46 सूरए अहक़ाफ़ -दूसरा रूकू

46 सूरए अहक़ाफ़ -दूसरा रूकू

وَقَالَ الَّذِينَ كَفَرُوا لِلَّذِينَ آمَنُوا لَوْ كَانَ خَيْرًا مَّا سَبَقُونَا إِلَيْهِ ۚ وَإِذْ لَمْ يَهْتَدُوا بِهِ فَسَيَقُولُونَ هَٰذَا إِفْكٌ قَدِيمٌ
وَمِن قَبْلِهِ كِتَابُ مُوسَىٰ إِمَامًا وَرَحْمَةً ۚ وَهَٰذَا كِتَابٌ مُّصَدِّقٌ لِّسَانًا عَرَبِيًّا لِّيُنذِرَ الَّذِينَ ظَلَمُوا وَبُشْرَىٰ لِلْمُحْسِنِينَ
إِنَّ الَّذِينَ قَالُوا رَبُّنَا اللَّهُ ثُمَّ اسْتَقَامُوا فَلَا خَوْفٌ عَلَيْهِمْ وَلَا هُمْ يَحْزَنُونَ
أُولَٰئِكَ أَصْحَابُ الْجَنَّةِ خَالِدِينَ فِيهَا جَزَاءً بِمَا كَانُوا يَعْمَلُونَ
وَوَصَّيْنَا الْإِنسَانَ بِوَالِدَيْهِ إِحْسَانًا ۖ حَمَلَتْهُ أُمُّهُ كُرْهًا وَوَضَعَتْهُ كُرْهًا ۖ وَحَمْلُهُ وَفِصَالُهُ ثَلَاثُونَ شَهْرًا ۚ حَتَّىٰ إِذَا بَلَغَ أَشُدَّهُ وَبَلَغَ أَرْبَعِينَ سَنَةً قَالَ رَبِّ أَوْزِعْنِي أَنْ أَشْكُرَ نِعْمَتَكَ الَّتِي أَنْعَمْتَ عَلَيَّ وَعَلَىٰ وَالِدَيَّ وَأَنْ أَعْمَلَ صَالِحًا تَرْضَاهُ وَأَصْلِحْ لِي فِي ذُرِّيَّتِي ۖ إِنِّي تُبْتُ إِلَيْكَ وَإِنِّي مِنَ الْمُسْلِمِينَ
أُولَٰئِكَ الَّذِينَ نَتَقَبَّلُ عَنْهُمْ أَحْسَنَ مَا عَمِلُوا وَنَتَجَاوَزُ عَن سَيِّئَاتِهِمْ فِي أَصْحَابِ الْجَنَّةِ ۖ وَعْدَ الصِّدْقِ الَّذِي كَانُوا يُوعَدُونَ
وَالَّذِي قَالَ لِوَالِدَيْهِ أُفٍّ لَّكُمَا أَتَعِدَانِنِي أَنْ أُخْرَجَ وَقَدْ خَلَتِ الْقُرُونُ مِن قَبْلِي وَهُمَا يَسْتَغِيثَانِ اللَّهَ وَيْلَكَ آمِنْ إِنَّ وَعْدَ اللَّهِ حَقٌّ فَيَقُولُ مَا هَٰذَا إِلَّا أَسَاطِيرُ الْأَوَّلِينَ
أُولَٰئِكَ الَّذِينَ حَقَّ عَلَيْهِمُ الْقَوْلُ فِي أُمَمٍ قَدْ خَلَتْ مِن قَبْلِهِم مِّنَ الْجِنِّ وَالْإِنسِ ۖ إِنَّهُمْ كَانُوا خَاسِرِينَ
وَلِكُلٍّ دَرَجَاتٌ مِّمَّا عَمِلُوا ۖ وَلِيُوَفِّيَهُمْ أَعْمَالَهُمْ وَهُمْ لَا يُظْلَمُونَ
وَيَوْمَ يُعْرَضُ الَّذِينَ كَفَرُوا عَلَى النَّارِ أَذْهَبْتُمْ طَيِّبَاتِكُمْ فِي حَيَاتِكُمُ الدُّنْيَا وَاسْتَمْتَعْتُم بِهَا فَالْيَوْمَ تُجْزَوْنَ عَذَابَ الْهُونِ بِمَا كُنتُمْ تَسْتَكْبِرُونَ فِي الْأَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّ وَبِمَا كُنتُمْ تَفْسُقُونَ

और काफ़िरों ने मुसलमानों को कहा आग उसमें(1)
(1) यानी दीने मुहम्मदी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम में.

