51 Surah-Al-Zariyat

51 सूरए ज़ारियात

51|1|بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ وَالذَّارِيَاتِ ذَرْوًا
51|2|فَالْحَامِلَاتِ وِقْرًا
51|3|فَالْجَارِيَاتِ يُسْرًا
51|4|فَالْمُقَسِّمَاتِ أَمْرًا
51|5|إِنَّمَا تُوعَدُونَ لَصَادِقٌ
51|6|وَإِنَّ الدِّينَ لَوَاقِعٌ
51|7|وَالسَّمَاءِ ذَاتِ الْحُبُكِ
51|8|إِنَّكُمْ لَفِي قَوْلٍ مُّخْتَلِفٍ
51|9|يُؤْفَكُ عَنْهُ مَنْ أُفِكَ
51|10|قُتِلَ الْخَرَّاصُونَ
51|11|الَّذِينَ هُمْ فِي غَمْرَةٍ سَاهُونَ
51|12|يَسْأَلُونَ أَيَّانَ يَوْمُ الدِّينِ
51|13|يَوْمَ هُمْ عَلَى النَّارِ يُفْتَنُونَ
51|14|ذُوقُوا فِتْنَتَكُمْ هَٰذَا الَّذِي كُنتُم بِهِ تَسْتَعْجِلُونَ
51|15|إِنَّ الْمُتَّقِينَ فِي جَنَّاتٍ وَعُيُونٍ
51|16|آخِذِينَ مَا آتَاهُمْ رَبُّهُمْ ۚ إِنَّهُمْ كَانُوا قَبْلَ ذَٰلِكَ مُحْسِنِينَ
51|17|كَانُوا قَلِيلًا مِّنَ اللَّيْلِ مَا يَهْجَعُونَ
51|18|وَبِالْأَسْحَارِ هُمْ يَسْتَغْفِرُونَ
51|19|وَفِي أَمْوَالِهِمْ حَقٌّ لِّلسَّائِلِ وَالْمَحْرُومِ
51|20|وَفِي الْأَرْضِ آيَاتٌ لِّلْمُوقِنِينَ
51|21|وَفِي أَنفُسِكُمْ ۚ أَفَلَا تُبْصِرُونَ
51|22|وَفِي السَّمَاءِ رِزْقُكُمْ وَمَا تُوعَدُونَ
51|23|فَوَرَبِّ السَّمَاءِ وَالْأَرْضِ إِنَّهُ لَحَقٌّ مِّثْلَ مَا أَنَّكُمْ تَنطِقُونَ

सूरए ज़ारियात मक्के में उतरी, इसमें 60 आयतें, तीन रूकू हैं
-पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए ज़ारियात मक्की है इसमें तीन रूकू, साठ आयतें, तीन सौ साठ कलिमे और एक हज़ार दो सौ उन्त्तालीस अक्षर हैं.

क़सम उनकी जो बिखेर कर उड़ाने वालियाँ (2){1}
(2) यानी वो हवाएं जो ख़ाक वग़ैरह को उड़ाती हैं.

फिर बोझ उठाने वालियाँ (3){2}
(3) यानी वो घटाएं और बदलियाँ जो बारिश का पानी उठाती हैं.

फिर नर्म चलने वालियां (4){3}
(4) वो किश्तियाँ जो पानी में आसानी से चलती है.

फिर हुक्म से बाँटने वालियां (5){4}
(5) यानी फ़रिश्तों की वो जमाअतें जो अल्लाह के हुक्म से बारिश और रिज़्क़ वग़ैरह की तक़सीम करती हैं और जिनको अल्लाह तआला ने संसार का बन्दोबस्त करने पर लगाया है और इस दुनिया के निज़ाम को चलाने और उसमें रद्दोबदल का इख़्तियार अता फ़रमाया है. कुछ मुफ़स्सिरों का क़ौल है कि ये तमाम विशेषताएं हवाओ की हैं कि वो धूल भी उड़ाती हैं, बादलों को भी उठाए फिरती हैं, फिर उन्हें लेकर बसहूलत चलती हैं, फिर अल्लाह तआला के शहरों में उसके हुक्म से बारिश तक़सीम करती हैं. क़सम का उद्देश्य उस चीज़ की महानता बयान करता है जिसके साथ क़सम याद फ़रमाई गई क्योंकि ये चीज़ें अल्लाह की बेपनाह क़ुदरत पर दलील लाने वाली हैं. समझ वालों को मौक़ा दिया जाता है कि वो इनमें नज़र करके मरने के बाद उठाए जाने और कर्मों का बदला दिये जाने को प्रमाणित करें कि वो क़ुदरत वाला रब ऐसी अनोखी बातों पर क़ुदरत रखता है वह अपनी पैदा की हुई चीज़ों को नष्ट करने के बाद दोबारा अस्तित्व में लाने पर बेशक क़ादिर है.

