48-Surah-Fatah

48 सूरए फ़त्ह -दूसरा रूकू

سَيَقُولُ لَكَ الْمُخَلَّفُونَ مِنَ الْأَعْرَابِ شَغَلَتْنَا أَمْوَالُنَا وَأَهْلُونَا فَاسْتَغْفِرْ لَنَا ۚ يَقُولُونَ بِأَلْسِنَتِهِم مَّا لَيْسَ فِي قُلُوبِهِمْ ۚ قُلْ فَمَن يَمْلِكُ لَكُم مِّنَ اللَّهِ شَيْئًا إِنْ أَرَادَ بِكُمْ ضَرًّا أَوْ أَرَادَ بِكُمْ نَفْعًا ۚ بَلْ كَانَ اللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًا
بَلْ ظَنَنتُمْ أَن لَّن يَنقَلِبَ الرَّسُولُ وَالْمُؤْمِنُونَ إِلَىٰ أَهْلِيهِمْ أَبَدًا وَزُيِّنَ ذَٰلِكَ فِي قُلُوبِكُمْ وَظَنَنتُمْ ظَنَّ السَّوْءِ وَكُنتُمْ قَوْمًا بُورًا
وَمَن لَّمْ يُؤْمِن بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ فَإِنَّا أَعْتَدْنَا لِلْكَافِرِينَ سَعِيرًا
وَلِلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ يَغْفِرُ لِمَن يَشَاءُ وَيُعَذِّبُ مَن يَشَاءُ ۚ وَكَانَ اللَّهُ غَفُورًا رَّحِيمًا
سَيَقُولُ الْمُخَلَّفُونَ إِذَا انطَلَقْتُمْ إِلَىٰ مَغَانِمَ لِتَأْخُذُوهَا ذَرُونَا نَتَّبِعْكُمْ ۖ يُرِيدُونَ أَن يُبَدِّلُوا كَلَامَ اللَّهِ ۚ قُل لَّن تَتَّبِعُونَا كَذَٰلِكُمْ قَالَ اللَّهُ مِن قَبْلُ ۖ فَسَيَقُولُونَ بَلْ تَحْسُدُونَنَا ۚ بَلْ كَانُوا لَا يَفْقَهُونَ إِلَّا قَلِيلًا
قُل لِّلْمُخَلَّفِينَ مِنَ الْأَعْرَابِ سَتُدْعَوْنَ إِلَىٰ قَوْمٍ أُولِي بَأْسٍ شَدِيدٍ تُقَاتِلُونَهُمْ أَوْ يُسْلِمُونَ ۖ فَإِن تُطِيعُوا يُؤْتِكُمُ اللَّهُ أَجْرًا حَسَنًا ۖ وَإِن تَتَوَلَّوْا كَمَا تَوَلَّيْتُم مِّن قَبْلُ يُعَذِّبْكُمْ عَذَابًا أَلِيمًا
لَّيْسَ عَلَى الْأَعْمَىٰ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْأَعْرَجِ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْمَرِيضِ حَرَجٌ ۗ وَمَن يُطِعِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ يُدْخِلْهُ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۖ وَمَن يَتَوَلَّ يُعَذِّبْهُ عَذَابًا أَلِيمًا

अब तुम से कहेंगे जो गंवार पीछे रह गए थे(1)
(1) क़बीलए ग़िफ़ार और मुज़ैय्यिनह व जुहैनह व अशजअ व असलम के, जब कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हुदैबिय्यह के साल उमरा की नियत से मक्कए मुकर्रमा का इरादा फ़रमाया तो मदीने के आस पास के गाँवों वाले और सहराओ में रहने वाले क़ुरैश के डर से आपके साथ जाने से रूके जबकि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उमरे का एराम बाँधा था और कर्बानी के जानवर साथ थे और इससे साफ़ ज़ाहिर था कि जंग का इरादा नहीं है फिर भी बहुत से लोगों पर जाना बोझ हुआ और वो काम का बहाना करके रह गए और उनका गुमान यह था कि क़ुरैश बहुत ताक़तवर हैं. मुसलमान उनसे बचकर न आएंगे सब वही हलाक हो जाएंगे. अब जबकि अल्लाह की मदद से मामला उनके गुमान के बिल्कुल विपरीत हुआ तो उन्हें अपने न जाने पर अफ़सोस होगा और मुअज़िरत करेंगे.

