45 सूरए जासियह -दूसरा रूकू

45 सूरए जासियह -दूसरा रूकू

۞ اللَّهُ الَّذِي سَخَّرَ لَكُمُ الْبَحْرَ لِتَجْرِيَ الْفُلْكُ فِيهِ بِأَمْرِهِ وَلِتَبْتَغُوا مِن فَضْلِهِ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
وَسَخَّرَ لَكُم مَّا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا مِّنْهُ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ
قُل لِّلَّذِينَ آمَنُوا يَغْفِرُوا لِلَّذِينَ لَا يَرْجُونَ أَيَّامَ اللَّهِ لِيَجْزِيَ قَوْمًا بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ
مَنْ عَمِلَ صَالِحًا فَلِنَفْسِهِ ۖ وَمَنْ أَسَاءَ فَعَلَيْهَا ۖ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّكُمْ تُرْجَعُونَ
وَلَقَدْ آتَيْنَا بَنِي إِسْرَائِيلَ الْكِتَابَ وَالْحُكْمَ وَالنُّبُوَّةَ وَرَزَقْنَاهُم مِّنَ الطَّيِّبَاتِ وَفَضَّلْنَاهُمْ عَلَى الْعَالَمِينَ
وَآتَيْنَاهُم بَيِّنَاتٍ مِّنَ الْأَمْرِ ۖ فَمَا اخْتَلَفُوا إِلَّا مِن بَعْدِ مَا جَاءَهُمُ الْعِلْمُ بَغْيًا بَيْنَهُمْ ۚ إِنَّ رَبَّكَ يَقْضِي بَيْنَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ
ثُمَّ جَعَلْنَاكَ عَلَىٰ شَرِيعَةٍ مِّنَ الْأَمْرِ فَاتَّبِعْهَا وَلَا تَتَّبِعْ أَهْوَاءَ الَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ
إِنَّهُمْ لَن يُغْنُوا عَنكَ مِنَ اللَّهِ شَيْئًا ۚ وَإِنَّ الظَّالِمِينَ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ ۖ وَاللَّهُ وَلِيُّ الْمُتَّقِينَ
هَٰذَا بَصَائِرُ لِلنَّاسِ وَهُدًى وَرَحْمَةٌ لِّقَوْمٍ يُوقِنُونَ
أَمْ حَسِبَ الَّذِينَ اجْتَرَحُوا السَّيِّئَاتِ أَن نَّجْعَلَهُمْ كَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ سَوَاءً مَّحْيَاهُمْ وَمَمَاتُهُمْ ۚ سَاءَ مَا يَحْكُمُونَ

अल्लाह है जिसने तुम्हारे बस में दरिया कर दिया कि उसमें उसके हुक्म से क़िश्तियां चलें और इसलिये कि उसका फ़ज़्ल तलाश करो(1)
(1) समुद्री यात्राओ से और तिजारतों से और ग़ोता लगाने और मोती वग़ैरह निकालने से.

और इसलिये कि हक़ (सत्य) मानो(2) {12}
(2) उस के नेअमत व करम और कृपा तथा एहसान का.

और तुम्हारे लिय काम में लगाए जो कुछ आसमानों में है(3)
(3) सूरज चांद सितारे वग़ैरह.

और जो कुछ ज़मीन में (4)
(4) चौपाए दरख़्त नेहरें वग़ैरह.

अपने हुक्म से, बेशक इसमें निशानियां हैं सोचने वालों के लिये {13} ईमान वालों से फ़रमाओ दरगुज़र करें उनसे जो अल्लाह के दिनों की उम्मीद नहीं रखते (5)
(5) जो दिन कि उसने ईमान वालो के लिये निर्धारित किये. या अल्लाह तआला के दिनों से वो वाक़ए मुराद हैं जिनमें वह अपने दुश्मनों को गिरफ़्तार करता है. बहरहाल उन उम्मीद न रखने वालों से मुराद काफ़िर हैं और मानी ये हैं कि काफ़िरों से जो तकलीफ़ पहुंचे और उनकी बातें जो तकलीफ़ पहुंचाए, मुसलमान उन से दरगुज़र करें, झगड़ा न करें. (कहा गया है कि यह आयत क़िताल की आयत से मन्सूख़ कर दी गई) इस आयत के उतरने की परिस्थितियों के बारे में कई कथन हैं. एक यह कि ग़ज़वए बनी मुस्तलक में मुसलमान बीरे मरीसीअ पर उतरे. यह एक कुँवां था. अब्दुल्लाह बिन उबई मुनाफ़िक़ ने अपने ग़ुलाम को पानी के लिये भेजा. वह देर में आया तो उससे कारण पूछा. उसने कहा कि हज़रत उमर कुँए के किनारे पर बैठे हुए थे, जब तक नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की और हज़रत अबूबक्र की मश्क़ें न भर गईं, उस वक़्त तक उन्होंने किसी को पानी न भरने दिया. यह सुनकर उस बदबख़्त ने उन हज़रात की शान में गुस्ताख़ी के कलिमें कहे. हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो को इसकी ख़बर हुई तो आप तलवार लेकर तैयार हुए . इसपर यह आयत उतरी. इस सूरत में यह आयत मदनी होगी. मक़ातिल का क़ौल है कि क़बीलए बनी ग़िफ़ार के एक व्यक्ति ने मक्कए मुकर्रमा में हज़रत उमर रदियल्लहो अन्हो को गाली दी तो आपने उसको पकड़ने का इरादा किया इसपर यह आयत उतरी. और एक क़ौल यह है कि जब आयत “मन ज़ल-लज़ी युक़रिदुल्लाहा क़र्दन हसना” यानी है कोई जो अल्लाह को क़र्ज़े हसना दे. (सूरए बक़रह, आयत 245) उतरी तो फ़िनहास यहूदी ने कहा कि मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) का रब मोहताज हो गया (मआज़ल्लाह), इस को सुनकर हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने तलवार खींची और  उसकी तलाश में निकले. हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने आदमी भेज कर उन्हें वापस बुला लिया.

ताकि अल्लाह एक क़ौम से उसकी कमाई का बदला दे(6) {14}
(6) यानी उनके कर्मो का.

जो भला काम करे तो अपने लिये और बुरा करे तो अपने बुरे को(7)
(7) नेकी और बदी का सवाब और अज़ाब उसके करने वाले पर है.

फिर अपने रब की तरफ़ फेरे जाओगे(8){15}
(8) वह नेकों और बदों को उनके कर्मों का बदला देगा.

और बेशक हमने बनी इस्राईल को किताब (9)
(9) यानी तौरात.

और हुक़ुमत और नबुव्वत अता फ़रमाई(10)
(10) उनमें अधिकांश नबी पैदा करके.

और हमने उन्हें सुथरी रोज़ियाँ दीं(11)
(11) हलाल कुशायश के साथ, फ़िरऔन और उसकी क़ौम के माल और इलाकों का मालिक करके और मन्न व सलवा उतार कर.

और उन्हें उनके ज़माने वालों पर फ़ज़ीलत (बुज़ुर्गी) बख़्शी {16} और हमने उन्हें इस काम की(12)
(12) यानी दीन के काम और हलाल व हराम के बयान और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के तशरीफ़ लाने की.

रौशन दलीलें दी तो उन्हों ने इख़्तिलाफ़ न किया(13)
(13) हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के नबी बनाए जाने में.

मगर बाद उसके कि इल्म उनके पास आ चुका(14)
(14) और इल्म मतभेद मिटने का कारण होता है. यहाँ उन लोगों के लिये मतभेद का कारण हुआ. इसकी वजह यह है कि इल्म उनका लक्ष्य न था बल्कि उनका लक्ष्य जाहो रियासत की तलब थी, इसी लिये उन्होंने विरोध किया.

आपस के हसद से(15)
(15) कि उन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की जलवा- अफ़रोज़ी के बाद अपनी शानों शौकत और हुकूमत के अन्देशे से आपके साथ हसद और दुशानी की और काफ़िर हो गए.

बेशक तुम्हारा रब क़यामत के दिन उनमें फ़ैसला कर देगा जिस बात में इख़्तिलाफ़ करते हैं {17} फिर हमने उस काम के(16)
(16) यानी दीन के.

ऊमदा रास्ते पर तुम्हें किया(17)
(17) ऐ हबीब मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

तो उसी राह चलो और नादानों की ख़्वाहिशों का साथ न दो (18) {18}
(18) यानी क़ुरैश के सरदारों की जो अपने दीन की तरफ़ बुलाते हैं.

बेशक वो अल्लाह के मुक़ाबिल तुम्हें कुछ काम न देंगे, और बेशक ज़ालिम एक दूसरे के दोस्त हैं (19)
(19) सिर्फ़ दुनिया में, और आख़िरत में उनका कोई दोस्त नहीं.

और डर वालों का दोस्त अल्लाह (20){19}
(20)दुनिया में भी, और आख़िरत में भी. डर वालों से मुराद ईमान वाले हैं और आगे क़ुरआन पाक के बारे में इरशाद होता है.

यह लोगों की आँखे खोलना है(21)
(21) कि इससे उन्हें दीन की बातों में नज़र हासिल होती है.

