48-Surah-Fatah

48 सूरए फ़त्ह -तीसरा रूकू

۞ لَّقَدْ رَضِيَ اللَّهُ عَنِ الْمُؤْمِنِينَ إِذْ يُبَايِعُونَكَ تَحْتَ الشَّجَرَةِ فَعَلِمَ مَا فِي قُلُوبِهِمْ فَأَنزَلَ السَّكِينَةَ عَلَيْهِمْ وَأَثَابَهُمْ فَتْحًا قَرِيبًا
وَمَغَانِمَ كَثِيرَةً يَأْخُذُونَهَا ۗ وَكَانَ اللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمًا
وَعَدَكُمُ اللَّهُ مَغَانِمَ كَثِيرَةً تَأْخُذُونَهَا فَعَجَّلَ لَكُمْ هَٰذِهِ وَكَفَّ أَيْدِيَ النَّاسِ عَنكُمْ وَلِتَكُونَ آيَةً لِّلْمُؤْمِنِينَ وَيَهْدِيَكُمْ صِرَاطًا مُّسْتَقِيمًا
وَأُخْرَىٰ لَمْ تَقْدِرُوا عَلَيْهَا قَدْ أَحَاطَ اللَّهُ بِهَا ۚ وَكَانَ اللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرًا
وَلَوْ قَاتَلَكُمُ الَّذِينَ كَفَرُوا لَوَلَّوُا الْأَدْبَارَ ثُمَّ لَا يَجِدُونَ وَلِيًّا وَلَا نَصِيرًا
سُنَّةَ اللَّهِ الَّتِي قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلُ ۖ وَلَن تَجِدَ لِسُنَّةِ اللَّهِ تَبْدِيلًا
وَهُوَ الَّذِي كَفَّ أَيْدِيَهُمْ عَنكُمْ وَأَيْدِيَكُمْ عَنْهُم بِبَطْنِ مَكَّةَ مِن بَعْدِ أَنْ أَظْفَرَكُمْ عَلَيْهِمْ ۚ وَكَانَ اللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرًا
هُمُ الَّذِينَ كَفَرُوا وَصَدُّوكُمْ عَنِ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَالْهَدْيَ مَعْكُوفًا أَن يَبْلُغَ مَحِلَّهُ ۚ وَلَوْلَا رِجَالٌ مُّؤْمِنُونَ وَنِسَاءٌ مُّؤْمِنَاتٌ لَّمْ تَعْلَمُوهُمْ أَن تَطَئُوهُمْ فَتُصِيبَكُم مِّنْهُم مَّعَرَّةٌ بِغَيْرِ عِلْمٍ ۖ لِّيُدْخِلَ اللَّهُ فِي رَحْمَتِهِ مَن يَشَاءُ ۚ لَوْ تَزَيَّلُوا لَعَذَّبْنَا الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْهُمْ عَذَابًا أَلِيمًا
إِذْ جَعَلَ الَّذِينَ كَفَرُوا فِي قُلُوبِهِمُ الْحَمِيَّةَ حَمِيَّةَ الْجَاهِلِيَّةِ فَأَنزَلَ اللَّهُ سَكِينَتَهُ عَلَىٰ رَسُولِهِ وَعَلَى الْمُؤْمِنِينَ وَأَلْزَمَهُمْ كَلِمَةَ التَّقْوَىٰ وَكَانُوا أَحَقَّ بِهَا وَأَهْلَهَا ۚ وَكَانَ اللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمًا

