57-Surah Al-Hadeed

57 सूरए हदीद -दूसरा रूकू

57|11|مَّن ذَا الَّذِي يُقْرِضُ اللَّهَ قَرْضًا حَسَنًا فَيُضَاعِفَهُ لَهُ وَلَهُ أَجْرٌ كَرِيمٌ
57|12|يَوْمَ تَرَى الْمُؤْمِنِينَ وَالْمُؤْمِنَاتِ يَسْعَىٰ نُورُهُم بَيْنَ أَيْدِيهِمْ وَبِأَيْمَانِهِم بُشْرَاكُمُ الْيَوْمَ جَنَّاتٌ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ خَالِدِينَ فِيهَا ۚ ذَٰلِكَ هُوَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ
57|13|يَوْمَ يَقُولُ الْمُنَافِقُونَ وَالْمُنَافِقَاتُ لِلَّذِينَ آمَنُوا انظُرُونَا نَقْتَبِسْ مِن نُّورِكُمْ قِيلَ ارْجِعُوا وَرَاءَكُمْ فَالْتَمِسُوا نُورًا فَضُرِبَ بَيْنَهُم بِسُورٍ لَّهُ بَابٌ بَاطِنُهُ فِيهِ الرَّحْمَةُ وَظَاهِرُهُ مِن قِبَلِهِ الْعَذَابُ
57|14|يُنَادُونَهُمْ أَلَمْ نَكُن مَّعَكُمْ ۖ قَالُوا بَلَىٰ وَلَٰكِنَّكُمْ فَتَنتُمْ أَنفُسَكُمْ وَتَرَبَّصْتُمْ وَارْتَبْتُمْ وَغَرَّتْكُمُ الْأَمَانِيُّ حَتَّىٰ جَاءَ أَمْرُ اللَّهِ وَغَرَّكُم بِاللَّهِ الْغَرُورُ
57|15|فَالْيَوْمَ لَا يُؤْخَذُ مِنكُمْ فِدْيَةٌ وَلَا مِنَ الَّذِينَ كَفَرُوا ۚ مَأْوَاكُمُ النَّارُ ۖ هِيَ مَوْلَاكُمْ ۖ وَبِئْسَ الْمَصِيرُ
57|16|۞ أَلَمْ يَأْنِ لِلَّذِينَ آمَنُوا أَن تَخْشَعَ قُلُوبُهُمْ لِذِكْرِ اللَّهِ وَمَا نَزَلَ مِنَ الْحَقِّ وَلَا يَكُونُوا كَالَّذِينَ أُوتُوا الْكِتَابَ مِن قَبْلُ فَطَالَ عَلَيْهِمُ الْأَمَدُ فَقَسَتْ قُلُوبُهُمْ ۖ وَكَثِيرٌ مِّنْهُمْ فَاسِقُونَ
57|17|اعْلَمُوا أَنَّ اللَّهَ يُحْيِي الْأَرْضَ بَعْدَ مَوْتِهَا ۚ قَدْ بَيَّنَّا لَكُمُ الْآيَاتِ لَعَلَّكُمْ تَعْقِلُونَ
57|18|إِنَّ الْمُصَّدِّقِينَ وَالْمُصَّدِّقَاتِ وَأَقْرَضُوا اللَّهَ قَرْضًا حَسَنًا يُضَاعَفُ لَهُمْ وَلَهُمْ أَجْرٌ كَرِيمٌ
57|19|وَالَّذِينَ آمَنُوا بِاللَّهِ وَرُسُلِهِ أُولَٰئِكَ هُمُ الصِّدِّيقُونَ ۖ وَالشُّهَدَاءُ عِندَ رَبِّهِمْ لَهُمْ أَجْرُهُمْ وَنُورُهُمْ ۖ وَالَّذِينَ كَفَرُوا وَكَذَّبُوا بِآيَاتِنَا أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ الْجَحِيمِ

कौन है जो अल्लाह को क़र्ज़ दे अच्छा क़र्ज़(1)
(1) यानी ख़ुशदिली के साथ ख़ुदा की राह में ख़र्च करे. इस ख़र्च को इस मुनासिबत से फ़र्ज़ फ़रमाया गया है कि इसपर जन्नत का वादा फ़रमाया गया है.

तो वह उस के लिये दूने करे और उसको इज़्ज़त का सवाब है{11} जिस दिन तुम ईमान वाले मर्दों और ईमान वाली औरतों को(2)
(2) पुले सिरात पर.

देखोगे कि उनका नूर है 3)
(3) यानी उनके ईमान और ताअत का नूर.

उनके आगे और उनके दाएं दौड़ता है (4)
(4) और जन्नत की तरफ़ उनका मार्गदर्शन करता है.

उनसे फ़रमाया जा रहा है कि आज तुम्हारी सब से ज़्यादा ख़ुशी की बात वो जन्नतें हैं जिनके नीचे नेहरें बहें, तुम उनमें हमेशा रहो यही बड़ी कामयाबी है {12} जिस दिन मुनाफ़िक़ (दोग़ले) मर्द और मुनाफ़िक़ औरतें मुसलमानों से कहेंगे कि हमें एक निगाह देखो कि हम तुम्हारे नूर से कुछ हिस्सा लें, कहा जाएगा अपने पीछे लौटो (5)
(5) जहाँ से आए थे यानी हश्र के मैदान की तरफ़ जहाँ हमें नूर दिया गया वहाँ नूर तलब करो या ये मानी हैं कि तुम हमारा नूर नहीं पा सकते, नूर की तलब के लिये पीछे लौट जाओ फिर वो नूर की तलाश में वापस होंगे और कुछ न पाएंगे तो दोबारा मूमिनीन की तरफ़ फिरेंगे.

