सूरए अअराफ़ – आठवाँ रूकू

सूरए अअराफ़ – आठवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

बेशक हमने नूह को उसकी क़ौम की तरफ़ भेजा (1)
तो उसने कहा ऐ मेरी क़ौम अल्लाह को पूजो (2)
उसके सिवा तुम्हारा कोई मअबूद (आराध्य) नहीं (3)
बेशक मुझे तुम पर बड़े दिन के अज़ाब का डर है (4){59}
उसकी क़ौम से सरदार बोले बेशक हम तुम्हें खुली गुमराही में देखते हैं {60} कहा ऐ मेरी क़ौम मुझमें गुमराही नहीं, मैं तो सारे जगत के रब का रसूल हूँ {61} तुम्हें अपने रब की रिसालतें (संदेश) पहुंचाता और तुम्हारा भला चाहता और मैं अल्लाह की तरफ़ से वह इल्म रखता हूँ जो तुम नहीं रखते {62} और क्या तुम्हें इसका अचंभा हुआ कि तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से एक नसीहत आई तुम में के एक मर्द की मारिफ़त (द्वारा) (5)
कि वह तुम्हें डराए और तुम डरो और कहीं तुमपर रहम हो {63} तो उन्होंने उसे (6)
झुटलाया तो हमने उसे और जो (7)
उसके साथ किश्ती में थे निजात दी और अपनी आयतें झुटलाने वालों को डुबो दिया, बेशक वह अंधा गिरोह था (8){64}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – आठवाँ रूकू

(1) हज़रत नूह अलैहिस्सलाम के वालिद का नाम लमक है. वह मतूशल्ख़ के, वह अख़नूख़ अलैहिस्सलाम के फ़रज़न्द हैं. अख़नूख़ हज़रत इदरीस अलैहिस्सलाम का नाम है. हज़रत नूह अलैहिस्सलाम चालीस या पचास साल की उम्र में नबुव्वत से सम्मानित किये गए. ऊपर की आयतों में अल्लाह तआला ने अपनी क़ुदरत की दलीलें और अपनी सनअत के चमत्कार बयान फ़रमाए जिनसे उसके एक होने और मअबूद होने का सुबूत मिलता है. और मरने के बाद उठने और ज़िन्दा होने की सेहत पर खुली दलीलें क़ायम कीं. इसके बाद नबियों का ज़िक्र फ़रमाता है और उनके उन मामलों का, जो उन्हें उम्मतों के साथ पेश आए. इसमें नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तसल्ली है कि केवल आप ही की क़ौम ने हक़ क़ुबूल करने से इन्कार नहीं किया, बल्कि पहली उम्मतें भी इन्कार करती रहीं और नबियों को झुटलाने वालों का अंजाम दुनिया में हलाकत और आख़िरत में भारी अज़ाब है. इससे ज़ाहिर है कि नबियों को झुटलाने वाले अल्लाह के ग़ज़ब और प्रकोप के हक़दार होते हैं. जो व्यक्ति सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को झुटलाएगा, उसका भी यही अंजाम होगा. नबियों के इन तज़किरों में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नबुव्वत की ज़बरदस्त दलील है, क्योंकि हुज़ूर उम्मी थे यानी ज़ाहिर में पढ़े लिखे न थे. फिर आपका इन घटनाओ को तफ़सील से बयान करना, ख़ास तौर से ऐसे मुल्क में, जहाँ किताब वालों के उलमा काफ़ी मौजूद थे, और सख़्त विरोधी भी थे, ज़रासी बात पाते तो बहुत शोर मचाते, वहाँ हुज़ूर का इन घटनाओ को बयान करना और किताब वालों का ख़ामोश और स्तब्ध तथा आश्चर्य चकित रह जाना, खुली दलील है कि आप सच्चे नबी हैं और अल्लाह तआला ने आप पर उलूम के दर्वाज़े खोल दिये हैं.

(2) वही इबादत के लायक़ है.

(3) तो उसके सिवा किसी को न पूजों.

(4) क़यामत के दिन का या तूफ़ान के दिन का, अगर तुम मेरी नसीहत क़ुबूल न करो और सीधी राह पर न आओ.

(5) जिसको तुम ख़ूब जानते हो और उसके नसब को पहचानते हो.

(6) यानी हज़रत नूह अलैहिस्सलाम को.

(7) उनपर ईमान लाए और.

(8) जिसे सत्य नज़र न आता था. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि उनके दिल अन्धे थे, मअरिफ़त यानी रब को पहचानने के नूर से उनको फ़ायदा न था.

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सूरए अअराफ़ – नवाँ रूकू

सूरए अअराफ़ – नवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और आद की तरफ़ (1)
उनकी बिरादरी से हूद को भेजा (2)
कहा ऐ मेरी क़ौम अल्लाह की बन्दगी करो उसके सिवा तुम्हारा कोई मअबूद नहीं तो क्या तुम्हें डर नहीं (3){65}
उसकी क़ौम के सरदार बोले बेशक हम तुम्हें बेवक़ूफ़ समझते हैं और बेशक हम तुम्हें झूटों में गुमान करते हैं (4){66}
कहा ऐ मेरी क़ौम मुझे बेवक़ूफ़ी से क्या सम्बन्ध मैं तो परवर्दिगारे आलम का रसूल हूँ {67} तुम्हें अपने रब की रिसालतें (संदेश) पहुंचाता हूँ और तुम्हारा मोअतमिद (विशवास पात्र) और भला चाहने वाला हूँ (5){68}
और क्या तुम्हें इसका अचंभा हुआ कि तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से एक नसीहत आई तुम में से एक मर्द की मअरिफ़त कि वह तुम्हें डराए और याद करो जब उसने तुम्हें नूह की क़ौम का जानशीन (उत्तराधिकारी) किया (6)
और तुम्हारे बदन का फैलाव बढ़ाया (7)
तो अल्लाह की नेमअतें याद करो (8)
कि कहीं तुम्हारा भला हो {69} बोले क्या तुम हमारे पास इसलिये आए हो (9)
कि हम एक अल्लाह को पूजें और जो (10)
हमारे बाप दादा पूजते थे उन्हें छोड़दें तो लाओ (11)
जिसका हमें वादा दे रहे हो अगर सच्चे हो {70} कहा (12)
ज़रूर तुमपर तुम्हारे रब का अज़ाब और ग़ज़ब (क्रोध) पड़ गया (13)
क्या मुझसे ख़ाली इन नामों में झगड़ रहे हो जो तुमने अपने और तुम्हारे बाप दादा ने रख लिये (14)
अल्लाह ने उनकी कोई सनद न उतारी, तो रास्ता देखो(15)
मैं भी तुम्हारे साथ देखता हूँ {71} तो हमने उसे और उसके साथ वालों को (16)
अपनी एक बड़ी रहमत फ़रमाकर निजात दी (17)
और जो हमारी आयतें झुटलाते (18)
थे उनकी जड़ काट दी (19) और वो ईमान वाले न थे {72}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – नवाँ रूकू

