53 Surah Al-Najm

53 सूरए नज्म -तीसरा रूकू

53|33|أَفَرَأَيْتَ الَّذِي تَوَلَّىٰ
53|34|وَأَعْطَىٰ قَلِيلًا وَأَكْدَىٰ
53|35|أَعِندَهُ عِلْمُ الْغَيْبِ فَهُوَ يَرَىٰ
53|36|أَمْ لَمْ يُنَبَّأْ بِمَا فِي صُحُفِ مُوسَىٰ
53|37|وَإِبْرَاهِيمَ الَّذِي وَفَّىٰ
53|38|أَلَّا تَزِرُ وَازِرَةٌ وِزْرَ أُخْرَىٰ
53|39|وَأَن لَّيْسَ لِلْإِنسَانِ إِلَّا مَا سَعَىٰ
53|40|وَأَنَّ سَعْيَهُ سَوْفَ يُرَىٰ
53|41|ثُمَّ يُجْزَاهُ الْجَزَاءَ الْأَوْفَىٰ
53|42|وَأَنَّ إِلَىٰ رَبِّكَ الْمُنتَهَىٰ
53|43|وَأَنَّهُ هُوَ أَضْحَكَ وَأَبْكَىٰ
53|44|وَأَنَّهُ هُوَ أَمَاتَ وَأَحْيَا
53|45|وَأَنَّهُ خَلَقَ الزَّوْجَيْنِ الذَّكَرَ وَالْأُنثَىٰ
53|46|مِن نُّطْفَةٍ إِذَا تُمْنَىٰ
53|47|وَأَنَّ عَلَيْهِ النَّشْأَةَ الْأُخْرَىٰ
53|48|وَأَنَّهُ هُوَ أَغْنَىٰ وَأَقْنَىٰ
53|49|وَأَنَّهُ هُوَ رَبُّ الشِّعْرَىٰ
53|50|وَأَنَّهُ أَهْلَكَ عَادًا الْأُولَىٰ
53|51|وَثَمُودَ فَمَا أَبْقَىٰ
53|52|وَقَوْمَ نُوحٍ مِّن قَبْلُ ۖ إِنَّهُمْ كَانُوا هُمْ أَظْلَمَ وَأَطْغَىٰ
53|53|وَالْمُؤْتَفِكَةَ أَهْوَىٰ
53|54|فَغَشَّاهَا مَا غَشَّىٰ
53|55|فَبِأَيِّ آلَاءِ رَبِّكَ تَتَمَارَىٰ
53|56|هَٰذَا نَذِيرٌ مِّنَ النُّذُرِ الْأُولَىٰ
53|57|أَزِفَتِ الْآزِفَةُ
53|58|لَيْسَ لَهَا مِن دُونِ اللَّهِ كَاشِفَةٌ
53|59|أَفَمِنْ هَٰذَا الْحَدِيثِ تَعْجَبُونَ
53|60|وَتَضْحَكُونَ وَلَا تَبْكُونَ
53|61|وَأَنتُمْ سَامِدُونَ
53|62|فَاسْجُدُوا لِلَّهِ وَاعْبُدُوا

तो क्या तुमने देखा जो फिर गया(1){33}
(1) इस्लाम से. यह आयत वलीद बिन मुग़ीरा के हक़ में उतरी जिसने नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम का दीन में इत्तिबाअ किया था. मुश्रिकों ने उसे शर्म दिलाई और कहा कि तूने बुज़ुर्गों का दीन छोड़ दिया और तू गुमराह हो गया. उसने कहा मैं ने अज़ाबे इलाही के डर से ऐसा किया तो शर्म दिलाने वाले काफ़िर ने उससे कहा कि अगर तू शिर्क की तरफ़ लौट आए और इस क़द्र माल मुझको दे तो तेरा अज़ाब मैं ज़िम्मे लेता हूँ. इसपर वलीद इस्लाम से फिर गया और मुरतद हो गया और फिर से शिर्क में जकड़ गया. और जिस आदमी से माल देना ठहरा था उसने थोड़ा सा दिया और बाक़ी से मुकर गया.

और कुछ थोड़ा सा दिया और रोक रखा (2){34}
(2) बाक़ी. यह भी कहा गया है कि यह आयत आस बिन वाइल सहमी के लिये उतरी. वह अक्सर कामों में नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ताईद और हिमायत किया करता था और यह भी कहा गया है कि यह आयत अबू जहल के बारे में उतरी कि उसने कहा था अल्लाह की क़सम, मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) हमें बेहतरीन अख़लाक का हुक्म फ़रमाते हैं. इस सूरत में मानी ये हैं कि थोड़ा सा इक़रार किया और ज़रूरी सच्चाई से कम अदा किया और बाक़ी से मुंह फेरा यानी ईमान न लाया.

