43 सूरए ज़ुख़रूफ़ -दूसरा रूकू

43 सूरए ज़ुख़रूफ़ -दूसरा रूकू

أَمِ اتَّخَذَ مِمَّا يَخْلُقُ بَنَاتٍ وَأَصْفَاكُم بِالْبَنِينَ
وَإِذَا بُشِّرَ أَحَدُهُم بِمَا ضَرَبَ لِلرَّحْمَٰنِ مَثَلًا ظَلَّ وَجْهُهُ مُسْوَدًّا وَهُوَ كَظِيمٌ
أَوَمَن يُنَشَّأُ فِي الْحِلْيَةِ وَهُوَ فِي الْخِصَامِ غَيْرُ مُبِينٍ
وَجَعَلُوا الْمَلَائِكَةَ الَّذِينَ هُمْ عِبَادُ الرَّحْمَٰنِ إِنَاثًا ۚ أَشَهِدُوا خَلْقَهُمْ ۚ سَتُكْتَبُ شَهَادَتُهُمْ وَيُسْأَلُونَ
وَقَالُوا لَوْ شَاءَ الرَّحْمَٰنُ مَا عَبَدْنَاهُم ۗ مَّا لَهُم بِذَٰلِكَ مِنْ عِلْمٍ ۖ إِنْ هُمْ إِلَّا يَخْرُصُونَ
أَمْ آتَيْنَاهُمْ كِتَابًا مِّن قَبْلِهِ فَهُم بِهِ مُسْتَمْسِكُونَ
بَلْ قَالُوا إِنَّا وَجَدْنَا آبَاءَنَا عَلَىٰ أُمَّةٍ وَإِنَّا عَلَىٰ آثَارِهِم مُّهْتَدُونَ
وَكَذَٰلِكَ مَا أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ فِي قَرْيَةٍ مِّن نَّذِيرٍ إِلَّا قَالَ مُتْرَفُوهَا إِنَّا وَجَدْنَا آبَاءَنَا عَلَىٰ أُمَّةٍ وَإِنَّا عَلَىٰ آثَارِهِم مُّقْتَدُونَ
۞ قَالَ أَوَلَوْ جِئْتُكُم بِأَهْدَىٰ مِمَّا وَجَدتُّمْ عَلَيْهِ آبَاءَكُمْ ۖ قَالُوا إِنَّا بِمَا أُرْسِلْتُم بِهِ كَافِرُونَ
فَانتَقَمْنَا مِنْهُمْ ۖ فَانظُرْ كَيْفَ كَانَ عَاقِبَةُ الْمُكَذِّبِينَ

क्या उसने अपने लिये अपनी मख़लूक़ (सृष्टि) में से बेटियाँ लीं और तुम्हें बेटों के साथ ख़ास किया(1) {16}
(1) अदना अपने लिये और आला तुम्हारे लिये, कैसे जाहिल हो, क्या बकते हो.

और जब उनमें किसी को ख़ुशख़बरी दी जाए उस चीज़ की(2)
(2) यानी बेटी की कि तेरे घर में बेटी पैदा हुई है.

जिसका वस्फ़ रहमान के लिये बता चुका है(3)
(3) कि मआज़ल्लाह वह बेटी वाला है.

तो दिन भर उसका मुंह काला रहे और ग़म खाया करे  (4){17}
(4) और बेटी का होना इस क़द्र नागवार समझे, इसके बावुजूद अल्लाह तआला के लिये बेटियाँ बताए.

और क्या (5)
(5) काफ़िर हज़रते रहमान के लिये औलाद की क़िस्मों में से तजवीज़ करते हैं.

वह जो गहने(जे़वर) में पर्वान चढ़े(6)
(6) यानी ज़ेवरों की सजधज में नाज़ और नज़ाकत के साथ पले बढ़े. इससे मालूम हुआ कि ज़ेवर से श्रंगार नुक़सान की दलील है तो मर्दों को इस से परहेज़ करना चाहिये. परहेज़गारी से अपनी ज़ीनत करें. अब आगे आयत में लड़की की एक और कमज़ोरी का इज़हार फ़रमाया जाता है.

और बहस में साफ़ बात न करे(7){18}
(7) यानी अपनी हालत की कमज़ोरी और अक़्ल की कमी की वजह से. हज़रत क़तादह रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि औरत जब बातचीत करती है और अपनी ताईद में कोई दलील पेश करना चाहती है तो अक्सर ऐसा होता है कि वह अपने ही ख़िलाफ़ दलील पेश कर देती है.

और उन्होंने फ़रिश्तों को कि रहमान के बन्दे हैं औरतें ठहराया(8)
(8) हासिल यह है कि फ़रिश्तों को ख़ुदा की बेटियाँ बताने में बेदीनों ने तीन कुफ़्र किये, एक तो अल्लाह तआला की तरफ़ औलाद की निस्बत, दूसरे उस ज़लील चीज़ को उसकी तरफ़ जोड़ना जिस को वो ख़ुद बहुत ही तुच्छ समझते हैं और अपने लिये गवारा नहीं करते, तीसरे फ़रिश्तों की तौहीन, उन्हें बेटियाँ बताना (मदारिक) अब उसका रद फ़रमाया जाता है.

