58-Surah Al-Mujadalah

58 सूरए मुजादलह -तीसरा रूकू

58|14|۞ أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ تَوَلَّوْا قَوْمًا غَضِبَ اللَّهُ عَلَيْهِم مَّا هُم مِّنكُمْ وَلَا مِنْهُمْ وَيَحْلِفُونَ عَلَى الْكَذِبِ وَهُمْ يَعْلَمُونَ
58|15|أَعَدَّ اللَّهُ لَهُمْ عَذَابًا شَدِيدًا ۖ إِنَّهُمْ سَاءَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
58|16|اتَّخَذُوا أَيْمَانَهُمْ جُنَّةً فَصَدُّوا عَن سَبِيلِ اللَّهِ فَلَهُمْ عَذَابٌ مُّهِينٌ
58|17|لَّن تُغْنِيَ عَنْهُمْ أَمْوَالُهُمْ وَلَا أَوْلَادُهُم مِّنَ اللَّهِ شَيْئًا ۚ أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ
58|18|يَوْمَ يَبْعَثُهُمُ اللَّهُ جَمِيعًا فَيَحْلِفُونَ لَهُ كَمَا يَحْلِفُونَ لَكُمْ ۖ وَيَحْسَبُونَ أَنَّهُمْ عَلَىٰ شَيْءٍ ۚ أَلَا إِنَّهُمْ هُمُ الْكَاذِبُونَ
58|19|اسْتَحْوَذَ عَلَيْهِمُ الشَّيْطَانُ فَأَنسَاهُمْ ذِكْرَ اللَّهِ ۚ أُولَٰئِكَ حِزْبُ الشَّيْطَانِ ۚ أَلَا إِنَّ حِزْبَ الشَّيْطَانِ هُمُ الْخَاسِرُونَ
58|20|إِنَّ الَّذِينَ يُحَادُّونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ أُولَٰئِكَ فِي الْأَذَلِّينَ
58|21|كَتَبَ اللَّهُ لَأَغْلِبَنَّ أَنَا وَرُسُلِي ۚ إِنَّ اللَّهَ قَوِيٌّ عَزِيزٌ
58|22|لَّا تَجِدُ قَوْمًا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ يُوَادُّونَ مَنْ حَادَّ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَلَوْ كَانُوا آبَاءَهُمْ أَوْ أَبْنَاءَهُمْ أَوْ إِخْوَانَهُمْ أَوْ عَشِيرَتَهُمْ ۚ أُولَٰئِكَ كَتَبَ فِي قُلُوبِهِمُ الْإِيمَانَ وَأَيَّدَهُم بِرُوحٍ مِّنْهُ ۖ وَيُدْخِلُهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا ۚ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا عَنْهُ ۚ أُولَٰئِكَ حِزْبُ اللَّهِ ۚ أَلَا إِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْمُفْلِحُونَ

क्या तुमने उन्हें न देखा जो ऐसों के दोस्त हुए जिन पर अल्लाह का ग़ज़ब है(1)
(1) जिन लोगों पर अल्लाह तआला का ग़ज़ब है उनसे मुराद यहूदी है और उनसे दोस्ती करने वाले मुनाफ़िक़. यह आयत मुनाफ़िक़ों के बारे में उतरी जिन्होंने यहूदियों से दोस्ती की और उनकी ख़ैर ख़्वाही में लगे रहते और मुसलमानों के राज़ उनसे कहते.

वो न तुम से न उनसे(2)
(2) यानी न मुसलमान न यहूदी बल्कि मुनाफ़िक़ हैं बीच में लटके हुए.

वो जानकर झूटी क़सम खाते हैं(3){14}
(3) यह आयत अब्दुल्लाह बिन नबतल मुनाफ़िक़ के बारे में उतरी जो रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की मजलिस में हाज़िर रहता यहाँ की बात यहूदियों के पास पहुंचाता. एक दिन हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम दौलत सराय अक़दस में तशरीफ़ फ़रमा थे. हुज़ूर ने फ़रमाया इस वक़्त एक आदमी आएगा जिसका दिल निहायत सख़्त और शैतान की आँखों से देखता है. थोड़ी ही देर बाद अब्दुल्लाह बिन नबतल आया उसकी आख़ें नीली थीं. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उससे फ़रमाया तू और तेरे साथी हमें क्यों गालियाँ देते हैं. वह क़सम खा गया कि ऐसा नहीं करता. और अपने यारों को ले आया उन्होंने भी क़सम खाई कि हमने आपको गाली नहीं दी. इस पर यह आयत उतरी.

अल्लाह ने उनके लिये सख़्त अज़ाब तैयार कर रखा है, बेशक वो बहुत ही बुरे काम करते हैं{15} उन्होंने अपनी क़समों को(4)
(4) जो झूटी है.

ढाल बना लिया है (5)
(5) कि अपना जान माल मेहफ़ूज़ रहे.