और ईमान वालों के लिये हिदायत व रहमत {20} क्या जिन्होंने बुराईयों का इर्तिकाब किया(22)
(22) कुफ़्र और गुमराही का.

यह समझते हैं कि हम उन्हें उन जैसा कर देंगे जो ईमान लाए और अच्छे काम किये कि इनकी उनकी ज़िन्दगी और मौत बराबर हो जाए(23)
(23) यानी ईमान वालों और काफ़िरों की ज़िन्दगी बराबर हो जाए ऐसा हरगिज़ न होगा क्योंकि ईमानदार ज़िन्दगी में ताअत पर क़ायम रहे और काफ़िर बुराईयों में डूबे रहे तो उन दोनों की ज़िन्दगी बराबर न हुई. ऐसे ही मौत भी एक सी नहीं कि ईमान वाले की मौत ख़ुशख़बरी व रहमत और बुज़ुर्गी पर होती है और काफ़िर की रहमत से निराशा और शर्मिन्दगी पर. मक्के के मुश्रिकों की एक जमाअत ने मुसलमानों से कहा था कि अगर तुम्हारी बात सत्य हो और मरने के बाद उठना हो तो भी हम ही अफ़ज़ल रहेंगे जैसा कि दुनिया में हम तुमसे बेहतर रहे. उनके रद में यह आयत उतरी.

क्या ही बुरा हुक्म लगाते हैं (24) {21}
(24) मुख़ालिफ़ सरकश, मुख़लिस फ़रमाँबरदार के बराबर कैसे हो सकता है. ईमान वाले जन्नत के ऊंचे दर्जों में इज़्ज़त बुज़ुर्गी और राहतें पाएंगे और काफ़िर जहन्नम के निचले दर्जों में ज़िल्लत और रूस्वाई के साथ सख़्त तरीन अज़ाब में गिरफ़्तार होंगे.

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41 सूरए हामीम सज्दा-छटा रूकू

41 सूरए हामीम सज्दा-छटा रूकू

وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَى الْكِتَابَ فَاخْتُلِفَ فِيهِ ۗ وَلَوْلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتْ مِن رَّبِّكَ لَقُضِيَ بَيْنَهُمْ ۚ وَإِنَّهُمْ لَفِي شَكٍّ مِّنْهُ مُرِيبٍ
مَّنْ عَمِلَ صَالِحًا فَلِنَفْسِهِ ۖ وَمَنْ أَسَاءَ فَعَلَيْهَا ۗ وَمَا رَبُّكَ بِظَلَّامٍ لِّلْعَبِيدِ
۞ إِلَيْهِ يُرَدُّ عِلْمُ السَّاعَةِ ۚ وَمَا تَخْرُجُ مِن ثَمَرَاتٍ مِّنْ أَكْمَامِهَا وَمَا تَحْمِلُ مِنْ أُنثَىٰ وَلَا تَضَعُ إِلَّا بِعِلْمِهِ ۚ وَيَوْمَ يُنَادِيهِمْ أَيْنَ شُرَكَائِي قَالُوا آذَنَّاكَ مَا مِنَّا مِن شَهِيدٍ
وَضَلَّ عَنْهُم مَّا كَانُوا يَدْعُونَ مِن قَبْلُ ۖ وَظَنُّوا مَا لَهُم مِّن مَّحِيصٍ
لَّا يَسْأَمُ الْإِنسَانُ مِن دُعَاءِ الْخَيْرِ وَإِن مَّسَّهُ الشَّرُّ فَيَئُوسٌ قَنُوطٌ
وَلَئِنْ أَذَقْنَاهُ رَحْمَةً مِّنَّا مِن بَعْدِ ضَرَّاءَ مَسَّتْهُ لَيَقُولَنَّ هَٰذَا لِي وَمَا أَظُنُّ السَّاعَةَ قَائِمَةً وَلَئِن رُّجِعْتُ إِلَىٰ رَبِّي إِنَّ لِي عِندَهُ لَلْحُسْنَىٰ ۚ فَلَنُنَبِّئَنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا بِمَا عَمِلُوا وَلَنُذِيقَنَّهُم مِّنْ عَذَابٍ غَلِيظٍ
وَإِذَا أَنْعَمْنَا عَلَى الْإِنسَانِ أَعْرَضَ وَنَأَىٰ بِجَانِبِهِ وَإِذَا مَسَّهُ الشَّرُّ فَذُو دُعَاءٍ عَرِيضٍ
قُلْ أَرَأَيْتُمْ إِن كَانَ مِنْ عِندِ اللَّهِ ثُمَّ كَفَرْتُم بِهِ مَنْ أَضَلُّ مِمَّنْ هُوَ فِي شِقَاقٍ بَعِيدٍ
سَنُرِيهِمْ آيَاتِنَا فِي الْآفَاقِ وَفِي أَنفُسِهِمْ حَتَّىٰ يَتَبَيَّنَ لَهُمْ أَنَّهُ الْحَقُّ ۗ أَوَلَمْ يَكْفِ بِرَبِّكَ أَنَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ
أَلَا إِنَّهُمْ فِي مِرْيَةٍ مِّن لِّقَاءِ رَبِّهِمْ ۗ أَلَا إِنَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ مُّحِيطٌ

और बेशक हमने मूसा को किताब अता फ़रमाई(1)
(1) यानी पवित्र तौरात.

तो उसमें इख़्तिलाफ़ किया गया(2)
(2) कुछ ने उसको माना और कुछ ने  न माना. कुछ ने इसकी तस्दीक़ की और कुछ ने इसे झुटलाया.

और अगर एक बात तुम्हारे रब की तरफ़ से गुज़र न चुकी होती (3)
(3) यानी हिसाब और जज़ा को क़यामत तक विलम्बित न फ़रमा दिया होता.

तो जभी उनका फै़सला हो जाता (4)
(4) और दुनिया ही में उन्हें उसकी सज़ा दे दी जाती.

और बेशक वो (5)
(5) यानी अल्लाह की किताब को झुटलाने वाले.

ज़रूर उसकी तरफ़ से एक धोखा डालने वाले शक में हैं {45} जो नेकी करे वह अपने भले को और जो बुराई करे तो अपने बुरे को, और तुम्हारा रब बन्दों पर ज़ुल्म नहीं करता{46}

पारा चौबीस समाप्त

पच्चीसवाँ पारा-इलैहि युरहु
सूरए हामीम सज्दा
(छटा रूकू जारी)

क़यामत के इल्म का उसी पर हवाला है(6)
(6) तो जिससे क़यामत का वक़्त पूछा जाए उसको लाज़िम है कि कहे, अल्लाह तआला जानने वाला है.

और कोई फ़ल अपने ग़लाफ़ से नहीं निकलता और न किसी मादा को पेट रहे और न जने मगर उसके इल्म से(7)
(7) यानी अल्लाह तआला फल के ग़लाफ़ से निकलने से पहले उसकी हालतों को जानता है, और मादा के गर्भ को और उसकी घड़ियों को और पैदायश के वक़्त को और उसके बुरे और अच्छे और नर व मादा होने सब को जानता है. इसका इल्म भी उसी की तरफ़ हवाले करना चाहिये. अगर यह ऐतिराज़ किया जाए कि अल्लाह के वली और छुपी बातें जानने वाले लोग अक्सर इन बातों की ख़बर देते हैं और वह दुरूस्त साबित होती हैं बल्कि कभी ज्यातिषी और तांत्रिक भी ख़बर देते हैं. इसका जवाब यह है कि ज्योतिषियों और तांत्रिकों की बातें मात्र अटकल होती हैं जो बहुधा ग़लत हो जाती हैं, वह इल्म ही नहीं, बेहक़ीक़त बातें हैं. और अल्लाह के वलियों की ख़बरें बेशक सही होती हैं और वो इल्म से फ़रमाते हैं और यह इल्म उनका ज़ाती नहीं, अल्लाह तआला का अता फ़रमाया हुआ है तो हक़ीक़त में यह उसी का इल्म हुआ, ग़ैर का नहीं (ख़ाज़िन)

और जिस दिन उन्हें निदा फ़रमाएगा(8)
(8) यानी अल्लाह तआला मुश्रिकों से फ़रमाएगा कि—-

कहाँ हैं मेरे शरीक (9)
(9) जो तुमने दुनिया में घड़ रखे थे जिन्हें तुम पूजा करते थे. इसके जवाब में मुश्रिक लोग—

कहेंगे हम तुझसे कह चुके कि हम में कोई गवाह नहीं(10){47}
(10) जो आज यह झूठी गवाही दे कि तेरा कोई शरीक है यानी हम सब ईमान वाले एक ख़ुदा में यक़ीन रखने वाले हैं. ये मुश्रिक लोग अज़ाब देखकर कहेंगे और अपने बुतों से बेज़ारी ज़ाहिर करेंगे.

और गुम गया उनसे जिसे पहले पूजते थे(11)
(11)  दुनिया में, यानी बुत.

और समझ लिये कि उन्हें कहीं(12)
(12) अल्लाह के अज़ाब से बचने, और.

