43 सूरए ज़ुख़रूफ़ -सातवाँ रूकू

43 सूरए ज़ुख़रूफ़ -सातवाँ रूकू

يَا عِبَادِ لَا خَوْفٌ عَلَيْكُمُ الْيَوْمَ وَلَا أَنتُمْ تَحْزَنُونَ
الَّذِينَ آمَنُوا بِآيَاتِنَا وَكَانُوا مُسْلِمِينَ
ادْخُلُوا الْجَنَّةَ أَنتُمْ وَأَزْوَاجُكُمْ تُحْبَرُونَ
يُطَافُ عَلَيْهِم بِصِحَافٍ مِّن ذَهَبٍ وَأَكْوَابٍ ۖ وَفِيهَا مَا تَشْتَهِيهِ الْأَنفُسُ وَتَلَذُّ الْأَعْيُنُ ۖ وَأَنتُمْ فِيهَا خَالِدُونَ
وَتِلْكَ الْجَنَّةُ الَّتِي أُورِثْتُمُوهَا بِمَا كُنتُمْ تَعْمَلُونَ
لَكُمْ فِيهَا فَاكِهَةٌ كَثِيرَةٌ مِّنْهَا تَأْكُلُونَ
إِنَّ الْمُجْرِمِينَ فِي عَذَابِ جَهَنَّمَ خَالِدُونَ
لَا يُفَتَّرُ عَنْهُمْ وَهُمْ فِيهِ مُبْلِسُونَ
وَمَا ظَلَمْنَاهُمْ وَلَٰكِن كَانُوا هُمُ الظَّالِمِينَ
وَنَادَوْا يَا مَالِكُ لِيَقْضِ عَلَيْنَا رَبُّكَ ۖ قَالَ إِنَّكُم مَّاكِثُونَ
لَقَدْ جِئْنَاكُم بِالْحَقِّ وَلَٰكِنَّ أَكْثَرَكُمْ لِلْحَقِّ كَارِهُونَ
أَمْ أَبْرَمُوا أَمْرًا فَإِنَّا مُبْرِمُونَ
أَمْ يَحْسَبُونَ أَنَّا لَا نَسْمَعُ سِرَّهُمْ وَنَجْوَاهُم ۚ بَلَىٰ وَرُسُلُنَا لَدَيْهِمْ يَكْتُبُونَ
قُلْ إِن كَانَ لِلرَّحْمَٰنِ وَلَدٌ فَأَنَا أَوَّلُ الْعَابِدِينَ
سُبْحَانَ رَبِّ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ رَبِّ الْعَرْشِ عَمَّا يَصِفُونَ
فَذَرْهُمْ يَخُوضُوا وَيَلْعَبُوا حَتَّىٰ يُلَاقُوا يَوْمَهُمُ الَّذِي يُوعَدُونَ
وَهُوَ الَّذِي فِي السَّمَاءِ إِلَٰهٌ وَفِي الْأَرْضِ إِلَٰهٌ ۚ وَهُوَ الْحَكِيمُ الْعَلِيمُ
وَتَبَارَكَ الَّذِي لَهُ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَيْنَهُمَا وَعِندَهُ عِلْمُ السَّاعَةِ وَإِلَيْهِ تُرْجَعُونَ
وَلَا يَمْلِكُ الَّذِينَ يَدْعُونَ مِن دُونِهِ الشَّفَاعَةَ إِلَّا مَن شَهِدَ بِالْحَقِّ وَهُمْ يَعْلَمُونَ
وَلَئِن سَأَلْتَهُم مَّنْ خَلَقَهُمْ لَيَقُولُنَّ اللَّهُ ۖ فَأَنَّىٰ يُؤْفَكُونَ
وَقِيلِهِ يَا رَبِّ إِنَّ هَٰؤُلَاءِ قَوْمٌ لَّا يُؤْمِنُونَ
فَاصْفَحْ عَنْهُمْ وَقُلْ سَلَامٌ ۚ فَسَوْفَ يَعْلَمُونَ