कुछ भलाई होती तो ये (2)
(2) ग़रीब लोग.

हमसे आगे उस तक न पहुंच जाते(3)
(3) यह आयत मक्के के मुश्रिकों के बारे में उतरी जो कहते थे कि अगर दीने मुहम्मदी सच्चा होता तो फ़लाँ और फ़लाँ उसका हम से पहले कैसे क़ुबूल कर लेते.

और जब उन्हें उसकी हिदायत न हुई तो अब (4)
(4) दुश्मनी से, क़ुरआन शरीफ़ की निस्बत.

कहेंगे कि यह पुराना बोहतान {11} और इससे पहले मूसा की किताब (5)
(5) तौरात.

है पेशवा और मेहरबानी, और यह किताब है तस्दीक़ (पुष्टि) फ़रमाती(6)
(6) पहली किताबों की.

अरबी ज़बान में कि ज़ालिमों को डर सुनाए, और नेकों को बशारत {12} बेशक वो जिन्होंने कहा हमारा रब अल्लाह है फिर साबित क़दम रहे (डटे रहे)(7)
(7) अल्लाह तआला की तौहीद  सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की शरीअत पर आख़िरी दम तक.

न उनपर ख़ौफ़(8)
(8) क़यामत में.

न उनको ग़म(9){13}
(9) मौत के वक़्त.

वो जन्नत वाले हैं हमेशा उसमें रहेंगे, उनके कर्मों का इनाम {14} और हमने आदमी को हुक्म दिया कि अपने माँ बाप से भलाई करे, उसकी माँ ने उसे पेट में रखा तकलीफ़ से और ज़नी उसको तकलीफ़ से और उसे उठाए फिरना और उसका दूध छूड़ाना तीस महीने में है(10)
(10) इस आयत से साबित होता है कि गर्भ की कम से कम मुद्दत छ माह है क्योंकि जब दूध छुडाने की मुद्दत दो साल हुई जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया “हौलैन कामिलैन “तो गर्भ के लिये छ माह बाक़ी रहे. यही क़ौल है इमाम अबू युसूफ़ और इमाम मुहम्मद रहमतुल्लाहे अलैहिमा का और हज़रत इमाम साहिब रदियल्लाहो अन्हो के नज़्दीक इस आयत से रिज़ाअत की मुद्दत ढाई साल साबित होती है. मसअले की तफ़सील दलीलों के साथ उसूल की किताबों में मिलती है.

यहाँ तक कि जब अपने ज़ोर को पहुंचा(11)
(11) और अक़्ल और क़ुव्वत मुस्तहकम हुई और यह बात तीस से चालीस साल तक की उम्र में हासिल होती है.

और चालीस बरस का हुआ (12)
(12) यह आयत हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हों के हक़ में उतरी. आपकी उम्र सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से दो साल कम थी. जब हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो की उम्र अटठारह साल की हुई तो आपने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की सोहबत इख़्तियार की. उस वक़्त हुज़ूर की उम्र शरीफ़ बीस साल की थी. हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की हमराही में तिजारत की ग़रज़ से शाम का सफ़र किया. एक मंज़िल पर ठहरे वहाँ एक बेरी का दरख़्त था. हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो वसल्लम उसके साए में तशरीफ़ फ़रमा हुए. क़रीब ही एक पादरी रहता था. हज़रत सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो उसके पास चले गए. उसने आपसे कहा यह कौन साहिब हैं जो इस बेरी के साए में जलवा फ़रमा हैं. हज़रत सिद्दीक़ ने फ़रमाया कि यह मुहम्मद इब्ने अब्दुल्लाह हैं, अब्दुल मुत्तलिब के पोते, राहिब ने कहा ख़ुदा की क़सम ये नबी है इस बेरी के साए में हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के बाद से आज तक इनके सिवा कोई नहीं बैठा, यही आख़िरी ज़माने के नबी हैं. राहिब की यह बात हज़रत अबूबक्र सिद्दीक़ के दिल में उतर गई और नबुव्वत का यक़ीन आपके दिल में जम गया. और आपने सरकार की सोहबत शरीफ़ की मुलाज़िमत इख़्तियार कर ली. सफ़र व हज़र में आपसे जुदा न होते. जब सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की उम्र शरीफ़ चालीस साल की हुई और अल्लाह तआला ने हुज़ूर को अपनी नबुव्वत और रिसालत का ताज पहनाया तो हज़रत सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो आप पर ईमान ले आए. उस वक़्त आपकी उम्र अड़तीस बरस की थी. जब आप चालीस साल के हुए तो आपने अल्लाह तआला से यह दुआ की.

