59-Surah Al-Hashra

59 सूरए हश्र
सूरए हश्र मदीने में उतरी, इसमें 24 आयतें, तीन रूकू हैं.
पहला रूकू

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
59|1|سَبَّحَ لِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۖ وَهُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ
59|2|هُوَ الَّذِي أَخْرَجَ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ مِن دِيَارِهِمْ لِأَوَّلِ الْحَشْرِ ۚ مَا ظَنَنتُمْ أَن يَخْرُجُوا ۖ وَظَنُّوا أَنَّهُم مَّانِعَتُهُمْ حُصُونُهُم مِّنَ اللَّهِ فَأَتَاهُمُ اللَّهُ مِنْ حَيْثُ لَمْ يَحْتَسِبُوا ۖ وَقَذَفَ فِي قُلُوبِهِمُ الرُّعْبَ ۚ يُخْرِبُونَ بُيُوتَهُم بِأَيْدِيهِمْ وَأَيْدِي الْمُؤْمِنِينَ فَاعْتَبِرُوا يَا أُولِي الْأَبْصَارِ
59|3|وَلَوْلَا أَن كَتَبَ اللَّهُ عَلَيْهِمُ الْجَلَاءَ لَعَذَّبَهُمْ فِي الدُّنْيَا ۖ وَلَهُمْ فِي الْآخِرَةِ عَذَابُ النَّارِ
59|4|ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ شَاقُّوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ ۖ وَمَن يُشَاقِّ اللَّهَ فَإِنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ
59|5|مَا قَطَعْتُم مِّن لِّينَةٍ أَوْ تَرَكْتُمُوهَا قَائِمَةً عَلَىٰ أُصُولِهَا فَبِإِذْنِ اللَّهِ وَلِيُخْزِيَ الْفَاسِقِينَ
59|6|وَمَا أَفَاءَ اللَّهُ عَلَىٰ رَسُولِهِ مِنْهُمْ فَمَا أَوْجَفْتُمْ عَلَيْهِ مِنْ خَيْلٍ وَلَا رِكَابٍ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ يُسَلِّطُ رُسُلَهُ عَلَىٰ مَن يَشَاءُ ۚ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
59|7|مَّا أَفَاءَ اللَّهُ عَلَىٰ رَسُولِهِ مِنْ أَهْلِ الْقُرَىٰ فَلِلَّهِ وَلِلرَّسُولِ وَلِذِي الْقُرْبَىٰ وَالْيَتَامَىٰ وَالْمَسَاكِينِ وَابْنِ السَّبِيلِ كَيْ لَا يَكُونَ دُولَةً بَيْنَ الْأَغْنِيَاءِ مِنكُمْ ۚ وَمَا آتَاكُمُ الرَّسُولُ فَخُذُوهُ وَمَا نَهَاكُمْ عَنْهُ فَانتَهُوا ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۖ إِنَّ اللَّهَ شَدِيدُ الْعِقَابِ
59|8|لِلْفُقَرَاءِ الْمُهَاجِرِينَ الَّذِينَ أُخْرِجُوا مِن دِيَارِهِمْ وَأَمْوَالِهِمْ يَبْتَغُونَ فَضْلًا مِّنَ اللَّهِ وَرِضْوَانًا وَيَنصُرُونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ ۚ أُولَٰئِكَ هُمُ الصَّادِقُونَ
59|9|وَالَّذِينَ تَبَوَّءُوا الدَّارَ وَالْإِيمَانَ مِن قَبْلِهِمْ يُحِبُّونَ مَنْ هَاجَرَ إِلَيْهِمْ وَلَا يَجِدُونَ فِي صُدُورِهِمْ حَاجَةً مِّمَّا أُوتُوا وَيُؤْثِرُونَ عَلَىٰ أَنفُسِهِمْ وَلَوْ كَانَ بِهِمْ خَصَاصَةٌ ۚ وَمَن يُوقَ شُحَّ نَفْسِهِ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الْمُفْلِحُونَ
59|10|وَالَّذِينَ جَاءُوا مِن بَعْدِهِمْ يَقُولُونَ رَبَّنَا اغْفِرْ لَنَا وَلِإِخْوَانِنَا الَّذِينَ سَبَقُونَا بِالْإِيمَانِ وَلَا تَجْعَلْ فِي قُلُوبِنَا غِلًّا لِّلَّذِينَ آمَنُوا رَبَّنَا إِنَّكَ رَءُوفٌ رَّحِيمٌ

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए हश्र मदीने में उतरी. इसमें तीन रूकू, 34 आयतें. 445 कलिमे एक हज़ार नौ सौ तेरह अक्षर हैं.

अल्लाह की पाकी बोलता है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में, और वही इज़्ज़त व हिकमत वाला हैं(2){1}
(2) यह सूरत बनी नुज़ैर के हक़ में नाज़िल हुई. ये लोग यहूदी थे. जब नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मदीनए तैय्यिबह में रौनक़ अफ़रोज़ हुए तो उन्होंने हुज़ूर से इस शर्त पर सुलह की कि न आपके साथ होकर किसी से लड़ें, न आपसे जंग करें. जब जंगे बद्र में इस्लाम की जीत हुई तो बनी नुज़ैर ने कहा कि यह वही नबी हैं जिनकी सिफ़त तौरात में है. फिर जब उहद में मुसलमानों को आरिज़ी हार की सूरत पेश आई तो यो शक में पड़े और उन्होंने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और हुज़ूर के नियाज़मन्दों के साथ दुश्मनी ज़ाहिर की. और जो मुआहिदा किया था वह तोड़ दिया और उनका एक सरकार कअब बिन अशरफ़ यहूदी चालीस सवारों के साथ मक्कए मुकर्रमा पहुंचा और काबा मुअज़्ज़मा के पर्दें थाम कर क़ुरैश के सरदारों से रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ख़िलाफ़ समझौता किया. अल्लाह तआला ने अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को इस की ख़बर दे दी थी. और बनी नुज़ैर से एक ख़यानत और भी वाक़े हो चुकी थी कि उन्होंने क़िले के ऊपर से सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर बुरे इरादे से एक पत्थर गिराया था. अल्लाह तआला ने हुज़ूर को ख़बरदार कर दिया और अल्लाह के फ़ज्ल से हुज़ूर मेहफ़ूज़ रहे. जब बनी नुज़ैर के यहूदियों ने ख़यानत की और एहद तोड़ा और क़ुरैश के काफ़िरों से हुज़ूर के ख़िलाफ एहद जोड़ा तो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने मुहम्मद बिन मुस्लिमा अन्सारी को हुक्म दिया और उन्होंने कअब बिन अशरफ़ को क़त्ल कर दिया. फिर हुज़ूर लश्कर के साथ बनी नुज़ैर की तरफ़ रवाना हुए और उनका मुहासिरा कर लिया. यह घिराव 21 दिन चला. उस बीच मुनाफ़िक़ों ने यहूदियों से हमदर्दी और मदद के बहुत से मुआहिदे किये लेकिन अल्लाह तआला ने उन सबको नाकाम किया. यहूद के दिलों में रोअब डाला. आख़िरकार उन्हें हुज़ूर के हुक्म से जिलावतन होना पड़ा. और वो शाम और अरीहा और ख़ैबर की तरफ़ चले गए.

वही है जिसने उन काफ़िर किताबियों को(3)
(3) यानी बनी नुज़ैर के यहूदियों को.

उनके घरों से निकाला(4)
(4) जो मदीनए तैय्यिबह में थे.

उनके पहले हश्र के लिये(5)
(5) यह जिलावतनी उनका पहला हश्र और दूसरा हश्र उनका यह है कि अमीरूल मूमिनीन हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने उन्हें अपनी ख़िलाफ़त के ज़माने में ख़ैबर से शाम की तरफ़ निकाला था. आख़िरी हश्र क़यामत के दिन का हश्र है कि आग सब लोगों को सरज़मीने शाम की तरफ़ ले जाएगी और वहीं उनपर क़यामत क़ायम होगी. उसके बाद मुसलमानों से ख़िताब किया जाता है.

तुम्हें गुमान न था कि वो निकलेंगे(6)
(6) मदीने से, क्योंकि क़ुव्वत और लश्कर वाले थे. मज़बूत किले रखते थे. उनकी संख्या भी काफ़ी थी, जागीरें थीं, दौलत थी.

और वो समझते थे कि उनके क़िले उन्हें अल्लाह से बचा लेंगे, तो अल्लाह का हुक्म उनके पास आया जहाँ से उनका गुमान भी न था(7)
(7) यानी ख़तरा भी न था कि मुसलमान उन पर हमला कर सकते है.

और उस ने उनके दिलों में रोब डाला(8)
(8) उनके सरदार कअब बिन अशरफ़ के क़त्ल से.

