُ لِلنَّٰظِرِينَ

और याद करो जब तुम्हारे रब ने मूसा को निदा फ़रमाई कि ज़ालिम लोगों के पास जा{10} जो फ़िरऔन की क़ौम है(1)
(1) जिन्होंने कुफ़्र और गुमराही से अपनी जानों पर ज़ुल्म किया  और बनी इसराईल को ग़ुलाम बनाकर और उन्हें तरह तरह की यातनाएं देकर उन पर अत्याचार किया. उस क़ौम का नाम क़िब्त है. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को उनकी तरफ़ रसूल बनाकर भेजा गया था कि उन्हें उनकी बदकिरदारी पर अल्लाह के अज़ाब से डराएं.

क्या वो न डरेंगे(2){11}
(2) अल्लाह से और अपनी जानों को अल्लाह तआला पर ईमान लाकर और उसकी फ़रमाँबरदारी करके उसके अज़ाब से न बचाएंगे. इसपर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की बारगाह में….

अर्ज़ की ऐ मेरे रब मैं डरता हूँ कि वो मुझे झुटलाएंगे{12} और मेरा सीना तंगी करता है(3)
(3) उनके झुटलाने से.

और मेरी ज़बान नहीं चलती(4)
(4) यानी बात चीत करने में किसी क़दर तकल्लुफ़ होता है. उस तकलीफ़ की वजह से जो बचपन में मुंह में आग का अंगारा रख लेने की वजह से ज़बान में हो गई है.

तो तू हारून को भी रसूल कर (5){13}
(5) ताकि वह रिसालत के प्रचार में मेरी मदद करें. जिस वक़्त हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को शाम में नबुव्वत दी गई उस वक़्त हज़रत हारून अलैहिस्सलाम मिस्र में थे.

और उनका मुझपर एक इल्ज़ाम है(6)
(6) कि मैंने क़िब्ती को मारा था.

तो मैं डरता हूँ कहीं मुझे (7)
(7) उसके बदले में.

क़त्ल कर दें{14} फ़रमाया यूँ नहीं(8)
(8) तुम्हें क़त्ल नहीं कर सकते और अल्लाह तआला ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की प्रार्थना मन्ज़ूर फ़रमा कर हज़रत हारून अलैहिस्सलाम को भी नबी कर दिया और दोनों को हुक्म दिया.

तुम दोनों मेरी आयतें लेकर जाओ हम तुम्हारे साथ सुनते हैं(9){15}
(9) जो तुम कहो और जो तुम्हें दिया जाए.

तो फ़िरऔन के पास जाओ फिर उससे कहो हम दोनों उसके रसूल हैं जो रब है सारे जगत का{16} कि तू हमारे साथ बनी इस्राईल को छोड़ दे(10){17}
(10) ताकि हम उन्हें शाम की धरती पर ले जाएं. फ़िरऔन ने चारसौ बरस तक बनी इस्राईल को ग़ुलाम बनाए रखा था. उस वक़्त बनी इस्राईल की तादाद छ लाख तीस हज़ार थी. अल्लाह तआला का यह हुक्म पाकर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम मिस्र की तरफ़ रवाना हुए. आप पशमीने का जुब्बा पहने हुए थे. मुबारक हाथ में लाठी थी जिसके सिरे पर ज़ंबील लटकी हुई थी जिसमें सफ़र का तोशा था. इस शान से आप मिस्र में पहुंच कर अपने मकान मे दाख़िल हुए. हज़रत हारून अलैहिस्सलाम वहीं थे. आपने उन्हें ख़बर दी कि अल्लाह तआला ने मुझे रसूल बनाकर फ़िरऔन की तरफ़ भेजा है और आप को भी रसूल बनाया है कि फ़िरऔन को ख़ुदा की तरफ़ दावत दो. यह सुनकर आपकी वालिदा साहिबा घबराई और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से कहने लगीं कि फ़िरऔन तुम्हें क़त्ल करने के लिये तुम्हारी तलाश में है. जब तुम उसके पास जाओगे तो तुम्हें क़त्ल करेगा. लेकिन हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम उनके यह फ़रमाने से न रूके  हज़रत हारून को साथ लेकर रात के वक़्त फ़िरऔन के दरवाज़े पर पहुंचें दरवाज़ा खटखटाया, पूछा आप कौन हैं? हज़रत ने फ़रमाया मैं हूँ मूसा, सारे जगत के रब का रसूल, फ़िरऔन को ख़बर दी गई. सुबह के वक़्त आप बुलाए गए. आप ने पहुंचकर अल्लाह तआला की रिसालत अदा की और फ़िरऔन के पास जो हुक्म पहुंचाने पर आप मुक़र्रर किये गए थे, वह पहुंचाया, फ़िरऔन ने आपको पहचाना.

बोला क्या हमने तुम्हें अपने यहाँ बचपन मे न पाला और तुमने हमारे यहाँ अपनी उम्र के कई बरस गुज़ारे (11){18}
(11) मुफ़स्सिरों ने कहा तीस बरस. उस ज़माने में हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम फ़िरऔन के लिबास पहनते थे और उसकी सवारियों में सवार होते थे और उसके बेटे मशहूर थे.

और तुमने किया अपना वह काम जो तुमने किया(12)
(12) क़िब्ती को क़त्ल किया.

और तुम नाशुक्रे थे (13){19}
(13) कि तुमने हमारी नेअमत का शुक्रिया अदा न किया और हमारे एक आदमी को क़त्ल कर दिया.

मूसा ने फ़रमाया, मैंने वह काम किया जबकि मुझे राह की ख़बर न थी(14){20}
(14) मैं न जानता था कि घूंसा मारने से वह शख़्स मर जाएगा. मेरा मारना अदब सिखाने के लिये था न कि क़त्ल के लिये.

तौ मैं तुम्हारे यहां से निकल गया जब कि तुम से डरा(15)
(15)कि तुम मुझे क़त्ल करोगे और मदयन शहर को चला गया.

तो मेरे रब ने मुझे हुक्म अता फ़रमाया(16)
(16) मदयन से वापसी के वक़्त. हुक्म से यहाँ या नबुव्वत मुराद है या इल्म.

और मुझे पैग़म्बरों से किया{21} और कोई नेअमत है जिसका तू मुझ पर एहसान जताता है कि तूने ग़ुलाम बनाकर रखे बनी इस्राईल (17){22}
(17) यानी इसमें तेरा क्या एहसान है कि तू ने मेरी तरबियत की और बचपन में मुझे रखा, खिलाया, पहनाया, क्योंकि मेरे तुझ तक पहुंचने का कारण तो यही हुआ कि तूने बनी इस्राईल को ग़ुलाम बनाया, उनकी औलाद को क़त्ल किया. यह तेरा ज़ुल्म इसका कारण हुआ कि मेरे माँ बाप मुझे पाल पोस न सके और मुझे दरिया में डालने पर मजबूर हुए. तू ऐसा न करता तो मैं अपने वालदैन के पास रहता. इसलिये यह बात क्या इस क़ाबिल है कि इसका एहसान जताया जाए. फ़िरऔन मूसा अलैहिस्सलाम की इस तक़रीर से लाजवाब हो गया और उसने अपने बोलने का ढंग बदला और यह गुफ़्तगू छोड़ कर दूसरी बात शुरू की.

