46 सूरए अहक़ाफ़ -चौथा रूकू

46 सूरए अहक़ाफ़ -चौथा रूकू

وَلَقَدْ أَهْلَكْنَا مَا حَوْلَكُم مِّنَ الْقُرَىٰ وَصَرَّفْنَا الْآيَاتِ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
فَلَوْلَا نَصَرَهُمُ الَّذِينَ اتَّخَذُوا مِن دُونِ اللَّهِ قُرْبَانًا آلِهَةً ۖ بَلْ ضَلُّوا عَنْهُمْ ۚ وَذَٰلِكَ إِفْكُهُمْ وَمَا كَانُوا يَفْتَرُونَ
وَإِذْ صَرَفْنَا إِلَيْكَ نَفَرًا مِّنَ الْجِنِّ يَسْتَمِعُونَ الْقُرْآنَ فَلَمَّا حَضَرُوهُ قَالُوا أَنصِتُوا ۖ فَلَمَّا قُضِيَ وَلَّوْا إِلَىٰ قَوْمِهِم مُّنذِرِينَ
قَالُوا يَا قَوْمَنَا إِنَّا سَمِعْنَا كِتَابًا أُنزِلَ مِن بَعْدِ مُوسَىٰ مُصَدِّقًا لِّمَا بَيْنَ يَدَيْهِ يَهْدِي إِلَى الْحَقِّ وَإِلَىٰ طَرِيقٍ مُّسْتَقِيمٍ
يَا قَوْمَنَا أَجِيبُوا دَاعِيَ اللَّهِ وَآمِنُوا بِهِ يَغْفِرْ لَكُم مِّن ذُنُوبِكُمْ وَيُجِرْكُم مِّنْ عَذَابٍ أَلِيمٍ
وَمَن لَّا يُجِبْ دَاعِيَ اللَّهِ فَلَيْسَ بِمُعْجِزٍ فِي الْأَرْضِ وَلَيْسَ لَهُ مِن دُونِهِ أَوْلِيَاءُ ۚ أُولَٰئِكَ فِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ
أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّ اللَّهَ الَّذِي خَلَقَ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضَ وَلَمْ يَعْيَ بِخَلْقِهِنَّ بِقَادِرٍ عَلَىٰ أَن يُحْيِيَ الْمَوْتَىٰ ۚ بَلَىٰ إِنَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
وَيَوْمَ يُعْرَضُ الَّذِينَ كَفَرُوا عَلَى النَّارِ أَلَيْسَ هَٰذَا بِالْحَقِّ ۖ قَالُوا بَلَىٰ وَرَبِّنَا ۚ قَالَ فَذُوقُوا الْعَذَابَ بِمَا كُنتُمْ تَكْفُرُونَ
فَاصْبِرْ كَمَا صَبَرَ أُولُو الْعَزْمِ مِنَ الرُّسُلِ وَلَا تَسْتَعْجِل لَّهُمْ ۚ كَأَنَّهُمْ يَوْمَ يَرَوْنَ مَا يُوعَدُونَ لَمْ يَلْبَثُوا إِلَّا سَاعَةً مِّن نَّهَارٍ ۚ بَلَاغٌ ۚ فَهَلْ يُهْلَكُ إِلَّا الْقَوْمُ الْفَاسِقُونَ

और बेशक हमने हलाक कर दीं(1)
(1) ऐ क़ुरैश.

तुम्हारे आस पास की बस्तियां (2)
(2) समूद व आद व क़ौमे लूत की तरह.

और तरह तरह की निशानियां लाए कि वो बाज़ आए(3) {27}
(3) कुफ़्र और सरकशी से, लेकिन वो बाज़ न आए तो हमने उन्हें उनके कुफ़्र के कारण हलाक कर दिया.

तो क्यों न मदद की उनकी(4)
(4) उन काफ़िरों की, उन बुतों ने.

जिनको उन्होंने अल्लाह के सिवा क़ुर्ब (समीपता) हासिल करने को ख़ुदा ठहरा रखा था (5)
(5) और जिनकी निस्बत यह कहा करते थे कि इन बुतों को पूजने से अल्लाह का क़ुर्ब हासिल होता है.

बल्कि वो उनसे ग़ुम गए (6)
(6) और अज़ाब उतरने के समय काम न आए.

और यह उनका बोहतान और इफ़तिरा है(7){28}
(7) कि वो बुतों को मअबूद कहते हैं और बुत परस्ती को अल्लाह के नज़्दीक होने का ज़रिया ठहराते हैं.

