48-Surah-Fatah

48 सूरए फ़त्ह -तीसरा रूकू

۞ لَّقَدْ رَضِيَ اللَّهُ عَنِ الْمُؤْمِنِينَ إِذْ يُبَايِعُونَكَ تَحْتَ الشَّجَرَةِ فَعَلِمَ مَا فِي قُلُوبِهِمْ فَأَنزَلَ السَّكِينَةَ عَلَيْهِمْ وَأَثَابَهُمْ فَتْحًا قَرِيبًا
وَمَغَانِمَ كَثِيرَةً يَأْخُذُونَهَا ۗ وَكَانَ اللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمًا
وَعَدَكُمُ اللَّهُ مَغَانِمَ كَثِيرَةً تَأْخُذُونَهَا فَعَجَّلَ لَكُمْ هَٰذِهِ وَكَفَّ أَيْدِيَ النَّاسِ عَنكُمْ وَلِتَكُونَ آيَةً لِّلْمُؤْمِنِينَ وَيَهْدِيَكُمْ صِرَاطًا مُّسْتَقِيمًا
وَأُخْرَىٰ لَمْ تَقْدِرُوا عَلَيْهَا قَدْ أَحَاطَ اللَّهُ بِهَا ۚ وَكَانَ اللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرًا
وَلَوْ قَاتَلَكُمُ الَّذِينَ كَفَرُوا لَوَلَّوُا الْأَدْبَارَ ثُمَّ لَا يَجِدُونَ وَلِيًّا وَلَا نَصِيرًا
سُنَّةَ اللَّهِ الَّتِي قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلُ ۖ وَلَن تَجِدَ لِسُنَّةِ اللَّهِ تَبْدِيلًا
وَهُوَ الَّذِي كَفَّ أَيْدِيَهُمْ عَنكُمْ وَأَيْدِيَكُمْ عَنْهُم بِبَطْنِ مَكَّةَ مِن بَعْدِ أَنْ أَظْفَرَكُمْ عَلَيْهِمْ ۚ وَكَانَ اللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرًا
هُمُ الَّذِينَ كَفَرُوا وَصَدُّوكُمْ عَنِ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَالْهَدْيَ مَعْكُوفًا أَن يَبْلُغَ مَحِلَّهُ ۚ وَلَوْلَا رِجَالٌ مُّؤْمِنُونَ وَنِسَاءٌ مُّؤْمِنَاتٌ لَّمْ تَعْلَمُوهُمْ أَن تَطَئُوهُمْ فَتُصِيبَكُم مِّنْهُم مَّعَرَّةٌ بِغَيْرِ عِلْمٍ ۖ لِّيُدْخِلَ اللَّهُ فِي رَحْمَتِهِ مَن يَشَاءُ ۚ لَوْ تَزَيَّلُوا لَعَذَّبْنَا الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْهُمْ عَذَابًا أَلِيمًا
إِذْ جَعَلَ الَّذِينَ كَفَرُوا فِي قُلُوبِهِمُ الْحَمِيَّةَ حَمِيَّةَ الْجَاهِلِيَّةِ فَأَنزَلَ اللَّهُ سَكِينَتَهُ عَلَىٰ رَسُولِهِ وَعَلَى الْمُؤْمِنِينَ وَأَلْزَمَهُمْ كَلِمَةَ التَّقْوَىٰ وَكَانُوا أَحَقَّ بِهَا وَأَهْلَهَا ۚ وَكَانَ اللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمًا

बेशक अल्लाह राज़ी हुआ ईमान वालों से जब वो उस पेड़ के नीचे तुम्हारी बैअत करते थे(1)
(1) हुदैबिय्यह में चूंकि उन बैअत करने वालों को अल्लाह की रज़ा की ख़ुशख़बरी दी गई इसलिये उस बैअत को बैअते रिज़वान कहते हैं. इस बैअत का ज़ाहिरी कारण यह हुआ कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हुदैबिय्यह से हज़रत उसमाने ग़नी रदियल्लाहो अन्हो को क़ुरैश के सरदारों के पास मक्कए मुकर्रमा भेजा कि उन्हें ख़बर दें कि हम बैतुल्लाह की ज़ियारत और उमरे की नियत से आए हैं हमारा इरादा जंग का नहीं है. और यह भी फ़रमा दिया था कि जो कमज़ोर मुसलमान वहाँ हैं उन्हें इत्मीनान दिला दें कि मक्कए मुकर्रमा बहुत जल्द फ़त्ह होगा और अल्लाह तआला अपने दीन को ग़ालिब फ़रमाएगा. क़ुरैश इस बात पर सहमत रहे कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम इस साल न आएं और हज़रत उस्माने ग़नी रदियल्लाहो अन्हो से कहा कि अगर आप काबे का तवाफ़ करना चाहें तो करलें. हज़रत उस्माने ग़नी ने फ़रमाया ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के बिना तवाफ़ करूं. यहाँ मुसलमानों ने कहा कि उस्माने ग़नी रदियल्लाहो अन्हो बड़े ख़ुशनसीब हैं जो काबए मुअज़्ज़मा पहुंचे और तवाफ़ से मुशर्रफ़ हुए. हुज़ूर ने फ़रमाया मैं जानता हूँ कि वो हमारे बग़ैर तवाफ़ न करेंगे. हज़रत उस्माने गनी रदियल्लाहो अन्हो ने मक्के के कमज़ोर मुसलमानों को आदेशनुसार फ़त्ह की ख़ुशख़बरी भी पहुंचाई फिर क़ुरैश ने हज़रत उस्माने ग़नी को रोक लिया. यहाँ यह ख़बर मशहूर हो गई कि उस्माने ग़नी रदियल्लाहो अन्हो शहीद कर दिये गए. इसपर मुसलमानों को बहुत जोश आया और रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने सहाबा से काफ़िरों के मुक़ाबले में जिहाद में डटे रहने पर बैअत ली. यह बैअत एक बड़े काँटेदार दरख़्त के नीचे हुई जिसको अरब में समुरह कहते हैं. हुज़ूर ने अपना बायां दस्ते मुबारक दाएं दस्ते अक़दस में लिया और फ़रमाया कि यह उस्मान (रदियल्लाहो अन्हो) की बैअत है और फ़रमाया यारब उस्मान तेरे और तेरे रसूल के काम में हैं. इस घटना से मालूम होता है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को नबुव्वत के नूर से मालूम था कि हज़रत उस्मान रदियल्लाहो अन्हो शहीद नहीं हुए जभी तो उनकी बैअत ली. मुश्रिकों में इस बैअत का हाल सुनकर डर छा गया और उन्होंने हज़रत उस्माने ग़नी रदियल्लाहो अन्हो को भेज दिया. हदीस शरीफ़ में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया जिन लोगों ने दरख़्त के नीचे बैअत ली थी उनमें से कोई भी दोज़ख़ में दाख़िल न होगा. (मुस्लिम शरीफ़) और जिस दरख़्त के नीचे बैअत की गई थी अल्लाह तआला ने उसको आँखों से पोशीदा कर दिया सहाबा ने बहुत तलाश किया किसी को उसका पता न चला.

तो अल्लाह ने जाना जो उनके दिलों में है(2)
(2) सच्चाई, सच्ची महब्बत और वफ़ादारी.

तो उनपर इत्मीनान उतारा और उन्हें ज़ल्द आने वाली फ़त्ह का इनाम दिया(3){18}
(3) यानी ख़ैबर की विजय का जो हुदैबिय्यह से वापस होकर छ माह बाद हासिल हुई.

और बहुत सी ग़नीमतें(4)
(4) ख़ैबर की और ख़बर वालों के माल कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने तक़सीम फ़रमाए.

जिन को लें, और अल्लाह इज़्ज़त व हिकमत वाला है {19} और अल्लाह ने तुम से वादा किया है बहुत सी ग़नीमतों का कि तुम लोगे (5)
(5) और तुम्हारी विजय होती रहेगी.

तो तुम्हें वह ज़ल्द अता फ़रमा दी और लोगों के हाथ तुमसे रोक दिये(6)
(6) कि वो डर कर तुम्हारे बाल बच्चों को हानि न पहुंचा सके. इसका वाक़िआ यह था कि जब मुसलमान ख़ैबर की जंग के लिये रवाना हुए तो ख़ैबर वासियों के हलीफ़ बनी असद और ग़ितफान ने चाहा कि मदीनए तैय्यिबह पर हमला करके मुसलमानों के बाल बच्चों को लूट लें. अल्लाह तआला ने उनके दिलों में रोब डाला और उनके हाथ रोक दिये.

और इसलिये कि ईमान वालों के लिये निशानी हो(7)
(7) यह ग़नीमत देना और दुश्मनों के हाथ रोक देना.