कि अपने घर वीरान करते हैं अपने हाथों (9)
(9) और उनको ढाते हैं ताकि जो लकड़ी वग़ैरह उन्हें अच्छी मालूम हो वो जिलावतन होते वक्त अपने साथ लेते जाएं.

और मुसलमानों के हाथों(10)
(10) कि उनके मकानों के जो हिस्से बाक़ी रह जाते थे उन्हें मुसलमान गिरा देते थे ताकि जंग के लिये साफ़ हो जाए.

तो इबरत लो ऐ निगाह वालो {2} और अगर न होता कि अल्लाह ने उनपर घर से उजड़ना लिख दिया था तो दुनिया ही में उनपर अज़ाब फ़रमाता(11)
(11) और उन्हें क़त्ल और क़ैद में जकड़ता जैसा कि बनी क़ुरैज़ा के यहूदियों के साथ किया.

और उनके लिये(12)
(12) हर हाल में, चाहे जिलावतन किये जाएं या क़त्ल किये जाएं.

आख़िरत में आग का अज़ाब है {3} यह इसलिये कि वो अल्लाह और उसके रसूल से फटे (जुदा)रहे (13)
(13) यानी विरोध पर डटे रहे.

और जो अल्लाह और उसके रसूल से फटा रहे तो बेशक बेशक अल्लाह का अज़ाब सख़्त है {4} जो दरख़्त तुमने काटे या उनकी जड़ों पर क़ायम छोड़ दिये यह सब अल्लाह की इजाज़त से था (14)
(14) जब बनी नुज़ैर ने अपने क़िलों में पनाह ले ली तो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उनके पेड़ काट डालने और उन्हें जला देने का हुक्म दिया. इस पर वो बहुत घबराए और रंजीदा हुए और कहने लगे कि क्या तुम्हारी किताब में इसी का हुक्म है. मुसलमान इस मुद्दे पर अलग अलग राय के हो गए. कुछ ने कहा, पेड न काटो कि ये ग़नीनत यानी दुश्मन का छोड़ा हुआ माल हैं जो अल्लाह तआला ने हमें अता किये हैं. कुछ ने कहा, काट डाले जाएं कि इससे काफ़िरों को रूसवा करना और उन्हें ग़ुस्सा दिलाना मक़सूद है. इस पर आयत उतरी. और इसमें बताया गया कि मुसलमानों में जो पेड़ काटने वाले हैं उनका कहना भी ठीक है और जो न काटने की कहते हैं उनका ख़याल भी सही है, क्योंकि दरख़्तों का काटना और उनका छोड़ देना ये दोनो अल्लाह तआला के इज़्न और इजाज़त से है.

और इसलिये कि फ़ासिकों को रूसवा करे(15) {5}
(15) यानी यहूदियों को ज़लील करे पेड़ काटने की इजाज़त देकर.

और जो ग़नीमत दिलाई अल्लाह ने अपने रसूल को उनसे(16)
(16) यानी बनी नुज़ैर के यहूदियों से.

तो तुमने उनपर अपने घोड़े दौड़ाए थे और न ऊंट(17)
(17) यानी उसके लिये तुम्हें कोई कोफ्त़ या मशक़्क़त नहीं उठानी पड़ी. सिर्फ़ दो मील का फ़ासला था. सब लोग पैदल चले गए सिर्फ़ रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम सवार हुए.

हाँ अल्लाह अपने रसूलों के क़ाबू में दे देता है जिसे चाहे(18)
(18) अपने दुश्मनों में से, मुराद यह है कि बनी नुज़ैर से जो ग़नीमतें हासिल हुई उनके लिये मुसलमानों को जंग करना नहीं पड़े. अल्लाह तआला ने अपने रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को उन पर मुसल्लत कर दिया. ये माल हुज़ूर की मर्ज़ी पर है, जहां चाहें ख़र्च करें. रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने यह माल मुहाजिरों पर तक़सीम फ़रमा दिया. और अन्सार में से सिर्फ़ तीन हाजतमन्द लोगों को दिया वो अबू दुजाना समाक बिन खरशाहकी और सहल बिन हनीफ़ और हारिस बिन सुम्मा हैं.

और अल्लाह सब कुछ कर सकता है {6} जो ग़नीमत दिलाई अल्लाह ने अपने रसूल को शहर वालों से (19)
(19) पहली आयत में ग़नीमत का जो ज़िक्र हुआ इस आयत में उसीकी व्याख्या है और कुछ मुफ़स्सिरों ने इस क़ौल का विरोध किया और फ़रमाया कि पहली आयत बनी नुज़ैर के अमवाल के बारे में उतरी. उनको अल्लाह तआला ने अपने रसूल के लिये ख़ास किया और यह आयत हर उस शहर की ग़नीमतों के बारे में है जिसको मुसलमान अपनी क़ुव्वत से हासिल करें. (मदारिक)

वह अल्लाह और रसूल की है और रिश्तेदारों (20)
(20) रिश्तेदारों से मुराद सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के एहले क़राबत हैं यानी बनी हाशिम और बनी मुत्तलिब.

और यतीमों और मिस्कीनों (दरिद्रों) और मुसाफ़िरों के लिये कि तुम्हारे मालदारों का माल न हो जाए(21)
(21) और ग़रीब और फ़क़ीर नुक़सान में रहें जैसा कि इस्लाम से पहले के ज़माने में तरीक़ा था कि ग़नीमत में से एक चौथाई तो सरदार ले लेता था, बाक़ी क़ौम के लिये छोड़ देता था. इसमें से मालदार लोग बहुत ज़ियादा ले लेते थे और ग़रीबों के लिये बहुत थोड़ा बचता था. इसी तरीक़े के अनुसार लोगों ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे से अर्ज़ किया कि हुज़ूर का इख़्तियार नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को दिया और उसका तरीक़ा इरशाद फ़रमाया.

और जो कुछ तुम्हें रसूल अता फ़रमाएं वह लो(22)
(22) ग़नीमत में से क्योंकि वो तुम्हारे लिये हलाल है. या ये मानी हैं कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम जो तुम्हें हुक्म दें उसका पालन करो क्योंकि रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की इताअत हर काम में वाजिब है.

और जिससे मना फ़रमाएं बाज़ रहो, और अल्लाह से डरो(23)
(23) नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की मुख़ालिफ़त न करो और उनके इरशाद पर तअमील में सुस्ती न करो.

बेशक अल्लाह का अज़ाब सख़्त है(24){7}
(24) उन पर जो रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नाफ़रमानी करे और ग़नीमत के माल में, जैसा कि ऊपर ज़िक्र किये हुए लोगों का हश्र है, ऐसा ही.

उन फ़क़ीर हिजरत करने वालों के लिये जो अपने घरों और मालों से निकाले गए(25)
(25) और उनके घरों और मालों पर मक्का के काफ़िरों ने क़ब्ज़ा कर लिया. इस आयत से साबित हुए है कि काफ़िर इस्तीला, (ग़ालिब होने) से मुसलमानों के अमवाल के मालिक हो जाते हैं.

अल्लाह का फ़ज़्ल (26)
(26) यानी आख़िरत का सवाब.

और उसकी रज़ा चाहते और अल्लाह व रसूल की मदद करते(27)
(27) अपने जानो माल से दीन की हिमायत में.

वही सच्चे हैं(28){8}
(28) ईमान और इख़लास में. क़तादह ने फ़रमाया कि उन मुहाजिरों ने घर और माल और कुंबे अल्लाह तआला और रसूल की महब्बत में छोड़े और इस्लाम को क़बूल किया और उन सारी सख़्तियों को गवारा किया जो इस्लाम क़बूल करने की वजह से उन्हें पेश आई. उनकी हालतें यहां पहुंचीं कि भूक की शिद्दत से पेट पर पत्थर बांधते थे और जाड़ों में कपड़ा न होने के कारण गढ़ों और ग़ारों में गुज़ारा करते थे. हदीस शरीफ़ में आया है कि फ़क़ीर मुहाजिरीन मालदारों से चालीस साल पहले जन्नत में जाएंगे.

और जिन्होंने पहले से(29)
(29) यानी मुहाजिरों से पहले या उनकी हिजरत से पहले बल्कि नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तशरीफ़ आवरी से पहले.

इस शहर(30)
(30) मदीनए पाक.

और ईमान में घर बना लिया(31)
(31) यानी मदीनए पाक को वतन और ईमान को अपनी मंज़िल बनाया और इस्लाम लाए और हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तशरीफ़ आवरी से दो साल पहले मस्जिदें बनाई उनका यह हाल है कि.

दोस्त रखते हैं उन्हें जो उनकी तरफ़ हिजरत करके गए(32)
(32) चुनांन्चे अपने घरों में उन्हें उतारते हैं अपने मालों में उन्हें आधे का शरीक करते हैं.

