54 Surah Al-Qamar

54 सूरए   क़मर -तीसरा रूकू

وَلَقَدْ جَاءَ آلَ فِرْعَوْنَ النُّذُرُ
كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا كُلِّهَا فَأَخَذْنَاهُمْ أَخْذَ عَزِيزٍ مُّقْتَدِرٍ
أَكُفَّارُكُمْ خَيْرٌ مِّنْ أُولَٰئِكُمْ أَمْ لَكُم بَرَاءَةٌ فِي الزُّبُرِ
أَمْ يَقُولُونَ نَحْنُ جَمِيعٌ مُّنتَصِرٌ
سَيُهْزَمُ الْجَمْعُ وَيُوَلُّونَ الدُّبُرَ
بَلِ السَّاعَةُ مَوْعِدُهُمْ وَالسَّاعَةُ أَدْهَىٰ وَأَمَرُّ
إِنَّ الْمُجْرِمِينَ فِي ضَلَالٍ وَسُعُرٍ
يَوْمَ يُسْحَبُونَ فِي النَّارِ عَلَىٰ وُجُوهِهِمْ ذُوقُوا مَسَّ سَقَرَ
إِنَّا كُلَّ شَيْءٍ خَلَقْنَاهُ بِقَدَرٍ
وَمَا أَمْرُنَا إِلَّا وَاحِدَةٌ كَلَمْحٍ بِالْبَصَرِ
وَلَقَدْ أَهْلَكْنَا أَشْيَاعَكُمْ فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍ
وَكُلُّ شَيْءٍ فَعَلُوهُ فِي الزُّبُرِ
وَكُلُّ صَغِيرٍ وَكَبِيرٍ مُّسْتَطَرٌ
إِنَّ الْمُتَّقِينَ فِي جَنَّاتٍ وَنَهَرٍ
فِي مَقْعَدِ صِدْقٍ عِندَ مَلِيكٍ مُّقْتَدِرٍ

और बेशक फ़िरऔन वालों के पास रसूल आएं(1){41}
(1) हज़रत मूसा और हज़रत हारून अलैहिस्सलाम, तो फ़िरऔनी उनपर ईमान न लाए.

उन्होंने हमारी सब निशानियाँ झुटलाई(2)
(2) जो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को दी गई थीं.

तो हमने उनपर (3)
(3) अज़ाब के साथ.

गिरफ़्त की जो एक इज़्ज़त वाले और अज़ीम क़ुदरत वाले की शान थी{42} क्या (4)
(4) ऐ मक्के वालों.

तुम्हारे काफ़िर उनसे बेहतर हैं (5)
(5) यानी उन क़ौमों से ज़्यादा क़वी और मज़बूत हैं या कुफ़्र और दुश्मनी में कुछ उनसे कमे हैं.

या किताबों में तुम्हारी छुट्टी लिखी हुई है(6){43}
(6) कि तुम्हारे कुफ़्र की पकड़ न होगी और तुम अल्लाह के अज़ाब से अम्न में रहोगे.

या ये कहते हैं(7)
(7) मक्के के काफ़िर.

कि हम सब मिलकर बदला ले लेंगे(8){44}
(8) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से.

अब भगाई जाती है यह जमाअत(9)
(9) मक्के के काफ़िरों की.

और पीठें फेर देंगे(10){45}
(10) और इस तरह भागेंगे कि एक भी क़ायम न रहेगा. बद्र के रोज़ जब अबू जहल ने कहा कि हमसब मिलकर बदला ले लेंगे, तब यह आयत उतरी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ज़िरह पहन कर यह आयत तिलावत फ़रमाई. फिर ऐसा ही हुआ कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की फ़त्ह हुई और काफ़िर परास्त हुए.

बल्कि उनका वादा क़यामत पर है(11)
(11)  यानी उस अज़ाब के बाद उन्हें क़यामत के दिन के अज़ाब का वादा है.

और क़यामत निहायत (अत्यन्त) कड़वी और सख़्त कड़वी(12){46}
(12) दुनिया के अज़ाब से उसका अज़ाब बहुत ज़्यादा सख़्त है.

बेशक मुजरिम गुमराह और दीवाने हैं(13){47}
(13)न समझते है न राह पाते हैं. (तफ़सीरे कबीर)

जिस दिन आग में अपने मुंहों पर घसीटे जाएंगे, और फ़रमाया जाएगा चखों दोज़ख़ की आंच {48} बेशक हम ने हर चीज़ एक अन्दाज़े से पैदा फ़रमाई (14){49}
(14) अल्लाह की हिकमत के अनुसार. यह आयत क़दिरयों के रद में उतरी जो अल्लाह की क़ुदरत के इन्कारी हैं और दुनिया में जो कुछ होता है उसे सितारों वगै़रह की तरफ़ मन्सूब करते हैं. हदीसों में उन्हें इस उम्मत का मजूस कहा गया है और उनके पास उठने बैठने और उनके साथ बात चीत करने और वो बीमार हो जाएं तो उनकी पूछ ताछ करने और मर जाएं तो उनके जनाज़े में शरीक होने से मना फ़रमाया गया है और उन्हें दज्जाल का साथी फ़रमाया गया. वो बदतरीन लोग हैं.

और हमारा काम तो एक बात की बात है जैसे पलक मारना(15) {50}
(15) जिस चीज़ के पैदा करने का इरादा हो वह हुक्म के साथ ही हो जाती है.

और बेशक हमने तुम्हारी वज़अ के(16)
(16) काफ़िर पहली उम्मतों के.

हलाक कर दिये तो है कोई ध्यान करने वाला(17){51}
(17) जो इब्रत हासिल करें और नसीहत माने.

और उन्होंने जो कुछ किया सब किताबों में है (18){52}
(18)यानी बन्दों के सारे कर्म आमाल के निगहबान फ़रिश्तो के लेखों में है.

और हर छोटी बड़ी चीज़ लिखी हुई है (19){53}
(19) लौहे मेहफ़ूज़ में.

बेशक परहेज़गार बाग़ों और नहर में हैं{54} सच की मजलिस में अज़ीम क़ुदरत वाले बादशाह के हुज़ूर(20){55}
(20) यानी उसकी बारगाह के प्यारे चहीते हैं.

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51-Surah – Al- Zariyat

51|47|وَالسَّمَاءَ بَنَيْنَاهَا بِأَيْدٍ وَإِنَّا لَمُوسِعُونَ
51|48|وَالْأَرْضَ فَرَشْنَاهَا فَنِعْمَ الْمَاهِدُونَ
51|49|وَمِن كُلِّ شَيْءٍ خَلَقْنَا زَوْجَيْنِ لَعَلَّكُمْ تَذَكَّرُونَ
51|50|فَفِرُّوا إِلَى اللَّهِ ۖ إِنِّي لَكُم مِّنْهُ نَذِيرٌ مُّبِينٌ
51|51|وَلَا تَجْعَلُوا مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ ۖ إِنِّي لَكُم مِّنْهُ نَذِيرٌ مُّبِينٌ
51|52|كَذَٰلِكَ مَا أَتَى الَّذِينَ مِن قَبْلِهِم مِّن رَّسُولٍ إِلَّا قَالُوا سَاحِرٌ أَوْ مَجْنُونٌ
51|53|أَتَوَاصَوْا بِهِ ۚ بَلْ هُمْ قَوْمٌ طَاغُونَ
51|54|فَتَوَلَّ عَنْهُمْ فَمَا أَنتَ بِمَلُومٍ
51|55|وَذَكِّرْ فَإِنَّ الذِّكْرَىٰ تَنفَعُ الْمُؤْمِنِينَ
51|56|وَمَا خَلَقْتُ الْجِنَّ وَالْإِنسَ إِلَّا لِيَعْبُدُونِ
51|57|مَا أُرِيدُ مِنْهُم مِّن رِّزْقٍ وَمَا أُرِيدُ أَن يُطْعِمُونِ
51|58|إِنَّ اللَّهَ هُوَ الرَّزَّاقُ ذُو الْقُوَّةِ الْمَتِينُ
51|59|فَإِنَّ لِلَّذِينَ ظَلَمُوا ذَنُوبًا مِّثْلَ ذَنُوبِ أَصْحَابِهِمْ فَلَا يَسْتَعْجِلُونِ
51|60|فَوَيْلٌ لِّلَّذِينَ كَفَرُوا مِن يَوْمِهِمُ الَّذِي يُوعَدُونَ

51 सूरए ज़ारियात -तीसरा रूकू
और आसमान को हमने हाथों से बनाया(1)
(1) अपने दस्ते क़ुदरत से.

और बेशक हम वुसअत देने वाले हैं(2){47}
(2) उसको इतनी कि ज़मीन अपनी फ़ज़ा के साथ उसके अन्दर इस तरह आजाए जैसे कि एक चौड़े मैदान में गैंद पड़ी हो या ये मानी हैं कि हम अपनी सृष्टि पर रिज़्क़ फैलाने वाले हैं.

और ज़मीन को हमने फ़र्श किया तो हम क्या ही अच्छे बिछाने वाले {48} और हमने हर चीज़ के दो जोड़े बनाए(3)
(3) आसमान और ज़मीन और सूरज और चाँद और रात और दिन और ख़ुश्की और तरी और गर्मी व सर्दी और जिन्न व इन्स और रौशनी और अंधेरा और ईमान व कुफ़्र और सआदत व शक़ावत और हक़ व बातिल और नर व मादा की तरह.

