54 Surah Al-Qamar

54 सूरए   क़मर -दूसरा रूकू

 

54|23|كَذَّبَتْ ثَمُودُ بِالنُّذُرِ
54|24|فَقَالُوا أَبَشَرًا مِّنَّا وَاحِدًا نَّتَّبِعُهُ إِنَّا إِذًا لَّفِي ضَلَالٍ وَسُعُرٍ
54|25|أَأُلْقِيَ الذِّكْرُ عَلَيْهِ مِن بَيْنِنَا بَلْ هُوَ كَذَّابٌ أَشِرٌ
54|26|سَيَعْلَمُونَ غَدًا مَّنِ الْكَذَّابُ الْأَشِرُ
54|27|إِنَّا مُرْسِلُو النَّاقَةِ فِتْنَةً لَّهُمْ فَارْتَقِبْهُمْ وَاصْطَبِرْ
54|28|وَنَبِّئْهُمْ أَنَّ الْمَاءَ قِسْمَةٌ بَيْنَهُمْ ۖ كُلُّ شِرْبٍ مُّحْتَضَرٌ
54|29|فَنَادَوْا صَاحِبَهُمْ فَتَعَاطَىٰ فَعَقَرَ
54|30|فَكَيْفَ كَانَ عَذَابِي وَنُذُرِ
54|31|إِنَّا أَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ صَيْحَةً وَاحِدَةً فَكَانُوا كَهَشِيمِ الْمُحْتَظِرِ
54|32|وَلَقَدْ يَسَّرْنَا الْقُرْآنَ لِلذِّكْرِ فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍ
54|33|كَذَّبَتْ قَوْمُ لُوطٍ بِالنُّذُرِ
54|34|إِنَّا أَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ حَاصِبًا إِلَّا آلَ لُوطٍ ۖ نَّجَّيْنَاهُم بِسَحَرٍ
54|35|نِّعْمَةً مِّنْ عِندِنَا ۚ كَذَٰلِكَ نَجْزِي مَن شَكَرَ
54|36|وَلَقَدْ أَنذَرَهُم بَطْشَتَنَا فَتَمَارَوْا بِالنُّذُرِ
54|37|وَلَقَدْ رَاوَدُوهُ عَن ضَيْفِهِ فَطَمَسْنَا أَعْيُنَهُمْ فَذُوقُوا عَذَابِي وَنُذُرِ
54|38|وَلَقَدْ صَبَّحَهُم بُكْرَةً عَذَابٌ مُّسْتَقِرٌّ
54|39|فَذُوقُوا عَذَابِي وَنُذُرِ
54|40|وَلَقَدْ يَسَّرْنَا الْقُرْآنَ لِلذِّكْرِ فَهَلْ مِن مُّدَّكِرٍ

समूद ने रसूलों को झुटलाया(1){23}
(1) अपने नबी हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम का इन्कार करके और उनपर ईमान न लाकर.

तो बोले क्या हम अपने में के एक आदमी की ताबेदारी करें(2)
(2) यानी हम बहुत से होकर एक आदमी के ताबे हो जाएं. हम ऐसा न करेंगे क्योंकि अगर ऐसा करें.

जब तो हम ज़रूर गुमराह और दीवाने हैं(3){24}
(3) यह उन्होंने हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम का कलाम लौटाया. आपने उनसे फ़रमाया था कि अगर तुमने मेरा इत्तिबाअ न किया तो तुम गुमराह और नासमझ हो.

क्या हम सब में से उस पर (4)
(4) यानी हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम पर.

ज़िक्र उतारा गया (5)
(5) वही नाज़िल की गई और कोई हम में इस क़ाबिल ही न था.

बल्कि यह सख़्त झूटा इतरौना (शैख़ीबाज़) है(6) {25}
(6) कि नबुव्वत का दावा करके बड़ा बनना चाहता है. अल्लाह तआला फ़रमाता है.

बहुत जल्द कल जान जाएंगे(7)
(7) जब अज़ाब में जकड़े जाएंगे.

कौन था बड़ा झूटा इतरौना {26} हम नाक़ा भेजने वाले हैं उनकी जांच को(8)
(8) यह उस पर फ़रमाया गया कि हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम की क़ौम ने आप से कहा था कि आप पत्थर से एक ऊंटनी निकाल दीजिये. आपने उनसे ईमान की शर्त करके यह बात मंजूर कर ली थी. चुनांन्चे अल्लाह तआला ने ऊंटनी भेजने का वादा फ़रमाया और हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम से इरशाद किया.

तो ऐ सालेह तू राह देख(9)
(9) कि वो क्या करते हैं और उनके साथ क्या किया जाता है.

