38 सूरए सॉद -पहला रूकू

38 सूरए सॉद -पहला रूकू

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
ص ۚ وَالْقُرْآنِ ذِي الذِّكْرِ
بَلِ الَّذِينَ كَفَرُوا فِي عِزَّةٍ وَشِقَاقٍ
كَمْ أَهْلَكْنَا مِن قَبْلِهِم مِّن قَرْنٍ فَنَادَوا وَّلَاتَ حِينَ مَنَاصٍ
وَعَجِبُوا أَن جَاءَهُم مُّنذِرٌ مِّنْهُمْ ۖ وَقَالَ الْكَافِرُونَ هَٰذَا سَاحِرٌ كَذَّابٌ
أَجَعَلَ الْآلِهَةَ إِلَٰهًا وَاحِدًا ۖ إِنَّ هَٰذَا لَشَيْءٌ عُجَابٌ
وَانطَلَقَ الْمَلَأُ مِنْهُمْ أَنِ امْشُوا وَاصْبِرُوا عَلَىٰ آلِهَتِكُمْ ۖ إِنَّ هَٰذَا لَشَيْءٌ يُرَادُ
مَا سَمِعْنَا بِهَٰذَا فِي الْمِلَّةِ الْآخِرَةِ إِنْ هَٰذَا إِلَّا اخْتِلَاقٌ
أَأُنزِلَ عَلَيْهِ الذِّكْرُ مِن بَيْنِنَا ۚ بَلْ هُمْ فِي شَكٍّ مِّن ذِكْرِي ۖ بَل لَّمَّا يَذُوقُوا عَذَابِ
أَمْ عِندَهُمْ خَزَائِنُ رَحْمَةِ رَبِّكَ الْعَزِيزِ الْوَهَّابِ
أَمْ لَهُم مُّلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا ۖ فَلْيَرْتَقُوا فِي الْأَسْبَابِ
جُندٌ مَّا هُنَالِكَ مَهْزُومٌ مِّنَ الْأَحْزَابِ
كَذَّبَتْ قَبْلَهُمْ قَوْمُ نُوحٍ وَعَادٌ وَفِرْعَوْنُ ذُو الْأَوْتَادِ
وَثَمُودُ وَقَوْمُ لُوطٍ وَأَصْحَابُ الْأَيْكَةِ ۚ أُولَٰئِكَ الْأَحْزَابُ
إِن كُلٌّ إِلَّا كَذَّبَ الرُّسُلَ فَحَقَّ عِقَابِ

सूरए सॉद मक्का में उतरी, इसमें 88 आयतें, पांच रूकू हैं.

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए सॉद का नाम सूरए दाऊद भी है. य सूरत मक्के में उतरी, इसमें पांच रूकू, अठासी आयतें और सात सौ बत्तीस कलिमे और तीन हज़ार सढ़सठ अक्षर हैं.

इस नामवर क़ुरआन की क़सम(2){1}
(2) जो बुज़ुर्गी वाला है कि ये चमत्कारी कलाम है.

बल्कि काफ़िर तकब्बुर (घमण्ड) और ख़िलाफ़ (दुश्मनी) में हैं(3){2}
(3) और नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से दुश्मनी रखते हैं इसलिये सच्चाई को नहीं मानते.

हमने उनसे पहले कितनी संगते खपाई(4)
(4) यानी आपकी क़ौम से पहले कितनी उम्मतें हलाक कर दीं, इसी घमण्ड और नबियों के विरोध के कारण.

तो अब वो पुकारें (5)
(5)  यानी अज़ाब उतरने के वक़्त उन्होंने फ़रियाद की.

और छूटने का वक़्त न था(6){3}
(6) कि छुटकारा पा सकते. उस वक़्त की फ़रियाद बेकार थी. मक्के के काफ़िरों ने उनके हाल से इब्रत हासिल न की.

और उन्हें इसका अचंभा हुआ कि उनके पास उन्हीं में का एक डर सुनाने वाला तशरीफ़ लाया(7)
(7) यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

और काफ़िर बोले यह जादूगर है बड़ा झूटा{4} क्या उसने बहुत ख़ुदाओं का एक ख़ुदा कर दिया(8)
(8) जब हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो इस्लाम लाए तो मुसलमानों को ख़ुशी हुई और काफ़िरों को बहुत रंज हुआ. वलीद बिन मुग़ीरह ने क़ुरैश के पच्चीस प्रतिष्ठित आदमियों को जमा किया और उन्हें अबू तालिब के पास लाया और उनसे कहा कि तुम हमारे सरदार हो और बुज़ुर्ग हो. हम तुम्हारे पास इसलिये आए है कि तुम हमारे और अपने भतीजे के बीच फै़सला करदो. उनकी जमाअत के छोटे दर्जे के लोगों ने जो आतंक मचा रखा है वह तुम जानते हो. अबू तालिब ने हज़रत सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को बुलाकर अर्ज़ किया कि ये आपकी क़ौम के लोग हैं और आप से सुलह चाहते हैं आप उनकी तरफ़ से ज़रा सा भी मुंह न फेरिये. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया ये मुझसे क्या चाहते हैं, उन्होंने कहा कि हम इतना चाहते हैं कि आप हमें और हमारे मअबूदों का ज़िक्र छोड़ दीजिये. हम आपको और आपके मअबूद की बदगोई के पीछे न पढ़ेंगे. हुज़ूर अलैहिस्सलातो वसल्लाम ने फ़रमाया क्या तुम एक कलिमा क़ुबूल कर सकते हो जिस से अरब और अजम के मालिक और शासक हो जाओ. अबू जहल ने कहा कि एक क्या हम दस कलिमे क़ुबूल कर सकते हैं. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कहो ला इलाहा इल्लल्लाह, इसपर वो लोग उठ गए और कहने लगे कि क्या उन्होंने बहुत से ख़ुदाओं का एक ख़ुदा कर दिया इतनी बहुत सी मख़लूक़ के लिये एक ख़ुदा कैसे काफ़ी हो सकता है.

बेशक यह अजीब बात है {5} और उनमें के सरदार चले(9)
(9) अबू तालिब की मजलिस से आपस में यह कहते.

कि उसके पास से चल दो और अपने ख़ुदाओं पर साबिर रहो बेशक इसमें उसका कोई मतलब है{6} यह तो हमने सबसे पिछले दीन नसरानियत (ईसाइयत) में भी न सुनी(10)
(10) नसरानी भी तीन ख़ुदाओ के क़ाइल थे, ये तो एक ही ख़ुदा बताते है.

यह तो निरी नई गढ़त है {7} क्या उन पर क़ुरआन उतारा गया हम सब में से(11)
(11) मक्का वालों को सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के मन्सबे नबुव्वत पर हसद आया और उन्होंने यह कहा कि हम में इज़्ज़त और बुज़ुर्गी वाले आदमी मौजूद थे उनमें से किसी पर क़ुरआन न उतरा, ख़ास हज़रत सैयदुल अम्बिया मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर उतरा.

बल्कि वो शक में हैं मेरी किताब से(12)
(12) कि उसके लाने वाले हज़रत मुहम्मद सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को झुटलाते हैं.

