46 सूरए अहक़ाफ़ -तीसरा रूकू

46 सूरए अहक़ाफ़ -तीसरा रूकू

۞ وَاذْكُرْ أَخَا عَادٍ إِذْ أَنذَرَ قَوْمَهُ بِالْأَحْقَافِ وَقَدْ خَلَتِ النُّذُرُ مِن بَيْنِ يَدَيْهِ وَمِنْ خَلْفِهِ أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا اللَّهَ إِنِّي أَخَافُ عَلَيْكُمْ عَذَابَ يَوْمٍ عَظِيمٍ
قَالُوا أَجِئْتَنَا لِتَأْفِكَنَا عَنْ آلِهَتِنَا فَأْتِنَا بِمَا تَعِدُنَا إِن كُنتَ مِنَ الصَّادِقِينَ
قَالَ إِنَّمَا الْعِلْمُ عِندَ اللَّهِ وَأُبَلِّغُكُم مَّا أُرْسِلْتُ بِهِ وَلَٰكِنِّي أَرَاكُمْ قَوْمًا تَجْهَلُونَ
فَلَمَّا رَأَوْهُ عَارِضًا مُّسْتَقْبِلَ أَوْدِيَتِهِمْ قَالُوا هَٰذَا عَارِضٌ مُّمْطِرُنَا ۚ بَلْ هُوَ مَا اسْتَعْجَلْتُم بِهِ ۖ رِيحٌ فِيهَا عَذَابٌ أَلِيمٌ
تُدَمِّرُ كُلَّ شَيْءٍ بِأَمْرِ رَبِّهَا فَأَصْبَحُوا لَا يُرَىٰ إِلَّا مَسَاكِنُهُمْ ۚ كَذَٰلِكَ نَجْزِي الْقَوْمَ الْمُجْرِمِينَ
وَلَقَدْ مَكَّنَّاهُمْ فِيمَا إِن مَّكَّنَّاكُمْ فِيهِ وَجَعَلْنَا لَهُمْ سَمْعًا وَأَبْصَارًا وَأَفْئِدَةً فَمَا أَغْنَىٰ عَنْهُمْ سَمْعُهُمْ وَلَا أَبْصَارُهُمْ وَلَا أَفْئِدَتُهُم مِّن شَيْءٍ إِذْ كَانُوا يَجْحَدُونَ بِآيَاتِ اللَّهِ وَحَاقَ بِهِم مَّا كَانُوا بِهِ يَسْتَهْزِئُونَ

और याद करो आद के हमक़ौम (1)
(1) हज़रत हूद अलैहिस्सलाम.

को जब उसने उनको अहक़ाफ़ की सरज़मीन (धरती) में डराया(2)
(2) शिर्क से. अहक़ाफ़ एक रेगिस्तानी घाटी है जहाँ क़ौमें आद के लोग रहते थे.

और बेशक इससे पहले डर सुनाने वाले गुज़र चुके और उसके बाद आए कि अल्लाह के सिवा किसी को न पूजो बेशक मुझे तुम पर एक बड़े दिन के अज़ाब का भय है {21} बोले क्या तुम इसलिये आए कि हमें हमारे मअबूदों से फेर दो तो हम पर लाओ (3)
(3) वह अज़ाब.

जिसका हमें वादा देते हो अगर तुम सच्चे हो(4){22}
(4)  इस बात में कि अज़ाब आने वाला है.

उसने फ़रमाया (5)
(5) यानी हूद अलैहिस्सलाम ने.

इसके ख़बर तो अल्लाह ही के पास है(6)
(6) कि अज़ाब कब आएगा.

मैं तो तुम्हें अपने रब के पयाम (संदेश) पहुंचाता हूँ हाँ मेरी दानिस्त (जानकारी) में तुम निरे जाहिल लोग हो(7){23}
(7) जो अज़ाब में जल्दी करते हो और अज़ाब को जानते नहीं क्या चीज़ है.

फिर जब उन्होंने अज़ाब को देखा बादल की तरह आसमान के किनारे में फैला हुआ उनकी वादियों की तरफ़ आता(8)
(8) और लम्बी  मुद्दत से उनकी सरज़मीन में बारिश न हुई थी. इस काले बादल को देखकर ख़ुश हुए.

बोले यह बादल है कि हम पर बरसेगा (9)
(9) हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने फ़रमाया.

बल्कि यह तो वह है जिसकी तुम जल्दी मचाते थे, एक आंधी है जिसमें दर्दनाक अज़ाब {24} हर चीज़ को तबाह कर डालती है अपने रब के हुक्म से(10)
(10) चुनांन्चे उस आंधी के अज़ाब ने उनके मर्दों औरतों छोटों बड़ों को हलाक कर दिया और उनके माल आसमान और ज़मीन के बीच उड़ते फिरते थे. चीज़ें टुकड़े टुकड़े हो गई. हज़रत हूद अलैहिस्सलाम ने अपने और अपने ऊपर ईमान लाने वालों के चारों तरफ़ एक लकीर खींच दी थी. हवा जब उस लकीर के अन्दर आती तो अत्यन्त नर्म पाकीज़ा और राहत देने वाली ठण्डी होती और वही हवा क़ौम पर अत्यन्त सख़्त हलाक करने की होती. और यह हज़रत हूद अलैहिस्सलाम का एक महान चमत्कार था.

तो सुब्ह रह गए कि नज़र न आते थे मगर उनके सूने मकान हम ऐसी ही सज़ा देते हैं मुजरिमों को {25} और बेशक हमने उन्हें वो मक़दूर (साधन) दिये थे जो तुम को न दिये (11)
(11) ऐ मक्के वालों, वो क़ुव्वत और माल और लम्बी उम्र में तुम से ज़्यादा थे.

और उनके लिये कान और आँख और दिल बनाए (12)
(12) ताकि दीन के काम में लाएं. मगर उन्होंने सिवाय दुनिया की तलब के ख़ुदा की दी हुई उन नेअमतों से दीन का काम ही नहीं लिया.
तो उनके कान और आँखे और दिल कुछ काम न आए जब कि वो अल्लाह की आयतों का इन्कार करते थे और उन्हें घेर लिया उस अज़ाब ने जिसकी हंसी बनाते थे{26}

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