फ़िरऔन बोला और सारे जगत का रब क्या है(18){23}
(18) जिसका तुम अपने आपको रसूल बताते हो.

मूसा ने फ़रमाया रब आसमानों और ज़मीन का और जो कुछ उनके बीच में है अगर तुम्हें यक़ीन हो (19){24}
(19) यानी अगर तुम चीज़ों को प्रमाण से जानने की योग्यता रखते हो तो उन चीज़ों की पैदायश उसके अस्तित्व यानी होने का खुला प्रमाण है. ईक़ान यानी यक़ीन उस इल्म को कहते हैं जो तर्क से या प्रमाण से हासिल हो. इसीलिये अल्लाह तआला की शान में “मूक़िन” यक़ीन वाला नहीं कहा जाता.

अपने आस पास वालों से बोला क्या तुम ग़ौर से सुनते नहीं (20){25}
(20) उस वक़्त उसके चारों तरफ़ उसकी क़ौम के प्रतिष्ठित लोगों में से पाँच सौ व्यक्ति ज़ेवरों से सजे, सोने की कुर्सीयों पर बैठे थे. उन से फ़िरऔन का यह कहना क्या तुम ग़ौर से नहीं सुनते, इस अर्थ में था कि वो आसमान और ज़मीन को क़दीम समझते थे और उनके नष्ट किये जाने के इन्कारी थे, मतलब यह था कि जब ये चीज़ें क़दीम यानी अपने आप वुजूद में आई तो इनके लिये रब की क्या ज़रूरत. अब हज़रत मूसा अलेहिस्सलाम ने उन चीज़ों से इस्तदलाल पेश करना चाहा जिनकी पैदाइश और जिनकी फ़ना देखने में आचुकी है.

मूसा ने फ़रमाया रब तुम्हारा और तुम्हारे अगले बाप दादाओ का(21){26}
(21) यानी अगर तुम दूसरी चीज़ों से इस्तदलाल नहीं कर सकते तो ख़ुद तुम्हारे नूफ़ूस से इस्तदलाल पेश किया जाता है. अपने आपको जानते हो, पैदा हुए हो, अपने बाप दादा को जानते हो कि वो नष्ट हो गए. तो अपनी पैदायश से और उनके नष्ट हो जाने से पैदा करने और मिटा देने वाले के अस्तित्व का सुबूत मिलता है.

बोला तुम्हारे ये रसूल जो तुम्हारी तरफ़ भेजे गए है ज़रूर अक़्ल नहीं रखते(22){27}
(22) फ़िरऔन ने यह इसलिये कहा कि वह अपने सिवा किसी मअबूद के अस्तित्व का मानने वाला न था और जो उसके मअबूद होने का अक़ीदा न रखे उसको समझ से वंचित कहता था. हक़ीक़त में इस तरह की गुफ़्तगू मजबूरी और लाचारी के वक़्त आदमी की ज़बान पर आती है. लेकिन हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने हिदायत का फ़र्ज़ पूरी तरह निभाया और उसकी इस सारी निरर्थक बातचीत के बावुजूद फिर अतिरिक्त बयान की तरफ़ मुतवज्जह हुए.

मूसा ने फ़रमाया, रब पूरब और पश्चिम का और जो कुछ उन के बीच है(23)
(23) क्योंकि पूर्व से सूर्य का उदय करना और पश्चिम में डूब जाना और साल की फ़सलों में एक निर्धारित हिसाब पर चलना और हवाओं और बारिशों वग़ैरह के प्रबन्ध, यह सब उसके वुजूद यानी अस्तित्व और क्षमता यानी क़ुदरत के प्रमाण है.

अगर तुम्हें अक़्ल हो(24){28}
(24) अब फ़िरऔन आश्चर्य चकित हो गया और अल्लाह की क़ुदरत के चिन्हों के इन्कार की राह बाक़ी न रही और कोई जवाब उससे न बन पड़ा.

बोला अगर तुम ने मेरे सिवा किसी और को ख़ुदा ठहराया तो मैं ज़रूर तुम्हें कै़द कर दूंगा(25){29}
(25) फ़िरऔन की क़ैद क़त्ल से बदतर थी. उसका जेल खाना तंग, अंधेरा, गहरा गढा था. उसमें अकेला डाल देता था, न वहाँ कोई आवाज़ सुनाई देती थी, न कुछ नज़र आता था.

फ़रमाया क्या अगरचे मैं तेरे पास रौशन चीज़ लांऊ (26){30}
(26) जो मेरी रिसालत का प्रमाण हो, मुराद इससे चमत्कार है. इसपर फ़िरऔन ने.

कहा तो लाओ अगर सच्चे हो {31} तो मूसा ने अपना असा डाल दिया जभी वह साफ़ खुला अजगर हो गया (27){32}
(27) लाठी अजगर बन कर आसमान की तरफ़ एक मील के बराबर उड़ी फिर उतर कर फ़िरऔन की तरफ़ आई और कहने लगी, ऐ मूसा हुक्म दीजिये. फ़िरऔन ने घबराकर कहा उसकी क़सम जिसने तुम्हें रसूल बनाया, इसे पकड़ो. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उसे हाथ में लिया तो पहले की तरह लाठी हो गई. फ़िरऔन कहने लगा, इसके सिवा और भी कोई चमत्कार है. आपने फ़रमाया हाँ. और उसको चमकती हथैली दिखाई.

और अपना हाथ(28)
(28) गिरेबान में डालकर.

निकाला तो जभी वह देखने वालों की निगाह में जगमगाने लगा(29){33}
(29) उससे सूरज की सी किरन ज़ाहिर हुई.