भागने की जगह नहीं {48} आदमी भलाई मांगने से नहीं उकताता (13)
(13) हमेशा अल्लाह तआला से माल और ख़ुशहाली और तंदुरूस्ती मांगता रहता है.

और कोई बुराई पहुंचे(14)
(14) यानी कोई सख़्ती और बला और रोज़ी की तंगी.

तो ना उम्मीद आस टूटा(15) {49}
(15) अल्लाह तआला के फ़ज़्ल और रहमत से निराश हो जाता है. यह और इसके बाद जो ज़िक्र फ़रमाया जाता है वह काफ़िर का हाल है. मूमिन अल्लाह तआला की रहमत से मायूस नहीं होते.

और अगर हम उसे कुछ अपनी रहमत का मज़ा दें(16)
(16) सेहत व सलामती और माल दौलत अता फ़रमाकर.

उस तकलीफ़ के बाद जो उसे पहुंची थी तो कहेगा यह तो मेरी है(17)
(17)ख़ालिस मेरा हक़ है, मैं अपने अमल से इसका मुस्तहिक हूँ.

और मेरे गुमान में क़यामत क़ायम न होगी अगर(18)
(18) बिलफ़र्ज़ जैसा कि मुसलमान कहते हैं.

मैं रब की तरफ़ लौटाया भी गया तो ज़रूर मेरे लिए उसके पास भी ख़ूबी ही है(19)
(19) यानी वहां भी मेरे लिये दुनिया की तरह ऐश और राहत, इज़्ज़त और बुज़ुर्गी है.

तो ज़रूर हम बता देंगे काफ़िरों को जो उन्हों ने किया (20)
(20) यानी उनके कुकर्म और उनके दुष्कर्म के परिणाम, और जिस अज़ाब के वो मुस्तहिक़  हैं, उससे उन्हें आगाह कर देंगे.

तो ज़रूर उन्हें गाढ़ा अज़ाब चखाएंगे(21){50}
(21) यानी अत्यन्त सख़्त.

और जब हम आदमी पर एहसान करते हैं तो मुंह फेर लेता है(22)
(22) और इस एहसान का शुक्र बजा नहीं लाता और इस नेअमत पर इतराता है और नेअमत देने वाले परवरदिगार को भूल जाता है.

और अपनी तरफ़ दूर हट जाता है(23)
(23) अल्लाह की याद से घमण्ड करता है.

और जब उसे तकलीफ़ पहुंचती है(24)
(24) किसी क़िस्म की परेशानी, बीमारी या नादारी वग़ैरह पेश आती है.

तो चौड़ी दुआ वाला है (25) {51}
(25) ख़ूब दुआएं करता है, रोता है, गिड़गिड़ता है, और लगातार दुआएं मांगे जाता है.

तुम फ़रमाओ (26)
(26) ऐ मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, मक्के के काफ़िरों से.

भला बताओ अगर यह क़ुरआन अल्लाह के पास से है(27)
(27) जैसा कि नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम फ़रमाते हैं और साफ़ ख़ुली दलीलें साबित करती हैं.

फिर तुम इसके मुन्किर हुए तो उससे बढ़कर गुमराह कौन जो दूर की ज़िद में है(28){52}
(28) सच्चाई का विरोध करता है.

अभी हम उन्हें दिखाएंगे अपनी आयतें दुनिया भर में(29)
(29) आसमान व ज़मीन घेरों में. सूरज चांद सितारे पेड़ पौधे जानवर. ये सब उसकी क़ुदरत और हिकमत को प्रमाणित करने वाले हैं. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि इन आयतों से मुराद गुज़री हुई उम्मतों की उजड़ी हुई बस्तियाँ हैं जिनसे नबियों को झुटलाने वालों का हाल मालूम होता है. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि इन निशानियों से पूर्व और पश्चिम की वो विजयें मुराद हैं जो अल्लाह तआला अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और उनके साथियों को बहुत जल्द अता फ़रमाने वाला है.

और ख़ुद उनके आपे में (30)
(30) उनकी हस्तियों में लाखों अनोखी बारीकियों और अनगिनत चमत्कार हैं. या ये मानी हैं कि बद्र में काफ़िर मग़लूब व मक़हूर करके ख़ुद उनके अपने हालात में अपनी निशानियों का अवलोकन करा दिया. या ये मानी हैं कि मक्का फ़त्ह फ़रमाकर उनमे अपनी निशानियाँ ज़ाहिर कर देंगे.

यहाँ तक कि उनपर खुल जाए कि बेशक वह हक़ है(31)
(31) यानी इस्लाम और क़ुरआन की सच्चाई उन पर ज़ाहिर हो जाए.

क्या तुम्हारे रब का हर चीज़ पर गवाह होना काफ़ी नहीं {53} सुना उन्हें ज़रूर अपने रब से मिलने से शक है  (32)
(32)क्योंकि वो दोबारा उठाए जाने और क़यामत को नहीं मानते.

सुनो वह हर चीज़ को घेरे है (33) {54}
(33) कोई चीज़ उसके इल्म के घेरे से बाहर नहीं और उसकी मालूमात असीम है.

40 सूरए मूमिन -दूसरा रूकू

40 सूरए मूमिन -दूसरा रूकू

إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا يُنَادَوْنَ لَمَقْتُ اللَّهِ أَكْبَرُ مِن مَّقْتِكُمْ أَنفُسَكُمْ إِذْ تُدْعَوْنَ إِلَى الْإِيمَانِ فَتَكْفُرُونَ
قَالُوا رَبَّنَا أَمَتَّنَا اثْنَتَيْنِ وَأَحْيَيْتَنَا اثْنَتَيْنِ فَاعْتَرَفْنَا بِذُنُوبِنَا فَهَلْ إِلَىٰ خُرُوجٍ مِّن سَبِيلٍ
ذَٰلِكُم بِأَنَّهُ إِذَا دُعِيَ اللَّهُ وَحْدَهُ كَفَرْتُمْ ۖ وَإِن يُشْرَكْ بِهِ تُؤْمِنُوا ۚ فَالْحُكْمُ لِلَّهِ الْعَلِيِّ الْكَبِيرِ
هُوَ الَّذِي يُرِيكُمْ آيَاتِهِ وَيُنَزِّلُ لَكُم مِّنَ السَّمَاءِ رِزْقًا ۚ وَمَا يَتَذَكَّرُ إِلَّا مَن يُنِيبُ
فَادْعُوا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ وَلَوْ كَرِهَ الْكَافِرُونَ
رَفِيعُ الدَّرَجَاتِ ذُو الْعَرْشِ يُلْقِي الرُّوحَ مِنْ أَمْرِهِ عَلَىٰ مَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ لِيُنذِرَ يَوْمَ التَّلَاقِ
يَوْمَ هُم بَارِزُونَ ۖ لَا يَخْفَىٰ عَلَى اللَّهِ مِنْهُمْ شَيْءٌ ۚ لِّمَنِ الْمُلْكُ الْيَوْمَ ۖ لِلَّهِ الْوَاحِدِ الْقَهَّارِ
الْيَوْمَ تُجْزَىٰ كُلُّ نَفْسٍ بِمَا كَسَبَتْ ۚ لَا ظُلْمَ الْيَوْمَ ۚ إِنَّ اللَّهَ سَرِيعُ الْحِسَابِ
وَأَنذِرْهُمْ يَوْمَ الْآزِفَةِ إِذِ الْقُلُوبُ لَدَى الْحَنَاجِرِ كَاظِمِينَ ۚ مَا لِلظَّالِمِينَ مِنْ حَمِيمٍ وَلَا شَفِيعٍ يُطَاعُ
يَعْلَمُ خَائِنَةَ الْأَعْيُنِ وَمَا تُخْفِي الصُّدُورُ
وَاللَّهُ يَقْضِي بِالْحَقِّ ۖ وَالَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِهِ لَا يَقْضُونَ بِشَيْءٍ ۗ إِنَّ اللَّهَ هُوَ السَّمِيعُ الْبَصِيرُ

बेशक जिन्होंने कुफ़्र किया उनको निदा की जाएगी(1)
(1) क़यामत के दिन जबकि वो जहन्नम में दाख़िल होंगे और उनकी बदियाँ उनपर पेश की जाएंगी और वो अज़ाब देखेंगे तो फ़रिश्ते उनसे कहेंगे.

कि ज़रूर तुमसे अल्लाह की बेज़ारी इससे बहुत ज़्यादा है जैसे तुम आज अपनी जान से बेज़ार हो जबकि तुम(2)
(2) दुनिया में.

ईमान की तरफ़ बुलाए जाते तो तुम कुफ़्र करते{10} कहेंगे ऐ हमारे रब तूने हमें दोबारा मुर्दा किया और दोबारा ज़िन्दा किया(3)
(3) क्योंकि पहले बेजान नुत्फ़ा थे, इस मौत के बाद उन्हें जान देकर ज़िन्दा किया, फिर उम्र पूरी होने पर मौत दी, दोबारा उठाने के लिये ज़िन्दा किया.