(1) यहाँ आद प्रथम मुराद है. यह हज़रत हूद अलैहिस्सलाम की क़ौम है, और आद द्वितीय हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम की क़ौम है, उसी को समूद कहते हैं. इन दोनों के बीच सौ बरस का फ़ासला है. (जुमल)

(2) हूद अलैहिस्सलाम ने.

(3) अल्लाह के अज़ाब का.

(4) यानी रिसालत के दावे में सच्चा नहीं जानते.

(5) काफ़िरों का हज़रत हूद अलैहिस्सलाम की शान में यह निरादर और अपमान का कलाम, कि तुम्हें बेवकूफ़ समझते हैं, झूटा ख़याल करते हैं, अत्यन्त दर्जें की बेअदबी और कमीनगी थी. और वो हक़दार इस बात के थे कि उन्हें सख़्त से सख़्त जवाब दिया जाता, मगर आपने अपने अख़लाक़ और अदब और विनम्रता की शान से जो जवाब दिया, उसमें मुक़ाबले की शान ही न पैदा होने दी और उनकी जिहालत से चश्मपोशी फ़रमाई. इससे दुनिया का सबक़ मिलता है कि गिरे हुए और ख़राब ख़सलत वाले लोगों से इस तरह सम्बोधन करना चाहिये. इसके साथ ही आपने अपनी रिसालत और ख़ैरख्वाही और अमानत का ज़िक्र फ़रमाया. इससे यह मसअला मालूम हुआ कि इल्म और कमाल वाले को ज़रूरत के वक़्त अपने मन्सब और कमाल का ज़ाहिर करना जायज़ है.

(6) यह उसका कितना बड़ा एहसान है.

(7) और बहुत ज़्यादा क़ुव्वत और लंबा क़द प्रदान किया.

(8) और ऐसे नेअमत देने वाले पर ईमान लाओ और फ़रमाँबरदारी और इबादतें बजा लाकर उसके एहसान का शुक्र अदा करों.

(9) यानी अपने इबादत ख़ाने से. हज़रत हूद अलैहिस्सलाम अपनी क़ौम की बस्ती से अलग एक एकान्त जगह में इबादत किया करते थे. जब जब आपके पास वही आती तो क़ौम के पास आकर सुना देते.

(10) बुत.

(11) वह अज़ाब.

(12) हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने.

(13) और तुम्हारी सरकशी से तुमपर अज़ाब आना वाजिब और लाज़िम होगा.

(14) और उन्हें पूजने लगे और मअबूद मानने लगे जबकि उनकी कुछ हक़ीकत ही नहीं है और उलूहियत के मानी से बिल्कुल ख़ाली और अनजान है.

(15) अल्लाह के अज़ाब का.

(16) जो उनके अनुयायी थे और उनपर ईमान लाए थे.

(17) उस अज़ाब से जो हूद क़ौम पर उतरा.

(18) और हज़रत हूद अलैहिस्सलाम को झुटलाते.