बेशक अल्लाह राज़ी हुआ ईमान वालों से जब वो उस पेड़ के नीचे तुम्हारी बैअत करते थे(1)
(1) हुदैबिय्यह में चूंकि उन बैअत करने वालों को अल्लाह की रज़ा की ख़ुशख़बरी दी गई इसलिये उस बैअत को बैअते रिज़वान कहते हैं. इस बैअत का ज़ाहिरी कारण यह हुआ कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हुदैबिय्यह से हज़रत उसमाने ग़नी रदियल्लाहो अन्हो को क़ुरैश के सरदारों के पास मक्कए मुकर्रमा भेजा कि उन्हें ख़बर दें कि हम बैतुल्लाह की ज़ियारत और उमरे की नियत से आए हैं हमारा इरादा जंग का नहीं है. और यह भी फ़रमा दिया था कि जो कमज़ोर मुसलमान वहाँ हैं उन्हें इत्मीनान दिला दें कि मक्कए मुकर्रमा बहुत जल्द फ़त्ह होगा और अल्लाह तआला अपने दीन को ग़ालिब फ़रमाएगा. क़ुरैश इस बात पर सहमत रहे कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम इस साल न आएं और हज़रत उस्माने ग़नी रदियल्लाहो अन्हो से कहा कि अगर आप काबे का तवाफ़ करना चाहें तो करलें. हज़रत उस्माने ग़नी ने फ़रमाया ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के बिना तवाफ़ करूं. यहाँ मुसलमानों ने कहा कि उस्माने ग़नी रदियल्लाहो अन्हो बड़े ख़ुशनसीब हैं जो काबए मुअज़्ज़मा पहुंचे और तवाफ़ से मुशर्रफ़ हुए. हुज़ूर ने फ़रमाया मैं जानता हूँ कि वो हमारे बग़ैर तवाफ़ न करेंगे. हज़रत उस्माने गनी रदियल्लाहो अन्हो ने मक्के के कमज़ोर मुसलमानों को आदेशनुसार फ़त्ह की ख़ुशख़बरी भी पहुंचाई फिर क़ुरैश ने हज़रत उस्माने ग़नी को रोक लिया. यहाँ यह ख़बर मशहूर हो गई कि उस्माने ग़नी रदियल्लाहो अन्हो शहीद कर दिये गए. इसपर मुसलमानों को बहुत जोश आया और रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने सहाबा से काफ़िरों के मुक़ाबले में जिहाद में डटे रहने पर बैअत ली. यह बैअत एक बड़े काँटेदार दरख़्त के नीचे हुई जिसको अरब में समुरह कहते हैं. हुज़ूर ने अपना बायां दस्ते मुबारक दाएं दस्ते अक़दस में लिया और फ़रमाया कि यह उस्मान (रदियल्लाहो अन्हो) की बैअत है और फ़रमाया यारब उस्मान तेरे और तेरे रसूल के काम में हैं. इस घटना से मालूम होता है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को नबुव्वत के नूर से मालूम था कि हज़रत उस्मान रदियल्लाहो अन्हो शहीद नहीं हुए जभी तो उनकी बैअत ली. मुश्रिकों में इस बैअत का हाल सुनकर डर छा गया और उन्होंने हज़रत उस्माने ग़नी रदियल्लाहो अन्हो को भेज दिया. हदीस शरीफ़ में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया जिन लोगों ने दरख़्त के नीचे बैअत ली थी उनमें से कोई भी दोज़ख़ में दाख़िल न होगा. (मुस्लिम शरीफ़) और जिस दरख़्त के नीचे बैअत की गई थी अल्लाह तआला ने उसको आँखों से पोशीदा कर दिया सहाबा ने बहुत तलाश किया किसी को उसका पता न चला.

तो अल्लाह ने जाना जो उनके दिलों में है(2)
(2) सच्चाई, सच्ची महब्बत और वफ़ादारी.

तो उनपर इत्मीनान उतारा और उन्हें ज़ल्द आने वाली फ़त्ह का इनाम दिया(3){18}
(3) यानी ख़ैबर की विजय का जो हुदैबिय्यह से वापस होकर छ माह बाद हासिल हुई.

और बहुत सी ग़नीमतें(4)
(4) ख़ैबर की और ख़बर वालों के माल कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने तक़सीम फ़रमाए.

जिन को लें, और अल्लाह इज़्ज़त व हिकमत वाला है {19} और अल्लाह ने तुम से वादा किया है बहुत सी ग़नीमतों का कि तुम लोगे (5)
(5) और तुम्हारी विजय होती रहेगी.

तो तुम्हें वह ज़ल्द अता फ़रमा दी और लोगों के हाथ तुमसे रोक दिये(6)
(6) कि वो डर कर तुम्हारे बाल बच्चों को हानि न पहुंचा सके. इसका वाक़िआ यह था कि जब मुसलमान ख़ैबर की जंग के लिये रवाना हुए तो ख़ैबर वासियों के हलीफ़ बनी असद और ग़ितफान ने चाहा कि मदीनए तैय्यिबह पर हमला करके मुसलमानों के बाल बच्चों को लूट लें. अल्लाह तआला ने उनके दिलों में रोब डाला और उनके हाथ रोक दिये.

और इसलिये कि ईमान वालों के लिये निशानी हो(7)
(7) यह ग़नीमत देना और दुश्मनों के हाथ रोक देना.

और तुम्हें सीधी राह दिखा दे(8){20}
(8) अल्लाह तआला पर तवक्कुल करने और काम उस पर छोड़ देने की जिससे बसीरत और यक़ीन ज़्यादा हो.

और एक और (9)
(9) फ़त्ह.