अब हम अपने गुनाहों पर मुक़िर हुए (अड़ गए) तो आग से निकलने की भी कोई राह है(4){11}
(4) उसका जवाब यह होगा कि तुम्हारे दोज़ख़ से निकलने का कोई रास्ता नहीं और तुम जिस हाल में हो, जिस अज़ाब में गिरफ़्तार हो, और उससे रिहाई की कोई राह नहीं पा सकते.

यह उस पर हुआ कि जब एक अल्लाह पुकारा जाता तो तुम कुफ़्र करते(5)
(5) यानी इस अज़ाब और इसकी हमेशगी का कारण तुम्हारा यह कर्म है कि जब अल्लाह की तौहीद का ऐलान होता और लाइलाहा इल्लल्लाहो कहा जाता तो तुम उसका इन्कार करते और कुफ़्र इख़्तियार करते.

और उस का शरीक ठहराया जाता तो तुम मान लेते(6)
(6) और इस शिर्क की तस्दीक़ करते.

तो हुक्म अल्लाह के लिये है जो सब से बलन्द बड़ा {12} वही है कि तुम्हें अपनी निशानियां दिखाता है(7)
(7) यानी अपनी मसनूआत के चमत्कार जो उसकी भरपूर क़ुदरत के प्रमाण है जैसे हवा और बादल और बिजली वग़ैरह.

और तुम्हारे लिये आसमान से रोज़ी उतारता है(8),
(8) मेंह बरसा कर.

और नसीहत नहीं मानता(9)
(9) और उन निशानियों से नसीहत हासिल नहीं करता.

मगर जो रूजू लाए(10){13}
(10) सारे कामों में अल्लाह तआला की तरफ़ और शिर्क से तौबह करे.

तो अल्लाह की बन्दगी करो निरे उसके बन्दे होकर(11)
(11) शिर्क से अलग होकर.

पड़े बुरा माने काफ़िर {14} बलन्द दर्जे देने वाला(12)
(12) नबियों, वलियों और उलमा को, जन्नम में.

अर्श का मालिक, ईमान की जान वही डालता है अपन हुक्म से अपने बन्दों में जिस पर चाहे(13)
(13) यानी अपने बन्दों में से जिसे चाहता है नबुव्वत की उपाधि अता करता है और जिसको नबी बनाता है उसका काम होता है.

कि वह मिलने के दिन से डराए(14) {15}
(14) यानी सृष्टि को क़यामत का ख़ौफ़ दिलाए जिस दिन आसमान और ज़मीन वाले और अगले पिछले मिलेंगे और आत्माएं शरीरों से और हर कर्म करने वाला अपने कर्म से मिलेगा.

जिस दिन वो बिल्कुल ज़ाहिर हो जाएंगे(15)
(15)क़ब्रों से निकल कर और कोई ईमारत या पहाड़ और छुपने की जगह और आड़ न पाएंगे.

अल्लाह पर उनका कुछ हाल छुपा न होगा(16)
(16) न कहनी न करनी, न दूसरे हालात और अल्लाह तआला से तो कोई चीज़ कभी नहीं छुप सकती लेकिन यह दिन ऐसा होगा कि उन लोगों के लिये कोई पर्दा और आड़ की चीज़ न होगी जिसके ज़रिये से वो अपने ख़याल में भी अपने हाल को छुपा सके, और सृष्टि के नाश के बाद अल्लाह तआला फ़रमाएगा.

आज किस की बादशाही है (17)
(17) अब कोई न होगा कि जवाब दे. ख़ुद ही जवाब में फ़रमाएगा कि अल्लाह वाहिद व क़हहार की. और एक क़ौल यह है कि क़यामत के दिन जब सारे अगले पिछले हाज़िर होंगे तो एक पुकारने वाला पुकारेगा, आज किसकी बादशाही है? सारी सृष्टि जवाब देगी “लिल्लाहिल वाहिदिल क़हहार”  अल्लाह वाहिद व क़हहार की जैसा कि आगे इरशाद होता है.

एक अल्लाह सब पर ग़ालिब की(18) {16}
(18) मूमिन तो यह जवाब बहुत मज़े के साथ अर्ज़ करेंगे क्योंकि वो दुनिया में यही अक़ीदा रखते थे. यही कहते थे और इसी की बदौलत उन्हें दर्जे मिले और काफ़िर ज़िल्लत और शर्मिन्दगी के साथ इसका इक़रार करेंगे और दुनिया में अपने इन्कारी रहने पर लज्जित होंगे.

आज हर जान अपने किये का बदला पाएगी (19)
(19) नेक अपनी नेकी का और बद अपनी बदी का.

आज किसी पर ज़ियादती नहीं, बेशक अल्लाह जल्द हिसाब लेने वाला है {17} और उन्हें डराओ उस नज़्दीक आने वाली आफ़त के दिन से(20)
(20) इससे क़यामत का दिन मुराद है.

जब दिल गलों के पास आ जाएंगे(21)
(21) ख़ौफ़ की सख़्ती से न बाहर ही निकल सकें न अन्दर ही अपनी जगह वापस जा सकें.

ग़म में भरे, और ज़ालिमों का न कोई दोस्त न कोई सिफ़रिशी जिस का कहा माना जाए(22){18}
(22) यानी काफ़िर शफ़ाअत से मेहरूम होंगे.

अल्लाह जानता है चोरी छुपे की निगाह(23)
(23) यानी निगाहों की ख़यानत और चोरी, ना-मेहरम को देखना और मना की हुई चीज़ों पर नज़र डालना.

और जो कुछ सीनों में छुपा है(24){19}
(24)यानी दिलों के राज़, सब चीजें अल्लाह तआला के इल्म में हैं.

और अल्लाह सच्चा फ़ैसला फ़रमाता है और उसके सिवा जिनको(25)
(25) यानी जिन बुतों को ये मुश्रिक लोग.

पूजते हैं वो कुछ फ़ैसला नहीं करते(26) ,
(26) क्योंकि न वो इल्म रखते हैं न क़ुदरत, तो उनकी इबादत करना और उन्हें ख़ुदा का शरीक ठहराना बहुत ही खुला हुआ असत्य है.

बेशक अल्लाह ही सुनता और देखता है(27) {20}
(27) अपनी मख़लुक़ की कहनी व करनी और सारे हालात को.

40 सूरए मूमिन -तीसरा रूकू

40 सूरए मूमिन -तीसरा रूकू

۞ أَوَلَمْ يَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَيَنظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذِينَ كَانُوا مِن قَبْلِهِمْ ۚ كَانُوا هُمْ أَشَدَّ مِنْهُمْ قُوَّةً وَآثَارًا فِي الْأَرْضِ فَأَخَذَهُمُ اللَّهُ بِذُنُوبِهِمْ وَمَا كَانَ لَهُم مِّنَ اللَّهِ مِن وَاقٍ
ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَانَت تَّأْتِيهِمْ رُسُلُهُم بِالْبَيِّنَاتِ فَكَفَرُوا فَأَخَذَهُمُ اللَّهُ ۚ إِنَّهُ قَوِيٌّ شَدِيدُ الْعِقَابِ
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا مُوسَىٰ بِآيَاتِنَا وَسُلْطَانٍ مُّبِينٍ
إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَهَامَانَ وَقَارُونَ فَقَالُوا سَاحِرٌ كَذَّابٌ
فَلَمَّا جَاءَهُم بِالْحَقِّ مِنْ عِندِنَا قَالُوا اقْتُلُوا أَبْنَاءَ الَّذِينَ آمَنُوا مَعَهُ وَاسْتَحْيُوا نِسَاءَهُمْ ۚ وَمَا كَيْدُ الْكَافِرِينَ إِلَّا فِي ضَلَالٍ
وَقَالَ فِرْعَوْنُ ذَرُونِي أَقْتُلْ مُوسَىٰ وَلْيَدْعُ رَبَّهُ ۖ إِنِّي أَخَافُ أَن يُبَدِّلَ دِينَكُمْ أَوْ أَن يُظْهِرَ فِي الْأَرْضِ الْفَسَادَ
وَقَالَ مُوسَىٰ إِنِّي عُذْتُ بِرَبِّي وَرَبِّكُم مِّن كُلِّ مُتَكَبِّرٍ لَّا يُؤْمِنُ بِيَوْمِ الْحِسَابِ

तो क्या उन्होंने ज़मीन में सफ़र न किया कि देखते कैसा अंजाम हुआ उनसे अगलों का(1),
(1) जिन्हों ने रसूलों को झुटलाया था.

उनकी क़ुव्वत और ज़मीन में जो निशानियाँ छोड़ गए(2)
(2) क़िले और महल, नेहरें और हौज़, और बड़ी बड़ी इमारतें.

उनसे ज़्यादा तो अल्लाह ने उन्हें उनके गुनाहों पर पकड़ा, और अल्लाह से उनका कोई बचाने वाला न हुआ(3) {21}
(3) कि अल्लाह के अजाब से बचा सकता, समझदार का काम है कि दूसरे के हाल से इब्रत हासिल करे. इस एहद के काफ़िर यह हाल देखकर क्यों इब्रत हासिल नहीं करते, क्यों नहीं सोचते कि पिछली क़ौमें उनसे ज़्यादा मज़बूत और स्वस्थ, मालदार और अधिकार वाली होने के बावुजूद, इस इब्रत से भरपूर तरीक़े पर तबाह कर दी गई. यह क्यों हुआ.