और तुम्हें सीधी राह दिखा दे(8){20}
(8) अल्लाह तआला पर तवक्कुल करने और काम उस पर छोड़ देने की जिससे बसीरत और यक़ीन ज़्यादा हो.

और एक और (9)
(9) फ़त्ह.

जो तुम्हारे बल की न थी (10)
(10) मुराद इससे फ़ारस और रूम की ग़नीमतें हैं या ख़ैबर की जिसका अल्लाह तआला ने पहले से वादा फ़रमाया था और मुसलमानों को कामयाबी की उम्मीद थी. अल्लाह तआला ने उन्हें विजय दिलाई. और एक क़ौल यह है कि वह फ़त्हे मक्का है. और एक यह क़ौल है कि वह हर फ़त्ह है जो अल्लाह तआला ने मुसलमानों को अता फ़रमाई.

वह अल्लाह के क़ब्ज़े में है, और अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है {21} और अगर काफ़िर तुम से लड़ें(11)
(11) यानी मक्के वालों या ख़ैबर वासियों के सहयोगी असद, ग़ित्फ़ान.

तो ज़रूर तुम्हारे मुक़ाबले से पीठ फेर देंगे(12)
(12) पराजित होंगे और उन्हें मुंह की खानी पड़ेगी.

फिर कोई हिमायती न पाएंगे न मददगार {22} अल्लाह का दस्तूर है कि पहले से चला आता है(13)
(13) कि वह ईमान वालों की मदद फ़रमाता है और काफ़िरों को ज़लील करता है.

और हरगिज़ तुम अल्लाह का दस्तूर बदलता न पाओगे {23} और वही है जिसने उनके हाथ (14)
(14) यानी काफ़िरों के.

तुम से रोक दिये और तुम्हारे हाथ उनसे रोक दिये मक्का की घाटी में (15)
(15) मक्का की विजय का दिन. एक क़ौल यह है कि बत्ने मक्का से हुदैबिय्यह मुराद है और इस आयत के उतरने की परिस्थितियों में हज़रत अनस रदियल्लाहो अन्हो कहते हैं कि मक्के वालों में से अस्सी हथियार बन्द जवान जबले तनईम से मुसलमानों पर हमला करने के इरादे से उतरे. मुसलमानों ने उन्हें गिरफ़्तार करके सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर किया. हुज़ूर ने माफ़ फ़रमा दिया और उन्हें जाने दिया.

बाद इसके कि तुम्हें उनपर क़ाबू दे दिया था और अल्लाह तुम्हारे काम देखता है(16){24}
(16)मक्के के काफ़िर.

वो हैं जिन्होंने कुफ़्र किया और तुम्हें मस्जिदें हराम से(17)
(17) वहाँ पहुंचने से और उसका तवाफ़ करने से.

रोका और क़ुरबानी के जानवर रूके पड़े अपनी जगह पहुंचने से (18)
(18) यानी ज़िब्ह के मक़ाम से जो हरम में है.

और अगर यह न होता कुछ मुसलमान मर्द और कुछ मुसलमान औरतें (19)
(19) मक्कए मुकर्रमा में है.

जिनकी तुम्हें ख़बर नहीं(20)
(20) तुम उन्हें पहचाने नहीं.

कहीं तुम उन्हें रौंदे डालो(21)
(21) काफ़िरों से जंग करने में.

तो तुम्हें उनकी तरफ़ से अनजानी में कोई मकरूह पहुंचे तो हम तुम्हें उनके क़िताल की इजाज़त देते उनका यह बचाव इसलिये है कि अल्लाह अपनी रहमत में दाख़िल करें जिसे चाहे, अगर वो जुदा हो जाते(22)
(22) यानी मुसलमान काफ़िरों से मुम्ताज़ हो जाते.

तो हम ज़रूर उनमें के काफ़िरों को दर्दनाक अज़ाब देते(23) {25}
(23) तुम्हारे हाथ से क़त्ल कराके और तुम्हारी कै़द में लाके.

जब कि काफ़िरों ने अपने दिलों में आड़ रखी है वही अज्ञानता के ज़माने की आड़ (24)
(24) कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और हुज़ूर के सहाबा को काबए मुअज़्ज़मा से रोका.

तो अल्लाह ने अपना इत्मीनान अपने रसूल और ईमान वालों पर उतारा (25)
(25) कि उन्होंने अगले साल आने पर सुलह की, अगर वो भी क़ुरैश के काफ़िरों की तरह ज़िद करते तो ज़रूर जंग हो जाती.

और परहेज़गारी का कलिमा उनपर अनिवार्य फ़रमाया(26)
(26) कलिमए तक़वा यानी परहेज़गारी के कलिमे से मुराद “ला इलाहा इल्लल्लाहे मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” है.

और वो उसके ज़्यादा सज़ावार और उसके योग्य थे (27)
(27) क्योंकि अल्लाह तआला ने उन्हें अपने दीन और अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की सोहबत से नवाज़ा.

और अल्लाह सब कुछ जानता है (28) {26}
(28)काफ़िरों का हाल भी जानता है, मुसलमानों का भी, कोई चीज़ उससे छुपी नहीं है.

45 सूरए जासियह –

45 सूरए जासियह –

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ حم
تَنزِيلُ الْكِتَابِ مِنَ اللَّهِ الْعَزِيزِ الْحَكِيمِ
إِنَّ فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ لَآيَاتٍ لِّلْمُؤْمِنِينَ
وَفِي خَلْقِكُمْ وَمَا يَبُثُّ مِن دَابَّةٍ آيَاتٌ لِّقَوْمٍ يُوقِنُونَ
وَاخْتِلَافِ اللَّيْلِ وَالنَّهَارِ وَمَا أَنزَلَ اللَّهُ مِنَ السَّمَاءِ مِن رِّزْقٍ فَأَحْيَا بِهِ الْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا وَتَصْرِيفِ الرِّيَاحِ آيَاتٌ لِّقَوْمٍ يَعْقِلُونَ
تِلْكَ آيَاتُ اللَّهِ نَتْلُوهَا عَلَيْكَ بِالْحَقِّ ۖ فَبِأَيِّ حَدِيثٍ بَعْدَ اللَّهِ وَآيَاتِهِ يُؤْمِنُونَ
وَيْلٌ لِّكُلِّ أَفَّاكٍ أَثِيمٍ
يَسْمَعُ آيَاتِ اللَّهِ تُتْلَىٰ عَلَيْهِ ثُمَّ يُصِرُّ مُسْتَكْبِرًا كَأَن لَّمْ يَسْمَعْهَا ۖ فَبَشِّرْهُ بِعَذَابٍ أَلِيمٍ
وَإِذَا عَلِمَ مِنْ آيَاتِنَا شَيْئًا اتَّخَذَهَا هُزُوًا ۚ أُولَٰئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ مُّهِينٌ
مِّن وَرَائِهِمْ جَهَنَّمُ ۖ وَلَا يُغْنِي عَنْهُم مَّا كَسَبُوا شَيْئًا وَلَا مَا اتَّخَذُوا مِن دُونِ اللَّهِ أَوْلِيَاءَ ۖ وَلَهُمْ عَذَابٌ عَظِيمٌ
هَٰذَا هُدًى ۖ وَالَّذِينَ كَفَرُوا بِآيَاتِ رَبِّهِمْ لَهُمْ عَذَابٌ مِّن رِّجْزٍ أَلِيمٌ

सूरए जासियह मक्का में उतरी, इसमें 37 आयतें, चार रूकू हैं.
पहला रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) यह सूरए जासियह है. इसका नाम सूरए शरीअह भी है. यह सूरत मक्के में उतरी, सिवाय आयत “क़ुल लिल-लज़ीना आमनू यग़फ़िरू”  के. इस सूरत मे चार रूकू सैंतीस आयतें, चार सौ अठासी कलिमे और दो हज़ार एक सौ इक्यानवे अक्षर है.

हा-मीम {1} किताब का उतारना है अल्लाह इज़्ज़त व हिकमत वाले की तरफ़ से  {2} बेशक आसमानों और ज़मीन में निशानियाँ हैं ईमान वालो के लिये (2){3}
(2) अल्लाह तआला की क़ुदरत और उसके एक होने पर दलालत करने वाली.

और तुम्हारी पैदाइश में(3)
(3) यानी तुम्हारी पैदायश में भी उसकी क़ुदरत और हिकमत की निशानियाँ हैं कि नुत्फ़े को ख़ून बनाता है, ख़ून को बांधता है बंधे ख़ून को गोश्त का टुकड़ा, यहाँ तक कि पूरा इन्सान बना देता है.

और जो जो जानवर वह फैलाता है उनमें निशानियां हैं यक़ीन वालों के लिये {4} और रात और दिन की तब्दीलियों में (4)
(4) कि कभी घटते हैं कभी बढ़ते हैं और एक जाता है दूसरा आता है.