कि तुम ध्यान करो (4){49}
(4) और समझो कि उन तमाम जोड़ों को पैदा करने वाली एक ही हस्ती है, न उसका नज़ीर है, न शरीक, न ज़िद न बराबर. वही इबादत के लायक़ है.

तो अल्लाह की तरफ़ भागो (5)
(5) उसके मासिवा को छोड़ कर उसकी इबादत इख़्तियार करो.

बेशक मैं उसकी तरफ़ से तुम्हारे लिये साफ़ डर सुनाने वाला हूँ {50} और अल्लाह के साथ और मअबूद न ठहराओ, बेशक मैं उसकी तरफ़ से तुम्हारे लिये खुला डर सुनाने वाला हूँ {51}यूंही (6)
(6) जैसे कि उन काफ़िरों ने आपको झुटलाया और आपको जादूगर और दीवाना कहा, ऐसे ही.

जब उनसे अगलों के पास कोई रसूल तशरीफ़ लाया तो यही बोले कि जादूगर है या दीवाना {52} क्या आपस में एक दूसरे को यह बात कह मरे हैं, बल्कि वो सरकश लोग हैं(7){53}
(7) यानी पहले काफ़िरों ने अपने पिछलों को यह वसीयत तो नहीं की कि तुम नबियों को झुटलाना और उनकी शान में इस तरह की बातें बनाना लेकिन चूंकि सरकशी और बग़ावत की इल्लत दोनों में है इसलिये गुमराही में एक दूसरे के मुवाफ़िक़ रहे.

तो ऐ मेहबूब, तुम उनसे मुंह फेर लो तो तुम पर कुछ इल्ज़ाम नहीं(8){54}
(8) क्योंकि आप रिसालत की तबलीग़ फ़रमा चुके और दावत व हिदायत में काफ़ी मेहनत कर चुके और आपने अपनी कोशिश में कोई कसर उठा न रखी. जब यह आयत उतरी तो रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ग़मगीन हुए और आपके सहाबा को रंज हुआ कि जब रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को मुंह फेरने का हुक्म हो गया तो अब वही क्यों आएगी और जब नबी ने उम्मत को तबलीग़ पूरे तौर पर फ़रमादी और उम्मत सरकशी से बाज़ न आई और रसूल को उनसे मुंह फेरने का हुक्म मिल गया तो वक़्त आ गया कि उन पर अज़ाब उतरे. इस पर वह आयत उतरी जो इस आयत के बाद है और उसमें तस्कीन दी गई कि वही का सिलसिला टूटा नहीं है. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नसीहत सआदतमन्दों के लिये जारी रहेगी चुनांन्वे इरशाद हुआ.

और समझाओ कि समझाना मुसलमानों को फ़ायदा देता है{55} और मैंने जिन्न और आदमी इतने ही के लिये बनाए कि मेरी बन्दगी करें(9){56}
(9) और मेरी मअरिफ़त यानी पहचान हो.

मैं उनसे कुछ रिज़्क़ नहीं मांगता(10)
(10) कि मेरे बन्दों को रोज़ी दें या सब की नहीं तो अपनी ही रोज़ी ख़ुद पैदा करें क्योंकि रिज़्क़ देने वाला मैं हूँ और सब की रोज़ी का मैं ही पूरा करने वाला हूँ.

और न यह चाहता हूँ कि वो मुझे खाना दें(11){57}
(11) मेरी सृष्टि के लिये.

बेशक अल्लाह ही बड़ा रिज़्क़ देने वाला क़ुव्वत वाला क़ुदरत वाला है(12){58}
(12) सबको वही देता, वही पालता है.

तो बेशक उन ज़ालिमों के लिये(13)
(13) जिन्होंने रसूले पाक सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को झुटलाकर अपनी जानों पर ज़ुल्म किया.

अज़ाब की एक बारी है(14)
(14) हिस्सा है नसीब है.

जैसे उनके साथ वालों के लिये एक बारी थी(15)
(15) यानी पिछली उम्मतों के काफ़िरों के लिये जो नबीयों को झुटलाने में इनके साथी थे. उनका अज़ाब और हलाकत में हिस्सा था.

तो मुझसे जल्दी न करें(16){59}
(16) अज़ाब नाज़िल करने की.

तो काफ़िरों की ख़राबी है उनके उस दिन से जिसका वादा दिये जाते हैं(17){60}
(17) और वह क़यामत का दिन है.

50 Surah Al-Qaaf

50|16|وَلَقَدْ خَلَقْنَا الْإِنسَانَ وَنَعْلَمُ مَا تُوَسْوِسُ بِهِ نَفْسُهُ ۖ وَنَحْنُ أَقْرَبُ إِلَيْهِ مِنْ حَبْلِ الْوَرِيدِ
50|17|إِذْ يَتَلَقَّى الْمُتَلَقِّيَانِ عَنِ الْيَمِينِ وَعَنِ الشِّمَالِ قَعِيدٌ
50|18|مَّا يَلْفِظُ مِن قَوْلٍ إِلَّا لَدَيْهِ رَقِيبٌ عَتِيدٌ
50|19|وَجَاءَتْ سَكْرَةُ الْمَوْتِ بِالْحَقِّ ۖ ذَٰلِكَ مَا كُنتَ مِنْهُ تَحِيدُ
50|20|وَنُفِخَ فِي الصُّورِ ۚ ذَٰلِكَ يَوْمُ الْوَعِيدِ
50|21|وَجَاءَتْ كُلُّ نَفْسٍ مَّعَهَا سَائِقٌ وَشَهِيدٌ
50|22|لَّقَدْ كُنتَ فِي غَفْلَةٍ مِّنْ هَٰذَا فَكَشَفْنَا عَنكَ غِطَاءَكَ فَبَصَرُكَ الْيَوْمَ حَدِيدٌ
50|23|وَقَالَ قَرِينُهُ هَٰذَا مَا لَدَيَّ عَتِيدٌ
50|24|أَلْقِيَا فِي جَهَنَّمَ كُلَّ كَفَّارٍ عَنِيدٍ
50|25|مَّنَّاعٍ لِّلْخَيْرِ مُعْتَدٍ مُّرِيبٍ
50|26|الَّذِي جَعَلَ مَعَ اللَّهِ إِلَٰهًا آخَرَ فَأَلْقِيَاهُ فِي الْعَذَابِ الشَّدِيدِ
50|27|۞ قَالَ قَرِينُهُ رَبَّنَا مَا أَطْغَيْتُهُ وَلَٰكِن كَانَ فِي ضَلَالٍ بَعِيدٍ
50|28|قَالَ لَا تَخْتَصِمُوا لَدَيَّ وَقَدْ قَدَّمْتُ إِلَيْكُم بِالْوَعِيدِ
50|29|مَا يُبَدَّلُ الْقَوْلُ لَدَيَّ وَمَا أَنَا بِظَلَّامٍ لِّلْعَبِيدِ

50 सूरए क़ाफ़ -दूसरा रूकू

और बेशक हमने आदमी को पैदा किया और हम जानते हैं जो वसवसा उसका नफ़्स डालता है(1)
(1) हमसे उसके भेद और अन्दर की बातें छुपी नहीं.

और हम दिल की रग से भी उससे ज़्यादा नज़्दीक़ हैं(2){16}
(2) यह भरपूर इल्म का बयान है कि हम बन्दे के हाल को ख़ुद उससे ज़्यादा जानने वाले हैं. वरीद वह रग है जिसमें ख़ून जारी होकर बदन के हर हर अंग में पहुंचता है. यह रग गर्दन में है. मानी ये हैं कि इन्सान के अंग एक दूसरे से पर्दे में हैं मगर अल्लाह तआला से कोई चीज़ पर्दे में नहीं.

जब उससे लेते हैं दो लेने वाले(3)
(3) फ़रिश्ते, और वो इन्सान का हर काम और उसकी हर बात लिखने पर मुक़र्रर हैं.

एक दाएं बैठा और एक बाएं(4){17}
(4) दाईं तरफ़ वाला नेकियाँ लिखता है और बाई तरफ़ वाला गुनाह. इसमें इज़हार है कि अल्लाह तआला फ़रिश्तों के लिखने से भी ग़नी है, वह छुपी से छुपी बात का जानने वाला है. दिल के अन्दर की बात तक उससे छुपी नहीं है. फ़रिश्तों का लिखना तो अल्लाह तआला की हिकमत का एक हिस्सा है कि क़यामत के दिन हर व्यक्ति का कर्म लेखा या नामए अअमाल उसके हाथ में दे दिया जाएगा.