यह इसलिये कि उनके पास उनके रसूल रौशन निशानियां लेकर आए(4)
(4) चमत्कार दिखाते.

फिर वो कुफ़्र करते तो अल्लाह ने उन्हें पकड़ा, बेशक अल्लाह ज़बरदस्त सख़्त अज़ाब वाला है {22} और बेशक हमने मूसा को अपनी निशानियों और रौशन सनद के साथ भेजा {23} फ़िरऔन और हामान और क़ारून की तरफ़ तो वो बोले जादूगर है बड़ा झूटा(5) {24}
(5) और उन्होंने हमारी निशानियाँ और प्रमाणों को जादू बताया.

फिर जब वह उनपर हमारे पास से हक़ (सच्चाई) लाया (6)
(6) यानी नबी होकर अल्लाह का संदेश लाए तो फ़िरऔन और उसकी क़ौम.

बोले जो इस पर ईमान लाए उनके बेटे क़त्ल करो और औरतें ज़िन्दा रखो(7)
(7) ताकि लोग हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के अनुकरण से बाज़ आएं.

और काफ़िरों का दाव नहीं मगर भटकता फिरता (8) {25}
(8) कुछ भी तो कारआमद नहीं, बिल्कुल निकम्मा और बेकार. पहले भी फ़िरऔनियों ने फ़िरऔन के हुक्म से हज़ारों क़त्ल किये मगर अल्लाह की मर्ज़ी होकर रही और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को रब ने फ़िरऔन के घर बार में पाला, उससे ख़िदमतें कराई. जैसा वह दाव फ़िरऔनियों का बेकार गया ऐसे ही अब ईमान वालों को रोकने के लिये फिर दोबारा क़त्ल शुरू करना बेकार है. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के दीन का प्रचलन अल्लाह तआला को मंज़ूर है, उसे कौन रोक सकता है.

और फ़िरऔन बोला(9)
(9) अपने गिरोह से.

मुझे छोड़ों मैं मूसा को क़त्ल करूं(10)
(10) फ़िरऔन जब कभी हजरत मूसा अलैहिस्सलाम के क़त्ल का इरादा करता तो उसकी क़ौम के लोग उसे इस से मना करते और कहते कि यह वह व्यक्ति नहीं है जिसका तुझे अन्देशा है. यह तो एक मामूली जादूगर है इसपर तो हम अपने जादू से ग़ालिब आ जाएंगे और अगर इसको क़त्ल कर दिया तो आम लोग शुबह में पड़ जाएंगे कि वह व्यक्ति सच्चा था, हक़ पर था, तू दलील से उसका मुक़ाबला करने में आजिज़ हुआ, जवाब न दे सका, तो तूने उसे क़त्ल कर दिया. लेकिन हक़ीक़त में फ़िरऔन का यह कहना कि मुझे छोड़ दो मैं मूसा को क़त्ल करूं, ख़ालिस धमकी ही थी. उसको ख़ुद आपके सच्चे नबी होने का यक़ीन था और वह जानता था कि जो चमत्कार आप लाए हैं वह अल्लाह की आयतें हैं, जादू नहीं. लेकिन यह समझता था कि अगर आप के क़त्ल का इरादा करेगा तो आप उसको हलाक करने में जल्दी फ़रमाएंगे, इससे यह बेहतर है कि बहस बढ़ाने में ज़्यादा वक़्त गुज़ार दिया जाए. अगर फ़िरऔन अपने दिल में आप को सच्चा नबी न समझता और यह न जानता कि अल्लाह की ताईदें जो आपके साथ हैं, उनका मुक़ाबला नामुमकिन है, तो आपके क़त्ल में हरगिज़ देरी न करता क्योंकि वह बड़ा खूंखार, सफ्फ़ाक़, ज़ालिम, बेदर्द था, छोटी सी बात में हज़ारहा ख़ून कर डालता था.

और वह अपने रब को पुकारे(11)
(11)   जिसका अपने आप को रसूल बताता है ताकि उसका रब उसको हमसे बचाए. फ़िरऔन का यह क़ौल इसपर गवाह है कि उसके दिल में आपका और आपकी दुआओ का ख़ौफ़ था. वह अपने दिल में आप से डरता था. दिखावे की इज़्ज़त बनी रखने के लिये यह ज़ाहिर करता था कि वह क़ौम के मना करने के कारण हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को क़त्ल नहीं करता.

मैं डरता हूँ कहीं वह तुम्हारा दीन बदल दे(12)
(12) और तुम से फ़िरऔन परस्ती और बुत परस्ती छुड़ा दे.

या ज़मीन में फ़साद चमकाए(13) {26}
(13) जिदाल और क़िताल करके.

और मूसा ने (14),
(14) फ़िरऔन की धमकियाँ सुनकर.

कहा मैं तुम्हारे और अपने रब की पनाह लेता हूँ हर मुतकब्बिर (घमण्डी) से कि हिसाब के दिन पर यक़ीन नहीं लाता(15) {27}
(15) हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने फ़िरऔन की सख़्तियों के जवाब में अपनी तरफ़ से कोई कलिमा अतिश्योक्ति या बड़ाई का न फ़रमाया बल्कि अल्लाह तआला से पनाह चाही और उसपर भरोसा किया. यही ख़ुदा की पहचान वालों का तरीक़ा है और इसी लिये अल्लाह तआला ने आपको हर एक बला से मेहफ़ूज़ रखा. इन मुबारक जुमलों में कैसी बढ़िया हिदायतें है. यह फ़रमाना कि तुम्हारे और अपने रब की पनाह लेता हूँ और इसमें हिदायत है कि रब एक ही है. यह भी हिदायत है कि जो उसकी पनाह में आए उस पर भरोसा करे तो वह उसकी मदद फ़रमाए, कोई उसको हानि नहीं पहुंचा सकता. यह भी हिदायत है कि उसी पर भरोसा करना बन्दगी की शान है और तुम्हारे रब फ़रमाने में यह भी हिदायत है कि अगर तुम उस पर भरोसा करो तो तुम्हें भी सआदत नसीब हो.

40 सूरए मूमिन -सातवाँ रूकू

40 सूरए मूमिन -सातवाँ रूकू

اللَّهُ الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ اللَّيْلَ لِتَسْكُنُوا فِيهِ وَالنَّهَارَ مُبْصِرًا ۚ إِنَّ اللَّهَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى النَّاسِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَشْكُرُونَ
ذَٰلِكُمُ اللَّهُ رَبُّكُمْ خَالِقُ كُلِّ شَيْءٍ لَّا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ فَأَنَّىٰ تُؤْفَكُونَ
كَذَٰلِكَ يُؤْفَكُ الَّذِينَ كَانُوا بِآيَاتِ اللَّهِ يَجْحَدُونَ
اللَّهُ الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ الْأَرْضَ قَرَارًا وَالسَّمَاءَ بِنَاءً وَصَوَّرَكُمْ فَأَحْسَنَ صُوَرَكُمْ وَرَزَقَكُم مِّنَ الطَّيِّبَاتِ ۚ ذَٰلِكُمُ اللَّهُ رَبُّكُمْ ۖ فَتَبَارَكَ اللَّهُ رَبُّ الْعَالَمِينَ
هُوَ الْحَيُّ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ فَادْعُوهُ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ ۗ الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ
۞ قُلْ إِنِّي نُهِيتُ أَنْ أَعْبُدَ الَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ لَمَّا جَاءَنِيَ الْبَيِّنَاتُ مِن رَّبِّي وَأُمِرْتُ أَنْ أُسْلِمَ لِرَبِّ الْعَالَمِينَ
هُوَ الَّذِي خَلَقَكُم مِّن تُرَابٍ ثُمَّ مِن نُّطْفَةٍ ثُمَّ مِنْ عَلَقَةٍ ثُمَّ يُخْرِجُكُمْ طِفْلًا ثُمَّ لِتَبْلُغُوا أَشُدَّكُمْ ثُمَّ لِتَكُونُوا شُيُوخًا ۚ وَمِنكُم مَّن يُتَوَفَّىٰ مِن قَبْلُ ۖ وَلِتَبْلُغُوا أَجَلًا مُّسَمًّى وَلَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
هُوَ الَّذِي يُحْيِي وَيُمِيتُ ۖ فَإِذَا قَضَىٰ أَمْرًا فَإِنَّمَا يَقُولُ لَهُ كُن فَيَكُونُ

अल्लाह है जिसने तुम्हारे लिये रात बनाई कि उसमें आराम पाओ और दिन बनाया आँखे खोलता(1)
(1) कि उसमें अपना काम इत्मीनान के साथ करो.

बेशक अल्लाह लोगों पर फ़ज़्ल (कृपा) वाला है लेकिन बहुत आदमी शुक्र नहीं करते {61} वह है अल्लाह तुम्हारा रब हर चीज़ का बनाने वाला, उसके सिवा किसी की बन्दगी नहीं तो कहां औंधे जाते हो(2){62}
(2) कि उसको छोड़कर बुतों को पूजते हो और उसपर ईमान नहीं लाते जबकि दलीलें क़ायम हैं.