बेशक जिस बात का तुम्हें वादा दिया जाता है(6)
(6) यानी दोबारा ज़िन्दगी दिये जाने और कर्मों का बदला दिये जाने.

ज़रूर सच है {5} और बेशक इन्साफ़ ज़रूर होना (7){6}
(7) और हिसाब के बाद नेकी बदी का बदला ज़रूर मिलता.

आरायश वाले आसमान की क़सम(8){7}
(8) जिसको सितारों से सजाया है कि मक्के वाले नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की शान में और क़ुरआन पाक के बारे में.

तुम मुख़्तलिफ़ बात में हो(9){8}
(9) कभी रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को जादूगर कहते हो, कभी शायर, कभी तांत्रिक, कभी पागल (मआज़ल्लाह) इसी तरह क़ुरआने पाक को भी कभी जादू बताते हो कभी शायरी, कभी तंत्र विद्या की अगलों की कहानियाँ.

इस क़ुरआन से वही औंधा किया जाता है जिसकी क़िस्मत ही में औंधाया जाना हो(10){9}
(10) और जो हमेशा का मेहरूम है, इस सआदत से मेहरूम रहता है और बहकाने वालों के बहकावे में आ जाता है. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ज़मान के काफ़िर जब किसी को देखते कि ईमान लाने का इरादा करता है तो उससे नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की निस्बत कहते कि उनके पास क्यों जाता है, वह तो शायर हैं, जादूगर हैं, तांत्रिक हैं, झूटे हैं (मआज़ल्लाह) और इसी तरह क़ुरआन शरीफ़ को शायरी, जादू और झूट बताते (मआज़ल्लाह).

मारे जाएं दिल से तराशने वाले {10} जो नशे में भूले हुए हैं(11){11}
(11) यानी जिहालत के नशे में आख़िरत को भूले हुए हैं.

पूछतें हैं(12)
(12) नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से मज़ाक उड़ान के तौर पर.

इन्साफ़ का दिन कब होगा(13){12}
(13) उनके जवाब में फ़रमाया जाता है.

उस दिन होगा जिस दिन वो आग पर तपाए जाएंगे(14){13}
(14) और उन्हें अज़ाब दिया जाएगा.

और फ़रमाया जाएगा चखो अपना तपना यह है वह जिसकी तुम्हें जल्दी थी(15) {14}
(15) और दुनिया में मज़ाक के तौर पर कहा करते थे कि वह अज़ाब जल्दी लाओ जिसका वादा देते हो.

बेशक परहेज़गार बाग़ों और चश्मों में हैं(16){15}
(16) यानी अपने रब की नेअमत में हैं बाग़ों के अन्दर जिनमें लतीफ़ चश्मे जारी हैं.

अपने रब की अताएं लेते हुए, बेशक वो उससे पहले(17)
(17) दुनिया में.

नेकी करने वाले थे {16} वो रात में कम सोया करते थे(18){17}
(18) और ज़्यादा हिस्सा रात का नमाज़ में गुज़ारते.

और पिछली रात इस्तिग़फ़ार (गुनाहों से माफ़ी मांगा) करते (19){18}
(19) यानी रात तहज्जुद और जागने में गुज़ारते हैं और बहुत थोड़ी देर सोते और रात का पिछला हिस्सा इस्तिग़फ़ार में गुज़ारते हैं और इतने सो जाने को भी गुनाह समझते हैं.

और उनके मालों में हक़ था मंगता और बेनसीब का(20){19}
(20) मंगता तो वह जो अपनी हाजत के लिये लोगो से सवाल करे और मेहरूम वह कि हाजतमन्द हो और शर्म से सवाल भी न करे.

