53 Surah Al-Najm

53 सूरए नज्म -दूसरा रूकू

۞ وَكَم مِّن مَّلَكٍ فِي السَّمَاوَاتِ لَا تُغْنِي شَفَاعَتُهُمْ شَيْئًا إِلَّا مِن بَعْدِ أَن يَأْذَنَ اللَّهُ لِمَن يَشَاءُ وَيَرْضَىٰ
إِنَّ الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِالْآخِرَةِ لَيُسَمُّونَ الْمَلَائِكَةَ تَسْمِيَةَ الْأُنثَىٰ
وَمَا لَهُم بِهِ مِنْ عِلْمٍ ۖ إِن يَتَّبِعُونَ إِلَّا الظَّنَّ ۖ وَإِنَّ الظَّنَّ لَا يُغْنِي مِنَ الْحَقِّ شَيْئًا
فَأَعْرِضْ عَن مَّن تَوَلَّىٰ عَن ذِكْرِنَا وَلَمْ يُرِدْ إِلَّا الْحَيَاةَ الدُّنْيَا
ذَٰلِكَ مَبْلَغُهُم مِّنَ الْعِلْمِ ۚ إِنَّ رَبَّكَ هُوَ أَعْلَمُ بِمَن ضَلَّ عَن سَبِيلِهِ وَهُوَ أَعْلَمُ بِمَنِ اهْتَدَىٰ
وَلِلَّهِ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ لِيَجْزِيَ الَّذِينَ أَسَاءُوا بِمَا عَمِلُوا وَيَجْزِيَ الَّذِينَ أَحْسَنُوا بِالْحُسْنَى
الَّذِينَ يَجْتَنِبُونَ كَبَائِرَ الْإِثْمِ وَالْفَوَاحِشَ إِلَّا اللَّمَمَ ۚ إِنَّ رَبَّكَ وَاسِعُ الْمَغْفِرَةِ ۚ هُوَ أَعْلَمُ بِكُمْ إِذْ أَنشَأَكُم مِّنَ الْأَرْضِ وَإِذْ أَنتُمْ أَجِنَّةٌ فِي بُطُونِ أُمَّهَاتِكُمْ ۖ فَلَا تُزَكُّوا أَنفُسَكُمْ ۖ هُوَ أَعْلَمُ بِمَنِ اتَّقَىٰ

 

और कितने ही फ़रिश्तें हैं आसमानों में कि उनकी सिफ़ारिश कुछ काम नहीं आती मगर जब कि अल्लाह इज़ाज़त दे दे जिसके लिये चाहे और पसन्द फ़रमाए(1){26}
(1) यानी फ़रिश्ते, जबकि वो अल्लाह की बारगाह में इज़्ज़त रखते हैं इसके बाद सिर्फ़ उसके लिए शफ़ाअत करेंगे जिसके लिये अल्लाह तआला की मर्ज़ी हो यानी तौहीद वाले मूमिन के लिये. तो बुतों से शफ़ाअत की उम्मीद रखना अत्यन्त ग़लत है कि न उन्हें हक़ तआला की बारगाह में क़ुर्ब हासिल, न काफ़िर शफ़ाअत के योग्य.

बेशक वो जो आख़िरत पर ईमान नहीं रखते(2)
(2) यानी काफ़िर जो दोबारा ज़िन्दा किये जाने का इन्कार करते हैं.

मलायक़ा (फ़रिश्तों) का नाम औरतों का सा रखते हैं(3){27}
(3) कि उन्हें ख़ुदा की बेटियाँ बताते हैं.

और उन्हें इसकी कुछ ख़बर नहीं, वो तो निरे गुमान के पीछे हैं, और बेशक गुमान यक़ीन की जगह कुछ काम नहीं देता (4){28}
(4) सही बात और वास्तविकता इल्म और यक़ीन से मालूम होती है न कि वहम और गुमान से.

तो तुम उससे मुंह फेर लो जो हमारी याद से फिरा (5)
(5) यानी क़ुरआन पर ईमान से.

और उसने न चाही मगर दुनिया की ज़िन्दगी(6){29}
(6) आख़िरत पर ईमान न लाया कि उसका तालिब होता.

यहाँ तक उनके इल्म की पहुंच है(7)
(7) यानी वो इस क़द्र कम इल्म और कमअक़्ल है कि उन्होंने आख़िरत पर दुनिया को प्राथमिकता दी है या ये मानी हैं कि उनके इल्म की इन्तिहा वहम और गुमान हैं जो उन्हों ने बाँध रखे हैं कि (मआज़ल्लाह) फ़रिश्ते ख़ुदा की बेटियाँ हैं उनकी शफ़ाअत करेंगे और इस बातिल वहम पर भरोसा करके उन्हों ने ईमान और क़ुरआन की पर्वाह न की.

बेशक तुम्हारा रब ख़ूब जानता है जो उसकी राह से बहका और वह ख़ूब जानता है जिसने राह पाई {30} और अल्लाह ही का है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में ताकि बुराई करने वालों को उनके किये का बदला दे और नेकी करने वालों को निहायत (अत्यन्त) अच्छा (सिला) इनआम अता फ़रमाए {31} वो जो बड़े गुनाहों और बेहयाइयों से बचते हैं (8)
(8) गुनाह वह अमल है जिसका करने वाला अज़ाब का मुस्तहिक़ हो और कुछ जानकारों ने फ़रमाया किगुनाह वह है जिसका करने वाला सवाब से मेहरूम हो. कुछ का कहना है नाजायज़ काम करने को गुनाह कहते हैं. बहरहाल गुनाह की दो क़िस्में हैं सग़ीरा और कबीरा. कबीरा वो जिसका अज़ाब सख़्त हो और कुछ उलमा ने फ़रमाया कि सग़ीरा वो जिसपर सज़ा न हो. कबीरा वो जिसपर सज़ा हो, और फ़वाहिश वो जिसपर हद हो.

मगर इतना कि गुनाह के पास गए और रूक गए (9)
(9) कि इतना तो कबीरा गुनाहों से बचने की बरकत से माफ़ हो जाता है.

बेशक तुम्हारे रब की मग़फ़िरत वसीअ है, वह तुम्हें ख़ूब जानता है (10)
(10) यह आयत उन लोगों के हक़ में नाज़िल हुई जो नेकियाँ करते थे और अपने कामों की तारीफ़ करते थे और कहते थे कि हमारी नमाज़ें, हमारे रोज़े, हमारे हज—

तुम्हें मिट्टी से पैदा किया और जब तुम अपनी माँओ के पेट में हमल (गर्भ) थे, तो आप अपनी जानों को सुथरा न बताओ (11)
(11) यानी घमण्ड से अपनी नेकियों की तारीफ़ न करो क्योंकि अल्लाह तआला अपने बन्दों के हालात का ख़ुद जानने वाला है, वह उनकी हस्ती की शुरूआत से आख़िर तक सारे हालात जानता है. इस आयत में बनावटीपन, दिखावे और अपने मुंह मियाँ मिटठू बनने को मना किया गया है. लेकिन अगर अल्लाह की नेअमत के ऐतिराफ़ और फ़रमाँबरदारी व इबादत और अल्लाह के शुक्र  के लिये नेकियों का ज़िक्र किया जाए तो जायज़ है.

वह ख़ूब जानता है जो परहेज़गार हैं (12) {32}
(12) और उसी का जानना काफ़ी, वही जज़ा देने वाला है. दूसरों पर इज़हार और दिखावे का क्या फ़ायदा.

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