यूंही औंधे होते हैं(3)
(3) और हक़ से फिरते हैं, दलीलें क़ायम होने के बावुजूद.

वो जो अल्लाह की आयतों का इन्कार करते हैं(4) {63}
(4) और उनमें सच्चाई जानने के लिये नज़र और ग़ौर नहीं करते.

अल्लाह है जिसने तुम्हारे लिये ज़मीन ठहराव बनाई (5)
(5) कि वह तुम्हारी क़रारगाह हो, ज़िन्दगी में भी और मौत के बाद भी.

और आसमान छत(6)
(6) कि उसको क़ुब्बे की तरह बलन्द फ़रमाया.

और तुम्हारी तस्वीर की, तो तुम्हारी सूरतें अच्छी बनाई (7)
(7) कि तुम्हें अच्छे डील डौल, नूरानी चेहरे और सुडौल किया, जानवरों की तरह न बनाया कि औंधे चलते.

और तुम्हें सुथरी चीज़ें(8)
(8) नफ़ीस खाने पीने की चीज़े.

रोज़ी दीं, यह है अल्लाह तुम्हारा रब, तो बड़ी बरकत वाला है अल्लाह रब सारे जगत का {64} वही ज़िन्दा है (9)
(9) कि उसकी फ़ना मुहाल है, असंभव है.

उसके सिवा किसी की बन्दगी नहीं तो उसे पूजो निरे उसी के बन्दे होकर, सब ख़ूबियां अल्लाह को जो सारे जगत का रब {65} तुम फ़रमाओ मैं मना किया गया हूँ कि उन्हें पूजूं जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पूजते हो (10)
(10) शरीर काफ़िरों ने जिहालत और गुमराही के तौर पर अपने झूठे दीन की तरफ़ हुज़ूर पुरनूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को दावत दी थी और आपसे बुत परस्ती की दरख़्वास्त की थी. इसपर यह आयत उतरी.

जब कि मेरे पास रौशन दलीलें (11)
(11) अक़्ल व वही की तौहीद पर दलालत करने वाली.

मेरे रब की तरफ़ से आईं और मुझे हुक्म हुआ है कि जगत के रब के हुज़ूर (समक्ष) गर्दन रखूं{66} वही है जिसने तुम्हें(12)
(12) यानी तुम्हारे अस्ल और तुम्हारे पितामह हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को.

मिट्टी से बनाया फिर (13)
(13)हज़रत आदम के बाद उनकी नस्ल को.

पानी की बूंद से(14)
(14) यानी मनी के क़तरे से.

फिर ख़ून की फुटक से फिर तुम्हें निकालता है बच्चा फिर तुम्हें बाक़ी रखता है कि अपनी जवानी को पहुंचो(15)
(15)और क़ुव्वत समपूर्ण हो.

फिर इसलिये कि बूढ़े हो और तुम में कोई पहले ही उठा लिया जाता है(16)
(16) यानी बुढ़ापे या जवानी के पहुंचने से पहले, यह इसलिये किया कि तुम ज़िन्दगानी करो.

और इसलिये कि तुम एक मुक़र्रर वादे तक पहुंचे (17)
(17)ज़िन्दगी के सीमित समय तक.

और इसलिये कि समझो(18){67}
(18) तौहीद की दलीलों को, और ईमान लाओ.

वही है कि जिलाता है और मारता है, फिर जब कोई हुक्म फ़रमाता है तो उससे यही कहता है कि होजा जभी वह हो जाता है (19){68}
(19)यानी चीज़ों का वुजूद उसके इरादे के आधीन है कि उसने इरादा फ़रमाया और चीज़ मौजूद हुई. न कोई कुलफ़त है न मशक़्क़त है न किसी सामान की हाजत, यह उसकी भरपूर क़ुदरत का बयान है.

39 सूरए ज़ुमर -दूसरा रूकू

39 सूरए  ज़ुमर -दूसरा रूकू

قُلْ يَا عِبَادِ الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا رَبَّكُمْ ۚ لِلَّذِينَ أَحْسَنُوا فِي هَٰذِهِ الدُّنْيَا حَسَنَةٌ ۗ وَأَرْضُ اللَّهِ وَاسِعَةٌ ۗ إِنَّمَا يُوَفَّى الصَّابِرُونَ أَجْرَهُم بِغَيْرِ حِسَابٍ
قُلْ إِنِّي أُمِرْتُ أَنْ أَعْبُدَ اللَّهَ مُخْلِصًا لَّهُ الدِّينَ
وَأُمِرْتُ لِأَنْ أَكُونَ أَوَّلَ الْمُسْلِمِينَ
قُلْ إِنِّي أَخَافُ إِنْ عَصَيْتُ رَبِّي عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ
قُلِ اللَّهَ أَعْبُدُ مُخْلِصًا لَّهُ دِينِي
فَاعْبُدُوا مَا شِئْتُم مِّن دُونِهِ ۗ قُلْ إِنَّ الْخَاسِرِينَ الَّذِينَ خَسِرُوا أَنفُسَهُمْ وَأَهْلِيهِمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ أَلَا ذَٰلِكَ هُوَ الْخُسْرَانُ الْمُبِينُ
لَهُم مِّن فَوْقِهِمْ ظُلَلٌ مِّنَ النَّارِ وَمِن تَحْتِهِمْ ظُلَلٌ ۚ ذَٰلِكَ يُخَوِّفُ اللَّهُ بِهِ عِبَادَهُ ۚ يَا عِبَادِ فَاتَّقُونِ
وَالَّذِينَ اجْتَنَبُوا الطَّاغُوتَ أَن يَعْبُدُوهَا وَأَنَابُوا إِلَى اللَّهِ لَهُمُ الْبُشْرَىٰ ۚ فَبَشِّرْ عِبَادِ
الَّذِينَ يَسْتَمِعُونَ الْقَوْلَ فَيَتَّبِعُونَ أَحْسَنَهُ ۚ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ هَدَاهُمُ اللَّهُ ۖ وَأُولَٰئِكَ هُمْ أُولُو الْأَلْبَابِ
أَفَمَنْ حَقَّ عَلَيْهِ كَلِمَةُ الْعَذَابِ أَفَأَنتَ تُنقِذُ مَن فِي النَّارِ
لَٰكِنِ الَّذِينَ اتَّقَوْا رَبَّهُمْ لَهُمْ غُرَفٌ مِّن فَوْقِهَا غُرَفٌ مَّبْنِيَّةٌ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۖ وَعْدَ اللَّهِ ۖ لَا يُخْلِفُ اللَّهُ الْمِيعَادَ
أَلَمْ تَرَ أَنَّ اللَّهَ أَنزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَسَلَكَهُ يَنَابِيعَ فِي الْأَرْضِ ثُمَّ يُخْرِجُ بِهِ زَرْعًا مُّخْتَلِفًا أَلْوَانُهُ ثُمَّ يَهِيجُ فَتَرَاهُ مُصْفَرًّا ثُمَّ يَجْعَلُهُ حُطَامًا ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَذِكْرَىٰ لِأُولِي الْأَلْبَابِ

तुम फ़रमाओ ऐ मेरे बन्दों जो ईमान लाए अपने रब से डरो जिन्होंने भलाई की (1)
(1) फ़रमाँबरदारी की और अच्छे कर्म किये.

उनके लिये दुनिया में भलाई है(2)
(2) यानी सेहत और आफ़ियत.

और अल्लाह की ज़मीन फैली हुई है (3)
(3) इसमें हिजरत की तरग़ीब है कि जिस शहर में गुनाहों की ज़ियादती हो और वहाँ के रहने वाले आदमी को अपनी दीनदारी पर क़ायम रहना दुशवार हो जाए, चाहिये कि उस जगह को छोड़ दे और वहाँ से हिजरत कर जाए. यह आयत हबशा के मुहाजिरों के हक़ में उतरी और यह भी कहा गया है कि हज़रत जअफ़र बिन अबी तालिब और उनके साथियों के हक़ में उतरी जिन्हों ने मुसीबतों और बलाओ पर सब्र किया और हिजरत की  और अपने दीन पर क़ायम रहे, उसको छोड़ना गवारा न किया.

साबिरों ही को उनका सवाब भरपूर दिया जाएगा बेगिनती(4) {10}
(4) हज़रत अली मुर्तज़ा रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि हर नेकी करने वाले की नेकियों का वज़न किया जाएगा, सिवाय सब्र करने वालों के कि उन्हें बे अन्दाज़ा और बेहिसाब दिया जाएगा और यह भी रिवायत है कि मुसीबत और बला वाले लोग हाज़िर किये जाएंगे, न उनके लिये मीज़ान क़ायम की जाए, न उनके लिये दफ़्तर खोले जाएं. उन पर अज्र और सवाब की बेहिसाब बारिश होगी, यहाँ तक कि दुनिया में आफ़ियत की ज़िन्दगी बसर करने वाले उन्हें देखकर आरज़ू करेंगे कि काश वो मुसीबत वालों में से होते और उनके जिस्म क़ैंचियों से काटे गए होते कि आज यह सब्र का फल पाते.

