सूरए निसा

सूरए निसा
सूरए (1) निसा मदीने में उतरी, आयतें 176, रूकू चौबीस,
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

सूरए निसा – पहला रूकू

ऐ लोगों (2)
अपने रब से डरो जिसने तुम्हें एक जान से पैदा किया (3)
और उसी में उसका जोड़ा बनाया और उन दोनों से बहुत से मर्द व औरत फैला दिये और अल्लाह से डरो जिसके नाम पर मांगते हो और रिश्तों का लिहाज़ रखो(4)
बेशक अल्लाह हर वक़्त तुम्हें देख रहा है (1)और यतीमों को उनके माल दो (5)
और सुथरे(6)
के बदले गन्दा न लो(7)
और उनके माल अपने मालों में मिला कर न खा जाओ बेशक यह बड़ा गुनाह है (2) और अगर तुम्हें डर हो कि यतीम (अनाथ) लड़कियों में इन्साफ़ न करोगे (8)
तो निकाह में लाओ जो औरतें तुम्हें ख़ुश आऐं दो दो और तीन तीन और चार चार (9)
फिर अगर डरो कि दो बीवियों को बराबर न रख सकोगे तो एक ही करो या कनीज़े (दासियां) जिनके तुम मालिक हो पर उससे ज़्यादा क़रीब है कि तुम से ज़ुल्म न हो  (10)(3)
और औरतों को उनके मेहर ख़ुशी से दो(11)
फिर अगर वो अपने दिल की ख़ुशी से मेहर में से तुम्हें कुछ दें तो उसे खाओ रचता पचता (12) (4)
और बेअक़्लों को (13)
उनके माल न दो जो तुम्हारे पास हैं जिनको अल्लाह ने तुम्हारी बसर औक़ात (गुज़ारा) किया है और उन्हें उसमें से खिलाओ और पहनाओ और उनसे अच्छी बात कहो (14) (5)
और यतीमों को आज़माते रहो  (15)
यहां तक कि जब वह निकाह के क़ाबिल हों तो अगर तुम उनकी समझ ठीक देखो तो उनके माल उन्हें सुपुर्द कर दो और उन्हें न खाओ हद से बढ़कर और इस जल्दी में कि कहीं बड़े न हो जाएं और जिसे हाजत (आवश्यकता) न हो वह बचता रहे (16)
और जो हाजत वाला हो वह मुनासिब हद तक खाए फिर जब तुम उनके माल उन्हें सुपुर्द करो तो उनपर गवाह कर लो और अल्लाह काफ़ी है हिसाब लेने को (6) मर्दों के लिये हिस्सा है उसमें से जो छोड़ गए मां बाप और क़रावत (रिश्तेदार) वाले और औरतों के लिये हिस्सा है उसमें से जो छोड़ गए मां बाप  और क़रावत वाले तर्का (माल व जायदाद) थोड़ा हो या बहुत, हिस्सा है अन्दाज़ा बांधा हुआ(17) (7)
फिर बांटते वक़्त अगर रिश्तेदार और यतीम और मिस्कीन (दरिद्र) (18)
आजाएं तो उसमें से उन्हें भी कुछ दो  (19)
और उनसे अच्छी बात कहो (20) (8)
और डरें (21) वो लोग अगर अपने बाद कमज़ोर औलाद छोड़ते तो उनका कैसा उन्हें ख़तरा होता तो चाहिये कि अल्लाह से डरें (22)
और सीधी बात करें (23)  (9)
वो जो यतीमों का माल नाहक़ खाते हैं वो तो अपने पेट में निरी आग भरते हैं (24)
और कोई दम जाता है कि भड़कते धड़े में जाएंगे (10)

तफ़सीर :
सूरए निसा – पहला रूकू

(1) सूरए निसा मदीनए तैय्यिबह में उतरी, इसमें 24 रूकू, 176 आयतें, 3045 कलिमे और 16030 अक्षर हैं.

(2) ये सम्बोधन आया है तमाम आदमी की औलाद को.

(3) अबुल बशर हज़रत आदम से, जिनको माँ बाप के बग़ैर मिट्टी से पैदा किया था. इन्सान की पैदाइश के आरम्भ का बयान करके अल्लाह की क़ुदरत की महानता का बयान फ़रमाया गया. अगरचे दुनिया के बेदीन अपनी बेअक़्ली और नासमझी से इसका मज़ाक़ उड़ाते हैं लेकिन समझ वाले और अक़्ल वाले जानते हैं कि ये मज़मून ऐसी ज़बरदस्त बुरहान से साबित है जिसका इन्कार असभंव है. जन गणना का हिसाब बता देता है कि आज से सौ बरस पहले दुनिया में इन्सानों की संख्या आज से बहुत कम थी और इससे सौ बरस पहले और भी कम. तो इस तरह अतीत की तरफ़ चलते चलते इस कमी की हद एक ज़ात क़रार पाएगी या यूँ कहिये कि क़बीलों की बहुसंख्या एक व्यक्ति की तरफ़ ख़त्म हो जाती है. मसलन, सैयद दुनिया में करोड़ो पाए जाएंगे मगर अतीत की तरफ़ उनका अन्त सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की एक ज़ात पर होगा और बनी इस्त्राईल कितने भी ज़्यादा हों मगर इस तमाम ज़ियादती का स्त्रोत हज़रत याक़ूब अलैहिस्सलाम की एक ज़ात होगी. इसी तरह और ऊपर को चलना शुरू करें तो इन्सान के तमाम समुदायों और क़बीलों का अन्त एक ज़ात पर होगा, उसका नाम अल्लाह की किताबों में आदम अलैहिस्सलाम है और मुमकिन नहीं कि वह एक व्यक्ति मानव उत्पत्ति या इन्सानी पैदायश के मामूली तरीक़े से पैदा हो सके. अगर उसके लिये बाप भी मान लिया जाये तो माँ कहाँ से आए. इसलिये ज़रूरी है कि उसकी पैदायश बग़ैर माँ बाप के हो और जब बग़ैर माँ बाप के पैदा हुआ तो यक़ीनन उन्हीं अनासिर या तत्वों से पैदा होगा जो उसके अस्तित्व या वुजूद में पाए जाते हैं. फिर तत्वों में से वह तत्व उसका ठिकाना हो और जिसके सिवा दूसरे में वह न रह सके, लाज़िम है कि वही उसके वुजूद में ग़ालिब हो इसलिये पैदायश की निस्बत उसी तत्व की तरफ़ की जाएगी. यह भी ज़ाहिर है कि मानव उत्पत्ति का मामूली तरीक़ा एक व्यक्ति से जारी नहीं हो सकता, इसलिये उसके साथ एक और भी हो कि जोड़ा हो जाए और वह दूसरा व्यक्ति जो उसके बाद पैदा हो तो हिकमत का तक़ाज़ा यही है कि उसी के जिस्म से पैदा किया जाए क्योंकि एक व्यक्ति के पैदा होने से नस्ल तो पैदा हो चुकी मगर यह भी लाज़िम है कि उसकी बनावट पहले इन्सान से साधारण उत्पत्ति के अलावा किसी और तरीक़े से हो, क्योंकि साधारण उत्पत्ति दो के बिना संभव ही नहीं और यहाँ एक ही है. लिहाज़ा अल्लाह की हिकमत ने हज़रत आदम की एक बाईं पसली उनके सोते में निकाली और उससे उनकी बीबी हज़रत हव्वा को पैदा किया. चूंकि हज़रत हव्वा साधारण उत्पत्ति के तरीक़े से पैदा नहीं हुईं इसलिये वह औलाद नहीं हो सकतीं जिस तरह कि इस तरीक़े के ख़िलाफ़ मानव शरीर से बहुत से कीड़े पैदा हुआ करते हैं, वो उसकी औलाद नहीं हो सकते हैं. नींद से जागकर हज़रत आदम ने अपने पास हज़रत हव्वा को देखा तो अपने जैसे दूसरे को पाने की महब्बत दिल में पैदा हुई. उनसे फ़रमाया तुम कौन हो. उन्हों ने अर्ज़ किया औरत. फ़रमाया, किस लिये पैदा की गई हो. अर्ज़ किया आपका दिल बहलाने के लिये. तो आप उनसे मानूस हुए.

(4) उन्हें तोड़ो या काटे मत. हदीस शरीफ़ में है, जो रिज़्क़ में बढ़ौतरी चाहे उसको चाहिये कि अपने रिशतेदारों के साथ मेहरबानी से पेश आए और उनके अधिकारों का ख़याल रखे.

(5) एक व्यक्ति की निगरानी में उसके अनाथ भतीजे का बहुत सा माल था. जब वह यतीम बालिग़ हुआ और उसने अपना माल तलब किया तो चचा ने देने से इन्कार कर दिया. इस पर यह आयत उतरी. इसको सुनकर उस व्यक्ति ने यतीम का माल उसके हवाले किया और कहा कि हम अल्लाह और उसके रसूल की आज्ञा का पालन करते है.

(6) यानी अपने हलाल माल.

(7) यतीम का माल जो तुम्हारे लिये हराम है, उसको अच्छा समझकर अपने रद्दी माल से न बदलो क्योंकि वह रद्दी तुम्हारे लिये हलाल और पाक है, और यह हराम और नापाक.

(8) और उनके अधिकार का ख़याल न रख सकोगे.