26 – सूरए शुअरा -तीसरा रूकू

26 – सूरए शुअरा -तीसरा रूकू

قَالَ لِلْمَلَإِ حَوْلَهُۥٓ إِنَّ هَٰذَا لَسَٰحِرٌ عَلِيمٌۭ
يُرِيدُ أَن يُخْرِجَكُم مِّنْ أَرْضِكُم بِسِحْرِهِۦ فَمَاذَا تَأْمُرُونَ
قَالُوٓا۟ أَرْجِهْ وَأَخَاهُ وَٱبْعَثْ فِى ٱلْمَدَآئِنِ حَٰشِرِينَ
يَأْتُوكَ بِكُلِّ سَحَّارٍ عَلِيمٍۢ
فَجُمِعَ ٱلسَّحَرَةُ لِمِيقَٰتِ يَوْمٍۢ مَّعْلُومٍۢ
وَقِيلَ لِلنَّاسِ هَلْ أَنتُم مُّجْتَمِعُونَ
لَعَلَّنَا نَتَّبِعُ ٱلسَّحَرَةَ إِن كَانُوا۟ هُمُ ٱلْغَٰلِبِينَ
فَلَمَّا جَآءَ ٱلسَّحَرَةُ قَالُوا۟ لِفِرْعَوْنَ أَئِنَّ لَنَا لَأَجْرًا إِن كُنَّا نَحْنُ ٱلْغَٰلِبِينَ
قَالَ نَعَمْ وَإِنَّكُمْ إِذًۭا لَّمِنَ ٱلْمُقَرَّبِينَ
قَالَ لَهُم مُّوسَىٰٓ أَلْقُوا۟ مَآ أَنتُم مُّلْقُونَ
فَأَلْقَوْا۟ حِبَالَهُمْ وَعِصِيَّهُمْ وَقَالُوا۟ بِعِزَّةِ فِرْعَوْنَ إِنَّا لَنَحْنُ ٱلْغَٰلِبُونَ
فَأَلْقَىٰ مُوسَىٰ عَصَاهُ فَإِذَا هِىَ تَلْقَفُ مَا يَأْفِكُونَ
فَأُلْقِىَ ٱلسَّحَرَةُ سَٰجِدِينَ
قَالُوٓا۟ ءَامَنَّا بِرَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ
رَبِّ مُوسَىٰ وَهَٰرُونَ
قَالَ ءَامَنتُمْ لَهُۥ قَبْلَ أَنْ ءَاذَنَ لَكُمْ ۖ إِنَّهُۥ لَكَبِيرُكُمُ ٱلَّذِى عَلَّمَكُمُ ٱلسِّحْرَ فَلَسَوْفَ تَعْلَمُونَ ۚ لَأُقَطِّعَنَّ أَيْدِيَكُمْ وَأَرْجُلَكُم مِّنْ خِلَٰفٍۢ وَلَأُصَلِّبَنَّكُمْ أَجْمَعِينَ
قَالُوا۟ لَا ضَيْرَ ۖ إِنَّآ إِلَىٰ رَبِّنَا مُنقَلِبُونَ
إِنَّا نَطْمَعُ أَن يَغْفِرَ لَنَا رَبُّنَا خَطَٰيَٰنَآ أَن كُنَّآ أَوَّلَ ٱلْمُؤْمِنِينَ

बोला अपने गिर्द के सरदारों से कि बेशक ये जानकार जादूगर हैं{34} चाहते हैं कि तुम्हें तुम्हारे मुल्क से निकाल दें अपने जादू के ज़ोर से, तब तुम्हारी क्या सलाह है(1){35}
(1) क्योंकि उस ज़माने में जादू का बहुत रिवाज़ था इसलिये फ़िरऔन ने ख़याल किया यह बात चल जाएगी और उसकी क़ौम के लोग इस धोखे में आकर हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से नफ़रत करने लगेंगे और उनकी बात क़ुबूल न करेंगे.

वो बोले इन्हें और इनके भाई को ठहराए रहो और शहरों में जमा करने वाले भेजो{36} कि वो तरे पास ले आएं , हर बड़े जानकार जादूगर को (2){37}
(2) जो जादू के इल्म में उनके कहने के मुताबिक मूसा अलैहिस्सलाम से बढ़ कर हो और वो लोग अपने जादू से हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के चमत्कारों का मुकाबला करें ताकि हज़रत मूसा के लिये हुज्जत बाक़ी न रहे और फ़िरऔन के लोगों को यह कहने का मौक़ा मिल जाए कि यह काम जादू से हो जाते हैं लिहाज़ा नबुव्वत की दलील नहीं.

तो जमा किये गए जादूगर एक मुक़र्रर दिन के वादे पर(3){38}
(3) वह दिन फ़िरऔन की क़ौम की ईद का था और इस मुक़ाबले के लिये चाश्त का समय निर्धारित किया गया था.

और लोगों से कहा गया क्या तुम जमा हो गए(4){39}
(4) ताकि देखो कि दोनों पक्ष क्या करते हैं और उनमें कोन जीतता है.

शायद हम उन जादूगरों ही की पैरवी करें अगर ये ग़ालिब आएं (5){40}
(5) हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर. इससे उनका तात्पर्य जादूगरों का अनुकरण करना न था बल्कि ग़रज़ यह थी कि इस बहाने लोगों को हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के अनुकरण से रोकें.

फिर जब जादूगर आए फ़िरऔन से बोले क्या हमें कुछ मजदूरी मिलेगी अगर हम ग़ालिब आए{41} बोला हाँ और उस वक़्त तुम मेरे मुकर्रर (नज़दीकी) हो जाओगे(6){42}
(6) तुम्हें दरबारी बनाया जाएगा, तुम्हें विशेष उपाधियाँ दी जाएगी, सब से पहले दाख़िल होने की इजाज़त दी जाएगी, सबसे बाद तक दरबार में रहोगे. इसके बाद जादूगरों ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से अर्ज़ किया कि क्या हज़रत अपनी लाठी पहले डालेंगे या हमें इजाज़त है कि हम अपना जादूई सामान डालें.

मूसा ने उनसे फ़रमाया डालो जो तुम्हें डालना है(7){43}
(7) ताकि तुम उसका अंजाम देख लो.

तो उन्होनें अपनी रस्सियां और लाठियां डालीं और बोले फ़िरऔन की इज़्ज़त की क़सम बेशक हमारी ही जीत है(8){44}
(8) उन्हें अपनी जीत का इत्मीनान था क्योंकि जादू के कामों में जो इन्तिहा के काम थे ये उनको काम में लाए थे और पूरा यक़ीन रखते थे कि अब कोई जादू इसका मुक़ाबला नहीं कर सकता.

तो मूसा ने अपना असा डाला जभी वह उनकी बनावटों को निगलने लगा(9){45}
(9)  जो उन्होंने जादू के ज़रिये बनाई थीं यानी उनकी रस्सियाँ और लाठियाँ जो जादू से अजगर बनकर दौड़ते नज़र आ रहे थे. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की लाठी अजगर बनकर उन सब को निगल गई फिर उसको हज़रत मूसा ने अपने मुबारक हाथ में लिया तो वह पहले की तरह हो गई. जब जादूगरों ने यह देखा तो उन्हें यक़ीन हो गया कि यह जादूगर नहीं है.