तुम फ़रमाओ (5)
(5) ऐ नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम.

मुझे हुक्म है कि अल्लाह को पूजूं निरा उसका बन्दा होकर {11} और मुझे हुक्म है कि मैं सबसे पहले गर्दन रखूं (6) {12}
(6) और फ़रमाँबरदार और ख़ूलूस वालों में मुक़द्दम और साबिक़ यानी आगे और पीछे हों. अल्लाह तआला ने पहले इख़लास का हुक्म दिया जो दिल का अमल है फिर फ़रमाँबरदारी यानी अंगों के कामों का. चूंकि शरीअत के अहकाम रसूल से हासिल होते हैं वही उनके पहुंचाने वाले हैं तो वो उनके शुरू करने में सब से मुक़द्दस और अव्वल हुए. अल्लाह तआला ने अपने रसूल को यह हुक्म देकर तस्बीह की कि दूसरों पर इसकी पाबन्दी निहायत ज़रूरी है और दूसरों की तरग़ीब के लिये नबी अलैहिस्सलाम को यह हुक्म दिया गया.

तुम फ़रमाओ फ़र्ज़ करो अगर मुझसे नाफ़रमानी हो जाए तो मुझे भी अपने रब से एक बड़े दिन के अज़ाब का डर है(7){13}
(7) क़ुरैश के काफ़िरों ने नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा था कि आप अपनी क़ौम के सरदारों और अपने रिश्तेदारों को नहीं देखते जो लात और उज़्ज़ा की पूजा करते हैं उनके रद में यह आयत उतरी.

तुम फ़रमाओ मैं अल्लाह ही को पूजता हूँ निरा उसका बन्दा होकर {14} तो तुम उसके सिवा जिसे चाहो पूजो(8)
(8) हिदायत और तम्बीह के तरीक़े पर फ़रमाया.

तुम फ़रमाओ पूरी हार उन्हें जो अपनी जान और अपने घर वाले क़यामत के दिन हार बैठे (9)
(9) यानी गुमराही इख़्तियार करके हमेशा के लिये जहन्नम के मुस्तहिक़ हो गए और जन्नत की नेअमतों से मेहरूम हो गए जो ईमान लाने पर उन्हें मिलतीं.

हां हां यही खुली हार है {15} उन के ऊपर आग के पहाड़ हैं और उन के नीचे पहाड़ (10)
(10) यानी हर तरफ़ से आग उन्हें घेरे हुए हैं.

इससे अल्लाह डराता है अपने बन्दों को (11)
(11) कि ईमान लाएं और मना की हुई बातों से बचें.

ऐ मेरे बन्दों तुम मुझ से डरो (12) {16}
(12) वह काम न करो जो मेरी नाराज़ी का कारण हो.

और वो जो बुतों की पूजा से बचे और अल्लाह की तरफ़ रूजू हुए उन्हीं के लिये ख़ुशख़बरी है तो ख़ुशी सुनाओ मेरे उन बन्दों को {17} जो कान लगाकर बात सुनें फिर उसके बेहतर पर चलें(13)
(13) जिसमें उनकी भलाई हो.

ये हैं जिनको अल्लाह ने हिदायत फ़रमाई और ये हैं जिनको अक़्ल है(14) {18}
(14) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि जब हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो ईमान लाए तो आपके पास हज़रत उस्मान और अब्दुर्रहमान बिन औंफ़ और तलहा और ज़ुबैर और सअद बिन अबी वक़क़ास और सईद बिन ज़ैद आए और उनसे पूछा. उन्होंने अपने ईमान की ख़बर दी ये हज़रत भी सुनकर ईमान ले आए. इन के हक़ में यह आयत उतरी “फ़बश्शिर इबादिल्लज़ीना” ख़ुशी सुनाओ मेरे उन बन्दों को जो कान लगाकर बात सुने….

तो क्या वह जिसपर अज़ाब की बात साबित हो चुकी निजात वालों के बराबर हो जाएगा तो क्या तुम हिदायत देकर आग के मुस्तहिक़ को बचा लोगे(15) {19}
(15) जो अज़ली बदबख़्त और अल्लाह के इल्म में जहन्नमी है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि मुराद इससे अबू लहब और उसके लड़के हैं.

लेकिन वह जो अपने रब से डरे(16)
(16) और उन्होंने अल्लाह तआला की फ़रमाँबरदारी की.

उनके लिये बालाख़ाने हैं उनपर बालाख़ाने बनें(17)
(17) यानी जन्नत की ऊंची मंज़िलें जिनके ऊपर और बलन्द मंज़िलें हैं.

उनके नीचे नेहरें बहें, अल्लाह का वादा, अल्लाह का वादा ख़िलाफ़ नहीं करता {20} क्या तूने न देखा कि अल्लाह ने आसमान से पानी उतारा फिर उससे ज़मीन में चश्मे बनाए फिर उससे खेती निकालता है कई रंगत की(18)
(18) पीली हरी सुर्ख़ सफ़ेद, क़िस्म की, गेहूँ जौ और तरह तरह के ग़ल्ले.

फिर सूख जाती है तो तू देखे कि वह (19)
(19) हरी भरी होने के बाद.

पीली पड़ गई फिर उसे रेज़ा रेज़ा कर देता है, बेशक इसमें ध्यान की बात है अक़्लमन्दों को(20){21}
(20) जो उससे अल्लाह तआला की वहदानियत और क़ुदरत पर दलीलें कायम करते हैं.

38 सूरए सॉद -दूसरा रूकू

38 सूरए सॉद -दूसरा रूकू

وَمَا يَنظُرُ هَٰؤُلَاءِ إِلَّا صَيْحَةً وَاحِدَةً مَّا لَهَا مِن فَوَاقٍ
وَقَالُوا رَبَّنَا عَجِّل لَّنَا قِطَّنَا قَبْلَ يَوْمِ الْحِسَابِ
اصْبِرْ عَلَىٰ مَا يَقُولُونَ وَاذْكُرْ عَبْدَنَا دَاوُودَ ذَا الْأَيْدِ ۖ إِنَّهُ أَوَّابٌ
إِنَّا سَخَّرْنَا الْجِبَالَ مَعَهُ يُسَبِّحْنَ بِالْعَشِيِّ وَالْإِشْرَاقِ
وَالطَّيْرَ مَحْشُورَةً ۖ كُلٌّ لَّهُ أَوَّابٌ
وَشَدَدْنَا مُلْكَهُ وَآتَيْنَاهُ الْحِكْمَةَ وَفَصْلَ الْخِطَابِ
۞ وَهَلْ أَتَاكَ نَبَأُ الْخَصْمِ إِذْ تَسَوَّرُوا الْمِحْرَابَ
إِذْ دَخَلُوا عَلَىٰ دَاوُودَ فَفَزِعَ مِنْهُمْ ۖ قَالُوا لَا تَخَفْ ۖ خَصْمَانِ بَغَىٰ بَعْضُنَا عَلَىٰ بَعْضٍ فَاحْكُم بَيْنَنَا بِالْحَقِّ وَلَا تُشْطِطْ وَاهْدِنَا إِلَىٰ سَوَاءِ الصِّرَاطِ
إِنَّ هَٰذَا أَخِي لَهُ تِسْعٌ وَتِسْعُونَ نَعْجَةً وَلِيَ نَعْجَةٌ وَاحِدَةٌ فَقَالَ أَكْفِلْنِيهَا وَعَزَّنِي فِي الْخِطَابِ
قَالَ لَقَدْ ظَلَمَكَ بِسُؤَالِ نَعْجَتِكَ إِلَىٰ نِعَاجِهِ ۖ وَإِنَّ كَثِيرًا مِّنَ الْخُلَطَاءِ لَيَبْغِي بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ إِلَّا الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَقَلِيلٌ مَّا هُمْ ۗ وَظَنَّ دَاوُودُ أَنَّمَا فَتَنَّاهُ فَاسْتَغْفَرَ رَبَّهُ وَخَرَّ رَاكِعًا وَأَنَابَ ۩
فَغَفَرْنَا لَهُ ذَٰلِكَ ۖ وَإِنَّ لَهُ عِندَنَا لَزُلْفَىٰ وَحُسْنَ مَآبٍ
يَا دَاوُودُ إِنَّا جَعَلْنَاكَ خَلِيفَةً فِي الْأَرْضِ فَاحْكُم بَيْنَ النَّاسِ بِالْحَقِّ وَلَا تَتَّبِعِ الْهَوَىٰ فَيُضِلَّكَ عَن سَبِيلِ اللَّهِ ۚ إِنَّ الَّذِينَ يَضِلُّونَ عَن سَبِيلِ اللَّهِ لَهُمْ عَذَابٌ شَدِيدٌ بِمَا نَسُوا يَوْمَ الْحِسَابِ

और ये राह नहीं देखते मगर एक चीख़ की(1)
(1)  यानी क़यामत के पहले सूर के फूंके जाने की, जो उनके अज़ाब की मीआद है.