अर्ज़ की ऐ मेरे रब मेरे दिल में डाल कि मैं तेरी नेअमत का शुक्र करूं जो तूने मुझ पर और मेरे माँ बाप पर की(13)
(13) कि हम सबको हिदायत फ़रमाई और इस्लाम से मुशर्रफ़ किया. हज़रत सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो के वालिद का नाम अबू क़हाफ़ा और वालिदा का नाम उम्मुल ख़ैर था.

और  मैं वह काम करूं जो तूझे पसन्द आए(14)
(14) आपकी यह दुआ भी क़ुबूल हुई और अल्लाह तआला ने आपको अच्छे कर्मों की वह दौलत अता फ़रमाई कि सारी उम्मत के कर्म आपके एक कर्म के बराबर नहीं हो सकते. आपकी नेकियों में से एक यह है कि नौ मूमिन जो ईमान की वजह से सख़्त यातनाओ और तकलीफ़ों में जकड़े हुए थे, उनको आपने आज़ाद कराया, उन्हीं में से हज़रत बिलाल रदियल्लाहो अन्हो भी हैं. और आप ने यह दुआ की.

और मेरे लिये मेरी औलाद में सलाह रख(15)
(15) यह दुआ भी क़ुबूल हुई . अल्लाह तआला ने आपकी औलाद में नेकी रखी. आपकी तमाम औलाद मूमिन है और उनमें हज़रत उम्मुल मूमिनीन आयशा सिद्दीक़ा रदियल्लाहो अन्हा का दर्जा किस क़द्र बलन्द है कि तमाम औरतों पर अल्लाह ने उन्हें बुज़ुर्गी अता की है. हज़रत अबूबक्र रदियल्लाहो अन्हो के वालिदेन भी मुसलमान और आपके बेटे मुहम्मद और अब्दुल्लाह और अब्दुल रहमान और आपकी बेटियाँ हज़रत आयशा और हज़रत असमा और आपके पोते मुहम्मद बिन अब्दुर रहमान, ये सब मूमिन और सब सहाबियत की बुज़ुर्गी रखने वाले हैं. आपके सिवा कोई ऐसा नहीं है जिसको यह फ़ज़ीलत हासिल हो कि उसके वालिदैन भी सहाबी हों, ख़ुद भी सहाबी, औलाद भी सहाबी, पोते भी सहाबी, चार पुश्तें सहाबियत का शरफ़ रखने वाली.

मैं तेरी तरफ़ रूजू लाया(16)
(16) हर उस काम में जिसमें तेरी रज़ा हो.

और मैं मुसलमान हूँ (17){15}
(17) दिल से भी और ज़बान से भी.

ये हैं वो जिनकी नेकियाँ हम क़ुबूल फ़रमाएंगे (18)
(18) उनपर सवाब देंगे.

और उनकी तक़सीरों से दरग़ुज़र फ़रमाएंगे जन्नत वालों में, सच्चा वादा जो उन्हें दिया जाता था (19){16}
(19)दुनिया में नबीए अकरम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की ज़बाने मुबारक से.

और वह जिसने अपने माँ बाप से कहा(20)
(20) इससे मुराद कोई ख़ास व्यक्ति नहीं है बल्कि काफ़िर जो मरने के बाद उठाए जाने का इन्कारी हो और माँ बाप का नाफ़रमान और उसके माँ बाप उसको सच्चे दीन की तरफ़ बुलाते हों और वह इन्कार करता हो.