अब सज्दे में गिरे {46} जादूगर बोले हम ईमान लाए उसपर जो सारे जगत का रब है{47} जो मूसा और हारून का रब है{48} फ़िरऔन बोला क्या तुम उसपर ईमान लाए पहले इसके कि मैं तुम्हें इजाज़त दूँ बेशक वह तुम्हारा बड़ा है जिसने तुम्हें जादू सिखाया, (10)
(10) यानी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम तुम्हारे उस्ताद हैं इसीलिये वह तुम से बढ गए.

तो अब जानना चाहते हो(11){49}
(11)  कि तुम्हारे साथ क्या किया जाए.

मुझे क़सम है बेशक मैं तुम्हारे हाथ और दूसरी तरफ़ के पाँव काटूंगा और तुम सब को सूली दूंगा (12)
(12) इससे उद्देश यह था कि आम लोग डर जाएं और जादूगरों को देखकर लोग हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर ईमान न ले आएं.

वो बोले कुछ नुक़सान नहीं(13)
(13) चाहे दुनिया में कुछ भी पेश आए क्योंकि.

हम अपने रब की तरफ़ पलटने वाले हैं(14){50}
(14) ईमान के साथ और हमें अल्लाह तआला से रहमत की उम्मीद है.

हमें तमअ (लालच) है कि हमारा रब हमारी खताएं बख़्श दे इसपर कि हम सबसे पहले ईमान लाएं(15) {51}
(15) फ़िरऔन की जनता में से या उस भीड़ में से. उस वाक़ए के बाद हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने कई साल वहाँ क़याम फ़रमाया और उन लोगों को हक़ की दावत देते रहे लेकिन उनकी सरकशी बढ़ती गई.

26 – सूरए शुअरा – चौथा रूकू

26 – सूरए शुअरा – चौथा रूकू

۞ وَأَوْحَيْنَآ إِلَىٰ مُوسَىٰٓ أَنْ أَسْرِ بِعِبَادِىٓ إِنَّكُم مُّتَّبَعُونَ
فَأَرْسَلَ فِرْعَوْنُ فِى ٱلْمَدَآئِنِ حَٰشِرِينَ
إِنَّ هَٰٓؤُلَآءِ لَشِرْذِمَةٌۭ قَلِيلُونَ
وَإِنَّهُمْ لَنَا لَغَآئِظُونَ
وَإِنَّا لَجَمِيعٌ حَٰذِرُونَ
فَأَخْرَجْنَٰهُم مِّن جَنَّٰتٍۢ وَعُيُونٍۢ
وَكُنُوزٍۢ وَمَقَامٍۢ كَرِيمٍۢ
كَذَٰلِكَ وَأَوْرَثْنَٰهَا بَنِىٓ إِسْرَٰٓءِيلَ
فَأَتْبَعُوهُم مُّشْرِقِينَ
فَلَمَّا تَرَٰٓءَا ٱلْجَمْعَانِ قَالَ أَصْحَٰبُ مُوسَىٰٓ إِنَّا لَمُدْرَكُونَ
قَالَ كَلَّآ ۖ إِنَّ مَعِىَ رَبِّى سَيَهْدِينِ
فَأَوْحَيْنَآ إِلَىٰ مُوسَىٰٓ أَنِ ٱضْرِب بِّعَصَاكَ ٱلْبَحْرَ ۖ فَٱنفَلَقَ فَكَانَ كُلُّ فِرْقٍۢ كَٱلطَّوْدِ ٱلْعَظِيمِ
وَأَزْلَفْنَا ثَمَّ ٱلْءَاخَرِينَ
وَأَنجَيْنَا مُوسَىٰ وَمَن مَّعَهُۥٓ أَجْمَعِينَ
ثُمَّ أَغْرَقْنَا ٱلْءَاخَرِينَ
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ

और हमने मूसा को वही भेजी कि रातों रात मेरे बन्दों को(1)
(1) यानी बनी इस्राईल को मिस्र से.

ले निकल बेशक तुम्हारा पीछा होना है(2){52}
(2) फ़िरऔन और उसके लश्कर पीछा करेंगे, और तुम्हारे पीछे दरिया में दाख़िल होंगे, हम तुम्हें निजात देंगे और उन्हें डुबा देंगे.

अब फ़िरऔन ने शहरों में जमा करने वाले भेजे(3){53}
(3) लश्करों को जमा करने के लिये, जब लश्कर जमा होगए, तो उनकी कसरत के मुक़ाबिल बनी इस्राईल की संख्या थोड़ी मालूम होने लगी. चुनान्चे फ़िरऔन ने बनी इस्राईल की निस्बत कहा.

कि ये लोग एक थोड़ी जमाअत हैं{54} और बेशक वो हम सब का दिल जलाते हैं (4){55}
(4) हमारी मुख़ालिफ़त करके और हमारी इजा़ज़त के बिना हमारी सरज़मीन से निकल कर.

और बेशक हम सब चौकन्ने हैं (5){56}
(5) हथियार बाँधे तेयार हैं.

तो हमने उन्हें (6)
(6) यानी फ़िरऔनियों को.

बाहर निकाला बाग़ों और चश्मों {57}और ख़जानों और उमदा मकानों से{58} हमने ऐसा ही किया और उनका वारिस कर दिया बनी इस्राईल को(7){59}
(7) फ़िरऔन और उसकी क़ौम के ग़र्क़ यानी डूबने के बाद.

तो फ़िरऔनियों ने उनका पीछा किया दिन निकले {60} फिर जब आमना सामना हुआ दोनों गिरोहों का(8)
(8) और उनमें से हर एक ने दूसरे को देखा.

मूसा वालों ने कहा हमको उन्होंने आ लिया(9){61}
(9) अब वो हम पर क़ाबू पा लेंगे. न हम उनके मुक़ाबले की ताक़त रखते हैं, न भागने की जगह है क्योंकि आगे दरिया है.

मूसा ने फ़रमाया यूं नहीं, (10)
(10) अल्लाह के वादे पर पूरा पूरा भरोसा है.

बेशक मेरा रब मेरे साथ है वह मुझे अब राह देता है{62} तो हमने मूसा को वही (देववाणी) फ़रमाई कि दरिया पर अपना असा मार(11)
(11)  चुनान्चे हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने दरिया पर लाठी मारी.

तो जभी दरिया फट गया(12)
(12) और उसके बारह हिस्से नमूदार हुए.

तो हर हिस्सा हो गया जैसे बड़ा पहाड़ (13){63}
(13)और उनके बीच ख़ुश्क राहें.

और वहाँ क़रीब लाए हम दूसरों को(14){64}
(14)यानी फ़िरऔन और फ़िरऔनियों को, यहाँ तक कि वो बनी इस्राईल के रास्तों पर चल पड़े जो उनके लिये दरिया में अल्लाह की क़ुदरत से पैदा हुए थे.

और हमने बचा लिया मूसा और उसके सब साथ वालों को(15) {65}
(15)दरिया से सलामत निकाल कर.

