57-Surah Al-Hadeed

57 सूरए हदीद -दूसरा रूकू

57|11|مَّن ذَا الَّذِي يُقْرِضُ اللَّهَ قَرْضًا حَسَنًا فَيُضَاعِفَهُ لَهُ وَلَهُ أَجْرٌ كَرِيمٌ
57|12|يَوْمَ تَرَى الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ يَسْعَىٰ نُورُهُم بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَبِأَيْمَانِهِم بُشْرَاكُمُ الْيَوْمَ جَنَّاتٌ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا ۚ ذَٰلِكَ هُوَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ
57|13|يَوْمَ يَقُولُ الْمُنَافِقُونَ وَالْمُنَافِقَاتُ لِلَّذِينَ آمَنُوا انظُرُونَا نَقْتَبِسْ مِن نُّورِكُمْ قِيلَ ارْجِعُوا وَرَاءَكُمْ فَالْتَمِسُوا نُورًا فَضُرِبَ بَيْنَهُم بِسُورٍ لَّهُ بَابٌ بَاطِنُهُ فِيهِ الرَّحْمَةُ وَظَاهِرُهُ مِن قِبَلِهِ الْعَذَابُ
57|14|يُنَادُونَهُمْ أَلَمْ نَكُن مَّعَكُمْ ۖ قَالُوا بَلَىٰ وَلَٰكِنَّكُمْ فَتَنتُمْ أَنفُسَكُمْ وَتَرَبَّصْتُمْ وَارْتَبْتُمْ وَغَرَّتْكُمُ الْأَمَانِيُّ حَتَّىٰ جَاءَ أَمْرُ اللَّهِ وَغَرَّكُم بِاللَّهِ الْغَرُورُ
57|15|فَالْيَوْمَ لَا يُؤْخَذُ مِنكُمْ فِدْيَةٌ وَلَا مِنَ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ مَأْوَاكُمُ النَّارُ ۖ هِيَ مَوْلَاكُمْ ۖ وَبِئْسَ الْمَصِيرُ
57|16|۞ أَلَمْ يَأْنِ لِلَّذِينَ آمَنُوا أَن تَخْشَعَ قُلُوبُهُمْ لِذِكْرِ اللَّهِ وَمَا نَزَلَ مِنَ الْحَقِّ وَلَا يَكُونُوا كَالَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ مِن قَبْلُ فَطَالَ عَلَيْهِمُ الْأَمَدُ فَقَسَتْ قُلُوبُهُمْ ۖ وَكَثِيرٌ مِّنْهُمْ فَاسِقُونَ
57|17|اعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ يُحْيِي الْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا ۚ قَدْ بَيَّنَّا لَكُمُ الْآيَاتِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
57|18|إِنَّ الْمُصَّدِّقِينَ وَالْمُصَّدِّقَاتِ وَأَقْرَضُوا اللَّهَ قَرْضًا حَسَنًا يُضَاعَفُ لَهُمْ وَلَهُمْ أَجْرٌ كَرِيمٌ
57|19|وَالَّذِينَ آمَنُوا بِاللَّهِ وَرُسُلِهِ أُولَٰئِكَ هُمُ الصِّدِّيقُونَ ۖ وَالشُّهَدَاءُ عِندَ رَبِّهِمْ لَهُمْ أَجْرُهُمْ وَنُورُهُمْ ۖ وَالَّذِينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِآيَاتِنَا أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ الْجَحِيمِ

कौन है जो अल्लाह को क़र्ज़ दे अच्छा क़र्ज़(1)
(1) यानी ख़ुशदिली के साथ ख़ुदा की राह में ख़र्च करे. इस ख़र्च को इस मुनासिबत से फ़र्ज़ फ़रमाया गया है कि इसपर जन्नत का वादा फ़रमाया गया है.

तो वह उस के लिये दूने करे और उसको इज़्ज़त का सवाब है{11} जिस दिन तुम ईमान वाले मर्दों और ईमान वाली औरतों को(2)
(2) पुले सिरात पर.

देखोगे कि उनका नूर है 3)
(3) यानी उनके ईमान और ताअत का नूर.

उनके आगे और उनके दाएं दौड़ता है (4)
(4) और जन्नत की तरफ़ उनका मार्गदर्शन करता है.

उनसे फ़रमाया जा रहा है कि आज तुम्हारी सब से ज़्यादा ख़ुशी की बात वो जन्नतें हैं जिनके नीचे नेहरें बहें, तुम उनमें हमेशा रहो यही बड़ी कामयाबी है {12} जिस दिन मुनाफ़िक़ (दोग़ले) मर्द और मुनाफ़िक़ औरतें मुसलमानों से कहेंगे कि हमें एक निगाह देखो कि हम तुम्हारे नूर से कुछ हिस्सा लें, कहा जाएगा अपने पीछे लौटो (5)
(5) जहाँ से आए थे यानी हश्र के मैदान की तरफ़ जहाँ हमें नूर दिया गया वहाँ नूर तलब करो या ये मानी हैं कि तुम हमारा नूर नहीं पा सकते, नूर की तलब के लिये पीछे लौट जाओ फिर वो नूर की तलाश में वापस होंगे और कुछ न पाएंगे तो दोबारा मूमिनीन की तरफ़ फिरेंगे.

वहाँ नूर ढूंढो वो लौटेंगे, जभी उनके (6)
(6) यानी मूमिनीन और मुनाफ़िक़ीन के.

बीच दीवार खड़ी कर दी जाएगी(7)
(7) कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा कि वही अअराफ़ है.

जिसमें एक दरवाज़ा है(8)
(8) उससे जन्नती जन्नत में दाख़िल होंगे.

उसके अन्दर की तरफ़ रहमत (9)
(9) यानी उस दीवार के अन्दूरूनी जानिब जन्नत.

और उसके बाहर की तरफ़ अज़ाब {13} मुनाफ़िक़ (10)
(10) उस दीवार के पीछे से.

मुसलमानों को पुकारेंगे क्या हम तुम्हारे साथ न थे(11)
(11) दुनिया में नमाज़ें पढ़ते, रोज़ा रखते.

वो कहेंगे क्यों नहीं मगर तुमने तो अपनी जानें फ़ित्ने में डालीं(12)
(12) दोग़लेपन और कुफ़्र को अपना कर.

और मुसलमानों की बुराई तकते और शक रखते (13)
(13)इस्लाम में.

और झूटे लालच ने तुम्हें धोखा दिया(14)
(14) और तुम बातिल उम्मीदों में रहे कि मुसलमानों पर हादसे आएंगे, वो तबाह हो जाएंगे.

यहाँ तक कि अल्लाह का हुक्म आ गया (15)
(15)यानी मौत.

और तुम्हें अल्लाह के हुक्म पर उस बड़े फ़रेबी ने घमण्डी रखा(16){14}
(16) यानी शैतान ने धोखा दिया कि अल्लाह तआला बड़ा हिलम वाला है तुम पर अज़ाब न करेगा और न मरने के बाद उठना न हिसाब. तुम उसके इस फ़रेब में आ गए.

तो आज न तुमसे कोई फ़िदिया लिया जाए(17)
(17) जिसको देकर तुम अपनी जानें अज़ाब से छुड़ा सको. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया मानी ये हैं कि आज न तुम से ईमान क़ुबूल किया जाए, न तौबह.

और न खुले काफ़िरों से, तुम्हारा ठिकाना आग है, वह तुम्हारी रफ़ीक़ है, और क्या ही बुरा अंजाम {15} क्या ईमान वालों को अभी वह वक़्त न आया कि उनके दिल झुक जाएं अल्लाह की याद और उस हक़ के लिये जो उतरा (18)
(18) हज़रत उम्मुल मूमिनीन आयशा सिद्दीक़ा रदियल्लाहो अन्हा से रिवायत है कि नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम दौलतसरा से बाहर तशरीफ़ लाए तो मुसलमानों को देखा कि आपस में हंस रहे हैं फ़रमाया तुम हंसते हो, अभी तक तुम्हारे रब की तरफ़ से अमान नहीं आई और तुम्हारे हंसने पर यह आयत उतरी. उन्होंने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, इस हंसी का कफ़्फ़ारा क्या है? फ़रमाया इतना ही रोना. और उतरने वाले हक़ से मुराद क़ुरआन शरीफ़ है.

और उन जैसे न हों जिन को पहले किताब दी गई (19)
(19)यानी यहूदी और ईसाईयों के तरीक़े इख़्तियार न करें.

फिर उन पर मुद्दत दराज़ हुई(20)
(20) यानी वह ज़माना जो उनके और उन नबियों के बीच था.

तो उनके दिल सख़्त हो गए(21)
(21) और अल्लाह की याद के लिये नर्म न हुए दुनिया की तरफ़ माइल हो गए और नसीहतों उपदेशों से मुंह फेरा.

और उनमें बहुत फ़ासिक़ हैं(22){16}
(22) दीन से निकल जाने वाले.

जान लो कि अल्लाह ज़मीन को ज़िन्दा करता है उसके मरे पीछे,(23)
(23) मेंह बरसाकर सब्ज़ा उगा कर. बाद इसके कि ख़ुश्क हो गई थी. ऐसे ही दिलों को सख़्त हो जाने के बाद नर्म करता है और उन्हें इल्म व हिकमत से ज़िन्दगी अता फ़रमाता है. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि यह मिसाल है ज़िक्र के दिलों में असर करने की जिस तरह बारिश से ज़मीन को ज़िन्दगी हासिल होती है ऐसे ही अल्लाह के ज़िक्र से दिल ज़िन्दा होते हैं.

बेशक हमने तुम्हारे लिये निशानियाँ, बयान फ़रमा दीं कि तुम्हें समझ हो {17} बेशक सदक़ा देने वाले मर्द और सदक़ा देने वाली औरतें और वो जिन्हों ने अल्लाह को अच्छा क़र्ज़ दिया(24)
(24) यानी ख़ुशदिली और नेक नियत के साथ मुस्तहिक़्क़ों को सदक़ा दिया और ख़ुदा की राह में ख़र्च किया.

उनके दूने हैं और उनके लिये इज़्ज़त का सवाब है(25){18}
(25) और वह जन्नत है.

और वो जो अल्लाह और उसके सब रसूलों पर ईमान लाएं वही हैं पूरे सच्चे और औरों पर(26)
(26) गुज़री हुई उम्मतों में से.

गवाह अपने रब के यहाँ, उनके लिये उनका सवाब(27)
(27) जिसका वादा किया गया.