और अपने दिलों में कोई हाजत नहीं पाते(33)
(33) यानी उनके दिलों में कोई ख्वाहिश और तलब नहीं पैदा होती.

उस चीज़ की जो दिये गये(34)
(34) यानी मुहाजिरीन को जो ग़नीमत के माल दिये गए. अन्सार के दिल में उनकी कोई ख्वाहिश पैदा नहीं होती, रश्क तो क्या होता. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की बरकत ने दिल ऐसे पाक कर दिये कि अन्सार मुहाजिरों के साथ ये सुलूक करते हैं.

और अपनी जानों पर उनको तरजीह देते हैं(35)
(35) यानी मुहाजिरों को.

अगरचे उन्हें शदीद(सख्त़) मुहताजी हो (36)
(36) हदीस शरीफ़ में है कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में एक भूखा आदमी आया. हुज़ूर ने अपनी पाक मुक़द्दस बीबियों के हुजरों पर मालूम कराया कि क्या खाने की कोई चीज़ है. मालूम हुआ कि किसी बीबी साहिबा के यहां कुछ भी नहीं है तो हुज़ूर ने सहाबा से फ़रमाया जो इस आदमी को मेहमान बनाए, अल्लाह तआला उस पर रहमत फ़रमाए. हज़रत अबू तलहा अन्सारी खड़े हो गए और हुज़ूर से इजाज़त लेकर मेहमान को अपने घर ले गए. घर जाकर बीबी से पूछा, कुछ है ? उन्होंने कहा, कुछ भी नहीं. सिर्फ़ बच्चों के लिये थोड़ा सा खाना रखा है. हज़रत अबूतलहा ने फ़रमाया बच्चों को बहलाकर सुला दो और जब मेहमान खाने बैठे तो चिराग़ दुरूस्त करने उठो और चिराग़ को बुझा दो ताकि वह अच्छी तरह खाले. यह इसलिये कहा कि मेहमान यह न जान सके कि घर वाले उसके साथ नहीं खा रहे हैं. क्योकि उसको यह मालूम होगा तो वह इसरार करेगा और खाना कम है, भूखा रह जाएगा. इस तरह मेहमान को ख़िलाया और आप उन लोगों ने भूखे पेट रात गुज़ारी. जब सुबह हुई और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुए तो हुज़ूर अक़दस ने फ़रमाया, रात फ़लां फ़लां लोगों में अजीब मामला पेश आया. अल्लाह तआला उनसे बहुत राज़ी है और यह आयत उतरी.

और जो अपने नफ़्स के लालच से बचाया गया(37)
(37) यानी जिसके नफ़्स को लालच से पाक किया गया.

तो वही कामयाब हैं {9} और वो जो उनके बाद आए(38)
(38) यानी मुहाजिरों और अन्सार के, इसमें क़यामत तक पैदा होने वाले मुसलमान दाख़िल हैं.

अर्ज़ करते हैं ऐ हमारे रब! हमें बख़्श दे और हमारे भाइयों को जो हम से पहले ईमान लाए और हमारे दिल में ईमान वालों की तरफ़ से कीना न रख(39)
(39) यानी रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सहाबा की तरफ़ से. जिसके दिल में किसी सहाबी की तरफ़ से बुग्ज़ और कदूरत हो और वह उनके लिये रहमत और मग़फ़िरत की दुआ न करे वह मूमिन की किस्म से बाहर है क्योंकि यहां मूमिनों की तीन किस्में फ़रमाई गई, मुहाजिर, अन्सार और उनके बाद वाले जो उनके ताबेअ हों और उनकी तरफ़ से दिल में कोई कदूरत न रखें और उनके लिए मग़फ़िरत की दुआ करें तो जो सहाबा से कदूरत रखे, राफ़िज़ी हो या ख़ारिजी, वह मुसलमानों की इन तीनों क़िस्मों से बाहर है. हज़रत उम्मुल मूमिनीन आयशा सिद्दीक़ा रदियल्लाहो अन्हा ने फ़रमाया कि लोगों को हुक्म तो यह दिया गया कि सहाबा के लिये इस्तिग़फ़ार करें और करते हैं यह, कि गालियां देते हैं.
ऐ रब हमारे! बेशक तू ही बहुत मेहरबान रहम वाला है {10}

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59-Surah Al-Hashra

59 सूरए हश्र -दूसरा रूकू

59|11|۞ أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ نَافَقُوا يَقُولُونَ لِإِخْوَانِهِمُ الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْ أَهْلِ الْكِتَابِ لَئِنْ أُخْرِجْتُمْ لَنَخْرُجَنَّ مَعَكُمْ وَلَا نُطِيعُ فِيكُمْ أَحَدًا أَبَدًا وَإِن قُوتِلْتُمْ لَنَنصُرَنَّكُمْ وَاللَّهُ يَشْهَدُ إِنَّهُمْ لَكَاذِبُونَ
59|12|لَئِنْ أُخْرِجُوا لَا يَخْرُجُونَ مَعَهُمْ وَلَئِن قُوتِلُوا لَا يَنصُرُونَهُمْ وَلَئِن نَّصَرُوهُمْ لَيُوَلُّنَّ الْأَدْبَارَ ثُمَّ لَا يُنصَرُونَ
59|13|لَأَنتُمْ أَشَدُّ رَهْبَةً فِي صُدُورِهِم مِّنَ اللَّهِ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَفْقَهُونَ
59|14|لَا يُقَاتِلُونَكُمْ جَمِيعًا إِلَّا فِي قُرًى مُّحَصَّنَةٍ أَوْ مِن وَرَاءِ جُدُرٍ ۚ بَأْسُهُم بَيْنَهُمْ شَدِيدٌ ۚ تَحْسَبُهُمْ جَمِيعًا وَقُلُوبُهُمْ شَتَّىٰ ۚ ذَٰلِكَ بِأَنَّهُمْ قَوْمٌ لَّا يَعْقِلُونَ
59|15|كَمَثَلِ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ قَرِيبًا ۖ ذَاقُوا وَبَالَ أَمْرِهِمْ وَلَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
59|16|كَمَثَلِ الشَّيْطَانِ إِذْ قَالَ لِلْإِنسَانِ اكْفُرْ فَلَمَّا كَفَرَ قَالَ إِنِّي بَرِيءٌ مِّنكَ إِنِّي أَخَافُ اللَّهَ رَبَّ الْعَالَمِينَ
59|17|فَكَانَ عَاقِبَتَهُمَا أَنَّهُمَا فِي النَّارِ خَالِدَيْنِ فِيهَا ۚ وَذَٰلِكَ جَزَاءُ الظَّالِمِينَ

 

क्या तुमने मुनाफ़िक़ों (दोग़लों) को न देखा(1)
(1) अब्दुल्लाह बिन उबई बिन सुलूल मुनाफ़िक़ और उसके साथियों को.

कि अपने भाइयों काफ़िर किताबियों(2)
(2) यानी बनी क़ुरैज़ा और बनी नुज़ैर के यहूदी.

से कहते हैं कि अगर तुम निकाले गए(3)
(3) मदीना शरीफ़ से.

तो ज़रूर हम तुम्हारे साथ निकल जाएंगे और हरगिज़ तुम्हारे बारे में किसी को न मानेंगे(4)
(4) यानी तुम्हारे ख़िलाफ़ किसी का कहना न मानेंगे न मुसलमानों का, न रसूल सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का.

और तुम से लड़ाई हुई तो हम ज़रूर तुम्हारी मदद करेंगे, और अल्लाह गवाह है कि वो झूटे हैं(5){11}
(5) यानी यहूदियों से मुनाफ़िक़ों के ये सब वादे झूटे हैं. इसके बाद अल्लाह तआला मुनाफ़िक़ों के हाल की ख़बर देता है.

अगर वो निकाले गए(6)
(6)यानी यहूदी

तो ये उनके साथ न निकलेंगे, और उनसे लड़ाई हुई तो ये उनकी मदद न करेंगे(7)
(7) चुनांन्चे ऐसा ही हुआ कि यहूदी निकाले गए और मुनाफ़िक़ उनके साथ न निकले और यहूदियों से जंग हुई और मुनाफ़िक़ों ने यहूदियों की मदद न की.
अगर उनकी मदद की भी तो ज़रूर पीठ फेर कर भागेंगे फिर(8)
(8) जब ये मददगार भाग निकलेंगे तो मुनाफ़िक़.

मदद न पाएंगे {12} बेशक (9)
(9) ऐ मुसलमानो.

उनके दिलों में अल्लाह से ज़्यादा तुम्हारा डर है(10)
(10) कि तुम्हारे सामने तो कुफ़्र ज़ाहिर करने में डरते हैं और यह जानते हुए भी कि अल्लाह तआला दिलों की छुपी बातें जानता है, दिल में कुफ्र रखते हैं.