फिर दूसरों को डुबो दिया(16){66}
(16) यानी फ़िरऔन और उसकी क़ौम को इस तरह कि जब बनीं इस्राईल कुल के कुल दरिया से पार हो गए और सारे फ़िरऔनी दरिया के अन्दर आ गए तो दरिया अल्लाह के हुक्म से मिल गया और पहले की तरह हो गया. और फ़िरऔन अपनी क़ौम सहित डूब गया.

बेशक इसमें ज़रूर निशानी है, (17)
(17) अल्लाह की क़ुदरत पर और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का चमत्कार.

और उनमें अक्सर मुसलमान न थे (18){67}
(18) यानी मिस्र निवासियों में सिर्फ़ फ़िरऔन की बीबी आसिया और हिज़क़ील जिनको फ़िरऔन की मूमिन औलाद कहते हैं, वो अपना ईमान छुपाए रहते थे और फ़िरऔन के चचाज़ाद थे और मरयम जिसने हज़रत यूसुफ़ अलैहिस्सलाम की कब्र का निशान बताया था, जब कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने उनके ताबूत को दरिया से निकाला.

और बेशक तुम्हारा रब ही इज़्ज़त वाला(19)
(19) कि उसने काफ़िरों को ग़र्क़ करके बदला लिया.

मेहरबान है(20){68}
(20) ईमान वालों पर जिन्हें ग़र्क़ होने से बचाया.

26 – सूरए शुअरा – पाँचवां रूकू

26 – सूरए शुअरा – पाँचवां रूकू

وَٱتْلُ عَلَيْهِمْ نَبَأَ إِبْرَٰهِيمَ
إِذْ قَالَ لِأَبِيهِ وَقَوْمِهِۦ مَا تَعْبُدُونَ
قَالُوا۟ نَعْبُدُ أَصْنَامًۭا فَنَظَلُّ لَهَا عَٰكِفِينَ
قَالَ هَلْ يَسْمَعُونَكُمْ إِذْ تَدْعُونَ
أَوْ يَنفَعُونَكُمْ أَوْ يَضُرُّونَ
قَالُوا۟ بَلْ وَجَدْنَآ ءَابَآءَنَا كَذَٰلِكَ يَفْعَلُونَ
قَالَ أَفَرَءَيْتُم مَّا كُنتُمْ تَعْبُدُونَ
أَنتُمْ وَءَابَآؤُكُمُ ٱلْأَقْدَمُونَ
فَإِنَّهُمْ عَدُوٌّۭ لِّىٓ إِلَّا رَبَّ ٱلْعَٰلَمِينَ
ٱلَّذِى خَلَقَنِى فَهُوَ يَهْدِينِ
وَٱلَّذِى هُوَ يُطْعِمُنِى وَيَسْقِينِ
وَإِذَا مَرِضْتُ فَهُوَ يَشْفِينِ
وَٱلَّذِى يُمِيتُنِى ثُمَّ يُحْيِينِ
وَٱلَّذِىٓ أَطْمَعُ أَن يَغْفِرَ لِى خَطِيٓـَٔتِى يَوْمَ ٱلدِّينِ
رَبِّ هَبْ لِى حُكْمًۭا وَأَلْحِقْنِى بِٱلصَّٰلِحِينَ
وَٱجْعَل لِّى لِسَانَ صِدْقٍۢ فِى ٱلْءَاخِرِينَ
وَٱجْعَلْنِى مِن وَرَثَةِ جَنَّةِ ٱلنَّعِيمِ
وَٱغْفِرْ لِأَبِىٓ إِنَّهُۥ كَانَ مِنَ ٱلضَّآلِّينَ
وَلَا تُخْزِنِى يَوْمَ يُبْعَثُونَ
يَوْمَ لَا يَنفَعُ مَالٌۭ وَلَا بَنُونَ
إِلَّا مَنْ أَتَى ٱللَّهَ بِقَلْبٍۢ سَلِيمٍۢ
وَأُزْلِفَتِ ٱلْجَنَّةُ لِلْمُتَّقِينَ
وَبُرِّزَتِ ٱلْجَحِيمُ لِلْغَاوِينَ
وَقِيلَ لَهُمْ أَيْنَ مَا كُنتُمْ تَعْبُدُونَ
مِن دُونِ ٱللَّهِ هَلْ يَنصُرُونَكُمْ أَوْ يَنتَصِرُونَ
فَكُبْكِبُوا۟ فِيهَا هُمْ وَٱلْغَاوُۥنَ
وَجُنُودُ إِبْلِيسَ أَجْمَعُونَ
قَالُوا۟ وَهُمْ فِيهَا يَخْتَصِمُونَ
تَٱللَّهِ إِن كُنَّا لَفِى ضَلَٰلٍۢ مُّبِينٍ
إِذْ نُسَوِّيكُم بِرَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ
وَمَآ أَضَلَّنَآ إِلَّا ٱلْمُجْرِمُونَ
فَمَا لَنَا مِن شَٰفِعِينَ
وَلَا صَدِيقٍ حَمِيمٍۢ
فَلَوْ أَنَّ لَنَا كَرَّةًۭ فَنَكُونَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيم

और उनपर पढ़ो ख़बर इब्राहीम की(1){61}
(1) यानी मुश्रिकों पर.

जब उसने अपने बाप और अपनी क़ौम से फ़रमाया तुम क्या पूजते हो (2){70}
(2) हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम जानते थे कि वह लोग बुत परस्त है इसके बावुजूद आपका सवाल फ़रमाना इसलिये था ताकि उन्हें दिखा दें कि जिन चीज़ों को वो लोग पूजते हैं वो किसी तरह उसके मुस्तहिक़ नहीं.

बोले हम बुतों को पूजते हैं फिर उनके सामने आसन मारे रहते हैं{71} फ़रमाया क्या वो तुम्हारी सुनते हैं जब तुम पुकारो{72} या तुम्हारा कुछ भला बुरा करते हैं(3){73}
(3) जब यह कुछ नहीं तो उन्हें तुमने मअबूद कैसे ठहराया.

बोले बल्कि हमने अपने बाप दादा को ऐसा ही करते पाया {74} फ़रमाया तो क्या तुम देखते हो ये जिन्हें पूज रहे हो{75} तुम और तुम्हारे अगले बाप दादा (4){76}
(4) कि ये न इल्म रखते हैं न क़ुदरत, न कुछ सुनते हैं न कोई नफ़ा या नुक़सान पहुंचा सकते हैं.

बेशक वो सब मेरे दुश्मन हैं(5)
(5) मैं उनका पूजा जाना गवारा नहीं कर सकता.

मगर पर्वरदिगारे आलम(6){77}
(6) मेरा रब है, मेरे काम बनाने वाला है, मैं उसकी इबादत करता हूँ, वही इबादत के लायक़ है उसके गुण ये हैं.