(9) आयत के मानी में विभिन्न क़ौल हैं. हसन का क़ौल है कि पहले ज़माने में मदीने के लोग अपनी सरपरस्ती वाली यतीम लड़की से उसके माल की वजह से निकाह कर लेते जबकि उसकी तरफ़ रग़बत न होती. फिर उसके साथ सहवास में अच्छा व्यवहार न करते और उसके माल के वारिस बनने के लिये उसकी मौत की प्रतीक्षा करतें. इस आयत में उन्हें इससे रोका गया. एक क़ौल यह है कि लोग यतीमों की सरपरस्ती से तो बेइन्साफ़ी होने के डर से घबराते थे और ज़िना की पर्वाह न करते थे. उन्हें बताया गया कि अगर तुम नाइन्साफ़ी के डर से यतीमों की सरपरस्ती से बचते हो तो ज़िना से भी डरो और इससे बचने के लिये जो औरतें तुम्हारे लिये हलाल हैं उनसे निकाह करो और हराम के क़रीब मत जाओ. एक क़ौल यह है कि लोग यतीमों की विलायत और सरपरस्ती में तो नाइन्साफ़ी का डर करते थे और बहुत से निकाह करने में कुछ भी नहीं हिचकिचाते थे. उन्हें बताया गया कि जब ज़्यादा औरतें निकाह में हों तो उनके हक़ में नाइन्साफ़ी होने से डरो. उतनी ही औरतों से निकाह करो जिनके अधिकार अदा कर सको. इकरिमा ने हज़रत इब्ने अब्बास से रिवायत की कि क़ुरैश दस दस बल्कि इससे ज़्यादा औरतें करते थे और जब उनका बोझ न उठ सकता तो जो यतीम लड़कियाँ उनकी सरपरस्ती में होतीं उनके माल ख़्रर्च कर डालते. इस आयत में फ़रमाया गया कि अपनी क्षमता देख ली और चार से ज़्यादा न करो ताकि तुम्हें यतीमों का माल ख़र्च करने की ज़रूरत पेश न आए. इस आयत से मालूम हुआ कि आज़ाद मर्द के लिये एक वक़्त में चार औरतों तक से निकाह जायज़ है, चाहे वो आज़ाद हों या दासी. तमाम उम्मत की सहमित है कि एक वक़्त में चार औरतों से ज़्यादा निकाह में रखना किसी के लिये जायज़ नहीं सिवाय रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के. यह आप की विशेषताओं में से हैं. अबू दाऊद की हदीस में है कि एक व्यक्ति इस्लाम लाए. उनकी आठ बीबीयाँ थीं. हुज़ूर ने फ़रमाया उनमें से चार रखना. तिरमिज़ी की हदीस में है कि ग़ीलान बिन सलमा सक़फ़ी इस्लाम लाए. उनकी दस बीबीयाँ थीं. वो साथ मुसलमान हुई. हुज़ूर ने हुक्म दिया, इनमें से चार रखो.

(10) इससे मालूम हुआ कि बीबीयों के बीच इन्साफ़ फ़र्ज़ है. नई पुरानी, सब अधिकारों में बराबर हैं. ये इन्साफ़ लिबास में, खाने पीने में, रहने की जगह में, और रात के सहवास में अनिवार्य है. इन बातों में सब के साथ एक सा सुलूक हो.

(11) इससे मालूम हुआ कि मेहर की अधिकारी औरतें हैं न कि उनके सरपरस्त. अगर सरपरस्तों ने मेहर वसूल कर लिया हो तो उन्हें लाज़िम है कि वो मेहर हक़दार औरत को पहुंचा दें.

(12) औरतों की इख़्तियार है कि वो अपने शौहरों को मेहर का कोई हिस्सा हिबा करें या कुल मेहर मगर मेहर बख़्शवाने के लिये उन्हें मजबूर करना, उनके साथ दुर्व्यवहार न करना चाहिये क्योंकि अल्लाह तआला ने “तिब्ना लकुम” फ़रमाया जिसका मतलब है दिल की ख़ुशी के साथ माफ़ करना.

(13) जो इतनी समझ नहीं रखते कि माल कहाँ ख़र्च किया जाए इसे पहचानें. और जो माल को बेमहल ख़र्च करते हैं और अगर उन पर छोड़ दिया जाए तो वो जल्द नष्ट कर देंगे.

(14) जिससे उनके दिल की तसल्ली हो और वो परेशान न हों जैसे यह कि माल तुम्हारा है और तुम होशियार हो जाओगे तो तुम्हारे सुपुर्द कर दिया जाएगा.

(15) कि उनमें होशियारी और मामला जानने की समझ पैदा हुई या नहीं.

(16) यतीम का माल खाने से.

(17) जिहालत के ज़माने में औरतों और बच्चों को विरासत न देते थे. इस आयत में उस रस्म को बातिल किया गया.

(18) अजनबी, जिन में से कोई मैयत का वारिस न हो.

(19) तक़सीम से पहले, और यह देना मुस्तहब है.

(20) इसमें ख़ूबसूरत बहाना, अच्छा वादा और भलाई की दुआ, सब शामिल हैं. इस आयत में मैयत के तर्के से ग़ैर वारिस रिशतेदारों और यतीमों और मिस्कीनों को कुछ सदक़े के तौर पर देने और अच्छी बात कहने का हुक्म दिया. सहाबा के ज़माने में इस पर अमल था. मुहम्मद बिन सीरीन से रिवायत है कि उनके वालिद ने विरासत की तक़सीम के वक़्त एक बकरी ज़िबह कराके खाना पकाया और रिश्तेदारों, यतीमों और मिस्कीनों को खिलाया और यह आयत पढ़ी. इब्ने सीरीन ने इसी मज़मून की उबैदा सलमानी से भी रिवायत की है. उसमें यह भी है कि कहा अगर यह आयत न आई होती तो यह सदक़ा मैं अपने माल से करता. तीजा, जिसको सोयम कहते हैं और मुसलमानों का तरीक़ा है, वह भी इसी आयत का अनुकरण है कि उसमें रिश्तेदारों यतीमों और मिस्कीनों पर सदक़ा होता है और कलिमे का ख़त्म और क़ुरआने पाक की तिलावत और दुआ अच्छी बात है. इसमें कुछ लोगों को बेजा इसरार हो गया है जो बुजुर्गों के इस अमल का स्त्रोत तो तलाश कर न सके, जब कि इतना साफ़ क़ुरआन पाक में मौजूद था, अलबत्ता उन्होंने अपनी राय को दीन में दख़्ल दिया और अच्छे काम को रोकने में जुट गये, अल्लाह हिदायत करे.

(21) जिसके नाम वसिय्यत की गई वह और यतीमों के सरपरस्त और वो लोग जो मौत के क़रीब मरने वाले के पास मौजूद हों.

(22) और मरने वाले की औलाद के साथ मेहरबानी के अलावा कोई कायर्वाही न करें जिससे उसकी औलाद परेशान हो.

(23) मरीज़ के पास उसकी मौत के क़रीब मौजूद होने वालों की सीधी बात तो यह है कि उसे सदक़ा और वसिय्यत में यह राय दें कि वह उतने माल से करे जिससे उसकी औलाद तंगदस्त और नादार न रह जाए और वसी यानी जिसके नाम वसिय्यत की जाए और वली यानी सरपरस्त की सीधी बात यह है कि वो मरने वाले की ज़ुर्रियत के साथ सदव्यवहार करें, अच्छे से बात करें जैसा कि अपनी औलाद के साथ करते हैं.

(24) यानी यतीमों का माल नाहक़ खाना मानो आग खाना है. क्योंकि वह अज़ाब का कारण है. हदीस शरीफ़ में है, क़यामत के दिन यतीमों का माल खाने वाले इस तरह उठाए जाएंगे कि उनकी क़ब्रों से और उनके मुंह से और उनके कानों से धुवाँ निकलता होगा तो लोग पहचानेंगे कि यह यतीम का माल खाने वाला है.

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सूरए निसा _ दूसरा रूकू

सूरए निसा _ दूसरा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
अल्लाह तुम्हें हुक्म देता है (1)
तुम्हारी औलाद के बारे में  (2)
बेटे का हिस्सा दो बेटियों के बराबर है (3)
फिर अगर निरी लड़कियां हो अगरचे दो से ऊपर (4)
तो उनको तर्के की दो तिहाई और अगर एक लड़की हो तो उसका आधा (5)
और मैयत के माँ बाप को हर एक को उसके तर्के से छटा, अगर मैयत के औलाद हो (6)
फिर अगर उसकी औलाद न हो और माँ बाप छोड़े (7)
तो माँ का तिहाई फिर अगर उसके कई बहन भाई हों(8)
तो माँ का छटा (9)
बाद उस वसियत के जो कर गया और दैन के (10)
तुम्हारे बाप और तुम्हारे बेटे तुम क्या जानो कि उनमें कौन तुम्हारे ज़्यादा काम आएगा (11)
यह हिस्सा बांधा हुआ है अल्लाह की तरफ़ से बेशक अल्लाह इल्म वाला हिकमत (बोध) वाला है  (11)
और तुम्हारी बीवियाँ जो छोड़ जाएं उसमें तुम्हें आधा है अगर उनके औलाद हो तो उनके तर्के में से तुम्हें चौथाई है (12)
जो वसिय्यत वो कर गई और दैन (ऋण) निकाल कर और तुम्हारे तर्के में औरतों का चौथाई है अगर तुम्हारे औलाद न हो. फिर अगर तुम्हारे औलाद हो तो उनका तुम्हारे तर्के में से आठवाँ (13)
जो वसिय्यत तुम कर जाओ  दैन (ऋण) निकाल कर और अगर किसी ऐसे मर्द या औरत का तर्का बटता हो जिसने माँ बाप औलाद कुछ न छोड़े और माँ की तरफ़ से उसका भाई या बहन है तो उनमें से हर एक को छटा फिर अगर  वो बहन भाई एक से ज़्यादा हों तो सब तिहाई में शरीक हैं (14)
मैयत की वसिय्यत और दैन निकाल कर जिसमें उसने नुक़सान न पहुंचाया हो  (15)
यह अल्लाह का इरशाद  (आदेश) है और  अल्लाह इल्म वाला हिल्म (सहिष्णुता) वाला है (12) ये अल्लाह की हदें हैं, और जो हुक्म माने अल्लाह और अल्लाह के रसूल का, अल्लाह उसे बाग़ों में ले जाएगा जिनके नीचे नेहरें बहें हमेशा उनमें रहेंगे और यही है बड़ी कामयाबी (13)
और जो अल्लाह और उसके रसूल की नाफ़रमानी करे और उसकी कुल हदों से बढ़ जाए अल्लाह उसे आग में दाख़िल करेगा जिसमें हमेशा रहेगा और उसके लिये ख़्वारी (ज़िल्लत) का अज़ाब है (16) (14)

तफ़सीर :

सूरए निसा – दूसरा रूकू

(1) विरासत के बारे में.

