40 सूरए मूमिन -आठवाँ रूकू

40 सूरए मूमिन -आठवाँ रूकू

أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ يُجَادِلُونَ فِي آيَاتِ اللَّهِ أَنَّىٰ يُصْرَفُونَ
الَّذِينَ كَذَّبُوا بِالْكِتَابِ وَبِمَا أَرْسَلْنَا بِهِ رُسُلَنَا ۖ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ
إِذِ الْأَغْلَالُ فِي أَعْنَاقِهِمْ وَالسَّلَاسِلُ يُسْحَبُونَ
فِي الْحَمِيمِ ثُمَّ فِي النَّارِ يُسْجَرُونَ
ثُمَّ قِيلَ لَهُمْ أَيْنَ مَا كُنتُمْ تُشْرِكُونَ
مِن دُونِ اللَّهِ ۖ قَالُوا ضَلُّوا عَنَّا بَل لَّمْ نَكُن نَّدْعُو مِن قَبْلُ شَيْئًا ۚ كَذَٰلِكَ يُضِلُّ اللَّهُ الْكَافِرِينَ
ذَٰلِكُم بِمَا كُنتُمْ تَفْرَحُونَ فِي الْأَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّ وَبِمَا كُنتُمْ تَمْرَحُونَ
ادْخُلُوا أَبْوَابَ جَهَنَّمَ خَالِدِينَ فِيهَا ۖ فَبِئْسَ مَثْوَى الْمُتَكَبِّرِينَ
فَاصْبِرْ إِنَّ وَعْدَ اللَّهِ حَقٌّ ۚ فَإِمَّا نُرِيَنَّكَ بَعْضَ الَّذِي نَعِدُهُمْ أَوْ نَتَوَفَّيَنَّكَ فَإِلَيْنَا يُرْجَعُونَ
وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا رُسُلًا مِّن قَبْلِكَ مِنْهُم مَّن قَصَصْنَا عَلَيْكَ وَمِنْهُم مَّن لَّمْ نَقْصُصْ عَلَيْكَ ۗ وَمَا كَانَ لِرَسُولٍ أَن يَأْتِيَ بِآيَةٍ إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ ۚ فَإِذَا جَاءَ أَمْرُ اللَّهِ قُضِيَ بِالْحَقِّ وَخَسِرَ هُنَالِكَ الْمُبْطِلُونَ

क्या तुमने उन्हें न देखा जो अल्लाह की आयतों में झगड़ते हैं(1)
(1) यानी क़ुरआने पाक में.

कहाँ फेरे जाते हैं(2){69}
(2) ईमान और सच्चे दीन से.

वो जिन्होंने झुटलाई किताब(3)
(3) यानी काफ़िर जिन्होंने क़ुरआन शरीफ़ को झुटलाया.

और जो हमने अपने रसूलों के साथ भेजा (4)
(4) उसको भी झुटलाया और उसके रसूलों के साथ जो चीज़ भेजी. इससे मुराद या तो वो किताबें हैं जो पहले रसूल लाए या वो सच्चे अक़ीदे जो तमाम नबियों ने पहुंचाए जैसे अल्लाह की वहदानियत और मरने के बाद उठाए जाने का अक़ीदा.

वो बहुत जल्द जान जाएंगे (5){70}
(5) अपने झुटलाने का परिणाम.

जब उनकी गर्दनों में तौक़ होंगे और ज़ंजीरें (6)
(6) और इन ज़ंजीरों से.

घसीटे जाएंगे {71} खौलते पानी में, फिर आग में दहकाए जाएंगे (7){72}
(7) और वह आग बाहर से भी उन्हें घेरे होगी और उनके अन्दर भी भरी होगी. (अल्लाह तआला की पनाह)

फिर उनसे फ़रमाया जाएगा कि कहाँ गए वो जो तुम शरीक बनाते थे(8){73}
(8) यानी वो बुत क्या हुए जिनकी तुम पूजा करते थे.

अल्लाह के मुक़ाबिल, कहेंगे वो तो हम से गुम गए(9)
(9) कहीं नज़र ही नहीं आते.

बल्कि हम पहले कुछ पूजते ही न थे(10)
(10) बुतों की पूजा का इन्कार कर जाएंगे. फिर बुत हाज़िर किये जाएंगे और काफ़िरों से फ़रमाया जाएगा कि तुम और तुम्हारे ये मअबूद सब जहन्नम का ईंधन हो. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि जहन्नमियों का यह कहना कि हम पहले कुछ पूजते ही न थे इसके यह मानी हैं कि अब हमें ज़ाहिर हो गया कि जिन्हें हम पूजते थे वो कुछ न थे कि कोई नफ़ा या नुक़सान पहुंचा सकते.