वो जिसने मुझे पैदा किया(7)
(7) कुछ नहीं से सब कुछ फ़रमाया और अपनी इताअत के लिये बनाया.

तो वह मुझे राह देगा(8){78}
(8) दोस्ती के आदाब की, जैसी कि पहले हिदायत फ़रमा चुका है दीन और दुनिया की नेक बातों की.

और वह जो मुझे खिलाता और पिलाता है(9){79}
(9) और मेरा रोज़ी देने वाला है.

और जब मैं बीमार हूँ तो वही मुझे शिफ़ा देता है(10){80}
(10) मेरी बीमारियों को दूर करता है. इब्ने अता ने कहा, मानी ये है कि जब मैं ख़ल्क़ की दीद से बीमार होता है, और सच्चाई के अवलोकन से मुझे शिफ़ा यानी अच्छाई अता फ़रमाता है.

और वह मुझे वफ़ात (मृत्यु) देगा फिर मुझे ज़िन्दा करेगा(11){81}
(11)  मौत और ज़िन्दगी उसकी क़ुदरत के अन्तर्गत है.

और वह जिसकी मुझे आस लगी है कि मेरी ख़ताएं क़यामत के दिन बख़्शेगा(12){82}
(12) नबी मअसूम है. गुनाह उनसे होते ही नहीं, उनका इस्तिग़फ़ार यानी माफ़ी माँगना अपने रब के समक्ष विनम्रता है, और उम्मत के लिये माफ़ी माँगने की तालीम है, हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का अल्लाह के इन गुणों को बयान करना अपनी क़ौम पर हुज्जत क़ायम करना है कि मअबूद वही हो सकता है जिसके ये गुण हैं.

ऐ मेरे रब मुझे हुक्म अता कर(13)
(13) हुक्म से या इल्म मुराद है या हिक़मत या नबुव्वत.

और मुझे उनसे मिला दे जो तेरे ख़ास कुर्ब (समीपता) के अधिकारी है (14){83}
(14) यानी नबी अलैहिमुस्सलाम. और आपकी यह दुआ क़ुबूल हुई. चुनान्चे अल्लाह तआला फ़रमाता है “व इन्नहू फ़िल आख़िरते लमिनस सॉलिहीन”.

और मेरी सच्ची नामवरी रख पिछलों में(15) {84}
(15) यानी उन उम्मतों में जो मेरे बाद आएं. चुनांन्चे अल्लाह तआला ने उनको यह अता फ़रमाया कि तमाम दीनों वाले उनसे महब्बत रखते हैं और उनकी तारीफ़ करते हैं.

और मुझे उनमें कर जो चैन के बाग़ों के वारिस हैं(16){85}
(16) जिन्हें तू जन्नत अता फ़रमाएगा.

और मेरे बाप को बख़्श दे(17)
(17) तौबह और ईमान अता फ़रमाकर, और यह दुआ आपने इस लिये फ़रमाई कि जुदाई के वक़्त आपके वालिद ने आपसे ईमान लाने का वादा किया था. जब ज़ाहिर हो गया कि वह ख़ुदा का दुश्मन है, उसका वादा झूठ था, तो आप उससे बेज़ार हो गए, जैसा कि सूरए बराअत में है “माकानस-तिग़फारो इब्राहीमा लिअबीहे इल्ला अन मौइदतिन वअदहा इय्याहो फ़लम्मा तबय्यना लहू अन्नहू अदुव्वुन लिल्लाहे तबर्रआ मिन्हो”. यानी और इब्राहीम का अपने बाप की बख़्शिश चाहना वह तो न था मगर एक वादे के सबब जो उससे कर चुका था, फिर जब इब्राहीम को खुल गया कि वह अल्लाह का दुश्मन है, उससे तिनका तोड़ दिया, बेशक इब्राहीम ज़रूर बहुत आहें करने वाला मुतहम्मिल है. (सूरए तौबह, आयत 114).

बेशक वह गुमराह है{86} और मुझे रूस्वा न करना जिस दिन सब उठाए जाएंगे (18){87}
(18) यानी क़यामत के दिन.

जिस दिन न माल काम आएगा न बेटे{88} मगर वह जो अल्लाह के हुज़ूर हाज़िर हुआ सलामत दिल लेकर (19){89}
(19) जो शिर्क, कुफ़्र  दोहरी प्रवृति से पाक हो उसको उसका माल भी नफ़ा देगा जो राहे ख़ुदा में ख़र्च किया हो  और औलाद भी जो सालेह हो, जैसा कि हदीस शरीफ़ में है कि आदमी मरता है, उसके अमल मुनक़ते हो जाते हैं सिवाय तीन के. एक सदक़ए जारिया, दूसरा वह माल जिससे लोग नफ़ा उठाएं, तीसरी नेक औलाद जो उसके लिये दुआ करे.

और क़रीब लाई जाएगी जन्नत पर परहेज़गारों के लिये(20){90}
(20) कि उसको देखेंगे.

और ज़ाहिर की जाएगी दोज़ख़ गुमराहों के लिये{91} और उनसे कहा जाएगा (21)
(21) मलामत और फटकार के तौर पर, उनके कुफ़्र व शिर्क पर.

कहां हैं वो जिन को तुम पूजते थे {92} अल्लाह के सिवा, क्या वो तुम्हारी मदद करेंगे(22)
(22) अल्लाह के अज़ाब से बचाकर.

या बदला लेंगे{93} तो औंधा दिये गए जहन्नम में वह और सब गुमराह (23){94}
(23) यानी बुत और उनके पुजारी सब औंधे करके जहन्नम में डाल दिये जाएंगे.

और इब्लीस के लश्कर सारे(24){95}
(24) यानी उसका अनुकरण  करने वाले जिन्न हों या इन्सान. कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा कि इब्लीस के लश्करों से उसकी सन्तान मुराद है.

कहेंगे और वो उसमें आपस में झगड़ते होंगे{96} ख़ुदा की क़सम बेशक हम खुली गुमराही में थे{97} जब कि तुम्हें सारे जगत के रब के बराबर ठहराते थे{98} और हमें न बहकाया मगर मुजरिमों ने(25){99}
(25) जिन्होंने बुत परस्ती की दावत दी या वो पहले लोग जिनका हमने अनुकरण किया या इब्लीस और उसकी सन्तान ने.

तो अब हमारा कोई सिफ़ारिशी नहीं(26){100}
(26) जैसे कि ईमान वालों के लिये अम्बिया और औलिया और फ़रिश्ते और मूमिनीन शफ़ाअत करने वाले हैं.

