58-Surah Al-Mujadalah

58 सूरए मुजादलह -दूसरा रूकू

58|7|أَلَمْ تَرَ أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۖ مَا يَكُونُ مِن نَّجْوَىٰ ثَلَاثَةٍ إِلَّا هُوَ رَابِعُهُمْ وَلَا خَمْسَةٍ إِلَّا هُوَ سَادِسُهُمْ وَلَا أَدْنَىٰ مِن ذَٰلِكَ وَلَا أَكْثَرَ إِلَّا هُوَ مَعَهُمْ أَيْنَ مَا كَانُوا ۖ ثُمَّ يُنَبِّئُهُم بِمَا عَمِلُوا يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۚ إِنَّ اللَّهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ
58|8|أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ نُهُوا عَنِ النَّجْوَىٰ ثُمَّ يَعُودُونَ لِمَا نُهُوا عَنْهُ وَيَتَنَاجَوْنَ بِالْإِثْمِ وَالْعُدْوَانِ وَمَعْصِيَتِ الرَّسُولِ وَإِذَا جَاءُوكَ حَيَّوْكَ بِمَا لَمْ يُحَيِّكَ بِهِ اللَّهُ وَيَقُولُونَ فِي أَنفُسِهِمْ لَوْلَا يُعَذِّبُنَا اللَّهُ بِمَا نَقُولُ ۚ حَسْبُهُمْ جَهَنَّمُ يَصْلَوْنَهَا ۖ فَبِئْسَ الْمَصِيرُ
58|9|يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا تَنَاجَيْتُمْ فَلَا تَتَنَاجَوْا بِالْإِثْمِ وَالْعُدْوَانِ وَمَعْصِيَتِ الرَّسُولِ وَتَنَاجَوْا بِالْبِرِّ وَالتَّقْوَىٰ ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ الَّذِي إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ
58|10|إِنَّمَا النَّجْوَىٰ مِنَ الشَّيْطَانِ لِيَحْزُنَ الَّذِينَ آمَنُوا وَلَيْسَ بِضَارِّهِمْ شَيْئًا إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ ۚ وَعَلَى اللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ
58|11|يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا قِيلَ لَكُمْ تَفَسَّحُوا فِي الْمَجَالِسِ فَافْسَحُوا يَفْسَحِ اللَّهُ لَكُمْ ۖ وَإِذَا قِيلَ انشُزُوا فَانشُزُوا يَرْفَعِ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنكُمْ وَالَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ دَرَجَاتٍ ۚ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ
58|12|يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا نَاجَيْتُمُ الرَّسُولَ فَقَدِّمُوا بَيْنَ يَدَيْ نَجْوَاكُمْ صَدَقَةً ۚ ذَٰلِكَ خَيْرٌ لَّكُمْ وَأَطْهَرُ ۚ فَإِن لَّمْ تَجِدُوا فَإِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
58|13|أَأَشْفَقْتُمْ أَن تُقَدِّمُوا بَيْنَ يَدَيْ نَجْوَاكُمْ صَدَقَاتٍ ۚ فَإِذْ لَمْ تَفْعَلُوا وَتَابَ اللَّهُ عَلَيْكُمْ فَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ وَأَطِيعُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ ۚ وَاللَّهُ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ

ऐ सुनने वाले क्या तूने न देखा कि अल्लाह जानता है जो कुछ आसमानों में हैं और जो कुछ ज़मीन में है और जो कुछ ज़मीन में(1)
(1) उससे कुछ छुपा नहीं.

जहाँ कहीं तीन लोगों की कानाफूसी हो(2)
(2) और अपने राज़ आपस में कानों में कहें और अपनी बात चीत पर किसी को सूचित न होने दें.

तो चौथा वह मौजूद है (3)
(3) यानी अल्लाह तआला उन्हें देखता है, उनके राज़ जानता है.

और पाँच की(4)
(4) कानाफूसी हो.

तो छटा वह (5)
(5) यानी अल्लाह तआला.

और न उससे कम(6)
(6) यानी पाँच और तीन से.

और न उससे ज़्यादा की मगर यह कि वह उनके साथ है(7)
(7) अपने इल्म और क़ुदरत से.