और इसमें कि अल्लाह ने आसमान से रोज़ी का साधन मेंह उतारा तो उससे ज़मीन को उसके मरे पीछे ज़िन्दा किया और हवाओ को गर्दिश में (5)
(5) कि कभी गर्म चलती है कभी ठण्डी, कभी दक्षिणी, कभी उत्तरी, कभी पुरवैया कभी पछारिया.

निशानियाँ हें अक़्लमन्दों के लिये {5} ये अल्लाह की आयतें हैं कि हम तुम पर हक़ के साथ पढ़ते हैं, फिर अल्लाह और उसकी आयतों को छोड़कर कौन सी बात पर ईमान लाएंगे {6} ख़राबी है हर बड़े बोहतानहाए गुनहगार के लिये (6) {7}
(6) यानी नज़र बिन हारिस के लिये, कहा गया है कि यह आयत नज़र बिन हारिस के बारे में उतरी जो अजम के क़िस्से कहानियाँ सुनाकर लोगों को क़ुरआने पाक सुनने से रोकता था और यह आयत हर ऐसे व्यक्ति के लिये आम है जो दीन को हानि पहुंचाए और ईमान लाने और क़ुरआन सुनने से घमण्ड करे.

अल्लाह की आयतों को सुनता है कि उसपर पढ़ी जाती हैं फिर हठ पर जमता है (7)
(7) यानी अपने कुफ़्र पर.

घमण्ड करता (8)
(8) ईमान लाने से.

मानो उन्हें सुना ही नहीं, तो उसे ख़ुशख़बरी सुनाओ दर्दनाक अज़ाब की {8} और जब हमारी आयतों में से किसी पर इत्तिला (सूचना) पाए उसकी हंसी बनाता है, उनके लिये ख़्वारी (ज़िल्लत) का अज़ाब {9} उनके पीछे जहन्नम है(9)
(9) यानी मौत के बाद उनका अंजामकार दोज़ख़ है.

और उन्हें कुछ काम न देगा उनका कमाया हुआ(10)
(10) माल जिस पर वो बहुत इतराते हैं.

और न वो जो अल्लाह के सिवा हिमायती ठहर रखे थे(11)
(11) यानी बुत, जिन को पूजा करते थे.

और उनके लिये बड़ा अज़ाब है {10} यह(12)
(12) क़ुरआन शरीफ़.
राह दिखाता है और जिन्होंने अपने रब की आयतों को न माना उनके लिये दर्दनाक अज़ाब में से सख़्त तर अज़ाब है {11}

45 सूरए जासियह -दूसरा रूकू

45 सूरए जासियह -दूसरा रूकू

۞ اللَّهُ الَّذِي سَخَّرَ لَكُمُ الْبَحْرَ لِتَجْرِيَ الْفُلْكُ فِيهِ بِأَمْرِهِ وَلِتَبْتَغُوا مِن فَضْلِهِ وَلَعَلَّكُمْ تَشْكُرُونَ
وَسَخَّرَ لَكُم مَّا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ جَمِيعًا مِّنْهُ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّقَوْمٍ يَتَفَكَّرُونَ
قُل لِّلَّذِينَ آمَنُوا يَغْفِرُوا لِلَّذِينَ لَا يَرْجُونَ أَيَّامَ اللَّهِ لِيَجْزِيَ قَوْمًا بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ
مَنْ عَمِلَ صَالِحًا فَلِنَفْسِهِ ۖ وَمَنْ أَسَاءَ فَعَلَيْهَا ۖ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّكُمْ تُرْجَعُونَ
وَلَقَدْ آتَيْنَا بَنِي إِسْرَائِيلَ الْكِتَابَ وَالْحُكْمَ وَالنُّبُوَّةَ وَرَزَقْنَاهُم مِّنَ الطَّيِّبَاتِ وَفَضَّلْنَاهُمْ عَلَى الْعَالَمِينَ
وَآتَيْنَاهُم بَيِّنَاتٍ مِّنَ الْأَمْرِ ۖ فَمَا اخْتَلَفُوا إِلَّا مِن بَعْدِ مَا جَاءَهُمُ الْعِلْمُ بَغْيًا بَيْنَهُمْ ۚ إِنَّ رَبَّكَ يَقْضِي بَيْنَهُمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ فِيمَا كَانُوا فِيهِ يَخْتَلِفُونَ
ثُمَّ جَعَلْنَاكَ عَلَىٰ شَرِيعَةٍ مِّنَ الْأَمْرِ فَاتَّبِعْهَا وَلَا تَتَّبِعْ أَهْوَاءَ الَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ
إِنَّهُمْ لَن يُغْنُوا عَنكَ مِنَ اللَّهِ شَيْئًا ۚ وَإِنَّ الظَّالِمِينَ بَعْضُهُمْ أَوْلِيَاءُ بَعْضٍ ۖ وَاللَّهُ وَلِيُّ الْمُتَّقِينَ
هَٰذَا بَصَائِرُ لِلنَّاسِ وَهُدًى وَرَحْمَةٌ لِّقَوْمٍ يُوقِنُونَ
أَمْ حَسِبَ الَّذِينَ اجْتَرَحُوا السَّيِّئَاتِ أَن نَّجْعَلَهُمْ كَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ سَوَاءً مَّحْيَاهُمْ وَمَمَاتُهُمْ ۚ سَاءَ مَا يَحْكُمُونَ

अल्लाह है जिसने तुम्हारे बस में दरिया कर दिया कि उसमें उसके हुक्म से क़िश्तियां चलें और इसलिये कि उसका फ़ज़्ल तलाश करो(1)
(1) समुद्री यात्राओ से और तिजारतों से और ग़ोता लगाने और मोती वग़ैरह निकालने से.

और इसलिये कि हक़ (सत्य) मानो(2) {12}
(2) उस के नेअमत व करम और कृपा तथा एहसान का.

और तुम्हारे लिय काम में लगाए जो कुछ आसमानों में है(3)
(3) सूरज चांद सितारे वग़ैरह.

और जो कुछ ज़मीन में (4)
(4) चौपाए दरख़्त नेहरें वग़ैरह.

अपने हुक्म से, बेशक इसमें निशानियां हैं सोचने वालों के लिये {13} ईमान वालों से फ़रमाओ दरगुज़र करें उनसे जो अल्लाह के दिनों की उम्मीद नहीं रखते (5)
(5) जो दिन कि उसने ईमान वालो के लिये निर्धारित किये. या अल्लाह तआला के दिनों से वो वाक़ए मुराद हैं जिनमें वह अपने दुश्मनों को गिरफ़्तार करता है. बहरहाल उन उम्मीद न रखने वालों से मुराद काफ़िर हैं और मानी ये हैं कि काफ़िरों से जो तकलीफ़ पहुंचे और उनकी बातें जो तकलीफ़ पहुंचाए, मुसलमान उन से दरगुज़र करें, झगड़ा न करें. (कहा गया है कि यह आयत क़िताल की आयत से मन्सूख़ कर दी गई) इस आयत के उतरने की परिस्थितियों के बारे में कई कथन हैं. एक यह कि ग़ज़वए बनी मुस्तलक में मुसलमान बीरे मरीसीअ पर उतरे. यह एक कुँवां था. अब्दुल्लाह बिन उबई मुनाफ़िक़ ने अपने ग़ुलाम को पानी के लिये भेजा. वह देर में आया तो उससे कारण पूछा. उसने कहा कि हज़रत उमर कुँए के किनारे पर बैठे हुए थे, जब तक नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की और हज़रत अबूबक्र की मश्क़ें न भर गईं, उस वक़्त तक उन्होंने किसी को पानी न भरने दिया. यह सुनकर उस बदबख़्त ने उन हज़रात की शान में गुस्ताख़ी के कलिमें कहे. हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो को इसकी ख़बर हुई तो आप तलवार लेकर तैयार हुए . इसपर यह आयत उतरी. इस सूरत में यह आयत मदनी होगी. मक़ातिल का क़ौल है कि क़बीलए बनी ग़िफ़ार के एक व्यक्ति ने मक्कए मुकर्रमा में हज़रत उमर रदियल्लहो अन्हो को गाली दी तो आपने उसको पकड़ने का इरादा किया इसपर यह आयत उतरी. और एक क़ौल यह है कि जब आयत “मन ज़ल-लज़ी युक़रिदुल्लाहा क़र्दन हसना” यानी है कोई जो अल्लाह को क़र्ज़े हसना दे. (सूरए बक़रह, आयत 245) उतरी तो फ़िनहास यहूदी ने कहा कि मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) का रब मोहताज हो गया (मआज़ल्लाह), इस को सुनकर हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने तलवार खींची और  उसकी तलाश में निकले. हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने आदमी भेज कर उन्हें वापस बुला लिया.

ताकि अल्लाह एक क़ौम से उसकी कमाई का बदला दे(6) {14}
(6) यानी उनके कर्मो का.

