49-Surah Al-Huzuraat

49 सूरए हुजुरात

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تُقَدِّمُوا بَيْنَ يَدَيِ اللَّهِ وَرَسُولِهِ ۖ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ سَمِيعٌ عَلِيمٌ
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا تَرْفَعُوا أَصْوَاتَكُمْ فَوْقَ صَوْتِ النَّبِيِّ وَلَا تَجْهَرُوا لَهُ بِالْقَوْلِ كَجَهْرِ بَعْضِكُمْ لِبَعْضٍ أَن تَحْبَطَ أَعْمَالُكُمْ وَأَنتُمْ لَا تَشْعُرُونَ
إِنَّ الَّذِينَ يَغُضُّونَ أَصْوَاتَهُمْ عِندَ رَسُولِ اللَّهِ أُولَٰئِكَ الَّذِينَ امْتَحَنَ اللَّهُ قُلُوبَهُمْ لِلتَّقْوَىٰ ۚ لَهُم مَّغْفِرَةٌ وَأَجْرٌ عَظِيمٌ
إِنَّ الَّذِينَ يُنَادُونَكَ مِن وَرَاءِ الْحُجُرَاتِ أَكْثَرُهُمْ لَا يَعْقِلُونَ
وَلَوْ أَنَّهُمْ صَبَرُوا حَتَّىٰ تَخْرُجَ إِلَيْهِمْ لَكَانَ خَيْرًا لَّهُمْ ۚ وَاللَّهُ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا إِن جَاءَكُمْ فَاسِقٌ بِنَبَإٍ فَتَبَيَّنُوا أَن تُصِيبُوا قَوْمًا بِجَهَالَةٍ فَتُصْبِحُوا عَلَىٰ مَا فَعَلْتُمْ نَادِمِينَ
وَاعْلَمُوا أَنَّ فِيكُمْ رَسُولَ اللَّهِ ۚ لَوْ يُطِيعُكُمْ فِي كَثِيرٍ مِّنَ الْأَمْرِ لَعَنِتُّمْ وَلَٰكِنَّ اللَّهَ حَبَّبَ إِلَيْكُمُ الْإِيمَانَ وَزَيَّنَهُ فِي قُلُوبِكُمْ وَكَرَّهَ إِلَيْكُمُ الْكُفْرَ وَالْفُسُوقَ وَالْعِصْيَانَ ۚ أُولَٰئِكَ هُمُ الرَّاشِدُونَ
فَضْلًا مِّنَ اللَّهِ وَنِعْمَةً ۚ وَاللَّهُ عَلِيمٌ حَكِيمٌ
وَإِن طَائِفَتَانِ مِنَ الْمُؤْمِنِينَ اقْتَتَلُوا فَأَصْلِحُوا بَيْنَهُمَا ۖ فَإِن بَغَتْ إِحْدَاهُمَا عَلَى الْأُخْرَىٰ فَقَاتِلُوا الَّتِي تَبْغِي حَتَّىٰ تَفِيءَ إِلَىٰ أَمْرِ اللَّهِ ۚ فَإِن فَاءَتْ فَأَصْلِحُوا بَيْنَهُمَا بِالْعَدْلِ وَأَقْسِطُوا ۖ إِنَّ اللَّهَ يُحِبُّ الْمُقْسِطِينَ
إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ إِخْوَةٌ فَأَصْلِحُوا بَيْنَ أَخَوَيْكُمْ ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ لَعَلَّكُمْ تُرْحَمُونَ

सूरए हुजुरात मदीने में उतरी, इसमें 18 आयतें, दो रूकू हैं
-पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1) सूरए हुजुरात मदनी है, इसमें दो रूकू, अठारह आयतें, तीन सौ तैंतालीस कलिमे और एक हज़ार चार सौ छिहत्तर अक्षर हैं.

ऐ ईमान वालों अल्लाह और उसके रसूल से आगे न बढ़ो(2)
(2) यानी तुम्हें लाज़िम है कि कभी तुम से तक़दीम वाक़े न हो, न क़ौल में न फ़ेअल, यानी न कहनी में न करनी में कि पहल करना रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के अदब और सम्मान के ख़िलाफ़ है. उनकी बारगाह में नियाज़मन्दी और आदाब लाज़िम हैं. कुछ लोगों ने बक़्र ईद के दिन सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से पहले क़ुर्बानी कर ली तो उनको हुक्म दिया गया कि दोबारा क़ुर्बानी करें और हज़रत आयशा रदियल्लाहो अन्हा से रिवायत है कि कुछ लोग रम़जान से एक रोज़ पहले ही रोज़ा रखना शुरू कर देते थे उनके बारे में यह आयत उतरी और हुक्म दिया गया कि रोज़ा रखने में अपने नबी से आगे मत जाओ.

और अल्लाह से डरो, बेशक अल्लाह सुनता जानता है {1} ऐ ईमान वालों अपनी आवाज़ें ऊंची न करो उस ग़ैब बताने वाले (नबी) की आवाज़ से(3)
(3) यानी जब हुज़ूर में कुछ अर्ज़ करो तो आहिस्ता धीमी आवाज़ में अर्ज़ करो यही दरबारे रिसालत का अदब और एहतिराम है.

और उनके हुज़ूर (समक्ष) बात चिल्लाकर न कहो जैसे आपस में एक दूसरे के सामने चिल्लाते हो कि कहीं तुम्हारे कर्म अक़ारत न हो जाएं और तुम्हें ख़बर न हो(4){2}
(4) इस आयत में हुज़ूर की बुज़ुर्गी और उनका सम्मान बताया गया और हुक्म दिया गया कि पुकारने में अदब का पूरा ध्यान रखें जैसे आपस में एक दूसरे को नाम लेकर पुकारते हैं उस तरह न पुकारें बल्कि अदब और सम्मान के शब्दों के साथ अर्ज़ करो जो अर्ज़ करना हो, कि अदब छोड़ देने से नेकियों के बर्बाद होने का डर है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि यह आयत साबित बिन क़ैस बिन शम्मास के बारे में उतरी. वो ऊंचा सुनते थे और आवाज़ उनकी ऊंची थी. बात करने में आवाज़ बलन्द हो जाया करती थी. जब यह आयत उतरी तो हज़रत साबित अपने घर बैठ रहे और कहने लगे मैं दोज़ख़ी हूँ. हुज़ूर ने हज़रत सअद से उनका हाल दर्याफ़त किया. उन्होंने अर्ज़ किया कि वह मेरी पड़ौसी हैं और मेरी जानकारी में उन्हें कोई बीमारी तो नहीं हुई. फिर आकर हज़रत साबित से इसका ज़िक्र किया. साबित ने कहा यह आयत उतरी है और तुम जानते हो कि मैं तुम सबसे ज़्यादा ऊंची आवाज़ वाला हूँ तो मैं जहन्नमी हो गया. हज़रत सअद ने यह हाल ख़िदमते अक़दस में अर्ज़ किया तो हुज़ूर ने फ़रमाया कि वह जन्नत वालों में से हैं.

बेशक वो जो अपनी आवाज़ें पस्त करते हैं रसूलुल्लाह के पास(5)
(5) अदब और सम्मान के तौर पर. आयत “या अय्युहल्लज़ीना आमनू ला तरफ़ऊ असवातकुम” के उतरने के बाद हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ और उमरे फ़ारूक रदियल्लाहो अन्हुमा और कुछ और सहाबा ने बहुत एहतियात लाज़िम करली और ख़िदमत अक़दस में बहुत ही धीमी आवाज़ से बात करते. उन हज़रात के हक़ में यह आयत उतरी.

वो हैं जिनका दिल अल्लाह ने परहेज़गारी के लिये परख लिया है, उनके लिये बख़्शिश और बड़ा सवाब है {3} बेशक वो जो तुम्हें हुजरों के बाहर से पुकारते हैं उनमें अक्सर बे अक़्ल है (6) {4}
(6) यह आयत बनी तमीम के वफ़्द के हक़ में उतरी कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में दोपहर को पहुंचे जब कि हुज़ूर आराम कर रहे थे. इन लोगों ने हुजरे के बाहर से हुज़ूर को पुकारना शुरू किया. हुज़ूर तशरीफ़ ले आए. उन लोगों के हक़ में यह आयत उतरी और हुज़ूर की शान की बुज़ुर्गी का बयान फ़रमाया गया कि हुज़ूर की बारगाह में इस तरह पुकारना जिहालत और बेअक़्ली है और उनको अदब की तलक़ीन की गई.

और अगर वो सब्र करते यहाँ तक कि तुम आप उनके पास तशरीफ लाते(7)
(7) उस वक़्त वो अर्ज़ करते जो उन्हें अर्ज़ करना था. यह अदब उन पर लाज़िम था, इसको बजा लाते.