और उनका नूर है(28)और जिन्होंने कुफ़्र किया और हमारी आयतें झुटलाईं दोज़ख़ी हैं {19}
(28) जो हश्र में उनके साथ होगा.

Advertisements

52 Surah-At-Tur

52 सूरए तूर -दूसरा रूकू

52|29|فَذَكِّرْ فَمَا أَنتَ بِنِعْمَتِ رَبِّكَ بِكَاهِنٍ وَلَا مَجْنُونٍ
52|30|أَمْ يَقُولُونَ شَاعِرٌ نَّتَرَبَّصُ بِهِ رَيْبَ الْمَنُونِ
52|31|قُلْ تَرَبَّصُوا فَإِنِّي مَعَكُم مِّنَ الْمُتَرَبِّصِينَ
52|32|أَمْ تَأْمُرُهُمْ أَحْلَامُهُم بِهَٰذَا ۚ أَمْ هُمْ قَوْمٌ طَاغُونَ
52|33|أَمْ يَقُولُونَ تَقَوَّلَهُ ۚ بَل لَّا يُؤْمِنُونَ
52|34|فَلْيَأْتُوا بِحَدِيثٍ مِّثْلِهِ إِن كَانُوا صَادِقِينَ
52|35|أَمْ خُلِقُوا مِنْ غَيْرِ شَيْءٍ أَمْ هُمُ الْخَالِقُونَ
52|36|أَمْ خَلَقُوا السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ ۚ بَل لَّا يُوقِنُونَ
52|37|أَمْ عِندَهُمْ خَزَائِنُ رَبِّكَ أَمْ هُمُ الْمُصَيْطِرُونَ
52|38|أَمْ لَهُمْ سُلَّمٌ يَسْتَمِعُونَ فِيهِ ۖ فَلْيَأْتِ مُسْتَمِعُهُم بِسُلْطَانٍ مُّبِينٍ
52|39|أَمْ لَهُ الْبَنَاتُ وَلَكُمُ الْبَنُونَ
52|40|أَمْ تَسْأَلُهُمْ أَجْرًا فَهُم مِّن مَّغْرَمٍ مُّثْقَلُونَ
52|41|أَمْ عِندَهُمُ الْغَيْبُ فَهُمْ يَكْتُبُونَ
52|42|أَمْ يُرِيدُونَ كَيْدًا ۖ فَالَّذِينَ كَفَرُوا هُمُ الْمَكِيدُونَ
52|43|أَمْ لَهُمْ إِلَٰهٌ غَيْرُ اللَّهِ ۚ سُبْحَانَ اللَّهِ عَمَّا يُشْرِكُونَ
52|44|وَإِن يَرَوْا كِسْفًا مِّنَ السَّمَاءِ سَاقِطًا يَقُولُوا سَحَابٌ مَّرْكُومٌ
52|45|فَذَرْهُمْ حَتَّىٰ يُلَاقُوا يَوْمَهُمُ الَّذِي فِيهِ يُصْعَقُونَ
52|46|يَوْمَ لَا يُغْنِي عَنْهُمْ كَيْدُهُمْ شَيْئًا وَلَا هُمْ يُنصَرُونَ
52|47|وَإِنَّ لِلَّذِينَ ظَلَمُوا عَذَابًا دُونَ ذَٰلِكَ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَهُمْ لَا يَعْلَمُونَ
52|48|وَاصْبِرْ لِحُكْمِ رَبِّكَ فَإِنَّكَ بِأَعْيُنِنَا ۖ وَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ حِينَ تَقُومُ
52|49|وَمِنَ اللَّيْلِ فَسَبِّحْهُ وَإِدْبَارَ النُّجُومِ

तो ऐ मेहबूब तुम नसीहत फ़रमाओ (1)
(1) मक्के के काफ़िरों को और उनके तांत्रिक और दीवाना कहने की वजह से आप नसीहत से बाज़ न रहें इसलिये.

कि तुम अपने रब के फ़ज़्ल से न काहिन हो न मजनून {29} या कहते हैं (2)
(2) ये मक्के के काफ़िर आपकी शान में.

ये शायर हैं हमे इन पर ज़माने के हादसों का इन्तिज़ार है(3){30}
(3) कि जैसे इनसे पहले शायर मर गए और उनके जत्थे टूट गए यही हाल इनका होना है (मआज़ल्लाह) और वो काफ़िर यह भी कहते थे इनके वालिद की मौत जवानी में हुई है इन की भी ऐसी ही होगी. अल्लाह तआला अपने हबीब से फ़रमाता है.

तुम फ़रमाओ इन्तिज़ार किये जाओ (4)
(4) मेरी मौत का.

मैं भी तुम्हारे इन्तिज़ार में हूँ (5){31}
(5) कि तुम पर अल्लाह का अज़ाब आए. चुनांन्चे यह हुआ और वो काफ़िर बद्र में क़त्ल और क़ैद के अज़ाब में गिरफ़्तार किये गए.

क्या उनकी अक़्लें उन्हें यही बताती हैं(6)
(6) जो वो हुज़ूर की शान में कहते हैं शायर, जादूगर तांत्रिक, ऐसा कहना बिल्कुल अक़्ल के ख़िलाफ़ है और मज़े की बात यह कि पागल भी कहते जाएं और शायर और तांत्रिक भी और फिर अपने अक़्ल वाले होने का दावा.

या वो सरकश लोग हैं(7){32}
(7) कि दुश्मनीं में अंधे हो रहे हैं और कुफ़्र और सरकशी में हद से गुज़र गए.

या कहते हैं उन्होंने (8)
(8) यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने अपने दिल से.

यह क़ुरआन बना लिया बल्कि वो ईमान नहीं रखते(9){33}
(9) और दुश्मनी और नफ़्स की बुराई से ऐसा बुरा भला कहते हैं. अल्लाह तआला उनपर हुज्जत क़ायम फ़रमाता है कि अगर उनके ख़याल में क़ुरआन जैसा कलाम कोई इन्सान बना सकता है.

तो उस जैसी एक बात तो ले आएं(10)
(10) वो हुस्नो ख़ूबी और फ़साहत व बलाग़त में इसकी तरह हो.

अगर सच्चे हैं {34} क्या वो किसी अस्ल से न बनाए गए(11)
(11) यानी क्या वो माँ बाप से पैदा नहीं हुए. पत्थर बेजान, बेअक़्ल हैं जिनपर हुज्जत क़ायम न की जाएगी. ऐसा नहीं. मानी ये हैं कि क्या वो नुत्फ़े से पैदा नहीं हुए और क्या उन्हें ख़ुदा ने नहीं बनाया.

या वही बनाने वाले हैं(12){35}
(12) कि उन्होंने अपने आपको ख़ुद ही बना लिया हो, यह भी मुहाल है. तो लामुहाला उन्हें इक़रार करना पड़ेगा कि उन्हें अल्लाह तआला ने ही पैदा किया और क्या कारण है कि वो उसकी इबादत नहीं करते और बुतों को पूजते हैं.

या आसमान और ज़मीन उन्हीं ने पैदा किये(13)
(13) यह भी नहीं और अल्लाह तआला के सिवा आसमान और ज़मीन पैदा करने की कोई क़ुदरत नहीं रखता तो क्या उसकी इबादत नहीं करते.

बल्कि उन्हें यक़ीन नहीं(14) {36}
(14) अल्लाह तआला की तौहीद और उसकी क़ुदरत और ख़ालिक़ होने का. अगर इसका यक़ीन होता तो ज़रूर उसके नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाते.

या उनके पास तुम्हारे रब के ख़ज़ाने हैं(15)
(15) नबुव्वत और रिज़्क़ वग़ैरह के कि उन्हें इख़्तियार हो जहाँ चाहे ख़र्च करें और जिसे चाहे दें.

या वो करोड़े (बड़े हाकिम) हैं(16){37}
(16) ख़ुद- मुख़्तार, जो चाहे करें कोई पूछने वाला नहीं.

या उनके पास कोई ज़ीना है(17)
(17) आसमान की तरफ़ लगा हुआ.

जिसमें चढ़कर सुन लेते हैं(18)
(18) और उन्हे मालूम हो जाता है कि कौन पहले हलाक होगा और किसकी फ़त्ह होगी. अगर इसका दावा हो.

तो उनका सुनने वाला कोई रौशन सन्द लाए {38} क्या उसको बेटियाँ और तुम को बेटे(19){39}
(19) यह उनकी मूर्खता का बयान है कि अपने लिये तो बेटे पसन्द करते हैं और अल्लाह तआला की तरफ़ बेटियों की निस्बत करते हैं. जिनको बुरा जानते हैं.

या तुम उनसे (20)
(20) दीन की तालीम पर.

कुछ उजरत (मजदूरी) मांगते हो तो वो चिट्टी के बोझ में दबे हैं(21){40}
(21) और तावान की ज़ेरबारी के कारण इस्लाम नहीं लाते. यह भी तो नहीं है, फिर इस्लाम लाने में उन्हें क्या उज्र है.

या उनके पास ग़ैब हैं जिससे वो हुक्म लगाते हैं (22){41}
(22) कि मरने के बाद न उठेंगे और उठे भी तो अज़ाब न किये जाएंगे, यह बात भी नहीं है.

किसी दाँव के इरादे में हैं(23)
(23) दारून नदवा में जमा होकर अल्लाह तआला के नबी हादिये बरहक़ सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को तकलीफ़ें देने और उनके क़त्ल के षडयंत्र रचाते हैं.

तो काफ़िरों ही पर दाँव पड़ना है(24){42}
(24) उनके छलकपट का वबाल उन्हीं पर पड़ेगा. चुनांन्चे ऐसा ही हुआ अल्लाह तआला ने अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को उनके छलकपट से मेहफ़ूज़ रखा और उन्हें बद्र में हलाक किया.

या अल्लाह के सिवा उनका कोई और ख़ुदा है(25)
(25) जो उन्हें रोज़ी दे और अल्लाह के अज़ाब से बचा सके.

अल्लाह को पाकी उनके शिर्क से {43} और अगर आसमान से कोई टुकड़ा गिरते देखें तो कहेंगे तह ब तह बादल है (26) {44}
(26) यह जवाब है काफ़िरों के उस क़ौल का जो कहते थे कि हम पर आसमान का कोई टुकड़ा गिरा कर अज़ाब कीजिये. अल्लाह तआला उसी के जवाब में फ़रमाता है कि उनका कुफ़्र और दुश्मनी इस हद पर पहुंच गई हैं कि अगर उनपर ऐसा ही किया जाए कि आसमान का कोई टुकड़ा गिरा दिया जाए और आसमान से उसे गिरते हुए देखें तो भी कुफ़्र से बाज़ न आएं और दुश्मनी से यही कहें कि यह तो बादल है इससे हमें पानी मिलेगा.