जो भला काम करे तो अपने लिये और बुरा करे तो अपने बुरे को(7)
(7) नेकी और बदी का सवाब और अज़ाब उसके करने वाले पर है.

फिर अपने रब की तरफ़ फेरे जाओगे(8){15}
(8) वह नेकों और बदों को उनके कर्मों का बदला देगा.

और बेशक हमने बनी इस्राईल को किताब (9)
(9) यानी तौरात.

और हुक़ुमत और नबुव्वत अता फ़रमाई(10)
(10) उनमें अधिकांश नबी पैदा करके.

और हमने उन्हें सुथरी रोज़ियाँ दीं(11)
(11) हलाल कुशायश के साथ, फ़िरऔन और उसकी क़ौम के माल और इलाकों का मालिक करके और मन्न व सलवा उतार कर.

और उन्हें उनके ज़माने वालों पर फ़ज़ीलत (बुज़ुर्गी) बख़्शी {16} और हमने उन्हें इस काम की(12)
(12) यानी दीन के काम और हलाल व हराम के बयान और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के तशरीफ़ लाने की.

रौशन दलीलें दी तो उन्हों ने इख़्तिलाफ़ न किया(13)
(13) हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के नबी बनाए जाने में.

मगर बाद उसके कि इल्म उनके पास आ चुका(14)
(14) और इल्म मतभेद मिटने का कारण होता है. यहाँ उन लोगों के लिये मतभेद का कारण हुआ. इसकी वजह यह है कि इल्म उनका लक्ष्य न था बल्कि उनका लक्ष्य जाहो रियासत की तलब थी, इसी लिये उन्होंने विरोध किया.

आपस के हसद से(15)
(15) कि उन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की जलवा- अफ़रोज़ी के बाद अपनी शानों शौकत और हुकूमत के अन्देशे से आपके साथ हसद और दुशानी की और काफ़िर हो गए.

बेशक तुम्हारा रब क़यामत के दिन उनमें फ़ैसला कर देगा जिस बात में इख़्तिलाफ़ करते हैं {17} फिर हमने उस काम के(16)
(16) यानी दीन के.

ऊमदा रास्ते पर तुम्हें किया(17)
(17) ऐ हबीब मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

तो उसी राह चलो और नादानों की ख़्वाहिशों का साथ न दो (18) {18}
(18) यानी क़ुरैश के सरदारों की जो अपने दीन की तरफ़ बुलाते हैं.

बेशक वो अल्लाह के मुक़ाबिल तुम्हें कुछ काम न देंगे, और बेशक ज़ालिम एक दूसरे के दोस्त हैं (19)
(19) सिर्फ़ दुनिया में, और आख़िरत में उनका कोई दोस्त नहीं.

और डर वालों का दोस्त अल्लाह (20){19}
(20)दुनिया में भी, और आख़िरत में भी. डर वालों से मुराद ईमान वाले हैं और आगे क़ुरआन पाक के बारे में इरशाद होता है.

यह लोगों की आँखे खोलना है(21)
(21) कि इससे उन्हें दीन की बातों में नज़र हासिल होती है.

और ईमान वालों के लिये हिदायत व रहमत {20} क्या जिन्होंने बुराईयों का इर्तिकाब किया(22)
(22) कुफ़्र और गुमराही का.

यह समझते हैं कि हम उन्हें उन जैसा कर देंगे जो ईमान लाए और अच्छे काम किये कि इनकी उनकी ज़िन्दगी और मौत बराबर हो जाए(23)
(23) यानी ईमान वालों और काफ़िरों की ज़िन्दगी बराबर हो जाए ऐसा हरगिज़ न होगा क्योंकि ईमानदार ज़िन्दगी में ताअत पर क़ायम रहे और काफ़िर बुराईयों में डूबे रहे तो उन दोनों की ज़िन्दगी बराबर न हुई. ऐसे ही मौत भी एक सी नहीं कि ईमान वाले की मौत ख़ुशख़बरी व रहमत और बुज़ुर्गी पर होती है और काफ़िर की रहमत से निराशा और शर्मिन्दगी पर. मक्के के मुश्रिकों की एक जमाअत ने मुसलमानों से कहा था कि अगर तुम्हारी बात सत्य हो और मरने के बाद उठना हो तो भी हम ही अफ़ज़ल रहेंगे जैसा कि दुनिया में हम तुमसे बेहतर रहे. उनके रद में यह आयत उतरी.

क्या ही बुरा हुक्म लगाते हैं (24) {21}
(24) मुख़ालिफ़ सरकश, मुख़लिस फ़रमाँबरदार के बराबर कैसे हो सकता है. ईमान वाले जन्नत के ऊंचे दर्जों में इज़्ज़त बुज़ुर्गी और राहतें पाएंगे और काफ़िर जहन्नम के निचले दर्जों में ज़िल्लत और रूस्वाई के साथ सख़्त तरीन अज़ाब में गिरफ़्तार होंगे.

42 सूरए शूरा -पांचवाँ रूकू

42 सूरए शूरा -पांचवाँ रूकू

وَمَن يُضْلِلِ اللَّهُ فَمَا لَهُ مِن وَلِيٍّ مِّن بَعْدِهِ ۗ وَتَرَى الظَّالِمِينَ لَمَّا رَأَوُا الْعَذَابَ يَقُولُونَ هَلْ إِلَىٰ مَرَدٍّ مِّن سَبِيلٍ
وَتَرَاهُمْ يُعْرَضُونَ عَلَيْهَا خَاشِعِينَ مِنَ الذُّلِّ يَنظُرُونَ مِن طَرْفٍ خَفِيٍّ ۗ وَقَالَ الَّذِينَ آمَنُوا إِنَّ الْخَاسِرِينَ الَّذِينَ خَسِرُوا أَنفُسَهُمْ وَأَهْلِيهِمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ أَلَا إِنَّ الظَّالِمِينَ فِي عَذَابٍ مُّقِيمٍ
وَمَا كَانَ لَهُم مِّنْ أَوْلِيَاءَ يَنصُرُونَهُم مِّن دُونِ اللَّهِ ۗ وَمَن يُضْلِلِ اللَّهُ فَمَا لَهُ مِن سَبِيلٍ
اسْتَجِيبُوا لِرَبِّكُم مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِيَ يَوْمٌ لَّا مَرَدَّ لَهُ مِنَ اللَّهِ ۚ مَا لَكُم مِّن مَّلْجَإٍ يَوْمَئِذٍ وَمَا لَكُم مِّن نَّكِيرٍ
فَإِنْ أَعْرَضُوا فَمَا أَرْسَلْنَاكَ عَلَيْهِمْ حَفِيظًا ۖ إِنْ عَلَيْكَ إِلَّا الْبَلَاغُ ۗ وَإِنَّا إِذَا أَذَقْنَا الْإِنسَانَ مِنَّا رَحْمَةً فَرِحَ بِهَا ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ فَإِنَّ الْإِنسَانَ كَفُورٌ
لِّلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ يَخْلُقُ مَا يَشَاءُ ۚ يَهَبُ لِمَن يَشَاءُ إِنَاثًا وَيَهَبُ لِمَن يَشَاءُ الذُّكُورَ
أَوْ يُزَوِّجُهُمْ ذُكْرَانًا وَإِنَاثًا ۖ وَيَجْعَلُ مَن يَشَاءُ عَقِيمًا ۚ إِنَّهُ عَلِيمٌ قَدِيرٌ
۞ وَمَا كَانَ لِبَشَرٍ أَن يُكَلِّمَهُ اللَّهُ إِلَّا وَحْيًا أَوْ مِن وَرَاءِ حِجَابٍ أَوْ يُرْسِلَ رَسُولًا فَيُوحِيَ بِإِذْنِهِ مَا يَشَاءُ ۚ إِنَّهُ عَلِيٌّ حَكِيمٌ
وَكَذَٰلِكَ أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ رُوحًا مِّنْ أَمْرِنَا ۚ مَا كُنتَ تَدْرِي مَا الْكِتَابُ وَلَا الْإِيمَانُ وَلَٰكِن جَعَلْنَاهُ نُورًا نَّهْدِي بِهِ مَن نَّشَاءُ مِنْ عِبَادِنَا ۚ وَإِنَّكَ لَتَهْدِي إِلَىٰ صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ
صِرَاطِ اللَّهِ الَّذِي لَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۗ أَلَا إِلَى اللَّهِ تَصِيرُ الْأُمُورُ

और जिसे अल्लाह गुमराह करे उसका कोई दोस्त नहीं अल्लाह के मुक़ाबिल(1)
(1) कि उसे अज़ाब से बचा सके.

और तुम ज़ालिमों को देखोगे कि जब अज़ाब देखेंगे(2)
(2) क़यामत के दिन.