(2) अगर मरने वाले ने बेटे बेटियाँ दोनों छोड़ी हों तो.

(3) यानी बेटी का हिस्सा बेटे से आधा है और अगर मरने वाले ने सिर्फ़ लड़के छोड़े हों तो कुल माल उन का.

(4) या दो.

(5) इससे मालूम हुआ कि अगर लड़का अकेला वारिस रहा हो तो कुल माल उसका होगा क्योंकि ऊपर बेटे का हिस्सा बेटियों से दूना बताया गया है तो जब अकेली लड़की का आधा हुआ तो अकेले लड़के का उससे दूना हुआ और वह कुल है.

(6) चाहे लड़का हो या लड़की कि उनमें से हर एक को औलाद कहा जाता है.

(7) यानी सिर्फ़ माँ बाप छोड़े और अगर माँ बाप के साथ शौहर या बीवी में से किसी को छोड़ा, तो माँ का हिस्सा बीवी का हिस्सा निकालने के बाद जो बाक़ी बचे उसका तिहाई होगा न कि कुल का तिहाई.

(8) सगे चाहे सौतेले.

(9) और एक ही भाई हो तो वह माँ का हिस्सा नहीं घटा सकता.

(10) क्योंकि वसिय्यत और क़र्ज़ विरासत की तक़सीम से पहले है. और क़र्ज़ वसिय्यत से भी पहले है. हदीस शरीफ़ में है “इन्नद दैना क़बलल वसिय्यते” जिसका अर्थ यह होता है कि वसिय्यत पर अमल करने से पहले मरने वाले का क़र्ज़ अदा करना ज़रूरी है.

(11) इसलिये हिस्सो का मुक़र्रर करना तुम्हारी राय पर न छोड़ा.

(12  चाहे एक बीबी हो या कई. एक होगी तो वह अकेली चौथाई पाएगी. कई होंगी तो सब उस चौथाई में बराबर शरीक होंगी चाहे बीबी एक हो या कई, हिस्सा यही रहेगा.

(13) चाहे बीबी एक हो या ज़्यादा.

(14) क्योंकि वो माँ के रिश्ते की बदौलत हक़दार हुए और माँ तिहाई से ज़्यादा नहीं पाती और इसीलिये उनमें मर्द का हिस्सा औरत से ज़्यादा नहीं है.

(15) अपने वारिसों को तिहाई से ज़्यादा वसिय्यत करके या किसी वारिस के हक़ में वसिय्यत करके. वारिस के क़र्ज़ कई क़िस्म हैं. असहाबे फ़राइज़ वो लोग हैं जिनके लिये हिस्सा मुक़र्रर है जैसे बेटी एक हो तो आधे माल की मालिक, ज़्यादा हों तो सब के लिये दो तिहाई. पोती और पड़पोती और उससे नीचे की हर पोती, अगर मरने वाले के औलाद न हो तो बेटी के हुक्म में है. और अगर मैयत ने एक बेटी छोड़ी है तो यह उसके साथ छटा पाएगी और अगर मैयत ने बेटा छोड़ा तो विरासत से वंचित हो जाएगी, कुछ न पाएगी और अगर मरने वाले ने दो बेटियाँ छोड़ीं तो भी पोती वंचित यानी साक़ित हो गई. लेकिन अगर उसके साथ या उसके नीचे दर्जे में कोई लड़का होगा तो वह उसको इसबा बना देगा. सगी बहन मैयत के बेटा या पोता न छोड़ने की सूरत में बेटियों के हुक्म में है. अल्लाती बहनें, जो बाप में शरीक हों और उनकी माएं अलग अलग हों, वो सगी बहनों के न होने की सूरत में उनकी मिस्ल है और दोनों क़िस्म की बहनें, यानी सगी और अल्लाती, मैयत की बेटी या पोती के साथ इसबा हो जाती हैं और बेटे और पोते और उसके मातहत पोते और बाप के साथ साक़ित या वंचित और इमाम साहब के नज़दीक दादा के साथ भी मेहरूम हैं. सौतेले भाई बहन जो फ़क़त माँ में शरीक हों, उनमें से एक हो तो छटा और ज़्यादा हों तो तिहाई और उनमें मर्द और औरत बराबर हिस्सा पाएंगे. और बेटे पोते और उसके मातहत के पोते और बाप दादा के होते मेहरूम हो जाएंगे. बाप छटा हिस्सा पाएगा अगर मैयत ने बेटा या पोता या उससे नीचे की कोई पोती छोड़ी हो तो बाप छटा और वह बाक़ी भी पाएगा जो असाबे फ़र्ज़ को देकर बचे. दादा यानी बाप का बाप, बाप के न होने की सूरत में बाप की मिस्ल है सिवाय इसके कि माँ को मेहरूम न कर सकेगा. माँ का छटा हिस्सा है. अगर मैयत ने अपनी औलाद या अपने बेटे या पोते या पड़पोते की औलाद या बहन भाई में से दो छोड़े हों चाहे वो सगे भाई हों या सौतेले और अगर उनमें से कोई छोड़ा न हो तो तो माँ कुल माल का तिहाई पाएगी और अगर मैयत ने शौहर या बीबी और माँ बाप छोड़े हों तो माँ को शौहर या बीबी का हिस्सा देने के बाद जो बाक़ी रहे उसका तिहाई मिलेगा और जद्दा का छटा हिस्सा है चाहे वह माँ की तरफ़ से हो यानी नानी या बाप की तरफ़ से हो यानी दादी. एक हो, ज़्यादा हों, और क़रीब वाली दूर वाली के लिये आड़ हो जाती है. और माँ हर एक जद्दा यानी नानी और दादी को मेहरूम कर देती है. और बाप की तरफ़ की जद्दात यानी दादियाँ बाप के होने की सूरत में मेहजूब यानी मेहरूम हो जाती हैं. इस सूरत में कुछ न मिलेगा. ज़ौज को चौथा हिस्सा मिलेगा. अगर मैयत ने अपनी या अपने बेटे पोते परपोते वग़ैरह की औलाद छोड़ी हो और अगर इस क़िस्म की औलाद न छोड़ी हो तो शौहर आधा पाएगा. बीवी मैयत की और उसके बेटे पोते वग़ैरह की औलाद होने की सूरत में आठवाँ हिस्सा पाएगी और न होने की सूरत में चौथाई. इसबात वो वारिस है जिनके लिये कोई हिस्सा निश्चित नहीं है. फ़र्ज़ वारिसों से जो बाक़ी बचता है वो पाते हैं. इन में सबसे ऊपर बेटा है फिर उसका बेटा फिर और नीचे के पोते फिर बाप फिर उसका बेटा फिर और नीचे के पोते फिर बाप फिर दादा फिर बाप के सिलसिले में जहाँ तक कोई पाया जाए. फिर सगा भाई फिर सौतेला यानी बाप शरीक भाई फिर सगे भाई का बेटा फिर बाप शरीक भाई का बेटा, फिर आज़ाद करने वाला और जिन औरतों का हिस्सा आधा या दो तिहाई है वो अपने भाईयों के साथ इसबा हो जाती हैं और जो ऐसी न हों वो नहीं. ख़ून के रिश्तों, फ़र्ज़ वारिस और इसबात के सिवा जो रिश्तेदार हैं वो ज़विल अरहाम में दाख़िल हैं और उनकी तरतीब इस्बात की मिस्ल है.

(16) क्योंकि कुल हदों के फलांगने वाला काफ़िर है. इसलिये कि मूमिन कैसा भी गुनाहगार हो, ईमान की हद से तो न गुज़रेगा.

सूरए निसा _ तीसरा रूकू

सूरए निसा _ तीसरा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और तुम्हारी औरतें जो बदकारी करें उन पर ख़ास अपने में (1)
के चार मर्दों की गवाही लो फिर अगर वो गवाही दे दें तो उन औरतों को घर में बंद रखो (2)
यहां तक कि उन्हें मौत उठाले या अल्लाह उनकी कुछ राह निकाले(3)(15)
और तुम में जो मर्द औरत ऐसा काम करें उनको ईज़ा (कष्ट) दो(4)
फिर अगर वो तौबह कर लें और नेक हो जाएं तो उनका पीछा छोड़ दो बेशक अल्लाह बड़ा तौबह क़ुबूल करने वाला मेहरबान है (5)(16)
वह तौबह जिसका क़ुबूल करना अल्लाह ने अपने फ़ज़्ल(कृपा) से लाज़िम कर लिया है वह उन्हीं की है जो नादानी से बुराई कर बैठे फिर थोड़ी देर में तौबा करलें (6)
ऐसो पर अल्लाह अपनी रहमत से रूजू (तवज्जुह)करता है और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है(17) और वह तौबा उनकी नहीं जो गुनाहों में लगे रहते हैं(7)
यहां तक कि जब उनमें किसी को मौत आए तो कहे अब मैं ने तौबा की(8)
और न उनकी जो काफ़िर मरें उनके लिये हमने दर्दनाक अज़ाब तैयार कर रखा है (9)(18)
ऐ ईमान वालों, तुम्हें हलाल नहीं कि औरतों के वारिस बन जाओ ज़बरदस्ती (10)
और औरतों को रोको नहीं इस नियत से कि जो मेहर उनको दिया था उसमें से कुछ ले लो (11)
मगर उस सूरत में कि खुल्लमखुल्ला बेहयाई का काम करें (12)
और उनसे अच्छा बर्ताव करो (13)
फिर अगर वो तुम्हें पसन्द न आएं (14)
तो क़रीब है कि कोई चीज़ तुम्हें नापसन्द हो और अल्लाह उसमें बहुत भलाई रखे (15) (19)
और अगर तुम एक बीबी के बदले दूसरी बदलना चाहो (16)
और उसे ढेरों माल दे चुके हो (17)
तो उसमें से कुछ वापिस न लो (18)
क्या उसे वापिस लोगे झूठ बांधकर और खुले गुनाह से (19) (20)
और किस तरह वापिस लोगे हालांकि तुम में एक दूसरे के सामने बेपर्दा हो लिया और वो तुम से गाढ़ा अहद (प्रतिज्ञा) ले चुकीं  (20)(21)
और बाप दादा की मनकूहा (विवाहिता) से निकाह न करो  (21)
मगर जो हो गुज़रा वह बेशक बेहयाई (22)
और गज़ब (प्रकोप) का काम है और  बहुत बुरी राह (23) (22)

तफसीर
सूरए निसा – तीसरा रूकू

(1) यानी मुसलमानों में के.