बल्कि अभी मेरी मार नहीं चखी है(13){8}
(13) अगर मेरा अज़ाब चख़ लेते तो यह शक, झुटलाने की प्रवृति और हसद कुछ भी बक़ी न रहता और नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तस्दीक़ करते लेकिन उस वक़्त की तस्दीक़ लाभदायक़ न होती.

क्या वो तुम्हारे रब की रहमत के ख़ज़ानची हैं(14)
(14)और क्या नबुव्वत की कुंजियाँ उनके हाथ में हैं जिसे चाहे दें.  अपने आपको क्या समझते हैं. अल्लाह तआला और उसकी मालिकियत को नहीं जानते.

वह इज़्ज़त वाला बहुत अता फ़रमाने वाला है(15) {9}
(15) हिकमत के तक़ाजे के अनुसार जिसे जो चाहे अता फ़रमाए. उसने अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को नबुव्वत अता फ़रमाई तो किसी को उसमें दख़्ल देने और क्यों कैसे करने की क्या मजाल.

क्या उनके लिये है सल्तनत आसमानों और ज़मीन की और जो कुछ उनके बीच है, तो रस्सियाँ लटकाकर चढ़ न जाएं(16) {10}
(16) और ऐसा इख़्तियार हो तो जिसे चाहे वही के साथ ख़ास करें और संसार की तदबीरें अपने हाथ में लें और जब यह कुछ नहीं तो अल्लाह की हिकमतों और उसके कामों में दख़्ल क्यों देते हैं. उन्हें इसका क्या हक़ है. काफ़िरों को यह जवाब देने के बाद अल्लाह तआला ने अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से नुसरत और मदद का वादा फ़रमाया है.

यह एक ज़लील लश्कर है उन्हीं लश्करों में से जो वहीं भगा दिया जाएगा (17){11}
(17) यानी इन क़ुरैश की जमाअत उन्हीं लश्करों में से एक है जो आप से पहले नबियों के विरूद्ध गिरोह बांधकर आया करते थे और यातनाएं देते थे. उस कारण हलाक कर दिये गए. अल्लाह तआला ने अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को ख़बर दी कि यही हाल इनका है इन्हें भी हार होगी. चुनांन्चे बद्र में ऐसा ही हुआ. इसके बाद अल्लाह तआला ने अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली के लिये पिछले नबियों और उनकी क़ौम का ज़िक्र फ़रमाया.

उनसे पहले झुटला चुके हैं नूह की क़ौम और आद और चौमेख़ा करने वाला फ़िरऔन(18){12}
(18) जो किसी पर ग़ुस्सा करता था तो उसे लिटाकर उसके चारों हाथ पाँव खींच कर चारों तरफ़ खूंटों में बंधवा देता था फिर उसको पिटवाता था और उस पर तरह तरह की सख़्तियाँ करता था.

और समूद और लूत की क़ौम और बन वाले (19)
(19) जो शुऐब अलैहिस्सलाम की क़ौम से थे.

ये हैं वो गिरोह(20){13}
(20)जो नबियों के विरूद्ध जत्थे बांधकर आए. मक्के के मुश्रिक उन्हीं समूहों में से हैं.

उनमें कोई ऐसा नहीं जिसने रसूलों को न झुटलाया हो तो मेरा अज़ाब लाज़िम हुआ(21){14}
(21) यानी उन गुज़री उम्मतों ने जब नबियों को झुटलाया तो उनपर अज़ाब लाज़िम हो गया. तो उन कमज़ोरों का क्या हाल होगा जब उनपर अज़ाब उतरेगा.

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38 सूरए सॉद -दूसरा रूकू

38 सूरए सॉद -दूसरा रूकू

وَمَا يَنظُرُ هَٰؤُلَاءِ إِلَّا صَيْحَةً وَاحِدَةً مَّا لَهَا مِن فَوَاقٍ
وَقَالُوا رَبَّنَا عَجِّل لَّنَا قِطَّنَا قَبْلَ يَوْمِ الْحِسَابِ
اصْبِرْ عَلَىٰ مَا يَقُولُونَ وَاذْكُرْ عَبْدَنَا دَاوُودَ ذَا الْأَيْدِ ۖ إِنَّهُ أَوَّابٌ
إِنَّا سَخَّرْنَا الْجِبَالَ مَعَهُ يُسَبِّحْنَ بِالْعَشِيِّ وَالْإِشْرَاقِ
وَالطَّيْرَ مَحْشُورَةً ۖ كُلٌّ لَّهُ أَوَّابٌ
وَشَدَدْنَا مُلْكَهُ وَآتَيْنَاهُ الْحِكْمَةَ وَفَصْلَ الْخِطَابِ
۞ وَهَلْ أَتَاكَ نَبَأُ الْخَصْمِ إِذْ تَسَوَّرُوا الْمِحْرَابَ
إِذْ دَخَلُوا عَلَىٰ دَاوُودَ فَفَزِعَ مِنْهُمْ ۖ قَالُوا لَا تَخَفْ ۖ خَصْمَانِ بَغَىٰ بَعْضُنَا عَلَىٰ بَعْضٍ فَاحْكُم بَيْنَنَا بِالْحَقِّ وَلَا تُشْطِطْ وَاهْدِنَا إِلَىٰ سَوَاءِ الصِّرَاطِ
إِنَّ هَٰذَا أَخِي لَهُ تِسْعٌ وَتِسْعُونَ نَعْجَةً وَلِيَ نَعْجَةٌ وَاحِدَةٌ فَقَالَ أَكْفِلْنِيهَا وَعَزَّنِي فِي الْخِطَابِ
قَالَ لَقَدْ ظَلَمَكَ بِسُؤَالِ نَعْجَتِكَ إِلَىٰ نِعَاجِهِ ۖ وَإِنَّ كَثِيرًا مِّنَ الْخُلَطَاءِ لَيَبْغِي بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ إِلَّا الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَقَلِيلٌ مَّا هُمْ ۗ وَظَنَّ دَاوُودُ أَنَّمَا فَتَنَّاهُ فَاسْتَغْفَرَ رَبَّهُ وَخَرَّ رَاكِعًا وَأَنَابَ ۩
فَغَفَرْنَا لَهُ ذَٰلِكَ ۖ وَإِنَّ لَهُ عِندَنَا لَزُلْفَىٰ وَحُسْنَ مَآبٍ
يَا دَاوُودُ إِنَّا جَعَلْنَاكَ خَلِيفَةً فِي الْأَرْضِ فَاحْكُم بَيْنَ النَّاسِ بِالْحَقِّ وَلَا تَتَّبِعِ الْهَوَىٰ فَيُضِلَّكَ عَن سَبِيلِ اللَّهِ ۚ إِنَّ الَّذِينَ يَضِلُّونَ عَن سَبِيلِ اللَّهِ لَهُمْ عَذَابٌ شَدِيدٌ بِمَا نَسُوا يَوْمَ الْحِسَابِ

और ये राह नहीं देखते मगर एक चीख़ की(1)
(1)  यानी क़यामत के पहले सूर के फूंके जाने की, जो उनके अज़ाब की मीआद है.