कहेंगे क्या वापस जाने का कोई रास्ता है(3) {44}
(3) यानी दुनिया में, ताकि वहाँ जाकर ईमान ले आएं.

और तुम उन्हें देखोगे कि आग पर पेश किये जाते हैं ज़िल्लत से दबे लचे छुपी निगाहों देखते हैं(4)
(4) यानी ज़िल्लत और ख़ौफ़ के कारण आग को ऐसी तेज़ नज़रों से देखेंगे जैसे कोई क़त्ल होने वाला अपने क़त्ल के वक़्त जल्लाद की तलवार तेज़ निगाह से देखता है.

और ईमान वाले कहेंगे बेशक हार में वो हैं जो अपनी जानें और अपने घर वाले हार बैठे क़यामत के दिन(5)
(5) जानों का हारना तो यह है कि वो कुफ़्र इख़्तियार करके जहन्नम के हमेशगी के अज़ाब में गिरफ़्तार हुए और घर वालों का हारना यह है कि ईमान लाने की सूरत में जन्नत की जो हूरें उनके लिये रखी गई थीं, उनसे मेहरूम हो गए.

सुनते हो बेशक ज़ालिम (6)
(6) यानी काफ़िर.

हमेशा के अज़ाब में हैं {45} और उनके कोई दोस्त न हुए कि अल्लाह के मुक़ाबिल उनकी मदद करते(7)
(7) और उनके अज़ाब से बचा सकते.

और जिसे अल्लाह गुमराह करे उसके लिये कहीं रास्ता नहीं (8){46}
(8) ख़ैर का, न वो दुनिया में हक़ तक पहुंच सके, न आख़िरत में जन्नत तक.

अपने रब का हुक्म मानो(9)
(9) और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की फ़रमाँबरदारी करके तौहीद और अल्लाह की इबादत इख़्तियार करे.

उस दिन के आने से पहले जो अल्लाह की तरफ़ से टलने वाला नहीं(10)
(10) इससे मुराद या मौत का दिन है, या क़यामत का.

उस दिन तुम्हें कोई पनाह न होगी और न तुम्हें इन्कार करते बने(11) {47}
(11) अपने गुनाहों का, यानी उस दिन कोई रिहाई की सूरत नहीं. न अज़ाब से बच सकते हो न अपने  बुरे कर्मों  का इन्कार कर सकते हो जो तुम्हारे आमाल नामों में दर्ज हैं.

तो अगर वो मुंह फेरें(12)
(12) ईमान लाने और फ़रमाँबरदारी करने से.

तो हमने तुम्हें उनपर निगहबान बनाकर नहीं भेजा(13)
(13) कि तुम पर उनके कर्मों की हिफ़ाज़त अनिवार्य हो.

तुम पर तो नहीं मगर पहुंचा देना(14)
(14)और वह तुमने अदा कर दिया.

और जब हम आदमी को अपनी तरफ़ से किसी रहमत का मज़ा देते हैं उस पर ख़ुश हो जाता है, (15)
(15) चाहे वह दौलत और जायदाद हो या सेहत व आफ़ियत या अम्न व सलामती या शान व शौकत.

और अगर उन्हें कोई बुराई पहुंचे (16)
(16) या और कोई मुसीबत और बला जैसे दुष्काल, बीमारी, ग़रीबी वग़ैरह सामने आए.

बदला उसका जो उनके हाथों ने आगे भेजा(17)
(17) यानी उनकी नाफ़रमानियों और गुमराहियों के कारण.

तो इन्सान बड़ नाशुक्रा है (18) {48}
(18) नेअमतों को भूल जाता है.

अल्लाह ही के लिये है आसमानों और ज़मीन की सल्तनत   (19)
(19) जैसे चाहता है, उपयोग में लाता है, कोई दख़्ल देने और ऐतिराज़ करने की मजाल नहीं रखता.

पैदा करता है जो चाहे, जिसे चाहे बेटियां अता करे(20)
(20) बेटा न दे.

और जिसे चाहे बेटे दे(21){49}
(21) बेटी न दे.

या दोनों मिला दे बेटे और बेटियाँ, और जिसे चाहे बांझ कर दे(22)
(22) कि उसके औलाद ही नहो. वह मालिक है अपनी नेअमत को जिस तरह चाहे तक़सीम करे, जिसे जो चाहे दे, नबियों में भी ये सूरतें पाई जाती हैं. हज़रत लूत और हज़रत शूऐब अलैहिस्सलाम के सिर्फ़ बेटियाँ थीं, कोई बेटा न था और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के सिर्फ़ बेटे थे, कोई बेटी हुई ही नहीं. और नबियों के सरदार अल्लाह के हबीब मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को अल्लाह तआला ने चार बेटे अता फ़रमाए और चार बेटियाँ. और हज़रत यहया और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के कोई औलाद ही नहीं.

बेशक वह इल्म व क़ुदरत वाला है {50} और किसी आदमी को नहीं पहुंचता कि अल्लाह उससे कलाम फ़रमाए मगर वही के तौर पर (23)
(23) यानी बेवास्ता उसके दिल में इल्क़ा फ़रमाकर और इल्हाम करके, जागते में या सपने में, इसमें वही की प्राप्ति कानों के माध्यम यानी सुनने के बग़ैर है और आयत में इल्ला वहयन से यही मुराद है. इसमें यह क़ैद नहीं कि इस हाल में सुनने वाला बोलने वाले को देखता हो या न देखता हो. मुजाहिद ने नक़्ल किया कि अल्लाह तआला ने हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम के सीने में ज़बूर की वही फ़रमाई और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को बेटे के ज़िब्ह की ख़्वाब में वही फ़रमाई. और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से मेअराज में इसी तरह की वही फ़रमाई. जिसका “फ़ औहा इला अब्दिही मा औहा” में बयान है. यह सब इसी क़िस्म में दाख़िल हैं. नबियों के ख़्वाब सच्चे होते हैं जैसा कि हदीस शरीफ़ में आया है कि अम्बिया के ख़्वाब वही हैं. (तफ़सीर अबू सऊद व कबीर व मदारिक व ज़रक़ानी अलल मवाहिब वगै़रह)

या यूं कि वह बशर महानता के पर्दे के उधर हो (24)
(24) यानी रसूल पर्दे के पीछे से उसका कलाम सुने. वही के इस तरीक़े में भी कोई वास्ता नहीं मगर सुनने वाले को इस हाल में बोलने वाले का दर्शन नहीं होता. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम इसी तरह के कलाम से बुज़ुर्गी दिये गए. यहूदियों ने हुज़ूर पुरनूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा था कि अगर आप नबी हैं तो अल्लाह तआला से कलाम करते वक़्त उसको क्यों नहीं देखते जैसा कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम देखते थे. हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने जवाब दिया कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम नहीं देखते थे और अल्लाह तआला ने यह आयत उतारी. अल्लाह तआला इससे पाक है कि उसके लिये कोई ऐसा पर्दा हो जैसा जिस्मानियात के लिये होता है. इस पर्दे से मुराद सुनने वाले का दुनिया में दर्शन से मेहजूब होना है.

या कोई फ़रिश्ता भेजे कि वह उसके हुक्म से वही करे जो वह चाहे(25)
(25) वही के इस तरीक़े में रसूल की तरफ़ फ़रिश्ते की वसातत है.

बेशक वह बलन्दी व हिकमत (बोध) वाला है {51} और यूंही हमने तुम्हें वही भेजी(26)
(26) ऐ नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम.

एक जाँफ़ज़ा चीज़(27)
(27) यानी क़ुरआने पाक, जो दिलों में ज़िन्दगी पैदा करता है.

अपने हुक्म से, इससे पहले न तुम किताब जानते थे न शरीअत के आदेशों की तफ़सील हाँ हमने उसे (28)
(28) यानी दीने इस्लाम.

नूर किया जिससे हम राह दिखाते हैं अपने बन्दों से जिसे चाहते हैं, और बेशक तुम ज़रूर सीधी राह बताते हो(29) {52}
(29)

अल्लाह की राह(30) कि उसी का है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में, सुनते हो सब काम अल्लाह ही की तरफ़ फिरते हैं {53}
(30) जो अल्लाह तआला ने अपने बन्दों के लिये मुक़र्रर फ़रमाई.

