55 Surah Ar-Rahmaan

सूरए रहमान -तीसरा रूकू

55|46|وَلِمَنْ خَافَ مَقَامَ رَبِّهِ جَنَّتَانِ
55|47|فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
55|48|ذَوَاتَا أَفْنَانٍ
55|49|فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
55|50|فِيهِمَا عَيْنَانِ تَجْرِيَانِ
55|51|فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
55|52|فِيهِمَا مِن كُلِّ فَاكِهَةٍ زَوْجَانِ
55|53|فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
55|54|مُتَّكِئِينَ عَلَىٰ فُرُشٍ بَطَائِنُهَا مِنْ إِسْتَبْرَقٍ ۚ وَجَنَى الْجَنَّتَيْنِ دَانٍ
55|55|فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
55|56|فِيهِنَّ قَاصِرَاتُ الطَّرْفِ لَمْ يَطْمِثْهُنَّ إِنسٌ قَبْلَهُمْ وَلَا جَانٌّ
55|57|فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
55|58|كَأَنَّهُنَّ الْيَاقُوتُ وَالْمَرْجَانُ
55|59|فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
55|60|هَلْ جَزَاءُ الْإِحْسَانِ إِلَّا الْإِحْسَانُ
55|61|فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
55|62|وَمِن دُونِهِمَا جَنَّتَانِ
55|63|فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
55|64|مُدْهَامَّتَانِ
55|65|فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
55|66|فِيهِمَا عَيْنَانِ نَضَّاخَتَانِ
55|67|فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
55|68|فِيهِمَا فَاكِهَةٌ وَنَخْلٌ وَرُمَّانٌ
55|69|فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
55|70|فِيهِنَّ خَيْرَاتٌ حِسَانٌ
55|71|فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
55|72|حُورٌ مَّقْصُورَاتٌ فِي الْخِيَامِ
55|73|فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
55|74|لَمْ يَطْمِثْهُنَّ إِنسٌ قَبْلَهُمْ وَلَا جَانٌّ
55|75|فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
55|76|مُتَّكِئِينَ عَلَىٰ رَفْرَفٍ خُضْرٍ وَعَبْقَرِيٍّ حِسَانٍ
55|77|فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكُمَا تُكَذِّبَانِ
55|78|تَبَارَكَ اسْمُ رَبِّكَ ذِي الْجَلَالِ وَالْإِكْرَامِ

और जो अपने रब के हुज़ूर (समक्ष) खड़े होने से डरे(1)
(1) यानी जिसे अपने रब के हुज़ूर क़यामत के दिन मेहशर के मैदान में हिसाब के लिये खड़े होने का डर हो और वह गुनाह छोड़ दे और अल्लाह के अहकाम पर अमल करे.

उसके लिये दो जन्नतें हैं(2){46}
(2) जन्नते अदन और जन्नते नईम और यह भी कहा गया है कि एक जन्नत रब से डरने का सिला और एक वासना त्यागने का इनआम.

तो अपने रब की कौन सी नेअमत झुटलाओगे{47} बहुत सी डालों वालियाँ(3){48}
(3) और हर डाली में क़िस्म क़िस्म के मेवे.

तो अपने रब की कौन सी नेअमत झुटलाओगे{49} उनमें दो चश्मे बहते हैं (4){50}
(4) एक मीठे पानी का और एक पवित्र शराब का या एक तस्नीम दूसरा सलसबील.

तो अपने रब की कौन सी नेअमत झुटलाओगे {51} उनमें हर मेवा दो दो क़िस्म का {52} तो अपने रब की कौन सी नेअमत झुटलाओगे {53} और ऐसे बिछौनों पर तकिया लगाए जिनका अस्तर क़नादीज़ का (5)
(5) यानी संगीन रेशम का जब अस्तर का यह हाल है तो अबरा कैसा होगा, सुब्हानल्लाह !

और दोनों के मेवे इतने झुके हुए कि नीचे से चुन लो (6){54}
(6) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि दरख़्त इतना क़रीब होगा कि अल्लाह तआला के प्यारे खड़े बैठे उसका मेवा चुन लेंगे.

तो अपने रब की कौन सी नेअमत झुटलाओगे {55} उन बिछौनों पर वो औरतें हैं कि शौहर के सिवा किसी को आँख उठा कर नहीं देखतीं(7)
(7) जन्नती बीबियाँ अपने शौहर से कहेंगी मुझे अपने रब के इज़्ज़तो जलाल की क़सम, जन्नत में मुझे कोई चीज़ तुझ से ज़्यादा अच्छी नहीं मालूम होती, तो उस ख़ुदा की हम्द है जिसने तुझे मेरा शौहर किया और मुझे तेरी बीबी बनाया.

उनसे पहले उन्हें न छुआ किसी आदमी और न जिन्न ने{56} तो अपने रब की कौन सी नेअमत झुटलाओगे {57} गोया वो लअल और याक़ूत और मूंगा हैं (8) {58}
(8) सफ़ाई और ख़ुशरंगी में. हदीस शरीफ़ में है कि जन्नती हूरों के शरीर की नफ़ासत का यह हाल है कि उनकी पिंडली का गूदा इस तरह नज़र आता है जिस तरह बिल्लौर की सुराही में लाल शराब.

तो अपने रब की कौन सी नेअमत झुटलाओगे {59} नेकी का बदला क्या है मगर नेकी (9){60}
(9) यानी जिसने दुनिया में नेकी की उसकी जज़ा आख़िरत में अल्लाह का एहसान है, हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि जो लाइलाहा इल्लल्लाह का क़ायल हो और शरीअते मुहम्मदिया पर आमिल, उसकी जज़ा जन्नत है.

तो अपने रब की कौन सी नेअमत झुटलाओगे {61} और इनके सिवा दो जन्नतें और हैं(10){62}
(10) हदीस शरीफ़ में है कि दो जन्नतें तो ऐसी हैं जिनके बर्तन और सामान चाँदी के हैं और दो जन्नतें ऐसी है जिनके सामान और बर्तन सोने के. और एक क़ौल यह भी है कि पहली दो जन्नते सोने और चाँदी की और दूसरी याक़ूत और ज़बरजद की.

तो अपने रब की कौन सी नेअमत झुटलाओगे {63} निहायत सब्ज़ी से सियाही की झलक दे रही है {64} तो अपने रब की कौन सी नेअमत झुटलाओगे{65} उनमें दो चश्में हैं छलकते हुए {66} तो अपने रब की कौन सी नेअमत झुटलाओगे {67} उनमें मेवे और खजूरें और अनार हैं {68} तो अपने रब की कौन सी नेअमत झुटलाओगे {69} उनमें औरतें हैं आदत की नेक, सूरत की अच्छी {70} तो अपने रब की कौन सी नेअमत झुटलाओगे {71} हूरें हैं ख़ैमों में पर्दा नशीन(11){72}
(11) कि उन ख़ैमों से बाहर नहीं निकलतीं यह उनकी शराफ़त और करामत है. हदीस शरीफ़ में है कि अगर जन्नती औरतों में से किसी एक की झलक ज़मीन की तरफ़ पड़ जाए तो आसमान और ज़मीन के बीच की तमाम फ़ज़ा रौशन हो जाए और ख़ुश्बू से भर जाए और उनके ख़ैमे मोती और ज़बरजद के होंगे.
तो अपने रब की कौन सी नेअमतें झुटलाओगे {73} उनसे पहले उन्हें हाथ न लगाया किसी आदमी और जिन्न ने {74} तो अपने रब की कौन सी नेअमत झुटलाओगे(12){75}
(12) और उनके शौहर जन्नत में ऐश करेंगे.