तो यह उनके लिये बेहतर था, और अल्ला बख़्शने वाला मेहरबान है (8){5}
(8) इन में से उनके लिये जो तौबह करें.

ऐ ईमान वालों अगर कोई फ़ासिक़ तुम्हारे पास कोई ख़बर लाए तो तहक़ीक़ कर लो(9)
(9) कि सही है या ग़लत. यह आयत वलीद बिन अक़बह के हक़ में उतरी कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उनको बनी मुस्तलक़ से सदक़ात वुसूल करने भेजा था और जिहालत के ज़माने में इनके और उनके दर्मियान दुश्मनी थी. जब वलीद उनके इलाक़े के क़रीब पहुंचे और उन्हें ख़बर हुई तो इस ख़याल से कि वो रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के भेजे हुए हैं, बहुत से लोग अदब से उनके स्वागत के लिये आए. वलीद ने गुमान किया कि ये पुरानी दुश्मनी से मुझे क़त्ल करने आ रहे हैं. यह ख़याल करके वलीद वापस हो गए और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से अर्ज़ कर दिया कि हुज़ूर उन लोगों ने सदक़ा देने को मना कर दिया और मेरे क़त्ल का इरादा किया. हुज़ूर ने ख़ालिद बिन वलीद को तहक़ीक़ के लिये भेजा. हज़रत ख़ालिद ने देखा कि वो लोग अज़ानें कहते हैं, नमाज़ पढ़ते हैं और उन लोगों ने सदक़ात पेश कर दिये. हज़रत ख़ालिद ये सदक़ात ख़िदमते अक़दस में लेकर हाज़िर हुए और हाल अर्ज़ किया. इस पर आयत उतरी. कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा कि यह आयत आम है, इस बयान में उतरी है कि फ़ासिक़ के क़ौल पर भरोसा न किया जाए. इस आयत से साबित हुआ कि एक व्यक्ति अगर आदिल हो तो उसकी ख़बर भरोसे के लायक़ है.

कि कहीं किसी क़ौम को बेजा ईजा (कष्ट) न दे बैठो फिर अपने किये पर पछताते रह जाओ{6} और जान लो कि तुम में अल्लाह के रसूल है(10)
(10) अगर तुम झूट बोलोगे तो अल्लाह तआला के ख़बरदार करने से वह तुम्हारा राज़ ख़ोल कर तुम्हें रूसवा कर देंगे.
बहुत मामलों में अगर यह तुम्हारी ख़ुशी करें(11)
(11) और तुम्हारी राय के मुताबिक हुक्म दे दें.

तो तुम ज़रूर मशक़्क़त में पड़ो लेकिन अल्लाह ने तुम्हें ईमान प्यारा कर दिया है और उसे तुम्हारे दिलों में आरास्ता कर दिया और कुफ़्र और हुक्म अदूली और नाफ़रमानी तुम्हें नागवार कर दी, ऐसे ही लोग राह पर हैं(12){7}
(12) कि सच्चाई के रास्ते पर क़ायम रहे.

अल्लाह का फ़ज़्ल और एहसान, और अल्लाह इल्म व हिकमत वाला है {8} और अगर मुसलमानों के दो दल आपस में लड़े तो उनमें सुलह कराओ(13)
(13) नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम दराज़ गोश (गधे) पर सवार तशरीफ़ ले जाते थे. अन्सार की मज़लीस पर गुज़र हुआ. वहाँ थोड़ी देर ठहरे. उस जगह गधे ने पेशाब किया तो इब्ने उबई ने नाक बन्द कर ली. हज़रत अब्दुल्लाह बिन रवाहा रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि हुज़ूर के दराज़गोश का पेशाब तेरे मुश्क से बेहतर ख़ुश्बू रखता हैं. हुज़ूर तो तशरीफ़ ले गए. उन दोनों में बात बढ़ गई और उन दोनों की क़ौमें आपस में लड़ गई और हाथा पाई की नौबत आई तो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम तशरीफ़ लाए और उनमें सुलह करा दी. इस मामले में यह आयत उतरी.

फिर अगर एक दूसरे पर ज़ियादती करे(14)
(14) जुल्म करे और सुलह से इन्कारी हो जाए. बाग़ी दल का यही हुक्म है कि उससे जंग की जाए यहाँ तक कि वह लड़ाई से बाज़ आए.

तो उस ज़ियादती वाले से लड़ो यहाँ तक कि वह अल्लाह के हुक्म की तरफ़ पलट आए फिर अगर पलट आए तो इन्साफ़ के साथ उनमें इस्लाह कर दो और इन्साफ़ करो, बेशक इन्साफ़ वाले अल्लाह को प्यारे हैं {9} मुसलमान मुसलमान भाई हैं(15)
(15) कि आपस में दीनी सम्बन्ध और इस्लामी महब्बत के साथ जुड़े हुए हैं. यह रिश्ता सारे दुनियवी रिश्तों से ज़्यादा मज़बूत है.

तो अपने दो भाइयों में सुलह करो(16)
(16) जब कभी उनमें मतभेद वाक़े हो.

और अल्लाह से डरो कि तुम पर रहमत हो(17){10}
(17) क्योंकि अल्लाह तआला से डरना और परहेज़गारी इख़्तियार करना ईमान वालों की आपसी महब्बत और दोस्ती का कारण है और जो अल्लाह तआला से डरता है, अल्लाह तआला की रहमत उस पर होती है.

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49-Surah Al-Huzuraat

49 सूरए हुजुरात -दूसरा रूकू

يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا لَا يَسْخَرْ قَوْمٌ مِّن قَوْمٍ عَسَىٰ أَن يَكُونُوا خَيْرًا مِّنْهُمْ وَلَا نِسَاءٌ مِّن نِّسَاءٍ عَسَىٰ أَن يَكُنَّ خَيْرًا مِّنْهُنَّ ۖ وَلَا تَلْمِزُوا أَنفُسَكُمْ وَلَا تَنَابَزُوا بِالْأَلْقَابِ ۖ بِئْسَ الِاسْمُ الْفُسُوقُ بَعْدَ الْإِيمَانِ ۚ وَمَن لَّمْ يَتُبْ فَأُولَٰئِكَ هُمُ الظَّالِمُونَ
يَا أَيُّهَا الَّذِينَ آمَنُوا اجْتَنِبُوا كَثِيرًا مِّنَ الظَّنِّ إِنَّ بَعْضَ الظَّنِّ إِثْمٌ ۖ وَلَا تَجَسَّسُوا وَلَا يَغْتَب بَّعْضُكُم بَعْضًا ۚ أَيُحِبُّ أَحَدُكُمْ أَن يَأْكُلَ لَحْمَ أَخِيهِ مَيْتًا فَكَرِهْتُمُوهُ ۚ وَاتَّقُوا اللَّهَ ۚ إِنَّ اللَّهَ تَوَّابٌ رَّحِيمٌ
يَا أَيُّهَا النَّاسُ إِنَّا خَلَقْنَاكُم مِّن ذَكَرٍ وَأُنثَىٰ وَجَعَلْنَاكُمْ شُعُوبًا وَقَبَائِلَ لِتَعَارَفُوا ۚ إِنَّ أَكْرَمَكُمْ عِندَ اللَّهِ أَتْقَاكُمْ ۚ إِنَّ اللَّهَ عَلِيمٌ خَبِيرٌ
۞ قَالَتِ الْأَعْرَابُ آمَنَّا ۖ قُل لَّمْ تُؤْمِنُوا وَلَٰكِن قُولُوا أَسْلَمْنَا وَلَمَّا يَدْخُلِ الْإِيمَانُ فِي قُلُوبِكُمْ ۖ وَإِن تُطِيعُوا اللَّهَ وَرَسُولَهُ لَا يَلِتْكُم مِّنْ أَعْمَالِكُمْ شَيْئًا ۚ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ رَّحِيمٌ
إِنَّمَا الْمُؤْمِنُونَ الَّذِينَ آمَنُوا بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ ثُمَّ لَمْ يَرْتَابُوا وَجَاهَدُوا بِأَمْوَالِهِمْ وَأَنفُسِهِمْ فِي سَبِيلِ اللَّهِ ۚ أُولَٰئِكَ هُمُ الصَّادِقُونَ
قُلْ أَتُعَلِّمُونَ اللَّهَ بِدِينِكُمْ وَاللَّهُ يَعْلَمُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۚ وَاللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ
يَمُنُّونَ عَلَيْكَ أَنْ أَسْلَمُوا ۖ قُل لَّا تَمُنُّوا عَلَيَّ إِسْلَامَكُم ۖ بَلِ اللَّهُ يَمُنُّ عَلَيْكُمْ أَنْ هَدَاكُمْ لِلْإِيمَانِ إِن كُنتُمْ صَادِقِينَ
إِنَّ اللَّهَ يَعْلَمُ غَيْبَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ وَاللَّهُ بَصِيرٌ بِمَا تَعْمَلُونَ