तो अल्लाह की राह से रोका(6)
(6) यानी मुनाफ़िक़ों ने अपनी इस हीला साज़ी से लोगों को जिहाद से रोका और कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा कि मानी यह हैं कि लोगों को इस्लाम में दाख़िल होने से रोका.

तो उनके लिये ख़्वारी का अज़ाब है(7){16}
(7) आख़िरत में.

उनके माल और उनकी औलाद अल्लाह के सामने उन्हें कुछ काम न देंगे(8)
(8) और क़यामत के दिन उन्हें अल्लाह के अज़ाब से न बचा सकेंगे.

वो दोज़ख़ी हैं, उन्हें उसमें हमेशा रहना {17} जिस दिन अल्लाह उन सब को उठाएगा तो उसके हुज़ूर भी ऐसे ही क़समें खाएंगे जैसे तुम्हारे सामने खा रहे हैं(9)
(9) कि दुनिया में मूमिन मुख़लिस थे.

और वो यह समझते हैं कि उन्होंने कुछ किया(10)
(10) यानी वो अपनी उन झूटी क़स्मों को कारआमद समझते हैं.

सुनते हो बेशक वही झूठे हैं(11) {18}
(11) अपनी क़स्मों में और ऐसे झूटे कि दुनिया में भी झूट बोलते रहे और आख़िरत में भी रसूल के सामने भी और ख़ुदा के सामने भी.

उन पर शैतान ग़ालिब आ गया तो उन्हें अल्लाह की याद भुलादी, वो शैतान के गिरोह हें, सुनता है बेशक शैतान ही का गिरोह हार में है(12) {19}
(12) कि जन्नत की हमेशा की नेअमतों से मेहरूम और जहन्नम के अबदी अज़ाब में गिरफ़्तार.

बेशक वो जो अल्लाह और उसके रसूल की मुख़ालिफ़त करते हैं, वो सबसे ज़्यादा ज़लीलों में हैं{20} अल्लाह लिख चुका (13)
(13) लौहे मेहफ़ूज़ में.

कि ज़रूर मैं ग़ालिब आऊंगा और मेरे रसूल (14)
(14) हुज्जत के साथ या तलवार के साथ.

बेशक अल्लाह क़ुव्वत वाला इज़्ज़त वाला है {21} तुम न पाओगे उन लोगों को जो यक़ीन रखते हैं अल्लाह और पिछले दिन पर कि दोस्ती करें उनसे जिन्हों ने अल्लाह और उसके रसूल से मुख़ालिफ़त की(15)
(15) यानी मूमिनों से यह हो ही नहीं सकता और उनकी यह शान ही नहीं और ईमान इसको गवारा ही नहीं करता कि ख़ुदा और रसूल के दुश्मन से दोस्ती करे. इस आयत से मालूम हुआ कि बददीनों और बदमज़हबों और ख़ुदा और रसूल की शान में गुस्ताख़ी और बेअदबी करने वालों से ताल्लुक़ात और मेलजोल जायज़ नहीं.

अगरचे वो उनके बाप या बेटे या भाई या कुंबे वाले हों(16)
(16) चुनांन्वे हज़रत अबूउबैदह बिन जर्राह ने उहुद की जंग में अपने बाप जर्राह को क़त्ल किया और हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो ने बद्र के दिन अपने बेटे अब्दुर्रहमान को लड़ने के लिये पुकारा लेकिन रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उन्हें इस जंग की इजाज़त न दी और मुसअब बिन उमैर ने अपने भाई अब्दुल्लाह बिन उमैर को क़त्ल किया और हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने अपने मामूँ आस बिन हिशाम बिन मुग़ीरह को बद्र के दिन क़त्ल किया और हज़रत अली बिन अबी तालिब व हमज़ा व अबू उबैदह ने रबीआ के बेटों उतबह और शैबह को और वलीद बिन उतबह को बद्र में क़त्ल किया जो उनके रिश्तेदार थे. ख़ुदा और रसूल पर ईमान लाने वालों को रिश्तेदारी का क्या लिहाज़.

ये हैं जिनके दिलों में अल्लाह ने ईमान नक़्श फ़रमा दिया और अपनी तरफ़ की रूह से उनकी मदद की(17)
(17) इस रूह से या अल्लाह की मदद मुराद है या ईमान या क़ुरआन या जिब्रईल या अल्लाह की रहमत या नूर.

और उन्हें बाग़ों में ले जाएगा जिनके नीचे नेहरें बहें उनमें हमेशा रहें, अल्लाह उनसे राज़ी (18)
(18) उनके ईमान, इख़लास और फ़रमाँबरदारी के कारण.

और वो अल्लाह से राज़ी (19)
(19) उसके रहमत और करम से.
यह अल्लाह की जमाअत है सुनता है अल्लाह ही की जमाअत कामयाब है{22}

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