(19) और इस तरह हलाक कर दिया कि उनमें से एक भी न बचा. संक्षिप्त घटना यह है कि आद क़ौम अहक़ाफ़ में रहती थी जो अम्मान और हज़रमौत के बीच यमन इलाक़े में एक रेगिस्तान है. उन्होंने ज़मीन को फ़िस्क़ (व्यभिचार) से भर दिया था, और दुनिया की क़ौमों को, अपनी जफ़ा-कारियों से, अपने ज़ोर और शक्ति के घमण्ड में कुचल डाला था. ये लोग बुत परस्त थे. उनके एक बुत का नाम सदा, एक का समूद, एक का हबा था. अल्लाह तआला ने उनमें हज़रत हूद अलैहिस्सलाम को भेजा. आपने उन्हें तौहीद का हुक्म दिया, शिर्क और बुत परस्ती और ज़ुल्म और जफ़ाकारी से मना किया. इस पर वो लोग इन्कारी हुए, आपको झुटलाने लगे और कहने लगे हम से ज़्यादा बलवान कौन है. कुछ आदमी उनमें से हज़रत हूद अलैहिस्सलाम पर ईमान लाए, वो थोड़े थे और अपना ईमान छुपाए रहते थे. उन ईमान लाने वालों में से एक शख़्स का नाम मुर्सिद बिन सअद बिन अदीर था, वह अपना ईमान छुपाए रखते थे. क़ौम ने सरकशी की और अपने नबी हज़रत हूद अलैहिस्सलाम को झुटलाया और ज़मीन में फ़साद किया और सितमगारियों में ज़ियादती की और बड़ी मज़बूत इमारतें बनाई. मालूम होता था कि उनहें गुमान है कि वो दुनिया में हमेशा ही रहेंगे. जब उनकी नौबत यहाँ तक पहुंची तो अल्लाह तआला ने बारिश रोक दी. तीन साल बारिश न हुई. अब वो बहुत मुसीबत में पड़े. उस ज़माने में दस्तूर यह था कि जब कोई बला या मुसीबत उतरती थी, तो लोग बैतुल्लाहिल हराम में हाज़िर होकर अल्लाह तआला से उसके दूर होने की दुआ करते थे. इसीलिये उन लोगों ने एक प्रतिनिधि मण्डल बैतुल्लाह को रवाना किया. इस प्रतिनिधि मण्डल में क़ील बिन अन्ज़ा और नईम बिन हज़ाल और मुर्सिद बिन सअद थे. ये वही साहिब हैं जो हज़रत हूद अलैहिस्सलाम पर ईमान लाए थे और अपना ईमान छुपाए रखते थे. उस ज़माने में मक्कए मुकर्रमा में अमालीक़ की सुकूनत थी और उन लोगों का सरदार मुआविया बिन बक्र था. इस शख़्स का ननिहाल आद क़ौम में था. इसी नाते से यह प्रतिनिधि मण्डल मक्कए मुकर्रमा के हवाली में मुआविया बिन बक्र के यहाँ मुक़ीम हुआ. उसने उन लोगों का बहुत सम्मान किया, अच्छी आओ भगत की. ये लोग वहाँ शराब पीते और बांदियों का नाच देखते थे. इस तरह उन्होंने ऐशो आराम में एक महीना बसर किया. मुआविया को ख़याल आया कि ये लोग तो राहत में पड़ गए और क़ौम की मुसीबत को भूल गए, जो वहाँ बला में फंसी हुई है. मगर मुआविया बिन बक्र को यह ख़याल भी था कि अगर वह इन लोगों से कहे तो शायद वो ये ख़याल करें कि अब इसको मेज़बानी भारी पड़ने लगी है. इसलिये उसने गाने वाली बांदी को ऐसे शेर दिये जिनमें आद क़ौम की हाजत का बयान था. जब बांदी ने वह नज़्म गाई तो उन लोगों को याद आया कि हम उस क़ौम की मुसीबत की फ़रियाद करने के लिये मक्कए मुकर्रमा भेजे गए हैं. अब उन्हें ख़याल हुआ कि हरम शरीफ़ में दाख़िल होकर क़ौम के लिये पानी बरसने की दुआ करें. उस वक़्त मुर्सिद बिन सअद ने कहा कि अल्लाह की क़सम तुम्हारी दुआ से पानी न बरसेगा लेकिन अगर तुम अपने नबी की फ़रमाँबरदारी करो और अल्लाह तआला से तौबह करो तो बारिश होगी. उस वक़्त मुर्सिद ने अपने इस्लाम का इज़हार कर दिया. उन लोगों ने मुर्सिद को छोड़ दिया और ख़ुद मक्कए मुकर्रमा जाकर दुआ की. अल्लाह तआला ने तीन बादल भेजे, एक सफ़ेद, एक सुर्ख़, एक सियाह, और आसमान से पुकार हुई कि ऐ क़ील, अपने और अपनी क़ौम के लिये इनमें से एक बादल इख़्तियार कर. उसने काला बादल चुना, इस ख़याल से कि इससे बहुत सा पानी बरसेगा. चुनांचे वह अब्र आद क़ौम की तरफ़ चला और वो लोग उसको देखकर बहुत ख़ुश हुए. मगर उसमें से एक हवा चली. वह इस शिद्दत की थी कि ऊंटों और आदमियों को उड़ा उड़ा कर कहीं से कहीं ले जाती थी. यह देखकर वो लोग घरों में घुस गए और अपने दरवाज़ें बन्द कर लिये. मगर हवा की तेज़ी से बच न सके. उसने दरवाज़ें भी उखेड़ दिये और उन लोगों को हलाक भी कर दिया. और अल्लाह की क़ुदरत से काली चिड़ियाँ आई, जिन्होंने उनकी लाशों को उठाकर समन्दर में फेंक दिया. हज़रत हूद ईमान वालों को लेकर क़ौम से अलग हो गए थे. इसलिये वो सलामत रहे. क़ौम के हलाक होने के बाद ईमानदारों को साथ लेकर मक्कए मुकर्रमा तशरीफ़ लाए और आख़िर उम्र शरीफ़ तक वहीं अल्लाह तआला की इबादत करते रहे.

सूरए अअराफ़ – दसवाँ रूकू

सूरए अअराफ़ – दसवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और समूद की तरफ़ (1)
उनकी बिरादरी से सालेह को भेजा, कहा ऐ मेरी क़ौम अल्लाह को पूजो उसके सिवा तुम्हारा कोई मअबूद नहीं बेशक तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से (2)
रौशन दलील आई  (3)
यह अल्लाह का नाक़ा (ऊंटनी) है (4)
तुम्हारे लिये निशानी तो इसे छोड़ दो कि अल्लाह की ज़मीन में खाए और इसे बुराई से हाथ न लगाओ (5)
कि तुम्हें दर्दनाक अज़ाब आएगा {73} और याद करो (6)
जब तुमको आद का जानशीन किया और मुल्क में जगह दी कि नर्म ज़मीन मे महल बनाते हो (7)
और पहाड़ों में मकान तराशते हो(8)
तो अल्लाह की नेअमतें याद करो(9)
और ज़मीन में फ़साद मचाते न फिरो{74} उसकी क़ौम के घमण्डी कमज़ोर मुसलमानों से बोले क्या तुम जानते हो कि सालेह अपने रब के रसूल हैं बोले वह जो कुछ लेकर भेजे गए हम उसपर ईमान रखते हैं (10){75}
घमण्डी बोले जिसपर तुम ईमान लाए हमें उससे इन्कार है {76} फिर (11)
नाक़े की कूंचें काट दीं और अपने रब के हुक्म से सरकशी की और बोले ऐ सालेह हमपर ले आओ (12)
जिसका तुम वादा कर रहे हो अगर तुम रसूल हो {77} तो उन्हें ज़लज़ले ने आलिया तो सुबह को अपने घरो में औंधे पड़े रह गए {78} तो सालेह ने उनसे मुंह फेरा (13)
और कहा ऐ मेरी क़ौम बेशक मैं ने तुम्हें अपने रब की रिसालत (संदेश) पहुंचा दी और तुम्हारा भला चाहा मगर तुम भला चाहने चाहने वालों के ग़र्ज़ी (पसन्द करने वाले) ही नहीं {79} और लूत को भेजा(14)
जब उसने अपनी क़ौम से क्या यह वह बेहयाई करते हो जो तुम से पहले जगत में किसी ने न की {80} तो मर्दों  के पास शहवत (वासना) से जाते हो (15)
औरतें छोड़कर बल्कि तुम लोग हद से गुज़र गए (16){81}
और उसकी क़ौम का कुछ जवाब न था मगर यही कहना कि उन (17)
को अपनी बस्ती से निकाल दो ये लोग तो पाकीज़गी (पवित्रता) चाहते हैं (18){82}
तो हमने उसे (19)
और उसके घरवालों को छुटकारा दिया मगर उसकी औरत वह रह जाने वालों में हुई (20){83}