ऐ ईमान वालों न मर्द मर्दों पर हंसे(1)
(1) यह आयत कई घटनाओं में उतरी. पहली घटना यह है कि साबित बिन क़ैस शम्मास ऊंचा सुनते थे. जब वह सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की मजलिस शरीफ़ में हाज़िर होते तो सहाबा उन्हें आगे बिठाते और उनके लिये जगह ख़ाली कर देते ताकि वह हुज़ूर के क़रीब हाज़िर रहकर कलामे मुबारक सुन सकें. एक रोज़ उन्हें हाज़िरी में देर हो गई और मजलिस शरीफ़ ख़ूब भर गई, उस वक़्त साबित आए और क़ायदा यह था कि जो व्यक्ति ऐसे वक़्त आता और मजलिस में जगह न पाता तो जहाँ होता खड़ा रहता. साबित आए तो वह रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के क़रीब बैठने के लिये लोगों को हटाते हुए यह कहते चले कि जगह दो, जगह दो. यहाँ तक कि वह हुज़ूर के क़रीब पहुंच गए और उनके और हुज़ूर के बीच में सिर्फ़ एक व्यक्ति रह गया. उन्होंने उससे भी कहा कि जगह दो. उसने कहा कि तुम्हे जगह मिल गई. बैठ जाओ. साबित ग़ुस्से में आकर उससे पीछे बैठ गए और जब दिन ख़ूब रौशन हुआ तो साबित ने उसका बदन दबा कर कहा कि कौन? उसने कहा मैं फ़लाँ व्यक्ति हूँ. साबित ने उसकी माँ का नाम लेकर कहा कि फ़लानी का लड़का. इस पर उस आदमी ने शर्म से सर झुका लिया. उस ज़माने में ऐसा कलिमा शर्म दिलाने के लिये बोला जाता था. इसपर यह आयत उतरी. दूसरा वाक़िआ ज़ुहाक ने बयान किया कि यह आयत बनी तमीम के हक़ में उतरी जो हज़रत अम्मार व ख़बाब व बिलालद व सुहैब व सलमान व सालिम वग़ैरह ग़रीब सहाबा की ग़रीबी देखकर उनका मज़ाक़ उड़ाते थे. उनके हक़ में यह आयत उतरी और फ़रमाया गया कि मर्द मर्दों से न हंसे यानी मालदार ग़रीबों की हंसी न बनाएं, न ऊंचे ख़ानदान वाले नीचे ख़ानदान वालों की, और न तन्दुरूस्त अपाहिज की, न आँख वाले उसकी जिसकी आँख में दोष हो.

अजब नहीं कि वो उन हंसने वालों से बेहतर हों(2)
(2) सच्चाई और इख़लास में.

और न औरतें औरतों से दूर नहीं कि वो उन हंसने वालियों से बेहतर हो(3)
(3) यह आयत उम्मुल मूमिनीन हज़रत सफ़िया बिन्ते हैय रदियल्लाहो अन्हा के हक़ में उतरी. उन्हें मालूम हुआ था कि उम्मुल मूमिनीन हज़रत हफ़सा ने उन्हें यहूदी की बेटी कहा. इस पर उन्हें दुख हुआ और रोईं और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से शिकायत की तो हुज़ूर ने फ़रमाया कि तुम नबीज़ादी और नबी की बीबी हो तुम पर वह क्या फ़ख्र रखती हैं और हज़रत हफ़सा से फ़रमाया, ऐ हफ़सा ख़ुदा से डरो. (तिरमिज़ी)
और आपस में तअना न करो(4)
(4) एक दूसरे पर ऐब न लगाओ. अगर एक मूमिन ने दूसरे मूमिन पर ऐब लगाया तो गोया अपने ही आपको ऐब लगाया.

और एक दूसरे के बुरे नाम न रखो (5)
(5) जो उन्हें नागवार मालूम हो. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि अगर किसी आदमी ने किसी बुराई से तौबह कर ली हो, उसको तौबह के बाद उस बुराई से शर्म दिलाना भी इस मनाही में दाख़िल है. कुछ उलमा ने फ़रमाया कि किसी मुसलमान को कुत्ता या गधा या सुअर कहना भी इसी में दाख़िल है. कुछ उलमा ने फ़रमाया कि इससे वो अलक़ाब मुराद हैं जिन से मुसलमान की बुराई निकलती हो और उसको नागवार हो, लेकिन तारीफ़ के अलक़ाब जो सच्चे हों मना नहीं जैसे कि हज़रत अबू बक्र का लक़ब अतीक़ और हज़रत उमर का फ़ारूक और हज़रत उस्मान का ज़ुन-नूरैन और हज़रत अली का अबू तुराब और हज़रत ख़ालिद का सैफ़ुल्लाह, रदियल्लाहो अन्हुम. और जो अलक़ाब पहचान की तरह हो गए और व्यक्ति विशेष को नागवार नहीं वो अलक़ाब भी मना नहीं जैसे कि अअमश, अअरज.

क्या ही बुरा नाम है मुसलमान होकर फ़ासिक़ कहलाना(6)
(6) तो ऐ मुसलमानों किसी मुसलमान की हंसी बनाकर या उसको ऐब लगाकर या उसका नाम बिगाड़ कर अपने आपको फ़ासिक़ न कहलाओ.

और जो तौबह न करें तो वही ज़ालिम हैं {11} ऐ, ईमान वालों बहुत ग़ुमानों से बचो(7)
(7) क्योंकि हर गुमान सही नहीं होता.

बेशक कोई ग़ुमान गुनाह हो जाता है (8)
(8) नेक मूमिन के साथ बुरा गुमान मना है इसी तरह उसका कोई कलाम सुनकर ग़लत अर्थ निकालना जबकि उसके दूसरे सही मानी मौजूद हों और मुसलमान का हाल उनके अनुसार हो, यह भी बुरे गुमान में दाख़िल है. सुफ़ियान सौरी रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया गुमान दो तरह का होता है एक वह कि दिलों में आए और ज़बान से भी कह दिया जाए. यह अगर मुसलमान पर बुराई के साथ है तो गुनाह है. दूसरा यह कि दिल में आए ज़बान से न कहा जाए. यह अगरचे गुनाह नहीं मगर इससे भी दिल ख़ाली करना ज़रूरी है. गुमान की कई किस्में है एक वाजिब है, वह अल्लाह के साथ अच्छा गुमान रखना. एक ममनूअ और हराम, वह अल्लाह तआला के साथ बुरा गुमान करना और मूमिन के साथ बुरा गुमान करना. एक जायज़, वह खुले फ़ासिक़ के साथ ऐसा गुमान करना जैसे काम वह करता हो.

और ऐब (दोष) न ढूंढो(9)
(9) यानी मुसलमानों के दोष तलाश न करो और उनके छुपे हाल की जुस्तजू में न रहो, जिसे अल्लाह तआला ने अपनी सत्तारी से छुपाया. हदीस शरीफ़ में है गुमान से बचो, गुमान बड़ी झूटी बात है, और मुसलमान के दोष मत तलाश करो. उनके साथ जहल, हसद बुग़्ज़ और बेमुरव्वती न करो. ऐ अल्लाह तआला के बन्दो, भाई बने रहो जैसे तुम्हें हुक्म दिया गया. मुसलमान मुसलमान का भाई है, उस पर ज़ुल्म न करे, उसको रूस्वा न करे, उसकी तहक़ीर न करे. तक़वा यहाँ है, तक़वा यहाँ है, तक़वा यहाँ है. (और “यहाँ” के शब्द से अपने सीने की तरफ़ इशारा फ़रमाया) आदमी के लिये यह बुराई बहुत है कि अपने मुसलमान भाई को गिरी हुई नज़रों से देखे. हर मुसलमान मुसलमान पर हराम है. उसका ख़ून भी, उसकी आबरू भी, उसका माल भी. (बुख़ारी व मुस्लिम) हदीस में है जो बन्दा दुनिया में दुसरे की पर्दा पोशी करता है, अल्लाह तआला क़यामत के दिन उसकी पर्दा पोशी फ़रमाएगा.

और एक दूसरे की ग़ीबत न करो(10)
(10) हदीस शरीफ़ में है कि ग़ीबत यह है कि मुसलमान भाई के पीठ पीछे ऐसी बात कही जाए जो उसे नागवार गुज़रे अगर यह बात सच्ची है तो ग़ीबत है, वरना बोहतान.