(2) कि वो बदकारी न करने पाएं.

(3) यानी हद निश्चित करे या तौबह और निकाह की तौफ़ीक़ दे. जो मुफ़स्सिर इस आयत “अलफ़ाहिशता” (बदकारी) से ज़िना मुराद लेते हैं वो कहते हैं कि हब्स का हुक्म हूदूद यानी सज़ाएं नाज़िल होने से पहले था. सज़ाएं उतरने के बाद स्थगित किया गया. (ख़ाज़िन, जलालैन व तफ़सीरे अहमदी)

(4) झिड़कों, घुड़को, बुरा कहो, शर्म दिलाओ, जूतियाँ मारो, (जलालैन, मदारिक व ख़ाज़िन वग़ैरह)

(5) हसन का क़ौल है कि ज़िना की सज़ा पहले ईज़ा यानी यातना मुक़र्रर की गई फिर क़ैद फिर कोड़े मारना या संगसार करना. इब्ने बहर का क़ौल है कि पहली आयत “वल्लती यातीना” (और तुम्हारी औरतों में…..) उन औरतों के बारे में है जो औरतों के साथ बुरा काम करती हैं और दूसरी आयत “वल्लज़ाने” (और तुममें जो मर्द…..) लौंडे बाज़ी या इग़लाम करने वालों के बारे में उतरी. और ज़िना करने वाली औरतें और ज़िना करने वाले मर्द का हुक्म सूरए नूर में बयान फ़रमाया गया. इस तक़दीर पर ये आयतें मन्सूख़ यानी स्थगित हैं और इनमें इमाम अबू हनीफ़ा के लिये ज़ाहिर दलील है उस पर जो वो फ़रमाते हैं कि लिवातत यानी लौंडे बाज़ी में छोटी मोटी सज़ा है, बड़ा धार्मिक दण्ड नहीं.

(6) ज़ुहाक का क़ौल है कि जो तौबह मौत से पहले हो, वह क़रीब है यानी थोड़ी देर वाली है.

(7)  और तौबह में देरी कर जाते है.

(8) तौबह क़ुबूल किये जाने का वादा जो ऊपर की आयत में गुज़रा वह ऐसे लोगों के लिये नहीं है. अल्लाह मालिक है, जो चाहे करे. उनकी तौबह क़ुबूल करे या न करे. बख़्श दे या अज़ाब फ़रमाए, उस की मर्ज़ी. (तफ़सीरे अहमदी)

(9) इससे मालूम हुआ कि मरते वक़्त काफ़िर की तौबह और उसका ईमान मक़बूल नहीं.

(10) जिहालत के दौर में लोग माल की तरह अपने रिश्तेदारों की बीबियों के भी वारिस बन जाते थे फिर अगर चाहते तो मेहर के बिना उन्हें अपनी बीबी बनाकर रखते या किसी और के साथ शादी कर देते और ख़ुद मेहर ले लेते या उन्हें क़ैद कर रखते कि जो विरासत उन्हों ने पाई है वह देकर रिहाई हासिल करलें या मर जाएं तो ये उनके वारिस हो जाएं. ग़रज़ वो औरतें बिल्कुल उनके हाथ में मजबूर होती थीं और अपनी मर्ज़ी से कुछ भी नहीं कर सकती थीं. इस रस्म को मिटाने के लिये यह आयत उतारी गई.

(11) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया यह उसके सम्बन्ध में है जो अपनी बीबी से नफ़रत रखता हो और इस लिये दुर्व्यवहार करता हो कि औरत परेशान होकर मेहर वापस कर दे या छोड़ दे. इसकी अल्लाह तआला ने मनाही फ़रमाई. एक क़ौल यह है कि लोग औरत को तलाक़ देते फिर वापस ले लेते, फिर तलाक़ देते. इस तरह उसको लटका कर रखते थे. न वह उनके पास आराम पा सकती, न दूसरी जगह ठिकाना कर सकती. इसको मना फ़रमाया गया. एक क़ौल यह है कि मरने वाले के सरपरस्त को ख़िताब है कि वो उसकी बीबी को न रोकें.

(12) शौहर की नाफ़रमानी या उसकी या उसके घर वालों की यातना, बदज़बानी या हरामकारी ऐसी कोई हालत हो तो ख़ुलअ चाहने में हर्ज नहीं.

(13) खिलाने पहनाने में, बात चीत में और मियाँ बीवी के व्यवहार में.

(14) दुर्व्यवहार या सूरत नापसन्द होने की वजह से, तो सब्र करो और जुदाई मत चाहो.

(15) नेक बेटा वग़ैरह.

(16) यानी एक को तलाक़ देकर दूसरी से निकाह करना.

(17) इस आयत से भारी मेहर मुक़र्रर करने के जायज़ होने पर दलील लाई गई है. हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने मिम्बर पर से फ़रमाया कि औरतों के मेहर भारी न करो. एक औरत ने यह आयत पढ़कर कहा कि ऐ  इब्ने ख़त्ताब, अल्लाह हमें देता है और तुम मना करते हो, इस पर अमीरूल मूमिनीन हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया, ऐ उमर, तुझसे हर शख़्स ज़्यादा समझदार है. जो चाहो मेहर मुक़र्रर करो. सुब्हानल्लाह, ऐसी थी रसूल के ख़लीफ़ा के इन्साफ़ की शान और शरीफ़ नफ़्स की पाकी. अल्लाह तआला हमें उनका अनुकरण करने की तौफ़ीक अता फ़रमाए. आमीन.

(18) क्योंकि जुदाई तुम्हारी तरफ़ से है.

(19) यह जिहालत वालों के उस काम का रद है कि जब उन्हें कोई दूसरी औरत पसन्द आती तो वो अपनी बीबी पर तोहमत यानी लांछन लगाते ताकि वह इससे परेशान होकर जो कुछ ले चुकी है वापस कर दे. इस तरीक़े को इस आयत में मना फ़रमाया गया और झुट और गुनाह बताया गया.

(20) वह अहद अल्लाह तआला का यह इरशाद है ” फ़ इम्साकुन बि मअरूफ़िन फ़ तसरीहुम बि इहसानिन” यानी फिर भलाई के साथ रोक लेना है या नेकूई के साथ छोड़ देना है. (सूरए बक़रह, आयत 229) यह आयत इस पर दलील है कि तन्हाई में हमबिस्तरी करने से मेहर वाजिब हो जाता है.

(21) जैसा कि जिहालत के ज़माने में रिवाज था कि अपनी माँ के सिवा बाप के बाद उसकी दूसरी औरत को बेटा अपनी बीवी बना लेता था.

(22) क्योंकि बाप की बीवी माँ के बराबर है. कहा गया है कि निकाह से हम-बिस्तरी मुराद है. इससे साबित होता है कि जिससे बाप ने हमबिस्तरी की हो, चाहे निकाह करके या ज़िना करके या वह दासी हो, उसका वह मालिक होकर, उनमें से हर सूरत में बेटे का उससे निकाह हराम है.

(23) अब इसके बाद जिस क़द्र औरतें हराम हैं उनका बयान फ़रमाया जाता है. इनमें सात तोनसब से हराम है.

सूरए निसा – चौथा रूकू

सूरए निसा – चौथा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
हराम हुई तुम पर तुम्हारी माएं  (1)
और बेटियां (2)
और बहनें और फुफियां और ख़ालाएं और भतीजियां(3)
और भांजियां और तुम्हारी माएं जिन्होंने दूध पिलाया (4)
और दूध की बहनें और औरतों की माएं  (5)
और उनकी बेटियां जो तुम्हारी गोद में हैं (6)
तो उनकी बेटियों में हर्ज नहीं (7)
और तुम्हारी नस्ली बेटों की बीबियां(8)
और दो बहनें इकट्ठी करना (9)
मगर जो हो गुज़रा बेशक अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है (23)

पाँचवां पारा – वल – मुहसनात
(सूरए निसा _ चौथा रूकू जारी)

और हराम हैं शौहरदार औरतें  मगर काफ़िरों की औरतें जो तुम्हारी मिल्क में आ जाएं (10)
यह अल्लाह का लिखा हुआ है तुमपर और उन (11)
के सिवा जो रहीं वो तुम्हें हलाल हैं कि अपने मालों के इवज़ तलाश करो कै़द लाते (12)
न पानी गिराते (13)
तो जिन औरतों को निकाह में लाना चाहो उनके बंधे हुए मेहर उन्हें दे दो और क़रारदाद (समझौते) के बाद अगर तुम्हारे आपस में कुछ रज़ामन्दी हो जावे तो उसमें गुनाह नहीं (14)
बेशक अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है  (24) और तुमसे बेमक़दूरी (असामथर्य) के कारण जिनके निकाह में आज़ाद औरतें ईमान वालियां न हों तो उनसे निकाह करे जो तुम्हारे हाथ की मिल्क हैं ईमान वाली कनीजे़ (15)
और अल्लाह तुम्हारे ईमान को ख़ूब जानता है, तुम में एक,दूसरे से है तो उनसे निकाह करो  (16)
उनके मालिकों  की इज़ाज़त से (17)
और दस्तूर के मुताबिक़  उनके मेहर उन्हें दो(18)
क़ैद में आतियां, न मस्ती निकालती और न यार बनाती (19)
जब वो कै़द में आजाएं (20)
फिर बुरा काम करें तो उनपर उसकी सज़ा आधी है जो आज़ाद औरतों पर है  (21)
यह (22)
उसके लिये जिसे तुम में से ज़िना  (व्यभिचार) का डर है और सब्र करना तुम्हारे लिये बेहतर है (23)
और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है(25)

तफसीर
सूरए निसा – चौथा रूकू

(1) और हर औरतें जिसकी तरफ़ बाप या माँ के ज़रिये से नसब पलटता हो, यानी दादियाँ व नानियाँ , चाहे क़रीब की हों या दूर की, सब माएं हैं  अपनी वालिदा के हुक्म में दाख़िल हैं.