सूरए अअराफ़ – दसवाँ रूकू

(1)  जो हिजाज़ और शाम के बीच सरज़मीने हजर में रहते थे.

(2) मेरी नबुव्वत की सच्चाई पर.

(3) जिसका बयान यह है कि…….

(4) जो न किसी पीठ में रही न किसी पेट में. न किसी नर से पैदा हुई, न मादा से, न गर्भ में रही न उसकी उत्पत्ति दर्जा ब दर्जा पूरी हुई, बल्कि आद के तरीक़े के ख़िलाफ़ वह पहाड़ के एक पत्थर से यकायक पैदा हुई. उसकी यह पैदायश चमत्कार है. वह एक दिन पानी पीती है और तमाम समूद सम्प्रदाय एक दिन. यह भी एक चमत्कार है कि एक ऊंटनी एक क़बीले के बराबर पी जाए. इसके अलावा उसके पीने के रोज़ उसका दूध दोहा जाता था और वह इतना होता था कि सारे क़बीले को काफ़ी हो और पानी की जगह ले ले. यह भी चमत्कार. और तमाम वहशी जानवर और हैवानत उसकी बारी के रोज़ पानी पीने से रूके रहते थे. यह भी चमत्कार. इतने चमत्कार हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम के सच्चे नबी होने की खुली दलीलें हैं.

(5) न मारो, न हंकाओ, अगर ऐसा किया तो यही नतीजा होगा.

(6) ऐ समूद क़ौम.

(7) गर्मी के मौसम में आराम करने के लिये.

(8) सर्दी के मौसम के लिये.

(9) और उसका शुक्र बजा लाओ.

(10) उनके दीन को क़ूबूल करते हैं, उनकी रिसालत को मानते हैं.

(11) समूद क़ौम ने.

(12) वह अज़ाब.

(13) जब कि उन्होंने सरकशी की. नक़ल है कि इन लोगों ने बुध को ऊंटनी की कूँचें काटी थीं तो हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया कि तुम इसके बाद तीन दिन ज़िन्दा रहोगे. पहले रोज़ तुम्हारे सब के चेहरे पीले हो जाएंगे, दूसरे रोज़ लाल और तीसरे रोज़ काले. चौथे दिन अज़ाब आएगा. चुनांचे ऐसा ही हुआ, और इतवार को दोपहर के क़रीब आसमान से एक भयानक आवाज़ आई जिससे उन लोगों के दिल फट गए और सब हलाक हो गए.

(14) जो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के भतीजे हैं, आप सदूम वालों की तरफ़ भेजे गए और जब आपके चाचा हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने शाम की तरफ़ हिजरत की तो हज़रत इब्राहीम ने सरज़मीने फ़लस्तीन में नुज़ूल फ़रमाया और हज़रत लूत अलैहिस्सलाम उरदुन में उतरे. अल्लाह तआला ने आपको समूद निवासियों की तरफ़ भेजा. आप उन लोगों को सच्चे दीन की तरफ़ बुलाते थे और बुरे काम से रोकते थे, जैसा कि आयत में ज़िक्र आता है.

(15) यानी उनके साथ बुरा काम करते हो.

(16) कि हलाल को छोड़कर हराम में पड़ गए और ऐसे ख़बीस और बुरे काम को अपनाया. इन्सान को जिन्सी जोश या काम वासना नस्ल मेहफूज़ रखने और दुनिया की आबादी के लिये दी गई है और औरतों को इसका साधन बनाया गया है कि उनसे जाने पहचाने तरीक़े से शरीअत की सीमाओं में रहकर औलाद हासिल की जाए. जब आदमियों ने औरतों को छोड़कर उनका काम मर्दों से लेना चाहा तो वह हद से गुज़र गए और उन्होंने इस क़ुव्वत के सही उद्देश्य को ख़त्म कर दिया. मर्द को न गर्भ रहता है न वह बच्चा जनता है, तो उसके साथ हमबिस्तरी करना शैतानी काम के सिवा और क्या है. उलमा का बयान है कि लूत क़ौम की बस्तियाँ बहुत ही हरी भरी और तरो ताज़ा थीं और वहाँ ग़ल्ले और फल कसरत से पैदा होते थे. दुनिया का दूसरा क्षेत्र इसके बराबर न था. इसलिये जगह जगह से लोग यहाँ आते थे और उन्हें परेशान करते थे. ऐसे वक़्त में इब्लीस लईन एक बूढे की सूरत में ज़ाहिर हुआ और उनसे कहने लगा कि अगर तुम मेहमानों की इस बहुतात से छुटकारा चाहते हो तो जब वो लोग आएं तो उनके साथ बुरा काम करो. इस तरह यह बुरा काम उन्होंने शैतानों से सीखा और उनके यहाँ इसका चलन हुआ.

(17) यानी हज़रत लूत और उनके मानने वाले.

(18) और पाकीज़गी ही अच्छी होती है. वही सराहनीय है. लेकिन इस क़ौम का स्तर इतना गिर गया था कि उन्होंने पाकीज़गी जैसी सराहनीय विशेषता को ऐब क़रार दिया.

(19) यानी हज़रत लूत अलैहिस्सलाम को.