क्या तुम में कोई पसन्द रखेगा कि अपने मरे भाई का गोश्त खाए तो यह तुम्हें गवारा न होगा(11)
(11) तो मुसलमान भाई की ग़ीबत भी गवारा नहीं होनी चाहिये. क्योंकि उसको पीठ पीछे बुरा कहना उसके मरने के बाद उसका गोश्त खाने के बराबर है. क्योकि जिस तरह किसी का गोश्त काटने से उसको तकलीफ़ होती है उसी तरह उसको बदगोई से दिली तकलीफ़ होती है. और वास्तव में आबरू गोश्त से ज़्यादा प्यारी है. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम जब जिहाद के लिये रवाना होते और सफ़र फ़रमाते तो हर दो मालदारों के साथ एक ग़रीब मुसलमान को कर देते कि वह ग़रीब उनकी ख़िदमत करे, वो उसे खिलाएं पिलाएं. हर एक का काम चले. इसी तरह हज़रत सलमान रदियल्लाहो अन्हो दो आदमियों के साथ किये गए. एक रोज़ वह सो गए और खाना तैयार न कर सके तो उन दोनों ने उन्हें खाना तलब करने के लिये रसूले ख़ुदा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में भेजा. हुजूर की रसोई के ख़ादिम हज़रत उसामह रदियल्लाहो अन्हो थे. उनके पास कुछ रहा न था. उन्हों ने फ़रमाया कि मेरे पास कुछ नहीं है. हज़रत सलमान ने आकर यही कह दिया तो उन दोनों साथियों ने कहा कि उसामह ने कंजूसी की. जब वह हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुए, फ़रमाया मैं तुम्हारे मुंह में गोश्त की रंगत देखता हूँ. उन्होंने अर्ज़ किया हम ने गोश्त खाया ही नहीं. फ़रमाया तुमने ग़ीबत की और जो मुसलमान की ग़ीबत करे उसने मुसलमान का गोश्त खाया. ग़ीबत के बारे में सब एकमत हैं कि यह बड़े गुनाहों में से है. ग़ीबत करने वाले पर तौबह लाज़िम है. एक हदीस में यह है कि ग़ीबत का कफ़्फ़ारा यह है कि जिसकी ग़ीबत की है उसके लिये मग़फ़िरत की दुआ करे. कहा गया है खुले फ़ासिक़ के दोषों का बयान करो कि लोग उससे बचें. हसन रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है कि तीन व्यक्तियों की बुराई या उनके दोष बयान करना ग़ीबत नहीं. एक साहिबे हवा (बदमज़हब), दूसरा खुला फ़ासिक़ तीसरा ज़ालिम बादशाह.

और अल्लाह से डरो बेशक अल्लाह बहुत तौबह क़ुबूल करने वाला मेहरबान है {12} ऐ लोगों हमने तुम्हें एक मर्द(12)
(12) हज़रत आदम अलैहिस्सलाम.

और एक औरत (13)
(13) हज़रत हव्वा.

से पैदा किया(14)
(14) नसब के इस इन्तिहाई दर्जे पर जाकर तुम सब के सब मिल जाते हो तो नसब में घमण्ड करने की कोई वजह नहीं. सब बराबर हो. एक जद्दे अअला की औलाद.

और तुम्हें शाख़ें और क़बीले किया कि आपस में पहचान रखो (15)
(15) और एक दूसरे का नसब जाने और कोई अपने बाप दादा के सिवा दूसरे की तरफ़ अपनी निस्बत न करे, न यह कि नसब पर घमण्ड करे औरि दूसरों की तहक़ीर करे. इसके बाद उस चीज़ कर बयान फ़रमाया जाता है जो इन्सान के लिये शराफ़त और फ़ज़ीलत का कारण और जिससे उसको अल्लाह की बारगाह में इज़्ज़त हासिल होती है.

बेशक अल्लाह के यहाँ तुम में ज़्यादा ईज़्ज़त वाला वह जो तुम में ज़्यादा परहेज़गार हैं(16)
(16) इससे मालूम हुआ कि इज़्ज़त और फ़ज़ीलत का आधार परहेज़गारी पर है न कि नसब पर. रसूल करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने मदीने के बाज़ार में एक हब्शी ग़ुलाम देखा जो यह कह रहा था कि जो मुझे ख़रीदे उससे मेरी यह शर्त है कि मुझे रसूले अकरम रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के पीछे पाँचों नमाज़ें अदा करने से मना न करे. उस ग़ुलाम को एक शख़्स ने ख़रीद लिया फिर वह ग़ुलाम बीमार हो गया तो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उसकी अयादत के लिये तशरीफ़ लाए फिर उसकी वफ़ात हो गई और रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम उसके दफ़्न में तशरीफ़ लाए. इसपर लोगों ने कुछ कहा. तब यह आयत उतरी.

बेशक अल्लाह जानने वाला ख़बरदार है {13} गंवार बोले हम ईमान लाए(17)
(17) यह आयत बनी असद बिन ख़ुजैमह की एक जमाअत के हक़ में नाज़िल हुई जो दुष्काल के ज़माने में रसूल करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुए और उन्हों ने इस्लाम का इज़हार किया और हक़ीक़त में वो ईमान न रखते थे. उन लोगों ने मदीने के रस्ते में गन्दगियाँ कीं और वहाँ के भाव मेंहगे कर दिये. सुब्ह शाम रसूले अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में आकर अपने इस्लाम लाने का एहसान जताते और कहते हमें कुछ दीजिये. उनके बारे में यह आयत उतरी.

तुम फ़रमाओ तुम ईमान तो न लाए (18)
(18) दिल की सच्चाई से.

हाँ यूं कहो कि हम मुतीअ हुए (19)
(19) ज़ाहिर में.

और अभी ईमान तुम्हारे दिलों में कहाँ दाख़िल हुआ (20)
(20) केवल ज़बानी इक़रार, जिसके साथ दिल की तस्दीक़ न हो, भरोसे के क़ाबिल नहीं. इससे आदमी मूमिन नहीं होता. इताअत और फ़रमाँबरदारी इस्लाम के लुग़वी मानी हैं, और शरई मानी में इस्लाम और ईमान एक हैं, कोई फ़र्क़ नहीं.

और अगर तुम अल्लाह और उसके रसूल की फ़रमाँबरदारी करोगे(21)
(21) ज़ाहिर में और बातिल में, दिल की गहराई और सच्चाई से निफ़ाक़ अर्थात दोहरी प्रवृत्ति को छोड़कर.

तो तुम्हारे किसी कर्म का तुम्हें नुक़सान न देगा(22)
(22) तुम्हारी नेकियों का सवाब कम न करेगा.

बेशक अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है {14} ईमान वाले तो वही हैं जो अल्लाह और उसके रसूल पर ईमान लाए फिर शक न किया(23)
(23) अपने दीन और ईमान में.

और अपनी जान और माल से अल्लाह की राह में जिहाद किया, वही सच्चे हैं (24){15}
(24) ईमान के दावे में, जब ये दोनों आयतें उतरीं तो अरब लोग सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर हुए और उन्होंने क़स्में ख़ाई कि हम सच्चे मूमिन हैं. इसपर अगली आयत उतरी और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को ख़िताब फ़रमाया गया.

तुम फ़रमाओ क्या तुम अल्लाह को अपना दीन बताते हो और अल्लाह जानता है जो कुछ आसमानों में और जो कुछ ज़मीन में है,(25)
(25) उससे कुछ छुपा हुआ नहीं.

और अल्लाह सब कुछ जानता है (26) {16}
(26) मूमिन का ईमान भी और मुनाफ़िक़ का दोग़लापन भी. तुम्हारे बताने और ख़बर देने की हाजत नहीं.

ऐ मेहबूब वो तुम पर एहसान जताते हैं कि मुसलमान हो गए, तुम फ़रमाओ अपने इस्लाम का एहसान मुझे पर न रखो, बल्कि अल्लाह तुम पर एहसान रखता है कि उसने तुम्हें इस्लाम की हिदायत की अगर तुम सच्चे हो(27) {17}
(27) अपने दावे में.

बेशक अल्लाह जानता है आसमानों और ज़मीन के सब ग़ैब, और अल्लाह तुम्हारे काम देख रहा है(28) {18}
(28) उससे तुम्हारा हाल छुपा नहीं, न ज़ाहिर न बातिन.