और ज़मीन में निशानियाँ हैं यक़ीन वालों को(21){20}
(21) जो अल्लाह तआला के एक होने और उसकी क़ुदरत और हिकमत को प्रमाणित करती है.

और ख़ुद तुम में(22)
(22) तुम्हारी पैदाइश में और तुम्हारे परिवर्तन में और तुम्हारे ज़ाहिर और बातिन में अल्लाह तआला की क़ुदरत के ऐसे बेशुमार अजूबे और चमत्कार हैं जिससे बन्दे को उसके रब होने की शान मालूम होती है.

तो क्या तुम्हें सूझता नहीं {21} और आसमान में तुम्हारा रिज़्क़ है(23)
(23) कि उसी तरफ़ से बारिश करके ज़मीन को पैदावार से मालामाल किया जाता है.

और जो तुम्हें वादा दिया जाता है (24){22}तो आसमान और ज़मीन के रब की क़सम बेशक यह क़ुरआन हक़ है वैसी ही ज़बान में जो तुम बोलते हो{23}
(24) आख़िरत के सवाब और अज़ाब का, वह सब आसमान में लिखा हुआ है.

Advertisements

51-Surah – Al- Zariyat

51|47|وَالسَّمَاءَ بَنَيْنَاهَا بِأَيْدٍ وَإِنَّا لَمُوسِعُونَ
51|48|وَالْأَرْضَ فَرَشْنَاهَا فَنِعْمَ الْمَاهِدُونَ
51|49|وَمِن كُلِّ شَيْءٍ خَلَقْنَا زَوْجَيْنِ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ
51|50|فَفِرُّوا إِلَى اللَّهِ ۖ إِنِّي لَكُم مِّنْهُ نَذِيرٌ مُّبِينٌ
51|51|وَلَا تَجْعَلُوا مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ ۖ إِنِّي لَكُم مِّنْهُ نَذِيرٌ مُّبِينٌ
51|52|كَذَٰلِكَ مَا أَتَى الَّذِينَ مِن قَبْلِهِم مِّن رَّسُولٍ إِلَّا قَالُوا سَاحِرٌ أَوْ مَجْنُونٌ
51|53|أَتَوَاصَوْا بِهِ ۚ بَلْ هُمْ قَوْمٌ طَاغُونَ
51|54|فَتَوَلَّ عَنْهُمْ فَمَا أَنتَ بِمَلُومٍ
51|55|وَذَكِّرْ فَإِنَّ الذِّكْرَىٰ تَنفَعُ الْمُؤْمِنِينَ
51|56|وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ
51|57|مَا أُرِيدُ مِنْهُم مِّن رِّزْقٍ وَمَا أُرِيدُ أَن يُطْعِمُونِ
51|58|إِنَّ اللَّهَ هُوَ الرَّزَّاقُ ذُو الْقُوَّةِ الْمَتِينُ
51|59|فَإِنَّ لِلَّذِينَ ظَلَمُوا ذَنُوبًا مِّثْلَ ذَنُوبِ أَصْحَابِهِمْ فَلَا يَسْتَعْجِلُونِ
51|60|فَوَيْلٌ لِّلَّذِينَ كَفَرُوا مِن يَوْمِهِمُ الَّذِي يُوعَدُونَ

51 सूरए ज़ारियात -तीसरा रूकू
और आसमान को हमने हाथों से बनाया(1)
(1) अपने दस्ते क़ुदरत से.

और बेशक हम वुसअत देने वाले हैं(2){47}
(2) उसको इतनी कि ज़मीन अपनी फ़ज़ा के साथ उसके अन्दर इस तरह आजाए जैसे कि एक चौड़े मैदान में गैंद पड़ी हो या ये मानी हैं कि हम अपनी सृष्टि पर रिज़्क़ फैलाने वाले हैं.

और ज़मीन को हमने फ़र्श किया तो हम क्या ही अच्छे बिछाने वाले {48} और हमने हर चीज़ के दो जोड़े बनाए(3)
(3) आसमान और ज़मीन और सूरज और चाँद और रात और दिन और ख़ुश्की और तरी और गर्मी व सर्दी और जिन्न व इन्स और रौशनी और अंधेरा और ईमान व कुफ़्र और सआदत व शक़ावत और हक़ व बातिल और नर व मादा की तरह.