क्या उनके बनाते वक़्त ये हाज़िर थे(9)
(9)  फ़रिश्तों का नर या मादा होना ऐसी चीज़ तो है नहीं जिसपर कोई अक़ली दलील क़ायम हो सके और उनके पास ख़बर आई नहीं तो जो काफ़िर उनको मादा क़रार देते हैं उनकी जानकारी का ज़रिया क्या है, क्या उनकी पैदायश के वक़्त मौजूद थे और उन्होंने अवलोकन कर लिया है. जब यह भी नहीं तो केवल जिहालत वाली गुमराही की बात है.

अब लिखली जाएगी उनकी गवाही (10)
(10) यानी काफ़िरों का फ़रिश्तों के मादा होने पर गवाही देना लिखा जाएगा.

और उन से जवाब तलब होगा(11) {19}
(11) आख़िरत में और उसपर सज़ा दी जाएगी. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने काफ़िरो से पूछा कि तुम फ़रिश्तों को ख़ुदा की बेटियाँ किस तरह कहते हो. तुम्हारी जानकारी का स्रोत क्या है. उन्हों ने कहा हमने अपने बाप दादा से सुना है और हम गवाही देते हैं वो सच्चे थे. इस गवाही को अल्लाह तआला ने फ़रमाया कि लिखी जाएगी और उस पर जवाब तलब होगा.

और बोले अगर रहमान चाहता हम इन्हें न पूजते, (12)
(12) यानी फ़रिश्तों को. मतलब यह था कि अगर फ़रिश्तों की पूजा करने से अल्लाह तआला राज़ी न होता तो हम पर अज़ाब उतारता और जब अज़ाब न आया तो हम समझते हैं कि वह यही चाहता हे. यह उन्होंने ऐसी ग़लत बात कही जिससे लाज़िम आए कि सारे जुर्म जो दुनिया में होते हैं उनसे ख़ुदा राज़ी है. अल्लाह तआला उन्हें झुटलाता है.

उन्हें इसकी हक़ीक़त कुछ मालूम नहीं (13)
(13) वो अल्लाह की रज़ा के जानने वाले ही नहीं.

यूंही अटकलें दौड़ाते हैं (14) {20}
(14) झूट बकते हैं.

या इससे पहले हमने उन्हें कोई किताब दी है जिसे वो थामे हुए हैं(15) {21}
(15) और उसमें ग़ैर ख़ुदा की पूजा की इजाज़त है ऐसा नहीं यह बातिल हैं और इसके सिवा भी उनके पास कोई हुज्जत नहीं है.

बल्कि बोले हमने अपने बाप दादा को एक दीन पर पाया और हम उनकी लकीर पर चल रहे हैं(16){22}
(16) आँखें मीच कर, बे सोचे समझे उनका अनुकरण करते हैं. वो मख़लूक़ परस्ती किया  करते थे. मतलब यह है कि उसकी कोई दलील इसके अलावा नहीं है कि यह काम वो अपने बाप दादा के अनुकरण में करते हैं. अल्लाह तआला फ़रमाता है कि उनसे पहले भी ऐसा ही कहा करते थे.

और ऐसे ही हमने तुम से पहले जब किसी शहर में कोई डर सुनाने वाला भेजा वहाँ के आसूदों ने यही कहा कि हमने अपने बाप दादा को एक दीन पर पाया और हम उनकी लकीर के पीछे हैं(17){23}
(17) इससे मालूम हुआ कि बाप दादा की अन्धे बन कर पैरवी करना काफ़िरों की पुरानी बीमारी है. और उन्हें इतनी तमीज़ नहीं कि किसी का अनुकरण या पैरवी करने के लिये यह देख लेना ज़रूरी है कि वह सीधी राह पर हो, चुनांन्चे—

नबी ने फ़रमाया और क्या जब भी कि मैं तुम्हारे पास वह (18)
(18) सच्चा दीन.

लाऊं जो सीधी राह हो उससे  (19)
(19) यानी उस दीन से.

जिसपर तुम्हारे बाप दादा थे, बोले जो कुछ तुम लेकर भेजे गए हम उसे नहीं मानते(20){24}
(20) अगरचे तुम्हारा दीन सच्चा और अच्छा हो मगर हम अपने बाप दादा का दीन छोड़ने वाले नहीं  चाहे वह कैसा ही हो. इसपर अल्लाह तआला इरशाद फ़रमाता है.

तो हमने उनसे बदला लिया(21) तो देखो झुटलाने वालों का कैसा अंजाम हुआ {25}
(21) यानी रसूलों के न मानने वालों और उन्हे झुटलाने वालों से.

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