19 सूरए मरयम

19 सूरए मरयम -पहला रूकू


सूरए मरयम मक्का में उतरी, इसमें 98 आयतें 6 रूकू हैं.
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए मरयम मक्का में उतरी, इसमें छ रूकू अठानवे आयतें, सात सौ अस्सी कलिमें हैं.

काफ़-हा-या-ऐन-सॉद {1} यह ज़िक्र है तेरे रब की उस रहमत का जो उसने अपने बन्दे ज़करिया पर की{2} जब उसने अपने रब को आहिस्ता पुकारा(2){3}
(2) क्योंकि आहिस्तगी, दिखावे से दूर और इख़लास से भरपूर होती है. इसके अलावा यह भी फ़ायदा था कि बुढापे की उम्र में जबकि आपकी उम्र पछहत्तर या अस्सी बरस की थी, लोग बुरा भला कहें. इसलिये भी इस दुआ का छुपाना या आहिस्ता रखना मुनासिब था. एक क़ौल यह भी है कि बुढ़ापे की कमज़ोरी की वजह से हज़रत की आवाज़ भी कमज़ोर हो गई थी. (मदारिक , ख़ाज़िन)

अर्ज़ की ऐ मेरे रब मेरी हड्डी कमज़ोर हो गई(3)
(3) यानी बुढापे की कमज़ोरी इस हद को पहुंच गई कि हड्डी जो बहुत मज़बूत अंग है उसमें कमज़ोरी आ गई तो बाक़ी अंगों की हालत का क्या बयान हो.

और सर से बुढ़ापे का भभूका फूटा (4)
(4) कि सारा सर सफ़ेद हो गया.

और ऐ मेरे रब मैं तुझे पुकार कर कभी नामुराद न रहा (5){4}
(5) हमेशा तूने मेरी दुआ क़ुबूल की.

और मुझे अपने बाद अपने क़राबत वालों (रिश्तेदारों) का डर है (6)
(6)  चचाज़ाद वग़ैरह का कि वो शरीर लोग हैं कहीं मेरे बाद दीन में अड़चन न करें जैसा कि बनी इस्राईल से देखने में आ चुका है.

और मेरी औरत बांझ है तो मुझे अपने पास से कोई ऐसा दे डाल जो मेरा काम उठा ले(7){5}
(7) और मेरे इल्म का हामिल हो.

वह मेरा जानशीन हो और यअक़ूब की औलाद का वारिस हो, और ऐ मेरे रब उसे पसन्दीदा कर (8){6}
(8) कि तू अपने फ़ज़्ल से उसको नबुव्वत अता फ़रमाए. अल्लाह तआला ने हज़रत ज़करिया अलैहिस्सलाम की दुआ क़ुबूल फ़रमाई और इरशाद फ़रमाया.

ऐ ज़करिया हम तुझे ख़ुशख़बरी सुनाते हैं एक लड़के की जिनका नाम यहया है इसके पहले हमने इस नाम का कोई न किया{7} अर्ज़ की ऐ मेरे रब मेरे लड़का कहाँ से होगा मेरी औरत तो बांझ है और मैं बुढ़ापे से सूख जाने की हालत को पहुंच गया (9){8}
(9) इस सवाल का उद्देश यह दरियाफ़्त करना है कि बेटा कैसे दिया जायेगा, क्या दोबारा जवानी प्रदानी की जाएगी या इसी हाल में बेटा अता किया जायेगा.

फ़रमाया ऐसा ही है ,(10)
(10) तुम्हीं दोनों से लड़का पैदा फ़रमाना मन्ज़ूर है.

तेरे रब ने फ़रमाया वह मुझे आसान है और मैंने तो इससे पहले तुझे उस वक़्त बनाया जब तू कुछ भी न था(11){9}
(11) तो जो शून्य से सब कुछ पैदा करने में सक्षम है उससे बुढ़ापे में औलाद अता फ़रमाना क्या अजब है.

अर्ज़ की ऐ मेरे रब मुझे कोई निशानी दे, (12)
(12) जिससे मुझे अपनी बीबी के गर्भवती होने की पहचान हो.

फ़रमाया तेरी निशानी यह है कि तू तीन रात दिन लोगों से कलाम न करे भला चंगा होकर(13){10}
(13) सही सालिम होकर बग़ैर किसी बीमारी के और बग़ैर गूंगा होने के. चुनांचे ऐसा ही हुआ कि उन दिनों आप लोगों से बात न कर सके. जब अल्लाह का ज़िक्र करना चाहते, ज़बान खुल जाती.

तो अपनी क़ौम पर मस्जिद से बाहर आया (14)
(14) जो उसकी नमाज़ की जगह थी और लोग मेहराब के पीछे इन्तिज़ार में थे कि आप उनके लिये दर्वाज़ा खोलें तो वो दाख़िल हों और नमाज़ पढ़ें. जब हज़रत ज़करिया बाहर आए तो आपका रंग बदला हुआ था बोल नहीं सकते थे. यह हाल देखकर लोगों ने पूछा क्या हाल है?

तो उन्हें इशारे से कहा कि सुबह शाम तस्बीह करते रहो(15) {11}
(15) और आदत के अनुसार फ़ज्र और अस्र की नमाज़ें अदा करते रहो. अब हज़रत ज़करिया अलैहिस्सलाम ने अपने कलाम न कर सकने से जान लिया कि आप की बीबी साहिबा गर्भवति हो गई और हज़रत यहया अलैहिस्सलाम की पैदायश से दो साल बाद अल्लाह तआला ने फ़रमाया.

ऐ यहया किताब(16)
(16) यानी तौरात को.

मज़बूत थाम और हमने उसे बचपन ही में नबुव्वत दी(17){12}
(17) जबकि आपकी उम्र शरीफ़ तीन साल की थी उस वक़्त में अल्लाह तआला ने आपको सम्पूर्ण बुद्वि अता फ़रमाई और आपकी तरफ़ वही की. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा का यही क़ौल है और इतनी सी उम्र में समझ बूझ और बुद्विमता और ज्ञान चमत्कार में से है और जब अल्लाह के करम से यह हासिल हो तो इस हाल में नबुव्वत मिलना भी कुछ अचरज की बात नहीं. इसलिये इस आयत में हुक्म से मुराद नबुव्वत है. यही क़ौल सही है. कुछ मुफ़स्सिरों ने इससे हिकमत यानी तौरात की जानकारी और दीन की सूझ बूझ भी मुराद ली हे. (ख़ाज़िन,मदारिक,कबीर), कहा गया है कि उस कमसिनी के ज़माने में बच्चों ने आपको खेल के लिये बुलाया तो आपने फ़रमाया “मा लिल लोअबे ख़ुलक़िना” यानी हम खेल के लिये पैदा नहीं किये गए.

और अपनी तरफ़ से मेहरबानी (18)
(18)अता की और उनके दिल में रिक़्क़त और  रहमत रखी कि लोगों पर मेहरबानी करें.

और सुथराई (19)
(19) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि ज़कात से यहाँ ताअत और इख़लास मुराद है.