कि तुम ध्यान करो (4){49}
(4) और समझो कि उन तमाम जोड़ों को पैदा करने वाली एक ही हस्ती है, न उसका नज़ीर है, न शरीक, न ज़िद न बराबर. वही इबादत के लायक़ है.

तो अल्लाह की तरफ़ भागो (5)
(5) उसके मासिवा को छोड़ कर उसकी इबादत इख़्तियार करो.

बेशक मैं उसकी तरफ़ से तुम्हारे लिये साफ़ डर सुनाने वाला हूँ {50} और अल्लाह के साथ और मअबूद न ठहराओ, बेशक मैं उसकी तरफ़ से तुम्हारे लिये खुला डर सुनाने वाला हूँ {51}यूंही (6)
(6) जैसे कि उन काफ़िरों ने आपको झुटलाया और आपको जादूगर और दीवाना कहा, ऐसे ही.

जब उनसे अगलों के पास कोई रसूल तशरीफ़ लाया तो यही बोले कि जादूगर है या दीवाना {52} क्या आपस में एक दूसरे को यह बात कह मरे हैं, बल्कि वो सरकश लोग हैं(7){53}
(7) यानी पहले काफ़िरों ने अपने पिछलों को यह वसीयत तो नहीं की कि तुम नबियों को झुटलाना और उनकी शान में इस तरह की बातें बनाना लेकिन चूंकि सरकशी और बग़ावत की इल्लत दोनों में है इसलिये गुमराही में एक दूसरे के मुवाफ़िक़ रहे.

तो ऐ मेहबूब, तुम उनसे मुंह फेर लो तो तुम पर कुछ इल्ज़ाम नहीं(8){54}
(8) क्योंकि आप रिसालत की तबलीग़ फ़रमा चुके और दावत व हिदायत में काफ़ी मेहनत कर चुके और आपने अपनी कोशिश में कोई कसर उठा न रखी. जब यह आयत उतरी तो रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ग़मगीन हुए और आपके सहाबा को रंज हुआ कि जब रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को मुंह फेरने का हुक्म हो गया तो अब वही क्यों आएगी और जब नबी ने उम्मत को तबलीग़ पूरे तौर पर फ़रमादी और उम्मत सरकशी से बाज़ न आई और रसूल को उनसे मुंह फेरने का हुक्म मिल गया तो वक़्त आ गया कि उन पर अज़ाब उतरे. इस पर वह आयत उतरी जो इस आयत के बाद है और उसमें तस्कीन दी गई कि वही का सिलसिला टूटा नहीं है. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नसीहत सआदतमन्दों के लिये जारी रहेगी चुनांन्वे इरशाद हुआ.

और समझाओ कि समझाना मुसलमानों को फ़ायदा देता है{55} और मैंने जिन्न और आदमी इतने ही के लिये बनाए कि मेरी बन्दगी करें(9){56}
(9) और मेरी मअरिफ़त यानी पहचान हो.

मैं उनसे कुछ रिज़्क़ नहीं मांगता(10)
(10) कि मेरे बन्दों को रोज़ी दें या सब की नहीं तो अपनी ही रोज़ी ख़ुद पैदा करें क्योंकि रिज़्क़ देने वाला मैं हूँ और सब की रोज़ी का मैं ही पूरा करने वाला हूँ.

और न यह चाहता हूँ कि वो मुझे खाना दें(11){57}
(11) मेरी सृष्टि के लिये.

बेशक अल्लाह ही बड़ा रिज़्क़ देने वाला क़ुव्वत वाला क़ुदरत वाला है(12){58}
(12) सबको वही देता, वही पालता है.

तो बेशक उन ज़ालिमों के लिये(13)
(13) जिन्होंने रसूले पाक सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को झुटलाकर अपनी जानों पर ज़ुल्म किया.

अज़ाब की एक बारी है(14)
(14) हिस्सा है नसीब है.

जैसे उनके साथ वालों के लिये एक बारी थी(15)
(15) यानी पिछली उम्मतों के काफ़िरों के लिये जो नबीयों को झुटलाने में इनके साथी थे. उनका अज़ाब और हलाकत में हिस्सा था.

तो मुझसे जल्दी न करें(16){59}
(16) अज़ाब नाज़िल करने की.

तो काफ़िरों की ख़राबी है उनके उस दिन से जिसका वादा दिये जाते हैं(17){60}
(17) और वह क़यामत का दिन है.