यह इस लिये कि वो नासमझ लोग हैं(11){13}
(11) अल्लाह तआला की अज़मत को नहीं जानते वरना जैसा उससे डरने का हक़ है डरते.

ये सब मिलकर भी तुम से न लड़ेंगे मगर क़िलेबन्द शहरों में या धुसों (शहर-पनाह) के पीछे, आपस में उनकी आंच (जोश) सख़्त है(12)
(12) यानी जब वो आपस में लड़े तो बहुत सख़्ती और क़ुव्वत वाले हैं लेकिन मुसलमानों के मुक़ाबिले में बुज़दिल और नामर्द साबित होंगे.

तुम उन्हें एक जथा समझोगे और उनके दिल अलग अलग हैं, यह इसलिये कि वो बेअक़्ल लोग हैं(13){14}
(13) इसके बाद यहूदियों की एक मिसाल इरशाद फ़रमाई.

उनकी सी कहावत जो अभी क़रीब ज़माने में उनसे पहले थे(14)
(14) यानी उनका हाल मक्के के मुश्रिकों जैसा है कि बद्र में—-

उन्हों ने अपने काम का वबाल चखा(15)
(15) यानी रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ दुश्मनी रखने और कुफ़्र करने का कि ज़िल्लत और रूस्वाई के साथ हलाक किये गए.

और उनके लिये दर्दनाक अज़ाब है(16){15}
(16) और मुनाफ़िक़ों का बनी नुज़ैर यहूदियों के साथ सुलूक ऐसा है जैसे—

शैतान की कहावत जब उसने आदमी से कहा कुफ़्र कर, फिर जब उसने कुफ़्र कर लिया, बोला मैं तुझसे अलग हूँ, मैं अल्लाह से डरता हूँ जो सारे जगत का रब (17){16}
(17) ऐसे ही मुनाफ़िक़ों ने बनी नुज़ैर को मुसलमानों के ख़िलाफ़ उभारा जंग पर आमादा किया उनसे मदद के वादे किये और जब उनके कहे से वो अहले इस्लाम के मुक़ाबले में लड़ने आए तो मुनाफ़िक़ बैठ रहे उनका साथ न दिया.

तो उन दोनों का (18)
(18) यानी उस शैतान और इन्सान का.
अंजाम यह हुआ कि वो दोनों आग में हैं हमेशा उसमें रहे, और ज़ालिमों की यही सज़ा है{17}

59-Surah Al-Hashra

59 सूरए हश्र -तीसरा रूकू

59|18|يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَلْتَنظُرْ نَفْسٌ مَّا قَدَّمَتْ لِغَدٍ ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ
59|19|وَلَا تَكُونُوا كَالَّذِينَ نَسُوا اللَّهَ فَأَنسَاهُمْ أَنفُسَهُمْ ۚ أُولَٰئِكَ هُمُ الْفَاسِقُونَ
59|20|لَا يَسْتَوِي أَصْحَابُ النَّارِ وَأَصْحَابُ الْجَنَّةِ ۚ أَصْحَابُ الْجَنَّةِ هُمُ الْفَائِزُونَ
59|21|لَوْ أَنزَلْنَا هَٰذَا الْقُرْآنَ عَلَىٰ جَبَلٍ لَّرَأَيْتَهُ خَاشِعًا مُّتَصَدِّعًا مِّنْ خَشْيَةِ اللَّهِ ۚ وَتِلْكَ الْأَمْثَالُ نَضْرِبُهَا لِلنَّاسِ لَعَلَّهُمْ يَتَفَكَّرُونَ
59|22|هُوَ اللَّهُ الَّذِي لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ عَالِمُ الْغَيْبِ وَالشَّهَادَةِ ۖ هُوَ الرَّحْمَٰنُ الرَّحِيمُ
59|23|هُوَ اللَّهُ الَّذِي لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ الْمَلِكُ الْقُدُّوسُ السَّلَامُ الْمُؤْمِنُ الْمُهَيْمِنُ الْعَزِيزُ الْجَبَّارُ الْمُتَكَبِّرُ ۚ سُبْحَانَ اللَّهِ عَمَّا يُشْرِكُونَ
59|24|هُوَ اللَّهُ الْخَالِقُ الْبَارِئُ الْمُصَوِّرُ ۖ لَهُ الْأَسْمَاءُ الْحُسْنَىٰ ۚ يُسَبِّحُ لَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۖ وَهُوَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ

ऐ ईमान वालों अल्लाह से डरो(1)
(1) और उसके हुक्म का विरोध न करो.

और हर जान देखे कि कल के लिये क्या आगे भेजा(2)
(2) यानी क़यामत के दिन के लिये क्या कर्म किये.

और अल्लाह से डरो(3)
(3) उसकी ताअत और फ़रमाँबरदारी में सरगर्म रहो.

बेशक अल्लाह को तुम्हारे कामों की ख़बर है {18} और उन जैसे न हो जो अल्लाह को भूल बैठे(4)
(4) उसकी ताअत छोड़ दी.

तो अल्लाह ने उन्हें बला में डाला कि अपनी जानें याद न रहीं (5)
(5) कि उनके लिये फ़ायदा देने वाले और काम आने वाले अमल कर लेते.

वही फ़ासिक़ हैं {19} दोज़ख़ वाले (6)
(6) जिनके लिये हमेशा का अज़ाब है.

और जन्नत वाले(7)
(7) जिनके लिये हमेशा का ऐश और हमेशा की राहत है.

बराबर नहीं, जन्नत वाले ही मुराद को पहुंचे {20} अगर हम यह क़ुरआन किसी पहाड़ पर उतारते(8)
(8) और उसको इन्सान की सी तमीज़ अता करते.

तो ज़रूर तू उसे देखता झुका हुआ पाश पाश होता, अल्लाह के डर से(9)
(9) यानी क़ुरआन की अज़मत व शान ऐसी है कि पहाड़ को अगर समझ होती तो वह बावुजूद इतना सख़्त और मज़बूत होने के टुकड़े
टुकड़े हो जाता इससे मालूम होता है कि काफ़िरों के दिल कितने सख़्त है कि ऐसे अज़मत वाले कलाम से प्रभावित नहीं होते.

और ये मिसाले लोगों के लिये हम बयान फ़रमाते हैं कि वो सोचें {21} वही अल्लाह है जिसके सिवा कोई माबूद नहीं, हर छुपे ज़ाहिर का
जानने वाला(10)
(10) मौजूद का भी और मअदूम का भी दुनिया और आख़िरत का भी.

वही है बड़ा मेहरबान रहमत वाला {22} वही है अल्लाह जिसके सिवा कोई माबूद नहीं, बादशाह(11)
(11) मुल्क और हुकूमत का हक़ीक़ी मालिक कि तमाम मौजूदात उसके तहत मुल्को हुकूमत है और उसकी मालिकिय्यत और सल्तनत
दायमी है जिसे ज़वाल नहीं.

निहायत (परम) पाक (12)
(12) हर ऐब से और तमाम बुराइयों से.

सलामती देने वाला(13)
(13) अपनी मख़लूक़ को.

अमान बख़्शने वाला (14)
(14) अपने अज़ाब से अपने फ़रमाँबरदार बन्दों को.

हिफ़ाज़त फ़रमाने वाला इज़्ज़त वाला अज़मत वाला तकब्बुर (बड़ाई) वाला (15)
(15) यानी अज़मत और बड़ाई वाला अपनी ज़ात और तमाम सिफ़ात में और अपनी बड़ाई का इज़हार उसी के शायाँ और लायक़ है उसका
हर कमाल अज़ीम है और हर सिफ़त आली. मख़लूक़ में किसी को नहीं पहुंचता कि घमण्ड यानी अपनी बड़ाई का इज़हार करे. बन्दे के
लिये विनम्रता सबसे बेहतर है.

अल्लाह को पाकी है उनके शिर्क से {23} वही है अल्लाह बनाने वाला पैदा करने वाला(16)
(16)नेस्त से हस्त करने वाला.

हर एक को सूरत देने वाला (17)
(17) जैसी चाहे.

उसी के हैं सब अच्छे नाम (18)
(18) निनानवे जो हदीस में आए हैं.