और कमाल डर वाला था (20){13}
(20) और आप अल्लाह तआला के ख़ौफ़ से बहुत रोया करते थे यहाँ तक कि आपके गालों पर आँआओ के निशान बन गए थे.

और अपने माँ बाप से अच्छा सुलूक करने वाला था ज़बरदस्त व नाफ़रमान न था(21){14}
(21) यानी आप बहुत विनम्र और मिलनसार थे और अल्लाह तआला के फ़रमाँबरदार.

और सलामती है उसपर जिस दिन पैदा हुआ और जिस दिन मरेगा और जिस दिन मुर्दा उठाया जाएगा(22){15}
(22) कि ये तीनों दिन बहुत डर वाले हें क्योंकि इनमें आदमी वह देखता है जो उसने पहले नहीं देखा इसलिये इन तीनों अवसरों पर बहुत वहशत और घबराहट होती है. अल्लाह तआला ने यहया अलैहिस्सलाम को सम्मानित किया कि उन्हें इन तीनों अवसरों पर अम्न और सलामती दी.

19 सूरए मरयम – दूसरा रूकू

19 सूरए मरयम – दूसरा रूकू


और किताब में मरयम को याद करो(1)
(1) यानी ऐ नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम, क़ुरआन शरीफ़ में हज़रत मरयम का वाक़िआ पढ़कर इन लोगों को सुनाइये ताकि इन्हें उनका हाल मालूम हो.

जब अपने घर वालों से पूरब की तरफ़ एक जगह अलग हो गई(2){16}
(2) और अपने मकान में  या बैतुल मक़दिस की पूर्वी दिशा में लोगों से जुदा होकर इबादत के लिये तन्हाई में बैठे.

तो उनसे उधर(3)
(3) यानी अपने और घर वालों के दरमियान.

एक पर्दा कर लिया, तो उसकी तरफ़ हमने अपना रूहानी भेजा(4)
(4) जिब्रईल अलैहिस्सलाम.

वह उसके सामने एक तंदुरूस्त आदमी के रूप में ज़ाहिर हुआ{17} बोली मैं तुझसे रहमान की पनाह मांगती हूँ अगर तुझे ख़ुदा का डर है {18} बोला मैं तेरे रब का भेजा हुआ हूँ कि मैं तुझे एक सुथरा बेटा दूँ {19} बोली मेरे लड़का कहाँ से होगा मुझे तो किसी आदमी ने हाथ न लगाया न मैं बदकार हूँ {20} कहा यूंही है (5)
(5) यही अल्लाह की मर्ज़ी है कि तुम्हें बग़ैर मर्द के छुए ही लड़का प्रदान करे.

तेरे रब ने फ़रमाया है कि ये (6)
(6) यानी बग़ैर बाप के बेटा देना.

मुझे आसान है, और इसलिये कि हम उसे लोगों के वास्ते निशानी  (7)
(7) और अपनी क़ुदरत का प्रमाण.

करें और अपनी तरफ़ से एक रहमत(8)
(8) उनके लिये जो उसके दीन का अनुकरण करें, उसपर ईमान लाएं.

और यह काम ठहर चुका है(9){21}
(9) अल्लाह के इल्म में. अब न रद हो सकता है न बदल सकता है. जब हज़रत मरयम को इत्मीनान हो गया और उनकी परेशानी जाती रही तो हज़रत जिब्रील ने उनके गिरेबान में या आस्तीन में या दामन में या मुंह में दम किया और वह अल्लाह की क़ुदरत से उसी समय गर्भवती हो गई. उस वक़्त हज़रत मरयम की उम्र तेरह या दस साल की थी.

अब मरयम ने उसे पेट में लिया फिर उसे लिये हुए एक दूर जगह चली गई(10){22}
(10) अपने घर वालों से और वह जगह बैतुल लहम थी. वहब का क़ौल है कि सबसे पहले जिस शख़्स को हज़रत मरयम के गर्भ का इल्म हुआ वह उनका चचाज़ाद भाई यूसुफ़ बढ़ई है जो बैतुल मक़दिस की मस्जिद का ख़ादिम था और बहुत बड़ा इबादत गुज़ार व्यक्ति था. उसको जब मालूम हुआ कि मरयम गर्भवती हैं तो काफ़ी हैरत हुई. जब चाहता था कि उनपर लांछन लगाए तो उनकी इबादत का तक़वा और हर वक़्त का हाज़िर रहना किसी वक़्त ग़ायब न होना याद करके ख़ामोश हो जाता था. और जब गर्भ का ख़्याल करता था तो उनको बुरी समझना मुश्किल मालूम होता था. आख़िर में उसने हज़रत मरयम से कहा कि मेरे दिल में एक बात आई है, बहुत चाहता हूँ कि ज़बान पर न लाऊं मगर अब रहा नहीं जाता. आप कहें तो मैं बोल दूँ ताकि मेरे दिल की परेशानी दूर हो जाए. हज़रत मरयम ने कहा कि अच्छी बात कहो. तो उसने कहा कि ऐ मरयम मुझे बताओ क्या खेती बीज के बिना और पेड़ बारिश के बिना और बच्चा बाप के बिना हो सकता है. हज़रत मरयम ने कहा कि हाँ, तुझे मालूम नहीं कि अल्लाह तआला ने जो सबसे पहले खेती पैदा की वह बीज के बिना पैदा की और पेड़ अपनी क़ुदरत से बारिश के बिना उगाए. क्या तू यह कह सकता है कि अल्लाह पानी की मदद के बिना दरख़्त पैदा करने की क्षमता नहीं रखता. यूसुफ़ ने कहा मैं यह तो नहीं कहता बेशक मैं मानता हूँ कि अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है जिसे “होजा” फ़रमाए वह हो जाती है. हजरत मरयम ने कहा कि क्या तुझे नहीं मालूम नहीं कि अल्लाह तआला ने हज़रत आदम और उनकी बीबी को माँ बाप के बिना पैदा किया. हज़रत मरयम की इस बात से यूसुफ़ का शक दूर हो गया और हज़रत मरयम गर्भ के कारण कमज़ोर हो गई थीं इस लिये वह मस्जिद की ख़िदमत में उनकी सहायता करने लगा. अल्लाह तआला ने हज़रत मरयम के दिल में डाला कि वह अपनी क़ौम से अलग चली जाएं. इसलिये वह बैतुल – लहम में चली गई.

फिर उसे जनने का दर्द एक खजूर की जड़ में ले आया (11)
(11) जिसका पेड़ जंगल में सूख गया था. तेज़ सर्दी का वक़्त था. आप उस पेड़ की जड़ में आई ताकि उससे टेक लगाएं और फ़ज़ीहत व लांछन के डर से—

बोली हाय किसी तरह मैं इससे पहले मर गई होती और भूली बिसरी हो जाती{23} तो उसे(12)
(12) जिब्रईल ने घाटी की ढलान से.

उसके तले से पुकारा कि ग़म न खा(13)
(13) अपनी तन्हाई का और खाने पीने की कोई चीज़ मौजूद न होने का और लोगों के बुरा भला कहने का.