जिसे कोई फेर नहीं सकता {15} और बोले ऐ हमारे रब हमारा हिस्सा हमें जल्द दे दे हिसाब के दिन से पहले(2){16}
(2) यह नज़र बिर हारिस ने हंसी के तौर पर कहा था, इसपर अल्लाह तआला ने अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से फ़रमाया कि—-

तुम उनकी बातों पर सब्र करो और हमारे बन्दे दाऊद नेअमातें वाले को याद करो(3)
(3) जिन को इबादत की बहुत कुव्वत दी गई थी. आप का तरीक़ा था कि एक दिन रोज़ा रखते, एक दिन इफ़्तार करते और रात के पहले आधे हिस्से में इबादत करते उसके बाद रात की एक तिहाई आराम फ़रमाते फिर बाक़ी छटा इबादत में गुज़ारते.

बेशक वह बड़ा  रूजू करने वाला है (4) {17}
(4) अपने रब की तरफ.

बेशक हमने उसके साथ पहाड़ मुसख़्ख़र (वशीभूत) फ़रमा दिये कि तस्बीह करते(5)
(5) हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की तस्बीह के साथ.

शाम को और सूरज चमकते{18} (6)
(6)  इस आयत की तफ़सीर में यह भी कहा गया है कि अल्लाह तआला ने हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम के लिये पहाड़ों को ऐसा मुसख़्ख़र यानी वशीभूत किया था कि जहाँ आप चाहते साथ ले जाते. (मदारिक)

और परिंदे जमा किए हुए सब उसके फ़रमाँबरदार थे(7){19}
(7) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि जब हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम तस्बीह करते तो पहाड़ भी आपके साथ तस्बीह करते और पक्षी आपके पास जमा होकर तस्बीह करते.

(8)
(8) पहाड़ भी और पक्षी भी.

और हमने उसकी सल्तनत को मज़बूत किया(9)
(9) फ़ौज़ और लश्कर की कसरत अता फ़रमाकर. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि धरती के बादशाहों में हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की बड़ी मज़बूत और ताक़तवार सल्तनत थी, छत्तीस हज़ार मर्द आप की मेहराब के पहरे पर मुक़र्रर थे.

और उसे हिकमत (बोध)(10)
(10) यानी नबुव्वत. कुछ मुफ़स्सिरों ने हिकमत की तफ़सीर इन्साफ़ की है, कुछ ने अल्लाह की किताब का इल्म, कुछ ने फ़िक़्ह, कुछ ने सुन्नत (जुमल)

और क़ौले फ़ैसल दिया(11) {20}
(11) क़ौले फ़ैसल से इल्मे कज़ा मुराद है जो सच और झूठ, सत्य और असत्य में फ़र्क़ और तमीज़ कर दे.

और क्या तुम्हें (12)
(12) ऐ सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

उस दावे वालों की भी ख़बर आई, जब वो दीवार कूद कर दाऊद की मस्जिद में आए(13){21}
(13) ये आने वाले, मशहूर क़ौल के अनुसार, फ़रिश्ते थे, जो हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की आज़मायश के लिये आए थे.

जब वो दाऊद पर दाख़िल हुए तो वह उनसे घबरा गया उन्होंने अर्ज़ की डरिये नहीं हम दो फ़रीक़ (पक्ष) हैं कि एक ने दूसरे पर ज़ियादती की है(14)
(14) उनका यह क़ौल एक मसअले की फ़र्ज़ी शक्ल पेश करके जवाब हासिल करना था और किसी मसअले के बारे में हुक्म मालूम करने के लिये फ़र्ज़ी सूरतें मुक़र्रर कर ली जाती हैं और निर्धारित व्यक्तियों की तरफ़ उनकी निस्बत कर दी जाती है. ताकि मसअले का बयान बहुत साफ़ तरीक़े पर हो और इबहाम बाक़ी न रहे. यहाँ जो मसअले की सूरत इन फ़रिश्तों ने पेश की इस से मक़सूद हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम को तवज्जह दिलाना था इस बात की तरफ़, जो उन्हें पेश आई थी और वह यह थी किं आपकी 99 बीबियाँ थीं. इसके बाद आपने एक और औरत को पयाम दे दिया जिसको एक मुसलमान पहले से पयाम दे चुका था लेकिन आपका संदेश पहुंचने के बाद औरत के अज़ीज़ रिश्तेदार दूसरे की तरफ़ इल्तिफ़ात करने वाल कब थे. आपके लिये राज़ी हो गए और आपसे निकाहा हो गया. एक क़ौल यह भी है कि उस मुसलमान के साथ निकाह हो चुका था. आपने उस मुसलमान से अपनी रग़बत का इज़हार किया और चाहा कि वह अपनी औरत को तलाक़ दे दे. वह आपके लिहाज़ से मना न कर सका और उसने तलाक़ दे दी. आपका निकाह हो गया. और उस ज़माने में ऐसा मामूल था कि अगर किसी व्यक्ति को किसी औरत की तरफ़ रग़बत होती तो उसके शौहर से इस्तिदआ करके तलाक़ दिलवा लेता और इद्दत के बाद निकाह कर लेता. यह बात न तो शरअई तौर पर नाजायज़ है न उस ज़माने की रस्म और आदत के ख़िलाफ़, लेकिन नबियों की शान बहुत ऊंची होती है इसलिये यह आपके ऊंचे मन्सब के लायक़ न था तो अल्लाह की मर्ज़ी यह हुई कि आपको इसपर आगाह किया जाए और उसका सबब यह पैदा किया कि फ़रिश्ते मुद्दई और मुद्दआ अलैह की शक्ल में आपके सामने पेश हुए. इस से मालूम हुआ कि अगर बुज़ु्र्गों से कोई लग़ज़िश सादिर हो और कोई बात शान के ख़िलाफ़ वाक़े हो जाए तो अदब यह है कि आलोचनात्मक ज़बान न खोली जाए बल्कि इस वाक़ए जैसा एक वाक़ए की कल्पना करके उसकी निस्बत जानकारी हासिल करने के लिये सवाल किया जाए और उनके आदर और सम्मान का भी ख़याल रखा जाए और यह भी मालूम हुआ कि अल्लाह तआला मालिको मौला अपने नबियों की ऐसी इज़्ज़त  फ़रमाता है कि उनको किसी बात पर आगाह करने के लिये फ़रिश्तों को इस तरीक़े पर अदब के साथ हाज़िर होने का हुक्म देता है.

तो हममें सच्चा फ़ैसला फ़रमा दीजिये और हक़ के ख़िलाफ़ न कीजिये(15)
(15) जिसकी ग़लती हो, बेझिझक फ़रमा दीजिये.

और हमें सीधी राह बताइये {22} बेशक यह मेरा भाई है (16)
(16) यानी दीनी भाई.