40 सूरए मूमिन -तीसरा रूकू

40 सूरए मूमिन -तीसरा रूकू

۞ أَوَلَمْ يَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَيَنظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذِينَ كَانُوا مِن قَبْلِهِمْ ۚ كَانُوا هُمْ أَشَدَّ مِنْهُمْ قُوَّةً وَآثَارًا فِي الْأَرْضِ فَأَخَذَهُمُ اللَّهُ بِذُنُوبِهِمْ وَمَا كَانَ لَهُم مِّنَ اللَّهِ مِن وَاقٍ
ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَانَت تَّأْتِيهِمْ رُسُلُهُم بِالْبَيِّنَاتِ فَكَفَرُوا فَأَخَذَهُمُ اللَّهُ ۚ إِنَّهُ قَوِيٌّ شَدِيدُ الْعِقَابِ
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا مُوسَىٰ بِآيَاتِنَا وَسُلْطَانٍ مُّبِينٍ
إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَهَامَانَ وَقَارُونَ فَقَالُوا سَاحِرٌ كَذَّابٌ
فَلَمَّا جَاءَهُم بِالْحَقِّ مِنْ عِندِنَا قَالُوا اقْتُلُوا أَبْنَاءَ الَّذِينَ آمَنُوا مَعَهُ وَاسْتَحْيُوا نِسَاءَهُمْ ۚ وَمَا كَيْدُ الْكَافِرِينَ إِلَّا فِي ضَلَالٍ
وَقَالَ فِرْعَوْنُ ذَرُونِي أَقْتُلْ مُوسَىٰ وَلْيَدْعُ رَبَّهُ ۖ إِنِّي أَخَافُ أَن يُبَدِّلَ دِينَكُمْ أَوْ أَن يُظْهِرَ فِي الْأَرْضِ الْفَسَادَ
وَقَالَ مُوسَىٰ إِنِّي عُذْتُ بِرَبِّي وَرَبِّكُم مِّن كُلِّ مُتَكَبِّرٍ لَّا يُؤْمِنُ بِيَوْمِ الْحِسَابِ

तो क्या उन्होंने ज़मीन में सफ़र न किया कि देखते कैसा अंजाम हुआ उनसे अगलों का(1),
(1) जिन्हों ने रसूलों को झुटलाया था.

उनकी क़ुव्वत और ज़मीन में जो निशानियाँ छोड़ गए(2)
(2) क़िले और महल, नेहरें और हौज़, और बड़ी बड़ी इमारतें.

उनसे ज़्यादा तो अल्लाह ने उन्हें उनके गुनाहों पर पकड़ा, और अल्लाह से उनका कोई बचाने वाला न हुआ(3) {21}
(3) कि अल्लाह के अजाब से बचा सकता, समझदार का काम है कि दूसरे के हाल से इब्रत हासिल करे. इस एहद के काफ़िर यह हाल देखकर क्यों इब्रत हासिल नहीं करते, क्यों नहीं सोचते कि पिछली क़ौमें उनसे ज़्यादा मज़बूत और स्वस्थ, मालदार और अधिकार वाली होने के बावुजूद, इस इब्रत से भरपूर तरीक़े पर तबाह कर दी गई. यह क्यों हुआ.

यह इसलिये कि उनके पास उनके रसूल रौशन निशानियां लेकर आए(4)
(4) चमत्कार दिखाते.

फिर वो कुफ़्र करते तो अल्लाह ने उन्हें पकड़ा, बेशक अल्लाह ज़बरदस्त सख़्त अज़ाब वाला है {22} और बेशक हमने मूसा को अपनी निशानियों और रौशन सनद के साथ भेजा {23} फ़िरऔन और हामान और क़ारून की तरफ़ तो वो बोले जादूगर है बड़ा झूटा(5) {24}
(5) और उन्होंने हमारी निशानियाँ और प्रमाणों को जादू बताया.

फिर जब वह उनपर हमारे पास से हक़ (सच्चाई) लाया (6)
(6) यानी नबी होकर अल्लाह का संदेश लाए तो फ़िरऔन और उसकी क़ौम.

बोले जो इस पर ईमान लाए उनके बेटे क़त्ल करो और औरतें ज़िन्दा रखो(7)
(7) ताकि लोग हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के अनुकरण से बाज़ आएं.

और काफ़िरों का दाव नहीं मगर भटकता फिरता (8) {25}
(8) कुछ भी तो कारआमद नहीं, बिल्कुल निकम्मा और बेकार. पहले भी फ़िरऔनियों ने फ़िरऔन के हुक्म से हज़ारों क़त्ल किये मगर अल्लाह की मर्ज़ी होकर रही और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को रब ने फ़िरऔन के घर बार में पाला, उससे ख़िदमतें कराई. जैसा वह दाव फ़िरऔनियों का बेकार गया ऐसे ही अब ईमान वालों को रोकने के लिये फिर दोबारा क़त्ल शुरू करना बेकार है. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के दीन का प्रचलन अल्लाह तआला को मंज़ूर है, उसे कौन रोक सकता है.

और फ़िरऔन बोला(9)
(9) अपने गिरोह से.

मुझे छोड़ों मैं मूसा को क़त्ल करूं(10)
(10) फ़िरऔन जब कभी हजरत मूसा अलैहिस्सलाम के क़त्ल का इरादा करता तो उसकी क़ौम के लोग उसे इस से मना करते और कहते कि यह वह व्यक्ति नहीं है जिसका तुझे अन्देशा है. यह तो एक मामूली जादूगर है इसपर तो हम अपने जादू से ग़ालिब आ जाएंगे और अगर इसको क़त्ल कर दिया तो आम लोग शुबह में पड़ जाएंगे कि वह व्यक्ति सच्चा था, हक़ पर था, तू दलील से उसका मुक़ाबला करने में आजिज़ हुआ, जवाब न दे सका, तो तूने उसे क़त्ल कर दिया. लेकिन हक़ीक़त में फ़िरऔन का यह कहना कि मुझे छोड़ दो मैं मूसा को क़त्ल करूं, ख़ालिस धमकी ही थी. उसको ख़ुद आपके सच्चे नबी होने का यक़ीन था और वह जानता था कि जो चमत्कार आप लाए हैं वह अल्लाह की आयतें हैं, जादू नहीं. लेकिन यह समझता था कि अगर आप के क़त्ल का इरादा करेगा तो आप उसको हलाक करने में जल्दी फ़रमाएंगे, इससे यह बेहतर है कि बहस बढ़ाने में ज़्यादा वक़्त गुज़ार दिया जाए. अगर फ़िरऔन अपने दिल में आप को सच्चा नबी न समझता और यह न जानता कि अल्लाह की ताईदें जो आपके साथ हैं, उनका मुक़ाबला नामुमकिन है, तो आपके क़त्ल में हरगिज़ देरी न करता क्योंकि वह बड़ा खूंखार, सफ्फ़ाक़, ज़ालिम, बेदर्द था, छोटी सी बात में हज़ारहा ख़ून कर डालता था.

और वह अपने रब को पुकारे(11)
(11)   जिसका अपने आप को रसूल बताता है ताकि उसका रब उसको हमसे बचाए. फ़िरऔन का यह क़ौल इसपर गवाह है कि उसके दिल में आपका और आपकी दुआओ का ख़ौफ़ था. वह अपने दिल में आप से डरता था. दिखावे की इज़्ज़त बनी रखने के लिये यह ज़ाहिर करता था कि वह क़ौम के मना करने के कारण हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को क़त्ल नहीं करता.

मैं डरता हूँ कहीं वह तुम्हारा दीन बदल दे(12)
(12) और तुम से फ़िरऔन परस्ती और बुत परस्ती छुड़ा दे.

या ज़मीन में फ़साद चमकाए(13) {26}
(13) जिदाल और क़िताल करके.

और मूसा ने (14),
(14) फ़िरऔन की धमकियाँ सुनकर.

कहा मैं तुम्हारे और अपने रब की पनाह लेता हूँ हर मुतकब्बिर (घमण्डी) से कि हिसाब के दिन पर यक़ीन नहीं लाता(15) {27}
(15) हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने फ़िरऔन की सख़्तियों के जवाब में अपनी तरफ़ से कोई कलिमा अतिश्योक्ति या बड़ाई का न फ़रमाया बल्कि अल्लाह तआला से पनाह चाही और उसपर भरोसा किया. यही ख़ुदा की पहचान वालों का तरीक़ा है और इसी लिये अल्लाह तआला ने आपको हर एक बला से मेहफ़ूज़ रखा. इन मुबारक जुमलों में कैसी बढ़िया हिदायतें है. यह फ़रमाना कि तुम्हारे और अपने रब की पनाह लेता हूँ और इसमें हिदायत है कि रब एक ही है. यह भी हिदायत है कि जो उसकी पनाह में आए उस पर भरोसा करे तो वह उसकी मदद फ़रमाए, कोई उसको हानि नहीं पहुंचा सकता. यह भी हिदायत है कि उसी पर भरोसा करना बन्दगी की शान है और तुम्हारे रब फ़रमाने में यह भी हिदायत है कि अगर तुम उस पर भरोसा करो तो तुम्हें भी सआदत नसीब हो.