बेशक तेरे रब ने नीचे एक नहर बहा दी है(14){24}
(14) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने या हज़रत जिब्रईल ने अपनी एड़ी ज़मीन पर मारी तो मीठे पानी का एक चश्मा जारी हो गया और खजूर का पेड़ हरा भरा हो गया, फल लाया. वो फल पककर रसदार हो गए और हज़रत मरयम से कहा गया—-

और खजूर की जड़ पकड़ कर अपनी तरफ़ हिला तुझपर ताज़ी पक्की खजूरें गिरंगी(15) {25}
(15) जो ज़च्चा के लिये बेहतरीन ग़िज़ा हैं.

तो खा और पी और आँख ठन्डी रख,(16)
(16) अपने बेटे ईसा से—

फिर अगर तू किसी आदमी को देखे(17)
(17) कि तुझसे बच्चे को पूछता है.

तो कह देना मैंने आज रहमान का रोज़ा माना है तो आज हरगिज़ किसी आदमी से बात न करूंगी(18){26}
(18) पहले ज़माने में बोलने का भी रोज़ा था जैसा कि हमारी शरीअत में खाने और पीने का रोज़ा होता है. हमारी शरीअत में चुप रहने का रोज़ा स्थगित हो गया. हज़रत मरयम को ख़ामोशी की नज्र मानने का इसलिये हुक्म दिया गया ताकि हज़रत ईसा कलाम फ़रमाएं और उनका बोलना मज़बूत प्रमाण हो जिससे लांछन दूर हो जाए. इससे कुछ बातें मालूम हुई. जाहिलों के जवाब में ख़ामोशी बेहतर है. कलाम को अफ़ज़ल शख़्स की तरफ़ तफ़वीज़ करना अच्छा है. हज़रत मरयम ने भी इशारे से कहा कि मैं किसी आदमी से बात न करूंगी.

तो उसे गोद में ले अपनी क़ौम के पास आई (19)
(19) जब लोगों ने हज़रत मरयम को देखा कि उनकी गोद में बच्चा है तो रोए और ग़मग़ीन हुए क्योंकि वो नेक घराने के लोग थे और.

बोले ऐ मरयम बेशक तूने बहुत बुरी बात की {27} ऐ हारून की बहन(20)
(20) और हारून या तो हज़रत मरयम के भाई का नाम था या तो बनी इस्रईल में से निहायत बुज़ुर्ग और नेक शख़्स का नाम था जिनके तक़वा और परहेज़गारी से उपमा देने के लिये उन लोगों ने हज़रत मरयम को हारून की बहन कहा था हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के भाई हज़रत हारून ही की तरफ़ निस्बत की जबकि उनका ज़माना बहुत दूर था और हज़ार बरस का समय गुज़र चुका था मगर चूंकि यह उनकी नस्ल से थीं इसलिये हारून की बहन कह दिया जैसा कि अरबों का मुहावरा है कि वो तमीमी को या अख़ा तमीम कहते हैं.

तेरा बाप (21)
(21) यान इमरान.

बुरा आदमी न था और न तेरी माँ (22)
(22) हन्ना.

बदकार {28} इसपर मरयम ने बच्चे की तरफ़ इशारा किया(23)
(23) कि जो कुछ कहना है ख़ुद उनसे कहो. इसपर क़ौम के लोगों को ग़ुस्सा आया और —

वह बोले हम कैसे बात करें उससे जो पालने में बच्चा है(24){29}
(24)यह बातचीत सुनकर हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने दूध पीना छोड़ दिया और अपने बाएं हाथ पर टिक कर क़ौम की तरफ़ मुतवज्जेह हुए और दाएं हाथ से इशारा करके कलाम शुरू किया.

बच्चे ने फ़रमाया, मैं हूँ अल्लाह का बन्दा(25)
(25) पहले बन्दा होने का इक़रार किया ताकि कोई उन्हें ख़ुदा और ख़ुदा का बेटा न कहे क्योंकि आपकी निस्बत यह तोहमत लगाई जाने वाली थी. और यह तोहमत अल्लाह तआला पर लगती थी. इसलिये रसूल के मन्सब का तक़ाज़ा यही था कि वालिदा की बेगुनाही का बयान करने से पहले उस तोहमत को दूर करदें जो अल्लाह तआला की ज़ाते पाक पर लगाई जाएगी और इसी से वह तोहमत भी दूर हो गई जो वालिदा पर लगाई जाती, क्योंकि अल्लाह तआना इस बलन्द दर्जे के साथ जिस बन्दे को नवाज़ता है यक़ीनन उसकी पैदाइश और उसकी सृष्टि निहायत पाक और ताहिर है.

उसने मुझे किताब दी और मुझे ग़ैब की ख़बर बताने वाला (नबी) किया(26){30}
(26) किताब से इंजील मुराद है. हसन का क़ौल है कि आप वालिदा के पेट ही में थे कि आपको तौरात का इल्हाम फ़रमा दिया गया था और पालने में थे जब आपको नबुव्वत अता कर दी गई और इस हालत में आपका कलाम फ़रमाना आपका चमत्कार है. कुछ मुफ़स्सिरों ने आयत के मानी यह भी बयान किये है कि यह नबुव्वत और किताब की ख़बर थी जो बहुत जल्द आप को मिलने वाली थी.

और उसने मुझे मुबारक किया(27)
(27) यानी लोगों के लिये नफ़ा पहुंचाने वाला और भलाई की तअलीम देने वाला, अल्लाह तआला और उसकी तौहीद की दावत देने वाला.

मैं कहीं हूँ और मुझे नमाज़ व ज़कात की ताकीद फ़रमाई जब कि जियूं{31} और अपनी माँ से अच्छा सुलूक करने वाला(28)
(28) बनाया.

और मुझे ज़बरदस्त बदबख़्त न किया{32} और वही सलामती मुझ पर (29)
(29) जो हज़रत यहया पर हुई.

जिस दिन मैं पैदा हुआ और जिस दिन मरूं और जिस दिन ज़िन्दा उठाया जाऊं(30){33}
(30) जब हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम ने यह कलाम फ़रमाया तो लोगों को हज़रत मरयम की बेगुनाही और पाकीज़गी का यक़ीन हो गया और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम इतना फ़रमाकर ख़ामोश हो गए और इसके बाद कलाम न किया जब तक कि उस उम्र को पहुंचे जिसमें बच्चे बोलने लगते हैं.(ख़ाजि़न)

यह है ईसा मरयम का बेटा, सच्ची बाते जिसमें शक करते हैं(31){34}
(31) कि यहूदी तो उन्हें जादूगर और झूठा कहते हैं (मआज़ल्लाह) और ईसाई उन्हें ख़ुदा और ख़ुदा का बेटा और तीन में का तीसरा कहते हैं. इसके बाद अल्लाह तआला अपनी तन्ज़ीह बयान फ़रमाता है.

अल्लाह को लायक़ नहीं कि किसी को अपना बच्चा ठहराए पाकी है उसको(32)
(32)इससे.

जब किसी काम का हुक्म फ़रमाता है तो यूंही कि उससे फ़रमाता है हो जा वह फ़ौरन हो जाता है{35} और ईसा ने कहा बेशक अल्लाह रब है मेरा तुम्हारा (33)
(33) और उसके सिवा कोई रब नहीं.