तो तुम उन्हें छोड़ दो यहाँ तक कि वो अपने उस दिन से मिलें जिसमें बेहोश होंगे(27){45}
(27) इससे मुराद सूर के पहली बार फ़ूंके जाने का दिन है.
जिस दिन उनका दाँव कुछ काम न देगा और न उनकी मदद हो(28){46}
(28) ग़रज़ किसी तरह अज़ाबे आख़िरत से बच न सकेंगे.

और बेशक ज़ालिमों के लिये इससे पहले एक अज़ाब है(29)
(29) उनके कुफ़्र के कारण अज़ाबे आख़िरत से पहले और वह अज़ाब या तो बद्र से क़त्ल होना है या भूख़ और दुष्काल की सात साल की मुसीबत या क़ब्र का अज़ाब.

मगर उनमें अक्सर को ख़बर नहीं(30){47}
(30) कि वो अज़ाब में मुब्तिला होने वाले हैं.

और ऐ मेहबूब, तुम अपने रब के हुक्म पर ठहरे रहो(31)
(31) और जो मोहलत उन्हें दी गई है उस पर दिल तंग न हो.
कि बेशक तुम हमारी निगहदाश्त में हो(32)
(32) तुम्हें वो कुछ नुक़सान नहीं पहुंचा सकते.

और अपने रब की तारीफ़ करते हुए उसकी पाकी बोलो जब तुम खड़े हो(33){48}
(33) नमाज़ के लिये. इससे पहली तकबीर के बाद सना यानी सुब्हानकल्लाहुम्मा पढ़ना मुराद है या ये मानी हैं कि जब सोकर उठो तो अल्लाह तआला की हम्द और तस्बीह किया करो या ये मानी हैं कि हर मजलिस से उठते वक़्त हम्द व तस्बीह बजा लाया करो.

और कुछ रात में उसकी पाकी बोलों और तारों के पीठ देते(34){49}
(34) यानी तारो के छुपने के बाद. मुराद यह है कि उन औक़ात में अल्लाह तआला की तस्बीह और तारीफ़ करो. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि तस्बीह से मुराद नमाज़ है.

43 सूरए ज़ुख़रूफ़

43 सूरए ज़ुख़रूफ़

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ حم
وَالْكِتَابِ الْمُبِينِ
إِنَّا جَعَلْنَاهُ قُرْآنًا عَرَبِيًّا لَّعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
وَإِنَّهُ فِي أُمِّ الْكِتَابِ لَدَيْنَا لَعَلِيٌّ حَكِيمٌ
أَفَنَضْرِبُ عَنكُمُ الذِّكْرَ صَفْحًا أَن كُنتُمْ قَوْمًا مُّسْرِفِينَ
وَكَمْ أَرْسَلْنَا مِن نَّبِيٍّ فِي الْأَوَّلِينَ
وَمَا يَأْتِيهِم مِّن نَّبِيٍّ إِلَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ
فَأَهْلَكْنَا أَشَدَّ مِنْهُم بَطْشًا وَمَضَىٰ مَثَلُ الْأَوَّلِينَ
وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّنْ خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ لَيَقُولُنَّ خَلَقَهُنَّ الْعَزِيزُ الْعَلِيمُ
الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ الْأَرْضَ مَهْدًا وَجَعَلَ لَكُمْ فِيهَا سُبُلًا لَّعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ
وَالَّذِي نَزَّلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً بِقَدَرٍ فَأَنشَرْنَا بِهِ بَلْدَةً مَّيْتًا ۚ كَذَٰلِكَ تُخْرَجُونَ
وَالَّذِي خَلَقَ الْأَزْوَاجَ كُلَّهَا وَجَعَلَ لَكُم مِّنَ الْفُلْكِ وَالْأَنْعَامِ مَا تَرْكَبُونَ
لِتَسْتَوُوا عَلَىٰ ظُهُورِهِ ثُمَّ تَذْكُرُوا نِعْمَةَ رَبِّكُمْ إِذَا اسْتَوَيْتُمْ عَلَيْهِ وَتَقُولُوا سُبْحَانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَٰذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ
وَإِنَّا إِلَىٰ رَبِّنَا لَمُنقَلِبُونَ
وَجَعَلُوا لَهُ مِنْ عِبَادِهِ جُزْءًا ۚ إِنَّ الْإِنسَانَ لَكَفُورٌ مُّبِينٌ

सूरए ज़ुख़रूफ़ मक्का में उतरी, इसमें 89 आयतें, सात रूकू हैं.
 -पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए ज़ुख़रूफ़ मक्के में उतरी. इस में सात रूकू, नवासी आयतें, और तीन हज़ार चार सौ अक्षर हैं.

हा-मीम {1} रौशन किताब की क़सम (2){2}
(2) यानी क़ुरआन शरीफ़ की, जिसमें हिदायत और गुमराही की राहें अलग अलग और साफ़ कर दीं और उम्मत की सारी शरई ज़रूरतों का बयान फ़रमा दिया.

हमने इसे अरबी क़ुरआन उतारा कि तुम समझो(3) {3}
(3) उसके मानी और आदेशों को.

और बेशक यह अस्ल किताब में(4)
(4) अस्ल किताब से मुराद लौहे मेहफ़ूज़ है. क़ुरआने करीम इसमें दर्ज है.

हमारे पास ज़रूर बलन्दी व हिकमत (बोध) वाला है {4} तो क्या हम तुम से ज़िक्र का पहलू फेर दें इस पर कि तुम लोग हद से बढ़ने वाले हो (5){5}
(5) यानी तुम्हारे कुफ़्र में हद से बढ़ने की वजह से क्या हम तुम्हें बेकार छोड़ दें और तुम्हारी तरफ़ से क़ुरआन की वही का रूख़ फेर दें और तुम्हें न कोई हुक्म दे और न किसी बात से रोकें. मानी ये है कि हम ऐसा न करेंगे. हज़रत क़तादह ने कहा कि ख़ुदा की क़सम अगर यह क़ुरआने पाक उठा लिया जाता उस वक़्त जबकि इस उम्मत के पहले लोगों ने इस से मुंह फेरा था तो वो सब हलाक हो जाते लेकिन उसने अपनी रहमत और करम से इस क़ुरआन का उतारना जारी रखा.

और हमने कितने ही ग़ैब बताने वाले (नबी) अगलों में भेजे{6} और उनके पास जो ग़ैब बताने वाला (नबी) आया उसकी हंसी ही बनाया किये(6) {7}
(6) जैसा कि आपकी क़ौम के लोग करते  हैं.  काफ़िरों का पहले से यह मामूल चला आया है.

तो हमने वो हलाक कर दिये जो उनसे भी पकड़ में सख़्त थे और अगलों का हाल गुज़र चुका है(7){8}
(7) और हर तरह का ज़ोर व क़ुव्वत रखते थे. आपकी उम्मत के लोग जो पहले के काफ़िरों की चालें चलते हैं उन्हे डरना चाहिये कि कहीं उनका भी वही अंजाम न हो जो उनका हुआ कि ज़िल्लत और रूस्वाई की मुसीबतों से हलाक किये गए.

और अगर तुम उनसे पूछो(8)
(8) यानी मुश्रिक लोगों से.

कि आसमान और ज़मीन किसने बनाए तो ज़रूर कहेंगे उन्हें बनाया उस इज़्ज़त वाले इल्म वाले ने(9){9}
(9) यानी इक़रार करेंगे कि आसमान व ज़मीन को अल्लाह तआला ने बनाया और यह भी मानेंगे कि वह इज़्जत और इल्म वाला है. इस इक़रार के बावुजूद दोबारा उठाए जाने का इन्कार कैसी इन्तिहा दर्जे की जिहालत है. इस के बाद अल्लाह तआला अपनी क़ुदरत के इज़हार के लिये अपनी सृजन-शक्ति का ज़िक्र फ़रमाता है और अपने औसाफ़ और शान का इज़हार करता है.

वह जिसने तुम्हारे लिये ज़मीन को बिछौना किया और तुम्हारे लिये उसमें रास्ते किये कि तुम राह पाओ (10){10}
(10) सफ़रों में अपनी मंज़िलों और उद्देश्यों की तरफ़.

और वह जिसने आसमान से पानी उतारा एक अन्दाज़े से,(11)
(11) तुम्हारी हाजतों की क़द्र, न इतना कम कि उससे तुम्हारी हाजतें पूरी न हों न इतना ज़्यादा कि क़ौमे नूह की तरह तुम्हें हलाक कर दे.

तो हमने उस से एक मुर्दा शहर ज़िन्दा फ़रमा दिया, यूं ही तुम निकाले जाओगे(12) {11}
(12) अपनी क़ब्रों से ज़िन्दा करके.

और जिसने सब जोड़े बनाए (13)
(13) यानी सारी अस्नाफ़ और क़िस्में. कहा गया है कि अल्लाह तआला तन्हा है, ज़िद और बराबरी और ज़ौजियत से पाक है उसके सिवा ख़ल्क़ में जो है, जोड़े से है.

और तुम्हारे लिये किश्तियाँ और चौपायों से सवारियाँ बनाई {12} कि तुम उनकी पीठों पर ठीक बैठो(14)
(14) ख़ुश्की और तरी के सफ़र में.