33 सूरए अहज़ाब- चौथा रूकू

33  सूरए अहज़ाब- चौथा रूकू

ا أَيُّهَا النَّبِيُّ قُل لِّأَزْوَاجِكَ إِن كُنتُنَّ تُرِدْنَ الْحَيَاةَ الدُّنْيَا وَزِينَتَهَا فَتَعَالَيْنَ أُمَتِّعْكُنَّ وَأُسَرِّحْكُنَّ سَرَاحًا جَمِيلًا
وَإِن كُنتُنَّ تُرِدْنَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَالدَّارَ الْآخِرَةَ فَإِنَّ اللَّهَ أَعَدَّ لِلْمُحْسِنَاتِ مِنكُنَّ أَجْرًا عَظِيمًا
يَا نِسَاءَ النَّبِيِّ مَن يَأْتِ مِنكُنَّ بِفَاحِشَةٍ مُّبَيِّنَةٍ يُضَاعَفْ لَهَا الْعَذَابُ ضِعْفَيْنِ ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عَلَى اللَّهِ يَسِيرًا
۞ وَمَن يَقْنُتْ مِنكُنَّ لِلَّهِ وَرَسُولِهِ وَتَعْمَلْ صَالِحًا نُّؤْتِهَا أَجْرَهَا مَرَّتَيْنِ وَأَعْتَدْنَا لَهَا رِزْقًا كَرِيمًا
يَا نِسَاءَ النَّبِيِّ لَسْتُنَّ كَأَحَدٍ مِّنَ النِّسَاءِ ۚ إِنِ اتَّقَيْتُنَّ فَلَا تَخْضَعْنَ بِالْقَوْلِ فَيَطْمَعَ الَّذِي فِي قَلْبِهِ مَرَضٌ وَقُلْنَ قَوْلًا مَّعْرُوفًا
وَقَرْنَ فِي بُيُوتِكُنَّ وَلَا تَبَرَّجْنَ تَبَرُّجَ الْجَاهِلِيَّةِ الْأُولَىٰ ۖ وَأَقِمْنَ الصَّلَاةَ وَآتِينَ الزَّكَاةَ وَأَطِعْنَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ ۚ إِنَّمَا يُرِيدُ اللَّهُ لِيُذْهِبَ عَنكُمُ الرِّجْسَ أَهْلَ الْبَيْتِ وَيُطَهِّرَكُمْ تَطْهِيرًا
وَاذْكُرْنَ مَا يُتْلَىٰ فِي بُيُوتِكُنَّ مِنْ آيَاتِ اللَّهِ وَالْحِكْمَةِ ۚ إِنَّ اللَّهَ كَانَ لَطِيفًا خَبِيرًا

ऐ ग़ैब बताने वाले (नबी) अपनी बीबियों से फ़रमा दो अगर तुम दुनिया की ज़िन्दगी और इसकी आरायश चाहती हो(1)
(1) यानी अगर तुम्हें बहुत सारा माल और ऐश के साधन दरकार हैं. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की पाक बीबियों ने आपसे दुनियावी सामान तलब किये और गुज़ारे के ख़र्च को बढ़ाने की दरख़्वास्त की. यहाँ तो पाकीज़गी अपनी चरम सीमा पर थी और दुनिया का सामान जमा करना गवारा ही न था इस लिये यह तलब सरकार के दिल पर बोझ हुई. और तब यह आयत उतरी और हुज़ूर  की मुक़द्दस बीबियों को समझाया गया. उस वक़्त हुज़ूर की नौ बीबियाँ थीं. पाँच क़ुरैश से, हज़रत आयशा बिन्ते अबी बक्र सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो, हज़रत हफ़सा बिन्ते उमरे फ़ारूक़, उम्मे हबीबह बिन्ते अबू सुफ़ियान, उम्मे सलमा बिन्ते अबी उमैया, सौदह बिन्ते ज़म्अह और चार बीबियाँ ग़ैर क़ुरैश, ज़ैनब बिन्ते जहश असदियह, मेमूनह बिन्ते हारिस हिलालियह, सफ़ियह बिन्ते हयई बिन अख़्तब खै़बरियह, जवैरियह बिन्हे हारिस मुस्तलिक़ियह (सबसे अल्लाह तआला राज़ी). सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने सबसे सलाह करके आयशा रदियल्लाहो अन्हा को यह आयत सुनाकर इख़्तियार दिया और फ़रमाया कि जल्दी न करो अपने माँ बाप से से सलाह करके जो राय हो उस पर अमल करो. उन्होंने अर्ज़ किया, हुज़ूर के मामले में सलाह कैसी, मैं अल्लाह को और उसके रसूल को और आख़िरत को चाहती हूँ, और बाक़ी बीबियों ने भी यही जवाब दिया. जिस औरत को इख़्तियार दिया जाए वह अगर अपने शौहर को इख़्तियार करे तो तलाक़ वाक़े नहीं होती और अगर अपने नफ़्स को इख़्तियार करे तो हमारे नज़दीक तलाक़े बाइन वाक़े हो जाती है.