(20) वह काफ़िरा थी और उसी क़ौम से महब्बत रखती थी.

(21) अजीब तरह का, जिसमें ऐसे पत्थर बरसे कि गन्धक और आग से बने थे. एक क़ौल यह है कि बस्ती में रहने वाले, जो वहाँ ठहरे हुए थे, वो तो ज़मीन में धंसा दिये गए और जो सफ़र में थे वो इस बारिश से हलाक कर दिये गए.

(22) मुजाहिद ने कहा कि हज़रत जिब्रील अलैहिस्सलाम उतरे और उन्होंने अपना बाज़ू लूत क़ौम की बस्तियों के नीचे डाल कर उस टुकड़े को उखाड़ लिया और आसमान के क़रीब पहुंचकर उसको औंधा करके गिरा दिया. इसके बाद पत्थरों की बारिश की गई.

सूरए अअराफ़ – ग्यारहवाँ रूकू

सूरए अअराफ़ – ग्यारहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और मदयन की तरफ़ उनकी बिरादरी से शुऐब को भेजा (1)
कहा ऐ मेरी क़ौम अल्लाह की इबादत करो उसके सिवा तुम्हारा कोई मअबूद नहीं, बेशक तुम्हारे पास तुम्हारे रब की तरफ़ से रौशन दलील आई (2)
तो नाप और तौल पूरी करो और लोगों की चीज़ें घटाकर न दो (3)
और ज़मीन में इन्तिज़ाम के बाद फ़साद न फ़ैलाओ यह तुम्हारा भला है अगर ईमान लाओ {85} और हर रास्ते पर यूं न बैठों की राहगीरों को डराओ और अल्लाह की राह से उन्हें रोको (4)
जो उसपर ईमान लाए और उसमें कजी (टेढ़ापन) चाहो, और याद करो जब तुम थोड़े थे उसने तुम्हें बढ़ा दिया (5)
और देखो (6)
फ़सादियों का कैसा अंजाम हुआ {86} और अगर तुम में एक गिरोह उसपर ईमान लाया जो मैं लेकर भेजा गया और एक गिरोह ने न माना  (7)
तो ठहरे रहो यहाँ तक कि अल्लाह हम में फ़ैसला करे, (8)
और अल्लाह का फ़ैसला सब से बेहतर (9){87}
नवां पारा – क़ालल- मलउ
(सूरए अअराफ़ जारी)
ग्यारहवाँ रूकू (जारी)
उसकी क़ौम के घमण्डी सरदार बोले ऐ शुऐब क़सम है कि हम तुम्हें और तुम्हारे साथ वाले मुसलमानों को अपनी बस्ती से निकाल देंगे या तुम हमारे दीन में आजाओ, कहा (10)
क्या अगरचे हम बेज़ार हों (11){88}
ज़रूर हम अल्लाह पर झूठ बांधेंगे अगर तुम्हारे दीन में आजाएं बाद इसके कि अल्लाह ने हमें इससे बचाया है(12)
और हम मुसलमानों में किसी का काम नहीं कि तुम्हारे दीन में आए मगर यह कि अल्लाह चाहे (13)
जो हमारा रब है, हमारे रब का इल्म हर चीज़ को घेरे है, अल्लाह ही पर भरोसा किया (14)
ऐ हमारे रब हम में और हमारी क़ौम में हक़ (सच्चा) फ़ैसला कर (15)
और तेरा फ़ैसला सबसे बेहतर है{89} और उसकी क़ौम के काफ़िर सरदार बोले कि अगर तुम शुऐब के ताबे(अधीन) हुए तो ज़रूर तुम नुक़सान में रहोगे {90} तो उन्हें ज़लज़ले ने आ लिया तो सुबह अपने घरो में औंधे पड़े रह गए(16){91}
शुऐब को झुटलाने वाले मानो उन घरों में कभी रहे ही न थे शुऐब को झुटलाने वाले ही तबाही में पड़े {92} तो शुऐब ने उनसे मुंह फेरा (17)
और कहा ऐ मेरी क़ौम मैं तुम्हें अपने रब की रिसालत (संदेश) पहुंचा चुका और तुम्हारे भले को नसीहत की (18)
तो कैसे ग़म करू काफ़िरों का {93}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – ग्यारहवाँ रूकू

(1)  हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम ने.

(2) जिससे मेरी नबुव्वत व रिसालत यक़ीनी तौर पर साबित होती है. इस दलील से चमत्कार मुराद है.

(3) उनके हक़ ईमानदारी के साथ पूरे पूरे अदा करो.

(4) और दीन का अनुकरण करने में लोगों के रास्ते में अड़चन न बनो.

(5) तुम्हारी संख़्या ज़्यादा कर दी तो उसकी नेअमत का शुक्र करो और ईमान लाओ.

(6) सबक़ सीखने के उद्देशय से पिछली उम्मतों के हालात और गुज़रे हुए ज़मानों में सरकशी करने वालों के अंजाम देखो और सोचो.

(7) यानी अगर तुम मेरी रिसालत में विरोध करके दो सम्प्रदाय हो गए, एक सम्प्रदाए ने माना और एक इन्कारी हुआ.

(8) कि तस्दीक़ करने वाले ईमानदारों को इज़्ज़त दे और उनकी मदद फ़रमाए और झुटलाने वालों और इन्कार करने वालों को हलाक करे और उन्हें अज़ाब दे.

(9) क्योंकि वह सच्चा हाकिम है.

(10) शुऐब अलैहिस्सलाम ने.

(11) मतलब यह है कि हम तुम्हारा दीन न क़ुबूल करेंगे और अगर तुमने हमपर ज़बरदस्ती की, जब भी न मानेंगे क्योंकि……..

(12) और तुम्हारे झूटे दीन के दोषों और ग़लत होने का इल्म दिया है.

(13) और उसको हलाक करना मंज़ूर हो और ऐसा ही लिखा हो.

(14) अपने सारे कामों में वही हमें ईमान पर क़ायम रखेगा, वही अक़ीदे और विश्वास को ज़्यादा और मज़बूत करेगा.