फिर अपने रब की नेअमत याद करो जब उस पर ठीक बैठ लो और यूं कहो पाकी है उसे जिसने इस सवारी को हमारे बस में कर दिया और यह हमारे बूते की न थी {13} और बेशक हमें अपने रब की तरफ़ पलटना है (15) {14}
(15) अन्त में, मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम जब सफ़र में तशरीफ़ ले जाते तो अपनी ऊंटनी पर सवार होते वक़्त पहले अल्हम्दु लिल्लाह पढ़ते फिर सुब्हानल्लाह और अल्लाहो अकबर. ये सब तीन तीन बार फिर यह आयत पढ़ते “सुब्हानल्लज़ी सख़्ख़रा लना हाज़ा व मा कुन्ना लहू मुक़रिनीन, व इन्ना इला रब्बिना ल मुन्क़लिबून” यानी पाकी है उसे जिसने इस सवारी को हमारे बस में कर दिया और यह हमारे बूते न थी और बेशक हमें अपने रब की तरफ़ पलटना है. (सूरए ज़ुख़रूफ़, आयत 13) और इसके बाद और दुआएं पढ़ते और जब हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम किश्ती में सवार होते तो फ़रमाते “बिस्मिल्लाहे मजरीहा व मुरसाहा इन्ना रब्बी ल ग़फ़ूरूर रहीम”यानी अल्लाह के नाम पर उसका चलना और उसका ठहरना बेशक मेरा रब ज़रूर बख़्शने वाला मेहरबान है. (सूरए हूद, आयत 41)

और उसके लिये उसके बन्दों में से टुकड़ा ठहराया, (16)
(16) यानी काफ़िरों ने इस इक़रार के बावुजूद कि अल्लाह तआला आसमान व ज़मीन का ख़ालिक़ है यह सितम किया कि फ़रिश्तों को अल्लाह तआला की बेटियाँ बताया और औलाद साहिबे औलाद का हिस्सा होती है. ज़ालिमों ने अल्लाह तआला के लिये हिस्सा क़रार दिया कैसा भारी जुर्म है.

बेशक आदमी (17)
(17) जो ऐसी बातों को मानता है.

खुला नाशुक्रा है (18) {15}
(18) उसका कुफ़्र ज़ाहिर है.

40 सूरए मूमिन -दूसरा रूकू

40 सूरए मूमिन -दूसरा रूकू

إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا يُنَادَوْنَ لَمَقْتُ اللَّهِ أَكْبَرُ مِن مَّقْتِكُمْ أَنفُسَكُمْ إِذْ تُدْعَوْنَ إِلَى الْإِيمَانِ فَتَكْفُرُونَ
قَالُوا رَبَّنَا أَمَتَّنَا اثْنَتَيْنِ وَأَحْيَيْتَنَا اثْنَتَيْنِ فَاعْتَرَفْنَا بِذُنُوبِنَا فَهَلْ إِلَىٰ خُرُوجٍ مِّن سَبِيلٍ
ذَٰلِكُم بِأَنَّهُ إِذَا دُعِيَ اللَّهُ وَحْدَهُ كَفَرْتُمْ ۖ وَإِن يُشْرَكْ بِهِ تُؤْمِنُوا ۚ فَالْحُكْمُ لِلَّهِ الْعَلِيِّ الْكَبِيرِ
هُوَ الَّذِي يُرِيكُمْ آيَاتِهِ وَيُنَزِّلُ لَكُم مِّنَ السَّمَاءِ رِزْقًا ۚ وَمَا يَتَذَكَّرُ إِلَّا مَن يُنِيبُ
فَادْعُوا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ وَلَوْ كَرِهَ الْكَافِرُونَ
رَفِيعُ الدَّرَجَاتِ ذُو الْعَرْشِ يُلْقِي الرُّوحَ مِنْ أَمْرِهِ عَلَىٰ مَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ لِيُنذِرَ يَوْمَ التَّلَاقِ
يَوْمَ هُم بَارِزُونَ ۖ لَا يَخْفَىٰ عَلَى اللَّهِ مِنْهُمْ شَيْءٌ ۚ لِّمَنِ الْمُلْكُ الْيَوْمَ ۖ لِلَّهِ الْوَاحِدِ الْقَهَّارِ
الْيَوْمَ تُجْزَىٰ كُلُّ نَفْسٍ بِمَا كَسَبَتْ ۚ لَا ظُلْمَ الْيَوْمَ ۚ إِنَّ اللَّهَ سَرِيعُ الْحِسَابِ
وَأَنذِرْهُمْ يَوْمَ الْآزِفَةِ إِذِ الْقُلُوبُ لَدَى الْحَنَاجِرِ كَاظِمِينَ ۚ مَا لِلظَّالِمِينَ مِنْ حَمِيمٍ وَلَا شَفِيعٍ يُطَاعُ
يَعْلَمُ خَائِنَةَ الْأَعْيُنِ وَمَا تُخْفِي الصُّدُورُ
وَاللَّهُ يَقْضِي بِالْحَقِّ ۖ وَالَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِهِ لَا يَقْضُونَ بِشَيْءٍ ۗ إِنَّ اللَّهَ هُوَ السَّمِيعُ الْبَصِيرُ

बेशक जिन्होंने कुफ़्र किया उनको निदा की जाएगी(1)
(1) क़यामत के दिन जबकि वो जहन्नम में दाख़िल होंगे और उनकी बदियाँ उनपर पेश की जाएंगी और वो अज़ाब देखेंगे तो फ़रिश्ते उनसे कहेंगे.

कि ज़रूर तुमसे अल्लाह की बेज़ारी इससे बहुत ज़्यादा है जैसे तुम आज अपनी जान से बेज़ार हो जबकि तुम(2)
(2) दुनिया में.

ईमान की तरफ़ बुलाए जाते तो तुम कुफ़्र करते{10} कहेंगे ऐ हमारे रब तूने हमें दोबारा मुर्दा किया और दोबारा ज़िन्दा किया(3)
(3) क्योंकि पहले बेजान नुत्फ़ा थे, इस मौत के बाद उन्हें जान देकर ज़िन्दा किया, फिर उम्र पूरी होने पर मौत दी, दोबारा उठाने के लिये ज़िन्दा किया.

अब हम अपने गुनाहों पर मुक़िर हुए (अड़ गए) तो आग से निकलने की भी कोई राह है(4){11}
(4) उसका जवाब यह होगा कि तुम्हारे दोज़ख़ से निकलने का कोई रास्ता नहीं और तुम जिस हाल में हो, जिस अज़ाब में गिरफ़्तार हो, और उससे रिहाई की कोई राह नहीं पा सकते.

यह उस पर हुआ कि जब एक अल्लाह पुकारा जाता तो तुम कुफ़्र करते(5)
(5) यानी इस अज़ाब और इसकी हमेशगी का कारण तुम्हारा यह कर्म है कि जब अल्लाह की तौहीद का ऐलान होता और लाइलाहा इल्लल्लाहो कहा जाता तो तुम उसका इन्कार करते और कुफ़्र इख़्तियार करते.

और उस का शरीक ठहराया जाता तो तुम मान लेते(6)
(6) और इस शिर्क की तस्दीक़ करते.

तो हुक्म अल्लाह के लिये है जो सब से बलन्द बड़ा {12} वही है कि तुम्हें अपनी निशानियां दिखाता है(7)
(7) यानी अपनी मसनूआत के चमत्कार जो उसकी भरपूर क़ुदरत के प्रमाण है जैसे हवा और बादल और बिजली वग़ैरह.

और तुम्हारे लिये आसमान से रोज़ी उतारता है(8),
(8) मेंह बरसा कर.

और नसीहत नहीं मानता(9)
(9) और उन निशानियों से नसीहत हासिल नहीं करता.

मगर जो रूजू लाए(10){13}
(10) सारे कामों में अल्लाह तआला की तरफ़ और शिर्क से तौबह करे.

तो अल्लाह की बन्दगी करो निरे उसके बन्दे होकर(11)
(11) शिर्क से अलग होकर.

पड़े बुरा माने काफ़िर {14} बलन्द दर्जे देने वाला(12)
(12) नबियों, वलियों और उलमा को, जन्नम में.

अर्श का मालिक, ईमान की जान वही डालता है अपन हुक्म से अपने बन्दों में जिस पर चाहे(13)
(13) यानी अपने बन्दों में से जिसे चाहता है नबुव्वत की उपाधि अता करता है और जिसको नबी बनाता है उसका काम होता है.

कि वह मिलने के दिन से डराए(14) {15}
(14) यानी सृष्टि को क़यामत का ख़ौफ़ दिलाए जिस दिन आसमान और ज़मीन वाले और अगले पिछले मिलेंगे और आत्माएं शरीरों से और हर कर्म करने वाला अपने कर्म से मिलेगा.

जिस दिन वो बिल्कुल ज़ाहिर हो जाएंगे(15)
(15)क़ब्रों से निकल कर और कोई ईमारत या पहाड़ और छुपने की जगह और आड़ न पाएंगे.

अल्लाह पर उनका कुछ हाल छुपा न होगा(16)
(16) न कहनी न करनी, न दूसरे हालात और अल्लाह तआला से तो कोई चीज़ कभी नहीं छुप सकती लेकिन यह दिन ऐसा होगा कि उन लोगों के लिये कोई पर्दा और आड़ की चीज़ न होगी जिसके ज़रिये से वो अपने ख़याल में भी अपने हाल को छुपा सके, और सृष्टि के नाश के बाद अल्लाह तआला फ़रमाएगा.

आज किस की बादशाही है (17)
(17) अब कोई न होगा कि जवाब दे. ख़ुद ही जवाब में फ़रमाएगा कि अल्लाह वाहिद व क़हहार की. और एक क़ौल यह है कि क़यामत के दिन जब सारे अगले पिछले हाज़िर होंगे तो एक पुकारने वाला पुकारेगा, आज किसकी बादशाही है? सारी सृष्टि जवाब देगी “लिल्लाहिल वाहिदिल क़हहार”  अल्लाह वाहिद व क़हहार की जैसा कि आगे इरशाद होता है.

एक अल्लाह सब पर ग़ालिब की(18) {16}
(18) मूमिन तो यह जवाब बहुत मज़े के साथ अर्ज़ करेंगे क्योंकि वो दुनिया में यही अक़ीदा रखते थे. यही कहते थे और इसी की बदौलत उन्हें दर्जे मिले और काफ़िर ज़िल्लत और शर्मिन्दगी के साथ इसका इक़रार करेंगे और दुनिया में अपने इन्कारी रहने पर लज्जित होंगे.

आज हर जान अपने किये का बदला पाएगी (19)
(19) नेक अपनी नेकी का और बद अपनी बदी का.

आज किसी पर ज़ियादती नहीं, बेशक अल्लाह जल्द हिसाब लेने वाला है {17} और उन्हें डराओ उस नज़्दीक आने वाली आफ़त के दिन से(20)
(20) इससे क़यामत का दिन मुराद है.

जब दिल गलों के पास आ जाएंगे(21)
(21) ख़ौफ़ की सख़्ती से न बाहर ही निकल सकें न अन्दर ही अपनी जगह वापस जा सकें.

ग़म में भरे, और ज़ालिमों का न कोई दोस्त न कोई सिफ़रिशी जिस का कहा माना जाए(22){18}
(22) यानी काफ़िर शफ़ाअत से मेहरूम होंगे.