उसकी पाकी बोलता है जो कुछ आसमानों और ज़मीन में है, और वही इज़्ज़त व हिकमत (बोध) वाला है {24}

58-Surah Al-Mujadalah

अठ्ठाईसवाँ पारा -क़द समिअल्लाहु
58 सूरए मुजादलह
सूरए मुजादलह मदीने में उतरी, इसमें 22 आयतें, तीन रूकू हैं.
पहला रूकू

58|1|بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ قَدْ سَمِعَ اللَّهُ قَوْلَ الَّتِي تُجَادِلُكَ فِي زَوْجِهَا وَتَشْتَكِي إِلَى اللَّهِ وَاللَّهُ يَسْمَعُ تَحَاوُرَكُمَا ۚ إِنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ بَصِيرٌ
58|2|الَّذِينَ يُظَاهِرُونَ مِنكُم مِّن نِّسَائِهِم مَّا هُنَّ أُمَّهَاتِهِمْ ۖ إِنْ أُمَّهَاتُهُمْ إِلَّا اللَّائِي وَلَدْنَهُمْ ۚ وَإِنَّهُمْ لَيَقُولُونَ مُنكَرًا مِّنَ الْقَوْلِ وَزُورًا ۚ وَإِنَّ اللَّهَ لَعَفُوٌّ غَفُورٌ
58|3|وَالَّذِينَ يُظَاهِرُونَ مِن نِّسَائِهِمْ ثُمَّ يَعُودُونَ لِمَا قَالُوا فَتَحْرِيرُ رَقَبَةٍ مِّن قَبْلِ أَن يَتَمَاسَّا ۚ ذَٰلِكُمْ تُوعَظُونَ بِهِ ۚ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ
58|4|فَمَن لَّمْ يَجِدْ فَصِيَامُ شَهْرَيْنِ مُتَتَابِعَيْنِ مِن قَبْلِ أَن يَتَمَاسَّا ۖ فَمَن لَّمْ يَسْتَطِعْ فَإِطْعَامُ سِتِّينَ مِسْكِينًا ۚ ذَٰلِكَ لِتُؤْمِنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ ۚ وَتِلْكَ حُدُودُ اللَّهِ ۗ وَلِلْكَافِرِينَ عَذَابٌ أَلِيمٌ
58|5|إِنَّ الَّذِينَ يُحَادُّونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ كُبِتُوا كَمَا كُبِتَ الَّذِينَ مِن قَبْلِهِمْ ۚ وَقَدْ أَنزَلْنَا آيَاتٍ بَيِّنَاتٍ ۚ وَلِلْكَافِرِينَ عَذَابٌ مُّهِينٌ
58|6|يَوْمَ يَبْعَثُهُمُ اللَّهُ جَمِيعًا فَيُنَبِّئُهُم بِمَا عَمِلُوا ۚ أَحْصَاهُ اللَّهُ وَنَسُوهُ ۚ وَاللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ شَهِيدٌ

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए मुजादलह मदनी है, इसमें तीन रूकू, बाईस आयतें, चार सौ तिहत्तर कलिमे और एक हज़ार सात सौ बानवे अक्षर हैं.

बेशक अल्लाह ने सुनी उसकी बात जो तुम से अपने शौहर के मामले में बहस करती है(2)
(2) वह ख़ूलह बिन्ते सअलबह थीं औस बिन साबित की बीबी, किसी बात पर औस ने उनसे कहा कि तू मुझ पर मेरी माँ की पुश्त की तरह है, यह कहने के बाद औस को शर्मिन्दगी हुई. जिहालत के ज़माने में यह कलिमा तलाक़ था. औस ने कहा मेरे ख़्याल में तू मुझ पर हराम हो गई. ख़ूलह ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर होकर सारा हाल अर्ज़ किया कि मेरा माल ख़त्म हो चुका, माँ बाप गुज़र गए, उम्र ज़्यादा हो गई, बच्चे छोटे छोटे हैं, उनके बाप के पास छोड़ दूँ तो हलाक हो जाएं, अपने साथ रखूं तो भूखे मर जाएं, क्या सूरत है कि मेरे और मेरे शौहर के बीच जुदाई न हो. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि तेरे सिलसिले में मेरे पास कोई हुक्म नहीं है यानी अभी तक ज़िहार के बारे में कोई नया हुक्म नहीं उतरा. पुराना तरीक़ा यही है कि ज़िहार से औरत हराम हो जाती है. औरत ने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, औस ने तलाक़ का शब्द न कहा, वह मेरे बच्चों का बाप है और मुझे बहुत ही प्यारा है. इसी तरह वह बार बार अर्ज़ करती रही और जवाब अपनी इच्छानुसार न पाया तो आसमान की तरफ़ सर उठाकर कहने लगी. या अल्लाह मैं तुझ से अपनी मोहताजी, बेकसी और परेशानी की शिकायत करती हूँ, अपने नबी पर मेरे हक़ में ऐसा हुक्म उतार जिस से मेरी मुसीबत दूर हो. हज़रत उम्मुल मूमिनीन आयशा सिद्दीक़ा रदियल्लाहो अन्हा ने फ़रमाया ख़ामोश हो. देख रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के मुबारक चेहरे पर वही के आसार हैं. जब वही पूरी हो गई तो फ़रमाया, अपने शौहर को बुला. औस हाज़िर हुए तो हुज़ूर ने ये आयतें पढ़कर सुनाई.

और अल्लाह से शिकायत करती है और अल्लाह तुम दोनों की बातचीत सुन रहा है, बेशक अल्लाह सुनता देखता है {1} वो जो तुम में अपनी बीबियों को अपनी माँ की जगह कह बैठते हैं(3)
(3) यानी ज़िहार करते हैं. ज़िहार उसको कहते हैं कि अपनी बीबी को नसब वाली मेहरमात या रिज़ाई रिश्ते की औरतों के किसी ऐसे अंग से उपमा दी जाए जिसको देखना हराम है. जैसे कि बीबी से कहे तू मुझ पर मेरी माँ की पीठ की तरह है या बीबी के किसी अंग को जिससे वह ताबीर की जाती हो या उसके शरीर और उसके अंगो को मेहरम औरतों के किसी ऐसे अंग से मिसाल दे जिसका देखना हराम है जैसे कि यह कहे कि तेरा सर या तेरा आधा बदन मेरी माँ की पीठ या उसके पेट या उसकी रान या मेरी बहन या फुफी या दूध पिलाने वाली की पीठ या पेट की तरह है तो ऐसा कहना ज़िहार कहलाता है.

वो उनकी माएँ नहीं (4)
(4) यह कहने से वो माएँ नहीं हो गई.

उनकी माएँ तो वही हैं जिन से वो पैदा हैं (5)
(5) और दूध पिलाने वालियां दूध पिलाने के कारण माँ के हुक्म में हैं. और नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की मुक़द्दस बीबियाँ कमाले हुर्मत के कारण माएँ बल्कि माओ से बढ़कर हैं.

और वह बेशक बुरी और निरी झूट बात कहते हैं (6)
(6) जो बीबी को माँ कहते हैं उसको किसी तरह माँ के साथ मिसाल देना ठीक नहीं.

और बेशक अल्लाह ज़रूर माफ़ करने वाला और बख़्शने वाला है{2} और वो जो अपनी बीबियों को अपनी माँ की जगह कहें(7)
(7) यानी उनसे ज़िहार करें. इस आयत से मालूम हुआ कि दासी से ज़िहार नहीं होता. अगर उसको मेहरम औरतों से तश्बीह दे तो मुज़ाहिर न होगा.

फिर वही करना चाहें जिस पर इतनी बड़ी बात कह चुके(8)
(8) यानी इस ज़िहार को तोड़ देना और हुर्मत को उठा देना

तो उनपर लाज़िम है(9)
(9) कफ़्फ़ारा ज़िहार का, लिहाज़ा उनपर ज़रूरी है.

एक ग़ुलाम आज़ाद करना(10)
(10) चाहे वह मूमिन हो या काफ़िर, छोटा हो या बड़ा, मर्द हो या औरत, अलबत्ता मुदब्बर और उम्मे वलद और ऐसा मकातिब जायज़ नहीं जिसने किताब के बदल में से कुछ अदा किया हो.

पहले इसके कि एक दूसरे को हाथ लगाएं(11)
(11) इससे मालूम हुआ कि इस कफ़्फ़ारे के देने से पहले वती (संभोग) और उसके दवाई (संभोग इच्छुक काम) हराम है.

यह है जो नसीहत तुम्हें की जाती है, और अल्लाह तुम्हारे कामों से ख़बरदार है{3} फिर जिसे ग़ुलाम न मिले(12)
(12) उसका कफ़्फ़ारा.

तो लगातार दो महीने के रोज़े (13)
(13) जुड़े हुए इसतरह कि न उन दो महीनों के बीच रमज़ान आए न उन पाँच दिनों में से कोई दिन आए जिनका रोज़ा मना है, और न किसी उज्र से, या बग़ैर उज्र के, दरमियान कोई रोज़ा छोड़ा जाए. अगर ऐसा हुआ तो नए सिरे से रोज़े रखने पड़ेंगे.