तो उसकी बन्दगी करो यह राह सीधी है{36} फिर जमाअतें आपस में मुख़्तलिफ़ हो गई(34)
(34) और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बारे में ईसाईयों के कई फ़िरक़े हो गए, एक यअक़ूबिया, एक नस्तूरिया, एक मलकानिया, यअक़ूबिया कहता था कि वह अल्लाह है, ज़मीन पर उतर आया था, फिर आसमान पर चढ गया. नस्तूरिया का क़ौल है कि वह ख़ुदा का बेटा है, जब तक चाहा उसे ज़मीन पर रखा फिर उठा लिया और तीसरा सम्प्रदाय कहता था कि वह अल्लाह के बन्दे हैं, मख़लूक़ हैं, नबी है. यह ईमान वाला समुदाय था (मदारिक)

तो ख़राबी हे काफ़िरों के लिये एक बड़े दिन की हाज़िरी से(35){37}
(35) बड़े दिन से क़यामत का दिन मुराद है.

कितना सुनेंगे और कितना देखेंगे जिस दिन हमारे पास हाज़िर होंगे(36)
(36) और उस दिन का देखना और सुनना कुछ नफ़ा न देगा जब उन्होंने दुनिया में सच्चाई की दलीलों को नहीं देखा और अल्लाह की चेतावनियों को नहीं सुना. कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा कि यह कलाम तहदीद के तौर पर है कि उस रोज़ ऐसी हौलनाक बातें सुनेंगे और देखेंगे जिनसे दिल फट जाएं.

मगर आज ज़ालिम खुली गुमराही में है(37){38}
(37) न हक़ देखें, न हक़ सुनें, बहरे, अन्धे बने हुए हैं. हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम को खुदा और मअबूद ठहराते हैं जबकि उन्होंने खुले शब्दों में अपने बन्दे होने का ऐलान फ़रमाया

और उन्हें डर सुनाओ पछतावे के दिन का (38)
(38)  हदीस शरीफ़ में है कि जब काफ़िर जन्नत की मन्ज़िलों को देखेंगे जिनसे वो मेहरूम किये गए तो उन्हें हसरत और शर्मिन्दगी होगी कि काश वो दुनिया में ईमान ले आए होते.

जब काम हो चुकेगा(39)
(39) और जन्नत वाले जन्नत में और दोज़ख़ वाले दोज़ख़ में पहुंचेंगे, ऐसा सख़्त दिन दरपेश है.

और वो ग़फ़लत में हैं(40)
(40) और उस दिन के लिये कुछ फ़िक्र नहीं करते.

और नहीं मानते{39} बेशक ज़मीन और जो कुछ उस पर है सब के वारिस हम होंगे(41)
(41) यानी सब फ़ना हो जाएंगे, हम ही बाक़ी रहेंगे.

और वो हमारी ही तरफ़ फिरेंगे(42){40}
(42) हम उन्हें उनके कर्मों का बदला देंगे.

19 सूरए मरयम -तीसरा रूकू

19 सूरए मरयम -तीसरा रूकू


और किताब में(1)
(1) यानी क़ुरआन में.

इब्राहीम को याद करो बेशक वह सच्चा(2)
(2) यानी सच्चाई में सर्वोत्तम. कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा कि सिद्दीक़ के मानी हैं तस्दीक़ करने में सबसे महान, जो अल्लाह तआला और उसकी वहदानियत और  उसके नबियों और रसूलों की और मरने के बाद उठने की तस्दीक़ करे और अल्लाह तआला के आदेश पूरे करे.

था(नबी){41} ग़ैब की ख़बरें बताता जब अपने बाप से बोला(3)
(3) यानी बुत परस्त आज़र से.

ऐ मेरे बाप क्यों ऐसों को पूजता हैं जो न सुने न देखे और न कुछ तेरे काम आए(4){42}
(4) यानी इबादत मअबूद की हद दर्जा तअज़ीम है, इसका वही मुस्तहिक़ हो सकता है जो गुण वाला और नेअमतें अता करने वाला हो न कि बुत जैसी नाकारा मख़लूक़. मतलब यह है कि अल्लाह वहदहू लाशरीका लहू के सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं.

ऐ मेरे बाप बेशक मेरे पास (5)
(5) मेरे रब की तरफ़ से मअरिफ़ते इलाही का.

वह इल्म आया जो तूझे न आया तो तू मेरे पीछे चला आ(6)
(6)  मेरा दीन क़ुबूल कर.

मैं तुझे सीधी राह दिखाऊं (7){43}
(7) जिस से अल्लाह के क़ुर्ब की मंज़िल तक पहुंचे सके.

ऐ मेरे बाप शैतान का बन्दा न बन(8)
(8) और उसकी फ़रमाँबरदारी करके कुफ़्र और शिर्क में जकड़ा हुआ न हो.

बेशक शैतान रहमान का नाफ़रमान है{44} ऐ मेरे बाप में डरता हूँ कि तुझे रहमान का कोई अज़ाब पहुंचे तो तू शैतान का दोस्त हो जाए(9) {45}
(9) और लअनत और अज़ाब में उसका साथी हो. इस नसीहत और हिदायत से आज़र ने नफ़ा न उठाया और इसके जवाब में.

बोला क्या तू मेरे खुदाओं से मुंह फेरता है ऐ इब्राहीम बेशक अगर तू(10)
(10) बुतों का विरोध और उनको बुरा कहने और उनके दोष बयान करने से.

बाज़ न आया तो मैं तुझे पथराव करूंगा और मुझसे लम्बे ज़माने तक बेइलाक़ा होजा(11) {46}
(11) ताकि मेरे हाथ और ज़बान से अम्न में रहे. हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने.

कहा बस तुझे सलाम है(12)
(12) यह सलाम अलग हो जाने का था.

क़रीब है कि मैं तेरे लिये अपने रब से माफ़ी मांगूंगा(13){47}
(13) कि वह तुझे तौबह और ईमान की तौफ़ीक़ देकर तेरी मग़फिरत करे.

बेशक वह मुझ पर मेहरबान है और मैं एक किनारे हो जाऊंगा(14)
(14)बाबुल शहर से शाम की तरफ़ हिजरत करके.

तुमसे और उन सबसे जिनको अल्लाह के सिवा पूजते हो और अपने रब को पूजूंगा(15)
(15) जिसने मुझे पैदा किया और मुझ पर एहसान फ़रमाए.

क़रीब है कि मैं अपने रब की बन्दगी से बदबख़्त  ना होऊं (16){48}
(16)  इसमें बताया कि जैसे तुम बुतों की पूजा करके बदनसीब हुए, ख़ुदा के पूजने वाले के लिये यह बात नहीं, उसकी बन्दगी करने वाला सख़्त दिल और मेहरूम नहीं होता.

फिर जब उनसे और अल्लाह के सिवा उनके मअबूदों से किनारा कर गया(17)
(17) पवित्र स्थल की तरफ़ हिजरत करके.

हमने उसे इस्हाक (18)
(18) बेटे.