वहाँ नूर ढूंढो वो लौटेंगे, जभी उनके (6)
(6) यानी मूमिनीन और मुनाफ़िक़ीन के.

बीच दीवार खड़ी कर दी जाएगी(7)
(7) कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा कि वही अअराफ़ है.

जिसमें एक दरवाज़ा है(8)
(8) उससे जन्नती जन्नत में दाख़िल होंगे.

उसके अन्दर की तरफ़ रहमत (9)
(9) यानी उस दीवार के अन्दूरूनी जानिब जन्नत.

और उसके बाहर की तरफ़ अज़ाब {13} मुनाफ़िक़ (10)
(10) उस दीवार के पीछे से.

मुसलमानों को पुकारेंगे क्या हम तुम्हारे साथ न थे(11)
(11) दुनिया में नमाज़ें पढ़ते, रोज़ा रखते.

वो कहेंगे क्यों नहीं मगर तुमने तो अपनी जानें फ़ित्ने में डालीं(12)
(12) दोग़लेपन और कुफ़्र को अपना कर.

और मुसलमानों की बुराई तकते और शक रखते (13)
(13)इस्लाम में.

और झूटे लालच ने तुम्हें धोखा दिया(14)
(14) और तुम बातिल उम्मीदों में रहे कि मुसलमानों पर हादसे आएंगे, वो तबाह हो जाएंगे.

यहाँ तक कि अल्लाह का हुक्म आ गया (15)
(15)यानी मौत.

और तुम्हें अल्लाह के हुक्म पर उस बड़े फ़रेबी ने घमण्डी रखा(16){14}
(16) यानी शैतान ने धोखा दिया कि अल्लाह तआला बड़ा हिलम वाला है तुम पर अज़ाब न करेगा और न मरने के बाद उठना न हिसाब. तुम उसके इस फ़रेब में आ गए.

तो आज न तुमसे कोई फ़िदिया लिया जाए(17)
(17) जिसको देकर तुम अपनी जानें अज़ाब से छुड़ा सको. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया मानी ये हैं कि आज न तुम से ईमान क़ुबूल किया जाए, न तौबह.

और न खुले काफ़िरों से, तुम्हारा ठिकाना आग है, वह तुम्हारी रफ़ीक़ है, और क्या ही बुरा अंजाम {15} क्या ईमान वालों को अभी वह वक़्त न आया कि उनके दिल झुक जाएं अल्लाह की याद और उस हक़ के लिये जो उतरा (18)
(18) हज़रत उम्मुल मूमिनीन आयशा सिद्दीक़ा रदियल्लाहो अन्हा से रिवायत है कि नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम दौलतसरा से बाहर तशरीफ़ लाए तो मुसलमानों को देखा कि आपस में हंस रहे हैं फ़रमाया तुम हंसते हो, अभी तक तुम्हारे रब की तरफ़ से अमान नहीं आई और तुम्हारे हंसने पर यह आयत उतरी. उन्होंने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, इस हंसी का कफ़्फ़ारा क्या है? फ़रमाया इतना ही रोना. और उतरने वाले हक़ से मुराद क़ुरआन शरीफ़ है.

और उन जैसे न हों जिन को पहले किताब दी गई (19)
(19)यानी यहूदी और ईसाईयों के तरीक़े इख़्तियार न करें.

फिर उन पर मुद्दत दराज़ हुई(20)
(20) यानी वह ज़माना जो उनके और उन नबियों के बीच था.

तो उनके दिल सख़्त हो गए(21)
(21) और अल्लाह की याद के लिये नर्म न हुए दुनिया की तरफ़ माइल हो गए और नसीहतों उपदेशों से मुंह फेरा.

और उनमें बहुत फ़ासिक़ हैं(22){16}
(22) दीन से निकल जाने वाले.

जान लो कि अल्लाह ज़मीन को ज़िन्दा करता है उसके मरे पीछे,(23)
(23) मेंह बरसाकर सब्ज़ा उगा कर. बाद इसके कि ख़ुश्क हो गई थी. ऐसे ही दिलों को सख़्त हो जाने के बाद नर्म करता है और उन्हें इल्म व हिकमत से ज़िन्दगी अता फ़रमाता है. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि यह मिसाल है ज़िक्र के दिलों में असर करने की जिस तरह बारिश से ज़मीन को ज़िन्दगी हासिल होती है ऐसे ही अल्लाह के ज़िक्र से दिल ज़िन्दा होते हैं.

बेशक हमने तुम्हारे लिये निशानियाँ, बयान फ़रमा दीं कि तुम्हें समझ हो {17} बेशक सदक़ा देने वाले मर्द और सदक़ा देने वाली औरतें और वो जिन्हों ने अल्लाह को अच्छा क़र्ज़ दिया(24)
(24) यानी ख़ुशदिली और नेक नियत के साथ मुस्तहिक़्क़ों को सदक़ा दिया और ख़ुदा की राह में ख़र्च किया.

उनके दूने हैं और उनके लिये इज़्ज़त का सवाब है(25){18}
(25) और वह जन्नत है.

और वो जो अल्लाह और उसके सब रसूलों पर ईमान लाएं वही हैं पूरे सच्चे और औरों पर(26)
(26) गुज़री हुई उम्मतों में से.

गवाह अपने रब के यहाँ, उनके लिये उनका सवाब(27)
(27) जिसका वादा किया गया.

और उनका नूर है(28)और जिन्होंने कुफ़्र किया और हमारी आयतें झुटलाईं दोज़ख़ी हैं {19}
(28) जो हश्र में उनके साथ होगा.

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