उनसे फ़रमाया जाएगा ऐ मेरे बन्दो आज न तुम पर ख़ौफ़ न तुम को ग़म हो {68} वो जो हमारी आयतों पर ईमान लाए और मुसलमान थे {69} दाख़िल हो जन्नत में तुम और तुम्हारी बीबियाँ  और तुम्हारी ख़ातिरें होतीं (1) {70}
(1) यानी जन्नत में तुम्हारा सम्मान, नेअमतें दी जाएंगी, ऐसे ख़ुश किये जाओगे कि तुम्हारे चेहरों पर ख़ूशी के आसार नमूदार होंगे.

उन पर दौरा होगा सोने के प्यालों और जामों का और उसमें जो जी चाहे और जिससे आँख को लज़्ज़त पहुंचे(2)
(2) तरह तरह की नेअमतें.

और तुम उसमें हमेशा रहोगे {71} और यह है वह जन्नत जिसके तुम वारिस किये गए अपने कर्मों से {72} तुम्हारे लिये इसमें बहुत मेवे हैं कि उनमें से खाओ (3) {73}
(3) जन्नती दरख़्त फलदार सदा बहार हैं उनकी ताज़गी और ज़ीनत में फ़र्क़ नहीं आता. हदीस शरीफ़ में है कि अगर कोई उनसे एक फल लेगा तो दरख़्त में उसकी जगह दो फल निकल आएंगे.

बेशक मुजरिम  (4)
(4) यानी काफ़िर.

जहन्नम के अज़ाब में हमेशा रहने वाले हैं {74} वह कभी उनपर से हलका न पड़ेगा और वो उसमें बेआस रहेंगे  (5){75}
(5) रहमत की उम्मीद भी न होगी.

और हमने उनपर कुछ ज़ुल्म न किया हाँ वो ख़ुद ही ज़ालिम थे(6) {76}
(6) कि सरकशी और नाफ़रमानी करके इस हाल को पहुंचे.

और वो पुकारेंगे(7)
(7) जहन्नम के दारोग़ा को कह.

ऐ मालिक तेरा रब हमें तमाम कर चुके(8)
(8) यानी मौत दे दे. मालिक से प्रार्थना करेंगे कि वह अल्लाह तबारक व तआला से उनकी मौत की दुआ करे.

वह फ़रमाएगा(9)
(9) हज़ार बरस बाद.

तुम्हें तो ठहरना है (10){77}
(10) अज़ाब में हमेशा, कभी उससे रिहाई न पाओगे, न मौत से और न और किसी प्रकार. इसके बाद अल्लाह तआला मक्का वालों से ख़िताब फ़रमाता है.

बेशक हम तुम्हारे पास हक़ लाए(11)
(11) अपने रसूलों द्वारा.

मगर तुम में अक्सर को हक़ नागवार है {78} क्या उन्होंने(12)
(12) यानी मक्के के काफ़िरों ने.

अपने ख़याल में कोई काम पक्का कर लिया है(13){79}
(13) नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ छल करने और धोखे से तकलीफ़ पहुंचाने का और वास्तव में ऐसा ही था कि क़ुरैश दारून-नदवा में जमा होकर हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को तकलीफ़ें देने के तरीक़े सोचते थे.

तो हम अपना काम पक्का करने वाले हैं(14)
(14) उनके इस छलकपट का बदला जिसका अन्त उनकी हलाकत है.

क्या इस घमण्ड में हैं कि हम उनकी आहिस्ता बात और उनकी मशविरत (सलाह) नहीं सुनते, हाँ क्यों नहीं(15)
(15)हम ज़रूर सुनते हैं और छुपी खुली हर बात जानते हैं. हम से कुछ भी नहीं छुप सकता.