48-Surah-Fatah

48 सूरए फ़त्ह -चौथा रूकू

لَّقَدْ صَدَقَ اللَّهُ رَسُولَهُ الرُّؤْيَا بِالْحَقِّ ۖ لَتَدْخُلُنَّ الْمَسْجِدَ الْحَرَامَ إِن شَاءَ اللَّهُ آمِنِينَ مُحَلِّقِينَ رُءُوسَكُمْ وَمُقَصِّرِينَ لَا تَخَافُونَ ۖ فَعَلِمَ مَا لَمْ تَعْلَمُوا فَجَعَلَ مِن دُونِ ذَٰلِكَ فَتْحًا قَرِيبًا
هُوَ الَّذِي أَرْسَلَ رَسُولَهُ بِالْهُدَىٰ وَدِينِ الْحَقِّ لِيُظْهِرَهُ عَلَى الدِّينِ كُلِّهِ ۚ وَكَفَىٰ بِاللَّهِ شَهِيدًا
مُّحَمَّدٌ رَّسُولُ اللَّهِ ۚ وَالَّذِينَ مَعَهُ أَشِدَّاءُ عَلَى الْكُفَّارِ رُحَمَاءُ بَيْنَهُمْ ۖ تَرَاهُمْ رُكَّعًا سُجَّدًا يَبْتَغُونَ فَضْلًا مِّنَ اللَّهِ وَرِضْوَانًا ۖ سِيمَاهُمْ فِي وُجُوهِهِم مِّنْ أَثَرِ السُّجُودِ ۚ ذَٰلِكَ مَثَلُهُمْ فِي التَّوْرَاةِ ۚ وَمَثَلُهُمْ فِي الْإِنجِيلِ كَزَرْعٍ أَخْرَجَ شَطْأَهُ فَآزَرَهُ فَاسْتَغْلَظَ فَاسْتَوَىٰ عَلَىٰ سُوقِهِ يُعْجِبُ الزُّرَّاعَ لِيَغِيظَ بِهِمُ الْكُفَّارَ ۗ وَعَدَ اللَّهُ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ مِنْهُم مَّغْفِرَةً وَأَجْرًا عَظِيمًا

बेशक अल्लाह ने सच कर दिया अपने रसूल का सच्चा ख़्वाब (1)
(1) रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हुदैबिय्यह का इरादा फ़रमाने से पहले मदीनए तैय्यिबह में ख़्वाब देखा था कि आप सहाबा के साथ मक्कए मुअज़्ज़मा में दाख़िल हुए और सहाबा ने सर के बाल मुंडाए, कुछ ने छोटे करवाए. यह ख़्वाब आपने अपने सहाबा से बयान किया तो उन्हें ख़ुशी हुई और उन्होंने ख़याल किया कि इसी साल वो मक्कए मुकर्रमा में दाख़िल होंगे. जब मुसलमान हुदैबिय्यह से सुलह के बाद वापस हुए और उस साल मक्कए मुकर्रमा में दाख़िला न हुआ तो मुनाफ़िक़ों ने मज़ाक़ किया, तअने दिये और कहा कि वह ख़्वाब क्या हुआ. इस पर अल्लाह तआला ने यह आयत उतारी और उस ख़्वाब के मज़मून की तस्दीक़ फ़रमाई कि ज़रूर ऐसा होगा. चुनांन्चे अगले साल ऐसा ही हुआ और मुसलमान अगले साल बड़ी शान व शौकत के साथ मक्कए मुकर्रमा में विजेता के रूप में दाख़िल हुए.

बेशक तुम ज़रूर मस्जिदे हराम में दाख़िल होंगे अगर अल्लाह चाहे अम्नो अमान से अपने सरों के(2)
(2) सारे.

बाल मुंडाते या(3)
(3) थोड़े से.

तरशवाते बेख़ौफ़, तो उसने जाना जो तुम्हे मालूम नहीं(4)
(4) यानी यह कि तुम्हारा दाख़िल होना अगले साल है और तुम इसी साल समझे थे और तुम्हारे लिये यह देरी बेहतर थी कि इसके कारण वहाँ के कमज़ोर मुसलमान पामाल होने से बच गए.

तो उससे पहले (5)
(5) यानी हरम में दाख़िले से पहले.

एक नज़्दीक़ आने वाली फ़त्ह रखी(6) {27}
(6) ख़ैबर की विजय, कि वादा की गई विजय के हासिल होने तक मुसलमानों के दिल इस से राहत पाएं. उसके बाद जब अगला साल आया तो अल्लाह तआला ने हुज़ूर के ख़्वाब का जलवा दिखाया और घटनाएं उसी के अनुसार घटीं. चुनांन्वे इरशाद फ़रमाता है.
वही है जिसने अपने रसूल को हिदायत और सच्चे दीन के साथ भेजा कि उसे सब दीनों पर ग़ालिब करे(7)
(7) चाहे वो मुश्रिकों के दीन हों या एहले किताब के. चुनांन्चे अल्लाह तआला ने यह नेअमत अता फ़रमाई और इस्लाम को तमाम दीनों पर ग़ालिब फ़रमा दिया.

और अल्लाह काफ़ी है गवाह (8){28}
(8) अपने हबीब मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की.

मुहम्मद अल्लाह के रसूल हैं और उनके साथ वाले (9)
(9) यानी उसके साथी.

काफ़िरों पर सख़्त हैं(10)
(10) जैसा कि शेर शिकार पर, और सहाबा की सख़्ती काफ़िरों के साथ इस क़द्र थीं कि वो लिहाज़ रखते थे कि उनका बदन किसी काफ़िर के बदन से न छू जाए और उनके कपड़े पर किसी काफ़िर का कपड़ा न लगने पाए. (मदारिक)

और आपस में नर्म दिल (11)
(11) एक दूसरे पर मेहरबानी करने वाले कि जैसे बाप बेटे में हो और यह महब्बत इस हद तक पहुंच गई कि जब एक मूमिन दूसरे को देखे तो महब्बत के जोश से हाथ मिलाए और गले से लगाए.

उन्हें देखेगा रूकू करते सज्दे में गिरते(12)
(12) बहुतान से नमाज़े पढ़ते, नमाज़ों पर हमेशगी करते.

अल्लाह का फ़ज़्ल और रज़ा चाहते, उनकी निशानी उनके चेहरों में है सज्दों के निशान से(13)
(13) और यह अलामत वह नूर है जो क़यामत के दिन उनके चेहरों पर चमकता होगा उससे पहचाने जाएंगे कि उन्होंने दुनिया में अल्लाह तआला के लिये बहुत सज्दे किये हैं और यह भी कहा गया है कि उनके चेहरों में सज्दे की जगह चौदहवीं के चाँद की तरह चमकती होगी. अता का क़ौल है कि रात की लम्बी नमाज़ों से उनके चेहरों पर नूर नुमायाँ होता है जैसा कि हदीस शरीफ़ में है कि जो रात को नमाज़ की बहुतात रखता है सुब्ह को उसका चेहरा ख़ूबसूरत हो जाता है यह भी कहा गया है कि मिट्टी का निशान भी सज्दे की अलामत है.

यह उनकी सिफ़त (विशेषता) तौरात में है और उनकी सिफ़त इंजील में हैं(14)
(14) यह बयान किया गया है कि.

जैसे एक खेती उसने अपना पट्ठा निकाला फिर उसे ताक़त दी फिर दबीज़ (मोटी) हुई फिर अपनी पिंडली पर सीधी खड़ी हुई किसानों को भली लगती है (15)
(15) यह उदाहरण इस्लाम की शुरूआत और उसकी तरक़्की की बयान की गई कि नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम अकेले उठे फिर अल्लाह तआला ने आप को आपके सच्चे महब्बत रखने वाले साथियों से क़ुव्वत अता फ़रमाई. क़तादह ने कहा कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के सहाबा की मिसाल इन्जील में यह लिखी है कि एक क़ौम खेती की तरह पैदा होगी और वो नेकियों का हुक्म करेंगे, बुराईयों से रोकेंगे, कहा गया है कि खेती हुज़ूर है और उसकी शाख़े सहाबा और ईमान वाले.