(15) ज़ुजाज ने कहा कि इसके ये मानी हो सकते हैं कि ऐ रब हमारे काम को ज़ाहिर फ़रमादे. मुराद इससे यह है कि इन पर ऐसा अज़ाब उतार जिससे इनका झूटा और ग़लती पर होना और हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम और उनके अनुयाइयों का सच्चाई पर होना ज़ाहिर हो.

(16) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि अल्लाह तआला ने इस क़ौम पर जहन्नम का दरवाज़ा खोला और उनपर दोज़ख़ की शदीद गर्मी भेजी जिससे साँस बन्द हो गए. अब न उन्हें साया काम देता था, न पानी. इस हालत में वो तहख़ाने में दाख़िल हुए ताकि वहाँ कुछ अम्न मिले लेकिन वहाँ बाहर से ज़्यादा गर्मी थी. वहाँ से निकल कर जंगल की तरफ़ भागे. अल्लाह तआला ने एक बादल भेजा जिसमें बहुत ठण्डी और अच्छी लगने वाली हवा थी. उसके साए में आए और एक ने दूसरे को पुकार कर जमा कर लिया. मर्द औरतें बच्चे सब इकट्ठा हो गए, तो वह अल्लाह के हुक्म से आग बनकर भड़क उठा और वो उसमें इस तरह जल गए जैसे भाड़ में कोई चीज़ भुन जाती है. क़तादा का क़ौल है कि अल्लाह तआला ने हज़रत शुऐब अलैहिस्सलाम को ऐका वालों की तरफ़ भी भेजा था और मदयन वालों की तरफ़ भी. ऐका वाले तो बादल से हलाक किए गए और मदयन वाले ज़लज़ले में गिरफ़तार हुए और एक भयानक आवाज़ से हलाक हो गए.

(17) जब उनपर अज़ाब आया.

(18) मगर तुम किसी तरह ईमान न लाए.

सूरए अअराफ़ – बारहवाँ रूकू

सूरए अअराफ़ – बारहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और न भेजा हमने किसी बस्ती में कोई नबी(1)
मगर यह कि उसके लोगों ने सख़्ती और तक़लीफ़ मे पकड़ा(2)
कि वो किसी तरह ज़ारी करें (3)
(रोएं){94} फिर हमने बुराई की जगह भलाई बदल दी(4)
यहाँ तक कि वो बहुत हो गए (5)
और बोले बेशक हमारे बाप दादा को रंज और राहत पहुंचे थे(6)
तो हमने उन्हें अचानक उनकी ग़फ़लत मे पकड़ लिया (7){95}
और अगर बस्तियों वाले ईमान लाते और डरते (8)
तो ज़रूर हम उनपर आसमान और ज़मीन से बरकतें खोल देते(9)
मगर उन्होंने तो झुटलाया (10)
तो हमने उन्हें उनके किये पर गिरफ़्तार किया(11){96}
क्या बस्तियों वाले (12)
नहीं डरते कि उनपर हमारा अज़ाब रात को आए जब वो सोते हों {97} या बस्तियों वाले नहीं डरते कि उनपर हमारा अज़ाब दिन चढ़े आए जब वो खेल रहे हों (13){98}
क्या अल्लाह की छुपवाँ तदबीर (युक्ति) से बेख़बर हैं (14)
तो अल्लाह की छुपी तदबीर से निडर नहीं होते मगर तबाही वाले (15){99}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – बारहवाँ रूकू

(1) जिसको उसकी क़ौम ने न झुटलाया हो.

(2) दरिद्रता और तंगदस्ती और बीमारी में गिरफ़्तार किया.

(3) घमण्ड छोड़ें, तौबा करें, अल्लाह के आदेशों का पालन करें.

(4) कि सख़्ती और तकलीफ़ के बाद राहत और आसायश पहुंचना और बदनी व माली नेअमतें मिलना इताअत व शुक्रगुज़ारी चाहता है.

(5) उनकी तादाद भी ज़्यादा हुई और माल भी बढ़े.

(6) यानी ज़माने का दस्तूर ही यह है कि कभी तकलीफ़ होती है, कभी राहत. हमारे बाप दादा पर भी ऐसे हालात गुज़र चुके हैं. इससे उनका मक़सद यह था कि पिछला ज़माना जो सख़्तियों में गुज़रा है, वह अल्लाह तआला की तरफ़ से कुछ फिटकार और सज़ा न थी. तो अपना दीन नहीं छोड़ना चाहिये. न उन लोगों ने सख़्ती और तकलीफ़ से कोई नसीहत हासिल की, न राहत और आराम से उनमें कोई शुक्र और फ़रमाँबरदारी की भावना पैदा हुई, वो ग़फ़लत में डूबे रहे.

(7) जब कि उन्हें अज़ाब का ख़याल भी न था. इन घटनाओं से सबक़ हासिल करना चाहिये. और बन्दों को गुनाह व सरकशी छोड़ कर, अपने मालिक की ख़ुशी और रज़ा चाहने वाला होना चाहिये.

(8) और ख़ुदा व रसूल की इताअत इख़्तियार करते और जिस चीज़ को अल्लाह और रसूल ने मना फ़रमाया, उससे रूके रहते.

(9) हर तरफ़ से उन्हें अच्छाई पहुंचती, वक़्त पर नफ़ा देने वाली बारिशे होतीं, ज़मीन से खेती फल कसरत से पैदा होते, रिज़्क़ की फ़राखी होती, अम्न व सलामती रहती, आफ़तों से मेहफ़ूज रहते.

(10) अल्लाह के रसूलों को.

(11) और तरह तरह के अज़ाब में जकड़ा.

(12) काफ़िर, चाहे वो मक्कए मुर्कमा के रहने वाले हों या आस पास के, या कहीं और के.

(13) और अज़ाब आने से ग़ाफ़िल हों.

(14) और उसके ढील देने और दुनिया की नेअमत देने पर घमण्डी होकर, उसके अज़ाब से बे फ़िक़्र हो गए.