और हमारे फ़रिश्ते उनके पास लिख रहे हैं {80} तुम फ़रमाओ फ़र्ज़ करो रहमान के कोई बच्चा होता तो सब से पहले मैं पूजता (16) {81}
(16) लेकिन उसके बच्चा नहीं है और उसके लिये औलाद असंभव है, किसी सूरत मुमकिन नहीं. नज़र बिन हारिस ने कहा था कि फ़रिश्ते ख़ुदा की बेटियाँ हैं. इसपर यह आयत उतरी तो नज़र कहने लगा देखते हो क़ुरआन में मेरी तस्दीक़ आ गई. वलीद ने कहा कि तेरी तस्दीक़ नहीं हुई बल्कि यह फ़रमाया गया है कि रहमान के बेटा नहीं है और मैं मक्का वालों में से पहला व्यक्ति हूँ जो अल्लाह के एक होने में यक़ीन रखता हूँ और उसके औलाद होने का इन्कार करता हूँ. इसके बाद अल्लाह तआला की तन्ज़ीह का बयान है.

पाकी है आसमानों और ज़मीन के रब को अर्श के रब को उन बातों से जो ये बनाते हैं(17){82}
(17) और उसके लिये औलाद क़रार देते हैं.

तो तुम उन्हें छोड़ो कि बेहूदा बातें करें और खेलें (18)
(18)यानी जिस बेहूदगी और बातिल में हैं उसी में पड़े रहें.

यहाँ तक कि अपने उस दिन को पाएं जिसका उनसे वादा है (19){83}
(19) जिसमें अज़ाब किये जाएंगे, और वह क़यामत का दिन है.

और वही आसमान वालों का ख़ुदा(20)
(20)यानी वही मअबूद है आसमान और ज़मीन में. उसी की इबादत की जाती है उसके सिवा कोई पूजनीय नहीं.

और ज़मीन वालों का ख़ुदा, और वही हिकमत (बोध) व इल्म वाला है {84} और बड़ी बरकत वाला है वह कि उसी के लिये हैं सल्तनत आसमानों और ज़मीन की और जो कुछ उनके बीच है और उसी के पास है क़यामत का इल्म, और तुम्हें उसी की तरफ़ फिरना {85} और जिनको ये अल्लाह के सिवा पूजते हैं शफ़ाअत का इख़्तियार नहीं रखते हाँ शफ़ाअत का इख़्तियार उन्हें हैं जो हक़ की गवाही दें (21)
(21) यानी अल्लाह के एक होने की.

और इल्म रखें (22){86}
(22) इसका कि अल्लाह उनका रब है. ऐसे मक़बूल बन्दे ईमानदारों की शफ़ाअत करेंगे.

और अगर तुम उनसे पूछो (23)
(23) यानी मुश्रिकों से.

कि उन्हें किसने पैदा किया तो ज़रूर कहेंगे अल्लाह ने(24)
(24) और अल्लाह तआला के जगत का पैदा करने वाला होने का इक़रार करेंगे.

तो कहाँ औंधे जाते हैं (25) {87}
(25) और इस इक़रार के बावजुद उसकी तौहीद से फिरते हैं.

मुझे रसूल(26)
(26) सैयदे आलम मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम.

के इस कहने की क़सम(27)
(27) अल्लाह तआला का हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के क़ौले मुबारक की क़सम याद फ़रमाना हुज़ूर के सम्मान और हुज़ूर की दुआ और इल्तिज़ा के सम्मान का इज़हार है.

कि ऐ मेरे रब ये लोग ईमान नहीं लाते {88} तो इन से दरगुज़र करो (छोड़ दो) (28)
(28) और उन्हें छोड़ दो.

और फ़रमाओ बस सलाम है, (29)
(29) यह सलाम बेज़ारी का है इसके मानी ये है कि हम तुम्हें छोड़ते हैं और तुम से अम्न में रहना चाहते हैं.

कि आगे जान जाएंगे(30){89}
(30) अपना अन्त या अंजाम.

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