कोई बात वह ज़बान से नहीं निकालता कि उसके पास एक मुहाफ़िज़ तैयार न बैठा हो(5){18}
(5) चाहे वह कहीं हो सिवाए पेशाब पाख़ाना या हमबिस्तरी करते समय के. उस वक़्त ये फ़रिश्ते आदमी के पास हट जाते हैं. इन दोनों हालतों में आदमी को बात करना जायज़ नहीं ताकि उसके लिखने के लिये फ़रिश्तों को उस हालत में उससे क़रीब होने की तकलीफ़ न हो. ये फ़रिश्ते आदमी की हर बात लिखते हैं बीमारी का कराहना तक. और यह भी कहा गया है कि सिर्फ़ वही चीज़ें लिखते हैं जिन में अज्र व सवाब या गिरफ़्त और अज़ाब हो. इमाम बग़वी ने एक हदीस रिवायत की है कि जब आदमी एक नेकी करता है तो दाई तरफ़ वाला फ़रिश्ता दस लिखता है, और जब बदी करता है तो दाई तरफ़ वाला फ़रिश्ता बाईं तरफ़ वाले फ़रिश्ते से कहता है कि अभी रूका रह कि शायद यह व्यक्ति इस्तिग़फ़ार कर ले. मौत के बाद उठाए जाने का इन्कार करने वालों का रद फ़रमाने और अपनी क़ुदरत व इल्म से उन पर हुज्जतें क़ायम करने के बाद उन्हें बताया जाता है कि वो जिस चीज़ का इन्कार करते हैं वह जल्द ही उनकी मौत और क़यामत के वक़्त पेश आने वाली है और भूतकाल से उनकी आमद की ताबीर फ़रमाकर उसके क़ुर्ब का इज़हार किया जाता है चुनांन्चे इरशाद होता है.

और आई मौत की सख़्ती (6)
(6) जो अक़्ल और हवास को बिगाड़ देती है.

हक़ के साथ (7)
(7) हक़ से मुराद या मौत की हक़ीक़त है या आख़िरत का वुजूद जिसको इन्सान ख़ुद मुआयना करता है या आख़िरी अंजाम, सआदत और शक़ावत. सकरात यानी जान निकलते वक़्त मरने वाले से कहा जाता है कि मौत—

यह है जिससे तू भागता था {19} और सूर फूंका गया(8)
(8) दोबारा उठाने के लिये.

यह है अज़ाब के वादे का दिन(9){20}
(9) जिसका अल्लाह तआला ने काफ़िरों से वादा फ़रमाया था.

और हर जान यूं हाज़िर हुई कि उसके साथ एक हांकने वाला(10)
(10) फ़रिश्ता जो उसे मेहशर की तरफ़ हाँके.

और एक गवाह(11){21}
(11) जो उसके कर्मों की गवाही दे. हज़रत इब्दे अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि हाँकने वाला फ़रिश्ता होगा और गवाह ख़ुद उसका अपना नफ़्स. ज़ुहाक का क़ौल है कि हाँकने वाला फ़रिश्ता है और गवाह अपने बदन के हिस्से हाथ पाँव बग़ैर. हज़रत उस्माने ग़नी रदियल्लाहो अन्हो ने मिम्बर से फ़रमाया कि हाँकने वाला भी फ़रिश्ता है और गवाह भी फ़रिश्ता (जुमल). फिर काफ़िर से कहा जाएगा.

बेशक तू इस से ग़फ़लत में था(12)
(12) दुनिया में.

तो हमने तुझ पर से पर्दा उठाया(13)
(13) जो तेरे दिल और कानों और आँखों पर पड़ा था.

तो आज तेरी निगाह तेज़ है(14) {22}
(14) कि तू उन चीज़ों को देख रहा है जिनका दुनिया में इन्कार करता था.

और उसका हमनशीं फ़रिश्ता(15)
(15) जो उसके कर्म लिखने वाला और उसपर गवाही देने वाला है. (मदारिक और ख़ाजिन)

बोला यह है(16)
(16) उसके कर्मों का लेखा (मदारिक)

जो मेरे पास हाज़िर है {23} हुक्म होगा तुम दोनों जहन्नम में डाल दो हर बड़े नाशुक्रे हटधर्म को {24} जो भलाई से बहुत रोकने वाला हद से बढ़ने वाला शक करने वाला(17){25}
(17) दीन में.

जिसने अल्लाह के साथ कोई और मअबूद ठहराया तुम दोनों उसे सख़्त अज़ाब में डालो{26} उसके साथी शैतान ने कहा (18)
(18) जो दुनिया में उसपर मुसल्लत था.

हमारे रब मैं ने इसे सरकश न किया (19)
(19) यह शैतान की तरफ़ से काफ़िर का जवाब है जो जहन्नम में डाले जाते वक़्त कहेगा कि ऐ हमारे रब मुझे शैतान ने बहकाया. उसपर शैतान कहेगा कि मैं ने इसे गुमराह न किया.

हाँ यह आप ही दूर की गुमराही में था(20){27}
(20) मैं ने उसे गुमराही की तरफ़ बुलाया उसने क़ुबूल कर लिया. इसपर अल्लाह तआला का इरशाद होगा अल्लाह तआला.

फ़रमाएगा मेरे पास न झगड़ों(21)
(21) कि हिसाब और जज़ा के मैदान में झगड़ा करने का कोई फ़ायदा नहीं.

मैं तुम्हें पहले ही अज़ाब का डर सुना चुका था(22){28}मेरे यहाँ बहुत बदलती नहीं और न मैं बन्दों पर ज़ुल्म करूं{29}
(22) अपनी किताबों में, अपने रसूलों की ज़बानों पर, मैं ने तुम्हारे लिये कोई हुज्जत बाक़ी न छोड़ी.

49-Surah Al-Huzuraat

49 सूरए हुजुरात

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُقَدِّمُوا بَيْنَ يَدَيِ اللَّهِ وَرَسُولِهِ ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَرْفَعُوا أَصْوَاتَكُمْ فَوْقَ صَوْتِ النَّبِيِّ وَلَا تَجْهَرُوا لَهُ بِالْقَوْلِ كَجَهْرِ بَعْضِكُمْ لِبَعْضٍ أَن تَحْبَطَ أَعْمَالُكُمْ وَأَنتُمْ لَا تَشْعُرُونَ
إِنَّ الَّذِينَ يَغُضُّونَ أَصْوَاتَهُمْ عِندَ رَسُولِ اللَّهِ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ امْتَحَنَ اللَّهُ قُلُوبَهُمْ لِلتَّقْوَىٰ ۚ لَهُم مَّغْفِرَةٌ وَأَجْرٌ عَظِيمٌ
إِنَّ الَّذِينَ يُنَادُونَكَ مِن وَرَاءِ الْحُجُرَاتِ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ
وَلَوْ أَنَّهُمْ صَبَرُوا حَتَّىٰ تَخْرُجَ إِلَيْهِمْ لَكَانَ خَيْرًا لَّهُمْ ۚ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِن جَاءَكُمْ فَاسِقٌ بِنَبَإٍ فَتَبَيَّنُوا أَن تُصِيبُوا قَوْمًا بِجَهَالَةٍ فَتُصْبِحُوا عَلَىٰ مَا فَعَلْتُمْ نَادِمِينَ
وَاعْلَمُوا أَنَّ فِيكُمْ رَسُولَ اللَّهِ ۚ لَوْ يُطِيعُكُمْ فِي كَثِيرٍ مِّنَ الْأَمْرِ لَعَنِتُّمْ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ حَبَّبَ إِلَيْكُمُ الْإِيمَانَ وَزَيَّنَهُ فِي قُلُوبِكُمْ وَكَرَّهَ إِلَيْكُمُ الْكُفْرَ وَالْفُسُوقَ وَالْعِصْيَانَ ۚ أُولَٰئِكَ هُمُ الرَّاشِدُونَ
فَضْلًا مِّنَ اللَّهِ وَنِعْمَةً ۚ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
وَإِن طَائِفَتَانِ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ اقْتَتَلُوا فَأَصْلِحُوا بَيْنَهُمَا ۖ فَإِن بَغَتْ إِحْدَاهُمَا عَلَى الْأُخْرَىٰ فَقَاتِلُوا الَّتِي تَبْغِي حَتَّىٰ تَفِيءَ إِلَىٰ أَمْرِ اللَّهِ ۚ فَإِن فَاءَتْ فَأَصْلِحُوا بَيْنَهُمَا بِالْعَدْلِ وَأَقْسِطُوا ۖ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ
إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ إِخْوَةٌ فَأَصْلِحُوا بَيْنَ أَخَوَيْكُمْ ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ

सूरए हुजुरात मदीने में उतरी, इसमें 18 आयतें, दो रूकू हैं
-पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए हुजुरात मदनी है, इसमें दो रूकू, अठारह आयतें, तीन सौ तैंतालीस कलिमे और एक हज़ार चार सौ छिहत्तर अक्षर हैं.

ऐ ईमान वालों अल्लाह और उसके रसूल से आगे न बढ़ो(2)
(2) यानी तुम्हें लाज़िम है कि कभी तुम से तक़दीम वाक़े न हो, न क़ौल में न फ़ेअल, यानी न कहनी में न करनी में कि पहल करना रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के अदब और सम्मान के ख़िलाफ़ है. उनकी बारगाह में नियाज़मन्दी और आदाब लाज़िम हैं. कुछ लोगों ने बक़्र ईद के दिन सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से पहले क़ुर्बानी कर ली तो उनको हुक्म दिया गया कि दोबारा क़ुर्बानी करें और हज़रत आयशा रदियल्लाहो अन्हा से रिवायत है कि कुछ लोग रम़जान से एक रोज़ पहले ही रोज़ा रखना शुरू कर देते थे उनके बारे में यह आयत उतरी और हुक्म दिया गया कि रोज़ा रखने में अपने नबी से आगे मत जाओ.

और अल्लाह से डरो, बेशक अल्लाह सुनता जानता है {1} ऐ ईमान वालों अपनी आवाज़ें ऊंची न करो उस ग़ैब बताने वाले (नबी) की आवाज़ से(3)
(3) यानी जब हुज़ूर में कुछ अर्ज़ करो तो आहिस्ता धीमी आवाज़ में अर्ज़ करो यही दरबारे रिसालत का अदब और एहतिराम है.