और न कोई ग़मख़्वार दोस्त(27) {101}
(27) जो काम आए, यह बात काफ़िर उस वक़्त कहेंगे जब देखेंगे कि अम्बिया और औलिया और फ़रिश्ते और नेक बन्दे ईमानदारों की शफ़ाअत कर रहे हैं और उनकी दोस्ती काम आ रही है. हदीस शरीफ़ में है कि जन्नती कहेगा, मेरे उस दोस्त का क्या हाल है और वह दोस्त गुनाहों की वजह से जहन्नम में होगा. अल्लाह तआला फ़रमाएगा कि इसके दोस्त को निकालों और जन्नत में दाख़िल करो तो जो लोग जहन्नम में बाक़ी रह जाएंगे वो ये कहेंगे कि हमारा कोई सिफ़ारशी नहीं है और न कोई दुख बाँटने वाला दोस्त, हसन रहमतुल्लाह अलैह ने फ़रमाया, ईमानदार दोस्त बढ़ाओ क्योंकि वो क़यामत के दिन शफ़ाअत करेंगे.

तो किसी तरह हमें फिर जाना होता(28)
(28) दुनिया में.
कि हम मुसलमान हो जाते {102} बेशक इसमें निशानी है, और उनमें बहुत ईमान वाले न थे{103} और बेशक तुम्हारा रब ही इज़्ज़त वाला मेहरबान है{104}

26 – सूरए शुअरा – छटा रूकू

26 – सूरए शुअरा – छटा रूकू

كَذَّبَتْ قَوْمُ نُوحٍ ٱلْمُرْسَلِينَ
إِذْ قَالَ لَهُمْ أَخُوهُمْ نُوحٌ أَلَا تَتَّقُونَ
إِنِّى لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌۭ
فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
وَمَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ
فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
۞ قَالُوٓا۟ أَنُؤْمِنُ لَكَ وَٱتَّبَعَكَ ٱلْأَرْذَلُونَ
قَالَ وَمَا عِلْمِى بِمَا كَانُوا۟ يَعْمَلُونَ
إِنْ حِسَابُهُمْ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّى ۖ لَوْ تَشْعُرُونَ
وَمَآ أَنَا۠ بِطَارِدِ ٱلْمُؤْمِنِينَ
إِنْ أَنَا۠ إِلَّا نَذِيرٌۭ مُّبِينٌۭ
قَالُوا۟ لَئِن لَّمْ تَنتَهِ يَٰنُوحُ لَتَكُونَنَّ مِنَ ٱلْمَرْجُومِينَ
قَالَ رَبِّ إِنَّ قَوْمِى كَذَّبُونِ
فَٱفْتَحْ بَيْنِى وَبَيْنَهُمْ فَتْحًۭا وَنَجِّنِى وَمَن مَّعِىَ مِنَ ٱلْمُؤْمِنِينَ
فَأَنجَيْنَٰهُ وَمَن مَّعَهُۥ فِى ٱلْفُلْكِ ٱلْمَشْحُونِ
ثُمَّ أَغْرَقْنَا بَعْدُ ٱلْبَاقِينَ
إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ

नूह की क़ौम ने पैग़म्बरों कोझुटलाया (1){105}
(1) यानी नूह अलैहिस्सलाम का झुटलाना सारे पैग़म्बरों का झुटलाना है क्योंकि दीन सारे रसूलों का एक है और हर एक नबी लोगों को तमाम नबियों पर ईमान लाने की दावत देते हैं.

जबकि उनसे उनके हम क़ौम नूह ने कहा क्या तुम डरते नहीं(2){106}
(2) अल्लाह तआला से, कि कुफ़्र और गुनाह का त्याग करो.

बेशक मैं तुम्हारे लिए अल्लाह का भेजा हुआ अमीन हूँ (3){107}
(3) उसकी वही और रिसालत की तबलीग़ पर, और आपकी अमानत आपकी क़ौम मानती थी जैसे कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के अमीन और ईमानदार होने पर सारा अरब सहमत था.

तो अल्लाह से डरो और मेरा हुक्म मानो(4){108}
(4) जो मैं तौहीद और ईमान और अल्लाह की फ़रमाँबरदारी के बारे में देता हूं.

और मैं उस पर तुम से कुछ उजरत नहीं मांगता, मेरा अज्र तो उसी पर है जो सारे जगत का रब है {109} तो अल्लाह से डरो और मेरा हुक्म मानो{110} बोले क्या हम तुम पर ईमान ले आएं और तुम्हारे साथ कमीने हुए हैं (5){111}
(5) यह बात उन्होंने घमण्ड से कही. ग़रीबों के पास बैठना उन्हें गवारा न था. इसमें वो अपना अपमान समझते थे. इसलिये ईमान जैसी नेअमत से मेहरूम रहे. कमीने से उनकी मुराद ग़रीब और व्यवसायी लोग थे और उनको ज़लील, तुच्छ और कमीना कहना, यह काफ़िरों का घमण्ड था वरना वास्तव में व्यवसाय और पेशा हैसियत दीन से आदमी को ज़लील नहीं करता. ग़िना अस्ल में दीनी अमीरी है और नसब तक़वा का नसब. मूमिन को ज़लील कहना जाइज़ नहीं, चाहे वह कितना ही मोहताज और नादार हो या वह किसी नसब का हो. (मदारिक).

फ़रमाया मुझे क्या ख़बर उनके काम क्या हैं(6){112}
(6) वे क्या पेशा करते हैं, मुझे इससे क्या मतलब , मैं उन्हें अल्लाह की तरफ़ दावत देता हूँ.

उनका हिसाब तो मेरे रब ही पर है(7)
(7) वही उन्हें जज़ा देगा.

अगर तुम्हें हिस (ज्ञान) हो (8){113}
(8) तो न तुम उन्हें ऐब लगाओ, न पेशों के कारण उनसे मुंह फेरो. फिर क़ौम ने कहा कि आप कमीनों को अपनी मजलिस से निकाल दीजिये ताकि हम आप के पास आएं और आपकी बात मानें. इसके जवाब में फ़रमाया.

और मैं मुसलमानों को दूर करने वाला नहीं(9){114}
(9) यह मेरी शान नहीं कि मैं तुम्हारी ऐसी इच्छाओ को पूरा करूं और तुम्हारे ईमान के लालच में मुसलमानों को अपने पास से निकाल दूं.

मैं तो नहीं मगर साफ़ डर सुनाने वाला(10){115}
(10) खुले प्रमाण के साथ, जिस से सच्चाई और बातिल में फ़र्क़ हो जाए तो जो ईमान लाए वही मेरे क़रीब है और जो ईमान न लाए, वही दूर.

बोले ऐ नूह अगर तुम बाज़ न आए (11)
(11)  दावत और डराने से.

तो ज़रूर संगसार (पथराव) किये जाओगे (12){116}
(12)  हज़रत नूह अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की बारगाह में.