अल्लाह यूंही गुमराह करता है काफ़िरों को {74} यह (11)
(11) यानी यह अज़ाब जिसमें तुम गिरफ़्तार हो.

उसका बदला है जो तुम ज़मीन में बातिल पर ख़ुश होते थे(12)
(12) यानी शिर्क और बुत परस्ती और दोबारा उठाए जाने के इन्कार पर.

और उसका बदला है जो तुम इतराते थे {75} जाओ जहन्नम के दरवाज़ों में उसमें हमेशा रहने, तो क्या ही बुरा ठिकाना घमण्डियों का(13){76}
(13)जिन्होंने घमण्ड किया और हक़ को क़ुबूल न किया.

तो तुम सब्र करो बेशक अल्लाह का वादा(14)
(14)काफ़िरों पर अज़ाब फ़रमाने का.

सच्चा है, तो अगर हम तुम्हें दिखा दें(15)
(15) तुम्हारी वफ़ात से पहले.

कुछ वह चीज़ जिसका उन्हें वादा दिया जाता है(16)
(16) अज़ाब की क़िस्मों से, जैसे बद्र में मारे जाने के, जैसा कि यह वाक़े हुआ.

या तुम्हें पहले ही वफ़ात (मृत्यु) दें बहरहाल उन्हें हमारी ही तरफ़ फिरना(17){77}
(17) और सख़्त अज़ाब में गिरफ़्तार होना.

और बेशक हमने तुमसे पहले कितने ही रसूल भेजे कि जिन में किसी का अहवाल तुमसे बयान फ़रमाया (18)
(18) इस क़ुरआन में तफ़सील के साथ.

और किसी का अहवाल न बयान फ़रमाया (19),
(19) क़ुरआन शरीफ़ में तफ़सील से और खुला खुला (मिरक़ात) और उन तमाम नबियों को अल्लाह तआला ने निशानी और चमत्कार अता फ़रमाए और उनकी क़ौमों ने उनसे जंग की और उन्हें झुटलाया इसपर उन हज़रात ने सब्र किया. इस बयान से तात्पर्य नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली है कि जिस तरह के वाक़िआत क़ौम की तरफ़ से आपको पेश आ रहे हैं जैसी तकलीफ़ें पहुंच रही है, पहले नबियों के साथ भी यही हालात गुज़र चुके हैं. उन्होंने सब्र किया. आप भी सब्र फ़रमाएं.

और किसी रसूल को नहीं पहुंचता कि कोई निशानी ले आए ख़ुदा के हुक्म के बिना, फिर जब अल्लाह का हुक्म आएगा(20)
(20) काफ़िरों पर अज़ाब उतारने के बारे में.

सच्चा फ़ैसला फ़रमा दिया जाएगा(21)और बातिल (असत्य) वालों का वहाँ ख़सारा{78}
(21) रसूलों के, और उनके झुटलाने वालों के बीच.

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40 सूरए मूमिन -नवाँ रूकू

40 सूरए मूमिन -नवाँ रूकू

اللَّهُ الَّذِي جَعَلَ لَكُمُ الْأَنْعَامَ لِتَرْكَبُوا مِنْهَا وَمِنْهَا تَأْكُلُونَ
وَلَكُمْ فِيهَا مَنَافِعُ وَلِتَبْلُغُوا عَلَيْهَا حَاجَةً فِي صُدُورِكُمْ وَعَلَيْهَا وَعَلَى الْفُلْكِ تُحْمَلُونَ
وَيُرِيكُمْ آيَاتِهِ فَأَيَّ آيَاتِ اللَّهِ تُنكِرُونَ
أَفَلَمْ يَسِيرُوا فِي الْأَرْضِ فَيَنظُرُوا كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ كَانُوا أَكْثَرَ مِنْهُمْ وَأَشَدَّ قُوَّةً وَآثَارًا فِي الْأَرْضِ فَمَا أَغْنَىٰ عَنْهُم مَّا كَانُوا يَكْسِبُونَ
فَلَمَّا جَاءَتْهُمْ رُسُلُهُم بِالْبَيِّنَاتِ فَرِحُوا بِمَا عِندَهُم مِّنَ الْعِلْمِ وَحَاقَ بِهِم مَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ
فَلَمَّا رَأَوْا بَأْسَنَا قَالُوا آمَنَّا بِاللَّهِ وَحْدَهُ وَكَفَرْنَا بِمَا كُنَّا بِهِ مُشْرِكِينَ
فَلَمْ يَكُ يَنفَعُهُمْ إِيمَانُهُمْ لَمَّا رَأَوْا بَأْسَنَا ۖ سُنَّتَ اللَّهِ الَّتِي قَدْ خَلَتْ فِي عِبَادِهِ ۖ وَخَسِرَ هُنَالِكَ الْكَافِرُونَ