जिसे कोई फेर नहीं सकता {15} और बोले ऐ हमारे रब हमारा हिस्सा हमें जल्द दे दे हिसाब के दिन से पहले(2){16}
(2) यह नज़र बिर हारिस ने हंसी के तौर पर कहा था, इसपर अल्लाह तआला ने अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से फ़रमाया कि—-

तुम उनकी बातों पर सब्र करो और हमारे बन्दे दाऊद नेअमातें वाले को याद करो(3)
(3) जिन को इबादत की बहुत कुव्वत दी गई थी. आप का तरीक़ा था कि एक दिन रोज़ा रखते, एक दिन इफ़्तार करते और रात के पहले आधे हिस्से में इबादत करते उसके बाद रात की एक तिहाई आराम फ़रमाते फिर बाक़ी छटा इबादत में गुज़ारते.

बेशक वह बड़ा  रूजू करने वाला है (4) {17}
(4) अपने रब की तरफ.

बेशक हमने उसके साथ पहाड़ मुसख़्ख़र (वशीभूत) फ़रमा दिये कि तस्बीह करते(5)
(5) हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की तस्बीह के साथ.

शाम को और सूरज चमकते{18} (6)
(6)  इस आयत की तफ़सीर में यह भी कहा गया है कि अल्लाह तआला ने हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम के लिये पहाड़ों को ऐसा मुसख़्ख़र यानी वशीभूत किया था कि जहाँ आप चाहते साथ ले जाते. (मदारिक)

और परिंदे जमा किए हुए सब उसके फ़रमाँबरदार थे(7){19}
(7) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि जब हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम तस्बीह करते तो पहाड़ भी आपके साथ तस्बीह करते और पक्षी आपके पास जमा होकर तस्बीह करते.

(8)
(8) पहाड़ भी और पक्षी भी.

और हमने उसकी सल्तनत को मज़बूत किया(9)
(9) फ़ौज़ और लश्कर की कसरत अता फ़रमाकर. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि धरती के बादशाहों में हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की बड़ी मज़बूत और ताक़तवार सल्तनत थी, छत्तीस हज़ार मर्द आप की मेहराब के पहरे पर मुक़र्रर थे.

और उसे हिकमत (बोध)(10)
(10) यानी नबुव्वत. कुछ मुफ़स्सिरों ने हिकमत की तफ़सीर इन्साफ़ की है, कुछ ने अल्लाह की किताब का इल्म, कुछ ने फ़िक़्ह, कुछ ने सुन्नत (जुमल)

और क़ौले फ़ैसल दिया(11) {20}
(11) क़ौले फ़ैसल से इल्मे कज़ा मुराद है जो सच और झूठ, सत्य और असत्य में फ़र्क़ और तमीज़ कर दे.

और क्या तुम्हें (12)
(12) ऐ सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

उस दावे वालों की भी ख़बर आई, जब वो दीवार कूद कर दाऊद की मस्जिद में आए(13){21}
(13) ये आने वाले, मशहूर क़ौल के अनुसार, फ़रिश्ते थे, जो हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की आज़मायश के लिये आए थे.

जब वो दाऊद पर दाख़िल हुए तो वह उनसे घबरा गया उन्होंने अर्ज़ की डरिये नहीं हम दो फ़रीक़ (पक्ष) हैं कि एक ने दूसरे पर ज़ियादती की है(14)
(14) उनका यह क़ौल एक मसअले की फ़र्ज़ी शक्ल पेश करके जवाब हासिल करना था और किसी मसअले के बारे में हुक्म मालूम करने के लिये फ़र्ज़ी सूरतें मुक़र्रर कर ली जाती हैं और निर्धारित व्यक्तियों की तरफ़ उनकी निस्बत कर दी जाती है. ताकि मसअले का बयान बहुत साफ़ तरीक़े पर हो और इबहाम बाक़ी न रहे. यहाँ जो मसअले की सूरत इन फ़रिश्तों ने पेश की इस से मक़सूद हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम को तवज्जह दिलाना था इस बात की तरफ़, जो उन्हें पेश आई थी और वह यह थी किं आपकी 99 बीबियाँ थीं. इसके बाद आपने एक और औरत को पयाम दे दिया जिसको एक मुसलमान पहले से पयाम दे चुका था लेकिन आपका संदेश पहुंचने के बाद औरत के अज़ीज़ रिश्तेदार दूसरे की तरफ़ इल्तिफ़ात करने वाल कब थे. आपके लिये राज़ी हो गए और आपसे निकाहा हो गया. एक क़ौल यह भी है कि उस मुसलमान के साथ निकाह हो चुका था. आपने उस मुसलमान से अपनी रग़बत का इज़हार किया और चाहा कि वह अपनी औरत को तलाक़ दे दे. वह आपके लिहाज़ से मना न कर सका और उसने तलाक़ दे दी. आपका निकाह हो गया. और उस ज़माने में ऐसा मामूल था कि अगर किसी व्यक्ति को किसी औरत की तरफ़ रग़बत होती तो उसके शौहर से इस्तिदआ करके तलाक़ दिलवा लेता और इद्दत के बाद निकाह कर लेता. यह बात न तो शरअई तौर पर नाजायज़ है न उस ज़माने की रस्म और आदत के ख़िलाफ़, लेकिन नबियों की शान बहुत ऊंची होती है इसलिये यह आपके ऊंचे मन्सब के लायक़ न था तो अल्लाह की मर्ज़ी यह हुई कि आपको इसपर आगाह किया जाए और उसका सबब यह पैदा किया कि फ़रिश्ते मुद्दई और मुद्दआ अलैह की शक्ल में आपके सामने पेश हुए. इस से मालूम हुआ कि अगर बुज़ु्र्गों से कोई लग़ज़िश सादिर हो और कोई बात शान के ख़िलाफ़ वाक़े हो जाए तो अदब यह है कि आलोचनात्मक ज़बान न खोली जाए बल्कि इस वाक़ए जैसा एक वाक़ए की कल्पना करके उसकी निस्बत जानकारी हासिल करने के लिये सवाल किया जाए और उनके आदर और सम्मान का भी ख़याल रखा जाए और यह भी मालूम हुआ कि अल्लाह तआला मालिको मौला अपने नबियों की ऐसी इज़्ज़त  फ़रमाता है कि उनको किसी बात पर आगाह करने के लिये फ़रिश्तों को इस तरीक़े पर अदब के साथ हाज़िर होने का हुक्म देता है.

तो हममें सच्चा फ़ैसला फ़रमा दीजिये और हक़ के ख़िलाफ़ न कीजिये(15)
(15) जिसकी ग़लती हो, बेझिझक फ़रमा दीजिये.

और हमें सीधी राह बताइये {22} बेशक यह मेरा भाई है (16)
(16) यानी दीनी भाई.

इसके पास निन्यानवे दुंबियां है और मेरे पास एक दुंबी, अब यह कहता है वह भी मुझे हवाले कर दे और बात में मुझ पर ज़ोर डालता है{23} दाऊद ने फ़रमाया बेशक यह तुझ पर ज़ियादती करता है कि तेरी दुंबी अपनी दुंबियों में मिलाने को मांगता है, और बेशक अक्सर साझे वाले एक दूसरे पर ज़ियादती करते हैं मगर जो ईमान लाए और अच्छे काम किये और वो बहुत थोड़े हैं(17)
(17) हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की यह बात सुनकर फ़रिश्तों में से एक ने दूसरे की तरफ़ देखा और मुस्कुरा के वो आसमान की तरफ़ रवाना हो गए.

अब दाऊद समझा कि हमने यह उसकी जांच की थी(18)
(18) और दुम्बी एक किनाया था जिस से मुराद औरत थी क्योंकि निनानवें औरतें आपके पास होते हुए एक और औरत की आपने ख़्वाहिश की थी इसलिये दुम्बी के पैराए में सवाल किया गया जब आपने यह समझा.

तो अपने रब से माफ़ी मांगी और सज्दे में गिर पड़ा (19)
(19) इस आयत से साबित होता है कि नमाज़ में रूकू करना तिलावत के सज्दे के क़ायम मुक़ाम हो जाता है जब कि नियत की जाए.

और रूजू लाया {24} तो हमने उसे यह माफ़ फ़रमाया, और बेशक उसके लिये हमारी बारगाह में ज़रूर नज़्दीकी और अच्छा ठिकाना है {25} ऐ दाऊद बेशक हमने तुझे ज़मीन में नायब किया(20)
(20) ख़ल्क़ की तदबीर पर आपको मामूर किया और आपका हुक्म उनमें नाफ़िज़ फ़रमाया.

तो लोगों में सच्चा हुक्म कर और ख़्वाहिश के पीछे न जाना कि तुझे अल्लाह की राह से बहका देगी बेशक वो जो अल्लाह की राह से बहकाते हैं उन के लिये सख़्त अज़ाब है इस पर कि वो हिसाब के दिन को भूल बैठे(21){26}
(21) और इस वजह से ईमान से मेहरूम रहे. अगर उन्हें हिसाब के दिन का यक़ीन होता तो दुनिया ही में ईमान ले आते.