51 Surah -Al-Zariyat

51|24|هَلْ أَتَاكَ حَدِيثُ ضَيْفِ إِبْرَاهِيمَ الْمُكْرَمِينَ
51|25|إِذْ دَخَلُوا عَلَيْهِ فَقَالُوا سَلَامًا ۖ قَالَ سَلَامٌ قَوْمٌ مُّنكَرُونَ
51|26|فَرَاغَ إِلَىٰ أَهْلِهِ فَجَاءَ بِعِجْلٍ سَمِينٍ
51|27|فَقَرَّبَهُ إِلَيْهِمْ قَالَ أَلَا تَأْكُلُونَ
51|28|فَأَوْجَسَ مِنْهُمْ خِيفَةً ۖ قَالُوا لَا تَخَفْ ۖ وَبَشَّرُوهُ بِغُلَامٍ عَلِيمٍ
51|29|فَأَقْبَلَتِ امْرَأَتُهُ فِي صَرَّةٍ فَصَكَّتْ وَجْهَهَا وَقَالَتْ عَجُوزٌ عَقِيمٌ
51|30|قَالُوا كَذَٰلِكِ قَالَ رَبُّكِ ۖ إِنَّهُ هُوَ الْحَكِيمُ الْعَلِيمُ
51|31|۞ قَالَ فَمَا خَطْبُكُمْ أَيُّهَا الْمُرْسَلُونَ
51|32|قَالُوا إِنَّا أُرْسِلْنَا إِلَىٰ قَوْمٍ مُّجْرِمِينَ
51|33|لِنُرْسِلَ عَلَيْهِمْ حِجَارَةً مِّن طِينٍ
51|34|مُّسَوَّمَةً عِندَ رَبِّكَ لِلْمُسْرِفِينَ
51|35|فَأَخْرَجْنَا مَن كَانَ فِيهَا مِنَ الْمُؤْمِنِينَ
51|36|فَمَا وَجَدْنَا فِيهَا غَيْرَ بَيْتٍ مِّنَ الْمُسْلِمِينَ
51|37|وَتَرَكْنَا فِيهَا آيَةً لِّلَّذِينَ يَخَافُونَ الْعَذَابَ الْأَلِيمَ
51|38|وَفِي مُوسَىٰ إِذْ أَرْسَلْنَاهُ إِلَىٰ فِرْعَوْنَ بِسُلْطَانٍ مُّبِينٍ
51|39|فَتَوَلَّىٰ بِرُكْنِهِ وَقَالَ سَاحِرٌ أَوْ مَجْنُونٌ
51|40|فَأَخَذْنَاهُ وَجُنُودَهُ فَنَبَذْنَاهُمْ فِي الْيَمِّ وَهُوَ مُلِيمٌ
51|41|وَفِي عَادٍ إِذْ أَرْسَلْنَا عَلَيْهِمُ الرِّيحَ الْعَقِيمَ
51|42|مَا تَذَرُ مِن شَيْءٍ أَتَتْ عَلَيْهِ إِلَّا جَعَلَتْهُ كَالرَّمِيمِ
51|43|وَفِي ثَمُودَ إِذْ قِيلَ لَهُمْ تَمَتَّعُوا حَتَّىٰ حِينٍ
51|44|فَعَتَوْا عَنْ أَمْرِ رَبِّهِمْ فَأَخَذَتْهُمُ الصَّاعِقَةُ وَهُمْ يَنظُرُونَ
51|45|فَمَا اسْتَطَاعُوا مِن قِيَامٍ وَمَا كَانُوا مُنتَصِرِينَ
51|46|وَقَوْمَ نُوحٍ مِّن قَبْلُ ۖ إِنَّهُمْ كَانُوا قَوْمًا فَاسِقِينَ

51 सूरए ज़ारियात – दूसरा रूकू

ऐ मेहबूब क्या तुम्हारे पास इब्राहीम के इज़्ज़त वाले मेहमानों की ख़बर आई(1){24}
(1) जो दस या बारह फ़रिश्ते थे.

जब वो उसके पास आकर बोले सलाम, कहा सलाम, नाशनासा लोग हैं(2){25}
(2) यह बात आपने अपने दिल में फ़रमाई.

फिर अपने घर गया तो एक मोटा ताज़ा बछड़ा ले आया(3){26}
(3) नफ़ीस भुना हुआ.

फिर उसे उनके पास रखा(4)
(4) कि खाएं और ये मेज़बान के आदाब में से है कि मेहमान के सामने खाना पेश करे. जब उन फ़रिश्तों ने खाया तो हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने —

कहा क्या तुम खाते नहीं {27} तो अपने जी में उनसे डरने लगा(5)
(5) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि आपके दिल में बात आई कि ये फ़रिश्ते हैं और अज़ाब के लिये भेजे गए हैं.

वो बोले डरिये नहीं(6)
(6) हम अल्लाह तआला के भेजे हुए हैं.