अल्लाह जानता है चोरी छुपे की निगाह(23)
(23) यानी निगाहों की ख़यानत और चोरी, ना-मेहरम को देखना और मना की हुई चीज़ों पर नज़र डालना.

और जो कुछ सीनों में छुपा है(24){19}
(24)यानी दिलों के राज़, सब चीजें अल्लाह तआला के इल्म में हैं.

और अल्लाह सच्चा फ़ैसला फ़रमाता है और उसके सिवा जिनको(25)
(25) यानी जिन बुतों को ये मुश्रिक लोग.

पूजते हैं वो कुछ फ़ैसला नहीं करते(26) ,
(26) क्योंकि न वो इल्म रखते हैं न क़ुदरत, तो उनकी इबादत करना और उन्हें ख़ुदा का शरीक ठहराना बहुत ही खुला हुआ असत्य है.

बेशक अल्लाह ही सुनता और देखता है(27) {20}
(27) अपनी मख़लुक़ की कहनी व करनी और सारे हालात को.

40 सूरए मूमिन -पाँचवाँ रूकू

40 सूरए मूमिन -पाँचवाँ रूकू

وَقَالَ الَّذِي آمَنَ يَا قَوْمِ اتَّبِعُونِ أَهْدِكُمْ سَبِيلَ الرَّشَادِ
يَا قَوْمِ إِنَّمَا هَٰذِهِ الْحَيَاةُ الدُّنْيَا مَتَاعٌ وَإِنَّ الْآخِرَةَ هِيَ دَارُ الْقَرَارِ
مَنْ عَمِلَ سَيِّئَةً فَلَا يُجْزَىٰ إِلَّا مِثْلَهَا ۖ وَمَنْ عَمِلَ صَالِحًا مِّن ذَكَرٍ أَوْ أُنثَىٰ وَهُوَ مُؤْمِنٌ فَأُولَٰئِكَ يَدْخُلُونَ الْجَنَّةَ يُرْزَقُونَ فِيهَا بِغَيْرِ حِسَابٍ
۞ وَيَا قَوْمِ مَا لِي أَدْعُوكُمْ إِلَى النَّجَاةِ وَتَدْعُونَنِي إِلَى النَّارِ
تَدْعُونَنِي لِأَكْفُرَ بِاللَّهِ وَأُشْرِكَ بِهِ مَا لَيْسَ لِي بِهِ عِلْمٌ وَأَنَا أَدْعُوكُمْ إِلَى الْعَزِيزِ الْغَفَّارِ
لَا جَرَمَ أَنَّمَا تَدْعُونَنِي إِلَيْهِ لَيْسَ لَهُ دَعْوَةٌ فِي الدُّنْيَا وَلَا فِي الْآخِرَةِ وَأَنَّ مَرَدَّنَا إِلَى اللَّهِ وَأَنَّ الْمُسْرِفِينَ هُمْ أَصْحَابُ النَّارِ
فَسَتَذْكُرُونَ مَا أَقُولُ لَكُمْ ۚ وَأُفَوِّضُ أَمْرِي إِلَى اللَّهِ ۚ إِنَّ اللَّهَ بَصِيرٌ بِالْعِبَادِ
فَوَقَاهُ اللَّهُ سَيِّئَاتِ مَا مَكَرُوا ۖ وَحَاقَ بِآلِ فِرْعَوْنَ سُوءُ الْعَذَابِ
النَّارُ يُعْرَضُونَ عَلَيْهَا غُدُوًّا وَعَشِيًّا ۖ وَيَوْمَ تَقُومُ السَّاعَةُ أَدْخِلُوا آلَ فِرْعَوْنَ أَشَدَّ الْعَذَابِ
وَإِذْ يَتَحَاجُّونَ فِي النَّارِ فَيَقُولُ الضُّعَفَاءُ لِلَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا إِنَّا كُنَّا لَكُمْ تَبَعًا فَهَلْ أَنتُم مُّغْنُونَ عَنَّا نَصِيبًا مِّنَ النَّارِ
قَالَ الَّذِينَ اسْتَكْبَرُوا إِنَّا كُلٌّ فِيهَا إِنَّ اللَّهَ قَدْ حَكَمَ بَيْنَ الْعِبَادِ
وَقَالَ الَّذِينَ فِي النَّارِ لِخَزَنَةِ جَهَنَّمَ ادْعُوا رَبَّكُمْ يُخَفِّفْ عَنَّا يَوْمًا مِّنَ الْعَذَابِ
قَالُوا أَوَلَمْ تَكُ تَأْتِيكُمْ رُسُلُكُم بِالْبَيِّنَاتِ ۖ قَالُوا بَلَىٰ ۚ قَالُوا فَادْعُوا ۗ وَمَا دُعَاءُ الْكَافِرِينَ إِلَّا فِي ضَلَالٍ

और वह ईमान वाला बोला ऐ मेरी क़ौम मेरे पीछे चलो मैं तुम्हें भलाई की राह बताऊं {38} ऐ मेरी क़ौम यह दुनिया का जीना तो कुछ बरतना ही है(1)
(1) यानी थोड़ी मुद्दत के लिये नापायदार नफ़ा है जो बाक़ी रहने वाला नहीं है.

और बेशक वह पिछला हमेशा रहने का घर है(2){39}
(2) मुराद यह है कि दुनिया नष्ट हो जाने वाली है और आख़िरत बाक़ी रहने वाली, सदा ज़िन्दा रहने वाली और सदा ज़िन्दा रहना ही बेहतर. इसके बाद अच्छे और बुरे कर्मों और उनके परिणामों का बयान किया.

जो बुरा काम करे तो उसे बदल न मिलेगा मगर उतना ही और जो अच्छा काम करे मर्द चाहे औरत और हो मुसलमान(3)
(3) क्योंकि कर्मों की मक़बूलियत ईमान पर आधारित है.

तो वो जन्नत में दाख़िल किये जाएंगे वहाँ बेगिनती रिज़्क़ पाएंगे(4) {40}
(4) यह अल्लाह तआला की भारी मेहरबानी है.

और ऐ मेरी क़ौम मुझे क्या हुआ मैं तुम्हें बुलाता हूँ निजात की तरफ़  (5)
(5) जन्नत की तरफ़, ईमान और फ़रमाँबरदारी की सीख देकर.

और तुम मुझे बुलाते हो दोज़ख़ की तरफ़(6) {41}
(6) कुफ़्र और शिर्क की दावत देकर.

मुझे उस तरफ़ बुलाते हो कि अल्लाह का इन्कार करूं और ऐसे को उसका शरीक करूं जो मेरे इल्म में नहीं, और मैं तुम्हें उस इज़्ज़त वाले बहुत बख़्शने वाले की तरफ़ बुलाता हूँ {42} आप ही साबित हुआ कि जिसकी तरफ़ मुझे बुलाते हो(7)
(7) यानी बुत की तरफ़.

उसे बुलाना कहीं काम का नहीं दुनिया में न आख़िरत में(8)
(8) क्योंकि वह बेजान पत्थर है.

और यह हमारा फिरना अल्लाह की तरफ़ है(9)
(9) वही हमें जज़ा देगा.

और यह कि हद से गुज़रने वाले(10)
(10) यानी काफ़िर.

ही दोज़ख़ी हैं {43} तो जल्द वह वक़्त आता है कि जो मैं तुम से कह रहा हूँ उसे याद करोगे (11)
(11) यानी अज़ाब उतरने के वक़्त तुम मेरी नसीहतें याद करोगे और उस वक़्त का याद करना कुछ काम न आएगा. यह सुनकर उन लोगों ने उस मूमिन को धमकाया कि अगर तू हमारे दीन की मुख़ालिफ़त करेगा तो हम तेरे साथ बुरे पेश आएंगे. इसके जवाब में उसने कहा.

और मैं अपने काम अल्लाह को सौंपता हूँ, बेशक अल्लाह बन्दों को देखता है(12) {44}
(12) और उनके कर्मों और हालतों को जानता है. फिर वह मूमिन उन में से निकल कर पहाड़ की तरफ़ चला गया और वहाँ नमाज़ में मश्ग़ूल हो गया. फ़िरऔन ने हज़ार आदमी उसे ढूंढने को भेजे. अल्लाह तआला ने ख़तरनाक जानवर उसकी हिफ़ाज़त पर लगा दिये. जो फ़िरऔनी उसकी तरफ़ आया, जानवरों ने उसे हलाक किया और जो वापस गया और उसने फ़िरऔन से हाल बयान किया. फ़िरऔन ने उसे सूली दे दी ताकि यह हाल मशहूर न हो.

तो अल्लाह ने उसे बचा लिया उनके मक्र (कपट) की बुराईयों से(13)
(13) और उसने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के साथ होकर निजात पाई अगरचे वह फ़िरऔन की क़ौम का था.

और फ़िरऔन वालों को बुरे अज़ाब ने आ घेरा(14) {45}
(14) दुनिया में यह अज़ाब कि वह फ़िरऔन के साथ ग़र्क़ हो गए और आख़िरत में दोज़ख़.

आग जिसपर सुब्ह शाम पेश किये जाते हैं(15)
(15) उसमें जलाए जाते हैं. हज़रत इब्ने मसऊद रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया फ़िरऔनियों की रूहें काले पक्षियों के शरीर में हर दिन दो बार सुब्ह शाम आग पर पेश की जाती है. और उनसे कहा जाता है कि यह आग तुम्हारा ठिकाना है और क़यामत तक उनके साथ यही मअमूल रहेगा. इस आयत से क़ब्र के अज़ाब के सुबूत पर इस्तदलाल किया जाता है. बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है कि हर मरने वाले पर उसका मक़ाम सुब्ह शाम पेश किया जाता है, जन्नती पर जन्नत का और जहन्नमी पर जहन्नम का और उससे कहा जाता है कि यह तेरा ठिकाना है, जब कि कि क़यामत के दिन अल्लाह तआला तुझे इसकी तरफ़ उठाए.

और जिस दिन क़यामत क़ायम होगी, हुक्म होगा, फ़िरऔन वालों को सख़्त तर अज़ाब में दाख़िल करो {46} और(16)
(16) ज़िक्र फ़रमाइये ऐ नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अपनी क़ौम से जहन्नम के अन्दर काफ़िरों के आपस में झगड़ने का हाल कि—-

जब वो आग में आपस में झगड़ेंगे तो कमज़ोर उनसे कहेंगे जो बड़े बनते थे हम तुम्हारे ताबे(अधीन) थे (17)
(17) दुनिया में और तुम्हारी बदौलत की काफ़िर बने.