जहाँ कहीं हों, फिर उन्हें क़यामत के दिन बता देगा जो कुछ उन्होंने किया, बेशक अल्लाह सब कुछ जानता है {7} क्या तुम ने उन्हें न देखा जिन्हें बुरी मशविरत से मना फ़रमाया गया था फिर वही करते हैं (8)
(8) यह अल्लाह यहूदियों और दोहरी प्रवृत्ति वाले मुनाफ़ि क़ों के बारे में उतरी. वो आपस में काना फूसी करते और मुसलमानों की तरफ़ देखते जाते और आँखों से उनकी तरफ़ इशारे करते जाते ताकि मुसलमान समझें कि उनके ख़िलाफ़ कोई छुपी बात है और इससे उन्हें दुख हो. उनकी इस हरकत से मुसलमानों को दुख होता था और वो कहते थे कि शायद इन लोगों को हमारे उन भाइयों की निस्बत क़त्ल या हार की कोई ख़बर पहुंची जो जिहाद में गए हैं और ये उसी के बारे में बाते बनाते और इशारे करते हैं. जब मुनाफ़ि क़ों की ये हरकतें ज़्यादा हो गई और मुसलमानों ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हुज़ूर में इसकी शि कायतें कीं तो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने कानाफ़ूसी करने वालों को मना फ़रमाया लेकिन वो नहीं माने और यह हरकत करते ही रहे इसपर यह आयत उतरी.

जिसकी मुमानियत हुई थी और आपस में गुनाह और हद से बढ़ने (9)
(9)गुनाह और हद से बढ़ना यह कि मक्कारी के साथ कानाफूसी करके मुसलमानों को दुख में डालते हैं.

और रसूल की नाफ़रमानी के मशविरे करते हैं (10)
(10) और रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नाफ़रमानरी यह कि मना करने के बाद भी बाज़ नहीं आते और यह भी कहा गया कि उनमें एक दूसरे को राय देते थे कि रसूल की नाफ़रमानी करो.

और जब तुम्हारे हुज़ूर हाज़िर होते हैं तो उन लफ़्ज़ों से तुम्हें मुजरा करते हैं जो लफ़्ज़ अल्लाह ने तुम्हारे एज़ाज़ में न कहे(11)
(11) यहूदी नबीये अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के पास आते तो अस्सामो अलैका (तुमपर मौत हो) कहते साम मौत को कहते हैं. नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उनके जवाब में अलैकुम(और तुम पर भी) फ़रमा देते.

और अपने दिलों में कहते हैं हमें अल्लाह अज़ाब क्यों नहीं करता हमारे इस कहने पर(12)
(12) इससे उनकी मुराद यह थी कि अगर हुज़ूर नबी होते तो हमारी इस गुस्ताख़ी पर अल्लाह तआला हमें अज़ाब करता, अल्लाह तआला फ़रमाता है.

उन्हें जहन्नम बस है, उसमें धंसेंगे तो क्या ही बुरा अंजाम {8} ऐ ईमान वालों तुम जब आपस में मशविरत (परामर्श) करो तो गुनाह और हद से बढ़ने और रसूल की नाफ़रमानी की मशविरत न करो(13)
(13) और जो तरीक़ा यहूदियों और मुनाफ़ि क़ों का है उससे बचो.

और नेकी और परहेज़गारी की मशविरत करो, और अल्लाह से डरो जिसकी तरफ़ उठाए जाओगे {9} वह मशविरत तो शैतान ही की तरफ़ से है(14)
(14) जिसमें गुनाह और हद से बढ़ना और रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नाफ़रमानी हो और शैतान अपने दोस्तों को उस पर उभारता है.

इसलिये कि ईमान वालों को रंज दे और वह उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता ख़ुदा के हुक्म के बिना और मुसलमानों को अल्लाह ही पर भरोसा चाहिये(15) {10}
(15) कि अल्लाह पर भरोसा करने वाला टोटे में नहीं रहता.

ऐ ईमान वालों! जब तुमसे कहा जाए मजलिसों में जगह दो तो जगह दो, अल्लाह तुम्हें जगह देगा(16)
(16) नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम बद्र में हाज़िर होने वाले सहाबा की इज़्ज़त करते थे. एक रोज़ चन्द बद्री सहाबा ऐसे वक़्त पहुंचे जबकि मजलिस शरीफ़ भर चुकी थी, उन्होंने हुज़ूर के सामने खड़े होकर सलाम अर्ज़ किया हुज़ूर ने जवाब दिया. फिर उन्होंने हाज़िरीन को सलाम किया उन्होंने जवाब दिया फिर वो इस इन्तिज़ार में खड़े रहे कि उनके लिये मजलिस शरीफ़ में जगह की जाए मगर किसी ने जगह न दी. यह सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे को बुरा लगा तो हुज़ूर ने अपने क़रीब बैठने वालों को उठाकर उनके लिये जगह की. उठने वालों को उठना अच्छा नहीं लगा इसपर यह आयत उतरी.

