20 सूरए तॉहा-आठवाँ रूकू

20 सूरए तॉहा-आठवाँ रूकू

और अगर तुम्हारे रब की एक बात न गुज़र चुकी होती(1)
(1) यानी यह कि उम्मते मुहम्मदिया के अज़ाब में विलम्ब किया जाएगा.

तो ज़रूर अज़ाब उन्हें(2)
(2) दुनिया ही में.

लिपट जाता और अगर न होता एक वादा ठहराया हुआ (3){129}
(3) यानी क़यामत के दिन.

तो उनकी बातों पर सब्र करो और अपने रब को सराहते हुए उसकी पाकी बोलो सूरज चमकने से पहले (4)
(4) इससे फ़ज्र की नमाज़ मुराद है.

और उसके डूबने से पहले (5)
(5) इससे ज़ोहर और अस्र की नमाज़ें मुराद हैं जो दिन के आख़िरी निस्फ़ यानी उत्तरार्ध में सूरज के ज़वाल और ग़ुरूब के बीच स्थित हैं.

और रात की घड़ियों में उसकी पाकी बोलो(6)
(6) यानी मग़रिब और इशा की नमाज़ें पढ़ो.

और दिन के किनारों पर(7)
(7) फ़ज्र और मग़रिब की नमाज़ें, इनको ताकीद के लिये दोहराया गया और कुछ मुफ़स्सिर “डूबने से पहले” से अस्र की नमाज़ और “दिन के किनारों पर” से ज़ोहर मुराद लेते हैं. उनकी तौजीह यह है कि ज़ोहर की नमाज़ ज़वाल के बाद है और उस वक़्त दिन के पहले आधे हिस्से और दूसरे आधे हिस्से के किनारे मिलते है. पहले आधे हिस्से का अंत है और दूसरे आधे की शुरूआत. (मदारिक ख़ाज़िन)

इस उम्मीद पर कि तुम राज़ी हो(8){130}
(8) अल्लाह के फ़ज़्ल और अता और उसके इनआम और इकराम से कि तुम्हें उम्मत के हक़ में शफ़ीअ बनाकर तुम्हारी शफ़ाअत क़ुबूल फ़रमाए और तुम्हें राज़ी करें जैसा कि उसने फ़रमाया है “व लसौफ़ा युअतीका रब्बुका फतरदा” यानी और बेशक क़रीब है कि तुम्हारा रब तुम्हें इतना देगा कि तुम राज़ी हो जाओगे (सुरए दुहा 93:5)

और ऐ सुनने वाले अपनी आँखें न फ़ैला उसकी तरफ़ जो हम ने काफ़िरों के जोड़ों को बरतने के लिये दी है जितनी दुनिया की ताज़गी(9)
(9)  यानी यहूदी और ईसाई काफ़िरों वग़ैरह को जो दुनियावी सामान दिया है, मूमिन को चाहिये कि उसको अचरज की नज़र से न देखे. हसन रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि नाफ़रमानों की शानो शौकत न देखो लेकिन यह देखो कि गुनाह और बुराई की ज़िल्लत किस तरह उनकी गर्दनों से नमूदार है.

कि हम उन्हें इसके कारण फ़ितने में डालें(10)
(10) इस तरह कि जितनी उनपर नेअमत ज़्यादा हो उतनी ही उनकी सरकशी और उनकी ज़िदें बढ़ें और वो आख़िरत की सज़ा के मुस्तहिक़ हों.

और तेरे रब का रिज़्क़ (11)
(11) यानी जन्नत और उसकी नेअमतें.

सब से अच्छा और सबसे देरपा है {113} और अपने घर वालों को नमाज़ का हुक्म दे और ख़ुद इस पर साबित रह, कुछ हम तुझसे रोज़ी नहीं मांगते(12)
(12) और इसकी ज़िम्मेदारी नहीं डालते कि हमारी ख़ल्क़ को रोज़ी दे या अपने नफ़्स और अपने कुटुम्ब की रोज़ी का ज़िम्मेदार हो, बल्कि—

हम तुझे रोज़ी देंगे(13)
(13) और उन्हें भी, रोज़ी के ग़म में न पड़, अपने दिल को आख़िरत की फ़िक्र के लिये आज़ाद रख कि जो अल्लाह के काम में होता है अल्लाह उसके काम बनाता है.

और अंजाम का भला परहेज़गारी के लिये{132} और काफ़िर बोले ये(14)
(14) यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

अपने रब के पास से कोई निशानी क्यों नहीं लाते(15)
(15) जो उनकी नबुव्वत की सच्चाई पर दलील हो जबकि बहुत सी आयतें आ चुकी थीं और चमत्कारों का लगातार जुहूर हो रहा था. फिर काफ़िर उन सबसे अन्धे बने और उन्होंने हुज़ूर की निस्बत यह कह दिया कि आप अपने रब के पास से कोई निशानी क्यों नहीं लाते. इसके जवाब में अल्लाह तआला फ़रमाता है.

और क्या उन्हें इसका बयान न आया जो अगले सहीफ़ों(धर्मग्रन्थों) में है(16){133}
(16) यानी क़ुरआन और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़ुशख़बरी और आपकी नबुव्वत और तशरीफ़ लाने का ज़िक्र, ये कैसी बड़ी निशानियाँ हैं. इनके होते हुए और किसी निशानी की तलब करने का क्या मौक़ा है.

और अगर हम उन्हें किसी अज़ाब से हलाक कर देते रसूल के आने से पहले तो (17)
(17) क़यामत के दिन.

ज़रूर कहते ऐ रब हमारे तूने हमारी तरफ़ कोई रसूल क्यों न भेजा कि हम तेरी आयतों पर चलते इससे पहले कि ज़लील व रूस्वा होते{134} तुम फ़रमाओ सब राह देख रहे हैं(18)
(18) हम भी और तुम भी. मुश्रिकों ने कहा था कि हम ज़माने की घटनाओं और इन्क़लाब का इन्तिज़ार करते हैं कि कब मुसलमानों पर आएं और उनकी कहानी का अन्त हो. इसपर यह आयत उतरी और बताया गया कि तुम मुसलमानों की तबाही और बर्बादी की राह देख्ख रहे हो और मुसलमान तुम्हारे पकड़े जाने और तुम पर अज़ाब आने का इन्तिज़ार कर रहे हैं.

तो तुम भी राह देखो तो अब जान जाओगे(19)कि कौन हैं सीधी राह वाले और किसने हिदायत पाई{135}
(19) जब ख़ुदा का हुक्म आएगा और क़यामत क़ायम होगी.
पारा सोलाह समाप्त 

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