अल्लाह है जिसने तुम्हारे लिये चौपाए बनाए कि किसी पर सवार हो और किसी का गोश्त खाओ{79} और तुम्हारे लिये उनमें कितने ही फ़ायदे हैं (1)
(1) कि उनके दूध और ऊन वग़ैरह काम में लाते हो और उनकी नस्ल से नफ़ा उठाते हो.

और इसलिये कि तुम उनकी पीठ पर अपने दिल की मुरादों को पहुंचो(2)
(2) यानी अपने सफ़रों में अपने वज़नी सामान उनकी पीठों पर लादकर एक स्थान से दूसरे स्थान पर ले जाते हो.

और उनपर(3)
(3) ख़ुश्की के सफ़रों में.

और किश्तियों पर(4)
(4) दरियाई सफ़रों में.

सवार होते हो {80} और वह तुम्हें अपनी निशानियां दिखाता है(5)
(5) जो उसकी क़ुदरत और वहदानियत पर दलालत करती हैं.

तो अल्लाह की कौन सी निशानी का इन्कार करोगे(6) {81}
(6) यानी वो निशानियाँ ऐसी ज़ाहिर व खुली हैं कि उनके इन्कार की कोई सूरत ही नहीं.

तो क्या उन्होंने ज़मीन में सफ़र न किया कि देखते उनसे अगलों का कैसा अंजाम हुआ, वो उनसे बहुत थे (7)
(7) उनकी संख्या अधिक थी.

और उनकी क़ुव्वत(8)
(8) और जिस्मानी ताक़त भी उनसे अधिक थी.

और ज़मीन में निशानियां उनसे ज़्यादा (9)
(9) यानी उनके महल और इमारतें वग़ैरह.

तो उनके क्या काम आया जो उन्हों ने कमाया(10){82}
(10) मानी ये हैं कि अगर ये लोग ज़मीन में सफ़र करते तो उन्हें मालूम हो जाता कि इन्कार और ज़िद करने वालों का क्या परिणाम हुआ और वो किस तरह हलाक और बर्बाद हुए और उनकी तादाद उनके ज़ोर उनके माल कुछ भी उनके काम न आ सके.

तो जब उनके पास उनके रसूल रौशन दलीलें लाए तो वो उसी पर ख़ुश रहे जो उनके पास दुनिया का इल्म था(11)
(11) और उन्होंने नबियों के इल्म की तरफ़ तवज्जह न की. उसे हासिल करने और उससे नफ़ा उठाने पर ध्यान न दिया बल्कि उसको तुच्छ जाना और उसकी हंसी बनाई और अपने दुनियावी इल्म को जो हक़ीक़त में जिहालत है, पसन्द करते रहे.

और उन्हीं पर उलट पड़ा जिसकी हंसी बनाते थे (12)
(12) यानी अल्लाह तआला का अज़ाब.

फिर जब उन्हों ने हमारा अज़ाब देखा बोले हम एक अल्लाह पर ईमान लाए और जो उसके शरीक करते थे उनसे इन्कारी हुए(13){83}
(13) यानी जिन बुतों को उसके सिवा पूजते थे उनसे बेज़ार हुए.

तो उनके ईमान ने उन्हें काम न दिया जब उन्होंने हमारा अज़ाब देख लिया, अल्लाह का दस्तूर जो उसके बन्दों में गुज़र चुका (14){84}
(14) यह है कि अज़ाब उतरने के वक़्त ईमान लाना नफ़ा नहीं देता उस वक़्त ईमान क़ुबूल नहीं किया जाता और यह भी अल्लाह तआला की सुन्नत है कि रसूलों के झुटलाने वालों पर अज़ाब उतरता है.

और वहाँ काफ़िर घाटे में रहे(15) {85}
(15) यानी उनका घाटा और टोटा अच्छी तरह ज़ाहिर हो गया.