क्या उसके पास ग़ैब (अज्ञात) का इल्म है तो वह देख रहा है (3) {35}
(3) कि दूसरा शख़्स उसके गुनाहों का बोझ उठा लेगा और उसके अज़ाब को अपने ज़िम्मे लेगा.

क्या उसे उसकी ख़बर न आई जो सहीफ़ों (धर्मग्रन्थों) में है मूसा के(4) {36}
(4) यानी तौरात में.

और इब्राहीम के जो पूरे अहकाम (आदेश) बजा लाया (5){37}
(5) यह हज़रत इब्राहीम की विशेषता  है कि उन्हें जो कुछ हुक्म दिया गया था वह उन्हों ने पूरी तरह अदा किया. इसमें बेटे का ज़िब्ह भी है और अपना आग में डाला जाना भी. और इसके अलावा और अहकाम भी, इसके बाद अल्लाह तआला उस मज़मून का ज़िक्र फ़रमाता है जो हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम की किताब और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के सहीफ़ों में बयान फ़रमाया गया था.

कि कोई बोझ उठाने वाली जान दूसरी का बोझ नहीं उठाती (6) {38}
(6) और कोई दूसरे के गुनाह पर नहीं पकड़ा जाएगा. इसमें उस व्यक्ति के क़ौल का रद है जो वलीद बिन मुग़ीरा के अज़ाब का ज़िम्मेदार बना था और उसके गुनाह अपने ऊपर लेने को कहता था. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि हज़रत इब्राहीम के ज़माने से पहले लोग आदमी को दूसरे के गुनाह पर भी पकड़ लेते थे. अगर किसी ने किसी को क़त्ल किया होता तो उकसे क़ातिल की बजाय उसके बेटे या भाई या बीबी या ग़ुलाम को क़त्ल कर देते थे. हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का ज़माना आया तो आपने इससे मना फ़रमाया और अल्लाह तआला का यह आदेश पहुंचाया कि कोई किसी के गुनाह के लिये नहीं पकड़ा जाएगा.

और यह कि आदमी न पाएगा मगर अपनी कोशिश (7){39}
(7) यानी अमल. मुराद यह है कि आदमी अपनी ही नेकियों से फ़ायदा उठाता है. यह मज़मून भी हज़रत इब्राहीम और हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के सहीफ़ों का है और गया है कि उनकी ही उम्मतों के लिये ख़ास था. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया यह हुक्म हमारी शरीअत में आयत “अलहक़ना बिहिम ज़ुर्रियतहुम वमा अलतनाहुम मिन अमलिहिम मिन शैइन” यानी हमने उनकी औलाद उनसे मिला दी और उनके अमल में उन्हें कुछ कमी न दी. (सूरए तूर, आयत 21) से मन्सूख़ हो गया. हदीस शरीफ़ में है कि एक व्यक्ति ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अर्ज़ किया कि मेरी माँ की वफ़ात हो गई अगर मैं उसकी तरफ़ से सदक़ा दूँ,  क्या नफ़ा देगा? फ़रमाया हाँ, और बहुत सी हदीसों से साबित है कि मैयत को सदक़ात व ताआत से जो सवाब पहुंचाया जाता है, पहुंचता है और इस पर उम्मत के उलमा की सहमति है और इसीलिये मुसलमानों में रिवाज है कि वो अपने मरने वालों को सोयम, चहल्लुम, बरसी, उर्स वग़ैरह की फ़ातिहा में ताआत व सदक़ात से सवाब पहुंचाते रहते हैं. यह अमल हदीसों के मुताबिक़ है. इस आयत की तफ़सीर में एक क़ौल यह भी है कि यहाँ इन्सान से काफ़िर मुराद हैं और मानी ये हैं कि काफ़िर को कोई भलाई न मिलेगी. सिवाय उसके जो उसने की हो. दुनिया ही में रिज़्क़ की वुसअत या तन्दुरूस्ती वग़ैरह से उसका बदला दे दिया जाएगा ताकि आख़िरत में उसका कुछ हिस्सा बाक़ी न रहे. और एक मानी इस आयत के मुफ़स्सिरों ने ये भी बयान किये हैं कि आदमी इन्साफ़ के तहत वही पाएगा जो उसने किया हो और अल्लाह तआला अपने फ़ज़्ल से जो चाहे अता फ़रमाए. और एक क़ौल मुफ़स्सिरों का यह भी है कि मूमिन के लिये दूसरा मूमिन जो नेकी करता है वह नेकी ख़ूद उसी मूमिन की गिनी जाती है जिसके लिये की गई हो क्योंकि उसका करने वाला नायब और वकील की तरह उसका क़ायम मुकाम होता है.