40 सूरए मूमिन -सातवाँ रूकू

40 सूरए मूमिन -सातवाँ रूकू

اللَّهُ الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ اللَّيْلَ لِتَسْكُنُوا فِيهِ وَالنَّهَارَ مُبْصِرًا ۚ إِنَّ اللَّهَ لَذُو فَضْلٍ عَلَى النَّاسِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَشْكُرُونَ
ذَٰلِكُمُ اللَّهُ رَبُّكُمْ خَالِقُ كُلِّ شَيْءٍ لَّا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ فَأَنَّىٰ تُؤْفَكُونَ
كَذَٰلِكَ يُؤْفَكُ الَّذِينَ كَانُوا بِآيَاتِ اللَّهِ يَجْحَدُونَ
اللَّهُ الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ الْأَرْضَ قَرَارًا وَالسَّمَاءَ بِنَاءً وَصَوَّرَكُمْ فَأَحْسَنَ صُوَرَكُمْ وَرَزَقَكُم مِّنَ الطَّيِّبَاتِ ۚ ذَٰلِكُمُ اللَّهُ رَبُّكُمْ ۖ فَتَبَارَكَ اللَّهُ رَبُّ الْعَالَمِينَ
هُوَ الْحَيُّ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ فَادْعُوهُ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ ۗ الْحَمْدُ لِلَّهِ رَبِّ الْعَالَمِينَ
۞ قُلْ إِنِّي نُهِيتُ أَنْ أَعْبُدَ الَّذِينَ تَدْعُونَ مِن دُونِ اللَّهِ لَمَّا جَاءَنِيَ الْبَيِّنَاتُ مِن رَّبِّي وَأُمِرْتُ أَنْ أُسْلِمَ لِرَبِّ الْعَالَمِينَ
هُوَ الَّذِي خَلَقَكُم مِّن تُرَابٍ ثُمَّ مِن نُّطْفَةٍ ثُمَّ مِنْ عَلَقَةٍ ثُمَّ يُخْرِجُكُمْ طِفْلًا ثُمَّ لِتَبْلُغُوا أَشُدَّكُمْ ثُمَّ لِتَكُونُوا شُيُوخًا ۚ وَمِنكُم مَّن يُتَوَفَّىٰ مِن قَبْلُ ۖ وَلِتَبْلُغُوا أَجَلًا مُّسَمًّى وَلَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
هُوَ الَّذِي يُحْيِي وَيُمِيتُ ۖ فَإِذَا قَضَىٰ أَمْرًا فَإِنَّمَا يَقُولُ لَهُ كُن فَيَكُونُ

अल्लाह है जिसने तुम्हारे लिये रात बनाई कि उसमें आराम पाओ और दिन बनाया आँखे खोलता(1)
(1) कि उसमें अपना काम इत्मीनान के साथ करो.

बेशक अल्लाह लोगों पर फ़ज़्ल (कृपा) वाला है लेकिन बहुत आदमी शुक्र नहीं करते {61} वह है अल्लाह तुम्हारा रब हर चीज़ का बनाने वाला, उसके सिवा किसी की बन्दगी नहीं तो कहां औंधे जाते हो(2){62}
(2) कि उसको छोड़कर बुतों को पूजते हो और उसपर ईमान नहीं लाते जबकि दलीलें क़ायम हैं.

यूंही औंधे होते हैं(3)
(3) और हक़ से फिरते हैं, दलीलें क़ायम होने के बावुजूद.

वो जो अल्लाह की आयतों का इन्कार करते हैं(4) {63}
(4) और उनमें सच्चाई जानने के लिये नज़र और ग़ौर नहीं करते.

अल्लाह है जिसने तुम्हारे लिये ज़मीन ठहराव बनाई (5)
(5) कि वह तुम्हारी क़रारगाह हो, ज़िन्दगी में भी और मौत के बाद भी.

और आसमान छत(6)
(6) कि उसको क़ुब्बे की तरह बलन्द फ़रमाया.

और तुम्हारी तस्वीर की, तो तुम्हारी सूरतें अच्छी बनाई (7)
(7) कि तुम्हें अच्छे डील डौल, नूरानी चेहरे और सुडौल किया, जानवरों की तरह न बनाया कि औंधे चलते.

और तुम्हें सुथरी चीज़ें(8)
(8) नफ़ीस खाने पीने की चीज़े.

रोज़ी दीं, यह है अल्लाह तुम्हारा रब, तो बड़ी बरकत वाला है अल्लाह रब सारे जगत का {64} वही ज़िन्दा है (9)
(9) कि उसकी फ़ना मुहाल है, असंभव है.

उसके सिवा किसी की बन्दगी नहीं तो उसे पूजो निरे उसी के बन्दे होकर, सब ख़ूबियां अल्लाह को जो सारे जगत का रब {65} तुम फ़रमाओ मैं मना किया गया हूँ कि उन्हें पूजूं जिन्हें तुम अल्लाह के सिवा पूजते हो (10)
(10) शरीर काफ़िरों ने जिहालत और गुमराही के तौर पर अपने झूठे दीन की तरफ़ हुज़ूर पुरनूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को दावत दी थी और आपसे बुत परस्ती की दरख़्वास्त की थी. इसपर यह आयत उतरी.

जब कि मेरे पास रौशन दलीलें (11)
(11) अक़्ल व वही की तौहीद पर दलालत करने वाली.

मेरे रब की तरफ़ से आईं और मुझे हुक्म हुआ है कि जगत के रब के हुज़ूर (समक्ष) गर्दन रखूं{66} वही है जिसने तुम्हें(12)
(12) यानी तुम्हारे अस्ल और तुम्हारे पितामह हज़रत आदम अलैहिस्सलाम को.

मिट्टी से बनाया फिर (13)
(13)हज़रत आदम के बाद उनकी नस्ल को.

पानी की बूंद से(14)
(14) यानी मनी के क़तरे से.

फिर ख़ून की फुटक से फिर तुम्हें निकालता है बच्चा फिर तुम्हें बाक़ी रखता है कि अपनी जवानी को पहुंचो(15)
(15)और क़ुव्वत समपूर्ण हो.

फिर इसलिये कि बूढ़े हो और तुम में कोई पहले ही उठा लिया जाता है(16)
(16) यानी बुढ़ापे या जवानी के पहुंचने से पहले, यह इसलिये किया कि तुम ज़िन्दगानी करो.

और इसलिये कि तुम एक मुक़र्रर वादे तक पहुंचे (17)
(17)ज़िन्दगी के सीमित समय तक.

और इसलिये कि समझो(18){67}
(18) तौहीद की दलीलों को, और ईमान लाओ.

वही है कि जिलाता है और मारता है, फिर जब कोई हुक्म फ़रमाता है तो उससे यही कहता है कि होजा जभी वह हो जाता है (19){68}
(19)यानी चीज़ों का वुजूद उसके इरादे के आधीन है कि उसने इरादा फ़रमाया और चीज़ मौजूद हुई. न कोई कुलफ़त है न मशक़्क़त है न किसी सामान की हाजत, यह उसकी भरपूर क़ुदरत का बयान है.

39 सूरए ज़ुमर -दूसरा रूकू

39 सूरए  ज़ुमर -दूसरा रूकू

قُلْ يَا عِبَادِ الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا رَبَّكُمْ ۚ لِلَّذِينَ أَحْسَنُوا فِي هَٰذِهِ الدُّنْيَا حَسَنَةٌ ۗ وَأَرْضُ اللَّهِ وَاسِعَةٌ ۗ إِنَّمَا يُوَفَّى الصَّابِرُونَ أَجْرَهُم بِغَيْرِ حِسَابٍ
قُلْ إِنِّي أُمِرْتُ أَنْ أَعْبُدَ اللَّهَ مُخْلِصًا لَّهُ الدِّينَ
وَأُمِرْتُ لِأَنْ أَكُونَ أَوَّلَ الْمُسْلِمِينَ
قُلْ إِنِّي أَخَافُ إِنْ عَصَيْتُ رَبِّي عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ
قُلِ اللَّهَ أَعْبُدُ مُخْلِصًا لَّهُ دِينِي
فَاعْبُدُوا مَا شِئْتُم مِّن دُونِهِ ۗ قُلْ إِنَّ الْخَاسِرِينَ الَّذِينَ خَسِرُوا أَنفُسَهُمْ وَأَهْلِيهِمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ أَلَا ذَٰلِكَ هُوَ الْخُسْرَانُ الْمُبِينُ
لَهُم مِّن فَوْقِهِمْ ظُلَلٌ مِّنَ النَّارِ وَمِن تَحْتِهِمْ ظُلَلٌ ۚ ذَٰلِكَ يُخَوِّفُ اللَّهُ بِهِ عِبَادَهُ ۚ يَا عِبَادِ فَاتَّقُونِ
وَالَّذِينَ اجْتَنَبُوا الطَّاغُوتَ أَن يَعْبُدُوهَا وَأَنَابُوا إِلَى اللَّهِ لَهُمُ الْبُشْرَىٰ ۚ فَبَشِّرْ عِبَادِ
الَّذِينَ يَسْتَمِعُونَ الْقَوْلَ فَيَتَّبِعُونَ أَحْسَنَهُ ۚ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ هَدَاهُمُ اللَّهُ ۖ وَأُولَٰئِكَ هُمْ أُولُو الْأَلْبَابِ
أَفَمَنْ حَقَّ عَلَيْهِ كَلِمَةُ الْعَذَابِ أَفَأَنتَ تُنقِذُ مَن فِي النَّارِ
لَٰكِنِ الَّذِينَ اتَّقَوْا رَبَّهُمْ لَهُمْ غُرَفٌ مِّن فَوْقِهَا غُرَفٌ مَّبْنِيَّةٌ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۖ وَعْدَ اللَّهِ ۖ لَا يُخْلِفُ اللَّهُ الْمِيعَادَ
أَلَمْ تَرَ أَنَّ اللَّهَ أَنزَلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً فَسَلَكَهُ يَنَابِيعَ فِي الْأَرْضِ ثُمَّ يُخْرِجُ بِهِ زَرْعًا مُّخْتَلِفًا أَلْوَانُهُ ثُمَّ يَهِيجُ فَتَرَاهُ مُصْفَرًّا ثُمَّ يَجْعَلُهُ حُطَامًا ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَذِكْرَىٰ لِأُولِي الْأَلْبَابِ