और जब कि हमने तुम्हारी तरफ़ कितने जिन्न फेरे (8)
(8) यानी ऐ सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम , उस वक़्त को याद कीजिये जब हमने आपकी तरफ़ जिन्नों की एक जमाअत भेजी. इस जमाअत की संख्या में मतभेद है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि सात जिन्न थे जिन्हें सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उनकी क़ौम की तरफ़ संदेश ले जाने वाला बनाया. कुछ रिवायतों मे आया है कि नौ थे. तहक़ीक़ करने वाले उलमा इसपर सहमत हैं कि जिन्न सब के सब मुकल्लिफ़ है यानी आक़िल व बालिग़. अब उन जिन्नों का हाल बयान होता है कि आप बत्ने नख़लह में, मक्कए मुकर्रमा और ताइफ़ के बीच, मक्कए मुकर्रमा को आते हुए अपने सहाबा के साथ फ़ज़्र की नमाज़ पढ़ रहे थे उस वक़्त जिन्न.

कान लगाकर क़ुरआन सुनते फिर जब वहाँ हाज़िर हुए आपस में बोले ख़ामोश रहो(9)
(9) ताकि अच्छी तरह हज़रत की क़िरअत सुन लें.

फिर जब पढ़ना हो चुका अपनी क़ौम की तरफ़ डर सुनाते पलटे (10){29}
(10) यानी रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर ईमान लाकर हुज़ूर के हुक्म से अपनी क़ौम की तरफ़ ईमान की दावत देने गए और उन्हें ईमान न लाने और रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के विरोध से डराया.

बोले ऐ हमारी क़ौम, हमने एक किताब सुनी(11)
(11) यानी क़ुरआन शरीफ़.

कि मूसा के बाद उतारी गई(12)
(12) अता ने कहा चूंकि  वो जिन्न दीने यहूदियत पर थे इसलिये उन्होंने हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम का ज़िक्र किया और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की किताब का नाम न लिया. कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम की किताब का नाम न लेने का कारण यह है कि उसमें सिर्फ़ नसीहतें हैं, अहकाम बहुत ही कम हैं.

अगली किताबों की तस्दीक़ (पुष्टि) फ़रमाती हक़ और सीधी राह दिखाती{30} ऐ हमारी क़ौम अल्लाह के मनादी (उदघोषक) (13)
(13) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

की बात मानो और उस पर ईमान लाओ कि वह तुम्हारे कुछ गुनाह बख़्श दे(14)
(14) जो इस्लाम से पहले हुए और जिनमें बन्दों का हक़ नहीं.

और तुम्हें दर्दनाक अज़ाब से बचा ले {31} और जो अल्लाह के मनादी की बात न माने वह ज़मीन में क़ाबू से निकल कर जाने वाला नहीं (15)
(15) अल्लाह तआला से कहीं भाग नहीं सकता और उसके अज़ाब से बच नहीं सकता.

और अल्लाह के सामने उसका कोई मददगार नहीं(16)
(16) जो उसे अज़ाब से बचा सके.

वो(17)
(17) जो अल्लाह तआला के मुनादी हज़रत मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की बात न माने.

खुली गुमराही में हैं {32} क्या उन्होंने  (18)
(18) यानी मरने के बाद उठाए जाने का इन्कार करने वालों ने.

न जाना कि वह अल्लाह जिसने आसमान और ज़मीन बनाए और उनके बनाने में न थका क़ादिर है कि मु्र्दे जिलाए, क्यों नहीं, बेशक वह सब कुछ कर सकता है {33} और जिस दिन काफ़िर आग पर पेश किये जाएंगे, उनसे फ़रमाया जाएगा,, क्या यह हक़ (सत्य) नहीं, कहेंगे, क्यों नहीं हमारे रब की क़सम, फ़रमाया जाएगा, तो अज़ाब चखो बदला अपने कुफ़्र का (19){34}
(19)  जिसके तुम दुनिया में मुरतकिब हुए थे. इसके बाद अल्लाह तआला अपने हबीब सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से खिताब फ़रमाता है.

तो तुम सब्र करो जैसा हिम्मत वाले रसूलों ने सब्र किया (20)
(20) अपनी क़ौम की तकलीफ़ पर.

और उनके लिये जल्दी न करो(21)
(21)  अज़ाब तलब करने में क्योंकि अज़ाब उनपर ज़रूर उतरने वाला है.

गोया वो जिस दिन देखेंगे(22)
(22) आख़िरत के अज़ाब को.

जो उन्हें वादा दिया जाता है(23)
(23) तो उसकी दराज़ी और हमेशगी के सामने दुनिया में ठहरने की मुद्दत को बहुत कम समझेंगे और ख़याल करेंगे कि—

दुनिया में न ठहरे थे मगर दिन की एक घड़ी भर, यह पहुंचाना है(24)
(24) यानी यह क़ुरआन और वह हिदायत और निशानियाँ जो इसमें हैं यह अल्लाह तआला की तरफ़ से तबलीग़ है.

तो कौन हलाक किये जाएंगे, मगर बेहुक्म लोग(25) {35}
(25) जो ईमान और फ़रमाँबरदारी से बाहर हैं.

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