और उसे एक इल्म वाले लड़के की खु़शख़बरी दी {28} इस पर उसकी बीबी (7)
(7) यानी हज़रत सारा.

चिल्लाती आई फिर अपना माथा ठोंका और बोली क्या बुढिया बांझ (8){29}
(8) जिसके कभी बच्चा नहीं हुआ नव्वे या निनानवे साल की उम्र हो चुकी. मतलब यह था कि ऐसी उम्र और ऐसी हालत में बच्चा होना अत्यन्त आशचर्य की बात हैं.

उन्होंने कहा तुम्हारे रब ने यूंही फ़रमा दिया है, और वही हकीम दाना (जानने वाला) है{30}

पारा छब्बीस समाप्त
सत्ताईसवां पारा-क़ाला फ़माख़त्बुकुम
(सूरए ज़ारियात जारी)

इब्राहीम ने फ़रमाया, तो ऐ फ़रिश्तों तुम किस काम से आए(9){31}
(9) यानी सिवाय इस ख़ुशख़बरी के तुम्हारा और क्या काम है.

बोले हम एक मुजरिम क़ौम की तरफ़ भेजे गए हैं(10){32}
(10) यानि क़ौमे लूत की तरफ़.

कि उनपर गारे के बनाए हुए पत्थर छोड़ें {33} जो तुम्हारे रब के पास हद से बढ़ने वालों के लिये निशान किये रखे हैं(11) {34}
(11) उन पत्थरों पर निशान थे जिनसे मालूम होता था कि ये दुनिया के पत्थरों में से नहीं हैं. कुछ मुफ़स्सिरों ने फ़रमाया कि हर एक पत्थर पर उसका नाम लिखा था जो उससे हलाक किया जाने वाला था.

तो हमने उस शहर में जो ईमान वाले थे निकाल लिये {35} तो हमने वहाँ एक ही घर मुसलमान पाया(12){36}
(12) यानी एक ही घर के लोग और वो हज़रत लूत अलैहिस्सलाम और आपकी दोनों बेटियाँ हैं.

और हमने उसमें (13)
(13) यानी क़ौमे लूत के उस शहर में काफ़िरों को हलाक करने के बाद.

निशानी बाक़ी रखी उनके लिये जो दर्दनाक अज़ाब से डरते हैं(14){37}
(14) ताकि वो इबरत हासिल करें और उनके जैसे कामों से बाज़ रहें और वह निशानी उनके उजड़े हुए शहर थे या वो पत्थर जिनसे वो हलाक किये गए या वह काला बदबूदार पानी जो उस धरती से निकला था.

और मूसा में(15)
(15) यानी हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के वाक़ए में भी निशानी रखी.

जब हमने उसे रौशन सनद लेकर फ़िरऔन के पास भेजा(16) {38}
(16) रौशन सनद से मुराद हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम के चमत्कार हैं जो आपने फ़िरऔन और उसके लोगों पर पेश फ़रमाए.

तो अपने लश्कर समेत फिर गया(17)
(17) यानी फ़िरऔन ने अपनी जमाअत के साथ हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर ईमान लाने से इन्कार किया.

और बोला जादूगर है या दीवाना {39} तो हमने उसे और उसके लश्कर को पकड़ कर दरिया में डाल दिया इस हाल में कि वह अपने आपको मलामत कर रहा था(18){40}
(18) कि क्यों वह हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम पर ईमान न लाया और क्यों उन्हें बुरा भला कहा.

और आद में(19)
(19) यानी क़ौमे आद के हलाक करने में इबरत वाली निशानियाँ हैं.

जब हमने उनपर ख़ुश्क़ आंधी भेजी(20){41}
(20) जिसमें कुछ भी ख़ैरो बरकत न थी. यह हलाक करने वाली हवा थी.

जिस चीज़ पर गुज़रती उसे गली हुई चीज़ की तरह कर छोड़ती(21){42}
(21) चाहे वो आदमी हों या जानवर या और अमवाल, जिस चीज़ को छू गई उसको हलाक करके ऐसा कर दिया मानों वह मुद्दतों की नष्ट की हुई है.

और समूद में(22)
(22) यानी क़ौमे समूद की हलाकत में भी निशानियाँ हैं.

जब उनसे फ़रमाया गया एक वक़्त तक बरत लो(23){43}
(23) यानी मौत के वक़्त तक दुनिया में जी लो तो यही ज़माना तुम्हारी मोहलत का है.

तो उन्होंने अपने रब के हुक्म से सरकशी की(24)
(24) और हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम को झुटलाया और ऊंटनी की कूंचें कांटीं.

तो उनकी आंखों के सामने उन्हें कड़क ने आ लिया(25){44}
(25) और भयानक आवाज़ के अज़ाब से हलाक कर दिये गए.

तो वो न खड़े हो सके(26) और न वो बदला ले सकते थे {45} और उनसे पहले नूह की क़ौम को हलाक फ़रमाया, बेशक वो फ़ासिक़ लोग थे{46}
(26) अज़ाब उतरते समय न भाग सके.

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