इसके पास निन्यानवे दुंबियां है और मेरे पास एक दुंबी, अब यह कहता है वह भी मुझे हवाले कर दे और बात में मुझ पर ज़ोर डालता है{23} दाऊद ने फ़रमाया बेशक यह तुझ पर ज़ियादती करता है कि तेरी दुंबी अपनी दुंबियों में मिलाने को मांगता है, और बेशक अक्सर साझे वाले एक दूसरे पर ज़ियादती करते हैं मगर जो ईमान लाए और अच्छे काम किये और वो बहुत थोड़े हैं(17)
(17) हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की यह बात सुनकर फ़रिश्तों में से एक ने दूसरे की तरफ़ देखा और मुस्कुरा के वो आसमान की तरफ़ रवाना हो गए.

अब दाऊद समझा कि हमने यह उसकी जांच की थी(18)
(18) और दुम्बी एक किनाया था जिस से मुराद औरत थी क्योंकि निनानवें औरतें आपके पास होते हुए एक और औरत की आपने ख़्वाहिश की थी इसलिये दुम्बी के पैराए में सवाल किया गया जब आपने यह समझा.

तो अपने रब से माफ़ी मांगी और सज्दे में गिर पड़ा (19)
(19) इस आयत से साबित होता है कि नमाज़ में रूकू करना तिलावत के सज्दे के क़ायम मुक़ाम हो जाता है जब कि नियत की जाए.

और रूजू लाया {24} तो हमने उसे यह माफ़ फ़रमाया, और बेशक उसके लिये हमारी बारगाह में ज़रूर नज़्दीकी और अच्छा ठिकाना है {25} ऐ दाऊद बेशक हमने तुझे ज़मीन में नायब किया(20)
(20) ख़ल्क़ की तदबीर पर आपको मामूर किया और आपका हुक्म उनमें नाफ़िज़ फ़रमाया.

तो लोगों में सच्चा हुक्म कर और ख़्वाहिश के पीछे न जाना कि तुझे अल्लाह की राह से बहका देगी बेशक वो जो अल्लाह की राह से बहकाते हैं उन के लिये सख़्त अज़ाब है इस पर कि वो हिसाब के दिन को भूल बैठे(21){26}
(21) और इस वजह से ईमान से मेहरूम रहे. अगर उन्हें हिसाब के दिन का यक़ीन होता तो दुनिया ही में ईमान ले आते.

38 सूरए सॉद -तीसरा रूकू

38 सूरए सॉद -तीसरा रूकू

وَمَا خَلَقْنَا السَّمَاءَ وَالْأَرْضَ وَمَا بَيْنَهُمَا بَاطِلًا ۚ ذَٰلِكَ ظَنُّ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ فَوَيْلٌ لِّلَّذِينَ كَفَرُوا مِنَ النَّارِ
أَمْ نَجْعَلُ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ كَالْمُفْسِدِينَ فِي الْأَرْضِ أَمْ نَجْعَلُ الْمُتَّقِينَ كَالْفُجَّارِ
كِتَابٌ أَنزَلْنَاهُ إِلَيْكَ مُبَارَكٌ لِّيَدَّبَّرُوا آيَاتِهِ وَلِيَتَذَكَّرَ أُولُو الْأَلْبَابِ
وَوَهَبْنَا لِدَاوُودَ سُلَيْمَانَ ۚ نِعْمَ الْعَبْدُ ۖ إِنَّهُ أَوَّابٌ
إِذْ عُرِضَ عَلَيْهِ بِالْعَشِيِّ الصَّافِنَاتُ الْجِيَادُ
فَقَالَ إِنِّي أَحْبَبْتُ حُبَّ الْخَيْرِ عَن ذِكْرِ رَبِّي حَتَّىٰ تَوَارَتْ بِالْحِجَابِ
رُدُّوهَا عَلَيَّ ۖ فَطَفِقَ مَسْحًا بِالسُّوقِ وَالْأَعْنَاقِ
وَلَقَدْ فَتَنَّا سُلَيْمَانَ وَأَلْقَيْنَا عَلَىٰ كُرْسِيِّهِ جَسَدًا ثُمَّ أَنَابَ
قَالَ رَبِّ اغْفِرْ لِي وَهَبْ لِي مُلْكًا لَّا يَنبَغِي لِأَحَدٍ مِّن بَعْدِي ۖ إِنَّكَ أَنتَ الْوَهَّابُ
فَسَخَّرْنَا لَهُ الرِّيحَ تَجْرِي بِأَمْرِهِ رُخَاءً حَيْثُ أَصَابَ
وَالشَّيَاطِينَ كُلَّ بَنَّاءٍ وَغَوَّاصٍ
وَآخَرِينَ مُقَرَّنِينَ فِي الْأَصْفَادِ
هَٰذَا عَطَاؤُنَا فَامْنُنْ أَوْ أَمْسِكْ بِغَيْرِ حِسَابٍ
وَإِنَّ لَهُ عِندَنَا لَزُلْفَىٰ وَحُسْنَ مَآبٍ

और हमने आसमान और ज़मीन और जो कुछ उनके बीच है बेकार न बनाए, यह काफ़िरों का गुमान है(1)
(1)  अगरचे वो साफ़ यह न कहें कि आसमान और ज़मीन और तमाम दुनिया बेकार पैदा की गई लेकिन जब कि दोबारा उठाए जाने और जज़ा के इन्कारी हैं तो नतीजा यही है कि जगत की सृष्टि को बेकार और बे फ़ायदा मानें.

तो काफ़िरों की ख़राबी है आग से {27} क्या हम उन्हें जो ईमान लाए और अच्छे काम किये उन जैसा करदें जो ज़मीन में फ़साद फैलाते हैं या हम परहेज़गारों को शरीर बेहुक्मों के बराबर ठहराएं (2){28}
(2) यह बात बिल्कुल हिकमत के ख़िलाफ़. और जो व्यक्ति जज़ा का क़ायल नहीं वह फ़सादी और इस्लाह करने वाले और बदकार और परहेज़गार को बरबार क़रार देगा और उन में फ़र्क़ न करेगा. काफ़िर इस जिहालत में गिरफ़तार हैं. क़ुरैश के काफ़िरों ने मुसलमानों से कहा था कि आख़िरत में जो नेअमतें तुम्हें मिलेंगी वही हमें भी मिलेंगी. इसपर यह आयत उतरी और इरशाद फ़रमाया गया कि अच्छे बुरे. मूमिन और काफ़िर को बराबर कर देना हिकमत का तक़ाज़ा नहीं, काफ़िरों का ख़याल ग़लत है.

यह एक किताब है कि हमने तुम्हारी तरफ़ उतारी(3)
(3) यानी क़ुरआन शरीफ़.

बरकत वाली ताकि इसकी आयतों को सोचें और अक़्लमन्द नसीहत मानें {29} और हमने दाऊद को(4)
(4) लायक़ बेटा.

सुलैमान अता फ़रमाया, क्या अच्छा बन्दा, बेशक वह बहुत रूजू लाने वाला(5){30}
(5) अल्लाह तआला की तरफ़ और सारे वक़्त तस्बीह और ज़िक्र में मश्ग़ूल रहने वाला.

जब कि उसपर पेश किये गए तीसरे पहर को(6)
(6) ज़ोहर के बाद ऐसे घोड़े.