और उनके हुज़ूर (समक्ष) बात चिल्लाकर न कहो जैसे आपस में एक दूसरे के सामने चिल्लाते हो कि कहीं तुम्हारे कर्म अक़ारत न हो जाएं और तुम्हें ख़बर न हो(4){2}
(4) इस आयत में हुज़ूर की बुज़ुर्गी और उनका सम्मान बताया गया और हुक्म दिया गया कि पुकारने में अदब का पूरा ध्यान रखें जैसे आपस में एक दूसरे को नाम लेकर पुकारते हैं उस तरह न पुकारें बल्कि अदब और सम्मान के शब्दों के साथ अर्ज़ करो जो अर्ज़ करना हो, कि अदब छोड़ देने से नेकियों के बर्बाद होने का डर है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि यह आयत साबित बिन क़ैस बिन शम्मास के बारे में उतरी. वो ऊंचा सुनते थे और आवाज़ उनकी ऊंची थी. बात करने में आवाज़ बलन्द हो जाया करती थी. जब यह आयत उतरी तो हज़रत साबित अपने घर बैठ रहे और कहने लगे मैं दोज़ख़ी हूँ. हुज़ूर ने हज़रत सअद से उनका हाल दर्याफ़त किया. उन्होंने अर्ज़ किया कि वह मेरी पड़ौसी हैं और मेरी जानकारी में उन्हें कोई बीमारी तो नहीं हुई. फिर आकर हज़रत साबित से इसका ज़िक्र किया. साबित ने कहा यह आयत उतरी है और तुम जानते हो कि मैं तुम सबसे ज़्यादा ऊंची आवाज़ वाला हूँ तो मैं जहन्नमी हो गया. हज़रत सअद ने यह हाल ख़िदमते अक़दस में अर्ज़ किया तो हुज़ूर ने फ़रमाया कि वह जन्नत वालों में से हैं.

बेशक वो जो अपनी आवाज़ें पस्त करते हैं रसूलुल्लाह के पास(5)
(5) अदब और सम्मान के तौर पर. आयत “या अय्युहल्लज़ीना आमनू ला तरफ़ऊ असवातकुम” के उतरने के बाद हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ और उमरे फ़ारूक रदियल्लाहो अन्हुमा और कुछ और सहाबा ने बहुत एहतियात लाज़िम करली और ख़िदमत अक़दस में बहुत ही धीमी आवाज़ से बात करते. उन हज़रात के हक़ में यह आयत उतरी.

वो हैं जिनका दिल अल्लाह ने परहेज़गारी के लिये परख लिया है, उनके लिये बख़्शिश और बड़ा सवाब है {3} बेशक वो जो तुम्हें हुजरों के बाहर से पुकारते हैं उनमें अक्सर बे अक़्ल है (6) {4}
(6) यह आयत बनी तमीम के वफ़्द के हक़ में उतरी कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में दोपहर को पहुंचे जब कि हुज़ूर आराम कर रहे थे. इन लोगों ने हुजरे के बाहर से हुज़ूर को पुकारना शुरू किया. हुज़ूर तशरीफ़ ले आए. उन लोगों के हक़ में यह आयत उतरी और हुज़ूर की शान की बुज़ुर्गी का बयान फ़रमाया गया कि हुज़ूर की बारगाह में इस तरह पुकारना जिहालत और बेअक़्ली है और उनको अदब की तलक़ीन की गई.

और अगर वो सब्र करते यहाँ तक कि तुम आप उनके पास तशरीफ लाते(7)
(7) उस वक़्त वो अर्ज़ करते जो उन्हें अर्ज़ करना था. यह अदब उन पर लाज़िम था, इसको बजा लाते.

तो यह उनके लिये बेहतर था, और अल्ला बख़्शने वाला मेहरबान है (8){5}
(8) इन में से उनके लिये जो तौबह करें.

ऐ ईमान वालों अगर कोई फ़ासिक़ तुम्हारे पास कोई ख़बर लाए तो तहक़ीक़ कर लो(9)
(9) कि सही है या ग़लत. यह आयत वलीद बिन अक़बह के हक़ में उतरी कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उनको बनी मुस्तलक़ से सदक़ात वुसूल करने भेजा था और जिहालत के ज़माने में इनके और उनके दर्मियान दुश्मनी थी. जब वलीद उनके इलाक़े के क़रीब पहुंचे और उन्हें ख़बर हुई तो इस ख़याल से कि वो रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के भेजे हुए हैं, बहुत से लोग अदब से उनके स्वागत के लिये आए. वलीद ने गुमान किया कि ये पुरानी दुश्मनी से मुझे क़त्ल करने आ रहे हैं. यह ख़याल करके वलीद वापस हो गए और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अर्ज़ कर दिया कि हुज़ूर उन लोगों ने सदक़ा देने को मना कर दिया और मेरे क़त्ल का इरादा किया. हुज़ूर ने ख़ालिद बिन वलीद को तहक़ीक़ के लिये भेजा. हज़रत ख़ालिद ने देखा कि वो लोग अज़ानें कहते हैं, नमाज़ पढ़ते हैं और उन लोगों ने सदक़ात पेश कर दिये. हज़रत ख़ालिद ये सदक़ात ख़िदमते अक़दस में लेकर हाज़िर हुए और हाल अर्ज़ किया. इस पर आयत उतरी. कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा कि यह आयत आम है, इस बयान में उतरी है कि फ़ासिक़ के क़ौल पर भरोसा न किया जाए. इस आयत से साबित हुआ कि एक व्यक्ति अगर आदिल हो तो उसकी ख़बर भरोसे के लायक़ है.

कि कहीं किसी क़ौम को बेजा ईजा (कष्ट) न दे बैठो फिर अपने किये पर पछताते रह जाओ{6} और जान लो कि तुम में अल्लाह के रसूल है(10)
(10) अगर तुम झूट बोलोगे तो अल्लाह तआला के ख़बरदार करने से वह तुम्हारा राज़ ख़ोल कर तुम्हें रूसवा कर देंगे.
बहुत मामलों में अगर यह तुम्हारी ख़ुशी करें(11)
(11) और तुम्हारी राय के मुताबिक हुक्म दे दें.

तो तुम ज़रूर मशक़्क़त में पड़ो लेकिन अल्लाह ने तुम्हें ईमान प्यारा कर दिया है और उसे तुम्हारे दिलों में आरास्ता कर दिया और कुफ़्र और हुक्म अदूली और नाफ़रमानी तुम्हें नागवार कर दी, ऐसे ही लोग राह पर हैं(12){7}
(12) कि सच्चाई के रास्ते पर क़ायम रहे.

अल्लाह का फ़ज़्ल और एहसान, और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है {8} और अगर मुसलमानों के दो दल आपस में लड़े तो उनमें सुलह कराओ(13)
(13) नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम दराज़ गोश (गधे) पर सवार तशरीफ़ ले जाते थे. अन्सार की मज़लीस पर गुज़र हुआ. वहाँ थोड़ी देर ठहरे. उस जगह गधे ने पेशाब किया तो इब्ने उबई ने नाक बन्द कर ली. हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाहा रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि हुज़ूर के दराज़गोश का पेशाब तेरे मुश्क से बेहतर ख़ुश्बू रखता हैं. हुज़ूर तो तशरीफ़ ले गए. उन दोनों में बात बढ़ गई और उन दोनों की क़ौमें आपस में लड़ गई और हाथा पाई की नौबत आई तो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम तशरीफ़ लाए और उनमें सुलह करा दी. इस मामले में यह आयत उतरी.

फिर अगर एक दूसरे पर ज़ियादती करे(14)
(14) जुल्म करे और सुलह से इन्कारी हो जाए. बाग़ी दल का यही हुक्म है कि उससे जंग की जाए यहाँ तक कि वह लड़ाई से बाज़ आए.

तो उस ज़ियादती वाले से लड़ो यहाँ तक कि वह अल्लाह के हुक्म की तरफ़ पलट आए फिर अगर पलट आए तो इन्साफ़ के साथ उनमें इस्लाह कर दो और इन्साफ़ करो, बेशक इन्साफ़ वाले अल्लाह को प्यारे हैं {9} मुसलमान मुसलमान भाई हैं(15)
(15) कि आपस में दीनी सम्बन्ध और इस्लामी महब्बत के साथ जुड़े हुए हैं. यह रिश्ता सारे दुनियवी रिश्तों से ज़्यादा मज़बूत है.

तो अपने दो भाइयों में सुलह करो(16)
(16) जब कभी उनमें मतभेद वाक़े हो.

और अल्लाह से डरो कि तुम पर रहमत हो(17){10}
(17) क्योंकि अल्लाह तआला से डरना और परहेज़गारी इख़्तियार करना ईमान वालों की आपसी महब्बत और दोस्ती का कारण है और जो अल्लाह तआला से डरता है, अल्लाह तआला की रहमत उस पर होती है.