तकिया लगाए हुए सब्ज़ बिछौनों और मुनक़्क़श ख़ूबसूरत चांदनियों पर {76} तो अपने रब की कौन सी नेअमत झुटलाओगे {77} बड़ी बरकत वाला है तुम्हारे रब का नाम जो अज़मत और बुज़ुर्गी वाला {78} (13)

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48-Surah-Fatah

48 सूरए फ़त्ह -चौथा रूकू

لَّقَدْ صَدَقَ اللَّهُ رَسُولَهُ الرُّؤْيَا بِالْحَقِّ ۖ لَتَدْخُلُنَّ الْمَسْجِدَ الْحَرَامَ إِن شَاءَ اللَّهُ آمِنِينَ مُحَلِّقِينَ رُءُوسَكُمْ وَمُقَصِّرِينَ لَا تَخَافُونَ ۖ فَعَلِمَ مَا لَمْ تَعْلَمُوا فَجَعَلَ مِن دُونِ ذَٰلِكَ فَتْحًا قَرِيبًا
هُوَ الَّذِي أَرْسَلَ رَسُولَهُ بِالْهُدَىٰ وَدِينِ الْحَقِّ لِيُظْهِرَهُ عَلَى الدِّينِ كُلِّهِ ۚ وَكَفَىٰ بِاللَّهِ شَهِيدًا
مُّحَمَّدٌ رَّسُولُ اللَّهِ ۚ وَالَّذِينَ مَعَهُ أَشِدَّاءُ عَلَى الْكُفَّارِ رُحَمَاءُ بَيْنَهُمْ ۖ تَرَاهُمْ رُكَّعًا سُجَّدًا يَبْتَغُونَ فَضْلًا مِّنَ اللَّهِ وَرِضْوَانًا ۖ سِيمَاهُمْ فِي وُجُوهِهِم مِّنْ أَثَرِ السُّجُودِ ۚ ذَٰلِكَ مَثَلُهُمْ فِي التَّوْرَاةِ ۚ وَمَثَلُهُمْ فِي الْإِنجِيلِ كَزَرْعٍ أَخْرَجَ شَطْأَهُ فَآزَرَهُ فَاسْتَغْلَظَ فَاسْتَوَىٰ عَلَىٰ سُوقِهِ يُعْجِبُ الزُّرَّاعَ لِيَغِيظَ بِهِمُ الْكُفَّارَ ۗ وَعَدَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ مِنْهُم مَّغْفِرَةً وَأَجْرًا عَظِيمًا

बेशक अल्लाह ने सच कर दिया अपने रसूल का सच्चा ख़्वाब (1)
(1) रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हुदैबिय्यह का इरादा फ़रमाने से पहले मदीनए तैय्यिबह में ख़्वाब देखा था कि आप सहाबा के साथ मक्कए मुअज़्ज़मा में दाख़िल हुए और सहाबा ने सर के बाल मुंडाए, कुछ ने छोटे करवाए. यह ख़्वाब आपने अपने सहाबा से बयान किया तो उन्हें ख़ुशी हुई और उन्होंने ख़याल किया कि इसी साल वो मक्कए मुकर्रमा में दाख़िल होंगे. जब मुसलमान हुदैबिय्यह से सुलह के बाद वापस हुए और उस साल मक्कए मुकर्रमा में दाख़िला न हुआ तो मुनाफ़िक़ों ने मज़ाक़ किया, तअने दिये और कहा कि वह ख़्वाब क्या हुआ. इस पर अल्लाह तआला ने यह आयत उतारी और उस ख़्वाब के मज़मून की तस्दीक़ फ़रमाई कि ज़रूर ऐसा होगा. चुनांन्चे अगले साल ऐसा ही हुआ और मुसलमान अगले साल बड़ी शान व शौकत के साथ मक्कए मुकर्रमा में विजेता के रूप में दाख़िल हुए.

बेशक तुम ज़रूर मस्जिदे हराम में दाख़िल होंगे अगर अल्लाह चाहे अम्नो अमान से अपने सरों के(2)
(2) सारे.

बाल मुंडाते या(3)
(3) थोड़े से.

तरशवाते बेख़ौफ़, तो उसने जाना जो तुम्हे मालूम नहीं(4)
(4) यानी यह कि तुम्हारा दाख़िल होना अगले साल है और तुम इसी साल समझे थे और तुम्हारे लिये यह देरी बेहतर थी कि इसके कारण वहाँ के कमज़ोर मुसलमान पामाल होने से बच गए.

तो उससे पहले (5)
(5) यानी हरम में दाख़िले से पहले.

एक नज़्दीक़ आने वाली फ़त्ह रखी(6) {27}
(6) ख़ैबर की विजय, कि वादा की गई विजय के हासिल होने तक मुसलमानों के दिल इस से राहत पाएं. उसके बाद जब अगला साल आया तो अल्लाह तआला ने हुज़ूर के ख़्वाब का जलवा दिखाया और घटनाएं उसी के अनुसार घटीं. चुनांन्वे इरशाद फ़रमाता है.
वही है जिसने अपने रसूल को हिदायत और सच्चे दीन के साथ भेजा कि उसे सब दीनों पर ग़ालिब करे(7)
(7) चाहे वो मुश्रिकों के दीन हों या एहले किताब के. चुनांन्चे अल्लाह तआला ने यह नेअमत अता फ़रमाई और इस्लाम को तमाम दीनों पर ग़ालिब फ़रमा दिया.

और अल्लाह काफ़ी है गवाह (8){28}
(8) अपने हबीब मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की.

मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं और उनके साथ वाले (9)
(9) यानी उसके साथी.

काफ़िरों पर सख़्त हैं(10)
(10) जैसा कि शेर शिकार पर, और सहाबा की सख़्ती काफ़िरों के साथ इस क़द्र थीं कि वो लिहाज़ रखते थे कि उनका बदन किसी काफ़िर के बदन से न छू जाए और उनके कपड़े पर किसी काफ़िर का कपड़ा न लगने पाए. (मदारिक)

और आपस में नर्म दिल (11)
(11) एक दूसरे पर मेहरबानी करने वाले कि जैसे बाप बेटे में हो और यह महब्बत इस हद तक पहुंच गई कि जब एक मूमिन दूसरे को देखे तो महब्बत के जोश से हाथ मिलाए और गले से लगाए.

उन्हें देखेगा रूकू करते सज्दे में गिरते(12)
(12) बहुतान से नमाज़े पढ़ते, नमाज़ों पर हमेशगी करते.

अल्लाह का फ़ज़्ल और रज़ा चाहते, उनकी निशानी उनके चेहरों में है सज्दों के निशान से(13)
(13) और यह अलामत वह नूर है जो क़यामत के दिन उनके चेहरों पर चमकता होगा उससे पहचाने जाएंगे कि उन्होंने दुनिया में अल्लाह तआला के लिये बहुत सज्दे किये हैं और यह भी कहा गया है कि उनके चेहरों में सज्दे की जगह चौदहवीं के चाँद की तरह चमकती होगी. अता का क़ौल है कि रात की लम्बी नमाज़ों से उनके चेहरों पर नूर नुमायाँ होता है जैसा कि हदीस शरीफ़ में है कि जो रात को नमाज़ की बहुतात रखता है सुब्ह को उसका चेहरा ख़ूबसूरत हो जाता है यह भी कहा गया है कि मिट्टी का निशान भी सज्दे की अलामत है.

यह उनकी सिफ़त (विशेषता) तौरात में है और उनकी सिफ़त इंजील में हैं(14)
(14) यह बयान किया गया है कि.

जैसे एक खेती उसने अपना पट्ठा निकाला फिर उसे ताक़त दी फिर दबीज़ (मोटी) हुई फिर अपनी पिंडली पर सीधी खड़ी हुई किसानों को भली लगती है (15)
(15) यह उदाहरण इस्लाम की शुरूआत और उसकी तरक़्की की बयान की गई कि नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अकेले उठे फिर अल्लाह तआला ने आप को आपके सच्चे महब्बत रखने वाले साथियों से क़ुव्वत अता फ़रमाई. क़तादह ने कहा कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सहाबा की मिसाल इन्जील में यह लिखी है कि एक क़ौम खेती की तरह पैदा होगी और वो नेकियों का हुक्म करेंगे, बुराईयों से रोकेंगे, कहा गया है कि खेती हुज़ूर है और उसकी शाख़े सहाबा और ईमान वाले.

