54 Surah Al-Qamar

54 सूरए   क़मर -तीसरा रूकू

وَلَقَدْ جَاءَ آلَ فِرْعَوْنَ النُّذُرُ
كَذَّبُوا بِآيَاتِنَا كُلِّهَا فَأَخَذْنَاهُمْ أَخْذَ عَزِيزٍ مُّقْتَدِرٍ
أَكُفَّارُكُمْ خَيْرٌ مِّنْ أُولَٰئِكُمْ أَمْ لَكُم بَرَاءَةٌ فِي الزُّبُرِ
أَمْ يَقُولُونَ نَحْنُ جَمِيعٌ مُّنتَصِرٌ
سَيُهْزَمُ الْجَمْعُ وَيُوَلُّونَ الدُّبُرَ
بَلِ السَّاعَةُ مَوْعِدُهُمْ وَالسَّاعَةُ أَدْهَىٰ وَأَمَرُّ
إِنَّ الْمُجْرِمِينَ فِي ضَلَالٍ وَسُعُرٍ
يَوْمَ يُسْحَبُونَ فِي النَّارِ عَلَىٰ وُجُوهِهِمْ ذُوقُوا مَسَّ سَقَرَ
إِنَّا كُلَّ شَيْءٍ خَلَقْنَاهُ بِقَدَرٍ
وَمَا أَمْرُنَا إِلَّا وَاحِدَةٌ كَلَمْحٍ بِالْبَصَرِ
وَلَقَدْ أَهْلَكْنَا أَشْيَاعَكُمْ فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍ
وَكُلُّ شَيْءٍ فَعَلُوهُ فِي الزُّبُرِ
وَكُلُّ صَغِيرٍ وَكَبِيرٍ مُّسْتَطَرٌ
إِنَّ الْمُتَّقِينَ فِي جَنَّاتٍ وَنَهَرٍ
فِي مَقْعَدِ صِدْقٍ عِندَ مَلِيكٍ مُّقْتَدِرٍ

और बेशक फ़िरऔन वालों के पास रसूल आएं(1){41}
(1) हज़रत मूसा और हज़रत हारून अलैहिस्सलाम, तो फ़िरऔनी उनपर ईमान न लाए.

उन्होंने हमारी सब निशानियाँ झुटलाई(2)
(2) जो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम को दी गई थीं.

तो हमने उनपर (3)
(3) अज़ाब के साथ.

गिरफ़्त की जो एक इज़्ज़त वाले और अज़ीम क़ुदरत वाले की शान थी{42} क्या (4)
(4) ऐ मक्के वालों.

तुम्हारे काफ़िर उनसे बेहतर हैं (5)
(5) यानी उन क़ौमों से ज़्यादा क़वी और मज़बूत हैं या कुफ़्र और दुश्मनी में कुछ उनसे कमे हैं.

या किताबों में तुम्हारी छुट्टी लिखी हुई है(6){43}
(6) कि तुम्हारे कुफ़्र की पकड़ न होगी और तुम अल्लाह के अज़ाब से अम्न में रहोगे.

या ये कहते हैं(7)
(7) मक्के के काफ़िर.

कि हम सब मिलकर बदला ले लेंगे(8){44}
(8) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से.

अब भगाई जाती है यह जमाअत(9)
(9) मक्के के काफ़िरों की.

और पीठें फेर देंगे(10){45}
(10) और इस तरह भागेंगे कि एक भी क़ायम न रहेगा. बद्र के रोज़ जब अबू जहल ने कहा कि हमसब मिलकर बदला ले लेंगे, तब यह आयत उतरी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने ज़िरह पहन कर यह आयत तिलावत फ़रमाई. फिर ऐसा ही हुआ कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की फ़त्ह हुई और काफ़िर परास्त हुए.

बल्कि उनका वादा क़यामत पर है(11)
(11)  यानी उस अज़ाब के बाद उन्हें क़यामत के दिन के अज़ाब का वादा है.

और क़यामत निहायत (अत्यन्त) कड़वी और सख़्त कड़वी(12){46}
(12) दुनिया के अज़ाब से उसका अज़ाब बहुत ज़्यादा सख़्त है.

बेशक मुजरिम गुमराह और दीवाने हैं(13){47}
(13)न समझते है न राह पाते हैं. (तफ़सीरे कबीर)

जिस दिन आग में अपने मुंहों पर घसीटे जाएंगे, और फ़रमाया जाएगा चखों दोज़ख़ की आंच {48} बेशक हम ने हर चीज़ एक अन्दाज़े से पैदा फ़रमाई (14){49}
(14) अल्लाह की हिकमत के अनुसार. यह आयत क़दिरयों के रद में उतरी जो अल्लाह की क़ुदरत के इन्कारी हैं और दुनिया में जो कुछ होता है उसे सितारों वगै़रह की तरफ़ मन्सूब करते हैं. हदीसों में उन्हें इस उम्मत का मजूस कहा गया है और उनके पास उठने बैठने और उनके साथ बात चीत करने और वो बीमार हो जाएं तो उनकी पूछ ताछ करने और मर जाएं तो उनके जनाज़े में शरीक होने से मना फ़रमाया गया है और उन्हें दज्जाल का साथी फ़रमाया गया. वो बदतरीन लोग हैं.

और हमारा काम तो एक बात की बात है जैसे पलक मारना(15) {50}
(15) जिस चीज़ के पैदा करने का इरादा हो वह हुक्म के साथ ही हो जाती है.

और बेशक हमने तुम्हारी वज़अ के(16)
(16) काफ़िर पहली उम्मतों के.

हलाक कर दिये तो है कोई ध्यान करने वाला(17){51}
(17) जो इब्रत हासिल करें और नसीहत माने.

और उन्होंने जो कुछ किया सब किताबों में है (18){52}
(18)यानी बन्दों के सारे कर्म आमाल के निगहबान फ़रिश्तो के लेखों में है.

और हर छोटी बड़ी चीज़ लिखी हुई है (19){53}
(19) लौहे मेहफ़ूज़ में.

बेशक परहेज़गार बाग़ों और नहर में हैं{54} सच की मजलिस में अज़ीम क़ुदरत वाले बादशाह के हुज़ूर(20){55}
(20) यानी उसकी बारगाह के प्यारे चहीते हैं.

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