43 सूरए ज़ुख़रूफ़ -चौथा रूकू

43 सूरए ज़ुख़रूफ़ -चौथा रूकू

وَمَن يَعْشُ عَن ذِكْرِ الرَّحْمَٰنِ نُقَيِّضْ لَهُ شَيْطَانًا فَهُوَ لَهُ قَرِينٌ
وَإِنَّهُمْ لَيَصُدُّونَهُمْ عَنِ السَّبِيلِ وَيَحْسَبُونَ أَنَّهُم مُّهْتَدُونَ
حَتَّىٰ إِذَا جَاءَنَا قَالَ يَا لَيْتَ بَيْنِي وَبَيْنَكَ بُعْدَ الْمَشْرِقَيْنِ فَبِئْسَ الْقَرِينُ
وَلَن يَنفَعَكُمُ الْيَوْمَ إِذ ظَّلَمْتُمْ أَنَّكُمْ فِي الْعَذَابِ مُشْتَرِكُونَ
أَفَأَنتَ تُسْمِعُ الصُّمَّ أَوْ تَهْدِي الْعُمْيَ وَمَن كَانَ فِي ضَلَالٍ مُّبِينٍ
فَإِمَّا نَذْهَبَنَّ بِكَ فَإِنَّا مِنْهُم مُّنتَقِمُونَ
أَوْ نُرِيَنَّكَ الَّذِي وَعَدْنَاهُمْ فَإِنَّا عَلَيْهِم مُّقْتَدِرُونَ
فَاسْتَمْسِكْ بِالَّذِي أُوحِيَ إِلَيْكَ ۖ إِنَّكَ عَلَىٰ صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ
وَإِنَّهُ لَذِكْرٌ لَّكَ وَلِقَوْمِكَ ۖ وَسَوْفَ تُسْأَلُونَ
وَاسْأَلْ مَنْ أَرْسَلْنَا مِن قَبْلِكَ مِن رُّسُلِنَا أَجَعَلْنَا مِن دُونِ الرَّحْمَٰنِ آلِهَةً يُعْبَدُونَ

और जिसे रतौंद आए रहमान के ज़िक्र से(1)
(1) यानी क़ुरआने पाक से अन्धा बन जाए कि उसकी हिदायतों को न देखे और उनसे फ़ायदा न उठाए.

हम उस पर एक शैतान तैनात करें कि वह उसका साथी रहे {36} और बेशक वो शयातीन उनको(2)
(2) यानी अन्धा बनने वालों को.

राह से रोकते हैं और(3)
(3) वो अन्धा बनने वाले गुमराह होने के बावुजूद.

समझते यह हैं कि वो राह पर हैं {37} यहाँ तक कि जब (4)
(4) क़यामत के दिन.

काफ़िर हमारे पास आएगा अपने शैतान से कहेगा हाय किसी तरह मुझ में तुझ में पूरब पश्चिम का फ़ासला होता तू क्या ही बुरा साथी है {38} और हरगिज़ तुम्हारा उस  (5)
(5) हसरत और शर्मिन्दगी.

से भला न होगा आज जब कि(6)
(6) ज़ाहिर और साबित हो गया कि दुनिया में शिर्क करके.

तुमने ज़ुल्म किया कि तुम सब अज़ाब में शरीक हो {39} तो क्या तुम बहरों को सुनाओगे(7)
(7) जो क़ुबूल करने वाले कान नहीं रखते.

या अंधों को राह दिखाओगे(8)
(8) जो सच्चे देखने वाली आँख से मेहरूम हैं.

और उन्हें जो खुली गुमराही में हैं(9){40}
(9) जिनके नसीब में ईमान नहीं.

तो अगर हम तुम्हें ले जाएं(10)
(10) यानी उन्हें अज़ाब करने से पहले तुम्हें वफ़ात दें.

तो उनसे हम ज़रूर बदला लेंगे(11){41}
(11) आपके बाद.

या तुम्हें दिखा दें(12)
(12)  तुम्हारी ज़िन्दगी में उनपर अपना वह अज़ाब.

जिसका उन्हें हमने वादा दिया हैं तो हम उनपर बड़ी क़ुदरत वाले हैं {42} तो मज़बूत थामे रहो उसे जो तुम्हारी तरफ़ वही की गई(13)
(13)हमारी किताब क़ुरआने मजीद.

बेशक तुम सीधी राह पर हो {43} और बेशक वह (14)
(14) क़ुरआन शरीफ़

शरफ़ (बुज़ुर्गी) है तुम्हारे लिये (15)
(15)कि अल्लाह तआला ने तुम्हें नबुव्वत व हिकमत अता की.

और तुम्हारी क़ौम के लिये(16)
(16) यानी उम्मत के लिये, कि उन्हें उससे हिदायत फ़रमाई.

और बहुत जल्द तुम से पूछा जाएगा (17){44}
(17)क़यामत के दिन कि तुम ने क़ुरआन का क्या हक़ अदा किया. उसकी क्या ताज़ीम की. उस नेअमत का क्या शुक्र बजा लाए.

और उनसे पूछो जो हमने तुमसे पहले रसूल भेजे क्या हमने रहमान के सिवा कुछ और ख़ुदा ठहराए जिनको पूजा हो (18){45}
(18) रसूलों से सवाल करने के मानी ये हैं कि उनके दीनों और मिल्लतों को तलाश करो, क्या कहीं भी किसी नबी की उम्मत में बुत परस्ती रवा रखी गई है. और अकसर मुफ़स्सिरों ने इसके मानी ये बयान किये हैं कि किताब वालों के मूमिनों से पूछों कि क्या कभी किसी नबी ने अल्लाह के अलावा किसी ग़ैर की इबादत की इजाज़त दी, ताकि मुश्रिकों पर साबित हो जाए कि मख़लूक़ परस्ती न किसी रसूल ने बताई न किसी किताब में आई. यह भी एक रिवायत है कि मेअराज की रात में सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने सारे नबियों की बैतुल मक़दिस में इमामत फ़रमाई. जब हुज़ूर नमाज़ से फ़ारिग़ हुए, जिब्रीले अमीन ने अर्ज़ किया कि ऐ सरवरे अकरम, अपने से पहले नबियों से पूछ लीजिये कि क्या अल्लाह तआला ने अपने सिवा किसी और की इबादत की इजाज़त दी. हुज़ूर सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि इस सवाल की कुछ हाजत नहीं, यानी इसमें कोई शक हीनहीं कि तमाम नबी तौहीद की दावत देते आए, सब ने मख़लूक़ परस्ती से मना फ़रमाया है.

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