ताकि उनसे काफ़िरों के दिल जलें, अल्लाह ने वादा किया उनसे जो उनमें ईमान और अच्छे कामों वाले हैं (16)
(16) सहाबा सबके सब ईमान वाले और नेक कर्मों वाले हैं इसलिये यह वादा सभी से है.
बख़्शिश और बड़े सवाब का{29}

46 सूरए अहक़ाफ़ -तीसरा रूकू

46 सूरए अहक़ाफ़ -तीसरा रूकू

۞ وَاذْكُرْ أَخَا عَادٍ إِذْ أَنذَرَ قَوْمَهُ بِالْأَحْقَافِ وَقَدْ خَلَتِ النُّذُرُ مِن بَيْنِ يَدَيْهِ وَمِنْ خَلْفِهِ أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا اللَّهَ إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ
قَالُوا أَجِئْتَنَا لِتَأْفِكَنَا عَنْ آلِهَتِنَا فَأْتِنَا بِمَا تَعِدُنَا إِن كُنتَ مِنَ الصَّادِقِينَ
قَالَ إِنَّمَا الْعِلْمُ عِندَ اللَّهِ وَأُبَلِّغُكُم مَّا أُرْسِلْتُ بِهِ وَلَٰكِنِّي أَرَاكُمْ قَوْمًا تَجْهَلُونَ
فَلَمَّا رَأَوْهُ عَارِضًا مُّسْتَقْبِلَ أَوْدِيَتِهِمْ قَالُوا هَٰذَا عَارِضٌ مُّمْطِرُنَا ۚ بَلْ هُوَ مَا اسْتَعْجَلْتُم بِهِ ۖ رِيحٌ فِيهَا عَذَابٌ أَلِيمٌ
تُدَمِّرُ كُلَّ شَيْءٍ بِأَمْرِ رَبِّهَا فَأَصْبَحُوا لَا يُرَىٰ إِلَّا مَسَاكِنُهُمْ ۚ كَذَٰلِكَ نَجْزِي الْقَوْمَ الْمُجْرِمِينَ
وَلَقَدْ مَكَّنَّاهُمْ فِيمَا إِن مَّكَّنَّاكُمْ فِيهِ وَجَعَلْنَا لَهُمْ سَمْعًا وَأَبْصَارًا وَأَفْئِدَةً فَمَا أَغْنَىٰ عَنْهُمْ سَمْعُهُمْ وَلَا أَبْصَارُهُمْ وَلَا أَفْئِدَتُهُم مِّن شَيْءٍ إِذْ كَانُوا يَجْحَدُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَحَاقَ بِهِم مَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ

और याद करो आद के हमक़ौम (1)
(1) हज़रत हूद अलैहिस्सलाम.

को जब उसने उनको अहक़ाफ़ की सरज़मीन (धरती) में डराया(2)
(2) शिर्क से. अहक़ाफ़ एक रेगिस्तानी घाटी है जहाँ क़ौमें आद के लोग रहते थे.

और बेशक इससे पहले डर सुनाने वाले गुज़र चुके और उसके बाद आए कि अल्लाह के सिवा किसी को न पूजो बेशक मुझे तुम पर एक बड़े दिन के अज़ाब का भय है {21} बोले क्या तुम इसलिये आए कि हमें हमारे मअबूदों से फेर दो तो हम पर लाओ (3)
(3) वह अज़ाब.

जिसका हमें वादा देते हो अगर तुम सच्चे हो(4){22}
(4)  इस बात में कि अज़ाब आने वाला है.

उसने फ़रमाया (5)
(5) यानी हूद अलैहिस्सलाम ने.

इसके ख़बर तो अल्लाह ही के पास है(6)
(6) कि अज़ाब कब आएगा.

मैं तो तुम्हें अपने रब के पयाम (संदेश) पहुंचाता हूँ हाँ मेरी दानिस्त (जानकारी) में तुम निरे जाहिल लोग हो(7){23}
(7) जो अज़ाब में जल्दी करते हो और अज़ाब को जानते नहीं क्या चीज़ है.

फिर जब उन्होंने अज़ाब को देखा बादल की तरह आसमान के किनारे में फैला हुआ उनकी वादियों की तरफ़ आता(8)
(8) और लम्बी  मुद्दत से उनकी सरज़मीन में बारिश न हुई थी. इस काले बादल को देखकर ख़ुश हुए.

बोले यह बादल है कि हम पर बरसेगा (9)
(9) हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया.

बल्कि यह तो वह है जिसकी तुम जल्दी मचाते थे, एक आंधी है जिसमें दर्दनाक अज़ाब {24} हर चीज़ को तबाह कर डालती है अपने रब के हुक्म से(10)
(10) चुनांन्चे उस आंधी के अज़ाब ने उनके मर्दों औरतों छोटों बड़ों को हलाक कर दिया और उनके माल आसमान और ज़मीन के बीच उड़ते फिरते थे. चीज़ें टुकड़े टुकड़े हो गई. हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने अपने और अपने ऊपर ईमान लाने वालों के चारों तरफ़ एक लकीर खींच दी थी. हवा जब उस लकीर के अन्दर आती तो अत्यन्त नर्म पाकीज़ा और राहत देने वाली ठण्डी होती और वही हवा क़ौम पर अत्यन्त सख़्त हलाक करने की होती. और यह हज़रत हूद अलैहिस्सलाम का एक महान चमत्कार था.

तो सुब्ह रह गए कि नज़र न आते थे मगर उनके सूने मकान हम ऐसी ही सज़ा देते हैं मुजरिमों को {25} और बेशक हमने उन्हें वो मक़दूर (साधन) दिये थे जो तुम को न दिये (11)
(11) ऐ मक्के वालों, वो क़ुव्वत और माल और लम्बी उम्र में तुम से ज़्यादा थे.

और उनके लिये कान और आँख और दिल बनाए (12)
(12) ताकि दीन के काम में लाएं. मगर उन्होंने सिवाय दुनिया की तलब के ख़ुदा की दी हुई उन नेअमतों से दीन का काम ही नहीं लिया.
तो उनके कान और आँखे और दिल कुछ काम न आए जब कि वो अल्लाह की आयतों का इन्कार करते थे और उन्हें घेर लिया उस अज़ाब ने जिसकी हंसी बनाते थे{26}

43 सूरए ज़ुख़रूफ़

43 सूरए ज़ुख़रूफ़

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ حم
وَالْكِتَابِ الْمُبِينِ
إِنَّا جَعَلْنَاهُ قُرْآنًا عَرَبِيًّا لَّعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
وَإِنَّهُ فِي أُمِّ الْكِتَابِ لَدَيْنَا لَعَلِيٌّ حَكِيمٌ
أَفَنَضْرِبُ عَنكُمُ الذِّكْرَ صَفْحًا أَن كُنتُمْ قَوْمًا مُّسْرِفِينَ
وَكَمْ أَرْسَلْنَا مِن نَّبِيٍّ فِي الْأَوَّلِينَ
وَمَا يَأْتِيهِم مِّن نَّبِيٍّ إِلَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ
فَأَهْلَكْنَا أَشَدَّ مِنْهُم بَطْشًا وَمَضَىٰ مَثَلُ الْأَوَّلِينَ
وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّنْ خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ لَيَقُولُنَّ خَلَقَهُنَّ الْعَزِيزُ الْعَلِيمُ
الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ الْأَرْضَ مَهْدًا وَجَعَلَ لَكُمْ فِيهَا سُبُلًا لَّعَلَّكُمْ تَهْتَدُونَ
وَالَّذِي نَزَّلَ مِنَ السَّمَاءِ مَاءً بِقَدَرٍ فَأَنشَرْنَا بِهِ بَلْدَةً مَّيْتًا ۚ كَذَٰلِكَ تُخْرَجُونَ
وَالَّذِي خَلَقَ الْأَزْوَاجَ كُلَّهَا وَجَعَلَ لَكُم مِّنَ الْفُلْكِ وَالْأَنْعَامِ مَا تَرْكَبُونَ
لِتَسْتَوُوا عَلَىٰ ظُهُورِهِ ثُمَّ تَذْكُرُوا نِعْمَةَ رَبِّكُمْ إِذَا اسْتَوَيْتُمْ عَلَيْهِ وَتَقُولُوا سُبْحَانَ الَّذِي سَخَّرَ لَنَا هَٰذَا وَمَا كُنَّا لَهُ مُقْرِنِينَ
وَإِنَّا إِلَىٰ رَبِّنَا لَمُنقَلِبُونَ
وَجَعَلُوا لَهُ مِنْ عِبَادِهِ جُزْءًا ۚ إِنَّ الْإِنسَانَ لَكَفُورٌ مُّبِينٌ