(15) और उसके सच्चे बन्दे उसका डर रखते है. रबीअ बिन ख़सीम की बेटी ने उनसे कहा, क्या कारण है, मैं देखती हूँ सब लोग सोते हैं और आप नहीं सोते. फ़रमाया, ऐ आँखों की रौशनी, तेरा बाप रात को सोने से डरता है, यानी यह कि ग़ाफ़िल होकर सोजाना कहीं अज़ाब का कारण न हो.

सूरए अअराफ़ – तेरहवाँ रूकू

सूरए अअराफ़ – तेरहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

और क्या वो जो ज़मीन के मालिको के बाद उसके वारिस हुए उन्हें हिदायत न मिली कि हम चाहें तो उन्हें उनके गुनाहों पर आफ़त पहुंचाए(1)
और हम उनके दिलों पर मोहर करते हैं कि वो कुछ नहीं सुनते(2){100}
ये बस्तियाँ हैं (3)
जिनके अहवाल हम तुम्हें सुनाते हैं (4)
और बेशक उनके पास उनके रसूल रौशन दलीलें (5)
लेकर आए तो वो (6)
इस क़ाबिल न हुए कि वो उसपर ईमान लाते जिसे पहले झुटला चुके थे(7)
अल्लाह यूं ही छाप लगा देता है काफ़िरों के दिलों पर (8){101}
और उनमें अक्सर को हमने क़ौल का सच्चा न पाया (9)
और ज़रूर उनमें अक्सर को बेहुक्म ही पाया {102} फिर उन (10)
के बाद हमने मूसा को अपनी निशानियों (11)
के साथ फ़िरऔन और उसके दरबारियों की तरफ़ भेजा तो उन्होंने उन निशानियों पर ज़ियादती की(12)
तो देखो कैसा अंजाम हुआ फ़साद फैलाने वालों का {103} और मूसा ने कहा ऐ फ़िरऔन मैं सारे जगत के रब का रसूल हूँ {104} मुझे सज़ावार (लाज़िम) है कि अल्लाह पर न कहूँ मगर सच्ची बात (13)
मैं तुम सबके पास तुम्हारे रब की तरफ़ से निशानी लेकर आया हूँ (14)
तो बनी इस्राईल को मेरे साथ छोड़ दे (15){105}
बोला अगर तुम कोई निशानी लेकर आए हो तो लाओ अगर सच्चे हो {106} तो मूसा ने अपना असा (लाठी) डाल दिया वह फ़ौरन एक अज़दहा (अजगर) हो गया (16){107}
और अपना हाथ गिरेबान में डाल कर निकाला तो वह देखने वालों के सामने जगमगाने लगा (17){108}

सूरए अअराफ़ – तेरहवाँ रूकू

(1) जैसा कि हमने उनके पूर्वजों को उनकी नाफ़रमानी के कारण हलाक किया.

(2) और कोई उपदेश व नसीहत नहीं मानते.

(3) हज़रत नूह की क़ौम और आद व समूद और हज़रत लूत की क़ौम और हज़रत शुऐब की क़ौम.

(4) ताकि मालूम हो कि हम अपने रसूलों की और उनपर ईमान लाने वालों की अपने दुश्मनों यानी काफ़िरों के मुक़ाबले में मदद किया करते हैं.

(5) यानी खुले चमत्कार.

(6) मरते दम तक.

(7) अपने कुफ़्र और झुटलाने पर जमे ही रहे.

(8) जिनकी निस्बत उसके इल्म में है कि कुफ़्र पर क़ायम रहेंगे और कभी ईमान न लाएंगे.

(9) उन्होंने अल्लाह के एहद पूरे न किये. उनपर जब भी कोई मुसीबत आती तो एहद करते कि यारब तू अगर हमें छुड़ा दे तो हम ज़रूर ईमान ले आएंगे. फिर जब छूट जाते तो एहद से फिर जाते. (मदारिक)

(10) जिनका बयान हुआ वो नबी.

(11) यानी खुले चमत्कार, जैसे कि चमकती हथैली और ज़िन्दा होती लाठी वग़ैरह.

(12) उन्हें झुटलाया और कुफ़्र किया.

(13) क्योंकि रसूल की यही शान है, वो कभी ग़लत बात नहीं कहते और अल्लाह का संदेश पहुंचाने में उनका झुट संभव नहीं.

(14) जिससे मेरा नबी होना साबित है और वह निशानी चमत्कार है.

(15) और अपनी क़ैद से आज़ाद कर दे ताकि वो मेरे साथ पाक सरज़मीन में चले जाएं जो उनका वतन है.

(16) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने असा डाला तो वह एक बड़ा अजगर बन गया, पीले रंग का. मुंह खोले हुए ज़मीन से एक मील ऊंचा अपनी दुम पर खड़ा हो गया और एक जबड़ा उसने ज़मीन पर रखा और एक शाही महल की दीवार पर. फिर उसने फ़िरऔन की तरफ़ रूख़ किया तो फ़िरऔन अपने तख़्त से कूद कर भागा और डर से उसकी हवा निकल गई और लोगों की तरफ़ रूख़ किया तो ऐसी भाग पड़ी कि हज़ारों आदमी आपस में कुचल कर मर गए. फ़िरऔन घर में जाकर चीख़ने लगा, ऐ मूसा, तुम्हें उसकी क़सम जिसने तुम्हें रसूल बनाया, इसको पकड़ लो, मैं तुमपर ईमान लाता हूँ और तुम्हारे साथ बनी इस्त्राईल को भेजे देता हूँ. हज़रत मूसा ने असा उठा लिया तो पहले की तरह लाठी ही था.

(17) और उसकी रौशनी और चमक सूरज के प्रकाश पर गालिब आ गई.