और सब्र कर(10){27}
(10) उनकी यातना पर.

और उन्हें ख़बर दे दे कि पानी उनमें हिस्सों से है(11)
(11) एक दिन उनका, एक दिन ऊंटनी का.

हर हिस्से पर वह हाज़िर हो जिसकी बारी है(12){28}
(12) जो दिन ऊंटनी का है उस दिन ऊंटनी हाज़िर हो और जो दिन क़ौम को है उस दिन क़ौम पानी पर हाज़िर हो.

तो उन्होंने अपने साथी को(13)
(13)यानी क़दार बिन सालिफ़ को ऊंटनी को क़त्ल करने के लिये.

पुकारा तो उसने (14)
(14)तेज़ तलवार.

लेकर उसकी कूंचे काट दीं(15) {29}
(15) और उसको क़त्ल कर डाला.

फिर कैसा हुआ मेरा अज़ाब और डर के फ़रमान (16){30}
(16) जो अज़ाब उतरने से पहले मेरी तरफ़ से आए थे और अपने वक़्त पर वाक़े हुए.

बेशक हमने उनपर एक चिंघाड़ भेजी (17)
(17) यानी फ़रिश्ते की हौलनाक आवाज़.

जभी वो हो गए जैसे घेरा बनाने वाले की बची हुई घास सूखी रौंदी हुई (18){31}
(18) यानी जिस तरह चर्वाहे जंगल में अपनी बकरियों की हिफ़ाज़त के लिये घास काँटों का घेरा बना लेते हैं उसमें से कुछ घास बच रह जाती है और वह जानवरों के पाँव में रूंध कर कण कण हो जाती है. यह हालत उनकी हो गई.

और बेशक हमने आसान किया क़ुरआन याद करने के लिये तो है कोई याद करने वाला {32} लूत की क़ौम ने रसूलों को झुटलाया {33} बेशक हमने उनपर (19)
(19) इस झुटलाने की सज़ा में.

पथराव भेजा (20)
(20) यानी उनपर छोटे छोटे संगरेज़े बरसाए.

सिवाय लूत के घर वालों के (21)
(21) यानी हज़रत लूत अलैहिस्सलाम और उनकी दोनो साहिबज़ादियाँ इस अज़ाब से मेहफ़ूज़ रहीं.

हमने उन्हें पिछले पहर(22)
(22) यानी सुबह होने से पहले.

बचा लिया {34} अपने पास की नेअमत फ़रमा कर, हम यूंही सिला देते हैं उसे जो शुक्र करे(23)
{35}
(23) अल्लाह तआला की नेअमतों का और शुक्रगुज़ार वह है जो अल्लाह पर और उसके रसूलों पर ईमान लाए और उनकी फ़रमाँबरदारी करे.

और बेशक उसने(24)
(24) यानी हज़रत लूत अलैहिस्सलाम ने.

उन्हें हमारी गिरफ़्त से(25)
(25) हमारे अज़ाब से.

डराया तो उन्होंने डर के फ़रमानों में शक किया(26) {36}
(26) और उनकी तस्दीक़ न की.

उन्होंने उसे उसके मेहमानों से फुसलाना चाहा(27)
(27) और हज़रत लूत अलैहिस्सलाम से कहा कि आप हमारे और अपने मेहमानों के बीच न पड़ें और उन्हें हमारे हवाले कर दें और यह उन्होंने ग़लत नीयत और बुरे इरादे से कहा था और मेहमान फ़रिश्ते थे उन्होंने हज़रत लूत अलैहिस्सलाम से कहा कि आप उन्हें छोड़ दीजिये,घर में आने दीजिये. जभी वो घर में आए तो हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम ने एक दस्तक दी.

तो हमने उनकी आँखों मेट दीं (चौपट कर दीं) (28)
(28) और वो फ़ौरन अन्धे हो गए और आँखें ऐसी नापैद हो गई कि निशान भी बाक़ी न रहा. चेहरे सपाट हो गए. आश्चर्य चकित मारे मारे फिरते थे दरवाज़ा हाथ न आता था. हज़रत लूत अलैहिस्सलाम ने उन्हें दरवाज़े से बाहर किया.

फ़रमाया चखो मेरा अज़ाब और डर के फ़रमान(29) {37}
(29)जो तुम्हें हज़रत लूत अलैहिस्सलाम ने सुनाए थे.

और बेशक सुबह तड़के उनपर ठहरने वाला अज़ाब आया(30) {38}
(30) जो अज़ाब आख़िरत तक बाक़ी रहेगा.
तो चखो मेरा अज़ाब और डर के फ़रमान{39} और बेशक हमने आसान किया क़ुरआन याद करने के लिये तो है कोई याद करने वाला{40}

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