सूरए ज़ुख़रूफ़ मक्का में उतरी, इसमें 89 आयतें, सात रूकू हैं.
 -पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए ज़ुख़रूफ़ मक्के में उतरी. इस में सात रूकू, नवासी आयतें, और तीन हज़ार चार सौ अक्षर हैं.

हा-मीम {1} रौशन किताब की क़सम (2){2}
(2) यानी क़ुरआन शरीफ़ की, जिसमें हिदायत और गुमराही की राहें अलग अलग और साफ़ कर दीं और उम्मत की सारी शरई ज़रूरतों का बयान फ़रमा दिया.

हमने इसे अरबी क़ुरआन उतारा कि तुम समझो(3) {3}
(3) उसके मानी और आदेशों को.

और बेशक यह अस्ल किताब में(4)
(4) अस्ल किताब से मुराद लौहे मेहफ़ूज़ है. क़ुरआने करीम इसमें दर्ज है.

हमारे पास ज़रूर बलन्दी व हिकमत (बोध) वाला है {4} तो क्या हम तुम से ज़िक्र का पहलू फेर दें इस पर कि तुम लोग हद से बढ़ने वाले हो (5){5}
(5) यानी तुम्हारे कुफ़्र में हद से बढ़ने की वजह से क्या हम तुम्हें बेकार छोड़ दें और तुम्हारी तरफ़ से क़ुरआन की वही का रूख़ फेर दें और तुम्हें न कोई हुक्म दे और न किसी बात से रोकें. मानी ये है कि हम ऐसा न करेंगे. हज़रत क़तादह ने कहा कि ख़ुदा की क़सम अगर यह क़ुरआने पाक उठा लिया जाता उस वक़्त जबकि इस उम्मत के पहले लोगों ने इस से मुंह फेरा था तो वो सब हलाक हो जाते लेकिन उसने अपनी रहमत और करम से इस क़ुरआन का उतारना जारी रखा.

और हमने कितने ही ग़ैब बताने वाले (नबी) अगलों में भेजे{6} और उनके पास जो ग़ैब बताने वाला (नबी) आया उसकी हंसी ही बनाया किये(6) {7}
(6) जैसा कि आपकी क़ौम के लोग करते  हैं.  काफ़िरों का पहले से यह मामूल चला आया है.

तो हमने वो हलाक कर दिये जो उनसे भी पकड़ में सख़्त थे और अगलों का हाल गुज़र चुका है(7){8}
(7) और हर तरह का ज़ोर व क़ुव्वत रखते थे. आपकी उम्मत के लोग जो पहले के काफ़िरों की चालें चलते हैं उन्हे डरना चाहिये कि कहीं उनका भी वही अंजाम न हो जो उनका हुआ कि ज़िल्लत और रूस्वाई की मुसीबतों से हलाक किये गए.

और अगर तुम उनसे पूछो(8)
(8) यानी मुश्रिक लोगों से.

कि आसमान और ज़मीन किसने बनाए तो ज़रूर कहेंगे उन्हें बनाया उस इज़्ज़त वाले इल्म वाले ने(9){9}
(9) यानी इक़रार करेंगे कि आसमान व ज़मीन को अल्लाह तआला ने बनाया और यह भी मानेंगे कि वह इज़्जत और इल्म वाला है. इस इक़रार के बावुजूद दोबारा उठाए जाने का इन्कार कैसी इन्तिहा दर्जे की जिहालत है. इस के बाद अल्लाह तआला अपनी क़ुदरत के इज़हार के लिये अपनी सृजन-शक्ति का ज़िक्र फ़रमाता है और अपने औसाफ़ और शान का इज़हार करता है.

वह जिसने तुम्हारे लिये ज़मीन को बिछौना किया और तुम्हारे लिये उसमें रास्ते किये कि तुम राह पाओ (10){10}
(10) सफ़रों में अपनी मंज़िलों और उद्देश्यों की तरफ़.

और वह जिसने आसमान से पानी उतारा एक अन्दाज़े से,(11)
(11) तुम्हारी हाजतों की क़द्र, न इतना कम कि उससे तुम्हारी हाजतें पूरी न हों न इतना ज़्यादा कि क़ौमे नूह की तरह तुम्हें हलाक कर दे.

तो हमने उस से एक मुर्दा शहर ज़िन्दा फ़रमा दिया, यूं ही तुम निकाले जाओगे(12) {11}
(12) अपनी क़ब्रों से ज़िन्दा करके.

और जिसने सब जोड़े बनाए (13)
(13) यानी सारी अस्नाफ़ और क़िस्में. कहा गया है कि अल्लाह तआला तन्हा है, ज़िद और बराबरी और ज़ौजियत से पाक है उसके सिवा ख़ल्क़ में जो है, जोड़े से है.

और तुम्हारे लिये किश्तियाँ और चौपायों से सवारियाँ बनाई {12} कि तुम उनकी पीठों पर ठीक बैठो(14)
(14) ख़ुश्की और तरी के सफ़र में.

फिर अपने रब की नेअमत याद करो जब उस पर ठीक बैठ लो और यूं कहो पाकी है उसे जिसने इस सवारी को हमारे बस में कर दिया और यह हमारे बूते की न थी {13} और बेशक हमें अपने रब की तरफ़ पलटना है (15) {14}
(15) अन्त में, मुस्लिम शरीफ़ की हदीस में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम जब सफ़र में तशरीफ़ ले जाते तो अपनी ऊंटनी पर सवार होते वक़्त पहले अल्हम्दु लिल्लाह पढ़ते फिर सुब्हानल्लाह और अल्लाहो अकबर. ये सब तीन तीन बार फिर यह आयत पढ़ते “सुब्हानल्लज़ी सख़्ख़रा लना हाज़ा व मा कुन्ना लहू मुक़रिनीन, व इन्ना इला रब्बिना ल मुन्क़लिबून” यानी पाकी है उसे जिसने इस सवारी को हमारे बस में कर दिया और यह हमारे बूते न थी और बेशक हमें अपने रब की तरफ़ पलटना है. (सूरए ज़ुख़रूफ़, आयत 13) और इसके बाद और दुआएं पढ़ते और जब हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम किश्ती में सवार होते तो फ़रमाते “बिस्मिल्लाहे मजरीहा व मुरसाहा इन्ना रब्बी ल ग़फ़ूरूर रहीम”यानी अल्लाह के नाम पर उसका चलना और उसका ठहरना बेशक मेरा रब ज़रूर बख़्शने वाला मेहरबान है. (सूरए हूद, आयत 41)

और उसके लिये उसके बन्दों में से टुकड़ा ठहराया, (16)
(16) यानी काफ़िरों ने इस इक़रार के बावुजूद कि अल्लाह तआला आसमान व ज़मीन का ख़ालिक़ है यह सितम किया कि फ़रिश्तों को अल्लाह तआला की बेटियाँ बताया और औलाद साहिबे औलाद का हिस्सा होती है. ज़ालिमों ने अल्लाह तआला के लिये हिस्सा क़रार दिया कैसा भारी जुर्म है.