ताकि उनसे काफ़िरों के दिल जलें, अल्लाह ने वादा किया उनसे जो उनमें ईमान और अच्छे कामों वाले हैं (16)
(16) सहाबा सबके सब ईमान वाले और नेक कर्मों वाले हैं इसलिये यह वादा सभी से है.
बख़्शिश और बड़े सवाब का{29}

48-Surah-Fatah

48 सूरए फ़त्ह -तीसरा रूकू

۞ لَّقَدْ رَضِيَ اللَّهُ عَنِ الْمُؤْمِنِينَ إِذْ يُبَايِعُونَكَ تَحْتَ الشَّجَرَةِ فَعَلِمَ مَا فِي قُلُوبِهِمْ فَأَنزَلَ السَّكِينَةَ عَلَيْهِمْ وَأَثَابَهُمْ فَتْحًا قَرِيبًا
وَمَغَانِمَ كَثِيرَةً يَأْخُذُونَهَا ۗ وَكَانَ اللَّهُ عَزِيزًا حَكِيمًا
وَعَدَكُمُ اللَّهُ مَغَانِمَ كَثِيرَةً تَأْخُذُونَهَا فَعَجَّلَ لَكُمْ هَٰذِهِ وَكَفَّ أَيْدِيَ النَّاسِ عَنكُمْ وَلِتَكُونَ آيَةً لِّلْمُؤْمِنِينَ وَيَهْدِيَكُمْ صِرَاطًا مُّسْتَقِيمًا
وَأُخْرَىٰ لَمْ تَقْدِرُوا عَلَيْهَا قَدْ أَحَاطَ اللَّهُ بِهَا ۚ وَكَانَ اللَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرًا
وَلَوْ قَاتَلَكُمُ الَّذِينَ كَفَرُوا لَوَلَّوُا الْأَدْبَارَ ثُمَّ لَا يَجِدُونَ وَلِيًّا وَلَا نَصِيرًا
سُنَّةَ اللَّهِ الَّتِي قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلُ ۖ وَلَن تَجِدَ لِسُنَّةِ اللَّهِ تَبْدِيلًا
وَهُوَ الَّذِي كَفَّ أَيْدِيَهُمْ عَنكُمْ وَأَيْدِيَكُمْ عَنْهُم بِبَطْنِ مَكَّةَ مِن بَعْدِ أَنْ أَظْفَرَكُمْ عَلَيْهِمْ ۚ وَكَانَ اللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرًا
هُمُ الَّذِينَ كَفَرُوا وَصَدُّوكُمْ عَنِ الْمَسْجِدِ الْحَرَامِ وَالْهَدْيَ مَعْكُوفًا أَن يَبْلُغَ مَحِلَّهُ ۚ وَلَوْلَا رِجَالٌ مُّؤْمِنُونَ وَنِسَاءٌ مُّؤْمِنَاتٌ لَّمْ تَعْلَمُوهُمْ أَن تَطَئُوهُمْ فَتُصِيبَكُم مِّنْهُم مَّعَرَّةٌ بِغَيْرِ عِلْمٍ ۖ لِّيُدْخِلَ اللَّهُ فِي رَحْمَتِهِ مَن يَشَاءُ ۚ لَوْ تَزَيَّلُوا لَعَذَّبْنَا الَّذِينَ كَفَرُوا مِنْهُمْ عَذَابًا أَلِيمًا
إِذْ جَعَلَ الَّذِينَ كَفَرُوا فِي قُلُوبِهِمُ الْحَمِيَّةَ حَمِيَّةَ الْجَاهِلِيَّةِ فَأَنزَلَ اللَّهُ سَكِينَتَهُ عَلَىٰ رَسُولِهِ وَعَلَى الْمُؤْمِنِينَ وَأَلْزَمَهُمْ كَلِمَةَ التَّقْوَىٰ وَكَانُوا أَحَقَّ بِهَا وَأَهْلَهَا ۚ وَكَانَ اللَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمًا

बेशक अल्लाह राज़ी हुआ ईमान वालों से जब वो उस पेड़ के नीचे तुम्हारी बैअत करते थे(1)
(1) हुदैबिय्यह में चूंकि उन बैअत करने वालों को अल्लाह की रज़ा की ख़ुशख़बरी दी गई इसलिये उस बैअत को बैअते रिज़वान कहते हैं. इस बैअत का ज़ाहिरी कारण यह हुआ कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हुदैबिय्यह से हज़रत उसमाने ग़नी रदियल्लाहो अन्हो को क़ुरैश के सरदारों के पास मक्कए मुकर्रमा भेजा कि उन्हें ख़बर दें कि हम बैतुल्लाह की ज़ियारत और उमरे की नियत से आए हैं हमारा इरादा जंग का नहीं है. और यह भी फ़रमा दिया था कि जो कमज़ोर मुसलमान वहाँ हैं उन्हें इत्मीनान दिला दें कि मक्कए मुकर्रमा बहुत जल्द फ़त्ह होगा और अल्लाह तआला अपने दीन को ग़ालिब फ़रमाएगा. क़ुरैश इस बात पर सहमत रहे कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम इस साल न आएं और हज़रत उस्माने ग़नी रदियल्लाहो अन्हो से कहा कि अगर आप काबे का तवाफ़ करना चाहें तो करलें. हज़रत उस्माने ग़नी ने फ़रमाया ऐसा कैसे हो सकता है कि मैं रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के बिना तवाफ़ करूं. यहाँ मुसलमानों ने कहा कि उस्माने ग़नी रदियल्लाहो अन्हो बड़े ख़ुशनसीब हैं जो काबए मुअज़्ज़मा पहुंचे और तवाफ़ से मुशर्रफ़ हुए. हुज़ूर ने फ़रमाया मैं जानता हूँ कि वो हमारे बग़ैर तवाफ़ न करेंगे. हज़रत उस्माने गनी रदियल्लाहो अन्हो ने मक्के के कमज़ोर मुसलमानों को आदेशनुसार फ़त्ह की ख़ुशख़बरी भी पहुंचाई फिर क़ुरैश ने हज़रत उस्माने ग़नी को रोक लिया. यहाँ यह ख़बर मशहूर हो गई कि उस्माने ग़नी रदियल्लाहो अन्हो शहीद कर दिये गए. इसपर मुसलमानों को बहुत जोश आया और रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने सहाबा से काफ़िरों के मुक़ाबले में जिहाद में डटे रहने पर बैअत ली. यह बैअत एक बड़े काँटेदार दरख़्त के नीचे हुई जिसको अरब में समुरह कहते हैं. हुज़ूर ने अपना बायां दस्ते मुबारक दाएं दस्ते अक़दस में लिया और फ़रमाया कि यह उस्मान (रदियल्लाहो अन्हो) की बैअत है और फ़रमाया यारब उस्मान तेरे और तेरे रसूल के काम में हैं. इस घटना से मालूम होता है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को नबुव्वत के नूर से मालूम था कि हज़रत उस्मान रदियल्लाहो अन्हो शहीद नहीं हुए जभी तो उनकी बैअत ली. मुश्रिकों में इस बैअत का हाल सुनकर डर छा गया और उन्होंने हज़रत उस्माने ग़नी रदियल्लाहो अन्हो को भेज दिया. हदीस शरीफ़ में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया जिन लोगों ने दरख़्त के नीचे बैअत ली थी उनमें से कोई भी दोज़ख़ में दाख़िल न होगा. (मुस्लिम शरीफ़) और जिस दरख़्त के नीचे बैअत की गई थी अल्लाह तआला ने उसको आँखों से पोशीदा कर दिया सहाबा ने बहुत तलाश किया किसी को उसका पता न चला.

तो अल्लाह ने जाना जो उनके दिलों में है(2)
(2) सच्चाई, सच्ची महब्बत और वफ़ादारी.

तो उनपर इत्मीनान उतारा और उन्हें ज़ल्द आने वाली फ़त्ह का इनाम दिया(3){18}
(3) यानी ख़ैबर की विजय का जो हुदैबिय्यह से वापस होकर छ माह बाद हासिल हुई.

और बहुत सी ग़नीमतें(4)
(4) ख़ैबर की और ख़बर वालों के माल कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने तक़सीम फ़रमाए.

जिन को लें, और अल्लाह इज़्ज़त व हिकमत वाला है {19} और अल्लाह ने तुम से वादा किया है बहुत सी ग़नीमतों का कि तुम लोगे (5)
(5) और तुम्हारी विजय होती रहेगी.

तो तुम्हें वह ज़ल्द अता फ़रमा दी और लोगों के हाथ तुमसे रोक दिये(6)
(6) कि वो डर कर तुम्हारे बाल बच्चों को हानि न पहुंचा सके. इसका वाक़िआ यह था कि जब मुसलमान ख़ैबर की जंग के लिये रवाना हुए तो ख़ैबर वासियों के हलीफ़ बनी असद और ग़ितफान ने चाहा कि मदीनए तैय्यिबह पर हमला करके मुसलमानों के बाल बच्चों को लूट लें. अल्लाह तआला ने उनके दिलों में रोब डाला और उनके हाथ रोक दिये.

और इसलिये कि ईमान वालों के लिये निशानी हो(7)
(7) यह ग़नीमत देना और दुश्मनों के हाथ रोक देना.

और तुम्हें सीधी राह दिखा दे(8){20}
(8) अल्लाह तआला पर तवक्कुल करने और काम उस पर छोड़ देने की जिससे बसीरत और यक़ीन ज़्यादा हो.

और एक और (9)
(9) फ़त्ह.

