57-Surah Al-Hadeed

57 सूरए हदीद -चौथा रूकू

57|26|وَلَقَدْ أَرْسَلْنَا نُوحًا وَإِبْرَاهِيمَ وَجَعَلْنَا فِي ذُرِّيَّتِهِمَا النُّبُوَّةَ وَالْكِتَابَ ۖ فَمِنْهُم مُّهْتَدٍ ۖ وَكَثِيرٌ مِّنْهُمْ فَاسِقُونَ
57|27|ثُمَّ قَفَّيْنَا عَلَىٰ آثَارِهِم بِرُسُلِنَا وَقَفَّيْنَا بِعِيسَى ابْنِ مَرْيَمَ وَآتَيْنَاهُ الْإِنجِيلَ وَجَعَلْنَا فِي قُلُوبِ الَّذِينَ اتَّبَعُوهُ رَأْفَةً وَرَحْمَةً وَرَهْبَانِيَّةً ابْتَدَعُوهَا مَا كَتَبْنَاهَا عَلَيْهِمْ إِلَّا ابْتِغَاءَ رِضْوَانِ اللَّهِ فَمَا رَعَوْهَا حَقَّ رِعَايَتِهَا ۖ فَآتَيْنَا الَّذِينَ آمَنُوا مِنْهُمْ أَجْرَهُمْ ۖ وَكَثِيرٌ مِّنْهُمْ فَاسِقُونَ
57|28|يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اتَّقُوا اللَّهَ وَآمِنُوا بِرَسُولِهِ يُؤْتِكُمْ كِفْلَيْنِ مِن رَّحْمَتِهِ وَيَجْعَل لَّكُمْ نُورًا تَمْشُونَ بِهِ وَيَغْفِرْ لَكُمْ ۚ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
57|29|لِّئَلَّا يَعْلَمَ أَهْلُ الْكِتَابِ أَلَّا يَقْدِرُونَ عَلَىٰ شَيْءٍ مِّن فَضْلِ اللَّهِ ۙ وَأَنَّ الْفَضْلَ بِيَدِ اللَّهِ يُؤْتِيهِ مَن يَشَاءُ ۚ وَاللَّهُ ذُو الْفَضْلِ الْعَظِيمِ

और बेशक हमने नूह और इब्राहीम को भेजा और उनकी औलाद में नबुव्वत और किताब रखी(1)
(1) यानी तौरात व इंजील और ज़ुबूर और क़ुरआन.

तो उनमें(2)
(2) यानी उनकी सन्तान में जिनमें नबी और किताबें भेजीं.

कोई राह पर आया, और उनमें बहुतेरे फ़ासिक़ हैं {26} फिर हमने उनके पीछे(3)
(3) यानी हज़रत नूह और इब्राहीम अलैहिस्सलाम के बाद हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के ज़माने तक एक के बाद दूसरा.

उसी राह पर अपने रसूल भेजे और उनके पीछे मरयम के बेटे ईसा को भेजा और उसे इन्जील अता फ़रमाई और उसके अनुयाइयों के दिल में नर्मी और रहमत रखी (4)
(4) कि वो आपस में एक दूसरे के साथ महब्बत और शफ़क़त रखते.

और राहिब बनना (5)
(5) पहाड़ों और ग़ारों और अकेले मकानों में एकान्त में बैठना और दुनिया वालों से रिश्ते तोड़ लेना और इबादतों में अपने ऊपर अतिरिक्त मेहनतें बढ़ा लेना, सन्यासी हो जाना, निकाह न करना, खुरदुरे कपड़े पहन्ना, साधारण ग़िज़ा निहायत कम मात्रा में खाना.