बेशक आदमी (17)
(17) जो ऐसी बातों को मानता है.

खुला नाशुक्रा है (18) {15}
(18) उसका कुफ़्र ज़ाहिर है.

40 सूरए मूमिन -तीसरा रूकू

40 सूरए मूमिन -तीसरा रूकू

۞ أَوَلَمْ يَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَيَنظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذِينَ كَانُوا مِن قَبْلِهِمْ ۚ كَانُوا هُمْ أَشَدَّ مِنْهُمْ قُوَّةً وَآثَارًا فِي الْأَرْضِ فَأَخَذَهُمُ اللَّهُ بِذُنُوبِهِمْ وَمَا كَانَ لَهُم مِّنَ اللَّهِ مِن وَاقٍ
ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ كَانَت تَّأْتِيهِمْ رُسُلُهُم بِالْبَيِّنَاتِ فَكَفَرُوا فَأَخَذَهُمُ اللَّهُ ۚ إِنَّهُ قَوِيٌّ شَدِيدُ الْعِقَابِ
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا مُوسَىٰ بِآيَاتِنَا وَسُلْطَانٍ مُّبِينٍ
إِلَىٰ فِرْعَوْنَ وَهَامَانَ وَقَارُونَ فَقَالُوا سَاحِرٌ كَذَّابٌ
فَلَمَّا جَاءَهُم بِالْحَقِّ مِنْ عِندِنَا قَالُوا اقْتُلُوا أَبْنَاءَ الَّذِينَ آمَنُوا مَعَهُ وَاسْتَحْيُوا نِسَاءَهُمْ ۚ وَمَا كَيْدُ الْكَافِرِينَ إِلَّا فِي ضَلَالٍ
وَقَالَ فِرْعَوْنُ ذَرُونِي أَقْتُلْ مُوسَىٰ وَلْيَدْعُ رَبَّهُ ۖ إِنِّي أَخَافُ أَن يُبَدِّلَ دِينَكُمْ أَوْ أَن يُظْهِرَ فِي الْأَرْضِ الْفَسَادَ
وَقَالَ مُوسَىٰ إِنِّي عُذْتُ بِرَبِّي وَرَبِّكُم مِّن كُلِّ مُتَكَبِّرٍ لَّا يُؤْمِنُ بِيَوْمِ الْحِسَابِ

तो क्या उन्होंने ज़मीन में सफ़र न किया कि देखते कैसा अंजाम हुआ उनसे अगलों का(1),
(1) जिन्हों ने रसूलों को झुटलाया था.

उनकी क़ुव्वत और ज़मीन में जो निशानियाँ छोड़ गए(2)
(2) क़िले और महल, नेहरें और हौज़, और बड़ी बड़ी इमारतें.

उनसे ज़्यादा तो अल्लाह ने उन्हें उनके गुनाहों पर पकड़ा, और अल्लाह से उनका कोई बचाने वाला न हुआ(3) {21}
(3) कि अल्लाह के अजाब से बचा सकता, समझदार का काम है कि दूसरे के हाल से इब्रत हासिल करे. इस एहद के काफ़िर यह हाल देखकर क्यों इब्रत हासिल नहीं करते, क्यों नहीं सोचते कि पिछली क़ौमें उनसे ज़्यादा मज़बूत और स्वस्थ, मालदार और अधिकार वाली होने के बावुजूद, इस इब्रत से भरपूर तरीक़े पर तबाह कर दी गई. यह क्यों हुआ.

यह इसलिये कि उनके पास उनके रसूल रौशन निशानियां लेकर आए(4)
(4) चमत्कार दिखाते.

फिर वो कुफ़्र करते तो अल्लाह ने उन्हें पकड़ा, बेशक अल्लाह ज़बरदस्त सख़्त अज़ाब वाला है {22} और बेशक हमने मूसा को अपनी निशानियों और रौशन सनद के साथ भेजा {23} फ़िरऔन और हामान और क़ारून की तरफ़ तो वो बोले जादूगर है बड़ा झूटा(5) {24}
(5) और उन्होंने हमारी निशानियाँ और प्रमाणों को जादू बताया.

फिर जब वह उनपर हमारे पास से हक़ (सच्चाई) लाया (6)
(6) यानी नबी होकर अल्लाह का संदेश लाए तो फ़िरऔन और उसकी क़ौम.

बोले जो इस पर ईमान लाए उनके बेटे क़त्ल करो और औरतें ज़िन्दा रखो(7)
(7) ताकि लोग हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के अनुकरण से बाज़ आएं.

और काफ़िरों का दाव नहीं मगर भटकता फिरता (8) {25}
(8) कुछ भी तो कारआमद नहीं, बिल्कुल निकम्मा और बेकार. पहले भी फ़िरऔनियों ने फ़िरऔन के हुक्म से हज़ारों क़त्ल किये मगर अल्लाह की मर्ज़ी होकर रही और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को रब ने फ़िरऔन के घर बार में पाला, उससे ख़िदमतें कराई. जैसा वह दाव फ़िरऔनियों का बेकार गया ऐसे ही अब ईमान वालों को रोकने के लिये फिर दोबारा क़त्ल शुरू करना बेकार है. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के दीन का प्रचलन अल्लाह तआला को मंज़ूर है, उसे कौन रोक सकता है.

और फ़िरऔन बोला(9)
(9) अपने गिरोह से.

मुझे छोड़ों मैं मूसा को क़त्ल करूं(10)
(10) फ़िरऔन जब कभी हजरत मूसा अलैहिस्सलाम के क़त्ल का इरादा करता तो उसकी क़ौम के लोग उसे इस से मना करते और कहते कि यह वह व्यक्ति नहीं है जिसका तुझे अन्देशा है. यह तो एक मामूली जादूगर है इसपर तो हम अपने जादू से ग़ालिब आ जाएंगे और अगर इसको क़त्ल कर दिया तो आम लोग शुबह में पड़ जाएंगे कि वह व्यक्ति सच्चा था, हक़ पर था, तू दलील से उसका मुक़ाबला करने में आजिज़ हुआ, जवाब न दे सका, तो तूने उसे क़त्ल कर दिया. लेकिन हक़ीक़त में फ़िरऔन का यह कहना कि मुझे छोड़ दो मैं मूसा को क़त्ल करूं, ख़ालिस धमकी ही थी. उसको ख़ुद आपके सच्चे नबी होने का यक़ीन था और वह जानता था कि जो चमत्कार आप लाए हैं वह अल्लाह की आयतें हैं, जादू नहीं. लेकिन यह समझता था कि अगर आप के क़त्ल का इरादा करेगा तो आप उसको हलाक करने में जल्दी फ़रमाएंगे, इससे यह बेहतर है कि बहस बढ़ाने में ज़्यादा वक़्त गुज़ार दिया जाए. अगर फ़िरऔन अपने दिल में आप को सच्चा नबी न समझता और यह न जानता कि अल्लाह की ताईदें जो आपके साथ हैं, उनका मुक़ाबला नामुमकिन है, तो आपके क़त्ल में हरगिज़ देरी न करता क्योंकि वह बड़ा खूंखार, सफ्फ़ाक़, ज़ालिम, बेदर्द था, छोटी सी बात में हज़ारहा ख़ून कर डालता था.

और वह अपने रब को पुकारे(11)
(11)   जिसका अपने आप को रसूल बताता है ताकि उसका रब उसको हमसे बचाए. फ़िरऔन का यह क़ौल इसपर गवाह है कि उसके दिल में आपका और आपकी दुआओ का ख़ौफ़ था. वह अपने दिल में आप से डरता था. दिखावे की इज़्ज़त बनी रखने के लिये यह ज़ाहिर करता था कि वह क़ौम के मना करने के कारण हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को क़त्ल नहीं करता.