और यअक़ूब (19)
(19) बेटे के बेटे यानी पोते. इसमें इशारा है कि हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम की उम्र शरीफ़ इतनी लम्बी हुई कि आपने अपने पोते हज़रत यअक़ूब अलैहिस्सलाम को देखा. इस आयत में यह बताया गया कि अल्लाह के लिये हिजरत करने और अपने घर बार छोड़ने का यह इनाम मिला कि अल्लाह तआला ने बेटे और पोते अता फ़रमाए.

अता किये और हर एक को ग़ैब की ख़बरें बताने वाला (नबी) किया{49}और हमने उन्हें अपनी रहमत अता की(20)
(20) कि माल और औलाद बहुत से इनायत किये.

और उनके लिये सच्ची बलन्दी नामवरी रखी(21){50}
(21) कि हर दीन वाले मुसलमान हों, चाहे यहूदी चाहे ईसाई, सब उनकी तअरीफ़ करते हैं और नमाज़ों में उन पर और उनकी आल पर दुरूद पढ़ा जाता है.

19 सूरए मरयम -चौथा रूकू

19 सूरए  मरयम -चौथा रूकू


और किताब में मूसा को याद करो बेशक वह चुना हुआ था और रसूल था, ग़ैब की ख़बरें बताने वाला{51} और उसे हमने तूर की दाईं तरफ़ से पुकारा(1)
(1) तूर एक पहाड़ का नाम है जो मिस्र और मदयन के बीच है. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को मदयन से आते हुए तूर की उस दिशा से जो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की दाईं तरफ़ थी एक दरख़्त से पुकारा गया “या मूसा इन्नी अनल्लाहो रब्बुल आलमीन”

और अपना राज़ कहने को क़रीब किया(2){52}
(2) क़ुर्ब का दर्जा अता फ़रमाया. पर्दे उठा दिये गए यहाँ तक कि आपने सरीरे अक़लाम सुनी और आपकी क़द्रों मन्जिलत बलन्द की गई और आपसे अल्लाह तआला ने कलाम फ़रमाया.

और अपनी रहमत से उसका भाई हारून अता किया (ग़ैब की ख़बरें बताने वाला)(3){53}
(3) जबकि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने दुआ की कि यारब, मेरे घर वालों में से मेरे भाई हारून को मेरा वज़ीर बना. अल्लाह तआला ने अपने करम से यह दुआ क़ुबूल फ़रमाई और  हज़रत हारून अलैहिस्सलाम को आपकी दुआ से नबी किया और  हज़रत हारून अलैहिस्सलाम हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम से बड़े थे.

और किताब में इस्माईल को याद करो (4)
(4) जो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बेटे और  सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के दादा हैं.

बेशक वह वादे का सच्चा था  (5)
(5) नबी सब ही सच्चे होते हैं लेकिन आप इस गुण में विशेष शोहरत रखते हैं. एक बार किसी जगह पर आप से कोई व्यक्ति कह गया कि आप यहीं ठहरीयें जब तक मैं वापस आऊं आप उस जगह उसके इन्तिज़ार में तीन रोज़ ठहरे रहे. आप ने सब्र का वादा किया था. ज़िब्ह के मौक़े पर इस शान से उसको पूरा फ़रमाया कि सुब्हानल्लाह.

और रसूल था ग़ैब की ख़बरें बताता{54}और अपने घर वालों को (6)
(6) और अपनी क़ौम जुरहम को जिन की तरफ़ आपको भेजा गया था.

नमाज़ और ज़कात का हुक्म देता और अपने रब को पसन्द था(7){55}
(7) अपनी ताअत और  सदकर्म और इस्तक़लाल और विशेष गुणों के कारण.

और किताब में इद्रीस को याद करो(8)
(8) आपका नाम अख़नूख़ है. आप हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के वालिद के दादा हैं. हज़रत आदम अलैहिस्सलाम के बाद आप ही पहले रसूल हैं. आपके वालिद हज़रत शीस अलैहिस्सलाम इब्ने आदम अलैहिस्सलाम हैं. सबसे पहले जिस शख़्स ने क़लम से लिखा, वह आप ही हैं. कपड़ों के सीने और  सिले कपड़े पहनने की शुरूआत भी आप ही से हुई. आपसे पहले लोग खालें पहनते थे. सब से पहले हथियार बनाने वाले, तराज़ू और पैमाने क़ायम करने वाले और  ज्योतिष विद्या और  हिसाब में नज़र फ़रमाने वाले भी आप ही हैं. ये सब काम आप ही से शुरू हुए. अल्लाह तआला ने आप पर तीस सहीफ़े उतारे और  आसमानी किताबों के ज़्यादा पढ़ने पढ़ाने के कारण आपका नाम इद्रीस हुआ.

बेशक वह सच्चा था, ग़ैब की ख़बरें देता{56} और हमने उसे बलन्द मकान पर उठा लिया(9){57}
(9) दुनिया में उन्हें ऊंचे उलूम अता किये या ये मानी हैं कि आसमान पर उठा लिया और यही ज़्यादा सही है. बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने मेअराज की रात हज़रत इद्रीस को चौथे आसमान पर देखा. हज़रत कअब अहबार वग़ैरह से रिवायत है कि हज़रत इद्रीस अलैहिस्सलाम ने मौत के फ़रिश्ते से फ़रमाया कि मैं मौत का मज़ा चखना चाहता हूँ, कैसा होता है. तुम मेरी रूह निकाल कर दिखाओ. उन्होंने इस हुक्म की तअमील की और रूह निकाल कर उसी वक़्त आपकी तरफ़ लौटा दी. आप ज़िन्दा हो गए. फ़रमाया अब मुझे जहन्नम दिखाओ ताकि अल्लाह का ख़ौफ़ ज़्यादा हो. चुनांचे यह भी किया गया. जहन्नम देखकर आपने जहन्नम के दरोग़ा मालिक से फ़रमाया कि दर्वाज़ा खोलो मैं इसपर गुज़रना चाहता हूँ चुनांचे ऐसा ही किया गया और आप उसपर से गुज़रे. फिर आप ने मौत के फ़रिश्ते से फ़रमाया कि मुझे जन्नत दिखाओ वह आपको जन्नत में ले गए. आप दर्वाज़ा खुलवाकर जन्नम में दाख़िल हुए. थोड़ी देर इन्तिज़ार करके मौत के फ़रिश्ते ने कहा कि आप अब अपने मक़ाम पर तशरीफ़ ले चलिये. फ़रमाया अब मैं यहाँ से कहीं न जाऊंगा. अल्लाह तआला ने फ़रमाया है “कुल्लो नफ़्सिन ज़ाइक़तुल मौत” वह मैं चख ही चुका हूँ. और  यह फ़रमाया है “वइम मिनकुम इल्ला वारिदुहा” कि हर शख़्स को जहन्नम पर गुज़रना है तो मैं गुज़र चुका अब मैं जन्न्त में पहुंच गया और  जन्नत में पहुंचने वालों के लिये अल्लाह तआला ने फ़रमाया है “वमा हुम मिन्हा विमुख़रिजीन” कि वो जन्नत से न निकाले जाएंगे. अब मुझे जन्नत से चलने को क्यों कहते हो. अल्लाह तआला ने मलकुल मौत को वही फ़रमाई कि इद्रीस ने जो कुछ किया मेरी इजाज़त से किया और वह मेरी इजाज़त से जन्नत में दाख़िल हुए. उन्हें छोड़ दो वह जन्नत ही में रहेंगे. चुनांचे आप वहाँ ज़िन्दा हें.