48-Surah-Fatah

48 सूरए फ़त्ह

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
إِنَّا فَتَحْنَا لَكَ فَتْحًا مُّبِينًا
لِّيَغْفِرَ لَكَ اللَّهُ مَا تَقَدَّمَ مِن ذَنبِكَ وَمَا تَأَخَّرَ وَيُتِمَّ نِعْمَتَهُ عَلَيْكَ وَيَهْدِيَكَ صِرَاطًا مُّسْتَقِيمًا
وَيَنصُرَكَ اللَّهُ نَصْرًا عَزِيزًا
هُوَ الَّذِي أَنزَلَ السَّكِينَةَ فِي قُلُوبِ الْمُؤْمِنِينَ لِيَزْدَادُوا إِيمَانًا مَّعَ إِيمَانِهِمْ ۗ وَلِلَّهِ جُنُودُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ وَكَانَ اللَّهُ عَلِيمًا حَكِيمًا
لِّيُدْخِلَ الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا وَيُكَفِّرَ عَنْهُمْ سَيِّئَاتِهِمْ ۚ وَكَانَ ذَٰلِكَ عِندَ اللَّهِ فَوْزًا عَظِيمًا
وَيُعَذِّبَ الْمُنَافِقِينَ وَالْمُنَافِقَاتِ وَالْمُشْرِكِينَ وَالْمُشْرِكَاتِ الظَّانِّينَ بِاللَّهِ ظَنَّ السَّوْءِ ۚ عَلَيْهِمْ دَائِرَةُ السَّوْءِ ۖ وَغَضِبَ اللَّهُ عَلَيْهِمْ وَلَعَنَهُمْ وَأَعَدَّ لَهُمْ جَهَنَّمَ ۖ وَسَاءَتْ مَصِيرًا
وَلِلَّهِ جُنُودُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ وَكَانَ اللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمًا
إِنَّا أَرْسَلْنَاكَ شَاهِدًا وَمُبَشِّرًا وَنَذِيرًا
لِّتُؤْمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ وَتُعَزِّرُوهُ وَتُوَقِّرُوهُ وَتُسَبِّحُوهُ بُكْرَةً وَأَصِيلًا
إِنَّ الَّذِينَ يُبَايِعُونَكَ إِنَّمَا يُبَايِعُونَ اللَّهَ يَدُ اللَّهِ فَوْقَ أَيْدِيهِمْ ۚ فَمَن نَّكَثَ فَإِنَّمَا يَنكُثُ عَلَىٰ نَفْسِهِ ۖ وَمَنْ أَوْفَىٰ بِمَا عَاهَدَ عَلَيْهُ اللَّهَ فَسَيُؤْتِيهِ أَجْرًا عَظِيمًا

सूरए फ़त्ह मदीने में उतरी, इसमें 29 आयतें, चार रूकू हैं.

-पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए फ़त्ह मदनी सूरत है इसमें चार रूकू, उन्तीस आयतें, पाँच सौ अड़सठ कलिमे और दो हज़ार पाँच सौ उन्सठ अक्षर है.

बेशक हमने तुम्हारे लिये रौशन फ़त्ह फ़रमा दी(2){1}
(2) इन्ना फतहना हुदैबिय्यह से वापस होते हुए हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर नाज़िल हुई. हुज़ूर को इसके नाज़िल होने से बहुत ख़ुशी हुई और सहाबा ने हुज़ूर को मुबारक बादे दीं. (बुख़ारी, मुस्लिम, तिरमिज़ी) हुदैबिय्यह एक कुंआ है मक्कए मुकर्रमा के नज़्दीक. संक्षिप्त विवरण यह है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ख़्वाब देखा कि हुज़ूर अपने सहाबा के हमराह अम्न के साथ मक्कए मुकर्रमा में दाख़िल हुए. कोई सर मुँडाए, कोई बाल छोटे कराए हुए, काबए मुअज़्ज़मा मे दाख़िल हुए और काबे की कुंजी ली. तवाफ़ फ़रमाया, उमरा किया. सहाबा को इस ख़्वाब की ख़बर दी. सब ख़ुश हुए. फिर हुज़ूर ने उमरे का इरादा किया और एक हज़ार चार सौ सहाबा के साथ पहली ज़िलक़अदा सन छ हिजरी को रवाना हुए. ज़ुल हलीफ़ा में पहुंचकर वहाँ मस्जिद में दो रकअतें पढ़कर उमरे का एहराम बाँधा और हुज़ूर के साथ अक्सर सहाबा ने भी. कुछ सहाबा ने जोहफ़ा से एहराम बाँधा . राह में पानी ख़त्म हो गया. सहाबा ने अर्ज़ किया कि पानी लश्कर में बिल्कुल नहीं है सिवाय हुज़ूर के आफ़ताबे यानी लोटे के कि उसमे थोड़ा पानी बाक़ी है. हुज़ूर ने अफ़ताबे में दस्ते मुबारक डाला तो नूरानी उंगलियों से चश्मे फूट निकले. तमाम लश्कर ने पिया, वुज़ू किया. जब उस्फ़ान मक़ाम पर पहुंचे तो ख़बर आई कि कुफ़्फ़ारे क़ुरैश बड़ी तैयारी से जंग के लिये उतावले हैं. जब हुदैबिय्यह पहुंचे तो उसका पानी ख़त्म हो गया. एक बूंद न रहा. गर्मी बहुत सख़्त थी. हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने कुंएं में कुल्ली फ़रमाई. उसकी बरकत से कुंआ पानी से भर गया, सब ने पिया, ऊंटों को पिलाया. यहाँ कुफ़्फ़ारे क़ुरैश की तरफ़ से हाल मालूम करने के लिये कई व्यक्ति भेजे गए. सबने जाकर यही बयान किया कि हुज़ूर उमरे के लिये आए हैं. जंग का इरादा नहीं है. लेकिन उन्हें यक़ीन न आया आख़िरकार उन्होंने अर्वा बिन मसऊद सक़फ़ी को जो ताइफ़ के बड़े सरदार और अरब के बहुत मालदार आदमी थे, हालात की जांच के लिये भेजा. उन्होंने आकर देखा कि हुज़ूर दस्ते मुबारक धोते हैं तो सहाबा तबर्रूक के लिये वह धोवन हासिल करने को टूट पड़ते हैं. अगर हुज़ूर कभी थूकते हैं तो लोग उसे हासिल करने की कोशिश करते हैं और जिसको वह मिल जाता है वह अपने चेहरे और बदन पर बरकत के लिये मलता है. कोई बाल हुज़ूर का गिरने नहीं पाता. सहाबा उसको बहुत अदब के साथ लेते और जान से ज़्यादा अज़ीज़ रखते हैं. जब हुज़ूर कलाम फ़रमाते हैं तो सब साकित हो जाते हैं. हुज़ूर के अदब और सम्मान के कारण कोई व्यक्ति नज़र ऊपर को नहीं उठाता. अर्वा ने क़ुरैश से जाकर यह सारा हाल बयान किया और कहा कि मैं फ़ारस, रोम और मिस्र के दरबारों में गया हूँ मैं ने किसी बादशाह की यह महानता नहीं देखी जो मुहम्मद की उन सहाबा में है. मुझे डर है कि तुम उनके मुक़ाबले में सफल न हो सकोगे. क़ुरैश ने कहा ऐसी बात मत कहो. हम इस साल उन्हें वापस कर देंगे. वो अगले साल आएं. अर्वा ने कहा मुझे डर है कि तुम्हें कोई मुसीबत पहुंचे. यह कहकर वह अपने साथियों समेत ताइफ़ चले गए और इस घटना के बाद अल्लाह तआला ने उन्हें इस्लाम से नवाज़ा. यहीं हुज़ूर ने अपने सहाबा से बैअत ली, इसको बैअते रिज़वान कहते हैं. बैअत की ख़बर से काफ़िर बहुत भयभीत हुए और उनके सलाहकारों ने यही मुनासिब समझा कि सुलह कर लें. चुनांन्चे सुलहनामा लिखा गया और अगले साल हुज़ूर का तशरीफ़ लाना क़रार पाया और यह सुलह मुसलमानों के हित में बड़ी लाभदायक साबित हुई बल्कि नतीजों के अनुसार विजयी सिद्ध हुई. इसी लिये अक्सर मुफ़स्सिरीन फ़त्ह से सुलह हुदैबिय्यह मुराद लेते हैं और कुछ इस्लाम की सारी फ़ूतूहात, जो आगे आने वाली थीं और भूतकाल की क्रिया से उनका ज़िक्र उनके निश्चित होने की वजह से है. (ख़ाज़िन और रूहुल बयान)

ताकि अल्लाह तुम्हारे कारण से गुनाह बख़्शे तुम्हारे अगलों के और तुम्हारे पिछलों के (3)
(3) और तुम्हारी बदौलत उम्मत की मग़फ़िरत फ़रमाए.(ख़ाज़िन और रूहुल बयान)

और अपनी नेअमतें तुम पर पूरी कर दे (4)
(4) दुनियावी भी और आख़िरत का भी.

और तुम्हें सीधी राह दिखा दे (5){2}
(5) रिसालत की तबलीग़ और रियासत के कामों की मज़बूती में (बैज़ावी)

और अल्लाह तुम्हारी ज़बरदस्त मदद फ़रमाए(6){3}
(6) दुश्मनों पर भरपूर ग़लबा अता करे.

वही है जिसने ईमान वालों के दिलों में इत्मीनान उतारा ताकि उन्हें यक़ीन पर यक़ीन बढ़े(7)
(7) और भरपूर अक़ीदे के बावुजूद नफ़्स का इत्मीनान हासिल हो.