पहले इसके कि एक दूसरे को हाथ लगाएं(14)
(14) यानी रोज़ों से जो कफ़्फ़ारा दिया जाए उसका भी हमबिस्तरी से पहले होना ज़रूरी है और जब तक वो रोज़े पूरे हों, शौहर बीबी में से किसी को हाथ न लगाए.

फिर जिस से रोज़े भी न हो सकें(15)
(15)यानी उसे रोज़े रखने की ताक़त ही न हो, बुढ़ापे या बीमारी के कारण, या रोज़े तो रख सकता हो मगर लगातार एक के बाद एक न रख सकता हो.

तो साठ मिस्कीनों (फ़क़ीरों) का पेट भरना(16)
(16) यानी साठ मिस्कीनों का ख़ाना देना और यह इस तरह कि हर मिस्कीन को निस्फ़ साअ गेँहू या एक साअ ख़जूर या जौ दे और अगर मिस्कीनों को उसकी क़ीमत दी या सुब्ह शाम दोनो समय उन्हें पेट भर खाना खिला दिया तब भी जायज़ है. इस कफ़्फ़ारे में यह शर्त नहीं कि एक दूसरे को हाथ लगाने से पहले हो, यहाँ तक कि अगर खाना खिलाने के बीच में शौहर और बीबी में क़ुर्बत वाक़े हुई तो नया कफ़्फ़ारा देना लाज़िम न होगा.

यह इसलिये कि तुम अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान रखो(17)
(17)और ख़ुदा और रसूल की फ़रमाँबरदारी करो और जिहालत के तरीक़े को छोड़ दो.

और ये अल्लाह की हदें हैं (18)
(18) उनको तोड़ना और उनसे आगे बढ़ना जायज़ नहीं.

और काफ़िरों के लिये दर्दनाक अज़ाब है {4} बेशक वो जो मुख़ालिफ़त करते हैं अल्लाह और उसके रसूल की, ज़लील किये गए जैसे उनसे अगलों को ज़िल्लत दी गई(19)
(19) रसूलों की मुख़ालिफ़त करने के कारण.

और बेशक हमने रौशन आयतें उतारीं(20)
(20)रसूलों की सच्चाई को प्रमाणित करने वाली.

और काफ़िरों के लिये ख़्वारी का अज़ाब है {5} जिस दिन अल्लाह उन सबको उठाएगा(21)
(21) किसी एक को बाक़ी न छोड़ेगा.

फिर उन्हें उनके कौतुक जता देगा(22)
(22) रूस्वा और शर्मिन्दा करने के लिये.

अल्लाह ने उन्हें गिन रखा है और वो भूल गए(23) और हर चीज़ अल्लाह के सामने है{6}
(23) अपने कर्म जो दुनिया में करते थे.

58-Surah Al-Mujadalah

58 सूरए मुजादलह -दूसरा रूकू

58|7|أَلَمْ تَرَ أَنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۖ مَا يَكُونُ مِن نَّجْوَىٰ ثَلَاثَةٍ إِلَّا هُوَ رَابِعُهُمْ وَلَا خَمْسَةٍ إِلَّا هُوَ سَادِسُهُمْ وَلَا أَدْنَىٰ مِن ذَٰلِكَ وَلَا أَكْثَرَ إِلَّا هُوَ مَعَهُمْ أَيْنَ مَا كَانُوا ۖ ثُمَّ يُنَبِّئُهُم بِمَا عَمِلُوا يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۚ إِنَّ اللَّهَ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ
58|8|أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ نُهُوا عَنِ النَّجْوَىٰ ثُمَّ يَعُودُونَ لِمَا نُهُوا عَنْهُ وَيَتَنَاجَوْنَ بِالْإِثْمِ وَالْعُدْوَانِ وَمَعْصِيَتِ الرَّسُولِ وَإِذَا جَاءُوكَ حَيَّوْكَ بِمَا لَمْ يُحَيِّكَ بِهِ اللَّهُ وَيَقُولُونَ فِي أَنفُسِهِمْ لَوْلَا يُعَذِّبُنَا اللَّهُ بِمَا نَقُولُ ۚ حَسْبُهُمْ جَهَنَّمُ يَصْلَوْنَهَا ۖ فَبِئْسَ الْمَصِيرُ
58|9|يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا تَنَاجَيْتُمْ فَلَا تَتَنَاجَوْا بِالْإِثْمِ وَالْعُدْوَانِ وَمَعْصِيَتِ الرَّسُولِ وَتَنَاجَوْا بِالْبِرِّ وَالتَّقْوَىٰ ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ الَّذِي إِلَيْهِ تُحْشَرُونَ
58|10|إِنَّمَا النَّجْوَىٰ مِنَ الشَّيْطَانِ لِيَحْزُنَ الَّذِينَ آمَنُوا وَلَيْسَ بِضَارِّهِمْ شَيْئًا إِلَّا بِإِذْنِ اللَّهِ ۚ وَعَلَى اللَّهِ فَلْيَتَوَكَّلِ الْمُؤْمِنُونَ
58|11|يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا قِيلَ لَكُمْ تَفَسَّحُوا فِي الْمَجَالِسِ فَافْسَحُوا يَفْسَحِ اللَّهُ لَكُمْ ۖ وَإِذَا قِيلَ انشُزُوا فَانشُزُوا يَرْفَعِ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا مِنكُمْ وَالَّذِينَ أُوتُوا الْعِلْمَ دَرَجَاتٍ ۚ وَاللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرٌ
58|12|يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِذَا نَاجَيْتُمُ الرَّسُولَ فَقَدِّمُوا بَيْنَ يَدَيْ نَجْوَاكُمْ صَدَقَةً ۚ ذَٰلِكَ خَيْرٌ لَّكُمْ وَأَطْهَرُ ۚ فَإِن لَّمْ تَجِدُوا فَإِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
58|13|أَأَشْفَقْتُمْ أَن تُقَدِّمُوا بَيْنَ يَدَيْ نَجْوَاكُمْ صَدَقَاتٍ ۚ فَإِذْ لَمْ تَفْعَلُوا وَتَابَ اللَّهُ عَلَيْكُمْ فَأَقِيمُوا الصَّلَاةَ وَآتُوا الزَّكَاةَ وَأَطِيعُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ ۚ وَاللَّهُ خَبِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ

ऐ सुनने वाले क्या तूने न देखा कि अल्लाह जानता है जो कुछ आसमानों में हैं और जो कुछ ज़मीन में है और जो कुछ ज़मीन में(1)
(1) उससे कुछ छुपा नहीं.

जहाँ कहीं तीन लोगों की कानाफूसी हो(2)
(2) और अपने राज़ आपस में कानों में कहें और अपनी बात चीत पर किसी को सूचित न होने दें.

तो चौथा वह मौजूद है (3)
(3) यानी अल्लाह तआला उन्हें देखता है, उनके राज़ जानता है.

और पाँच की(4)
(4) कानाफूसी हो.

तो छटा वह (5)
(5) यानी अल्लाह तआला.

और न उससे कम(6)
(6) यानी पाँच और तीन से.

और न उससे ज़्यादा की मगर यह कि वह उनके साथ है(7)
(7) अपने इल्म और क़ुदरत से.

जहाँ कहीं हों, फिर उन्हें क़यामत के दिन बता देगा जो कुछ उन्होंने किया, बेशक अल्लाह सब कुछ जानता है {7} क्या तुम ने उन्हें न देखा जिन्हें बुरी मशविरत से मना फ़रमाया गया था फिर वही करते हैं (8)
(8) यह अल्लाह यहूदियों और दोहरी प्रवृत्ति वाले मुनाफ़ि क़ों के बारे में उतरी. वो आपस में काना फूसी करते और मुसलमानों की तरफ़ देखते जाते और आँखों से उनकी तरफ़ इशारे करते जाते ताकि मुसलमान समझें कि उनके ख़िलाफ़ कोई छुपी बात है और इससे उन्हें दुख हो. उनकी इस हरकत से मुसलमानों को दुख होता था और वो कहते थे कि शायद इन लोगों को हमारे उन भाइयों की निस्बत क़त्ल या हार की कोई ख़बर पहुंची जो जिहाद में गए हैं और ये उसी के बारे में बाते बनाते और इशारे करते हैं. जब मुनाफ़ि क़ों की ये हरकतें ज़्यादा हो गई और मुसलमानों ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के हुज़ूर में इसकी शि कायतें कीं तो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने कानाफ़ूसी करने वालों को मना फ़रमाया लेकिन वो नहीं माने और यह हरकत करते ही रहे इसपर यह आयत उतरी.

जिसकी मुमानियत हुई थी और आपस में गुनाह और हद से बढ़ने (9)
(9)गुनाह और हद से बढ़ना यह कि मक्कारी के साथ कानाफूसी करके मुसलमानों को दुख में डालते हैं.