तो आओ मैं तुम्हें माल दूँ (2)
(2) जिस औरत के साथ निकाह के बाद सोहबत हुई हो उसको तलाक़ दी जाए तो कुछ सामान देना मुस्तहब है और वह सामान तीन कपड़ों का जोड़ा होता है. यहाँ माल से वही मुराद है. जिस औरत का मेहर निर्धारित न किया गया हो उसको सोहबत से पहले तलाक़ दी तो यह जोड़ा देना वाजिब है.

और अच्छी तरह छोड़ दूं(3) {28}
(3) बग़ैर किसी नुक़सान के.

और अगर तुम अल्लाह और उसके रसूल और आख़िरत का घर चाहती हो तो बेशक अल्लाह ने तुम्हारी नेकी वालियों के लिये बड़ा अज्र तैयार कर रखा है {29} ऐ नबी की बीबियों जो तुममें खुली शर्म के ख़िलाफ़ कोई जुरअत करे (4)
(4) जैसे कि शौहर की फ़रमाँबरदारी में कमी करना और उसके साथ दुर्व्यवहार करना, क्योंकि बदकारी से अल्लाह तआला नबियों की बीबियों को पाक रखता है.

उसपर औरों से दूना अज़ाब होगा (5)और यह अल्लाह को आसान है {30}
(5) क्योंकि जिस शख़्स की फ़ज़ीलत ज़्यादा होती है उससे अगर क़ुसूर वाक़े हो तो वह क़ुसूर भी दूसरों के क़ुसूर से ज़्यादा सख़्त क़रार दिया जाता है. इसीलिये आलिम का गुनाह जाहिल के गुनाह से ज़्यादा बुरा होता है और इसी लिये आज़ादों की सज़ा शरीअत में ग़ुलामों से ज़्यादा मुक़र्रर है. और नबी अलैहिस्सलातो वस्सलाम की बीबियाँ सारे जगत की औरतों से ज़्यादा बुज़ुर्गी रखती हैं इसलिये उनकी थोड़ी सी बात सख़्त पकड़ के क़ाबिल है. “फ़ाहिशा” यानी हया के ख़िलाफ़ खुली जुरअत का शब्द जब मअरिफ़ह होकर आए तो उससे ज़िना और लिवातत मुराद होती है और अगर नकरह ग़ैर मौसूफ़ह होकर लाया जाए तो उससे सारे गुनाह मुराद होते हैं और जब मौसूफ़ होकर आए तो उससे शौहर की नाफ़रमानी और उससे लड़ना झगड़ना मुराद होता है. इस आयत में नकरह मौसूफ़ह है इसीलिये इससे शौहर की इताअत में कमी और उससे दुर्व्यवहार मुराद है जैसा कि हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से नक़्ल किया गया है. (जुमल वगै़रह)

पारा इक्कीस समाप्त

बाईसवाँ पारा – व मैंय-यक़नुत
(सूरए अहज़ाब जारी)

और(6)
(6) ऐ नबी अलैहिस्सलातो वस्सलाम की बीबियो.

जो तुम में फ़रमाँबरदार रहे अल्लाह और रसूल की और अच्छा काम करे हम उसे औरों से दूना सवाब देंगे(7)
(7) यानी अगर औरों को एक नेकी पर दस गुना सवाब देंगे तो तुम्हें बीस गुना, क्योंकि सारे जगत की औरतों में तुम्हें अधिक सम्मान और बुज़ुर्गी हासिल है और तुम्हारे अमल में भी दो क़िस्में हैं एक इताअत की अदा, दूसरे रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को राज़ी रखने की कोशिश और क़नाअत और अच्छे व्यवहार के साथ हुज़ूर को ख़ुश करना.