और अल्लाह ही की मिल्क (स्वामित्व में) हैं तमाम लश्कर आसमानों और ज़मीन के(8)
(8) वह क़ादिर है जिससे चाहे अपने रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की मदद फ़रमाए. आसमान ज़मीन के लश्करों से या तो आसमान और ज़मीन के फ़रिश्ते मुराद है या आसमानों के फ़रिश्ते और ज़मीन के जानदार.
और अल्लाह इल्म व हिकमत (बोध) वाला है(9){4}
(9) उसने ईमान वालों के दिलों को तसल्ली और विजय का वादा फ़रमाया.

ताकि ईमान वाले मर्दों और ईमान वाली औरतों को बाग़ों में ले जाए जिनके नीचे नेहरें बहे हमेशा उनमें रहें और उनकी बुराइयाँ उनसे उतार दे, और यह अल्लाह के यहाँ बड़ी कामयाबी है{5} और अज़ाब दे मुनाफ़िक़ (दोग़ले) मर्दों और मुनाफ़िक़ औरतों और मुश्रिक मर्दों और मुश्रिक औरतों को जो अल्लाह पर गुमान रखते हैं(10)
(10) कि वह अपने रसूल सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और उनपर ईमान लाने वालों की मदद न फ़रमाएगा.

उन्हीं पर है बड़ी गर्दिश (मुसीबत) (11)
(11) अज़ाब और हलाकत का.

और अल्लाह ने उन पर ग़ज़ब फ़रमाया और उन्हें लअनत की और उनके लिये जहन्नम तैयार फ़रमाया, और वह क्या ही बुरा अंजाम {6} और अल्लाह ही की मिल्क में आसमानों और ज़मीन के सब लश्कर, और अल्लाह इज़्ज़त व हिकमत (बोध) वाला है {7} बेशक हमने तुम्हें भेजा हाज़िर व नाज़िर (सर्व द्ष्टा) (12)
(12) अपनी उम्मत के कर्मों और हालात का. ताकि क़यामत के दिन उनकी गवाही दो.

और ख़ुशी और डर सुनाता (13){8}
(13) यानी सच्चे ईमान वालों को जन्नत की ख़ुशी और नाफ़रमानों को दोज़ख़ के अज़ाब का डर सुनाता.

ताकि ऐ लोगों तुम अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाओ और रसूल की तअज़ीम व तौक़ीर (आदर व सत्कार) करो, और सुबह शाम अल्लाह की पाकी (प्रशंसा) बोलो(14) {9}
(14) सुब्ह की तस्बीह में नमाज़े फ़ज्र और शाम की तस्बीह में बाक़ी चारों नमाज़ें दाख़िल हैं.

वो जो तुम्हारी बैअत करते (अपना हाथ तुम्हारे हाथ में देते) हैं(15)
(15) इस बैअत से मुराद बैअते रिज़वान है जो नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हुदैबिय्यह में ली थी.

वो तो अल्लाह ही से बैअत करते हैं(16)
(16) क्योंकि रसूल से बैअत करना अल्लाह तआला ही से बैअत करना है जैसे कि रसूल की इताअत अल्लाह तआला की इताअत है.

उनके हाथों पर(17)
(17) जिनसे उन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की बैअत का सम्मान प्राप्त किया.

अल्लाह का हाथ है, तो जिसने एहद तोड़ा उसने अपने बड़े एहद को तोड़ा, (18)
(18) इस एहद तोड़ने का वबाल उसी पर पड़ेगा.

और जिसने पूरा किया वह एहद जो उसने अल्लाह से किया था तो बहुत जल्द अल्लाह उसे बड़ा सवाब देगा (19) {10}
(19) यानी हुदैबिय्यह से तुम्हारी वापसी के वक़्त.

40 सूरए मूमिन -दूसरा रूकू

40 सूरए मूमिन -दूसरा रूकू

إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا يُنَادَوْنَ لَمَقْتُ اللَّهِ أَكْبَرُ مِن مَّقْتِكُمْ أَنفُسَكُمْ إِذْ تُدْعَوْنَ إِلَى الْإِيمَانِ فَتَكْفُرُونَ
قَالُوا رَبَّنَا أَمَتَّنَا اثْنَتَيْنِ وَأَحْيَيْتَنَا اثْنَتَيْنِ فَاعْتَرَفْنَا بِذُنُوبِنَا فَهَلْ إِلَىٰ خُرُوجٍ مِّن سَبِيلٍ
ذَٰلِكُم بِأَنَّهُ إِذَا دُعِيَ اللَّهُ وَحْدَهُ كَفَرْتُمْ ۖ وَإِن يُشْرَكْ بِهِ تُؤْمِنُوا ۚ فَالْحُكْمُ لِلَّهِ الْعَلِيِّ الْكَبِيرِ
هُوَ الَّذِي يُرِيكُمْ آيَاتِهِ وَيُنَزِّلُ لَكُم مِّنَ السَّمَاءِ رِزْقًا ۚ وَمَا يَتَذَكَّرُ إِلَّا مَن يُنِيبُ
فَادْعُوا اللَّهَ مُخْلِصِينَ لَهُ الدِّينَ وَلَوْ كَرِهَ الْكَافِرُونَ
رَفِيعُ الدَّرَجَاتِ ذُو الْعَرْشِ يُلْقِي الرُّوحَ مِنْ أَمْرِهِ عَلَىٰ مَن يَشَاءُ مِنْ عِبَادِهِ لِيُنذِرَ يَوْمَ التَّلَاقِ
يَوْمَ هُم بَارِزُونَ ۖ لَا يَخْفَىٰ عَلَى اللَّهِ مِنْهُمْ شَيْءٌ ۚ لِّمَنِ الْمُلْكُ الْيَوْمَ ۖ لِلَّهِ الْوَاحِدِ الْقَهَّارِ
الْيَوْمَ تُجْزَىٰ كُلُّ نَفْسٍ بِمَا كَسَبَتْ ۚ لَا ظُلْمَ الْيَوْمَ ۚ إِنَّ اللَّهَ سَرِيعُ الْحِسَابِ
وَأَنذِرْهُمْ يَوْمَ الْآزِفَةِ إِذِ الْقُلُوبُ لَدَى الْحَنَاجِرِ كَاظِمِينَ ۚ مَا لِلظَّالِمِينَ مِنْ حَمِيمٍ وَلَا شَفِيعٍ يُطَاعُ
يَعْلَمُ خَائِنَةَ الْأَعْيُنِ وَمَا تُخْفِي الصُّدُورُ
وَاللَّهُ يَقْضِي بِالْحَقِّ ۖ وَالَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِهِ لَا يَقْضُونَ بِشَيْءٍ ۗ إِنَّ اللَّهَ هُوَ السَّمِيعُ الْبَصِيرُ

बेशक जिन्होंने कुफ़्र किया उनको निदा की जाएगी(1)
(1) क़यामत के दिन जबकि वो जहन्नम में दाख़िल होंगे और उनकी बदियाँ उनपर पेश की जाएंगी और वो अज़ाब देखेंगे तो फ़रिश्ते उनसे कहेंगे.

कि ज़रूर तुमसे अल्लाह की बेज़ारी इससे बहुत ज़्यादा है जैसे तुम आज अपनी जान से बेज़ार हो जबकि तुम(2)
(2) दुनिया में.

ईमान की तरफ़ बुलाए जाते तो तुम कुफ़्र करते{10} कहेंगे ऐ हमारे रब तूने हमें दोबारा मुर्दा किया और दोबारा ज़िन्दा किया(3)
(3) क्योंकि पहले बेजान नुत्फ़ा थे, इस मौत के बाद उन्हें जान देकर ज़िन्दा किया, फिर उम्र पूरी होने पर मौत दी, दोबारा उठाने के लिये ज़िन्दा किया.

अब हम अपने गुनाहों पर मुक़िर हुए (अड़ गए) तो आग से निकलने की भी कोई राह है(4){11}
(4) उसका जवाब यह होगा कि तुम्हारे दोज़ख़ से निकलने का कोई रास्ता नहीं और तुम जिस हाल में हो, जिस अज़ाब में गिरफ़्तार हो, और उससे रिहाई की कोई राह नहीं पा सकते.

यह उस पर हुआ कि जब एक अल्लाह पुकारा जाता तो तुम कुफ़्र करते(5)
(5) यानी इस अज़ाब और इसकी हमेशगी का कारण तुम्हारा यह कर्म है कि जब अल्लाह की तौहीद का ऐलान होता और लाइलाहा इल्लल्लाहो कहा जाता तो तुम उसका इन्कार करते और कुफ़्र इख़्तियार करते.

और उस का शरीक ठहराया जाता तो तुम मान लेते(6)
(6) और इस शिर्क की तस्दीक़ करते.

तो हुक्म अल्लाह के लिये है जो सब से बलन्द बड़ा {12} वही है कि तुम्हें अपनी निशानियां दिखाता है(7)
(7) यानी अपनी मसनूआत के चमत्कार जो उसकी भरपूर क़ुदरत के प्रमाण है जैसे हवा और बादल और बिजली वग़ैरह.

और तुम्हारे लिये आसमान से रोज़ी उतारता है(8),
(8) मेंह बरसा कर.

और नसीहत नहीं मानता(9)
(9) और उन निशानियों से नसीहत हासिल नहीं करता.

मगर जो रूजू लाए(10){13}
(10) सारे कामों में अल्लाह तआला की तरफ़ और शिर्क से तौबह करे.