और रसूल की नाफ़रमानी के मशविरे करते हैं (10)
(10) और रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नाफ़रमानरी यह कि मना करने के बाद भी बाज़ नहीं आते और यह भी कहा गया कि उनमें एक दूसरे को राय देते थे कि रसूल की नाफ़रमानी करो.

और जब तुम्हारे हुज़ूर हाज़िर होते हैं तो उन लफ़्ज़ों से तुम्हें मुजरा करते हैं जो लफ़्ज़ अल्लाह ने तुम्हारे एज़ाज़ में न कहे(11)
(11) यहूदी नबीये अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के पास आते तो अस्सामो अलैका (तुमपर मौत हो) कहते साम मौत को कहते हैं. नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उनके जवाब में अलैकुम(और तुम पर भी) फ़रमा देते.

और अपने दिलों में कहते हैं हमें अल्लाह अज़ाब क्यों नहीं करता हमारे इस कहने पर(12)
(12) इससे उनकी मुराद यह थी कि अगर हुज़ूर नबी होते तो हमारी इस गुस्ताख़ी पर अल्लाह तआला हमें अज़ाब करता, अल्लाह तआला फ़रमाता है.

उन्हें जहन्नम बस है, उसमें धंसेंगे तो क्या ही बुरा अंजाम {8} ऐ ईमान वालों तुम जब आपस में मशविरत (परामर्श) करो तो गुनाह और हद से बढ़ने और रसूल की नाफ़रमानी की मशविरत न करो(13)
(13) और जो तरीक़ा यहूदियों और मुनाफ़ि क़ों का है उससे बचो.

और नेकी और परहेज़गारी की मशविरत करो, और अल्लाह से डरो जिसकी तरफ़ उठाए जाओगे {9} वह मशविरत तो शैतान ही की तरफ़ से है(14)
(14) जिसमें गुनाह और हद से बढ़ना और रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की नाफ़रमानी हो और शैतान अपने दोस्तों को उस पर उभारता है.

इसलिये कि ईमान वालों को रंज दे और वह उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकता ख़ुदा के हुक्म के बिना और मुसलमानों को अल्लाह ही पर भरोसा चाहिये(15) {10}
(15) कि अल्लाह पर भरोसा करने वाला टोटे में नहीं रहता.

ऐ ईमान वालों! जब तुमसे कहा जाए मजलिसों में जगह दो तो जगह दो, अल्लाह तुम्हें जगह देगा(16)
(16) नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम बद्र में हाज़िर होने वाले सहाबा की इज़्ज़त करते थे. एक रोज़ चन्द बद्री सहाबा ऐसे वक़्त पहुंचे जबकि मजलिस शरीफ़ भर चुकी थी, उन्होंने हुज़ूर के सामने खड़े होकर सलाम अर्ज़ किया हुज़ूर ने जवाब दिया. फिर उन्होंने हाज़िरीन को सलाम किया उन्होंने जवाब दिया फिर वो इस इन्तिज़ार में खड़े रहे कि उनके लिये मजलिस शरीफ़ में जगह की जाए मगर किसी ने जगह न दी. यह सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे को बुरा लगा तो हुज़ूर ने अपने क़रीब बैठने वालों को उठाकर उनके लिये जगह की. उठने वालों को उठना अच्छा नहीं लगा इसपर यह आयत उतरी.

और जब कहा जाए उठ खड़े हो तो उठ खड़े हो(17)
(17) नमाज़ के या जिहाद के या और किसी नेक काम के लिये और इसी में ज़ि क्रे रसूल की ताज़ीम के लिये खड़ा होना.

अल्लाह तुम्हारे ईमान वालों के और उनके जिनको इल्म दिया गया (18)
(18) अल्लाह और उसके रसूल की फ़रमाँबरदारी के कारण.

दर्जे बलन्द फ़रमाएगा, और अल्लाह को तुम्हारे कामों की ख़बर है{11} ऐ ईमान वालो! जब तुम रसूल से कोई बात आहिस्ता अर्ज़ करना चाहो तो अपने अर्ज़ से पहले कुछ सदक़ा दे लो(19)
(19) कि उसमें रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की बारगाह में हाज़िरी की ताज़ीम और फ़क़ीरों का नफ़ा है. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की बारगाह में जब मालदारों ने अर्ज़ मअरूज़ का सिलसिला दराज़ किया और नौबत यहाँ तक पहुंची कि फ़क़ीरों को अपनी अर्ज़ पेश करने का मौक़ा कम मिलने लगा, तो अर्ज़ पेश करने वालों को अर्ज़ पेश करने से पहले सदक़ा देने का हुक्म दिया गया और इस हुक्म पर हज़रत अली मुर्तज़ा रदियल्लाहो अन्हो ने अमल किया और एक दीनार सदक़ा करके दस मसअले दरियाफ़्त किये अर्ज़ किया या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम वफ़ा क्या है? फ़रमाया, तौहीद और तौहीद की शहादत देना, अर्ज़ किया, फ़साद क्या है? फ़रमाया, कुफ़्र और शिर्क. अर्ज़ किया, हक क्या है? फ़रमाया, इस्लाम और क़ुरआन और विलायत, जब तुझे मिले. अर्ज़ किया, हीला क्या है? यानी तदबीर? फ़रमाया, तर्के हीला. अर्ज़ किया, मुझ पर क्या लाज़िम है? फ़रमाया, अल्लाह तआला और उसके रसूल की फ़रमाँबरदारी. अर्ज़ किया, अल्लाह तआला से दुआ कैसे माँगू? फ़रमाया, सच्चाई और यक़ीन के साथ, अर्ज़ किया, क्या माँगू? फ़रमाया, आक़िबत. अर्ज़ किया, अपनी निजात के लिये क्या करूं? फ़रमाया, हलाल खा और सच बोल. अर्ज़ किया, सुरूर क्या है? फ़रमाया, जन्नत, अर्ज़ किया, राहत क्या है? फ़रमाया, अल्लाह का दीदार. जब अली मुर्तज़ा रदियल्लाहो अन्हो इन सवालों के जवाब से फ़ारिग़ हो गए तो यह हुक्म मन्सूख़ हो गया और रूख़सत नाज़िल हुई और हज़रत अली के सिवा और किसी को इसपर अमल करने का वक़्त नहीं मिला. (मदारिक व ख़ाज़िन) हज़रत इमाम अहमद रज़ा ने फ़रमाया, यह इसकी अस्ल है जो औलिया की मज़ारात पर तस्दीक़ के लिये शीरीनी ले जाते हैं.

यह तुम्हारे लिये बहुत बेहतर और बहुत सुथरा है, फिर अगर तुम्हें मक़दूर न हो तो अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है {12} क्या तुम इससे डरे कि तुम अपनी अर्ज़ से पहले कुछ सदक़ा दो(20)
(20) अपनी ग़रीबी और नादारी के कारण.

फिर जब तुमने यह न किया और अल्लाह ने अपनी कृपा से तुम पर तवज्जुह फ़रमाई(21)
(21) और सदक़े की पहल छोड़ने की पकड़ तुम पर से उठाली और तुमको इख़्तियार दे दिया.

तो नमाज़ क़ायम रखो और ज़कात दो और अल्लाह और उसके रसूल के फ़रमाँबरदार रहो, और अल्लाह तुम्हारे कामों को जानता है {13}