और यह कि उसकी कोशिश बहुत जल्द देखी जाएगी (8){40}
(8) आख़िरत में.

फिर उसका भरपूर बदला दिया जायेगा {41} और यह कि बेशक तुम्हारे रब ही की तरफ़ इन्तिहा (अन्त) है(9){42}
(9) आख़िरत में उसी की तरफ़ रूजू हैं वही आमाल की जज़ा देगा.

और यह कि वही है कि जिसने हंसाया और रूलाया (10){43}
(10) जिसे चाहा ख़ुश किया जिसे चाहा ग़मगीन किया.

और यह कि वही है जिसने मारा और जिलाया (11){44}
(11) यानी दुनिया में मौत दी और आख़िरत में ज़िन्दगी अता की. या ये मानी कि बाप दादा को मौत दी और उनकी औलाद को ज़िन्दगी बख़्शी. या यह मुराद है कि काफ़िरों को कुफ़्र की मौत से हलाक किया और ईमानदारों को ईमानी ज़िन्दगी बख़्शी.

और यह कि उसी ने दो जोड़े बनाए नर और मादा {45} नुत्फ़े से जब डाला जाए(12){46}
(12) रहम में.

और यह कि उसी के ज़िम्मे है पिछला उठाना (दोबारा ज़िन्दा करना)(13){47}
(13) यानी मौत के बाद ज़िन्दा फ़रमाना.

और यह कि उसी ने ग़िना दी और क़नाअत दी {48} और यह कि वही शिअरा सितारे का रब है (14){49}
(14) जो कि गर्मी की सख़्ती में जौज़ा के बाद उदय होता है. एहले जाहिलियत उसकी पूजा करते थे. इस आयत में बताया गया है कि सब का रब अल्लाह है. उस सितारे का रब भी अल्लाह ही है लिहाज़ा उसी की इबादत करो.

और यह कि उसी ने पहली आद को हलाक फ़रमाया(15) {50}
(15) तेज़ झक्कड़ वाली हवा से. आद दो हैं एक तो क़ौमे हूद,  उसको पहली आद कहते हैं और उनके बाद वालों को दूसरी आद कि वो उन्हीं के वंशज थे.

और समूद को(16)
(16) जो सालेह अलैहिस्सलाम की क़ौम थी.

तो कोई बाक़ी न छोड़ा {51} और उनसे पहले नूह की क़ौम को(17)
(17) डुबा कर हलाक किया.

बेशक वह उनसे भी ज़ालिम और सरकश (नाफ़रमान) थे (18){52}
(18) कि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम उनमें हज़ार बरस के क़रीब तशरीफ़ फ़रमा रहे मगर उन्हों ने दावत क़ुबूल न की और उनकी सरकशी कम न हुई.

और उसने उलटने वाली बस्ती को नीचे गिराया (19){53}
(19) मुराद इस से क़ौमे लूत की बस्तियाँ हैं जिन्हें हज़रत जिब्रईल अलैहिस्सलाम ने अल्लाह के हुक्म से उठाकर औंधा डाल दिया और उथल पुथल कर दिया.

तो उसपर छाया जो कुछ छाया (20){54}
(20) यानी निशान किये हुए पत्थर बरसाए.

तो ऐ सुनने वाले अपने रब की कौन सी नेअमतों में शक करेगा {55} यह (21)
(21) यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

एक डर सुनाने वाले हैं अगले डराने वालों की तरह (22){56}
(22) जो अपनी क़ौमों की तरफ़ रसूल बनाकर भेजे गए थे.

पास आई पास आने वाली(23){57}
(23) यानी क़यामत.

अल्लाह के सिवा उसका कोई खोलने वाला नहीं (24){58}
(24) यानी वही उसको ज़ाहिर फ़रमाएगा, या ये मानी हैं कि उसकी दहशत और सख़्ती को अल्लाह तआला के सिवा कोई दफ़अ नहीं कर सकता और अल्लाह तआला दफ़आ न फ़रमाएगा.

तो क्या इस बात से तुम आश्चर्य करते हो(25){59}
(25) यानी क़ुरआन शरीफ़ का इन्कार करते हो.

और हंसते हो और रोते नहीं(26){60}
(26) उसके वादे और चेतावनी सुनकर.

और तुम खेल में पड़े हो {61}तो अल्लाह के लिये सजदा और उसकी बन्दगी करो(27){62}
(27) कि उसके सिवा कोई इबादत के लायक़ नहीं.

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