ये हैं जिन पर अल्लाह ने एहसान किया ग़ैब की ख़बरें बताने वालों में से आदम की औलाद से ,(10)
(10) यानी हज़रत इद्रीस और हज़रत नूह.

और उनमें जिनको हमने नूह के साथ सवार किया था(11)
(11)यानी इब्राहीम अलैहिस्सलाम जो हज़रत इसहाक़ व हज़रत यअक़ूब.

और इब्राहीम (12)
(12) की औलाद से हज़रत इस्माईल व हज़रत इसहाक़ व हज़रत यअक़ूब.

और यअक़ूब की औलाद से(13)
(13) हज़रत मूसा और हज़रत हारून और हज़रत ज़करिया और हज़रत यहया और हज़रत ईसा इलैहिस्सुलाम.

और उनमें से जिन्हें हमने राह दिखाई और चुन लिया,(14)
(14) शरीअत की व्याख्या और हक़ीक़त खोलने के लिये.

जब उनपर रहमान की आयतें पढ़ी जाती, गिर पड़ते सज्दा करते और रोते(15) {58}
(15) अल्लाह तआला ने इन आयतों मे ख़बर दी कि अम्बिया अल्लाह तअला की आयतों को सुनकर गिड़गिड़ा कर ख़ौफ़ से रोते और सज्दे करते थे. इससे साबित हुआ कि क़ुरआन शरीफ़ दिल लगाकर सुनना और रोना मुस्तहब है.

तो उनके बाद उनकी जगह वो नाख़लफ़ आए(16)
(16) यहूदियों और ईसाइयों वग़ैरह की तरह.

जिन्होंने नमाज़ें गवाई और अपनी ख़्वाहिशों के पीछे (17)
(17) और अल्लाह की फ़रमाँबरदारी की जगह गुनाहों को इख़्तियार किया.

तो बहुत जल्द वो दोज़ख़ में ग़ई का जंगल पाएंगे (18){59}
(18) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया “ग़ई जहन्नम में एक घाटी है जिसकी गर्मी से जहन्नम की दूसरी वादियाँ भी पनाह मांगती हैं. यह उन लोगों के लिये है जो ज़िना के आदी और उसपर अड़े हों जो शराब के आदी हों और जो सूद खाने वाले हों और जो माँ बाप की नाफ़रमानी करने वाले हों और जो झूठी गवाही देने वाले हों.

मगर जिन्होंने तौबह की और ईमान लाए और अच्छे काम किये तो ये लोग जन्नत में जाएंगे और उन्हें कुछ नुक़सान न दिया जाएगा (19){60}
(19) और उनके कर्मों के बदले में कोई कमी न की जाएगी.

बसने के बाग़ जिनका वादा रहमान ने अपने (20)
(20) ईमानदार नेक और तौबह करने वाले.

बन्दों से ग़ैब में किया,(21)
(21) यानी इस हाल में कि जन्नत उनसे ग़ायब है उनकी नज़र के सामने नहीं या इस हाल में कि वो जन्नत से ग़ायब हैं उसका मुशाहिदा या अवलोकन नहीं करते.

बेशक उसका वादा आने वाला है{61} वो उसमें कोई बेकार बात न सुनेंगे मगर सलाम, (22)
(22) फ़रिश्तों का या आपस में एक दूसरे का.

और उन्हें उसमें उनका रिज़्क है सुबह शाम(23){62}
(23) यानी हमेशा, क्योंकि जन्नत में रात और दिन नहीं हैं. जन्नत वाले हमेशा नूर ही में रहेंगे. या मुराद यह है कि दुनिया के दिन की मिक़दार में दो बार जन्नती नेअमतें उनके सामने पेश की जाएंगी.

यह वह बाग़ है जिसका वारिस हम अपने बन्दों में से उसे करेंगे जो परहेज़गार हैं{63} (और जिब्राईल ने मेहबूब से अर्ज़ की)(24)
(24) बुख़ारी शरीफ़ में हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने जिब्रईल से फ़रमाया ऐ जिब्रईल जितना तुम हमारे पास आया करते हो इस से ज़्यादा क्यों नहीं आते. इस पर यह आयत उतरी.

हम फ़रिश्ते नहीं उतरते मगर हुज़ूर के रब के हुक्म से उसी का है जो हमारे आगे है और जो हमारे पीछे और जो उसके बीच है,(25)
(25) यानी तमाम मकानों का वही मालिक है. हम एक मकान से दूसरे मकान की तरफ़ नक़्लों हरकत करने में उसके हुक्म और मर्ज़ी के अन्तर्गत हैं. वह हर हरकत और सुकून का जानने वाला और ग़फ़लत और भूलचूक से पाक हैं.

और  हुज़ूर का रब भूलने वाला नहीं(26){64}
(26) जब चाहे हमें आपकी ख़िदमत में भेजे.

आसमानों और ज़मीन और जो कुछ उनके बीच में है सब का मालिक तो उसे पूजो और उसकी बन्दगी पर साबित रहो, क्या उसके नाम का दूसरा जानते हो(27){65}
(27) यानी किसी को उसके साथ नाम की शिरकत भी नहीं और उसका एक होना इतना ज़ाहिर है कि मुश्रिकों ने भी अपने किसी मअबूदे बातिल का नाम अल्लाह नहीं रखा.

19 सूरए मरयम -पाँचवा रूकू

19 सूरए मरयम -पाँचवा रूकू

 

और आदमी कहता है क्या जब मैं मर जाऊंगा तो ज़रूर अनक़रीब जिलाकर निकाला जाऊंगा(1){66}
(1) इन्सान से यहाँ मुराद वो काफ़िर हैं जो मौत के बाद ज़िन्दा किये जाने के इन्कारी थे जैसे कि उबई बिन ख़लफ़ और वलीद बिन मुग़ीरा. उन्हीं लोगों के हक़ में यह आयत उतरीं और यही इसके उतरने की परिस्थति है.

और क्या आदमी को याद नहीं कि हमने इससे पहले उसे बनाया और जब वह कुछ न था,(2){67}
(2) तो जिसने मअदूम को मौजूद फ़रमाया उसकी क़ुदरत से मुर्दे को ज़िन्दा कर देना क्या आश्चर्य.

तो तुम्हारे रब की क़सम हम उन्हें (3)
(3) यानी मौत के बाद उठाए जाने का इन्कार करने वालों के साथ.

और शैतानों को सबको घेर लाएंगे (4)
(4) यानी काफ़िरों को उनके गुमराह करने वाले शैतानों के साथ इस तरह कि हर काफ़िर शैतान के साथ एक जंजीर में जकड़ा होगा.

और उन्हें दोज़ख़ के आसपास हाज़िर करेंगे, घुटनों के बल गिरे{68} फिर हम(5)
(5) काफ़िरों के.