जो तुम्हारे बल की न थी (10)
(10) मुराद इससे फ़ारस और रूम की ग़नीमतें हैं या ख़ैबर की जिसका अल्लाह तआला ने पहले से वादा फ़रमाया था और मुसलमानों को कामयाबी की उम्मीद थी. अल्लाह तआला ने उन्हें विजय दिलाई. और एक क़ौल यह है कि वह फ़त्हे मक्का है. और एक यह क़ौल है कि वह हर फ़त्ह है जो अल्लाह तआला ने मुसलमानों को अता फ़रमाई.

वह अल्लाह के क़ब्ज़े में है, और अल्लाह हर चीज़ पर क़ादिर है {21} और अगर काफ़िर तुम से लड़ें(11)
(11) यानी मक्के वालों या ख़ैबर वासियों के सहयोगी असद, ग़ित्फ़ान.

तो ज़रूर तुम्हारे मुक़ाबले से पीठ फेर देंगे(12)
(12) पराजित होंगे और उन्हें मुंह की खानी पड़ेगी.

फिर कोई हिमायती न पाएंगे न मददगार {22} अल्लाह का दस्तूर है कि पहले से चला आता है(13)
(13) कि वह ईमान वालों की मदद फ़रमाता है और काफ़िरों को ज़लील करता है.

और हरगिज़ तुम अल्लाह का दस्तूर बदलता न पाओगे {23} और वही है जिसने उनके हाथ (14)
(14) यानी काफ़िरों के.

तुम से रोक दिये और तुम्हारे हाथ उनसे रोक दिये मक्का की घाटी में (15)
(15) मक्का की विजय का दिन. एक क़ौल यह है कि बत्ने मक्का से हुदैबिय्यह मुराद है और इस आयत के उतरने की परिस्थितियों में हज़रत अनस रदियल्लाहो अन्हो कहते हैं कि मक्के वालों में से अस्सी हथियार बन्द जवान जबले तनईम से मुसलमानों पर हमला करने के इरादे से उतरे. मुसलमानों ने उन्हें गिरफ़्तार करके सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ख़िदमत में हाज़िर किया. हुज़ूर ने माफ़ फ़रमा दिया और उन्हें जाने दिया.

बाद इसके कि तुम्हें उनपर क़ाबू दे दिया था और अल्लाह तुम्हारे काम देखता है(16){24}
(16)मक्के के काफ़िर.

वो हैं जिन्होंने कुफ़्र किया और तुम्हें मस्जिदें हराम से(17)
(17) वहाँ पहुंचने से और उसका तवाफ़ करने से.

रोका और क़ुरबानी के जानवर रूके पड़े अपनी जगह पहुंचने से (18)
(18) यानी ज़िब्ह के मक़ाम से जो हरम में है.

और अगर यह न होता कुछ मुसलमान मर्द और कुछ मुसलमान औरतें (19)
(19) मक्कए मुकर्रमा में है.

जिनकी तुम्हें ख़बर नहीं(20)
(20) तुम उन्हें पहचाने नहीं.

कहीं तुम उन्हें रौंदे डालो(21)
(21) काफ़िरों से जंग करने में.

तो तुम्हें उनकी तरफ़ से अनजानी में कोई मकरूह पहुंचे तो हम तुम्हें उनके क़िताल की इजाज़त देते उनका यह बचाव इसलिये है कि अल्लाह अपनी रहमत में दाख़िल करें जिसे चाहे, अगर वो जुदा हो जाते(22)
(22) यानी मुसलमान काफ़िरों से मुम्ताज़ हो जाते.

तो हम ज़रूर उनमें के काफ़िरों को दर्दनाक अज़ाब देते(23) {25}
(23) तुम्हारे हाथ से क़त्ल कराके और तुम्हारी कै़द में लाके.

जब कि काफ़िरों ने अपने दिलों में आड़ रखी है वही अज्ञानता के ज़माने की आड़ (24)
(24) कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और हुज़ूर के सहाबा को काबए मुअज़्ज़मा से रोका.

तो अल्लाह ने अपना इत्मीनान अपने रसूल और ईमान वालों पर उतारा (25)
(25) कि उन्होंने अगले साल आने पर सुलह की, अगर वो भी क़ुरैश के काफ़िरों की तरह ज़िद करते तो ज़रूर जंग हो जाती.

और परहेज़गारी का कलिमा उनपर अनिवार्य फ़रमाया(26)
(26) कलिमए तक़वा यानी परहेज़गारी के कलिमे से मुराद “ला इलाहा इल्लल्लाहे मुहम्मदुर रसूलुल्लाह” है.

और वो उसके ज़्यादा सज़ावार और उसके योग्य थे (27)
(27) क्योंकि अल्लाह तआला ने उन्हें अपने दीन और अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की सोहबत से नवाज़ा.

और अल्लाह सब कुछ जानता है (28) {26}
(28)काफ़िरों का हाल भी जानता है, मुसलमानों का भी, कोई चीज़ उससे छुपी नहीं है.

48-Surah-Fatah

48 सूरए फ़त्ह -दूसरा रूकू

سَيَقُولُ لَكَ الْمُخَلَّفُونَ مِنَ الْأَعْرَابِ شَغَلَتْنَا أَمْوَالُنَا وَأَهْلُونَا فَاسْتَغْفِرْ لَنَا ۚ يَقُولُونَ بِأَلْسِنَتِهِم مَّا لَيْسَ فِي قُلُوبِهِمْ ۚ قُلْ فَمَن يَمْلِكُ لَكُم مِّنَ اللَّهِ شَيْئًا إِنْ أَرَادَ بِكُمْ ضَرًّا أَوْ أَرَادَ بِكُمْ نَفْعًا ۚ بَلْ كَانَ اللَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ خَبِيرًا
بَلْ ظَنَنتُمْ أَن لَّن يَنقَلِبَ الرَّسُولُ وَالْمُؤْمِنُونَ إِلَىٰ أَهْلِيهِمْ أَبَدًا وَزُيِّنَ ذَٰلِكَ فِي قُلُوبِكُمْ وَظَنَنتُمْ ظَنَّ السَّوْءِ وَكُنتُمْ قَوْمًا بُورًا
وَمَن لَّمْ يُؤْمِن بِاللَّهِ وَرَسُولِهِ فَإِنَّا أَعْتَدْنَا لِلْكَافِرِينَ سَعِيرًا
وَلِلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ يَغْفِرُ لِمَن يَشَاءُ وَيُعَذِّبُ مَن يَشَاءُ ۚ وَكَانَ اللَّهُ غَفُورًا رَّحِيمًا
سَيَقُولُ الْمُخَلَّفُونَ إِذَا انطَلَقْتُمْ إِلَىٰ مَغَانِمَ لِتَأْخُذُوهَا ذَرُونَا نَتَّبِعْكُمْ ۖ يُرِيدُونَ أَن يُبَدِّلُوا كَلَامَ اللَّهِ ۚ قُل لَّن تَتَّبِعُونَا كَذَٰلِكُمْ قَالَ اللَّهُ مِن قَبْلُ ۖ فَسَيَقُولُونَ بَلْ تَحْسُدُونَنَا ۚ بَلْ كَانُوا لَا يَفْقَهُونَ إِلَّا قَلِيلًا
قُل لِّلْمُخَلَّفِينَ مِنَ الْأَعْرَابِ سَتُدْعَوْنَ إِلَىٰ قَوْمٍ أُولِي بَأْسٍ شَدِيدٍ تُقَاتِلُونَهُمْ أَوْ يُسْلِمُونَ ۖ فَإِن تُطِيعُوا يُؤْتِكُمُ اللَّهُ أَجْرًا حَسَنًا ۖ وَإِن تَتَوَلَّوْا كَمَا تَوَلَّيْتُم مِّن قَبْلُ يُعَذِّبْكُمْ عَذَابًا أَلِيمًا
لَّيْسَ عَلَى الْأَعْمَىٰ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْأَعْرَجِ حَرَجٌ وَلَا عَلَى الْمَرِيضِ حَرَجٌ ۗ وَمَن يُطِعِ اللَّهَ وَرَسُولَهُ يُدْخِلْهُ جَنَّاتٍ تَجْرِي مِن تَحْتِهَا الْأَنْهَارُ ۖ وَمَن يَتَوَلَّ يُعَذِّبْهُ عَذَابًا أَلِيمًا

अब तुम से कहेंगे जो गंवार पीछे रह गए थे(1)
(1) क़बीलए ग़िफ़ार और मुज़ैय्यिनह व जुहैनह व अशजअ व असलम के, जब कि रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने हुदैबिय्यह के साल उमरा की नियत से मक्कए मुकर्रमा का इरादा फ़रमाया तो मदीने के आस पास के गाँवों वाले और सहराओ में रहने वाले क़ुरैश के डर से आपके साथ जाने से रूके जबकि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उमरे का एराम बाँधा था और कर्बानी के जानवर साथ थे और इससे साफ़ ज़ाहिर था कि जंग का इरादा नहीं है फिर भी बहुत से लोगों पर जाना बोझ हुआ और वो काम का बहाना करके रह गए और उनका गुमान यह था कि क़ुरैश बहुत ताक़तवर हैं. मुसलमान उनसे बचकर न आएंगे सब वही हलाक हो जाएंगे. अब जबकि अल्लाह की मदद से मामला उनके गुमान के बिल्कुल विपरीत हुआ तो उन्हें अपने न जाने पर अफ़सोस होगा और मुअज़िरत करेंगे.