कि रोकिये तो तीन पाँव पर खड़े हों चौथे सुम का किनारा ज़मीन पर लगाए हुए और चलाइये तो हवा हो जाएं(7){31}
(7) ये हज़ार घोड़े थे जो जिहाद के लिये हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम की ख़िदमत में ज़ोहर के बाद पेश किये गए.

तो सुलैमान ने कहा मुझे उन घोड़ों की महब्बत पसन्द आई है अपने रब की याद के लिये(8)
(8) यानी मैं उनसे अल्लाह की रज़ा और दीन की क़ुव्वत और ताईद के लिये महब्बत करता हूँ, मेरी महब्बत उनके साथ दुनिया की ग़रज़ से नहीं है. (तफ़सीरे कबीर)

फिर उन्हें चलाने का हुक्म दिया यहाँ तक कि निगाह से पर्दे में छुप गए (9){32}
(9) यानी नज़र से ग़ायब हो गए.

फिर हुक्म दिया कि उन्हें मेरे पास वापस लाओ तो उनकी पिंडलियों और गर्दनों पर हाथ फेरने लगा (10){33}
(10) और इस हाथ फ़ेरने के कुछ कारण थे, एक तो घोड़ो की इज़्ज़त और बुज़ुर्गी का इज़हार कि वो दुश्मन के मुक़ाबले में बेहतरीन मददगार हैं, दूसरे सल्तनत के कामों की ख़ुद निगरानी फ़रमाना कि तमाम काम करने वाले मुस्तइद रहें, तीसरे यह कि आप घोड़ों के अहवाल और उनके रोगों और दोषों के ऊंचे माहिर थे. उन पर हाथ फैर कर उनकी हालत का इम्तिहान फ़रमाते थे. कुछ मुफ़स्सिरों ने इन आयतों की तफ़सीर में बहुत से ऐसे वैसे क़ौल लिख दिये जिन की सच्चाई पर कोई प्रमाण नहीं और वो केवल हिकायतें है जो मज़बूत प्रमाणों के सामने किसी तरह क़ुबूल करने के योग्य नहीं और यह तफ़सीर जो ज़िक्र की गई, यह इबारत क़ुरआन से बिल्कुल मुताबिक़ है. (तफ़सीरे कबीर)

और बेशक हमने सुलैमान को जांचा(11)
(11) बुख़ारी व मुस्लिम शरीफ़ में हज़रत अबू हुरैरा रदियल्लाहो अन्हो की हदीस है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया था कि मैं आज रात में अपनी नव्वे बीबियों पर दौरा करूंगा. हर एक हामिला होगी और हर एक से ख़ुदा की राह में जिहाद करने वाला सवार पैदा होगा. मगर यह फ़रमाते वक़्त ज़बाने मुबारक से इन्शाअल्लाह न फ़रमाया (शायद हज़रत किसी ऐसे शग़्ल में थे कि इसका ख़याल न रहा) तो कोई भी औरत गर्भवती न हुई सिवाए एक के और उसके भी अधूरा बच्चा पैदा हुआ. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि अगर हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने इन्शाअल्लाह फ़रमाया होता तो उन सब औरतों के लड़के ही पैदा होते और वो ख़ुदा की राह में जिहाद करते. (बुख़ारी पारा तेरह, किताबुल अम्बिया)

और उसके तख़्त पर एक बेजान बदन डाल दिया(12) {34}
(12) यानी अधूरा बच्चा.

फिर रूजू लाया(13)
(13) अल्लाह तआला की तरफ़ इस्तिग़फ़ार करके इन्शाअल्लाह कहने की भूल पर और हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की बारगाह में.

अर्ज़ की ऐ मेरे रब मुझे बख़्श दे और मुझे ऐसी सल्तनत अता कर कि मेरे बाद किसी को लायक़ न हो(14)
(14) इससे यह मक़सूद था कि ऐसा मुल्क आपके लिये चमत्कार हो.

बेशक तू ही है बड़ी दैन वाला {35} तो हमने हवा उसके बस में कर दी कि उसके हुक्म से नर्म नर्म चलती(15)
(15) फ़रमाँबरदारी के तरीक़े से.

जहाँ वह चाहता {36} और देव बस में कर दिये हर मेमार(16)
(16) जो आपके हुक्म और मर्ज़ी के अनुसार अजीब इमारते तामीर करता.

और गौताख़ोर (17){37}
(17) जो आपके लिये समन्दर के मोती निकालता. दुनिया में सब से पहले समन्दर से मोती निकालने वाले आप ही हैं.

और दूसरे और बेड़ियों में जकड़े हुए(18) {38}
(18) सरकश शैतान भी आपके बस में कर दिये गए जिनको आप फ़साद से रोकने के लिये बेड़ियों और ज़ंजीरों में जकड़वा कर कै़द करते थे.

यह हमारी अता है अब तू चाहे तो एहसान कर(19)
(19) जिस पर चाहे.

या रोक रख(20)
(20) जिस किसी से चाहे यानी आप को देने और न देने का इख़्तियार दिया गया जैसी मर्ज़ी हो करें.

तुझ पर कुछ हिसाब नहीं {39} और बेशक उसके लिये हमारी बारगाह में ज़रूर नज़्दीकी और अच्छा ठिकाना है{40}