मैं डरता हूँ कहीं वह तुम्हारा दीन बदल दे(12)
(12) और तुम से फ़िरऔन परस्ती और बुत परस्ती छुड़ा दे.

या ज़मीन में फ़साद चमकाए(13) {26}
(13) जिदाल और क़िताल करके.

और मूसा ने (14),
(14) फ़िरऔन की धमकियाँ सुनकर.

कहा मैं तुम्हारे और अपने रब की पनाह लेता हूँ हर मुतकब्बिर (घमण्डी) से कि हिसाब के दिन पर यक़ीन नहीं लाता(15) {27}
(15) हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने फ़िरऔन की सख़्तियों के जवाब में अपनी तरफ़ से कोई कलिमा अतिश्योक्ति या बड़ाई का न फ़रमाया बल्कि अल्लाह तआला से पनाह चाही और उसपर भरोसा किया. यही ख़ुदा की पहचान वालों का तरीक़ा है और इसी लिये अल्लाह तआला ने आपको हर एक बला से मेहफ़ूज़ रखा. इन मुबारक जुमलों में कैसी बढ़िया हिदायतें है. यह फ़रमाना कि तुम्हारे और अपने रब की पनाह लेता हूँ और इसमें हिदायत है कि रब एक ही है. यह भी हिदायत है कि जो उसकी पनाह में आए उस पर भरोसा करे तो वह उसकी मदद फ़रमाए, कोई उसको हानि नहीं पहुंचा सकता. यह भी हिदायत है कि उसी पर भरोसा करना बन्दगी की शान है और तुम्हारे रब फ़रमाने में यह भी हिदायत है कि अगर तुम उस पर भरोसा करो तो तुम्हें भी सआदत नसीब हो.

40 सूरए मूमिन -छटा रूकू

40 सूरए मूमिन -छटा रूकू

إِنَّا لَنَنصُرُ رُسُلَنَا وَالَّذِينَ آمَنُوا فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا وَيَوْمَ يَقُومُ الْأَشْهَادُ
يَوْمَ لَا يَنفَعُ الظَّالِمِينَ مَعْذِرَتُهُمْ ۖ وَلَهُمُ اللَّعْنَةُ وَلَهُمْ سُوءُ الدَّارِ
وَلَقَدْ آتَيْنَا مُوسَى الْهُدَىٰ وَأَوْرَثْنَا بَنِي إِسْرَائِيلَ الْكِتَابَ
هُدًى وَذِكْرَىٰ لِأُولِي الْأَلْبَابِ
فَاصْبِرْ إِنَّ وَعْدَ اللَّهِ حَقٌّ وَاسْتَغْفِرْ لِذَنبِكَ وَسَبِّحْ بِحَمْدِ رَبِّكَ بِالْعَشِيِّ وَالْإِبْكَارِ
إِنَّ الَّذِينَ يُجَادِلُونَ فِي آيَاتِ اللَّهِ بِغَيْرِ سُلْطَانٍ أَتَاهُمْ ۙ إِن فِي صُدُورِهِمْ إِلَّا كِبْرٌ مَّا هُم بِبَالِغِيهِ ۚ فَاسْتَعِذْ بِاللَّهِ ۖ إِنَّهُ هُوَ السَّمِيعُ الْبَصِيرُ
لَخَلْقُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ أَكْبَرُ مِنْ خَلْقِ النَّاسِ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يَعْلَمُونَ
وَمَا يَسْتَوِي الْأَعْمَىٰ وَالْبَصِيرُ وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَلَا الْمُسِيءُ ۚ قَلِيلًا مَّا تَتَذَكَّرُونَ
إِنَّ السَّاعَةَ لَآتِيَةٌ لَّا رَيْبَ فِيهَا وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَ النَّاسِ لَا يُؤْمِنُونَ
وَقَالَ رَبُّكُمُ ادْعُونِي أَسْتَجِبْ لَكُمْ ۚ إِنَّ الَّذِينَ يَسْتَكْبِرُونَ عَنْ عِبَادَتِي سَيَدْخُلُونَ جَهَنَّمَ دَاخِرِينَ

बेशक ज़रूर हम अपने रसूलों की मदद करेंगे और ईमान वालों की(1)
(1) उनको ग़लबा अता फ़रमाकर और मज़बूत तर्क देकर और उनके दुश्मनों से बदला लेकर.

दुनिया की ज़िन्दगी में और जिस दिन गवाह खड़े होंगे(2){51}
(2) वह क़यामत का दिन है कि फ़रिश्तों रसूलों की तबलीग़ और काफ़िरों के झुटलाने की गवाही देंगे.

जिस दिन ज़ालिमों को उनके बहाने कुछ काम न देंगे(3)
(3) और काफ़िरों का कोई बहाना क़ुबून न किया जाएगा.

और उनके लिये लअनत है और उनके लिये बुरा घर(4){52}
(4) यानी जहन्नम.

और बेशक हम ने मूसा को रहनुमाई अता फ़रमाई (5)
(5) यानी तौरात और चमत्कार.

और बनी इस्राईल को किताब का वारिस किया (6) {53}
(6) यानी तौरात का या उन नबियों पर उतरी तमाम किताबों का.

अक़्लमन्दों की हिदायत और नसीहत को {54} तो ऐ महबूब तुम सब्र करो(7)
(7) अपनी क़ौम की तकलीफ़ पर.

बेशक अल्लाह का वादा सच्चा है(8)
(8) वह आपकी मदद फ़रमाएगा, आपके दीन को ग़ालिब करेगा, आपके दुश्मनों को हलाक करेगा. कलबी ने कहा कि सब्र की आयत जंग की आयत से मन्सूख़ हो गई.

और अपनों के गुनाहों की माफ़ी चाहो(9)
(9) यानी अपनी उम्मत के. (मदारिक)

और अपने रब की तारीफ़ करते हुए सुब्ह और शाम उसकी पाकी बोलो(10){55}
(10) यानी अल्लाह तआला की इबादत पर हमेशगी रखो और हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया इससे पाँचों नमाज़ें मुराद हैं.

वो जो अल्लाह की आयतों में झगड़ा करते हैं बे किसी सनद के जो उन्हें मिली हो(11)
(11) इन झगड़ा करने वालों से क़ुरैश के काफ़िर मुराद हैं.

उनके दिलों में नहीं मगर एक बड़ाई की हविस (12)
(12) और उनका यही घमण्ड उनके झुटलाने और इन्कार और कुफ़्र के अपनाने का कारण हुआ कि उन्होंने यह गवारा न किया कि कोई उनसे ऊंचा हो. इसलिये सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से दुश्मनों की, इस झूठे ख़याल से कि अगर आपको नबी मान लेंगे तो अपनी बड़ाई जाती रहेगी और उम्मती और छोटा बनना पड़ेगा और हविस रखते हैं बड़े बनने की.

जिसे न पहुंचेंगे(13)
(13) और बड़ाई मयस्सर न आएगी बल्कि हुज़ूर की मुख़ालिफ़त और इन्कार उनके हक़ में ज़िल्लत और रूस्वाई का कारण होगा.

तो तुम अल्लाह की पनाह मांगो(14)
(14)हासिदों के छलकपट से.

बेशक वही सुनता देखता है {56} बेशक आसमानों और ज़मीन की पैदायश आदमियों की पैदायश से बहुत बड़ी (15)
(15)यह आयत दोबारा उठाए जाने का इन्कार करने वालों के रद में उतरी. उनपर हुज्जत क़ायम की गई कि जब तुम आसमान और ज़मीन की पैदाइश पर उनकी इस विशालता और बड़ाई के बावुज़ूद अल्लाह तआला को क़ादिर मानते हो तो फिर इन्सान को दोबारा पैदा कर देना उसकी क़ुदरत से क्यों दूर समझते हो.