(2) पोतियाँ नवासियाँ किसी दर्जे की हों, बेटियों में दाख़िल हैं.

(3) ये सब सगी हों या सौतेली. इनके बाद उन औरतों का बयान किया जाता है जो सबब से हराम हैं.

(4) दूध के रिश्ते, दूध पीने को मुद्दत में थोड़ा दूध पिया जाय या बहुत सा, उसके साथ हुरमत जुड़ जाती है. दूध पीने की मुद्दत हज़रत इमाम अबू हनीफ़ रदियल्लाहो अन्हो के नज़दीक दो साल है. दूध पीने की मुद्दत के बाद जो दूध पिया जाए उससे हुरमत नहीं जुड़ती. अल्लाह तआला ने रिज़ाअत (दूध पीने) को नसब की जगह किया है और दूध पिलाने वाली को दूध पीने वाले बच्चे की माँ और उसकी लड़की को बच्चे की बहन फ़रमाया. इसी तरह दूध पिलाई का शौहर दूध पीने वाले बच्चे का बाप और उसका बाप बच्चे का दादा और उसकी बहन उसकी फुफी और उसका हर बच्चा जो दूध पिलाई के सिवा और किसी औरत से भी हो, चाहे वह दूध पीने से पहले पैदा हुआ या उसके बाद, वो सब उसके सौतेले भाई बहन हैं. और दूध पिलाई की माँ दूध पीने वाले बच्चे की नानी और उसकी बहन उसकी ख़ाला और उस शौहर से उसके जो बच्चे पैदा हो वो दूध पीने वाले बच्चे के दूध शरीक भाई बहन, और उस शौहर के अलावा दूसरे शौहर से जो हों वह उसके सौतेले भाई बहन, इसमें अस्ल यह हदीस है कि दूध पीने से वो रिश्ते हराम हो जाते हैं जो नसब से हराम हैं. इसलिये दूध पीने वाले बच्चे पर उसके दूध माँ बाप और उनके नसबी और रिज़ाई उसूल व फ़रोअ सब हराम हैं.

(5) बीवियों की माएं, बीवियों की बेटियाँ और बेटो की बीवियाँ बीवियों की माएं सिर्फ़ निकाह का बन्धन होते ही हराम हो जाती हैं चाहें उन बीवियों से सोहबत या हमबिस्तरी हुई हो या नहीं.

(6) गोद में होना ग़ालिबे हाल का बयान है, हुरमत के लिये शर्त नहीं.

(7) उनकी माओ से तलाक़ या मौत वग़ैरह के ज़रीये से, सोहबत से पहले जुदाई होने की सूरत में उनके साथ निकाह जायज़ है.

(8) इससे लेपालक निकल गए. उनकी औरतों के साथ निकाह जायज़ है. और दूध बेटे की बीबी भी हराम है क्योंकि वह सगे के हुक्म् में है. और पोते परपोते बेटों में दाख़िल हैं.

(9) यह भी हराम है चाहे दोनों बहनों को निकाह में जमा किया जाए या मिल्के यमीन के ज़रिये से वती में. और हदीस शरीफ़ में फुफी भतीजी और ख़ाला भांजी का निकाह में जमा करना भी हराम फ़रमाया गया. और क़ानून यह है कि निकाह में हर ऐसी दो औरतों का जमा करना हराम है जिससे हर एक को मर्द फ़र्ज़ करने से दूसरी उसके लिये हलाल न हो, जैसे कि फुफी भतीजी, कि अगर फुफी को मर्द समझा जाए तो चचा हुआ, भतीजी उस पर हराम है और अगर भतीजी को मर्द समझा जाए तो भतीजा हुआ, फुफी उस पर हराम है, हुरमत दोनों तरफ़ है. और अगर सिर्फ़ एक तरफ़ से हो तो जमा हराम न होगी जैसे कि औरत और उसके शौहर की लड़की को मर्द समझा जाए तो उसके लिये बाप की बीबी तो हराम रहती है मगर दूसरी तरफ़ से यह बात नहीं है यानी शौहर की बीबी कि अगर मर्द समझा जाए तो यह अजनबी होगा और कोई रिश्ता ही न रहेगा.

(10) गिरफ़्तार होकर बग़ैर अपने शौहरों के, वो तुम्हारे लिये इस्तबरा (छुटकारा हो जाने) के बाद हलाल हैं, अगरचें दारूल हर्ब में उनके शौहर मौजूद हों क्योंकि तबायने दारैन (अलग अलग सुकूनत) की वजह से उनकी शौहरों से फुर्क़त हो चुकी. हज़रत अबू सइर्द ख़ुदरी रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया हमने एक रोज़ बहुत सी क़ैदी औरतें पाई जिनके शौहर दारूल हर्ब में मौजूद थे, तो हमने उनसे क़ुर्बत में विलम्ब किया और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से मसअला पूछा. इस पर यह आयत उतरी.

(11) वो मेहरम औरतें जिनका ऊपर बयान किया गया.

(12) निकाह से या मिल्के यमीन से. इस आयत से कई मसअले साबित हुए. निकाह में मेहर ज़रूरी है और मेहर निशिचत न किया हो, जब भी वाज़िब होता है. मेहर माल ही होता है न कि ख़िदमत और तालीम वग़ैरह जो चीज़ें माल नहीं हैं, इतना क़लील जिसको माल न कहा जाए, मेहर होने की सलाहियत नहीं रखता. हज़रत जाबिर और हज़रत अली मुरतज़ा रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि मेहर की कम मिक़दार दस दरहम है, इससे कम नहीं हो सकता.

(13) इससे हरामकारी मुराद है और यहाँ चेतावनी है कि ज़िना करने वाला सिर्फ़ अपनी वासना की पूर्ति करता है और मस्ती निकालता है और उसका काम सही लक्ष्य और अच्छे उदेश्य से ख़ाली होता है, न औलाद हासिल करना, न नस्ल, न नसब मेहफ़ूज़ रखना, न अपने नफ़्स को हराम से बचाना, इनमें से कोई बात उसके सामने नहीं होती, वह अपने नुत्फ़े और माल को नष्ट करके दीन और दुनिया के घाटे में गिरफ़्तार होता है.

(14) चाहे औरत निश्चित मेहर से कम कर दे या बिल्कुल बख़्श दे या मर्द मेहर की मात्रा और ज़्यादा कर दें.

(15) यानी मुसलमानों की ईमानदार दासियाँ, क्योंकि निकाह अपनी दासी से नहीं होता : वह निकाह के बिना ही मालिक के लिये हलाल है. मतलब यह है कि जो शख़्स ईमान वाली आज़ाद औरत से निकाह की क्षमता और ताक़त न रखता हो वह ईमानदार दासी से निकाह करे, यह बात शर्माने की नहीं. जो शख़्स आज़ाद औरत से निकाह की क्षमता रखता हो उसको भी मुसलमान बांदी से निकाह करना जायज़ है. यह मसअला इस आयत में तो नहीं है, मगर ऊपर की आयत ” व उहिल्ला लकुम मा वराआ ज़ालिकुम” से साबित है. ऐसे ही किताब वाली दासी से भी निकाह जायज़ है और मूमिना यानी ईमान वाली के साथ अफ़ज़ल व मुस्तहब है. जैसा कि इस आयत से साबित हुआ.

(16) यह कोई शर्म की बात नहीं. फ़ज़ीलत ईमान से है. इसी को काफ़ी समझो.

(17) इससे मालूम हुआ कि दासी को अपने मालिक की आज्ञा के बिना निकाह का हक़ नहीं, इसी तरह ग़ुलाम को.

(18) अगरचे मालिक उनके मेहर के मालिक हैं लेकिन दासियों को देना मालिक ही को देना है क्योंकि ख़ुद वो और जो कुछ उनके क़ब्ज़े में हो, सब मालिक का है. या ये मानी हैं कि उनके मालिकों की इजाज़त से उन्हें मेहर दो.

(19) यानी खुले छुपे किसी तरह बदकारी नहीं करतीं.

(20) और शौहर-दार हो जाएं.

(21) जो शौहरदार न हों, यानी पचास कोड़े, क्योंकि आज़ाद के लिये सौ कोड़े हैं और दासियों को संगसार नहीं किया जाता.

(22) दासी से निकाह करना.

(23) दासी के साथ निकाह करने से, क्योंकि इससे ग़ुलाम औलाद पैदा होगी.

सूरए निसा – पाँचवा रूकू

सूरए निसा – पाँचवा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला


अल्लाह चाहता है कि अपने आदेश तुम्हारे लिये बयान करदे और तुम्हें अगलों के तरीक़े बतादे (1)
और तुमपर अपनी रहमत से रूज़ू (तवज्जूह) फ़रमाए और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है (26) और अल्लाह तुमपर अपनी रहमत से रूजू फ़रमाना चाहता है और जो अपने मज़ों के पीछे पड़े है वो चाहते है कि तुम सीधी राह से बहुत अलग हो जाओ  (2)(27)
अल्लाह चाहता है कि तुमपर तख़फ़ीफ़ (कमी) करे(3)
और आदमी कमज़ोर बनाया गया(4)(28)
ऐ ईमान वालों, आपस में एक दूसरे के माल नाहक़ ना खाओ  (5)
मगर यह कि कोई सौदा तुम्हारी आपसी रज़ामन्दी का हो (6)
और अपनी जानें क़त्ल न करो (7)
बेशक अल्लाह तुम पर मेहरबान है (29) और जो ज़ुल्म व ज़्यादती से ऐसा करेगा तो जल्द ही हम उसे आग में दाख़िल करेंगे और यह अल्लाह को आसान है(30) अगर बचते रहो बड़े गुनाहों से जिनकी तुम्हें मनाई है (8)
तो तुम्हारे और गुनाह (9)
हम बख़्श देंगे और तुम्हें इज़्ज़त की जगह दाख़िल करेंगे (31)
और उसकी आरज़ू न करो जिससे अल्लाह ने तुम में एक को दूसरे पर बड़ाई दी(10)
मर्दों के लिये उनकी कमाई से हिस्सा है और औरतों के लिये उनकी कमाई से हिस्सा (11)
और अल्लाह से उसका फ़ज़्ल (कृपा) मांगो बेशक अल्लाह सब कुछ जानता है (32)
और हमने सबके लिये माल के मुस्तहक़ (हक़दार) बना दिये है जो कुछ छोड़ जाएं  मां बाप और क़रावत वाले (रिश्तेदार) और वो जिनसे तुम्हारा हलफ़ बंध चुका (12)
उन्हें उनका हिस्सा दो बेशक हर चीज़ अल्लाह के सामने है (33)

तफसीर
सूरए निसा – पाँचवां रूकू

(1) नबियों और नेक बन्दों की.