38 सूरए सॉद -चौथा रूकू

38 सूरए सॉद -चौथा रूकू

وَاذْكُرْ عَبْدَنَا أَيُّوبَ إِذْ نَادَىٰ رَبَّهُ أَنِّي مَسَّنِيَ الشَّيْطَانُ بِنُصْبٍ وَعَذَابٍ
ارْكُضْ بِرِجْلِكَ ۖ هَٰذَا مُغْتَسَلٌ بَارِدٌ وَشَرَابٌ
وَوَهَبْنَا لَهُ أَهْلَهُ وَمِثْلَهُم مَّعَهُمْ رَحْمَةً مِّنَّا وَذِكْرَىٰ لِأُولِي الْأَلْبَابِ
وَخُذْ بِيَدِكَ ضِغْثًا فَاضْرِب بِّهِ وَلَا تَحْنَثْ ۗ إِنَّا وَجَدْنَاهُ صَابِرًا ۚ نِّعْمَ الْعَبْدُ ۖ إِنَّهُ أَوَّابٌ
وَاذْكُرْ عِبَادَنَا إِبْرَاهِيمَ وَإِسْحَاقَ وَيَعْقُوبَ أُولِي الْأَيْدِي وَالْأَبْصَارِ
إِنَّا أَخْلَصْنَاهُم بِخَالِصَةٍ ذِكْرَى الدَّارِ
وَإِنَّهُمْ عِندَنَا لَمِنَ الْمُصْطَفَيْنَ الْأَخْيَارِ
وَاذْكُرْ إِسْمَاعِيلَ وَالْيَسَعَ وَذَا الْكِفْلِ ۖ وَكُلٌّ مِّنَ الْأَخْيَارِ
هَٰذَا ذِكْرٌ ۚ وَإِنَّ لِلْمُتَّقِينَ لَحُسْنَ مَآبٍ
جَنَّاتِ عَدْنٍ مُّفَتَّحَةً لَّهُمُ الْأَبْوَابُ
مُتَّكِئِينَ فِيهَا يَدْعُونَ فِيهَا بِفَاكِهَةٍ كَثِيرَةٍ وَشَرَابٍ
۞ وَعِندَهُمْ قَاصِرَاتُ الطَّرْفِ أَتْرَابٌ
هَٰذَا مَا تُوعَدُونَ لِيَوْمِ الْحِسَابِ
إِنَّ هَٰذَا لَرِزْقُنَا مَا لَهُ مِن نَّفَادٍ
هَٰذَا ۚ وَإِنَّ لِلطَّاغِينَ لَشَرَّ مَآبٍ
جَهَنَّمَ يَصْلَوْنَهَا فَبِئْسَ الْمِهَادُ
هَٰذَا فَلْيَذُوقُوهُ حَمِيمٌ وَغَسَّاقٌ
وَآخَرُ مِن شَكْلِهِ أَزْوَاجٌ
هَٰذَا فَوْجٌ مُّقْتَحِمٌ مَّعَكُمْ ۖ لَا مَرْحَبًا بِهِمْ ۚ إِنَّهُمْ صَالُو النَّارِ
قَالُوا بَلْ أَنتُمْ لَا مَرْحَبًا بِكُمْ ۖ أَنتُمْ قَدَّمْتُمُوهُ لَنَا ۖ فَبِئْسَ الْقَرَارُ
قَالُوا رَبَّنَا مَن قَدَّمَ لَنَا هَٰذَا فَزِدْهُ عَذَابًا ضِعْفًا فِي النَّارِ
وَقَالُوا مَا لَنَا لَا نَرَىٰ رِجَالًا كُنَّا نَعُدُّهُم مِّنَ الْأَشْرَارِ
أَتَّخَذْنَاهُمْ سِخْرِيًّا أَمْ زَاغَتْ عَنْهُمُ الْأَبْصَارُ
إِنَّ ذَٰلِكَ لَحَقٌّ تَخَاصُمُ أَهْلِ النَّارِ

और याद करो हमारे बन्दे अय्यूब को जब उसने अपने रब को पुकारा कि मुझे शैतान ने तकलीफ़ और ईज़ा लगा दी (1) {41}
(1) जिस्म और माल में, इस से आप की बीमारी और इसकी सख़्तियाँ मुराद हैं. इस वाक़्ए का तफ़सीली बयान सूरए अम्बिया के छटे रूकू में गुज़र चुका हैं.

हमने फ़रमाया ज़मीन पर अपना पाँव मार(2)
(2) चुनांन्वे आपने जमीन में पावँ मारा और उससे मीठे पानी का एक चश्मा ज़ाहिर हुआ और आप से कहा गया.

यह है ठण्डा चश्मा नहाने और पीने को(3) {42}
(3) चुनांन्चे आप ने उससे पिया और ग़ुस्ल किया और तमाम ज़ाहिरी और बातिनी बीमारियाँ और तकलीफ़े दूर हो गई.

और हमने उसे उसके घर वाले और उनके बराबर और अता फ़रमा दिये अपनी रहमत करने(4)
(4) चुनांन्चे रिवायत है कि जो औलाद आप की मर चुकी थी अल्लाह तआला ने उसको ज़िन्दा किया और अपने फ़ज़्ल और रहमत से उतने ही और अता फ़रमाए.

और अक़्लमन्दों की नसीहत को {43} और फ़रमाया कि अपने हाथ में एक झाड़ू लेकर उससे मार दे(5)
(5) अपनी बीबी को जिसकी सौ ज़रबें मारने की क़स्म खाई थी, देर से हाज़िर होने के कारण.

और क़सम न तोड़, बेशक हमने उसे साबिर पाया, क्या अच्छा बन्दा(6)
(6) यानी अय्यूब अलैहिस्सलाम.

बेशक वह बहुत रूजू लाने वाला है {44} और याद करो हमारे बन्दों इब्राहीम और इस्हाक़ और यअक़ूब क़ुदरत और इल्म वालों को(7){45}
(7) जिन्हें अल्लाह तआला ने इल्म और अमल की हिकमत अता फ़रमाई और अपनी पहचान और फ़रमाँबरदारी पर दृढ़ता अता की.

बेशक हमने उन्हें एक खरी बात से इम्तियाज़ (विशेषता) बख़्शा कि वह उस घर की याद है(8){46}
(8) यानी आख़िरत की कि वह लोगो को उसी की चाह दिलाते हैं और बहुतात से उसका ज़िक्र करते हैं. दुनिया की महब्बत ने उनके दिलों में जगह नहीं पाई.

और बेशक वो हमारे नज़्दीक़ चुने हुए पसन्दीदा हैं {47} और याद करो इस्माईल और यसआ और ज़ुलकिफ़्ल को(9)
(9) यानी उनके फ़जाइल और उनके सब्र को, ताकि उनकी पाक ख़सलतों से लोग नेकियों का ज़ौक़ व शौक़ हासिल करें और ज़ुलकिफ़्ल की नबुव्वत में मतभेद है.

और सब अच्छे हैं {48} यह नसीहत है, और बेशक(10)
(10) आख़िरत में.

परहेज़गारों का ठिकाना भला {49} बसने के बाग़ उनके लिये सब दरवाज़ें खुले हुए {50} उसमें तकिया लगाए (11)
(11) सजे हुए तख़्तों पर.

उनमें बहुत से मेवे और शराब मांगते हैं {51} और उनके पास वो बीबियाँ हैं कि अपने शौहर के सिवा और की तरफ़ आंख नहीं उठातीं एक उम्र की (12) {52}
(12) यानी सब उम्र में बराबर, ऐसे ही हुस्न व जवानी में आपस में महब्बत रखने वाले, न एक को दूसरे से बुगज़, न रश्क, न हसद.

यह है जिसका वादा दिया जाता है हिसाब के दिन {53} बेशक यह हमारा रिज़्क़ है कि कभी ख़त्म न होगा (13){54}
(13) हमेशा बाक़ी रहेगा. वहाँ जो चीज़ ली जाएगी और ख़र्च की जाएगी वह अपनी जगह वैसी ही हो जाएगी. दुनिया की चीज़ों की तरह फ़ना और नेस्त नाबूद न होगी.

उनको तो यह है(14)
(14) यानी ईमान वालों को.

और बेशक सरकशों का बुरा ठिकाना {55} जहन्नम कि उसमें जाएंगे तो क्या ही बुरा बिछौना(15) {56}
(15) भड़कने वाली आग कि वही फ़र्श होगी.

उनको यह है तो इसे चखें खौलता पानी और पीप (16){57}
(16) जो जहन्निमयों के जिस्मों और उनके सड़े हुए ज़ख़्मों और नापाकी की जगहों से बहेगी जलती बदबूदार.

और इसी शक्ल के और जोड़े (17){58}
(17) तरह तरह के अज़ाब.