कि हमें हमारे माल और हमारे घर वालों ने जाने से मश्ग़ूल रखा(2)
(2) क्योंकि औरतें और बच्चे अकेले थे और उनका कोई ख़बरगीरी करने वाला न था इसलिये हम बेबस हो गए.

अब हुज़ूर हमारी मग़फ़िरत चाहें(3)
(3) अल्लाह उनको झुटलाता है.

अपनी ज़बानों से वो बात कहते हैं जो उनके दिलों में नहीं (4)
(4) यानी वो बहाना बनाने और माफ़ी मांगने में झूटे हैं.

तुम फ़रमाओ तो अल्लाह के सामने किसे तुम्हारा कुछ इख़्तियार है अगर वह तुम्हारा बुरा चाहे या तुम्हारी भलाई का इरादा फ़रमाए बल्कि अल्लाह को तुम्हारे कामों की ख़बर है {11} बल्कि तुम तो ये समझे हुए थे कि रसूल और मुसलमान हरगिज़ घरों को वापस न आएंगे (5)
(5) दुश्मन उन सबका वहीं ख़ात्मा कर देंगे.

और उसी को अपने दिलों में भला समझे हुए थे और तुमने बुरा गुमान किया(6)
(6) कुफ़्र और फ़साद के ग़लबे का और अल्लाह के वादे के पूरा न होने का.

और तुम हलाक होने वाले लोग थे(7){12}
(7) अल्लाह के अज़ाब के हक़दार.

और जो ईमान न लाए अल्लाह और उसके रसूल पर (8)
(8) इस आयत में चुनौती है कि जो अल्लाह तआला पर और उसके रसूल पर ईमान न लाए, उनमें से किसी एक का भी इन्कारी हों, वह काफ़िर है.

तो बेशक हमने काफ़िरों के लिये भड़कती आग तैयार कर रखी है {13} और अल्लाह ही के लिये है आसमानों और ज़मीन की सल्तनत जिसे चाहे बख़्शे और जिसे चाहे अज़ाब करे (9)
(9) यह सब उसकी मर्ज़ी और हिकमत पर है.

और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है{14} अब कहेंगे पीछे बैठ रहने वाले(10)
(10) जो हुदैबिय्यह की हाज़िरी से लाचार रहे, ऐ ईमान वालों.

जब तुम ग़नीमतें लेने चलो(11)
(11) ख़ैबर की. इसका वाकिआ यह था कि जब मुसलमान सुलह हुदैबिय्यह से फ़ारिग़ होकर वापस हुए तो अल्लाह तआला ने उनसे ख़ैबर की विजय का वादा फ़रमाया और वहाँ की ग़नीमतें हुदैबिय्यह में हाज़िर होने वालों के लिये मख़सूस कर दीं गई. जब मुसलमानों के ख़ैबर की तरफ़ रवाना होने का वक़्त आया तो उन लोगों को लालच आया और उन्होंने ग़नीमत के लालच में कहा.

तो हमें भी अपने पीछे आने दो(12)
(12) यानी हम भी ख़ैबर को तुम्हारे साथ चलें और जंग में शरीक हों अल्लाह तआला फ़रमाता है.

वो चाहते हैं अल्लाह का कलाम बदल दें(13)
(13)यानी अल्लाह तआला का वादा तो जो हुदैबिय्यह वालों के लिये फ़रमाया था कि ख़ैबर की ग़नीमत ख़ास उनके लिये है.

तुम फ़रमाओ हरगिज़ तुम हमारे साथ न आओ अल्लाह न पहले से यूंही फ़रमा दिया है (14)
(14) यानी हमारे मदीना आने से पहले.

तो अब कहेंगे बल्कि तुम हमसे जलते हो(15)
(15) और यह गवारा नहीं करते कि हम तुम्हारे साथ ग़नीमतें पाएं. अल्लाह तआला फ़रमाता है.

बल्कि वो बात न समझते थे(16)
(16) दीन की.