(2) और हराम में लगकर उन्हीं की तरफ़ हो जाओ.

(3) और अपने फ़ज़्ल व मेहरबानी से अहकाम आसान करे.

(4) उसको औरतों से और वासना से सब्र दुशवार है. हदीस में है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, औरतों में भलाई नहीं और उनकी तरफ़ से सब्र भी नहीं हो सकता. नेकों पर वो ग़ालिब आती हैं, बुरे उन पर ग़ालिब आ जाते हैं.

(5) चोरी, ग़बन, ख़ुर्द बुर्द और नाजायज़ तौर से क़ब्ज़ा कर लेना, जुआ, सूद जितने हराम तरीक़े हैं सब नाहक़ हैं, सब की मनाही है.

(6) वह तुम्हारे लिये हलाल है.

(7) ऐसे काम इख़्तियार करके जो दुनिया या आख़िरत में हलाकत का कारण हों, इसमें मुसलमानों का क़त्ल करना भी आ गया है और मूमिन का क़त्ल ख़ुद अपना ही क़त्ल है, क्योंकि तमाम ईमान वाले एक जान की तरह हैं. इस आयत से ख़ुदकुशी यानी आत्महत्या की अवैधता भी साबित हुई. और नफ़्स का अनुकरण करके हराम में पड़ जाना भी अपने आपको हलाक करना है.

(8) और जिन पर फटकार उतरी यानी अज़ाब का वादा दिया गया मिस्ल क़त्ल, ज़िना, चोरी वग़ैरह के.

(9) छोटे गुनाह. कुफ़्र और शिर्क तो न बख़्शा जाएगा अगर आदमी उसी पर मरा (अल्लाह की पनाह). बाक़ी सारे गुनाह, छोटे हों या बड़े, अल्लाह की मर्ज़ी में हैं, चाहे उन पर अज़ाब करे, चाहे माफ़ फ़रमाए.

(10) चाहे दुनिया के नाते से या दीन के, कि आपस में ईर्ष्या, हसद और दुश्मनी न पैदा हो. ईर्ष्या यानी हसद अत्यन्त बुरी चीज़ है. हसद वाला दूसरे को अच्छे हाल में देखता है तो अपने लिये उसकी इच्छा करता है और साथ में यह भी चाहता है कि उसका भाई उस नेअमत से मेहरूम हो जाए. यह मना है. बन्दे को चाहिये कि अल्लाह तआला की तरफ़ से उसे जो दिया गया है, उस पर राज़ी रहे. उसने जिस बन्दे को जो बुज़ुर्गी दी, चाहे दौलत और माल की, या दीन में ऊंचे दर्जे, यह उसकी हिकमत है. जब मीरास की आयत में ” लिज़्ज़करे मिस्लो हज़्ज़िल उनसयेन” उतरा और मरने वाले के तर्के में मर्द का हिस्सा औरत से दूना मुक़र्रर किया गया, तो मर्दों ने कहा कि हमें उम्मीद है कि आख़िरत में नेकियों का सवाब भी हमें औरतों से दुगना मिलेगा और औरतों ने कहा कि हमें उम्मीद है कि गुनाह का अज़ाब हमें मर्दों से आधा होगा. इस पर यह आयत उतरी और इसमें बताया गया कि अल्लाह तआला ने जिसको जो फ़ज़्ल दिया वह उसकी हिकमत है.

(11) हर एक को उसके कर्मों का बदला. उम्मुल मूमिनीन हज़रत उम्मे सलमा रदियल्लाहो अन्हा ने फ़रमाया कि हम भी अगर मर्द होते तो जिहाद करते और मर्दों की तरह जान क़ुर्बान करने का महान सवाब पाते. इस पर यह आयत उतरी और उन्हें तसल्ली दी गई कि मर्द जिहाद से सवाब हासिल कर सकते हैं तो औरतें शौहरों की फ़रमाँबरदारी और अपनी पवित्रता की हिफ़ाज़त करके सवाब हासिल कर सकती हैं.

(12) इससे अक़्दे मवालात मुराद है. इसकी सूरत यह है कि कोई मजहूलुन नसब शख़्स दूसरे से यह कहे कि तू मेरा मौला है, मैं मर जाऊं तो मेरा वारिस होगा और मैं कोई जिनायत करूँ तो तुझे दय्यत देनी होगी. दूसरा कहे मैंने क़ुबूल किया. उस सूरत में यह अक़्द सहीह हो जाता है और क़ुबूल करने वाला वारिस बन जाता है और दय्यत भी उस पर आ जाती है और दूसरा भी उसी की तरह से मजहूलुन नसब हो और ऐसा ही कहे और यह भी क़ुबूल कर ले तो उनमें से हर एक दूसरे का वारिस और उसकी दय्यत का ज़िम्मेदार होगा. यह अक़्द साबित है. सहाबा रदियल्लाहो अन्हुम इसके क़ायल हैं.

सूरए निसा – छटा रूकू

सूरए निसा – छटा रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला
मर्द अफ़सर हैं औरतों पर (1)
इसलिये कि अल्लाह ने उनमें एक को दूसरे पर बड़ाई दी  (2)
और इसलिये कि मर्दों ने उनपर अपने माल ख़र्च किये (3)
तो नेकबख़्त (ख़ुशनसीब) औरतें अदब वालियां हैं ख़ाविन्द (शौहर) के पीछे हिफ़ाज़त रखती हैं (4)
जिस तरह अल्लाह ने हिफ़ाज़त का हुक्म दिया और जिन औरतों की नाफ़रमानी का तुम्हें डर हो (5)
तो उन्हें समझाओ और उनसे अलग सोओ और उन्हें मारो(6)
फिर अगर वो तुम्हारे हुक्म में आजाएं तो उनपर ज़ियादती की कोई राह न चाहो बेशक अल्लाह बलन्द बड़ा है (7) (34) 
और अगर तुमको मियां बीबी के झगड़े का डर हो(8)
तो एक पंच मर्द वालों की तरफ़ से भेजो और एक पंच औरत वालों की तरफ़ से  (9)
ये दोनो अगर सुलह करना चाहे तो अल्लाह उनमें मेल कर देगा बेशक अल्लाह जानने वाला ख़बरदार है  (10) (35)
और अल्लाह की बन्दगी करो और उसका शरीक किसी को न ठहराओ (11)
और मां बाप से भलाई करो(12)
और रिश्तेदारों (13)
और यतीमों और मोहताजों (14)
और पास के पड़ोसी और दूर के पड़ोसी (15)
और करवट के साथी (16)
और राहगीर(17)
और अपनी बांदी (दासी) ग़ुलाम से(18)
बेशक अल्लाह को ख़ुश नहीं आता कोई इतराने वाला बड़ाई मारने वाला (19)(36)
जो आप कंजूसी करें और औरों से कंजूसी के लिये कहें (20)
और अल्लाह ने जो अपने फ़ज़्ल से दिया है उसे छुपाएं (21)
और काफ़िरों के लिये हमने ज़िल्लत का अज़ाब तैयार कर रखा है (37) और वो जो अपने माल लोगों के दिखावे को ख़र्च करते

हैं (22)
और ईमान नहीं लाते अल्लाह  और न क़यामत पर और जिसका साथी शैतान हुआ (23)
तो कितना बुरा साथी है (38) और उनका क्या नुक़सान था अगर ईमान लाते अल्लाह और क़यामत पर  और अल्लाह के दिये में से उसकी राह में ख़र्च करते (24)
और अल्लाह उनको जानता है (39) अल्लाह एक ज़र्रा भर ज़ुल्म नहीं फ़रमाता और अगर कोई नेकी हो तो उसे दूनी करता औरअपने पास से बड़ा सवाब देता है (40) तो कैसी होगी जब हम हर उम्मत से एक गवाह लाएं (25)
और ऐ मेहबूब, तुम्हें उनसब पर गवाह और निगहबान बनाकर लाएं (26)(41)
उस दिन तमन्ना करेंगे वो जिन्होने कुफ़्र किया और रसूल की नाफ़रमानी की काश उन्हें मिट्टी में दबाकर ज़मीन बराबर करदी जाए और कोई बात अल्लाह से न छुपा सकेंगे (27)(42)

तफसीर
सूरए निसा – छटा रूकू

(1) तो औरतों को उनकी इताअत लाज़िम है और मर्दों को हक़ है कि वो औरतों पर रिआया की तरह हुक्मरानी करें. हज़रत सअद बिन रबीअ ने अपनी बीबी हबीबा को किसी ख़ता पर एक थप्पड़ मारा. उनके वालिद सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में ले गए और उनके शौहर की शिकायत की. इस बारे में यह आयत उतरी.

(2) यानी मर्दों को औरतों पर अक़्ल और सूझबूझ और जिहाद व नबुव्वत, ख़िलाफ़त, इमामत, अज़ान, ख़ुत्बा, जमाअत, जुमुआ, तकबीर, तशरीक़ और हद व क़िसास की शहादत के, और विरासत में दूने हिस्से और निकाह व तलाक़ के मालिक होने और नसबों के उनकी तरफ़ जोड़े जाने और नमाज़ रोज़े के पूरे तौर पर क़ाबिल होने के साथ, कि उनके लिये कोई  ज़माना ऐसा नहीं है कि नमाज़ रोजे़ के क़ाबिल न हों, और दाढ़ियों और अमामों के साथ फ़ज़ीलत दी.

(3) इस आयत से मालूम हुआ कि औरतों की आजीविका मर्दों पर वाजिब है.