लेकिन बहुत लोग नहीं जानते(16){57}
(16) बहुत लोगों से मुराद यहाँ काफ़िर हैं और उनके दोबारा उठाए जाने के इन्कार का सबब उनकी अज्ञानता है कि वो आसमान और ज़मीन की पैदायश पर क़ादिर होने से दोबारा उठाए जाने पर इस्तिदलाल नहीं करते तो वो अन्धे की तरह हैं और जो मख़लूक़ात के वुजूद से ख़ालिक़ की क़ुदरत पर इस्तिदलाल करते हैं आँख वाले की तरह हैं.

और अंधा और अंखियारा बराबर नहीं(17)
(17) यानी जाहिल और आलिम एक से नहीं.

और न वो जो ईमान लाए और अच्छे काम किये और बदकार(18)
(18) यानी नेक ईमान वाला और बुरे काम करने वाला, ये दोनों भी बराबर नहीं.

कितना कम ध्यान करते हो {58} बेशक क़यामत ज़रूर आने वाली है इसमें कुछ शक नहीं लेकिन बहुत लोग ईमान नहीं लाते (19) {59}
(19) मरने के बाद ज़िन्दा किये जाने पर यक़ीन नहीं करते.

और तुम्हारे रब ने फ़रमाया मुझ से दुआ करो मैं क़ुबूल करूंगा (20) बेशक वो जो मेरी इबादत से ऊंचे खिंचते (घमण्ड करते) हैं बहुत जल्द जहन्नम में जाएंगे ज़लील होकर {60}
(20) अल्लाह तआला अपने बन्दों की दुआएं अपनी रहमत से क़ुबूल फ़रमाता है और उनके क़ुबूल के लिये कुछ शर्ते हैं एक इख़लास दुआ में, दूसरे यह कि दिल ग़ैर की तरफ़ न लगे, तीसरे यह कि वह दुआ किसी ग़लत मक़सद के लिये न हो, चौथे यह कि अल्लाह तआला की रहमत पर यक़ीन रखता हो, पाँचवे यह कि शिकायत न करे कि मैंने दुआ माँगी, क़ुबूल न हुई. जब इन शर्तों से दुआ की जाती है, क़ुबूल होती है.  हदीस शरीफ़ में है कि दुआ करने वाले की दुआ क़ुबूल होती है. या तो उससे उसकी मुराद दुनिया ही में उसको जल्द दे दी जाती है या आख़िरत में उसके लिये जमा होती है या उसके गुनाहों का कफ़्फ़ारा कर दिया जाता है. इस आयत की तफ़सीर में एक क़ौल यह भी है कि दुआ से मुराद इबादत है और क़ुरआन करीम से दुआ इबादत के अर्थ में बहुत जगह आई है. हदीस शरीफ़ में है “अद-दुआओ हुवल इबादतो” (अबू दाऊद, तिरमिज़ी) इस सूरत में आयत के मानी ये होंगे कि तुम मेरी इबादत करो मैं तुम्हें सवाब दूंगा.

38 सूरए सॉद -दूसरा रूकू

38 सूरए सॉद -दूसरा रूकू

وَمَا يَنظُرُ هَٰؤُلَاءِ إِلَّا صَيْحَةً وَاحِدَةً مَّا لَهَا مِن فَوَاقٍ
وَقَالُوا رَبَّنَا عَجِّل لَّنَا قِطَّنَا قَبْلَ يَوْمِ الْحِسَابِ
اصْبِرْ عَلَىٰ مَا يَقُولُونَ وَاذْكُرْ عَبْدَنَا دَاوُودَ ذَا الْأَيْدِ ۖ إِنَّهُ أَوَّابٌ
إِنَّا سَخَّرْنَا الْجِبَالَ مَعَهُ يُسَبِّحْنَ بِالْعَشِيِّ وَالْإِشْرَاقِ
وَالطَّيْرَ مَحْشُورَةً ۖ كُلٌّ لَّهُ أَوَّابٌ
وَشَدَدْنَا مُلْكَهُ وَآتَيْنَاهُ الْحِكْمَةَ وَفَصْلَ الْخِطَابِ
۞ وَهَلْ أَتَاكَ نَبَأُ الْخَصْمِ إِذْ تَسَوَّرُوا الْمِحْرَابَ
إِذْ دَخَلُوا عَلَىٰ دَاوُودَ فَفَزِعَ مِنْهُمْ ۖ قَالُوا لَا تَخَفْ ۖ خَصْمَانِ بَغَىٰ بَعْضُنَا عَلَىٰ بَعْضٍ فَاحْكُم بَيْنَنَا بِالْحَقِّ وَلَا تُشْطِطْ وَاهْدِنَا إِلَىٰ سَوَاءِ الصِّرَاطِ
إِنَّ هَٰذَا أَخِي لَهُ تِسْعٌ وَتِسْعُونَ نَعْجَةً وَلِيَ نَعْجَةٌ وَاحِدَةٌ فَقَالَ أَكْفِلْنِيهَا وَعَزَّنِي فِي الْخِطَابِ
قَالَ لَقَدْ ظَلَمَكَ بِسُؤَالِ نَعْجَتِكَ إِلَىٰ نِعَاجِهِ ۖ وَإِنَّ كَثِيرًا مِّنَ الْخُلَطَاءِ لَيَبْغِي بَعْضُهُمْ عَلَىٰ بَعْضٍ إِلَّا الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَقَلِيلٌ مَّا هُمْ ۗ وَظَنَّ دَاوُودُ أَنَّمَا فَتَنَّاهُ فَاسْتَغْفَرَ رَبَّهُ وَخَرَّ رَاكِعًا وَأَنَابَ ۩
فَغَفَرْنَا لَهُ ذَٰلِكَ ۖ وَإِنَّ لَهُ عِندَنَا لَزُلْفَىٰ وَحُسْنَ مَآبٍ
يَا دَاوُودُ إِنَّا جَعَلْنَاكَ خَلِيفَةً فِي الْأَرْضِ فَاحْكُم بَيْنَ النَّاسِ بِالْحَقِّ وَلَا تَتَّبِعِ الْهَوَىٰ فَيُضِلَّكَ عَن سَبِيلِ اللَّهِ ۚ إِنَّ الَّذِينَ يَضِلُّونَ عَن سَبِيلِ اللَّهِ لَهُمْ عَذَابٌ شَدِيدٌ بِمَا نَسُوا يَوْمَ الْحِسَابِ

और ये राह नहीं देखते मगर एक चीख़ की(1)
(1)  यानी क़यामत के पहले सूर के फूंके जाने की, जो उनके अज़ाब की मीआद है.

जिसे कोई फेर नहीं सकता {15} और बोले ऐ हमारे रब हमारा हिस्सा हमें जल्द दे दे हिसाब के दिन से पहले(2){16}
(2) यह नज़र बिर हारिस ने हंसी के तौर पर कहा था, इसपर अल्लाह तआला ने अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से फ़रमाया कि—-

तुम उनकी बातों पर सब्र करो और हमारे बन्दे दाऊद नेअमातें वाले को याद करो(3)
(3) जिन को इबादत की बहुत कुव्वत दी गई थी. आप का तरीक़ा था कि एक दिन रोज़ा रखते, एक दिन इफ़्तार करते और रात के पहले आधे हिस्से में इबादत करते उसके बाद रात की एक तिहाई आराम फ़रमाते फिर बाक़ी छटा इबादत में गुज़ारते.

बेशक वह बड़ा  रूजू करने वाला है (4) {17}
(4) अपने रब की तरफ.

बेशक हमने उसके साथ पहाड़ मुसख़्ख़र (वशीभूत) फ़रमा दिये कि तस्बीह करते(5)
(5) हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की तस्बीह के साथ.