58-Surah Al-Mujadalah

58 सूरए मुजादलह -तीसरा रूकू

58|14|۞ أَلَمْ تَرَ إِلَى الَّذِينَ تَوَلَّوْا قَوْمًا غَضِبَ اللَّهُ عَلَيْهِم مَّا هُم مِّنكُمْ وَلَا مِنْهُمْ وَيَحْلِفُونَ عَلَى الْكَذِبِ وَهُمْ يَعْلَمُونَ
58|15|أَعَدَّ اللَّهُ لَهُمْ عَذَابًا شَدِيدًا ۖ إِنَّهُمْ سَاءَ مَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
58|16|اتَّخَذُوا أَيْمَانَهُمْ جُنَّةً فَصَدُّوا عَن سَبِيلِ اللَّهِ فَلَهُمْ عَذَابٌ مُّهِينٌ
58|17|لَّن تُغْنِيَ عَنْهُمْ أَمْوَالُهُمْ وَلَا أَوْلَادُهُم مِّنَ اللَّهِ شَيْئًا ۚ أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ النَّارِ ۖ هُمْ فِيهَا خَالِدُونَ
58|18|يَوْمَ يَبْعَثُهُمُ اللَّهُ جَمِيعًا فَيَحْلِفُونَ لَهُ كَمَا يَحْلِفُونَ لَكُمْ ۖ وَيَحْسَبُونَ أَنَّهُمْ عَلَىٰ شَيْءٍ ۚ أَلَا إِنَّهُمْ هُمُ الْكَاذِبُونَ
58|19|اسْتَحْوَذَ عَلَيْهِمُ الشَّيْطَانُ فَأَنسَاهُمْ ذِكْرَ اللَّهِ ۚ أُولَٰئِكَ حِزْبُ الشَّيْطَانِ ۚ أَلَا إِنَّ حِزْبَ الشَّيْطَانِ هُمُ الْخَاسِرُونَ
58|20|إِنَّ الَّذِينَ يُحَادُّونَ اللَّهَ وَرَسُولَهُ أُولَٰئِكَ فِي الْأَذَلِّينَ
58|21|كَتَبَ اللَّهُ لَأَغْلِبَنَّ أَنَا وَرُسُلِي ۚ إِنَّ اللَّهَ قَوِيٌّ عَزِيزٌ
58|22|لَّا تَجِدُ قَوْمًا يُؤْمِنُونَ بِاللَّهِ وَالْيَوْمِ الْآخِرِ يُوَادُّونَ مَنْ حَادَّ اللَّهَ وَرَسُولَهُ وَلَوْ كَانُوا آبَاءَهُمْ أَوْ أَبْنَاءَهُمْ أَوْ إِخْوَانَهُمْ أَوْ عَشِيرَتَهُمْ ۚ أُولَٰئِكَ كَتَبَ فِي قُلُوبِهِمُ الْإِيمَانَ وَأَيَّدَهُم بِرُوحٍ مِّنْهُ ۖ وَيُدْخِلُهُمْ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا ۚ رَضِيَ اللَّهُ عَنْهُمْ وَرَضُوا عَنْهُ ۚ أُولَٰئِكَ حِزْبُ اللَّهِ ۚ أَلَا إِنَّ حِزْبَ اللَّهِ هُمُ الْمُفْلِحُونَ

क्या तुमने उन्हें न देखा जो ऐसों के दोस्त हुए जिन पर अल्लाह का ग़ज़ब है(1)
(1) जिन लोगों पर अल्लाह तआला का ग़ज़ब है उनसे मुराद यहूदी है और उनसे दोस्ती करने वाले मुनाफ़िक़. यह आयत मुनाफ़िक़ों के बारे में उतरी जिन्होंने यहूदियों से दोस्ती की और उनकी ख़ैर ख़्वाही में लगे रहते और मुसलमानों के राज़ उनसे कहते.

वो न तुम से न उनसे(2)
(2) यानी न मुसलमान न यहूदी बल्कि मुनाफ़िक़ हैं बीच में लटके हुए.

वो जानकर झूटी क़सम खाते हैं(3){14}
(3) यह आयत अब्दुल्लाह बिन नबतल मुनाफ़िक़ के बारे में उतरी जो रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की मजलिस में हाज़िर रहता यहाँ की बात यहूदियों के पास पहुंचाता. एक दिन हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम दौलत सराय अक़दस में तशरीफ़ फ़रमा थे. हुज़ूर ने फ़रमाया इस वक़्त एक आदमी आएगा जिसका दिल निहायत सख़्त और शैतान की आँखों से देखता है. थोड़ी ही देर बाद अब्दुल्लाह बिन नबतल आया उसकी आख़ें नीली थीं. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उससे फ़रमाया तू और तेरे साथी हमें क्यों गालियाँ देते हैं. वह क़सम खा गया कि ऐसा नहीं करता. और अपने यारों को ले आया उन्होंने भी क़सम खाई कि हमने आपको गाली नहीं दी. इस पर यह आयत उतरी.

अल्लाह ने उनके लिये सख़्त अज़ाब तैयार कर रखा है, बेशक वो बहुत ही बुरे काम करते हैं{15} उन्होंने अपनी क़समों को(4)
(4) जो झूटी है.

ढाल बना लिया है (5)
(5) कि अपना जान माल मेहफ़ूज़ रहे.

तो अल्लाह की राह से रोका(6)
(6) यानी मुनाफ़िक़ों ने अपनी इस हीला साज़ी से लोगों को जिहाद से रोका और कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा कि मानी यह हैं कि लोगों को इस्लाम में दाख़िल होने से रोका.

तो उनके लिये ख़्वारी का अज़ाब है(7){16}
(7) आख़िरत में.

उनके माल और उनकी औलाद अल्लाह के सामने उन्हें कुछ काम न देंगे(8)
(8) और क़यामत के दिन उन्हें अल्लाह के अज़ाब से न बचा सकेंगे.

वो दोज़ख़ी हैं, उन्हें उसमें हमेशा रहना {17} जिस दिन अल्लाह उन सब को उठाएगा तो उसके हुज़ूर भी ऐसे ही क़समें खाएंगे जैसे तुम्हारे सामने खा रहे हैं(9)
(9) कि दुनिया में मूमिन मुख़लिस थे.

और वो यह समझते हैं कि उन्होंने कुछ किया(10)
(10) यानी वो अपनी उन झूटी क़स्मों को कारआमद समझते हैं.

सुनते हो बेशक वही झूठे हैं(11) {18}
(11) अपनी क़स्मों में और ऐसे झूटे कि दुनिया में भी झूट बोलते रहे और आख़िरत में भी रसूल के सामने भी और ख़ुदा के सामने भी.

उन पर शैतान ग़ालिब आ गया तो उन्हें अल्लाह की याद भुलादी, वो शैतान के गिरोह हें, सुनता है बेशक शैतान ही का गिरोह हार में है(12) {19}
(12) कि जन्नत की हमेशा की नेअमतों से मेहरूम और जहन्नम के अबदी अज़ाब में गिरफ़्तार.

बेशक वो जो अल्लाह और उसके रसूल की मुख़ालिफ़त करते हैं, वो सबसे ज़्यादा ज़लीलों में हैं{20} अल्लाह लिख चुका (13)
(13) लौहे मेहफ़ूज़ में.

कि ज़रूर मैं ग़ालिब आऊंगा और मेरे रसूल (14)
(14) हुज्जत के साथ या तलवार के साथ.

बेशक अल्लाह क़ुव्वत वाला इज़्ज़त वाला है {21} तुम न पाओगे उन लोगों को जो यक़ीन रखते हैं अल्लाह और पिछले दिन पर कि दोस्ती करें उनसे जिन्हों ने अल्लाह और उसके रसूल से मुख़ालिफ़त की(15)
(15) यानी मूमिनों से यह हो ही नहीं सकता और उनकी यह शान ही नहीं और ईमान इसको गवारा ही नहीं करता कि ख़ुदा और रसूल के दुश्मन से दोस्ती करे. इस आयत से मालूम हुआ कि बददीनों और बदमज़हबों और ख़ुदा और रसूल की शान में गुस्ताख़ी और बेअदबी करने वालों से ताल्लुक़ात और मेलजोल जायज़ नहीं.

अगरचे वो उनके बाप या बेटे या भाई या कुंबे वाले हों(16)
(16) चुनांन्वे हज़रत अबूउबैदह बिन जर्राह ने उहुद की जंग में अपने बाप जर्राह को क़त्ल किया और हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो ने बद्र के दिन अपने बेटे अब्दुर्रहमान को लड़ने के लिये पुकारा लेकिन रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उन्हें इस जंग की इजाज़त न दी और मुसअब बिन उमैर ने अपने भाई अब्दुल्लाह बिन उमैर को क़त्ल किया और हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने अपने मामूँ आस बिन हिशाम बिन मुग़ीरह को बद्र के दिन क़त्ल किया और हज़रत अली बिन अबी तालिब व हमज़ा व अबू उबैदह ने रबीआ के बेटों उतबह और शैबह को और वलीद बिन उतबह को बद्र में क़त्ल किया जो उनके रिश्तेदार थे. ख़ुदा और रसूल पर ईमान लाने वालों को रिश्तेदारी का क्या लिहाज़.

ये हैं जिनके दिलों में अल्लाह ने ईमान नक़्श फ़रमा दिया और अपनी तरफ़ की रूह से उनकी मदद की(17)
(17) इस रूह से या अल्लाह की मदद मुराद है या ईमान या क़ुरआन या जिब्रईल या अल्लाह की रहमत या नूर.

और उन्हें बाग़ों में ले जाएगा जिनके नीचे नेहरें बहें उनमें हमेशा रहें, अल्लाह उनसे राज़ी (18)
(18) उनके ईमान, इख़लास और फ़रमाँबरदारी के कारण.

और वो अल्लाह से राज़ी (19)
(19) उसके रहमत और करम से.
यह अल्लाह की जमाअत है सुनता है अल्लाह ही की जमाअत कामयाब है{22}