(4) अपनी पवित्रता और शौहरों के घर, माल और उनके राज़ों की.

(5) उन्हें शौहर की नाफ़रमानी और उसकी फ़रमाँबरदारी न करने और उसके अधिकारों का लिहाज़ न रखने के नतीजे समझओ, जो दुनिया और आख़िरत में पेश आते हैं और अल्लाह के अज़ाब का ख़ौफ़ दिलाओ और बताओ कि हमारा तुम पर शरई हक़ है. और हमारी आज्ञा का पालन तुम पर फ़र्ज़ है. अगर इस पर भी न मानें…..

(6) हल्की मार.

(7) और तुम गुनाह करते हो फिर भी वह तुम्हारी तौबह कुबूल फ़रमा लेता है. तो तुम्हारे हाथ के नीचे की औरतें अगर ग़लती करने के बाद माफ़ी चाहें तो तुम्हें ज़्यादा मेहरबानी से माफ़ करना चाहिये और अल्लाह की क़ुदरत और बरतरी का लिहाज़ रखकर ज़ुल्म से दूर रहना चाहिये.

(8) और तुम देखो कि समझाना, अलग सोना, मारना कुछ भी कारामद न हो और दोनों के मतभेद दूर न हुए.

(9) क्योंकि क़रीब के लोग अपने रिश्तेदारों के घरेलू हालात से परिचित होते हैं और मियाँ बीबी के बीच मिलाप की इच्छा भी रखते हैं और दोनों पक्षों को उनपर भरोसा और इत्मीनान भी होता है और उनसे अपने दिल की बात कहने में हिचकिचाहट भी नहीं होती है.

(10) जानता है कि मियाँ बीवी में ज़ालिम कौन है. पंचों को मियाँ बीवी में जुदाई कर देने का इख़्तियार नहीं.

(11) न जानदार को न बेजान को, न उसके रब होने में, न उसकी इबादत में.

(12) अदब और आदर के साथ और उनकी ख़िदमत में सदा चौकस रहना और उन पर ख़र्च करने में कमी न करना. मुस्लिम शरीफ़ की हदीस है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने तीन बार फ़रमाया, उसकी नाक ख़ाक में लिपटे. हज़रत अबू हुरैरा ने अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह किसकी ? फ़रमाया, जिसने बूढ़े माँ बाप पाए या उनमें से एक को पाया और जन्नती न हो गया.

(13) हदीस शरीफ़ में है, रिश्तेदारों के साथ अच्छा सुलूक करने वालों की उम्र लम्बी और रिज़्क़ वसीअ होता है. (बुख़ारी व मुस्लिम)

(14) हदीस में है, सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, मैं और यतीम की सरपरस्ती करने वाला ऐसे क़रीब होंगे जैसे कलिमे और बीच की उंगली (बुख़ारी शरीफ़). एक और हदीस में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया, बेवा और मिस्कीन की इमदाद और ख़बरदारी करने वाला अल्लाह के रास्तें में जिहाद करने वाले की तरह है.

(15) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि जिब्रील मुझे हमेशा पड़ोसियों के साथ एहसान करने की ताकीद करते रहे, इस हद तक कि गुमान होता था कि उनको वारिस क़रार दे दें.

(16) यानी बीबी या जो सोहबत में रहे या सफ़र का साथी हो या साथ पढ़े या मजलिस और मस्जिद में बराबर बैठे.

(17) और मुसाफ़िर व मेहमान. हदीस में है, जो अल्लाह और क़यामत के दिन पर ईमान रखे उसे चाहिये कि मेहमान की इज़्ज़त करे. (बुख़ारी व मुस्लिम)

(18) कि उन्हें उनकी ताक़त से ज़्यादा तकलीफ़ न दो और बुरा भला न कहो और खाना कपड़ा उनकी ज़रूरत के अनुसार दो. हदीस में है, रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया जन्नत में बुरा व्यवहार करने वाला दाख़िल न होगा. (तिरमिज़ी)

(19) अपनी बड़ाई चाहने वाला घमण्डी, जो रिश्तेदारों और पड़ोसियों को ज़लील समझे.

(20) बुख़्ल यानी कंजूसी यह है कि ख़ुद खाए, दूसरे को न दे. “शेह” यह है कि न खाए न खिलाए. “सख़ा” यह है कि ख़ुद भी खाए दूसरों को भी खिलाए. “जूद” यह है कि आप न खाए दूसरे को खिलाए. यह आयत यहूदियों के बारे में उतरी जो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तारीफ़ बयान करने में कंजूसी करते और आपके गुण छुपाते थे. इस से मालूम हुआ कि इल्म को छुपाना बुरी बात है.

(21) हदीस शरीफ़ में है कि अल्लाह को पसन्द है कि बन्दे पर उसकी नेअमत ज़ाहिर हो. अल्लाह की नेअमत का इज़हार ख़ूलूस के साथ हो तो यह भी शुक्र है और इसलिये आदमी को अपनी हैसियत के लायक़ जायज़ लिबासों में बेहतर लिबास पहनना मुस्तहब है.

(22) बुख़्ल यानी कंजूसी के बाद फ़ुज़ूल ख़र्ची की बुराई बयान फ़रमाई. कि जो लोग केवल दिखावे के लिये या नाम कमाने के लिये ख़र्च करते हैं और अल्लाह की ख़ुशी हासिल करना उनका लक्ष्य नहीं होता, जैसे कि मुश्रिक और मुनाफ़िक़, ये भी उन्हीं के हुक्म में हैं जिन का हुक्म ऊपर गुज़र गया.

(23) दुनिया और आख़िरत में, दुनिया में तो इस तरह कि वह शैतानी काम करके उसको ख़ुश करता रहा और आख़िरत में इस तरह कि हर काफ़िर एक शैतान के साथ आग की ज़ंजीर में जकड़ा होगा. (ख़ाज़िन)
(24) इसमें सरासर उनका नफ़ा ही था.

(25) उस नबी को, और वह अपनी उम्मत के ईमान और कुफ़्र पर गवाही दें क्योंकि नबी अपनी उम्मतों के कामों से बा-ख़बर होते हैं.

(26) कि तुम नबियों के सरदार हो और सारा जगत तुम्हारी उम्मत.

(27) क्योंकि जब वो अपनी ग़लती का इन्कार करेंगे और क़सम खाकर कहेंगे कि हम मुश्रिक न थे और हमने ख़ता न की थी तो उनके मुंहों पर मुहर लगा दी जाएगी और उनके शरीर के अंगों को ज़बान दी जाएगी, वो उनके ख़िलाफ़ गवाही देंगे.

सूरए निसा – सातवाँ रूकू

सूरए निसा – सातवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

ऐ ईमान वालो, नशे की हालत में नमाज़ के पास न जाओ (1)
जब तक इतना होश न हो कि जो कहो उसे समझो और न नापाकी की हालत में बे नहाए मगर मुसाफ़िरी में (2)
और अगर तुम बीमार हो (3)
या सफ़र में या तुम में से कोई क़ज़ाए हाजत (पेशाब पख़ाना) से आया  (4)
या तुमने औरतों को छुआ(5)
और पानी न पाया(6)
तो पाक मिट्टी से तयम्मुम करो (7)
तो अपने मुंह और हाथों का मसह (हाथ फेरना)  करो(8)
बेशक अल्लाह माफ़ करने वाला बख़्शने वाला है (43)
क्या तुमने उन्हें न देखा जिनको किताब से एक हिस्सा मिला (9)
गुमराही मोल लेते है(10)
और चाहते है (11)
तुम भी राह से बहक जाओ (44) और अल्लाह ख़ूब जानता है तुम्हारे दुश्मनों को  (12)
और अल्लाह काफ़ी है वाली (मालिक) (13)
और अल्लाह काफ़ी है मददगार (45) कुछ यहूदी कलामों की उनकी जगह से फेरते हैं (14)
और (15)
कहते है हमने सुना और न माना और (16)
सुनिये आप सुनाए न जाएं (17)
और राना कहते हैं (18)
ज़बाने फेर कर (19)
और दीन में तअने (लांछन) के लिये (20)
और अगर वो  (21)
कहते है कि हमने सुना और माना और हुज़ूर हमारी बात सुनें और हुज़ूर हमपर नज़र फ़रमाएं तो उनके लिये भलाई और रास्ती में
ज़्यादा होता लेकिन उनपर तो अल्लाह ने लानत की उनके कुफ्र की वजह से तो यक़ीन नहीं रखते मगर थोड़ा (22) (46)
ऐ किताब वालो ईमान लाओ उसपर जो हमने उतारा तुम्हारे साथ वाली किताब (23)
की पुष्टि फ़रमाता इससे पहले कि हम बिगाड़ें कुछ मुंहों को (24)
तो उन्हें फेर दे उनकी पीठ की तरफ़ या उन्हें लानत करें जैसी लानत की हफ़्ते वालों पर (25)
और ख़ुदा का हुक्म होकर रहे  (47) बेशक अल्लाह इसे नहीं बख़्शता कि उसके साथ कुफ्र किया जाए  और कुफ्र से नीचे जो कुछ है जिसे चाहे माफ़ फ़रमा देता है (26)
और जिसने ख़ुदा का शरीक ठहराया उसने बड़ा गुनाह का तूफ़ान बांधा (48) क्या तुमने उन्हें न देखा जो ख़ुद अपनी सुथराई बयान करते हैं (27)
कि अल्लाह जिसे चाहे सुथरा करे और उनपर ज़ुल्म न होगा ख़ुर्में के दाने के डोरे बराबर (28)(49)
देखो कैसा अल्लाह पर झूठ बांध रहे हैं (29) और यह काफ़ी है खुल्लम खुल्ला गुनाह (50)

तफसीर
सूरए निसा – सातवाँ रूकू

(1) हज़रत अब्दुर रहमान बिन औफ़ ने सहाबा की एक जमाअत की दावत की. उसमें खाने के बाद शराब पेश की गई. कुछ ने पी, क्योंकि उस वक़्त तक शराब हराम न हुई थी. फिर मग़रिब की नमाज़ पढ़ी. इमाम नशे में “क़ुल या अय्युहल काफ़िरूना अअबुदो मा तअबुदूना व अन्तुम आबिदूना मा अअबुद” पढ़ गए और दोनों जगह “ला” (नहीं) छोड़ गए और नशे में ख़बर न हुई. और आयत का मतलब ग़लत हो गया. इस पर यह आयत उतरी और नशे की हालत में नमाज़ पढ़ने से मना फ़रमा दिया गया. तो मुसलमानों ने नमाज़ के वक़्तों में शराब छोड़ दी. इसके बाद शराब बिल्कुल हराम कर दी गई. इस से साबित हुआ कि आदमी नशे की हालत में कुफ़्र का कलिमा ज़बान पर लाने से काफ़िर नहीं होता. इसलिये कि “क़ुल या अय्युहल काफ़िरूना” में दोनों जगह “ला” का छोड़ देना कुफ़्र है, लेकिन उस हालत में हुज़ूर ने उस पर कुफ़्र का हुक्म न फ़रमाया बल्कि क़ुरआने पाक में उनको “या अय्युहल लज़ीना आमनू” (ऐ ईमान वालों) से ख़िताब फ़रमाया गया.