हर गिरोह से निकालेंगे जो उनमें रहमान पर सबसे ज़्यादा बेबाक होगा(6){69}
(6) यानी दोज़ख़ होने में,जो सबसे ज़्यादा सरकश और कुफ़्र में सख़्त होगा वह आगे किया जाएगा. कुछ रिवायतों में है कि काफ़िर सब के सब जहन्नम के गिर्द ज़ंजीरों में जकड़े, तौक़ डाले हुए हाज़िर किये जाएंगे फिर जो कुफ़्र और सरकशी में सख़्त होंगे वो पहले जहन्नम में दाख़िल किये जाएंगे.

फिर हम ख़ूब जानते हैं जो उस आग में भूनने से ज़्यादा लायक़ हैं{70} और तुम में कोई ऐसा नहीं जिसका गुज़र दोज़ख़ पर न हो, (7)
(7) नेक हो या बुरा, मगर नेक सलामत रहेंगे और जब उनका गुज़र दोज़ख़ पर होगा तो दोज़ख़ से आवाज़ उठेगी कि ऐ मूमिन गुज़र जा कि तेरे नूर ने मेरी लपट ठण्डी कर दी. हसन क़तादा से रिवायत है कि दोज़ख़ पर गुज़रने से पुले सिरात पर गुज़रना मुराद है जो दोज़ख़ पर है.

तुम्हारे रब के ज़िम्मे पर यह ज़रूर ठहरी हुई बात है(8){71}
(8) यानी जहन्नम में दाख़िला अल्लाह के आदेशों में से है जो अल्लाह तआला ने अपने बन्दों पर लाज़िम किया है.

फिर हम डर वालों को बचा लेंगे(9)
(9) यानी ईमानदारों को.

और ज़ालिमों को उसमें छोड़ देंगे घुटनों के बल गिरे{72} और जब उनपर हमारी रौशन आयतें पढ़ी जाती हैं(10)
(10)  नज़र बिन हारिस वग़ैरह के जैसे कुरैश के काफ़िर बनाव सिंगार करके, बालों में तेल डालकर, कंघियाँ करके, उमदा लिबास पहन कर घमण्ड के साथ ग़रीब फ़कीर—

काफ़िर मुसलमानों से कहते हैं कौन से गिरोह का मकान अच्छा और मजलिस बेहतर है(11){73}
(11) मतलब यह है कि जब आयतें उतारी जाती हैं और दलीलें और निशानियाँ पेश की जाती हैं तो काफ़िर उनमें तो ग़ौर नहीं करते और उनसे फ़ायदा नहीं उठाते,इसकी जगह दौलत और माल और लिबास और मकान पर घमण्ड करते है.

और हमने उनसे पहले कितनी संगते खपा दीं(12)
(12) उम्मतें हलाक कर दीं.

(क़ौमे हलाक कर दीं) कि वो उनसे भी सामान और नमूद (दिखावे) में बेहतर थे{74}तुम फ़रमाओ जो गुमराही में हो तो उसे रहमान ख़ूब ढील दे,(13)
(13) दुनिया में उसकी उम्र लम्बी करके और उसको गुमराही और बुराई में छोड़कर.

यहां तक कि जब  वो देखें वो चीज़ जिसका उन्हें वादा दिया जाता है या तो अज़ाब (14)
(14) दुनिया का क़त्ल और गिरफ़्तारी.

या क़यामत(15)
(15)जो तरह तरह की रूस्वाई और अज़ाब पर आधारित है.

तो अब जान लेंगे कि किस का बुरा दर्जा है और किसकी फ़ौज कमज़ोर(16){75}
(16) काफ़िरों की शैतानी फ़ौज या मुसलमानों का नूरी लश्कर. इसमें मुश्रिकों के उस क़ौल का रद है जो उन्होंने कहा था कि कौन से गिरोह का मकान अच्छा और मजलिस बेहतर है.

और जिन्होंने हिदायत पाई (17)
(17) और  ईमान लाए.

अल्लाह उन्हें और हिदायत बढाएगा (18)
(18) इसपर इस्तक़ामत अता फ़रमाकर और अधिक सूझबूझ और तौफ़ीक़ देकर.

और बाक़ी रहने वाली नेक बातों का (19)
(19) ताअतें और आख़िरत के सारे कर्म और  पाँचों वक़्त की नमाज़ और अल्लाह तआला की स्तूति और  ज़िक्र और  सारे नेक कर्म, ये सब बाक़ी रहने वाली नेक बातें हैं कि मूमिन के काम आती हैं.

तेरे रब के यहां सब से बेहतर सवाब और सबसे भला अंजाम(20){76}
(20) काफ़िरों के कर्मों के विपरीत कि वो निकम्मे, निरर्थक और बातिल है.

तो क्या तुमने उसे देखा जो हमारी आयतों का इन्कारी हुआ और कहता है मुझे ज़रूर माल व औलाद मिलेंगे(21){77}
(21) बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है कि हज़रत ख़बाब बिन अरत का जिहालत के ज़माने में आस बिन वाइल सहमी पर क़र्ज़ था. वह उसके पास तक़ाज़े को गए तो आस ने कहा कि मैं तुम्हारा क़्रर्ज़ अदा न करूंगा जब तक तुम मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) से फिर न जाओ और कुफ़्र इख़्तियार न कर लो. हज़रत ख़बाब ने फ़रमाया ऐसा कभी नहीं हो सकता यहाँ तक कि तू मरे और मरने के बाद ज़िन्दा होकर उठे, वह कहने लगा क्या मैं मरने के बाद ज़िन्दा होकर उठूंगा. हज़रत ख़बाब ने कहा हाँ. आस ने कहा तो फिर मुझे छोड़िये यहाँ तक कि मैं मर जाऊं और  मरने के बाद फिर ज़िन्दा होंऊं और मुझे माल व औलाद मिले, जब ही आपका क़र्ज़ अदा करूंगा. इसपर ये आयतें उतरीं.

क्या ग़ैब को झांक आया है(22)
(22) और उसने लौहे मेहफ़ूज़ में देख लिया है कि आख़िरत में उसको माल और औलाद मिलेगी.

या रहमान के पास कोई क़रार रखा है{78} हरगिज़ नहीं(23)
(23) ऐसा नहीं है तो—-

अब हम लिख रखेंगे जो वह कहता है और उसे ख़ूब लम्बा अज़ाब देंगे{79} और जो चीज़ें कह रहा है(24)
(24) यानी माल और औलाद उन सबसे उसकी मिल्क और उन्हें इस्तेमाल करने का हक़ सब उसके हलाक होने से उठ जाएगा और

उनके हमीं वारिस होंगे और हमारे पास अकेला आएगा (25){80}
(25) कि न उसके पास माल होगा न औलाद और उसका ये दावा करना झूटा हो जाएगा.

 और अल्लाह के सिवा और ख़ुदा बना लिये(26)
(26) यानी मुश्रिकों ने बुतों को मअबूद बनाया और उनको पूजने लगे इस उम्मीद पर—

कि वो उन्हे ज़ोर दें(27){81}
(27) और उनकी मदद करें और  उन्हें अज़ाब से बचाएं.