तो क्या तुम हमसे आग का कोई हिस्सा घटा लोगे {47} वो तकब्बुर (घमण्ड) वाले बोले(18)
(18) यानी काफ़िरों के सरदार जवाब देंगे.

हम सब आग में हैं(19)
(19) हर एक अपनी मुसीबत में गिरफ़्तार, हम में से कोई किसी के काम नहीं आ सकता.

बेशक अल्लाह बन्दों में फ़ैसला फ़रमा चुका(20){48}
(20) ईमानदारों को उसने जन्नत में दाख़िल कर दिया और काफ़िरों को जहन्नम में. जो होना था हो चुका.

और जो आग में हैं उसके दारोग़ों से बोले अपने रब से दुआ करो हम पर अज़ाब का एक दिन हल्का कर दे(21){49}
(21) यानी दुनिया के एक दिन के बराबर हमारे अज़ाब में कमी रहे.

उन्होंने कहा क्या तुम्हारे पास तुम्हारे रसूल रौशन निशानियाँ न लाते थे(22)
(22) क्या उन्होंने खुले चमत्कार पेश न किये थे यानी अब तुम्हारे लिये बहानों की कोई जगह बाक़ी न रही.

बोले क्यों नहीं(23)
(23) यानी काफ़िर नबियों के आने और अपने कुफ़्र का इक़रार करेंगे.

बोले तो तुम्हीं दुआ करो(24) और काफ़िरों की दुआ नहीं मगर भटकते फिरने को{50}
(24) हम काफ़िर के हक़ में दुआ न करेंगे और तुम्हारा दुआ करना भी बेकार है.

34 सूरए सबा- दूसरा रूकू

34  सूरए सबा- दूसरा रूकू

۞ وَلَقَدْ آتَيْنَا دَاوُودَ مِنَّا فَضْلًا ۖ يَا جِبَالُ أَوِّبِي مَعَهُ وَالطَّيْرَ ۖ وَأَلَنَّا لَهُ الْحَدِيدَ
أَنِ اعْمَلْ سَابِغَاتٍ وَقَدِّرْ فِي السَّرْدِ ۖ وَاعْمَلُوا صَالِحًا ۖ إِنِّي بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ
وَلِسُلَيْمَانَ الرِّيحَ غُدُوُّهَا شَهْرٌ وَرَوَاحُهَا شَهْرٌ ۖ وَأَسَلْنَا لَهُ عَيْنَ الْقِطْرِ ۖ وَمِنَ الْجِنِّ مَن يَعْمَلُ بَيْنَ يَدَيْهِ بِإِذْنِ رَبِّهِ ۖ وَمَن يَزِغْ مِنْهُمْ عَنْ أَمْرِنَا نُذِقْهُ مِنْ عَذَابِ السَّعِيرِ
يَعْمَلُونَ لَهُ مَا يَشَاءُ مِن مَّحَارِيبَ وَتَمَاثِيلَ وَجِفَانٍ كَالْجَوَابِ وَقُدُورٍ رَّاسِيَاتٍ ۚ اعْمَلُوا آلَ دَاوُودَ شُكْرًا ۚ وَقَلِيلٌ مِّنْ عِبَادِيَ الشَّكُورُ
فَلَمَّا قَضَيْنَا عَلَيْهِ الْمَوْتَ مَا دَلَّهُمْ عَلَىٰ مَوْتِهِ إِلَّا دَابَّةُ الْأَرْضِ تَأْكُلُ مِنسَأَتَهُ ۖ فَلَمَّا خَرَّ تَبَيَّنَتِ الْجِنُّ أَن لَّوْ كَانُوا يَعْلَمُونَ الْغَيْبَ مَا لَبِثُوا فِي الْعَذَابِ الْمُهِينِ
لَقَدْ كَانَ لِسَبَإٍ فِي مَسْكَنِهِمْ آيَةٌ ۖ جَنَّتَانِ عَن يَمِينٍ وَشِمَالٍ ۖ كُلُوا مِن رِّزْقِ رَبِّكُمْ وَاشْكُرُوا لَهُ ۚ بَلْدَةٌ طَيِّبَةٌ وَرَبٌّ غَفُورٌ
فَأَعْرَضُوا فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ سَيْلَ الْعَرِمِ وَبَدَّلْنَاهُم بِجَنَّتَيْهِمْ جَنَّتَيْنِ ذَوَاتَيْ أُكُلٍ خَمْطٍ وَأَثْلٍ وَشَيْءٍ مِّن سِدْرٍ قَلِيلٍ
ذَٰلِكَ جَزَيْنَاهُم بِمَا كَفَرُوا ۖ وَهَلْ نُجَازِي إِلَّا الْكَفُورَ
وَجَعَلْنَا بَيْنَهُمْ وَبَيْنَ الْقُرَى الَّتِي بَارَكْنَا فِيهَا قُرًى ظَاهِرَةً وَقَدَّرْنَا فِيهَا السَّيْرَ ۖ سِيرُوا فِيهَا لَيَالِيَ وَأَيَّامًا آمِنِينَ
فَقَالُوا رَبَّنَا بَاعِدْ بَيْنَ أَسْفَارِنَا وَظَلَمُوا أَنفُسَهُمْ فَجَعَلْنَاهُمْ أَحَادِيثَ وَمَزَّقْنَاهُمْ كُلَّ مُمَزَّقٍ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّكُلِّ صَبَّارٍ شَكُورٍ
وَلَقَدْ صَدَّقَ عَلَيْهِمْ إِبْلِيسُ ظَنَّهُ فَاتَّبَعُوهُ إِلَّا فَرِيقًا مِّنَ الْمُؤْمِنِينَ
وَمَا كَانَ لَهُ عَلَيْهِم مِّن سُلْطَانٍ إِلَّا لِنَعْلَمَ مَن يُؤْمِنُ بِالْآخِرَةِ مِمَّنْ هُوَ مِنْهَا فِي شَكٍّ ۗ وَرَبُّكَ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ حَفِيظٌ

और बेशक हमने दाऊद को अपना बड़ा फ़ज़्ल (कृपा) दिया(1)
(1) यानी नबुव्वत और किताब, और कहा गया है कि मुल्क और एक क़ौल यह है कि सौंदर्य वग़ैरह तमाम चीज़ें जो आपको विशेषता के साथ अता फ़रमाई गई, और अल्लाह तआला ने पहाड़ों और पक्षियों को हुक्म दिया.

ऐ पहाड़ों उस के साथ अल्लाह की तरफ़ रूजू करो और ऐ परिन्दो(2)
(2) जब वो तस्बीह करें, उनके साथ तस्बीह करो. चुनांन्चे जब हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम तस्बीह करते तो पहाड़ों से भी तस्बीह सुनी जाती थी और पक्षी झुक आते, यह आपका चमत्कार था.

और हमने उसके लिये लोहा नर्म किया(3){10}
(3) कि आपके मुबारक हाथ में आकर मोम या गूंधे आटे की तरह नर्म हो जाता हो और आप उससे जो चाहते बग़ैर आग और बिना ठोँके पीटे बना लेते. इसका कारण यह बयान किया गया है कि जब आप बनी इस्राईल के बादशाह हुए तो आपका तरीक़ा यह था कि आप लोगों के हालात की खोज में इस तरह निकलते कि वो आपको पहचानें नहीं और जब कोई मिलता और आपको न पहचानता तो उससे आप पूछते कि दाऊद कैसा व्यक्ति है. सब लोग तारीफ़ करते. अल्लाह तआला ने एक फ़रिश्ता इन्सान की सूरत भेजा. हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम ने अपनी आदत के अनुसार उससे भी यही सवाल किया तो फ़रिश्ते ने कहा कि दाऊद हैं तो बहुत अच्छे, काश उनमें एक ख़सलत न होती. इसपर आप चौकन्ने हुए और फ़रमाया ऐ ख़ुदा के बन्दे कौन सी ख़सलत ? उसने कहा कि वह अपना और अपने घर वालों का खर्च बेतुलमाल यानी सरकारी ख़ज़ाने से लेते हैं.  यह सुनकर आपके ख़याल में आया कि अगर आप बैतूल माल से वज़ीफ़ा न लेते तो ज़्यादा बेहतर होता. इसलिये आपने अल्लाह की बारगाह में दुआ की कि उनके लिये कोई ऐसा साधन कर दे जिससे आप अपने घर वालों का गुज़ारा करें और शाही ख़ज़ाने से आपको बेनियाज़ी हो जाए. आपकी यह दुआ क़ुबूल हुई और अल्लाह तआला ने आपके लिये लौहे को नर्म कर दिया और आपको ज़िरह बनाने का इल्म दिया. सबसे पहले ज़िरह बनाने वाले आप ही हैं. आप रोज़ एक ज़िरह बनाते थे. वह चार हज़ार की बिकती थी. उसमें से अपने और घर वालों पर भी ख़्रर्च फ़रमाते और फ़क़ीरों और दरिद्रों पर भी सदक़ा करते. इसका बयान आयत में है, अल्लाह तआला फ़रमाता है कि हमने दाऊद के लिये लोहा नर्म करके उनसे फ़रमाया.

कि वसीअ (बड़ी) ज़िरहें बना और बनाने में अन्दाज़े का लिहाज़ रख (4)
(4) कि उसके छल्ले एक से और मध्यम हो, न बहुत तंग न बहुत चौड़े.

और तुम सब नेकी करो,  बेशक मैं तुम्हारे काम देख रहा हूँ {11} और सुलैमान के बस में हवा कर दी उसकी सुब्ह की मंज़िल एक महीने की राह और शाम की मंज़िल एक महीने की राह(5)
(5) चुनांन्चे आप सुब्ह को दमिश्क़ से रवाना होते तो दोपहर को खाने के बाद का आराम उस्तख़ूर में फ़रमाते जो फ़ारस प्रदेश में है और दमिश्क़ से एक महीने की राह पर और शाम को उस्तख़ूर से रवाना होते तो रात को काबुल में आराम फरमाते, यह भी तेज़ सवार के लिये एक माह का रस्ता है.

और हमने उसके लिये पिघले हुए तांबे का चश्मा बहाया(6)
(6) जो तीन रोज़ यमन प्रदेश में पानी की तरह जारी रहा और एक क़ौल् यह है कि हर माह में तीन रोज़ जारी रहता और एक क़ौल यह है कि अल्लाह तआला ने हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम के लिये तांबे को पिघला दिया जैसा कि हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम के लिये लौहे को नर्म किया था.