तो अल्लाह की बन्दगी करो निरे उसके बन्दे होकर(11)
(11) शिर्क से अलग होकर.

पड़े बुरा माने काफ़िर {14} बलन्द दर्जे देने वाला(12)
(12) नबियों, वलियों और उलमा को, जन्नम में.

अर्श का मालिक, ईमान की जान वही डालता है अपन हुक्म से अपने बन्दों में जिस पर चाहे(13)
(13) यानी अपने बन्दों में से जिसे चाहता है नबुव्वत की उपाधि अता करता है और जिसको नबी बनाता है उसका काम होता है.

कि वह मिलने के दिन से डराए(14) {15}
(14) यानी सृष्टि को क़यामत का ख़ौफ़ दिलाए जिस दिन आसमान और ज़मीन वाले और अगले पिछले मिलेंगे और आत्माएं शरीरों से और हर कर्म करने वाला अपने कर्म से मिलेगा.

जिस दिन वो बिल्कुल ज़ाहिर हो जाएंगे(15)
(15)क़ब्रों से निकल कर और कोई ईमारत या पहाड़ और छुपने की जगह और आड़ न पाएंगे.

अल्लाह पर उनका कुछ हाल छुपा न होगा(16)
(16) न कहनी न करनी, न दूसरे हालात और अल्लाह तआला से तो कोई चीज़ कभी नहीं छुप सकती लेकिन यह दिन ऐसा होगा कि उन लोगों के लिये कोई पर्दा और आड़ की चीज़ न होगी जिसके ज़रिये से वो अपने ख़याल में भी अपने हाल को छुपा सके, और सृष्टि के नाश के बाद अल्लाह तआला फ़रमाएगा.

आज किस की बादशाही है (17)
(17) अब कोई न होगा कि जवाब दे. ख़ुद ही जवाब में फ़रमाएगा कि अल्लाह वाहिद व क़हहार की. और एक क़ौल यह है कि क़यामत के दिन जब सारे अगले पिछले हाज़िर होंगे तो एक पुकारने वाला पुकारेगा, आज किसकी बादशाही है? सारी सृष्टि जवाब देगी “लिल्लाहिल वाहिदिल क़हहार”  अल्लाह वाहिद व क़हहार की जैसा कि आगे इरशाद होता है.

एक अल्लाह सब पर ग़ालिब की(18) {16}
(18) मूमिन तो यह जवाब बहुत मज़े के साथ अर्ज़ करेंगे क्योंकि वो दुनिया में यही अक़ीदा रखते थे. यही कहते थे और इसी की बदौलत उन्हें दर्जे मिले और काफ़िर ज़िल्लत और शर्मिन्दगी के साथ इसका इक़रार करेंगे और दुनिया में अपने इन्कारी रहने पर लज्जित होंगे.

आज हर जान अपने किये का बदला पाएगी (19)
(19) नेक अपनी नेकी का और बद अपनी बदी का.

आज किसी पर ज़ियादती नहीं, बेशक अल्लाह जल्द हिसाब लेने वाला है {17} और उन्हें डराओ उस नज़्दीक आने वाली आफ़त के दिन से(20)
(20) इससे क़यामत का दिन मुराद है.

जब दिल गलों के पास आ जाएंगे(21)
(21) ख़ौफ़ की सख़्ती से न बाहर ही निकल सकें न अन्दर ही अपनी जगह वापस जा सकें.

ग़म में भरे, और ज़ालिमों का न कोई दोस्त न कोई सिफ़रिशी जिस का कहा माना जाए(22){18}
(22) यानी काफ़िर शफ़ाअत से मेहरूम होंगे.

अल्लाह जानता है चोरी छुपे की निगाह(23)
(23) यानी निगाहों की ख़यानत और चोरी, ना-मेहरम को देखना और मना की हुई चीज़ों पर नज़र डालना.

और जो कुछ सीनों में छुपा है(24){19}
(24)यानी दिलों के राज़, सब चीजें अल्लाह तआला के इल्म में हैं.

और अल्लाह सच्चा फ़ैसला फ़रमाता है और उसके सिवा जिनको(25)
(25) यानी जिन बुतों को ये मुश्रिक लोग.

पूजते हैं वो कुछ फ़ैसला नहीं करते(26) ,
(26) क्योंकि न वो इल्म रखते हैं न क़ुदरत, तो उनकी इबादत करना और उन्हें ख़ुदा का शरीक ठहराना बहुत ही खुला हुआ असत्य है.

बेशक अल्लाह ही सुनता और देखता है(27) {20}
(27) अपनी मख़लुक़ की कहनी व करनी और सारे हालात को.

39 सूरए ज़ुमर

39 सूरए  ज़ुमर

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ

تَنزِيلُ الْكِتَابِ مِنَ اللَّهِ الْعَزِيزِ الْحَكِيمِ
إِنَّا أَنزَلْنَا إِلَيْكَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ فَاعْبُدِ اللَّهَ مُخْلِصًا لَّهُ الدِّينَ
أَلَا لِلَّهِ الدِّينُ الْخَالِصُ ۚ وَالَّذِينَ اتَّخَذُوا مِن دُونِهِ أَوْلِيَاءَ مَا نَعْبُدُهُمْ إِلَّا لِيُقَرِّبُونَا إِلَى اللَّهِ زُلْفَىٰ إِنَّ اللَّهَ يَحْكُمُ بَيْنَهُمْ فِي مَا هُمْ فِيهِ يَخْتَلِفُونَ ۗ إِنَّ اللَّهَ لَا يَهْدِي مَنْ هُوَ كَاذِبٌ كَفَّارٌ
لَّوْ أَرَادَ اللَّهُ أَن يَتَّخِذَ وَلَدًا لَّاصْطَفَىٰ مِمَّا يَخْلُقُ مَا يَشَاءُ ۚ سُبْحَانَهُ ۖ هُوَ اللَّهُ الْوَاحِدُ الْقَهَّارُ
خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ بِالْحَقِّ ۖ يُكَوِّرُ اللَّيْلَ عَلَى النَّهَارِ وَيُكَوِّرُ النَّهَارَ عَلَى اللَّيْلِ ۖ وَسَخَّرَ الشَّمْسَ وَالْقَمَرَ ۖ كُلٌّ يَجْرِي لِأَجَلٍ مُّسَمًّى ۗ أَلَا هُوَ الْعَزِيزُ الْغَفَّارُ
خَلَقَكُم مِّن نَّفْسٍ وَاحِدَةٍ ثُمَّ جَعَلَ مِنْهَا زَوْجَهَا وَأَنزَلَ لَكُم مِّنَ الْأَنْعَامِ ثَمَانِيَةَ أَزْوَاجٍ ۚ يَخْلُقُكُمْ فِي بُطُونِ أُمَّهَاتِكُمْ خَلْقًا مِّن بَعْدِ خَلْقٍ فِي ظُلُمَاتٍ ثَلَاثٍ ۚ ذَٰلِكُمُ اللَّهُ رَبُّكُمْ لَهُ الْمُلْكُ ۖ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ فَأَنَّىٰ تُصْرَفُونَ
إِن تَكْفُرُوا فَإِنَّ اللَّهَ غَنِيٌّ عَنكُمْ ۖ وَلَا يَرْضَىٰ لِعِبَادِهِ الْكُفْرَ ۖ وَإِن تَشْكُرُوا يَرْضَهُ لَكُمْ ۗ وَلَا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَىٰ ۗ ثُمَّ إِلَىٰ رَبِّكُم مَّرْجِعُكُمْ فَيُنَبِّئُكُم بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ ۚ إِنَّهُ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ
۞ وَإِذَا مَسَّ الْإِنسَانَ ضُرٌّ دَعَا رَبَّهُ مُنِيبًا إِلَيْهِ ثُمَّ إِذَا خَوَّلَهُ نِعْمَةً مِّنْهُ نَسِيَ مَا كَانَ يَدْعُو إِلَيْهِ مِن قَبْلُ وَجَعَلَ لِلَّهِ أَندَادًا لِّيُضِلَّ عَن سَبِيلِهِ ۚ قُلْ تَمَتَّعْ بِكُفْرِكَ قَلِيلًا ۖ إِنَّكَ مِنْ أَصْحَابِ النَّارِ
أَمَّنْ هُوَ قَانِتٌ آنَاءَ اللَّيْلِ سَاجِدًا وَقَائِمًا يَحْذَرُ الْآخِرَةَ وَيَرْجُو رَحْمَةَ رَبِّهِ ۗ قُلْ هَلْ يَسْتَوِي الَّذِينَ يَعْلَمُونَ وَالَّذِينَ لَا يَعْلَمُونَ ۗ إِنَّمَا يَتَذَكَّرُ أُولُو الْأَلْبَابِ

सूरए ज़ुमर मक्का में उतरी, इसमें 75 आयतें, आठ रूकू हैं.
 -पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए ज़ुमर मक्के में उतरी सिवा आयत “क़ुल या इबादियल लज़ीना असरफ़ू” और “अल्लाहो नज़्ज़ला अहसनल हदीसे” के. इस सूरत में आठ रूकू, पछहत्तर आयतें, एक हज़ार एक सौ बहत्तर कलिमे और चार हज़ार नौ सौ आठ अक्षर है.

किताब(2)
(2) किताब से मुराद क़ुरआन शरीफ़ है.