अर्ज़ की ऐ मेरे रब मेरी क़ौम ने मुझे झुटलाया (13){117}
(13) तेरी वही और रिसालत में. मुराद आपकी यह थी कि मैं जो उन के हक़ में बददुआ करता हूँ उसका कारण यह नहीं है कि उन्होंने मुझे संगसार करने की धमकी दी. न यह कि उन्होंने मेरे मानने वालों को ज़लील समझा. बल्कि मेरी दुआ का कारण यह है कि उन्हों ने तेरे कलाम को झुटलाया और तेरी रिसालत को क़ुबूल करने से इन्कार किया.

तो मुझ में और उनमें पूरा फ़ैसला करदे और मुझे मेरे साथ वाले मुसलमानों को निजात दे(14){118}
(14) उन लोगों की शामतें आमाल से.

तो हमने बचा लिया उसे और उसके साथ वालों को भरी हुई किश्ती में(15) {119}
(15) जो आदमियों, पक्षियों और जानवरों से भरी हुई थी.

फिर उसके बाद(16)
(16)यानी हज़रत नूह अलैहिस्सलाम और उनके साथियों को निजात देने के बाद.

हमने बाक़ियों को डुबो दिया {120} बेशक इसमें ज़रूर निशानी है, और उनमें अकसर मुसलमान न थे{121} और बेशक तुम्हारा रब ही इज़्ज़त वाला मेहरबान है{122}

26 – सूरए शुअरा – सातवाँ रूकू

26 – सूरए शुअरा – सातवाँ रूकू

كَذَّبَتْ عَادٌ ٱلْمُرْسَلِينَ
إِذْ قَالَ لَهُمْ أَخُوهُمْ هُودٌ أَلَا تَتَّقُونَ
إِنِّى لَكُمْ رَسُولٌ أَمِينٌۭ
فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
وَمَآ أَسْـَٔلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ ۖ إِنْ أَجْرِىَ إِلَّا عَلَىٰ رَبِّ ٱلْعَٰلَمِينَ
أَتَبْنُونَ بِكُلِّ رِيعٍ ءَايَةًۭ تَعْبَثُونَ
وَتَتَّخِذُونَ مَصَانِعَ لَعَلَّكُمْ تَخْلُدُونَ
وَإِذَا بَطَشْتُم بَطَشْتُمْ جَبَّارِينَ
فَٱتَّقُوا۟ ٱللَّهَ وَأَطِيعُونِ
وَٱتَّقُوا۟ ٱلَّذِىٓ أَمَدَّكُم بِمَا تَعْلَمُونَ
أَمَدَّكُم بِأَنْعَٰمٍۢ وَبَنِينَ
وَجَنَّٰتٍۢ وَعُيُونٍ
إِنِّىٓ أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍۢ
قَالُوا۟ سَوَآءٌ عَلَيْنَآ أَوَعَظْتَ أَمْ لَمْ تَكُن مِّنَ ٱلْوَٰعِظِينَ
إِنْ هَٰذَآ إِلَّا خُلُقُ ٱلْأَوَّلِينَ
وَمَا نَحْنُ بِمُعَذَّبِينَ
فَكَذَّبُوهُ فَأَهْلَكْنَٰهُمْ ۗ إِنَّ فِى ذَٰلِكَ لَءَايَةًۭ ۖ وَمَا كَانَ أَكْثَرُهُم مُّؤْمِنِينَ
وَإِنَّ رَبَّكَ لَهُوَ ٱلْعَزِيزُ ٱلرَّحِيمُ

आद ने रसूलों को झुटलाया(1){123}
(1) आद एक क़बीला है और अस्ल में यह एक शख़्स का नाम है जिसकी सन्तान से यह क़बीला है.

जबकि उनसे उनके हक़ क़ौम हूद ने फ़रमाया क्या तुम डरते नहीं{124} बेशक मैं तुम्हारे लिये अमानत दार रसूल हूँ {125} तो अल्लाह से डरो(2)
(2) और मेरी तकज़ीब न करो यानी मूझे न झुटलाओ.

और मेरा हुक्म मानो{126} और मैं तुम से इस पर कुछ उजरत नहीं मांगता, मेरा अज्र तो उसी पर है जो सारे जगत का रब है{127} क्या हर बलन्दी पर एक निशान बनाते हो राहगीरों से हंसने को (3) {128}
(3) कि उस पर चढ़कर गुज़रने वालों से ठठ्ठा करो और यह उस क़ौम की आदत थी. उन्होंने रास्ते पर ऊंची बुनियादें बना ली थीं वहाँ बैठकर राहगीरों को परेशान करते और खेल करते.

और मज़बूत महल चुनते हो इस उम्मीद पर कि तुम हमेशा रहोगे(4){129}
(4) और कभी न मरोगे.

और जब किसी पर गिरफ़्त करते हो तो बड़ी बेदर्दी से गिरफ़्त करते हो (5){130}
(5) तलवार से क़त्ल करके, कोड़े मारकर, बहुत बेरहमी से.

तो अल्लाह से डरो और मेरा हुक्म मानो{131} और उससे डरो जिसने तुम्हारी मदद की उन चीज़ों से कि तुम्हें मालूम हैं(6){132}
(6) यानी वो नेअमतें जिन्हें तुम जानते हो, आगे उनका बयान फ़रमाया जाता है.

तुम्हारी मदद की चौपायों और बेटों {133} और बाग़ों और चश्मों (झरनों) से {134} बेशक मुझे तुम पर डर है एक बड़े दिन के अज़ाब का(7){135}
(7) अगर तुम मेरी नाफ़रमानी करो. इसका जवाब उनकी तरफ़ से यह हुआ कि…

बोले हमें बराबर है चाहे तुम नसीहत करो या नसीहत करने वालों में न हो(8){136}
(8) हम किसी तरह तुम्हारी बात न मानेंगे और तुम्हारी दावत क़ुबूल न करेंगे.

यह तो नहीं मगर वही अगलों की रीति(9){137}
(9) यानी जिन चीज़ों का आपने ख़ौफ़ दिलाया. यह पहलों का दस्तूर है, वो भी ऐसी ही बातें कहा करते थे. इससे उनकी मुराद यह थी कि हम उन बातों का ऐतिबार नहीं करते, उन्हें झूट जानते हैं. या आयत के मानी ये हैं कि मौत और ज़िन्दगी और ईमारतें बनाना पहलों का तरीक़ा है.

और हमें अज़ाब होना नहीं(10){138}
(10) दुनिया में न मरने के बाद उठना न आख़िरत में हिसाब.

तो उन्होंने उसे झुटलाया (11)
(11) यानी हूद अलैहिस्सलाम को.

तो हमने उन्हें हलाक किया(12)
(12) हवा के अज़ाब से.

बेशक इसमें ज़रूर निशानी है और उनमें बहुत मुसलमान न थे{139} और बेशक तुम्हारा रब ही इज़्ज़त वाला मेहरबान है{140}