शाम को और सूरज चमकते{18} (6)
(6)  इस आयत की तफ़सीर में यह भी कहा गया है कि अल्लाह तआला ने हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम के लिये पहाड़ों को ऐसा मुसख़्ख़र यानी वशीभूत किया था कि जहाँ आप चाहते साथ ले जाते. (मदारिक)

और परिंदे जमा किए हुए सब उसके फ़रमाँबरदार थे(7){19}
(7) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि जब हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम तस्बीह करते तो पहाड़ भी आपके साथ तस्बीह करते और पक्षी आपके पास जमा होकर तस्बीह करते.

(8)
(8) पहाड़ भी और पक्षी भी.

और हमने उसकी सल्तनत को मज़बूत किया(9)
(9) फ़ौज़ और लश्कर की कसरत अता फ़रमाकर. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि धरती के बादशाहों में हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की बड़ी मज़बूत और ताक़तवार सल्तनत थी, छत्तीस हज़ार मर्द आप की मेहराब के पहरे पर मुक़र्रर थे.

और उसे हिकमत (बोध)(10)
(10) यानी नबुव्वत. कुछ मुफ़स्सिरों ने हिकमत की तफ़सीर इन्साफ़ की है, कुछ ने अल्लाह की किताब का इल्म, कुछ ने फ़िक़्ह, कुछ ने सुन्नत (जुमल)

और क़ौले फ़ैसल दिया(11) {20}
(11) क़ौले फ़ैसल से इल्मे कज़ा मुराद है जो सच और झूठ, सत्य और असत्य में फ़र्क़ और तमीज़ कर दे.

और क्या तुम्हें (12)
(12) ऐ सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

उस दावे वालों की भी ख़बर आई, जब वो दीवार कूद कर दाऊद की मस्जिद में आए(13){21}
(13) ये आने वाले, मशहूर क़ौल के अनुसार, फ़रिश्ते थे, जो हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की आज़मायश के लिये आए थे.

जब वो दाऊद पर दाख़िल हुए तो वह उनसे घबरा गया उन्होंने अर्ज़ की डरिये नहीं हम दो फ़रीक़ (पक्ष) हैं कि एक ने दूसरे पर ज़ियादती की है(14)
(14) उनका यह क़ौल एक मसअले की फ़र्ज़ी शक्ल पेश करके जवाब हासिल करना था और किसी मसअले के बारे में हुक्म मालूम करने के लिये फ़र्ज़ी सूरतें मुक़र्रर कर ली जाती हैं और निर्धारित व्यक्तियों की तरफ़ उनकी निस्बत कर दी जाती है. ताकि मसअले का बयान बहुत साफ़ तरीक़े पर हो और इबहाम बाक़ी न रहे. यहाँ जो मसअले की सूरत इन फ़रिश्तों ने पेश की इस से मक़सूद हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम को तवज्जह दिलाना था इस बात की तरफ़, जो उन्हें पेश आई थी और वह यह थी किं आपकी 99 बीबियाँ थीं. इसके बाद आपने एक और औरत को पयाम दे दिया जिसको एक मुसलमान पहले से पयाम दे चुका था लेकिन आपका संदेश पहुंचने के बाद औरत के अज़ीज़ रिश्तेदार दूसरे की तरफ़ इल्तिफ़ात करने वाल कब थे. आपके लिये राज़ी हो गए और आपसे निकाहा हो गया. एक क़ौल यह भी है कि उस मुसलमान के साथ निकाह हो चुका था. आपने उस मुसलमान से अपनी रग़बत का इज़हार किया और चाहा कि वह अपनी औरत को तलाक़ दे दे. वह आपके लिहाज़ से मना न कर सका और उसने तलाक़ दे दी. आपका निकाह हो गया. और उस ज़माने में ऐसा मामूल था कि अगर किसी व्यक्ति को किसी औरत की तरफ़ रग़बत होती तो उसके शौहर से इस्तिदआ करके तलाक़ दिलवा लेता और इद्दत के बाद निकाह कर लेता. यह बात न तो शरअई तौर पर नाजायज़ है न उस ज़माने की रस्म और आदत के ख़िलाफ़, लेकिन नबियों की शान बहुत ऊंची होती है इसलिये यह आपके ऊंचे मन्सब के लायक़ न था तो अल्लाह की मर्ज़ी यह हुई कि आपको इसपर आगाह किया जाए और उसका सबब यह पैदा किया कि फ़रिश्ते मुद्दई और मुद्दआ अलैह की शक्ल में आपके सामने पेश हुए. इस से मालूम हुआ कि अगर बुज़ु्र्गों से कोई लग़ज़िश सादिर हो और कोई बात शान के ख़िलाफ़ वाक़े हो जाए तो अदब यह है कि आलोचनात्मक ज़बान न खोली जाए बल्कि इस वाक़ए जैसा एक वाक़ए की कल्पना करके उसकी निस्बत जानकारी हासिल करने के लिये सवाल किया जाए और उनके आदर और सम्मान का भी ख़याल रखा जाए और यह भी मालूम हुआ कि अल्लाह तआला मालिको मौला अपने नबियों की ऐसी इज़्ज़त  फ़रमाता है कि उनको किसी बात पर आगाह करने के लिये फ़रिश्तों को इस तरीक़े पर अदब के साथ हाज़िर होने का हुक्म देता है.

तो हममें सच्चा फ़ैसला फ़रमा दीजिये और हक़ के ख़िलाफ़ न कीजिये(15)
(15) जिसकी ग़लती हो, बेझिझक फ़रमा दीजिये.

और हमें सीधी राह बताइये {22} बेशक यह मेरा भाई है (16)
(16) यानी दीनी भाई.

इसके पास निन्यानवे दुंबियां है और मेरे पास एक दुंबी, अब यह कहता है वह भी मुझे हवाले कर दे और बात में मुझ पर ज़ोर डालता है{23} दाऊद ने फ़रमाया बेशक यह तुझ पर ज़ियादती करता है कि तेरी दुंबी अपनी दुंबियों में मिलाने को मांगता है, और बेशक अक्सर साझे वाले एक दूसरे पर ज़ियादती करते हैं मगर जो ईमान लाए और अच्छे काम किये और वो बहुत थोड़े हैं(17)
(17) हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम की यह बात सुनकर फ़रिश्तों में से एक ने दूसरे की तरफ़ देखा और मुस्कुरा के वो आसमान की तरफ़ रवाना हो गए.

अब दाऊद समझा कि हमने यह उसकी जांच की थी(18)
(18) और दुम्बी एक किनाया था जिस से मुराद औरत थी क्योंकि निनानवें औरतें आपके पास होते हुए एक और औरत की आपने ख़्वाहिश की थी इसलिये दुम्बी के पैराए में सवाल किया गया जब आपने यह समझा.

तो अपने रब से माफ़ी मांगी और सज्दे में गिर पड़ा (19)
(19) इस आयत से साबित होता है कि नमाज़ में रूकू करना तिलावत के सज्दे के क़ायम मुक़ाम हो जाता है जब कि नियत की जाए.

और रूजू लाया {24} तो हमने उसे यह माफ़ फ़रमाया, और बेशक उसके लिये हमारी बारगाह में ज़रूर नज़्दीकी और अच्छा ठिकाना है {25} ऐ दाऊद बेशक हमने तुझे ज़मीन में नायब किया(20)
(20) ख़ल्क़ की तदबीर पर आपको मामूर किया और आपका हुक्म उनमें नाफ़िज़ फ़रमाया.

तो लोगों में सच्चा हुक्म कर और ख़्वाहिश के पीछे न जाना कि तुझे अल्लाह की राह से बहका देगी बेशक वो जो अल्लाह की राह से बहकाते हैं उन के लिये सख़्त अज़ाब है इस पर कि वो हिसाब के दिन को भूल बैठे(21){26}
(21) और इस वजह से ईमान से मेहरूम रहे. अगर उन्हें हिसाब के दिन का यक़ीन होता तो दुनिया ही में ईमान ले आते.