उतारना है अल्लाह इज़्ज़त व हिकमत (बोध) वाले की तरफ़ से {1} बेशक हमने तुम्हारी तरफ़(3)
(3) ऐ सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम.

यह किताब हक़(सत्य) के साथ उतारी तो अल्लाह को पूजो निरे उसके बन्दे होकर {2} हाँ ख़ालिस अल्लाह ही की बन्दगी है(4)
(4) उसके सिवा कोई इबादत का मुस्तहिक़ नहीं.

और वो जिन्होंने उसके सिवा और वाली (सरपरस्त) बना लिये (5)
(5) मअबूद ठहरा लिये .मुराद इससे बुत-परस्त हैं.

कहते हैं हम तो उन्हें(6)
(6) यानी बुतों को.

सिर्फ़ इतनी बात के लिये पूजते हैं कि ये हमें अल्लाह के पास नज़्दीक़ कर दें, अल्लाह उनमें फ़ैसला कर देगा उस बात का जिसमें इख़्तिलाफ़ (मतभेद) कर रहे हैं(7)
(7) ईमानदारों को जन्नत में और काफ़िरों को दोज़ख़ में दाख़िल फ़रमा कर.

बेशक अल्लाह राह नहीं देता उसे जो झूठा बड़ा नाशुक्रा हो(8){3}
(8) झूटा इस बात में कि बुतों को अल्लाह तआला से नज़्दीक करने वाला बताए और ख़ुदा के लिये औलाद ठहराए और नाशुक्रा ऐसा कि बुतों को पूजे.

अल्लाह अपने लिये बच्चा बनाता तो अपनी मख़लूक़ में से जिसे चाहता चुन लेता(9)
(9) यानी अगर बिलफ़र्ज़ अल्लाह तआला के लिये औलाद मुमकिन होती तो वह जिसे चाहता औलाद बनाता न कि यह प्रस्ताव काफ़िरों पर छोड़ता कि वो जिसे चाहे ख़ुदा की औलाद क़रार दें.

पाकी है उसे(10)
(10) औलाद से और हर उस चीज़ से जो उसकी शाने अक़दस के लायक़ नहीं.

वही है एक अल्लाह(11)
(11) न उसका कोई शरीक न उसकी कोई औलाद.

सब पर ग़ालिब {4} उसने आसमान और ज़मीन हक़ बनाए रात को दिन पर लपेटता है और दिन को रात पर लपेटता है(12)
(12) यानी कभी रात की तारीकी से दिन के एक हिस्से को छुपाता है और कभी दिन की रौशनी से रात के हिस्से को. मुराद यह है कि कभी दिन का वक़्त घटा कर रात को बढ़ाता है कभी रात घटा कर दिन को ज़्यादा करता है और रात और दिन में से घटने वाला घटते घटते दस घण्टे का रह जाता है और बढ़ने वाला बढ़ते बढ़ते चौदह घण्टे का हो जाता है.

और उसने सूरज और चांद को काम में लगाया हर एक एक ठहराई मीआद के लिये चलता है(13)
(13) यानी क़यामत तक वह अपने निर्धारित निज़ाम पर चलते रहेंगे.

सुनता है वही इज़्ज़त वाला बख़्शने वाला है {5} उसने तुम्हें एक जान से बनाया(14)
(14) यानी हज़रत आदम अलैहिस्सलाम से.

फिर उसी से उसका जोड़ा पैदा किया(15)
(15) यानी हज़रत हव्वा को.

और तुम्हारे लिये चौपायों में से(16)
(16) यानी ऊंट, गाय, बकरी, भेड़ से.

आठ जोड़े उतारे(17)
(17) यानी पैदा किये जोड़ों से, मुराद नर और मादा हें.

तुम्हें तुम्हारी माओ के पेट में बनाता है एक तरह के बाद और तरह  (18)
(18) यानी नुत्फ़ा, फिर बँधा हुआ ख़ून, फिर गोश्त का टुकड़ा.

तीन अंधेरियों में (19)
(19) एक अंधेरी पेट की, दूसरी गर्भ की, तीसरी बच्चे दानी की.

यह है अल्लाह तुम्हारा रब उसी की बादशाही है, उसके सिवा किसी की बन्दगी नहीं फिर कहां फिरे जाते हो(20){6}
(20) और सच्चाई के रास्ते से दूर होते हो कि उसकी इबादत छोड़ कर ग़ैर की इबादत करते हो.

अगर तुम नाशुक्री करो तो बेशक अल्लाह बेनियाज़ है तुम से(21)
(21)  यानी तुम्हारी ताअत व इबादत से और तुम ही उसके मोहताज हो, ईमान लाने में तुम्हारा ही नफ़ा है, और काफ़िर हो जाने में तुम्हारा ही नुक़सान है.

और अपने बन्दों की नाशुक्री उसे पसन्द नहीं, और अगर शुक्र करो तो इसे तुम्हारे लिए पसंद फ़रमाता है(22)
(22) कि वह तुम्हारी कामयाबी का कारण है. उसपर तुम्हें सवाब देगा और जन्नत अता फ़रमाएगा.

और कोई बोझ उठाने वाली जान दूसरे का बोझ नहीं उठाएगी(23)
(23) यानी कोई व्यक्ति दूसरे के गुनाह में न पकड़ा जाएगा.

फिर तुम्हें अपने रब ही की तरफ़ फिरना है(24)
(24) आख़िरत में.

तो वह तुम्हें बता देगा जो तुम करते थे(25)
(25) दुनिया में और उसकी तुम्हें जज़ा देगा.

बेशक वह दिलों की बात जानता है {7} और जब आदमी को कोई तक़लीफ़ पहुंचती है(26)
(26) यहाँ आदमी से निरा काफ़िर या ख़ास अबू जहल या उतबा बिन रबीआ मुराद है.

अपने रब को पुकारता है उसी तरफ़ झुका हुआ(27)
(27) उसी से फ़रियाद करता है.

फिर जब अल्लाह ने उसे अपने पास से कोई नअमत दी तो भूल जाता है जिस लिये पहले पुकारा था(28)
(28) यानी उस सख़्ती और तकलीफ़ को भुला देता है जिसके लिये अल्लाह से फ़रियाद की थी.

और अल्लाह के लिये बराबर वाले ठहराने लगता है(29)
(29) यानी हाजत की पूर्ति के बाद फिर बुत परस्ती में पड़ जाता है.

ताकि उसकी राह से बहका दे, तुम फ़रमाओ(30)
(30) ऐ मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, उस काफ़िर से.

थोड़े दिन अपने कुफ़्र के साथ बरत ले(31)
(31) और दुनिया की ज़िन्दगी के दिन पूरे कर ले.

बेशक तू दोज़ख़ियों में है{8} क्या वह जिसे फ़रमाँबरदारी में रात की घड़ियां गुज़रीं सूजूद और क़याम में (32)
(32) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि आयत हज़रत अबूबक्र और हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हुमा की शान में नाज़िल हुई और हज़रत अब्दुल्लाह इब्ने उमर रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि यह आयत हज़रत उस्माने ग़नी रदियल्लाहो अन्हो के हक़ में नाज़िल हुई और एक क़ौल यह है कि हज़रत इब्ने मसऊद और हज़रत अम्मार और हज़रत सलमान रदियल्लाहो अन्हुम के हक़ में उतरी. इस आयत से साबित हुआ कि रात के नफ़्ल और इबादत दिन के नफ़लों से बढ़कर हैं. इसकी वजह तो यह है कि रात का अमल पोशीदा होता है इसलिये वह रिया से बहुत दूर होता है. दूसरे यह कि दुनिया के कारोबार बन्द होते हैं इसलिये दिल दिन की अपेक्षा बहुत फ़ारिग़ होता है और अल्लाह की तरफ़ तवज्जह और एकाग्रता दिन से ज़्यादा रात में मयस्सर आती है तीसरे, रात चूंकि राहत और नींद का समय होता है इसलिये उसमें जागना नफ़्स  को कठिन परिश्रम में डालता है तो सवाब भी उसका ज़्यादा होगा.

आख़िरत में डरता और अपने रब की रहमत की आस लगा(33)
(33) इससे साबित हुआ कि ईमान वाले के लिये लाज़िम है कि वह डर और उम्मीद के बीच हो. अपने कर्मों की कमी पर नज़र करके अज़ाब से डरता रहे और अल्लाह तआला की रहमत का उम्मीदवार रहे. दुनिया में बिल्कुल निडर होना या अल्लाह तआला की रहमत से बिल्कुल मायूस होना, ये दोनों क़ुरआने पाक में काफ़िरों की हालतें बताई गई हैं. अल्लाह तआला फ़रमाता है “फ़ला यअमनो मकरल्लाहे इल्लल क़ौमुल ख़ासिरून” यानी तो अल्लाह की छुपी तदबीर से निडर नहीं होते मगर तबाही वाले (सूरए अअराफ़, आयत 99), और इरशाद है”ला यएसो मिन रौहिल्लाहे इल्लल क़ौमुल काफ़िरून” यानी बेशक अल्लाह की रहमत से नाउम्मीद नहीं होते मगर काफ़िर लोग. (सूरए यूसुफ़, आयत 87)
क्या वह नाफ़रमानों जैसा हो जाएगा तुम फ़रमाओ क्या बराबर हैं जानने वाले और अनजान, नसीहत तो वही मानते हैं जो अक़्ल वाले हैं{9}