और जिन्नों में से वो जो उसके आगे काम करते उसके रब के हुक्म से(7)
(7) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम के लिये जिन्नों को मुतीअ किया.

और उनमें जो हमारे हुक्म से फिरे (8)
(8) और हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम की फ़रमाँबरदारी न करे.

हम उसे भड़कती आग का अज़ाब चखाएंगे {12} उसके लिये बनाते जो वह चाहता ऊंचे ऊंचे महल(9)
(9) और आलीशान इमारतें और मस्जिदें, और उन्हीं में से बैतुल मक़दिस भी है.

और तस्वीरें(10)
(10) दरिन्दों और पक्षियों वग़ैरह की तांबे और बिल्लौर और पत्थर वग़ैरह से, और उस शरीअत में तस्वीरें बनाना हराम न था.

और बड़े हौज़ों के बराबर लगन(11)
(11) इतने बड़े कि एक लगन में हज़ार हज़ार आदमी खाते.

और लंगरदार देंगे (12)
(12) जो अपने पायों पर क़ायम थीं और बहुत बड़ी थीं, यहाँ तक कि अपनी जगह से हटाई नहीं जा सकती थी. सीढियाँ लगाकर उनपर चढ़ते थे. ये यमन में थीं. अल्लाह तआला फ़रमाता है कि हमने फ़रमाया कि….

ऐ दाऊद वालो शुक्र करो(13)
(13) अल्लाह तआला का उन नेअमतों पर जो उसने तुम्हें अता फ़रमाई, उसकी फ़रमाँबरदारी करके.

और मेरे बन्दों में कम हैं शुक्र वाले {13} फिर जब हमने उस पर मौत का हुक्म भेजा (14)
(14) हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम ने अल्लाह की बारगाह में दुआ की थी कि उनकी वफ़ात का हाल  जिन्नों पर ज़ाहिर न हो ताकि इन्सानों को मालूम हो जाए कि जिन्न ग़ैब नहीं जानते. फिर आप मेहराब में दाख़िल हुए और आदत के अनुसार नमाज़ के लिये अपनी लाठी पर टेक लगाकर खड़े हो गए. जिन्नात हस्बे दस्तूर अपने कामें में लगे रहे और समझते रहे कि हज़रत जिन्दा हैं. और हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम का लम्बे अर्से तक उसी हालत पर रहना उनके लिये कुछ आश्चर्य का कारण न हुआ क्योंकि वो अक्सर देखते थे कि आप एक माह दो माह और इससे ज़्यादा समय तक इबादत में मशग़ूल रहते हैं और आपकी नमाज़ लम्बी होती है यहाँ तक कि आपकी वफ़ात का पता न चला और अपनी ख़िदमतों में लगे रहे यहाँ  तक कि अल्लाह के हुक्म से दीमक ने आपकी लाठी खा ली और आपका मुबारक जिस्म, जो लाठी के सहारे से क़ायम था, ज़मीन पर आ रहा. उस वक़्त जिन्नात को आपकी वफ़ात की जानकारी हुई.

जिन्नों को उसकी मौत न बताई मगर ज़मीन की दीमक ने कि उसका असा खाती थी, फिर जब सुलैमान ज़मीन पर आया जिन्नों की हक़ीक़त खुल गई(15)
(15) कि वो ग़ैब नहीं जानते.

अगर ग़ैब जानते होते(16)
(16) तो हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम की वफ़ात से सूचित होते.

तो इस ख़्वारी के अज़ाब में न होते(17){14}
(17) और एक साल तक इमारत के कामों में कठिन परिश्रम न करते रहते. रिवायत है कि हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम ने बैतुल मक़दिस की नीव उस स्थान पर रखी थी जहाँ हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का ख़ैमा लगाया गया था. इस इमारत के पूरा होने से पहले हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की वफ़ात का वक़्त आ गया तो आपने अपने सुपुत्र हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम को इसके पूरा करने की वसीयत फ़रमाई. चुनांन्चे आपने शैतानों को इसके पूरा करने का हुक्म दिया. जब आपकी वफ़ात का वक़्त क़रीब पहुंचा तो आपने दुआ की कि आपकी वफ़ात शैतानों पर ज़ाहिर न हो ताकि वो इमारत के पूरा होने तक काम में लगे रहे और उन्हें जो इल्मे ग़ैब का दावा है वह झूठा हो जाए. हज़रत सुलैमान अलैहिस्सलाम की उम्र शरीफ़ तिरपन साल की हुई. तेरह साल की उम्र में आप तख़्त पर जलवा अफ़रोज़ हुए, चालीस साल राज किया.

बेशक सबा(18)
(18) सबा अरब का एक क़बीला है जो अपने दादा के नाम से मशहूर है और वह दादा सबा बिन यशजब बिन यअरब बिन क़हतान हैं.

के लिये उनकी आबादी में (19)
(19) जो यमन की सीमाओं में स्थित थी.

निशानी थी(20)
(20) अल्लाह तआला की वहदानियत और क़ुदरत पर दलील लाने वाली और वह निशानी क्या थी इसका आगे बयान होता है.

दो बाग़ दाएं और बाएं(21)
(21) यानी उनकी घाटी के दाएं और बाएं दूर तक चले गए और उनसे कहा गया था.

अपने रब का रिज़्क़ खाओ (22)
(22) बाग़ इतने अधिक फलदार थे कि जब कोई व्यक्ति सर पर टोकरा लिये गुज़रता तो बग़ैर हाथ लगाए तरह तरह के मेवों से उसका टोकरा भर जाता.

और उसका शुक्र अदा करो(23)
(23) यानी इस नेअमत पर उसकी ताअत बजा लाओ-

पाकीज़ा शहर और (24)
(24) अच्छी जलवायु, साफ़ सुथरी ज़मीन, न उसमें मच्छर, न मक्खी, न खटमल, न साँप, न बिच्छू, हवा की पाकीज़गी ऐसी कि अगर कहीं और का कोई व्यक्ति इस शहर में गुज़र जाए और उसके कपड़ों में जुएं हों तो सब मर जाएं. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि सबा शहर सनआ से तीन फ़रसंग के फ़ासले पर था.

बख़्शने वाला रब (25) {15}
(25)  यानी अगर तुम रब की रोज़ी पर शुक्र करो और ताअत बजा लाओ तो वह बख़्शिश फ़रमाने वाला है.

तो उन्हों ने मुंह फेरा(26)
(26)  उसकी शुक्रगुज़ारी से और नबियों को झुटलाया. वहब का क़ौल है कि अल्लाह तआला ने उनकी तरफ़ तेरह नबी भेजे जिन्होंने उनको सच्चाई की तरफ़ बुलाया और अल्लाह तआला की नेअमतें याद दिलाई और उसके अज़ाब से डराया मगर वो ईमान न लाए और उन्होंने नबियों को झुटलाया और कहा कि हम नहीं जानते कि हम पर ख़ुदा की कोई भी नेअमत हो. तुम अपने रब से कह दो कि उस से हो सके तो वो इन नेअमतों को रोक ले.

तो हमने उनपर ज़ोर का अहला (सैलाब) भेजा(27)
(27) बड़ी बाढ़ जिससे उनके बाग़, अमवाल, सब डूब गए और उनके मकान रेत में दफ़्न हो गए और इस तरह तबाह हुए कि उनकी तबाही अरब के लिये कहावत बन गई.

और उनके बाग़ों के एवज़ दो बाग़ उन्हें बदल दिये जिन में बकटा मेवा(28)
(28) अत्यन्त बुरे मज़े का.

और झाऊ और थोड़ी सी बेरियां(29) {16}
(29) जैसी वीरानों में जम आती हैं. इस तरह की झाड़ियों और भयानक जंगल को जो उनके सुन्दर बाग़ों की जगह पैदा हो गया था. उपमा के तौर पर बाग़ फ़रमाया.

हमने उन्हें यह बदला दिया उनकी नाशुक्री(30)
(30) और उनके कुफ्र.

की सज़ा, और हम किसे सज़ा देते हैं उसी को जो नाशुक्रा है {17} और हमने किये थे उनमें(31)
(31)यानी सबा शहर में.

और उन शहरों में जिन में हमने बरकत रखी(32)
(32) कि वहाँ रहने वालों को बहुत सी नेअमतें और पानी और दरख़्त और चश्मे इनायत किये. उन से मुराद शाम के शहर हैं.

सरे राह कितने शहर(33)
(33) क़रीब क़रीब, सबा से शाम तक के सफ़र करने वालों को उस राह में तोशे और पानी साथ लेजाने की ज़रूरत न होती.

और उन्हें मंज़िल के अन्दाज़े पर रखा(34)
(34) कि चलने वाला एक जगह से सुबह चले तो दोपहर को एक आबादी में पहुंच जाए जहाँ ज़रूरत के सारे सामान हों और जब दोपहर को चले तो शाम को एक शहर में पहुंच जाए. यमन से शाम तक का सारा सफ़र इसी आसायश के साथ तय हो सके और हमने उनसे कहा कि—-

उनमें चलो रातों और दिनों अम्न व अमान से(35) {18}
(35) न रातों में कोई खटका, न दिनों में कोई तकलीफ़. न दुश्मन का अन्देशा, न भूख प्यास का ग़म, मालदारों में हसद पैदा हुआ कि हमारे और ग़रीबों के बीच कोई फ़र्क़ ही न रहा, क़रीब क़रीब की मंज़िलें हैं, लोग धीमे हवा खोरी करते चले आते है. थोड़ी देर के बाद दूसरी आबादी आ जाती है. वहाँ आराम करते हैं, न सफ़र में थकन है, न कोफ़्त, अगर मंज़िलें दूर होतीं, सफ़र की मुद्दत लम्बी होती, राह में पानी न मिलता, जंगलों और बयाबानों में गुज़र होता, तो हम तोशा साथ लेते, पानी का प्रबन्ध करते, सवारियाँ और सेवक साथ रखते, सफ़र का मज़ा आता और अमीर ग़रीब का फर्क़ ज़ाहिर होता. यह ख़्याल करके उन्होंने कहा.

तो बोले ऐ हमारे रब हमारे सफ़र में दूरी डाल(36)
(36) यानी हमारे और शाम के बीच जंगल और बयाबान कर दे कि बग़ैर तोशे और सवारी के सफ़र न हो सके.

और उन्होंने ख़ुद अपना ही नुक़सान किया तो हमने उन्हें कहानियां कर दिया(37)
(37) बाद वालों के लिये कि उन के हालात से इब्रत हासिल करें.