हरगिज़ नहीं(28)
(28) ऐसा हो ही नहीं सकता.

कोई दम जाता है कि वो(29)
(29) बुत, जिन्हें ये पूजते थे.

उनकी बन्दगी से इन्कारी होंगे और उनके मुख़ालिफ़ हो जाएंगे(30){82}
(30) उन्हें झुटलाऐंगे और उन पर लानत करेंगे. अल्लाह तआला उन्हे ज़बान देगा और वह कहेंगे यारब उन्हें अज़ाब कर.

19 सूरए मरयम -छटा रूकू

19 सूरए मरयम -छटा रूकू

क्या तुमने न देखा कि हमने काफ़िरों पर शैतान भेजे(1)
यानी शैतानों को उनपर छोड़ दिया और उन पर क़ब्ज़ा दे दिया.(1)

कि वो उन्हें ख़ूब उछालते हैं (2){83}
(2) और गुनाहों पर उभारते हैं.

तो तुम जल्दी न करो, हम तो उनकी गिनती पूरी करते हैं(3){84}
(3) कर्मों के बदले के लिये या सांसों की फ़ना के लिये या दिनों महीनों और बरसों की उस अवधि के लिये जो उनके अज़ाब के वास्ते निर्धारित है.

जिस दिन हम परहेज़गारों को रहमान की तरफ़ ले जाएंगे मेहमान बनाकर (4){85}
हज़रत अली मुर्तज़ा रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि ईमान वाले परहेज़गार लोग हश्र में अपनी क़ब्रों से सवार करके उठाए जाएंगे और उनकी सवारियों पर सोने की ज़ीनें और पालान होंगे.(4)

और मुजरिमों को जहन्नम की तरफ़ हांकेंगे प्यासे(5){86}
(5) ज़िल्लत और अपमान के साथ, उनके कुफ़्र के कारण.

लोग शफाअत के मालिक नहीं मगर वही जिन्होंने रहमान के पास क़रार रखा हैं(6){87}
(6) यानी जिन्हें शफ़ाअत की आज्ञा मिल चुकी है, वही शफा़अत करेंगे. या ये मानी हैं कि शफ़ाअत सिर्फ़ ईमान वालों की होगी और वही उससे फ़ायदा उठाएंगे. हदीस शरीफ़ है, जो ईमान लाया और जिसने लाइलाहा कहा उसके लिये अल्लाह के नज़दीक एहद है.

और काफ़िर बोले(7)
(7) यानी यहूदी, ईसाई और मुश्रिक जो फ़रिश्तों को अल्लाह की बेटीयाँ कहते थे कि—

रहमान ने औलाद इख़्तियार की{88} बेशक तुम हद की भारी बात लाए,(8){89}
(8) और अत्यन्त बुरे और ग़लत दर्ज़ें का कलिमा तुमने मुंह से निकाला.

क़रीब है कि आसमान उस से फट पड़ें और ज़मीन शक़ हो जाए और पहाड़ गिर जाएं ढै कर(9){90}
(9) यानी ये कलिमा ऐसी बेअदबी और गुस्ताख़ी का है कि अगर अल्लाह तआला ग़ज़ब फ़रमाए तो उसपर सारे जगत का निज़ाम दरहम बरहम उलट पुलट कर दे. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि काफ़िरों ने जब यह गुस्ताखी़ की और ऐसा अपमान-जनक  कलिमा मुंह से निकाला तो जिन्न और इंसानों के सिवा आसमान, ज़मीन, पहाड़ वग़ैरह तमाम सृष्टि परेशानी से बेचैन हो गई और हलाकत के क़रीब पहुंच गई. फ़रिश्तों को ग़ुस्सा आया और जहन्नम को जोश आया, फिर अल्लाह तआला ने अपनी पाकी बयान फ़रमाई.

उस पर कि उन्होंने रहमान के लिये औलाद बताई{91} और रहमान के लिये लायक़ नहीं कि औलाद इख़्तियार करे(10){92}
(10) वह इससे पाक है और उसके लिये औलाद होना मुहाल है, मुमकिन नहीं.

आसमानों और ज़मीन में जितने हैं सब उसके हुज़ूर बन्दे होकर हाज़िर होंगे(11){93}
(11) बन्दा होने का इक़रार करते हुए और बन्दा होना और औलाद होना जमा हो ही नहीं सकता और औलाद ममलूक नहीं होती, जो ममलूक है हरग़िज़ औलाद नहीं.

बेशक वह उनका शुमार जानता है और उनको एक एक करके गिन रखा है(12){94}
(12) सब उसके इल्म में हैं और हर एक की सांसे और सारे अहवाल और तमाम काम उसकी गिनती में हैं. उसपर कुछ छुपा नहीं, सब उसकी तदबीर और तक़दीर के तहत में हैं.

और उनमें हर एक क़यामत के रोज़ उसके हुज़ूर अकेला हाज़िर होगा(13){95}
(13) बग़ैर माल और औलाद और सहायक व मददगार के.

बेशक वो जो ईमान लाए और अच्छे काम किये, बहुत जल्द उनके लिये रहमान महब्बत कर देगा(14){96}
(14) यानी अपना मेहबूब बनाएगा और अपने बन्दों के दिल में उनकी महब्बत डाल देगा. बुख़ारी व मुस्लिम की हदीस में है कि जब अल्लाह तआला किसी बन्दे को अपना मेहबूब करता है तो जिब्रईल से फ़रमाता है कि अमुक मेरा महबूब है. जिब्रईल उससे महब्बत करने लगते है फिर वह आसमानों में पुकार लगाते हैं कि अल्लाह तआला इस बन्दे को मेहबूब रखता है सब इसको मेहबूब रखें तो आसमान वाले उसको मेहबूब रखते हैं फिर ज़मीन में उसकी लोकप्रियता आम कर दी जाती है. इससे मालूम हुआ कि ईमान वाले नेक बन्दे और वलियों की लोकप्रियता उनकी मेहबूबियत की दलील है. जैसे कि हुज़ूर ग़ौसे अअज़म रदियल्लाहो अन्हो और हज़रत सुल्तान निज़ामुद्दीन देहलवी और हज़रत सुल्तान सैयि्यद अशरफ़ जहांगीर सिमनानी रदियल्लाहो अन्हुम और दूसरे वलियों की लोकप्रियता उनकी मेहबूबियत की दलील है.

तो हमने यह क़ुरआन तुम्हारी ज़बान में यूंही आसान फ़रमाया कि तुम इससे डर वालों को ख़ुशख़बरी दो और झगड़ालू लोगों को इससे डर सुनाओ {97} और हमने उनसे पहले कितनी संगतें खपाई (क़ौमे हलाक कीं)(15)
(15) नबियों को झुटलाने की वजह से कितनी बहुत सी उम्मतें हलाक कीं.

क्या तुम उनमें किसी को देखते हो या उनकी भनक (ज़रा भी आवाज़) सुनते हो(16){98}
(16) वो सब नेस्तो नाबूद कर दिये गए उसी तरह ये लोग अगर वही तरीक़ा इख़्तियार करेंगे तो उनका भी वही अंजाम होगा.