सूरए अअराफ़ – चौदहवाँ रूकू

सूरए अअराफ़ – चौदहवाँ रूकू
अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला

फ़िरऔन की क़ौम के सरदार बोले यह तो एक इल्म वाला जादूगर है(1){109}
तुम्हें तुम्हारे मुल्क(2)
से निकालना चाहता है, तो तुम्हारी क्या सलाह है{110} बोले इन्हें और इनके भाई (3)
को ठहरा और शहरों में लोग जमा करने वाले भेज दे {111} कि हर इल्म वाले जादूगर को तेरे पास ले आएं (4)
{112}
और जादूगर फ़िरऔन के पास आए बोले कुछ हमें इनाम मिलेगा अगर हम ग़ालिब (विजयी) आएं {113} बोला हाँ और उस वक़्त तुम मुक़र्रब (नज़दीकी) हो जाओगे {114} बोले ऐ मूसा या तो (5)
आप डालें या हम डालने वाले हों(6){115}
कहा तुम्ही डालो(7),
जब उन्होंने डाला (8)
लोगों की आँखों पर जादू कर दिया और उन्हें डराया और बड़ा जादू लाए {116} और हमने मूसा को वही फ़रमाई कि अपना असा (लाठी) डाल तो नागाह (अचानक) उनकी बनावटों को निगलने लगा (9){117}
तो हक़ (सत्य) साबित हुआ और उनका काम बातिल (निरस्त) हुआ {118} तो यहाँ वो मग़लूब (पराजित) पड़े और ज़लील होकर पलटे {119} और जादूगर सिजदे में गिरा दिये गए (10){120}
बोले हम ईमान लाए जगत के रब पर {121} जो रब है मूसा और हारून का {122} फ़िरऔन बोला तुम उसपर ईमान लाए पहले इसके कि मैं तुम्हें इजाज़त दूँ यह तो बड़ा जअल (धोखा) है जो तुम सबने (11)
शहर में फैलाया है कि शहर वालों को इससे निकाल दो (12)
तो अब जान जाओगे (13){123}
क़सम है कि मैं तुम्हारे एक तरफ़ के हाथ और दूसरी तरफ़ के पाँव काटूंगा फिर तुम सब को सूली दूंगा(14){124}
बोले हम अपने रब की तरफ़ फिरने वाले हैं (15) {125}
और तुझे हमारा क्या बुरा लगा यही ना कि हम अपने रब की निशानियों पर ईमान लाए जब वो हमारे पास आई, ऐ हमारे रब हमपर सब्र उंडेल दे (16)
और हमें मुसलमान उठा (17){126}

तफ़सीर सूरए अअराफ़ – चौदहवाँ रूकू

(1) जिसने जादू से नज़र बन्दी की और लोगों को लाठी अजगर नज़र आने लगी और गेहूवाँ रंग का हाथ सूरज से ज़्यादा चमकदार मालूम होने लगा.

(2) मिस्त्र.

(3) हज़रत हारून.

(4) जो जादू में माहिर हो और सबसे योग्य. चुनांचे लोग रवाना हुए और आसपास के क्षेत्रों में तलाश करके जादूगरों को ले आए.

(5) पहले अपनी लाठी.

(6) जादूगरों ने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का यह अदब किया कि आपको पहल करने को कहा और आपकी इजाज़त के बिना अपने अमल या मंत्र तंत्र में मशग़ूल न हुए. इस अदब का बदला उन्हें यह मिला कि अल्लाह तआला ने उन्हें ईमान और हिदायत से पुरस्कृत किया.

(7) यह फ़रमाना हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का इसलिये था कि आप उनकी कुछ परवाह न करते थे और पक्का भरोसा रखते थे कि उनके चमत्कारों के सामने जादू नाकाम और परास्त होगा.

(8) अपना सामान, जिसमें बड़े बड़े रस्से और शहतीर थे. तो वो अजगर नज़र आने लगे और मैदान उनसे भरा मालूम होने लगा.

(9) जब हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने अपनी लाठी डाली तो वह एक बड़ा अजगर बन गई. इब्ने ज़ैद का कहना है कि यह सम्मेलन इस्कंदरिया में हुआ था और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के अजगर की दुम समन्दर के पार पहुंच गई थी. वह जादूगरों की सहरकारियों को एक एक करके निगल गया और तमाम रस्से लठ्ठे, जो उन्होंने जमा किये थे, जो तीन सौ ऊंटों का बोझा था, सब का अन्त कर दिया. जब मूसा अलैहिस्सलाम ने लाठी को अपने दस्ते मुबारक में लिया तो पहले की तरह लाठी हो गई और उसकी मोटाई और वज़न अपनी हालत पर रहा. यह देखकर जादूगरों ने पहचान लिया कि मूसा की लाठी जादू नहीं और इन्सान की क़ुदरत ऐसा चमत्कार नहीं दिखा सकती. ज़रूर यह आसमानी बात है. यह बात समझकर बोले, “आमन्ना बि रब्बिल आलमीन” यानी हम ईमान लाए जगत के रब पर, कहते हुए सज्दे में गिर गए.

(10) यानी यह चमत्कार देखकर उन पर ऐसा असर हुआ कि वो बेइख़्तियार सज्दे में गिर गए. मालूम होता था कि किसी ने माथे पकड़कर ज़मीन पर लगा दिये.

(11) यानी तुमने और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम ने, सब ने मिलकर.

(12) और ख़ुद इस पर क़ब्ज़ा कर लो.

(13) कि मैं तुम्हारे साथ किस तरह पेश आता हूँ.

(14) नील के किनारे. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि दुनिया में पहला सूली देने वाला, पहला हाथ पाँव काटने वाला, फ़िरऔन है. फ़िरऔन की इस बात पर जादूगरों ने यह जवाब दिया जो अगली आयत में आया है.

(15) तो हमें मौत का क्या ग़म, क्योंकि मर कर हमें अपने रब की मुलाक़ात और उसकी रहमत नसीब होगी. और जब सबको उसी की तरफ़ पलटना है तो वह ख़ुद हमारे तेरे बीच फ़ैसला फ़रमा देगा.

(16) यानी हमको भरपूर सब्र अता फ़रमा और इतना अधिक दे जैसे किसी पर पानी उंडेल दिया जाता है.

(17) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया, ये लोग दिन के पहले पहर में जादूगर थे और उसी रोज़ आख़िर पहर में शहीद.