तुम फ़रमाओ ऐ मेरे बन्दों जो ईमान लाए अपने रब से डरो जिन्होंने भलाई की (1)
(1) फ़रमाँबरदारी की और अच्छे कर्म किये.

उनके लिये दुनिया में भलाई है(2)
(2) यानी सेहत और आफ़ियत.

और अल्लाह की ज़मीन फैली हुई है (3)
(3) इसमें हिजरत की तरग़ीब है कि जिस शहर में गुनाहों की ज़ियादती हो और वहाँ के रहने वाले आदमी को अपनी दीनदारी पर क़ायम रहना दुशवार हो जाए, चाहिये कि उस जगह को छोड़ दे और वहाँ से हिजरत कर जाए. यह आयत हबशा के मुहाजिरों के हक़ में उतरी और यह भी कहा गया है कि हज़रत जअफ़र बिन अबी तालिब और उनके साथियों के हक़ में उतरी जिन्हों ने मुसीबतों और बलाओ पर सब्र किया और हिजरत की  और अपने दीन पर क़ायम रहे, उसको छोड़ना गवारा न किया.

साबिरों ही को उनका सवाब भरपूर दिया जाएगा बेगिनती(4) {10}
(4) हज़रत अली मुर्तज़ा रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि हर नेकी करने वाले की नेकियों का वज़न किया जाएगा, सिवाय सब्र करने वालों के कि उन्हें बे अन्दाज़ा और बेहिसाब दिया जाएगा और यह भी रिवायत है कि मुसीबत और बला वाले लोग हाज़िर किये जाएंगे, न उनके लिये मीज़ान क़ायम की जाए, न उनके लिये दफ़्तर खोले जाएं. उन पर अज्र और सवाब की बेहिसाब बारिश होगी, यहाँ तक कि दुनिया में आफ़ियत की ज़िन्दगी बसर करने वाले उन्हें देखकर आरज़ू करेंगे कि काश वो मुसीबत वालों में से होते और उनके जिस्म क़ैंचियों से काटे गए होते कि आज यह सब्र का फल पाते.

तुम फ़रमाओ (5)
(5) ऐ नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम.

मुझे हुक्म है कि अल्लाह को पूजूं निरा उसका बन्दा होकर {11} और मुझे हुक्म है कि मैं सबसे पहले गर्दन रखूं (6) {12}
(6) और फ़रमाँबरदार और ख़ूलूस वालों में मुक़द्दम और साबिक़ यानी आगे और पीछे हों. अल्लाह तआला ने पहले इख़लास का हुक्म दिया जो दिल का अमल है फिर फ़रमाँबरदारी यानी अंगों के कामों का. चूंकि शरीअत के अहकाम रसूल से हासिल होते हैं वही उनके पहुंचाने वाले हैं तो वो उनके शुरू करने में सब से मुक़द्दस और अव्वल हुए. अल्लाह तआला ने अपने रसूल को यह हुक्म देकर तस्बीह की कि दूसरों पर इसकी पाबन्दी निहायत ज़रूरी है और दूसरों की तरग़ीब के लिये नबी अलैहिस्सलाम को यह हुक्म दिया गया.

तुम फ़रमाओ फ़र्ज़ करो अगर मुझसे नाफ़रमानी हो जाए तो मुझे भी अपने रब से एक बड़े दिन के अज़ाब का डर है(7){13}
(7) क़ुरैश के काफ़िरों ने नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा था कि आप अपनी क़ौम के सरदारों और अपने रिश्तेदारों को नहीं देखते जो लात और उज़्ज़ा की पूजा करते हैं उनके रद में यह आयत उतरी.

तुम फ़रमाओ मैं अल्लाह ही को पूजता हूँ निरा उसका बन्दा होकर {14} तो तुम उसके सिवा जिसे चाहो पूजो(8)
(8) हिदायत और तम्बीह के तरीक़े पर फ़रमाया.

तुम फ़रमाओ पूरी हार उन्हें जो अपनी जान और अपने घर वाले क़यामत के दिन हार बैठे (9)
(9) यानी गुमराही इख़्तियार करके हमेशा के लिये जहन्नम के मुस्तहिक़ हो गए और जन्नत की नेअमतों से मेहरूम हो गए जो ईमान लाने पर उन्हें मिलतीं.

हां हां यही खुली हार है {15} उन के ऊपर आग के पहाड़ हैं और उन के नीचे पहाड़ (10)
(10) यानी हर तरफ़ से आग उन्हें घेरे हुए हैं.

इससे अल्लाह डराता है अपने बन्दों को (11)
(11) कि ईमान लाएं और मना की हुई बातों से बचें.

ऐ मेरे बन्दों तुम मुझ से डरो (12) {16}
(12) वह काम न करो जो मेरी नाराज़ी का कारण हो.

और वो जो बुतों की पूजा से बचे और अल्लाह की तरफ़ रूजू हुए उन्हीं के लिये ख़ुशख़बरी है तो ख़ुशी सुनाओ मेरे उन बन्दों को {17} जो कान लगाकर बात सुनें फिर उसके बेहतर पर चलें(13)
(13) जिसमें उनकी भलाई हो.

ये हैं जिनको अल्लाह ने हिदायत फ़रमाई और ये हैं जिनको अक़्ल है(14) {18}
(14) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि जब हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो ईमान लाए तो आपके पास हज़रत उस्मान और अब्दुर्रहमान बिन औंफ़ और तलहा और ज़ुबैर और सअद बिन अबी वक़क़ास और सईद बिन ज़ैद आए और उनसे पूछा. उन्होंने अपने ईमान की ख़बर दी ये हज़रत भी सुनकर ईमान ले आए. इन के हक़ में यह आयत उतरी “फ़बश्शिर इबादिल्लज़ीना” ख़ुशी सुनाओ मेरे उन बन्दों को जो कान लगाकर बात सुने….

तो क्या वह जिसपर अज़ाब की बात साबित हो चुकी निजात वालों के बराबर हो जाएगा तो क्या तुम हिदायत देकर आग के मुस्तहिक़ को बचा लोगे(15) {19}
(15) जो अज़ली बदबख़्त और अल्लाह के इल्म में जहन्नमी है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि मुराद इससे अबू लहब और उसके लड़के हैं.

लेकिन वह जो अपने रब से डरे(16)
(16) और उन्होंने अल्लाह तआला की फ़रमाँबरदारी की.

उनके लिये बालाख़ाने हैं उनपर बालाख़ाने बनें(17)
(17) यानी जन्नत की ऊंची मंज़िलें जिनके ऊपर और बलन्द मंज़िलें हैं.

उनके नीचे नेहरें बहें, अल्लाह का वादा, अल्लाह का वादा ख़िलाफ़ नहीं करता {20} क्या तूने न देखा कि अल्लाह ने आसमान से पानी उतारा फिर उससे ज़मीन में चश्मे बनाए फिर उससे खेती निकालता है कई रंगत की(18)
(18) पीली हरी सुर्ख़ सफ़ेद, क़िस्म की, गेहूँ जौ और तरह तरह के ग़ल्ले.

फिर सूख जाती है तो तू देखे कि वह (19)
(19) हरी भरी होने के बाद.

पीली पड़ गई फिर उसे रेज़ा रेज़ा कर देता है, बेशक इसमें ध्यान की बात है अक़्लमन्दों को(20){21}
(20) जो उससे अल्लाह तआला की वहदानियत और क़ुदरत पर दलीलें कायम करते हैं.