कि हमें हमारे माल और हमारे घर वालों ने जाने से मश्ग़ूल रखा(2)
(2) क्योंकि औरतें और बच्चे अकेले थे और उनका कोई ख़बरगीरी करने वाला न था इसलिये हम बेबस हो गए.

अब हुज़ूर हमारी मग़फ़िरत चाहें(3)
(3) अल्लाह उनको झुटलाता है.

अपनी ज़बानों से वो बात कहते हैं जो उनके दिलों में नहीं (4)
(4) यानी वो बहाना बनाने और माफ़ी मांगने में झूटे हैं.

तुम फ़रमाओ तो अल्लाह के सामने किसे तुम्हारा कुछ इख़्तियार है अगर वह तुम्हारा बुरा चाहे या तुम्हारी भलाई का इरादा फ़रमाए बल्कि अल्लाह को तुम्हारे कामों की ख़बर है {11} बल्कि तुम तो ये समझे हुए थे कि रसूल और मुसलमान हरगिज़ घरों को वापस न आएंगे (5)
(5) दुश्मन उन सबका वहीं ख़ात्मा कर देंगे.

और उसी को अपने दिलों में भला समझे हुए थे और तुमने बुरा गुमान किया(6)
(6) कुफ़्र और फ़साद के ग़लबे का और अल्लाह के वादे के पूरा न होने का.

और तुम हलाक होने वाले लोग थे(7){12}
(7) अल्लाह के अज़ाब के हक़दार.

और जो ईमान न लाए अल्लाह और उसके रसूल पर (8)
(8) इस आयत में चुनौती है कि जो अल्लाह तआला पर और उसके रसूल पर ईमान न लाए, उनमें से किसी एक का भी इन्कारी हों, वह काफ़िर है.

तो बेशक हमने काफ़िरों के लिये भड़कती आग तैयार कर रखी है {13} और अल्लाह ही के लिये है आसमानों और ज़मीन की सल्तनत जिसे चाहे बख़्शे और जिसे चाहे अज़ाब करे (9)
(9) यह सब उसकी मर्ज़ी और हिकमत पर है.

और अल्लाह बख़्शने वाला मेहरबान है{14} अब कहेंगे पीछे बैठ रहने वाले(10)
(10) जो हुदैबिय्यह की हाज़िरी से लाचार रहे, ऐ ईमान वालों.

जब तुम ग़नीमतें लेने चलो(11)
(11) ख़ैबर की. इसका वाकिआ यह था कि जब मुसलमान सुलह हुदैबिय्यह से फ़ारिग़ होकर वापस हुए तो अल्लाह तआला ने उनसे ख़ैबर की विजय का वादा फ़रमाया और वहाँ की ग़नीमतें हुदैबिय्यह में हाज़िर होने वालों के लिये मख़सूस कर दीं गई. जब मुसलमानों के ख़ैबर की तरफ़ रवाना होने का वक़्त आया तो उन लोगों को लालच आया और उन्होंने ग़नीमत के लालच में कहा.

तो हमें भी अपने पीछे आने दो(12)
(12) यानी हम भी ख़ैबर को तुम्हारे साथ चलें और जंग में शरीक हों अल्लाह तआला फ़रमाता है.

वो चाहते हैं अल्लाह का कलाम बदल दें(13)
(13)यानी अल्लाह तआला का वादा तो जो हुदैबिय्यह वालों के लिये फ़रमाया था कि ख़ैबर की ग़नीमत ख़ास उनके लिये है.

तुम फ़रमाओ हरगिज़ तुम हमारे साथ न आओ अल्लाह न पहले से यूंही फ़रमा दिया है (14)
(14) यानी हमारे मदीना आने से पहले.

तो अब कहेंगे बल्कि तुम हमसे जलते हो(15)
(15) और यह गवारा नहीं करते कि हम तुम्हारे साथ ग़नीमतें पाएं. अल्लाह तआला फ़रमाता है.

बल्कि वो बात न समझते थे(16)
(16) दीन की.

मगर थोड़ी (17){15}
(17) यानी मात्र दुनिया की. यहाँ तक कि उनका ज़बानी इक़रार भी दुनिया ही की ग़रज़ से था और आख़िरत की बातों को बिल्कुल नहीं समझते थे. (जुमल)

उन पीछे रह गए हुए गंवारों से फ़रमाओ (18)
(18) जो विभिन्न क़बीलों के लोग हैं और उनमें कुछ ऐसे भी हैं जिनके तौबह करने की आस की जाती है. कुछ ऐसे भी हैं जो दोहरी प्रवृत्ति या दोग़लेपन में बहुत पुख़्ता और सख़्ता हैं. उन्हें आज़माइश में डालना मन्ज़ूर है ताकि तौबह करने वालों और न करने वालों में फ़र्क़ हो जाए इसलिये हुक्म हुआ कि उनसे फ़रमा दीजिये.

बहुत जल्द तुम एक सख़्त लड़ाई वाली क़ौम की तरफ़ बुलाए जाओगे (19)
(19) इस क़ौम से बनी हनीफ़ा यमामह के रहने वाले जो मुसैलिमा कज़्ज़ाब की क़ौम के लोग हैं वो मुराद हैं जिनसे हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो ने जंग फ़रमाई और यह भी कहा गया है कि उनसे मुराद फ़ारस और रोम के लोग हैं जिनसे जंग के लिये हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो ने दावत दी.

कि उनसे लड़ो या वो मुसलमान हो जाएं, फिर अगर तुम फ़रमान मानोगे अल्लाह तुम्हें अच्छा सवाब देगा(20)
(20) यह आयत हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ और हज़रत उमर फ़ारूक़ रदियल्लाहो अन्हुमा की ख़िलाफ़त की सच्चाई की दलील है कि उन हज़रात की इताअत पर जन्नत का और उनकी मुख़ालिफ़त पर जहन्नम का वादा किया गया.

और अगर फिर जाओगे जैसे पहले फिर गए(21)
(21) हुदैबिय्यह के मौक़े पर.

तो तुम्हें दर्दनाक अज़ाब देगा {16} अंधे पर तंगी नहीं (22)
(22) जिहाद से रह जाने में, जब ऊपर की आयत उतरी तो जो लोग अपंग और मजबूर थे उन्होंने अर्ज़ किया या रसूलल्लाह सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम, हमारा क्या हाल होगा. इसपर यह आयत उतरी.

और न लंगड़े पर मुज़ायक़ा और न बीमार पर मुआख़िज़ा(23)
(23) कि ये उज्र ज़ाहिर हैं और जिहाद में हाज़िर न होना उन लोगों के लिये जायज़ है क्योंकि न ये लोग दुश्मन पर हमला करने की ताक़त रखते हैं न उनके हमले से बचने और भागने की. उन्हीं के हुक्म में दाख़िल है वो बूढे दुर्बल जिन्हें उठने बैठने की ताक़त नहीं या जिन्हें दमा और खाँसी है या जिनकी तिल्ली बहुत बढ़ गई है और उन्हें चलना फिरना कठिन है. ज़ाहिर है कि ये मजबूरियाँ जिहाद से रोकने वाली हैं. उनके अलावा और भी मजबूरियाँ है जैसे बहुत ज़्यादा मोहताजी और सफ़र की ज़रूरी हाजतों पर क़ुदरत न रखना या ऐसे ज़रूरी काम जो सफ़र से रोकते हों जैसे किसी ऐसे बीमार की ख़िदमत जिसकी नेअमतें देखभाल उस पर वाजिब है और उसके सिवा कोई करने वाला नहीं.

और जो अल्लाह और उसके रसूल का हुक्म माने अल्लाह उसे बाग़ों में ले जाएगा जिनके नीचे नहरें बहें, और जो फिर जाएगा (24)
(24) ताअत से मुंह फेरेगा और कोई कुफ़्र और दोग़लेपन पर रहेगा.
उसे दर्दनाक अज़ाब फ़रमाएगा {17}