मगर थोड़ी (17){15}
(17) यानी मात्र दुनिया की. यहाँ तक कि उनका ज़बानी इक़रार भी दुनिया ही की ग़रज़ से था और आख़िरत की बातों को बिल्कुल नहीं समझते थे. (जुमल)

उन पीछे रह गए हुए गंवारों से फ़रमाओ (18)
(18) जो विभिन्न क़बीलों के लोग हैं और उनमें कुछ ऐसे भी हैं जिनके तौबह करने की आस की जाती है. कुछ ऐसे भी हैं जो दोहरी प्रवृत्ति या दोग़लेपन में बहुत पुख़्ता और सख़्ता हैं. उन्हें आज़माइश में डालना मन्ज़ूर है ताकि तौबह करने वालों और न करने वालों में फ़र्क़ हो जाए इसलिये हुक्म हुआ कि उनसे फ़रमा दीजिये.

बहुत जल्द तुम एक सख़्त लड़ाई वाली क़ौम की तरफ़ बुलाए जाओगे (19)
(19) इस क़ौम से बनी हनीफ़ा यमामह के रहने वाले जो मुसैलिमा कज़्ज़ाब की क़ौम के लोग हैं वो मुराद हैं जिनसे हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो ने जंग फ़रमाई और यह भी कहा गया है कि उनसे मुराद फ़ारस और रोम के लोग हैं जिनसे जंग के लिये हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने दावत दी.

कि उनसे लड़ो या वो मुसलमान हो जाएं, फिर अगर तुम फ़रमान मानोगे अल्लाह तुम्हें अच्छा सवाब देगा(20)
(20) यह आयत हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ और हज़रत उमर फ़ारूक़ रदियल्लाहो अन्हुमा की ख़िलाफ़त की सच्चाई की दलील है कि उन हज़रात की इताअत पर जन्नत का और उनकी मुख़ालिफ़त पर जहन्नम का वादा किया गया.

और अगर फिर जाओगे जैसे पहले फिर गए(21)
(21) हुदैबिय्यह के मौक़े पर.

तो तुम्हें दर्दनाक अज़ाब देगा {16} अंधे पर तंगी नहीं (22)
(22) जिहाद से रह जाने में, जब ऊपर की आयत उतरी तो जो लोग अपंग और मजबूर थे उन्होंने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, हमारा क्या हाल होगा. इसपर यह आयत उतरी.

और न लंगड़े पर मुज़ायक़ा और न बीमार पर मुआख़िज़ा(23)
(23) कि ये उज्र ज़ाहिर हैं और जिहाद में हाज़िर न होना उन लोगों के लिये जायज़ है क्योंकि न ये लोग दुश्मन पर हमला करने की ताक़त रखते हैं न उनके हमले से बचने और भागने की. उन्हीं के हुक्म में दाख़िल है वो बूढे दुर्बल जिन्हें उठने बैठने की ताक़त नहीं या जिन्हें दमा और खाँसी है या जिनकी तिल्ली बहुत बढ़ गई है और उन्हें चलना फिरना कठिन है. ज़ाहिर है कि ये मजबूरियाँ जिहाद से रोकने वाली हैं. उनके अलावा और भी मजबूरियाँ है जैसे बहुत ज़्यादा मोहताजी और सफ़र की ज़रूरी हाजतों पर क़ुदरत न रखना या ऐसे ज़रूरी काम जो सफ़र से रोकते हों जैसे किसी ऐसे बीमार की ख़िदमत जिसकी नेअमतें देखभाल उस पर वाजिब है और उसके सिवा कोई करने वाला नहीं.

और जो अल्लाह और उसके रसूल का हुक्म माने अल्लाह उसे बाग़ों में ले जाएगा जिनके नीचे नहरें बहें, और जो फिर जाएगा (24)
(24) ताअत से मुंह फेरेगा और कोई कुफ़्र और दोग़लेपन पर रहेगा.
उसे दर्दनाक अज़ाब फ़रमाएगा {17}

One Response

  1. Assalaam alaikum.
    Hazrat 114 surah kab take complet honge. Hame be sabri se Intizaar hai.

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