उनसे कहा जाएगा यह एक और फ़ौज़ तुम्हारे साथ धंसी पड़ती है जो तुम्हारी थी(18){59}
(18) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि जब काफ़िरों के सरदार जहन्नम में दाख़िल होंगे और उनके पीछे पीछे उनके मानने वाले तो जहन्नम के ख़ाज़िन उन सरदारों से कहेंगे ये तुम्हारे अनुयाइयों की फ़ौज़ है जो तुम्हारी तरह तुम्हारे साथ जहन्नम में धंसी पड़ती है.

वो कहेंगे उनको खुली जगह न मिलियो, आग में तो उनको जाना ही है. वहाँ भी तंग जगह रहें, ताबे (फ़रमाँबरदार) बोले बल्कि तुम्हीं खुली जगह न मिलियो, यह मुसीबत तुम हमारे आगे लाए(19)
(19) कि तुम ने पहले कुफ़्र इख़्तियार किया और हमें उस राह पर चलाया.

तो क्या ही बुरा ठिकाना(20){60}
(20) यानी जहन्नम अत्यन्त बुरा ठिकाना है.

वो बोले ऐ हमारे रब जो यह मुसीबत हमारे आगे लाया उसे आग में दूना अज़ाब बढ़ा {61} और (21)
(21) काफ़िरों के बड़े और सरदार.

बोले हमें क्या हुआ हम उन मर्दों को नहीं देखते जिन्हें बुरा समझते थे(22){62}
(22) यानी ग़रीब मुसलमानों को और उन्हें वो अपने दीन का मुख़ालिफ़ होने के कारण शरीर कहते थे और ग़रीब होने के कारण तुच्छ समझते थे. जब काफ़िर जहन्नम में उन्हें न देखेंगे तो कहेंगे वो हमें नज़र क्यों नहीं आते.

क्या हमने उन्हें हंसी बना लिया(23)
(23) और वास्तव में वो ऐसे न थे. दोज़ख़ में आए ही नहीं. हमारा उनके साथ ठठ्ठा करना और उनकी हंसी बनाना बातिल था.

या आँखें उनकी तरफ़ फिर गईं(24) {63}
(24) इसलिये वो हमें नज़र न आए या ये मानी हैं कि उनकी तरफ़ से आँख़ें फिर गई और दुनिया में हम उनके रूत्बे और बुज़ुर्गी को न देख सकें.
बेशक यह ज़रूर हक़ है दोज़ख़ियों का आपसी झगड़ा {64}

38 सूरए सॉद -पाँचवां रूकू

38 सूरए सॉद -पाँचवां रूकू

قُلْ إِنَّمَا أَنَا مُنذِرٌ ۖ وَمَا مِنْ إِلَٰهٍ إِلَّا اللَّهُ الْوَاحِدُ الْقَهَّارُ
رَبُّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا الْعَزِيزُ الْغَفَّارُ
قُلْ هُوَ نَبَأٌ عَظِيمٌ
أَنتُمْ عَنْهُ مُعْرِضُونَ
مَا كَانَ لِيَ مِنْ عِلْمٍ بِالْمَلَإِ الْأَعْلَىٰ إِذْ يَخْتَصِمُونَ
إِن يُوحَىٰ إِلَيَّ إِلَّا أَنَّمَا أَنَا نَذِيرٌ مُّبِينٌ
إِذْ قَالَ رَبُّكَ لِلْمَلَائِكَةِ إِنِّي خَالِقٌ بَشَرًا مِّن طِينٍ
فَإِذَا سَوَّيْتُهُ وَنَفَخْتُ فِيهِ مِن رُّوحِي فَقَعُوا لَهُ سَاجِدِينَ
فَسَجَدَ الْمَلَائِكَةُ كُلُّهُمْ أَجْمَعُونَ
إِلَّا إِبْلِيسَ اسْتَكْبَرَ وَكَانَ مِنَ الْكَافِرِينَ
قَالَ يَا إِبْلِيسُ مَا مَنَعَكَ أَن تَسْجُدَ لِمَا خَلَقْتُ بِيَدَيَّ ۖ أَسْتَكْبَرْتَ أَمْ كُنتَ مِنَ الْعَالِينَ
قَالَ أَنَا خَيْرٌ مِّنْهُ ۖ خَلَقْتَنِي مِن نَّارٍ وَخَلَقْتَهُ مِن طِينٍ
قَالَ فَاخْرُجْ مِنْهَا فَإِنَّكَ رَجِيمٌ
وَإِنَّ عَلَيْكَ لَعْنَتِي إِلَىٰ يَوْمِ الدِّينِ
قَالَ رَبِّ فَأَنظِرْنِي إِلَىٰ يَوْمِ يُبْعَثُونَ
قَالَ فَإِنَّكَ مِنَ الْمُنظَرِينَ
إِلَىٰ يَوْمِ الْوَقْتِ الْمَعْلُومِ
قَالَ فَبِعِزَّتِكَ لَأُغْوِيَنَّهُمْ أَجْمَعِينَ
إِلَّا عِبَادَكَ مِنْهُمُ الْمُخْلَصِينَ
قَالَ فَالْحَقُّ وَالْحَقَّ أَقُولُ
لَأَمْلَأَنَّ جَهَنَّمَ مِنكَ وَمِمَّن تَبِعَكَ مِنْهُمْ أَجْمَعِينَ
قُلْ مَا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ مِنْ أَجْرٍ وَمَا أَنَا مِنَ الْمُتَكَلِّفِينَ
إِنْ هُوَ إِلَّا ذِكْرٌ لِّلْعَالَمِينَ
وَلَتَعْلَمُنَّ نَبَأَهُ بَعْدَ حِينٍ

तुम फ़रमाओ (1)
(1) ऐ सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, मक्के के काफ़िरों से.

मैं डर सुनाने वाला हूँ (2)
(2) तुम्हें अल्लाह के अज़ाब का डर दिलाता हूँ.

और मअबूद कोई नहीं मगर एक अल्लाह सब पर ग़ालिब (सर्वोपरि) {65} मालिक आसमानों और ज़मीन का और जो कुछ उनके बीच है, इज़्ज़त वाला बड़ा बख़्शने वाला {66} तुम फ़रमाओ वह(3)
(3) यानी क़ुरआन या क़यामत या मेरा डराने वाला रसूल होना या अल्लाह तआला का वहदहू ला शरीक लहू होना.

बड़ी ख़बर है {67} तुम उससे ग़फ़लत में हो (4) {68}
(4) कि मुझ पर ईमान नहीं लाते और क़ुरआन शरीफ़ और मेरे दीन को नहीं मानते.

मुझे आलमे बाला की क्या ख़बर थी जब वो झगड़ते थे (5){69}
(5) यानी फ़रिश्ते हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के बाब में, यह हज़रत सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सच्चे नबी होने की एक दलील है. मुद्दआ यह है कि आलमे बाला में फ़रिश्तों का हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के बाब में सवाल जवाब करना मुझे क्या मालूम होता, अगर में नबी न होता. उसकी ख़बर देना नबुव्वत और मेरे पास वही आने की दलील है.