(2) जबकि पानी न पाओ, तयम्मुम कर लो.

(3) और पानी का इस्तेमाल ज़रूर करता हो.

(4) यह किनाया है बे वुज़ू होने से.

(5) यानी हमबिस्तरी की.

(6) इसके इस्तेमाल पर क़ादिर न होने, चाहे पानी मौजूद न होने के कारण या दूर होने की वजह से या उसके हासिल करने का साधन न होने के कारण या साँप, ख़तरनाक जंगली जानवर, दुश्मन वग़ैरह कोई रूकावट होने के कारण.

(7) यह हुक्म मरीज़ों, मुसाफ़िरों, जनाबत और हदस वालों को शामिल है, जो पानी न पाएं या उसके इस्तेमाल से मजबूर हों (मदारिक). माहवारी, हैज़ व निफ़ास से पाकी के लिये भी पानी से मजबूर होने की सूरत में तयम्मुम जायज़ है, जैसा कि हदीस शरीफ़ में आया है.

(8) तयम्मुम का तरीक़ा :- तयम्मुम करने वाला दिल से पाकी हासिल करने की नियत करे. तयम्मुम में नियत शर्त है क्योंकि अल्लाह का हुक्म आया है. जो चीज़ मिट्टी की जिन्स से हो जैसे धूल, रेत, पत्थर, उन सब पर तयम्मुम जायज़ है. चाहे पत्थर पर धूल भी न हो लेकिन पाक होना इन चीज़ों में शर्त है. तयम्मुम में दो ज़र्बें हैं, एक बार हाथ मार कर चेहरे पर फेर लें, दूसरी बार हाथों पर. पानी के साथ पाक अस्ल है और तयम्मुम पानी से मजबूर होने की हालत में उसकी जगह लेता
है. जिस तरह हदस पानी से ज़ायल होता है, उसी तरह तयम्मुम से. यहाँ तक कि एक तयम्मुम से बहुत से फ़र्ज़ और नफ़्ल पढ़े जा सकते हैं. तयम्मुम करने वाले के पीछे ग़ुस्ल और वुज़ू वाले की नमाज़ सही है. ग़ज़वए बनी मुस्तलक़ में जब इस्लामी लश्कर रात को एक वीराने में उतरा जहाँ पानी न था और सुबह वहाँ से कूच करने का इरादा था, वहाँ उम्मुल मूमिनीन हज़रत आयशा रदियल्लाहो अन्हा का हार खो गया. उसकी तलाश के लिये सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने वहाँ क़याम फ़रमाया. सुबह हुई तो पानी न था. अल्लाह तआला ने तयम्मुम की आयत उतारी. उसैद बिन हदीर रदियल्लाहो अन्हो ने कहा कि ऐ आले अबूबक्र, यह तुम्हारी पहली ही बरकत नहीं है, यानी तुम्हारी बरकत से मुसलमानों को बहुत आसानियाँ हुई और बहुत से फ़ायदे पहुंचे. फिर ऊंट उठाया गया तो उसके नीचे हार मिला. हार खो जाने और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के
न बताने में बहुत हिकमत हैं. हज़रत सिद्दीक़ा के हार की वजह से क़याम उनकी बुज़ुर्गी और महानता ज़ाहिर करता है. सहाबा का तलाश में लग जाना, इसमें हिदायत है कि हुज़ूर की बीबियों की ख़िदमत ईमान वालों की ख़ुशनसीबी है, और फिर तयम्मुम का हुक्म होना, मालूम होता है कि हुज़ूर की पाक बीबियों की ख़िदमत का ऐसा इनआम है, जिससे क़यामत तक मुसलमान फ़ायदा उठाते रहेंगे. सुब्हानल्लाह !

(9) वह यह कि तौरात से उन्होंने सिर्फ़ हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की नबुव्वत को पहचाना और उसमें सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का जो बयान था उस हिस्से से मेहरूम रहे और आपके नबी होने का इन्कार कर बैठै. यह आयत रिफ़ाआ बिन ज़ैद और मालिक बिन दख़्श्म यहूदियों के बारे में उतरी. ये दोनों जब रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से बात करते तो ज़बान टेढ़ी करके बोलते.

(10) हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत का इन्कार करके.

(11) ऐ मुसलमानों !

(12) और उसने तुम्हें भी उनकी दुश्मनी पर ख़बरदार कर दिया तो चाहिये कि उनसे बचते रहो.

(13) और जिसके काम बनाने वाला अल्लाह हो उसे क्या डर.

(14) जो तौरात शरीफ़ में अल्लाह तआला ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नात में फ़रमाए.

(15) जब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उन्हें कुछ हुक्म फ़रमाते हैं तो.

(16) कहते हैं.

(17) यह कलिमा दो पहलू रखता है. एक पहलू तो यह कि कोई नागवार बात आपको सुनने में न आए और दूसरा पहलू यह कि आपको सुनना नसीब न हो.
(18) इसके बावुजूद कि इस कलिमे के साथ सम्बोधन करने को मना किया गया है क्योंकि उनकी ज़बान में ख़राब मानी रखता है.

(19) हक़ यानी सच्चाई से बातिल यानी बुराई की तरफ़

(20) कि वो अपने दोस्तों से कहते थे कि हम हुज़ूर की बुराई करते हैं. अगर आप नबी होते तो आप इसको जान लेते. अल्लाह तआला ने उनके दिल में छुपी कटुता और ख़बासत को ज़ाहिर फ़रमा दिया.

(21) इन कलिमात की जगह अदब और आदर करने वालों के तरीक़े पर.

(22) इतना कि अल्लाह ने उन्हें पैदा किया और रोज़ी दी और इतना काफ़ी नहीं जब तक कि ईमान वाली बातों को न मानें और सब की तस्दीक़ न करें.

(23) तौरात.

(24) आँख नाक कान पलकें वग़ैरह नक़्शा मिटा कर.

(25) इन दोनों बातों में से एक ज़रूर लाज़िम है. और लानत तो उन पर ऐसी पड़ी कि दुनिया उन्हें बुरा कहती है. यहाँ मुफ़स्सिरों के कुछ अलग अलग क़ौल हैं. कुछ इस फटकार का पड़ना दुनिया में बताते हैं, कुछ आख़िरत में. कुछ कहते है कि लानत हो चुकी और फटकार पड़ गई. कुछ कहते हैं कि अभी इन्तिज़ार है. कुछ का क़ौल है कि यह फटकार उस सूरत में थी जबकि यहूदियों में से कोई ईमान न लाता और चूंकि बहुत से यहूदी ईमान ले आए, इसलिये शर्त नहीं पाई गई और फटकार उठ गई. हज़रत अब्दुल्लाह बिन सलाम जो यहूदी आलिमों के बड़ों में से हैं, उन्होंने मुल्के शाम से वापस आते हुए रास्ते में यह आयत सुनी और अपने घर पहुंचने से पहले इसलाम लाकर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया, या रसूलल्लाह मैं नहीं ख़याल करता था कि मैं अपना मुंह पीठ की तरफ़ फिर जाने से पहले और चेहरे का नक़्शा मिट जाने से पहले आपकी ख़िदमत में हाज़िर हो सकूंगा, यानी इस डर से उन्होंने ईमान लाने में जल्दी की क्योंकि तौरात शरीफ़ से उन्हें आपके सच्चे रसूल होने का यक़ीनी इल्म था, इसी डर से कअब अहबार जो यहूदियों में बड़ी बुज़ुर्गी रखते थे, हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो से यह आयत सुनकर मुसलमान हो गए.

(26) मानी यह हैं कि जो कुफ़्र पर मरे उसकी बख़्शिश नहीं. उसके लिये हमेशगी का अज़ाब है और जिसने कुफ़्र न किया हो, वह चाहे कितना ही बड़ा गुनाह करने वाला हो, और तौबह के बग़ैर मर जाए, तो उसका बदला अल्लाह की मर्ज़ी पर है, चाहे माफ़ फ़रमाए या उसके गुनाहों पर अज़ाब करे फिर अपनी रहमत से जन्नत में दाख़िल फ़रमाए. इस आयत में यहूदियों को ईमान की तरग़ीब है और इस पर भी प्रमाण है कि यहूदियों पर शरीअत के शब्दों में मुश्रिक शब्द लागू होना सही है.

(27) यह आयत यहूदियों और ईसाईयों के बारे में नाज़िल हुई जो अपने आपको अल्लाह का बेटा और उसका प्यारा बताते थे और कहते थे कि यहूदियों और ईसाईयों के सिवा कोई जन्नत में दाख़िल न होगा. इस आयत में बताया गया कि इन्सान का, दीनदारी, नेक काम, तक़वा और अल्लाह की बारगाह में क़ुर्ब और मक़बूलियत का दावेदार होना और मुंह से अपनी तारीफ़ करना काम नहीं आता.

(28) यानी बिल्कुल ज़ुल्म न होगा. वही सज़ा दी जाएगी जो उनका हक़ है.

(29) अपने आपको गुनाह और अल्लाह का प्यारा बताकर.