और जब कहा जाए उठ खड़े हो तो उठ खड़े हो(17)
(17) नमाज़ के या जिहाद के या और किसी नेक काम के लिये और इसी में ज़ि क्रे रसूल की ताज़ीम के लिये खड़ा होना.

अल्लाह तुम्हारे ईमान वालों के और उनके जिनको इल्म दिया गया (18)
(18) अल्लाह और उसके रसूल की फ़रमाँबरदारी के कारण.

दर्जे बलन्द फ़रमाएगा, और अल्लाह को तुम्हारे कामों की ख़बर है{11} ऐ ईमान वालो! जब तुम रसूल से कोई बात आहिस्ता अर्ज़ करना चाहो तो अपने अर्ज़ से पहले कुछ सदक़ा दे लो(19)
(19) कि उसमें रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की बारगाह में हाज़िरी की ताज़ीम और फ़क़ीरों का नफ़ा है. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की बारगाह में जब मालदारों ने अर्ज़ मअरूज़ का सिलसिला दराज़ किया और नौबत यहाँ तक पहुंची कि फ़क़ीरों को अपनी अर्ज़ पेश करने का मौक़ा कम मिलने लगा, तो अर्ज़ पेश करने वालों को अर्ज़ पेश करने से पहले सदक़ा देने का हुक्म दिया गया और इस हुक्म पर हज़रत अली मुर्तज़ा रदियल्लाहो अन्हो ने अमल किया और एक दीनार सदक़ा करके दस मसअले दरियाफ़्त किये अर्ज़ किया या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम वफ़ा क्या है? फ़रमाया, तौहीद और तौहीद की शहादत देना, अर्ज़ किया, फ़साद क्या है? फ़रमाया, कुफ़्र और शिर्क. अर्ज़ किया, हक क्या है? फ़रमाया, इस्लाम और क़ुरआन और विलायत, जब तुझे मिले. अर्ज़ किया, हीला क्या है? यानी तदबीर? फ़रमाया, तर्के हीला. अर्ज़ किया, मुझ पर क्या लाज़िम है? फ़रमाया, अल्लाह तआला और उसके रसूल की फ़रमाँबरदारी. अर्ज़ किया, अल्लाह तआला से दुआ कैसे माँगू? फ़रमाया, सच्चाई और यक़ीन के साथ, अर्ज़ किया, क्या माँगू? फ़रमाया, आक़िबत. अर्ज़ किया, अपनी निजात के लिये क्या करूं? फ़रमाया, हलाल खा और सच बोल. अर्ज़ किया, सुरूर क्या है? फ़रमाया, जन्नत, अर्ज़ किया, राहत क्या है? फ़रमाया, अल्लाह का दीदार. जब अली मुर्तज़ा रदियल्लाहो अन्हो इन सवालों के जवाब से फ़ारिग़ हो गए तो यह हुक्म मन्सूख़ हो गया और रूख़सत नाज़िल हुई और हज़रत अली के सिवा और किसी को इसपर अमल करने का वक़्त नहीं मिला. (मदारिक व ख़ाज़िन) हज़रत इमाम अहमद रज़ा ने फ़रमाया, यह इसकी अस्ल है जो औलिया की मज़ारात पर तस्दीक़ के लिये शीरीनी ले जाते हैं.

यह तुम्हारे लिये बहुत बेहतर और बहुत सुथरा है, फिर अगर तुम्हें मक़दूर न हो तो अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है {12} क्या तुम इससे डरे कि तुम अपनी अर्ज़ से पहले कुछ सदक़ा दो(20)
(20) अपनी ग़रीबी और नादारी के कारण.

फिर जब तुमने यह न किया और अल्लाह ने अपनी कृपा से तुम पर तवज्जुह फ़रमाई(21)
(21) और सदक़े की पहल छोड़ने की पकड़ तुम पर से उठाली और तुमको इख़्तियार दे दिया.

तो नमाज़ क़ायम रखो और ज़कात दो और अल्लाह और उसके रसूल के फ़रमाँबरदार रहो, और अल्लाह तुम्हारे कामों को जानता है {13}

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3 Responses

  1. Asslamualaikum Bhai…sirf 60 ruje hai kya quran sharif me pure to 160 sure hai….muje aage ke bhi chahiye the kya aap muje iska koi link de sajte ho…jazakallah khair..

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