जो तुम्हारे बल की न थी (10)
(10) मुराद इससे फ़ारस और रूम की ग़नीमतें हैं या ख़ैबर की जिसका अल्लाह तआला ने पहले से वादा फ़रमाया था और मुसलमानों को कामयाबी की उम्मीद थी. अल्लाह तआला ने उन्हें विजय दिलाई. और एक क़ौल यह है कि वह फ़त्हे मक्का है. और एक यह क़ौल है कि वह हर फ़त्ह है जो अल्लाह तआला ने मुसलमानों को अता फ़रमाई.

वह अल्लाह के क़ब्ज़े में है, और अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है {21} और अगर काफ़िर तुम से लड़ें(11)
(11) यानी मक्के वालों या ख़ैबर वासियों के सहयोगी असद, ग़ित्फ़ान.

तो ज़रूर तुम्हारे मुक़ाबले से पीठ फेर देंगे(12)
(12) पराजित होंगे और उन्हें मुंह की खानी पड़ेगी.

फिर कोई हिमायती न पाएंगे न मददगार {22} अल्लाह का दस्तूर है कि पहले से चला आता है(13)
(13) कि वह ईमान वालों की मदद फ़रमाता है और काफ़िरों को ज़लील करता है.

और हरगिज़ तुम अल्लाह का दस्तूर बदलता न पाओगे {23} और वही है जिसने उनके हाथ (14)
(14) यानी काफ़िरों के.

तुम से रोक दिये और तुम्हारे हाथ उनसे रोक दिये मक्का की घाटी में (15)
(15) मक्का की विजय का दिन. एक क़ौल यह है कि बत्ने मक्का से हुदैबिय्यह मुराद है और इस आयत के उतरने की परिस्थितियों में हज़रत अनस रदियल्लाहो अन्हो कहते हैं कि मक्के वालों में से अस्सी हथियार बन्द जवान जबले तनईम से मुसलमानों पर हमला करने के इरादे से उतरे. मुसलमानों ने उन्हें गिरफ़्तार करके सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर किया. हुज़ूर ने माफ़ फ़रमा दिया और उन्हें जाने दिया.

बाद इसके कि तुम्हें उनपर क़ाबू दे दिया था और अल्लाह तुम्हारे काम देखता है(16){24}
(16)मक्के के काफ़िर.

वो हैं जिन्होंने कुफ़्र किया और तुम्हें मस्जिदें हराम से(17)
(17) वहाँ पहुंचने से और उसका तवाफ़ करने से.

रोका और क़ुरबानी के जानवर रूके पड़े अपनी जगह पहुंचने से (18)
(18) यानी ज़िब्ह के मक़ाम से जो हरम में है.

और अगर यह न होता कुछ मुसलमान मर्द और कुछ मुसलमान औरतें (19)
(19) मक्कए मुकर्रमा में है.

जिनकी तुम्हें ख़बर नहीं(20)
(20) तुम उन्हें पहचाने नहीं.

कहीं तुम उन्हें रौंदे डालो(21)
(21) काफ़िरों से जंग करने में.

तो तुम्हें उनकी तरफ़ से अनजानी में कोई मकरूह पहुंचे तो हम तुम्हें उनके क़िताल की इजाज़त देते उनका यह बचाव इसलिये है कि अल्लाह अपनी रहमत में दाख़िल करें जिसे चाहे, अगर वो जुदा हो जाते(22)
(22) यानी मुसलमान काफ़िरों से मुम्ताज़ हो जाते.

तो हम ज़रूर उनमें के काफ़िरों को दर्दनाक अज़ाब देते(23) {25}
(23) तुम्हारे हाथ से क़त्ल कराके और तुम्हारी कै़द में लाके.

जब कि काफ़िरों ने अपने दिलों में आड़ रखी है वही अज्ञानता के ज़माने की आड़ (24)
(24) कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और हुज़ूर के सहाबा को काबए मुअज़्ज़मा से रोका.

तो अल्लाह ने अपना इत्मीनान अपने रसूल और ईमान वालों पर उतारा (25)
(25) कि उन्होंने अगले साल आने पर सुलह की, अगर वो भी क़ुरैश के काफ़िरों की तरह ज़िद करते तो ज़रूर जंग हो जाती.

और परहेज़गारी का कलिमा उनपर अनिवार्य फ़रमाया(26)
(26) कलिमए तक़वा यानी परहेज़गारी के कलिमे से मुराद “ला इलाहा इल्लल्लाहे मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” है.

और वो उसके ज़्यादा सज़ावार और उसके योग्य थे (27)
(27) क्योंकि अल्लाह तआला ने उन्हें अपने दीन और अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की सोहबत से नवाज़ा.

और अल्लाह सब कुछ जानता है (28) {26}
(28)काफ़िरों का हाल भी जानता है, मुसलमानों का भी, कोई चीज़ उससे छुपी नहीं है.

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