मुझे तो यही वही होती है कि मैं नहीं मगर रौशन डर सुनाने वाला(6)
(6) दारिमी और तिरमिज़ी की हदीसों में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि मैं अपने बेहतरीन हालात में अपने इज़्ज़त और जलाल वाले रब के दीदार से मूशर्रफ़ हुआ. (हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा फ़रमाते हैं कि मेरे ख़याल में यह वाक़िआ ख़्वाब का है) हुज़ूर अलैहिस्सलातो वस्सलाम फ़रमाते हैं कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया ऐ मुहम्मद, आलमे बाला के फ़रिश्ते किस बहस में हैं. मैंने अर्ज़ किया यारब तू ही दाना है. हुज़ूर ने फ़रमाया फिर रब्बुल इज़्ज़त ने अपना दस्ते रहमतो करम मेरे दोनों शानों के बीच रखा और मैं ने उसके फ़ैज़ का असर अपने दिल में पाया तो आसमान व ज़मीन की सारी चीज़ें मेरे इल्म में आ गई. फिर अल्लाह तआला ने फ़रमाया या मुहम्मद, क्या तुम जानते कि आलमे बाला के फ़रिश्ते किस चीज़ में बहस कर रहे हैं. मैं ने अर्ज़ किया, हाँ ऐ रब मैं जानता हूँ वह कफ़्फ़ारों में बहस कर रहे हैं और कफ़्फ़ारे ये हैं नमाज़ों के बाद मस्जिद में ठहरना और पैदल जमाअतों के लिये जाना और जिस वक़्त सर्दी वग़ैरह के कारण पानी का इस्तेमाल नागवार हो उस वक़्त अच्छी तरह वुज़ू करना, जिसने यह किया उसकी ज़िन्दगी भी बेहतर, मौत भी बेहतर. और गुनाहों से ऐसा पाक साफ़ निकलेगा जैसा अपनी विलादत के दिन था. और फ़रमाया, ऐ मुहम्मद !  नमाज़ के बाद यह दुआ किया करो “अल्लाहुम्मा इन्नी असअलोका फ़िअलल ख़ैराते व तर्कल मुन्कराते व हुब्बल मसाकीने व इज़ा अरदता बि इबादिका फ़ित-नतन फ़क़बिदनी इलैका ग़ैरा मफ़तूनिन”. कुछ रिवायतों में यह है कि हज़रत सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया मुझे हर चीज़ रौशन हो गई और मैंने पहचान ली और एक रिवायत में है कि जो कुछ पूरब और पच्छिम में है सब मैं ने जान लिया. इमाम अल्लामा अलाऊदीन अली बिन मुहम्मद बिन इब्राहीम बग़दादी जो ख़ाज़िन के नाम से जाने जाते हैं, अपनी तफ़सीर में इसके मानी ये बयान फ़रमाते हैं कि अल्लाह तआला ने हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का सीनए मुबारक खोल दिया और क़ल्बे शरीफ़ मुनव्वर कर दिया और जो कोई न जाने उस सब की पहचान आप को अता कर दी यहाँ तक कि आपने नेअमत और मअरिफ़त की सर्दी अपने क़ल्बे मुबारक में पाई और जब क़ल्बे शरीफ़ मुनव्वर हो गया और सीनए पाक खुल गया तो जो कुछ आसमानों और जो कुछ ज़मीनों में है अल्लाह तआला के दिये से जान लिया.

जब तुम्हारे रब ने फ़रिश्तों से फ़रमाया कि मैं मिट्टी से इन्सान बनाऊंगा (7){70}
(7) यानी आदम को पैदा करूंगा.

फिर जब मैं उसे ठीक बना लूं(8)
(8) यानी उसकी पैदायश तमाम कर दूँ.

और उसमें अपनी तरफ़ की रूह फूंकूं (9)
(9) और उसको ज़िन्दगी अता कर दूँ.

तो तुम उसके लिये सज्दे में गिरना {71} तो सब फ़रिश्तों ने सज्दा किया एक एक ने कि कोई बाक़ी न रहा {72} मगर इब्लीस ने(10)
(10) सज्दा न किया.

उसने घमण्ड किया और वह था ही काफ़िरों में(11) {73}
(11) यानी अल्लाह के इल्म में.

फ़रमाया ऐ इब्लीस तुझे किस चीज़ ने रोका कि तू उसके लिये सज्दा करे जिसे मैं ने अपने हाथों से बनाया क्या तुझे घमण्ड आ गया या तू था ही घमण्डियों में(12) {74}
(12) यानी उस क़ौम में से जिनका शेवा ही घमण्ड है.

बोला मैं उससे बेहतर हूँ (13)
(13) इससे उसकी मुराद यह थी कि अगर आदम आग से पैदा किये जाते और मेरे बराबर होते जब भी मैं उन्हें सज्दा न करता, तो फिर उनसे बेहतर होकर उन्हें कैसे सिजदा करूं.

तूने मुझे आग से बनाया और उसे मिट्टी से पैदा किया {75} फ़रमाया तो जन्नत से निकल जा कि तू रांदा गया(14) {76}
(14) अपनी सरकशी और नाफ़रमानी और घमण्ड के कारण, फिर अल्लाह तआला ने उसकी सूरत बदल दी. वह पहले हसीन था, बदशकल काला मुंह कर दिया गया और उसकी नूरानियत सल्ब कर ली गई.

और बेशक तुझ पर मेरी लअनत है क़यामत तक(15) {77}
(15) और क़यामत के बाद लानत भी तरह तरह के अज़ाब भी.

बोला ऐ मेरे रब ऐसा है तो मुझे मोहलत दे उस दिन तक कि उठाए जाएं (16) {78}
(16) आदम अलैहिस्सलाम और उनकी सन्तान अपने फ़ना होने के बाद जज़ा के लिये, और इससे उसकी मुराद यह थी कि वह इन्सानों को गुमराह करने के लिये छूट पाए और उनसे अपना बुग्ज़ ख़ूब निकाले और मौत से बिल्कुल बच जाए क्योंकि उठने के बाद फिर मौत नहीं.

फ़रमाया तो तू मोहलत वालों में है {79}  उस जाने हुए वक़्त के दिन तक (17){80}
(17) यानी सूर के पहले फूंके जाने तक जिसको ख़ल्क़ की फ़ना के लिये निर्धारित फ़रमाया गया.

बोला तेरी इज़्ज़त की क़सम ज़रूर मैं उन सब को गुमराह कर दूंगा {81}मगर जो उनमें तेरे चुने  हुए बन्दे हैं {82} फ़रमाया तो सच यह है और मैं सच ही फ़रमाता हूँ {83} बेशक मैं ज़रूर जहन्नम भर दूंगा तुझसे (18)
(18)

और उनमें से (19)
(19) यानी इन्सानों में से.

जितने तेरी पैरवी करेंगे. सब से {84} तुम फ़रमाओ मैं इस क़ुरआन पर तुम से कुछ अज्र नहीं मांगता और मैं बनावट वालों में नहीं {85} वह तो नहीं मगर नसीहत सारे जगत के लिये {86} और ज़रूर एक वक़्त के बाद तुम इसकी ख़बर जानोगे(20){87}
(20) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि मौत के बाद, और एक क़ौल यह है कि क़यामत के दिन.