और उन्हें पूरी परेशानी से परागन्दा कर दिया(38)
(38) क़बीला क़बीला बिखर गया, वो बस्तियाँ डूब गई और लोग बेघर होकर अलग अलग शहरों में पहुंचे. ग़स्सान शाम में और अज़ल अम्मान में और ख़ुज़ाजह तिहामा में और आले ख़ुज़ैमह इराक़ में और औस ख़जरिज का दादा अम्र बिन आमिर मदीने में.

बेशक उसमें ज़रूर निशानियां हैं हर बड़े सब्र वाले हर बड़े शुक्र वाले के लिये(39)  {19}
(39) और सब्र और शुक्र मूमिन की सिफ़त है कि जब वह बला में गिरफ़्तार होता है, सब्र करता है और जब नेअमत पाता है, शुक्र बजा लाता है.

और बेशक इबलीस ने उन्हें अपना गुमान सच कर दिखाया(40)
(40) यानी  इब्लीस जो गुमान रखता था कि बनी आदम को वह शहवत, लालच और ग़ज़ब के ज़रीये गुमराह कर देगा. यह गुमान उसने सबा प्रदेश वालों पर बल्कि सारे काफ़िरों पर सच्चा कर दिखाया कि वो उसके मानने वाले हो गए और उसकी फ़रमाँबरदारी करने लगे. हसन रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि शैतान ने ना किसी पर तलवार खींची ना किसी पर कोड़े मारे, झूटे वादों और बातिल आशाओ से झूट वालों को गुमराह कर दिया.

तो वो उसके पीछे हो लिये मगर एक गिरोह कि मुसलमान था(41){20}
(41) उन्होंने उसका अनुकरण न किया.

और शैतान का उनपर (42)
(42) जिनके हक़ में उसका गुमान पूरा हुआ.

कुछ क़ाबू न था मगर इसलिये कि हम दिखा दें कि कौन आख़िरत पर ईमान लाता है और कौन इससे शक में है, और तुम्हारा रब हर चीज़ पर निगहबान है{21}

34 सूरए सबा- तीसरा रूकू

34  सूरए सबा- तीसरा रूकू

قُلِ ادْعُوا الَّذِينَ زَعَمْتُم مِّن دُونِ اللَّهِ ۖ لَا يَمْلِكُونَ مِثْقَالَ ذَرَّةٍ فِي السَّمَاوَاتِ وَلَا فِي الْأَرْضِ وَمَا لَهُمْ فِيهِمَا مِن شِرْكٍ وَمَا لَهُ مِنْهُم مِّن ظَهِيرٍ
وَلَا تَنفَعُ الشَّفَاعَةُ عِندَهُ إِلَّا لِمَنْ أَذِنَ لَهُ ۚ حَتَّىٰ إِذَا فُزِّعَ عَن قُلُوبِهِمْ قَالُوا مَاذَا قَالَ رَبُّكُمْ ۖ قَالُوا الْحَقَّ ۖ وَهُوَ الْعَلِيُّ الْكَبِيرُ
۞ قُلْ مَن يَرْزُقُكُم مِّنَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۖ قُلِ اللَّهُ ۖ وَإِنَّا أَوْ إِيَّاكُمْ لَعَلَىٰ هُدًى أَوْ فِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ
قُل لَّا تُسْأَلُونَ عَمَّا أَجْرَمْنَا وَلَا نُسْأَلُ عَمَّا تَعْمَلُونَ
قُلْ يَجْمَعُ بَيْنَنَا رَبُّنَا ثُمَّ يَفْتَحُ بَيْنَنَا بِالْحَقِّ وَهُوَ الْفَتَّاحُ الْعَلِيمُ
قُلْ أَرُونِيَ الَّذِينَ أَلْحَقْتُم بِهِ شُرَكَاءَ ۖ كَلَّا ۚ بَلْ هُوَ اللَّهُ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ
وَمَا أَرْسَلْنَاكَ إِلَّا كَافَّةً لِّلنَّاسِ بَشِيرًا وَنَذِيرًا وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
وَيَقُولُونَ مَتَىٰ هَٰذَا الْوَعْدُ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
قُل لَّكُم مِّيعَادُ يَوْمٍ لَّا تَسْتَأْخِرُونَ عَنْهُ سَاعَةً وَلَا تَسْتَقْدِمُونَ

तुम फ़रमाओ (1)
(1) ऐ मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम! मक्कए मुकर्रमा के काफ़िरों से.

पुकारो उन्हें जिन्हें अल्लाह के सिवा(2)
(2) अपना मअबूद.

समझे बैठे हो(3)
(3) कि वो तुम्हारी मुसीबतें दूर करें लेकिन ऐसा नहीं हो सकता क्योंकि नफ़ा और नुक़सान में.

और वो ज़र्रा भर के मालिक नहीं आसमानों में और न ज़मीन में और न उनका इन दोनों में कुछ हिस्सा और न अल्लाह का उनमें से कोई मददगार {22} और उसके पास शफ़ाअत काम नहीं देती मगर जिसके लिये वह इ़ज्न (आज्ञा) फ़रमाए, यहाँ तक कि जब इज़्न देकर उनके दलों की घबराहट दूर फ़रमा दी जाती है एक दूसरे से (4)
(4) ख़ुशख़बरी के तौर पर

कहते हैं तुम्हारे रब ने क्या ही बात फ़रमाई, वो कहते हैं जो फ़रमाया हक़(सत्य) फ़रमाया (5){23}
(5) यानी शफ़ाअत करने वालों को ईमानदारों की शफ़ाअत की इजाज़त दी.

और वही है बलन्द बड़ाई वाला, तुम फ़रमाओ कौन जो तुम्हें रोज़ी देता है आसमानों और ज़मीन से(6)
(6) यानी आसमान से मेंह बरसा कर और ज़मीन से सब्ज़ा उगाकर.

तुम ख़ुद ही फ़रमाओ अल्लाह(7)
(7) क्योंकि इस सवाल का इसके सिवा और कोई जवाब ही नहीं.

और बेशक हम या तुम(8)
(8) यानी दोनों पक्षों में से हर एक के लिये इन दोनो हालों में से एक हाल ज़रूरी है.

या तो ज़रूर हिदायत पर हैं या खुली गुमराही में(9){24}
(9) और यह ज़ाहिर है कि वो शख़्स सिर्फ़ अल्लाह तआला को रोज़ी देने वाला, पानी बरसाने वाला, सब्ज़ा उगाने वाला जानते हुए भी बुतों को पूजे जो किसी एक कण भर चीज़ के मालिक नहीं (जैसा कि ऊपर की आयतों में बयान हो चुका), वो यक़ीनन खुली गुमराही में है.

तुम फ़रमाओ हमने तुम्हारे गुमान में अगर कोई जुर्म किया तो उसकी तुमसे पूछ नहीं न तुम्हारे कौतुकों का हमसे सवाल(10){25}
(10) बल्कि हर शख़्स से उसके अमल का सवाल होगा और हर एक अपने अमल की जज़ा पाएगा.

तो फ़रमाओ हमारा रब हम सब को जमा करेगा(11)
(11) क़यामत के दिन.

फिर हम में सच्चा फ़ैसला फ़रमा देगा(12)
(12) तो सच्चाई वालों को जन्नत में और बातिल वालों को जहन्नम में दाख़िल करेगा.

और वही है बड़ा न्याव चुकाने वाला सब कुछ जानता {26} तुम फ़रमाओ मुझे दिखाओ तो वो शरीक जो तुमने उससे मिलाए हैं (13)
(13) यानी जिन बुतों को तुमने इबादत में शरीक किया है, मुझे दिखाओ तो किस क़ाबिल हैं. क्या वो कुछ पैदा करते हैं, रोज़ी देते हैं, और जब यह कुछ नहीं तो उनको ख़ुदा का शरीक बनाना और उनकी इबादत करना कैसी भरी ख़ता है, उससे बाज़ आओ.

हिश्त, बल्कि वही है अल्लाह इज़्ज़त वाला हिकमत (बोध) वाला {27} और ऐ मेहबूब हमने तुमको न भेजा मगर ऐसी रिसालत से जो तमाम आदमियों को घेरने वाली है(14)
(14) इस आयत से मालूम हुआ कि हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की रिसालत सार्वजनिक है, सारे इन्सान उसके घेरे में हैं, गोरे हों या काले, अरबी हों या अजमी, पहले हों या पिछले, सब के लिये आप रसूल हैं और वो सब आपके उम्मती. बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम फ़रमाते हैं मुझे पाँच चीज़ें ऐसी अता फ़रमाई गई जो मुझसे पहले किसी नबी को न दी गई – एक माह की दुरी के रोअब से मेरी मदद की गई, तमाम ज़मीन मेरे लिय मस्जिद और पाक की गई कि जहाँ मेरे उम्मती को नमाज़ का वक़्त हो नमाज़ पढ़े और मेरे लिये ग़नीमतें हलाल की गईं जो मुझ से पहले किसी के लिये हलाल न थीं और मुझे शफ़ाअत का दर्जा अता किया गया. दूसरे नबी ख़ास अपनी क़ौम की तरफ़ भेजे जाते थे और मैं तमाम इन्सानों की सार्वजनिक रिसालत है जो तमाम जिन्न और इन्सानों को शामिल है. ख़ुलासा यह कि हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम तमाम सृष्टि के रसूल हैं और यह दर्जा ख़ास आपका है जो क़ुरआने करीम की आयतों और बहुत सी हदीसों से साबित है. सूरए फ़ुरक़ान के शुरू में भी इसका बयान गुज़र चुका है. (ख़ाज़िन)

ख़ुशख़बरी देता(15)
(15) ईमान वालों को अल्लाह तआला के फ़ज़्ल की.

और डर सुनाता(16)
(16) काफ़िरों को उसके इन्साफ़ का.

लेकिन बहुत लोग नहीं जानते(17){28}
(17) और अपनी जिहालत की वजह से आपकी मुख़ालिफ़त करते हैं.

और कहते हैं ये वादा कब आएगा (18)
(18) यानी क़यामत का वादा.

अगर तुम सच्चे हो {29} तुम फ़रमाओ तुम्हारे लिये एक ऐसे दिन का वादा जिससे तुम न एक घड़ी पीछे हट सको और न आगे बढ़ सको(19) {30}
(19) यानी अगर तुम मोहलत चाहो तो ताख़ीर संभव नहीं और अगर जल्दी चाहो तो पहल मुमकिन नहीं, हर हाल में इस वादे का अपने वक़्त पर पूरा होना.