और हमने उसके लिये इज़्ज़त की रोज़ी तैयार कर रखी है (8){31}
(8) जन्नत में.

ऐ नबी की बीबियों तुम और औरतों की तरह नहीं हो(9)
(9) तुम्हारा दर्जा सबसे ज़्यादा है और तुम्हारा इनाम सबसे बढ़कर. जगत की औरतों में कोई तुम्हारे बराबर की नहीं.

अगर अल्लाह से डरो तो बात में ऐसी नर्मी न करो कि दिल का रोगी कुछ लालच करे(10)
(10) इसमें अदब की तालीम है कि अगर ज़रूरत के हिसाब से किसी ग़ैर मर्द से पर्दे के पीछे से बात करनी पड़े तो कोशिश करो कि लहजे में नज़ाकत न आने पाए और बात में लोच न हो. बात बहुत ही सादगी से की जाए. इज़्ज़त वाली महिलाओ के लिये यही शान की बात है.

हाँ अच्छी बात कहो(11) {32}
(11) दीन और इस्लाम की और नेकी की तालीम और नसीहत व उपदेश की, अगर ज़रूरत पेश आए, मगर बेलोच लहजे से.

और अपने घरों में ठहरी रहो और बेपर्दा न रहो जैसे अगली जाहिलियत की बेपर्दगी(12)
(12) अगली जिहालत से मुराद इस्लाम से पहले का ज़माना है. उस ज़माने में औरतें इतराती हुई निकलती थीं, अपनी सजधज और श्रंगार का इज़हार करती थीं कि अजनबी मर्द देखें, लिबास ऐसे पहनती थीं जिनसे बदन के अंग अच्छी तरह न छुपें और पिछली जिहालत से आख़िरी ज़माना मुराद है जिसमें लोगों के कर्म पहलों की तरह हो जाएंगे.

और नमाज़ क़ायम रखो और ज़कात दो और अल्लाह और रसूल का हुक्म मानो, अल्लाह तो यही चाहता है ऐ नबी के घर वालों कि तुम से हर नापाकी दूर फ़रमा दे और तुम्हें पाक करके ख़ूब सुथरा कर दे(13){33}
(13) यानी गुनाहों की गन्दगी से तुम प्रदूषित न हो. इस आयत से एहले बैत की फ़ज़ीलत साबित होती है.  और एहले बैत में नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्ल्म की बीबियाँ और हज़रत ख़ातूने जन्नत बीबी फ़ातिमा ज़हरा और अली मुर्तज़ा और हसनैन करीमैन (यानी सैयदना इमाम हसन और सैयदना इमाम हुसैन) रदियल्लाहो अन्हुम सब दाख़िल हैं. आयतों और हदीसों को जमा करने से यही नतीजा निकलता है और यही हज़रत इमाम अबू मन्सूर मातुरीदी रहमतुल्लाह अलैह से नक़्ल किया गया है. इन आयतों में एहले बैते रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को नसीहत फ़रमाई गई है ताकि वो गुनाहों से बचें और तक़वा और परहेज़गारी के पाबन्द रहें. गुनाहों को नापाकी से और परहेज़गारी को पाकी से उपमा दी गई क्योंकि गुनाह करने वाला उनसे ऐसा ही सना होता है जैसा शरीर गन्दगी से. इस अन्दाज़े कलाम से मक़सद यह है कि समझ वालों को गुनाहों से नफ़रत दिलाई जाए और तक़वा व परहेज़गारी की तरग़ीब दी जाए.

और याद करो जो तुम्हारे घरों में पढ़ी जाती हैं अल्लाह की आयतें और हिकमत(14) बेशक अल्लाह हर बारीकी जानता ख़बरदार है {34}
(14) यानी सुन्नत.

Islamic Wallpaper

Islamic Wallpaper free download for your pc desktop, mobile wallpaper

Madina Wallpaper

You can use free Madina Wallpaper for your Desktop wallpaper, Laptop, Mobile background, Website and Blog also.

 

Madina Wallpaper

 

 

Madina Wallpaper

 

 

Madina Wallpaper

 

 

Madina Wallpaper