तो यह बात उन्होंने दीन में अपनी तरफ़ से निकाली हमने उनपर मुक़र्रर न की थी हाँ यह बिदअत उन्होंने अल्लाह की रज़ा चाहने को पैदा की फिर उसे न निबाहा, जैसा उसके निबाहने का हक़ था(6)
(6) बल्कि उसको ज़ाया कर दिया और त्रिमूर्ति और इल्हाद में गिरफ़तार हुए और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के दीन से मुंह फेर कर अपने बादशाहों के दीन में दाख़िल हुए और कुछ लोग उनमें से मसीही दीन पर क़ायम और साबित भी रहे और हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के मुबारक ज़माने को पाया तो हुज़ूर पर ईमान भी लाए. इस आयत से मालूम हुआ कि बिदअत यानी दीन में किसी नई बात का निकालना, अगर वह बात नेक हो और उससे अल्लाह की रज़ा मक़सूद हो, तो बेहतर है, उस पर सवाब मिलता है और उसको जारी रखना चाहिये. ऐसी बिदअत को बिदअते हसना कहते हैं अलबत्ता दीन में बुरी बात निकालना बिदअते सैइय्या कहलाता है और वह ममनूअ और नाजायज़ है. और बिदअते सैइय्या हदीस शरीफ़ में वह बताई गई है जो सुन्नत के खिलाफ़ हो उसके निकालने से कोई सुन्नत उठ जाए. इससे हज़ारों मसअलों का फ़ैसला हो जाता है. जिनमें आजकल लोग इख़्तिलाफ़ करते हैं और अपनी हवाए नफ़्सानी से ऐसे भले कामों को बिदअत बताकर मना करते हैं जिनसे दीन की तक़वियत और ताईद होती है और मुसलमानों को आख़िरत के फ़ायदे पहुंचते हैं और वो ताअतों और इबादतों में ज़ौक़ और शौक़ से मश्ग़ूल रहते हैं. ऐसे कामों को बिदअत बताना क़ुरआन मजीद की इस आयत के ख़िलाफ़ है.

तो उनके ईमान वालों को(7)
(7) जो दीन पर क़ायम रहे थे.

हमने उनका सवाब अता किया, और उनमें से बहुतेरे(8)
(8) जिन्होंने सन्यास को छोड़ दिया और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के दीन से कट गए.

फ़ासिक़ हैं {27} ऐ ईमान वालो(9)
(9) हज़रत मूसा और ईसा अलैहिस्सलाम पर. यह ख़िताब किताब वालों को है उनसे फ़रमाया जाता है.

अल्लाह से डरो और उसके रसूल (10)
(10) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम

पर ईमान लाओ वह अपनी रहमत के दो हिस्से तुम्हें अता फ़रमाएगा(11)
(11) यानी तुम्हें दुगना अज्र देगा क्योंकि तुम पहली किताब और पहले नबी पर ईमान लाए और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और क़ुरआने पाक पर भी.

और तुम्हारे लिये नूर कर देगा(12)
(12) सिरात पर.

जिसमें चलो और तुम्हें बख़्श देगा, और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है {28} यह इसलिये कि किताब वाले काफ़िर जान जाएं कि अल्लाह के फ़ज़्ल पर उनका कुछ क़ाबू नहीं(13)और यह कि फ़ज़्ल अल्लाह के हाथ है देता है जिसे चाहे, और अल्लाह बड़े फ़ज़्ल वाला है{29}
(13)वो उसमें से कुछ नहीं पा सकते न दुगना अज्र, व नूर, मग़फ़िरत, क्योंकि वो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान न लाए तो उनका पहले नबियों पर ईमान लाना भी लाभदायक न होगा. जब ऊपर की आयत उतरी और उसमें किताब वालों के मूमिनों को सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के ऊपर ईमान लाने पर दुगने अज्र का वादा दिया गया तो एहले किताब के काफ़िरों ने कहा कि अगर हम हुज़ूर पर ईमान लाएं तो दुगना अज्र मिले और न लाएं तो एक अज्र तब भी रहेगा. इस पर यह आयत उतरी और उनके इस ख़याल को ग़लत क़रार दिया गया.

पारा सत्ताईस समाप्त

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