उफ़ तुम से दिल पक गया क्या मुझे यह वादा देते हो कि फिर ज़िन्दा किया जाऊंगा हालांकि मुझसे पहले संगते गुज़र चुकीं(21)
(21) उनमें से कोई मरकर ज़िन्दा न हुआ.

और वो दोनों(22)
(22) माँ बाप.

अल्लाह से फ़रियाद करते हैं तेरी ख़राबी हो ईमान ला बेशक अल्लाह का वादा सच्चा है(23)
(23)मुर्दे ज़िन्दा फ़रमाने का.

तो कहता है ये तो नहीं मगर अगलों की कहानियां {17} ये वो हैं जिन पर बात साबित हो चुकी(24)
(24) अज़ाब की.

उन गिरोहों में जो उन से पहले गुज़रे जिन्न और आदमी, बेशक वो ज़ियाँकार थे {18} और हर एक के लिये कर्म के अपने अपने (25)
(25) मूमिन हो या काफ़िर.

दर्जे हैं(26)
(26)यानी अल्लाह तआला के नज़्दीक मन्ज़िलों और दर्जों में. क़यामत के दिन जन्नत के दर्जे बलन्द होते चले जाते हैं और जहन्नम के दर्जे पस्त होते जाते हैं तो जिनके कर्म अच्छे हो वो जन्नत के ऊंचे दर्जे में होंगे और जो कु़फ़्र और गुमराही में चरम सीमा को पहुंच गए हों वो जहन्नम के सब से नीचे दर्जे में होंगे.

और ताकि अल्लाह उनके काम उन्हें पूरे भर दे(27)
(27) यानी मूमिन और काफ़िरों को फ़रमाँबरदारी और नाफ़रमानी की पूरी जंज़ा दे.

और उनपर ज़ुल्म न होगा {19} और जिस दिन काफ़िर आग पर पेश किये जाएंगे उनसे फ़रमाया जाएगा, तुम अपने हिस्से की पाक चीज़ें अपनी दुनिया ही की ज़िन्दगी में फ़ना कर चुके और उन्हें बरत चुके(28)

(28) यानी लज़्ज़त और ऐश जो तुम्हें पाना था. वह सब दुनिया में तुमने ख़त्म कर दिया. अब तुम्हारे लिये आख़िरत में कुछ भी बाक़ी न रहा और कुछ मुफ़स्सिरों का क़ौल है कि “तैय्यिबात” से शरीर के अंग और जवानी मुराद है और मानी ये हैं कि तुम ने अपनी जवानी और अपनी क़ुव्वतों को दुनिया के अन्दर कुफ़्र और गुनाहों में ख़र्च कर दिया.

तो आज तुम्हें ज़िल्लत का अज़ाब बदला दिया जाएगा सज़ा उसकी कि तुम ज़मीन में नाहक़ घमण्ड करते थे और सज़ा उसकी कि हुक्मअदूली (नाफ़रमानी) करते थे(29) {20}
(29) इस आयत में अल्लाह तआला ने दुनियावी लज़्ज़तें इख़्तियार करने पर काफ़िरों को मलामत फ़रमाई तो रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम और हुज़ूर के सहाबा ने दुनिया की लज़्ज़तों से किनारा कशी इख़्तियार फ़रमाई. बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में है कि हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की वफ़ात तक हुज़ूर के घर वालों ने कभी जौ की रोटी भी दो दिन बराबर न खाई. यह भी हदीस में है कि पूरा पूरा महीना गुज़र जाता था, सरकार के मकान में आग न जलती थी. कुछ खजूरों और पानी पर गुज़ारा कर लिया जाता था. हज़रत उमर रदियल्लाहो अन्हो से रिवायत है आप फ़रमाते थे कि मैं चाहता तो तुमसे अच्छा खाना खाता और तुम से बेहतर लिबास पहनता लेकिन मैं अपना ऐश और राहत अपनी आख़िरत के लिये बाक़ी रखना चाहता हूँ.

Advertisements

Leave a Reply

Fill in your details below or click an icon to log in:

WordPress.com Logo

You are commenting using your WordPress.com account. Log Out /  Change )

Google photo

You are commenting using your Google account. Log Out /  Change )

Twitter picture

You are commenting using your Twitter account. Log Out /  Change )

Facebook photo

You are commenting using your Facebook account. Log Out /  Change )

Connecting to %s

%d bloggers like this: