43 सूरए ज़ुख़रूफ़ -तीसरा रूकू

43 सूरए ज़ुख़रूफ़ -तीसरा रूकू

وَإِذْ قَالَ إِبْرَاهِيمُ لِأَبِيهِ وَقَوْمِهِ إِنَّنِي بَرَاءٌ مِّمَّا تَعْبُدُونَ
إِلَّا الَّذِي فَطَرَنِي فَإِنَّهُ سَيَهْدِينِ
وَجَعَلَهَا كَلِمَةً بَاقِيَةً فِي عَقِبِهِ لَعَلَّهُمْ يَرْجِعُونَ
بَلْ مَتَّعْتُ هَٰؤُلَاءِ وَآبَاءَهُمْ حَتَّىٰ جَاءَهُمُ الْحَقُّ وَرَسُولٌ مُّبِينٌ
وَلَمَّا جَاءَهُمُ الْحَقُّ قَالُوا هَٰذَا سِحْرٌ وَإِنَّا بِهِ كَافِرُونَ
وَقَالُوا لَوْلَا نُزِّلَ هَٰذَا الْقُرْآنُ عَلَىٰ رَجُلٍ مِّنَ الْقَرْيَتَيْنِ عَظِيمٍ
أَهُمْ يَقْسِمُونَ رَحْمَتَ رَبِّكَ ۚ نَحْنُ قَسَمْنَا بَيْنَهُم مَّعِيشَتَهُمْ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۚ وَرَفَعْنَا بَعْضَهُمْ فَوْقَ بَعْضٍ دَرَجَاتٍ لِّيَتَّخِذَ بَعْضُهُم بَعْضًا سُخْرِيًّا ۗ وَرَحْمَتُ رَبِّكَ خَيْرٌ مِّمَّا يَجْمَعُونَ
وَلَوْلَا أَن يَكُونَ النَّاسُ أُمَّةً وَاحِدَةً لَّجَعَلْنَا لِمَن يَكْفُرُ بِالرَّحْمَٰنِ لِبُيُوتِهِمْ سُقُفًا مِّن فِضَّةٍ وَمَعَارِجَ عَلَيْهَا يَظْهَرُونَ
وَلِبُيُوتِهِمْ أَبْوَابًا وَسُرُرًا عَلَيْهَا يَتَّكِئُونَ
وَزُخْرُفًا ۚ وَإِن كُلُّ ذَٰلِكَ لَمَّا مَتَاعُ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۚ وَالْآخِرَةُ عِندَ رَبِّكَ لِلْمُتَّقِينَ

और जब इब्राहीम ने अपने बाप और अपनी क़ौम से फ़रमाया मैं बेज़ार हूँ तुम्हारे मअबूदों से {26} सिवा उसके जिसने मुझे पैदा किया कि ज़रूर वह बहुत जल्द मुझे राह देगा {27} और उसे(1)
(1) यानी हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम ने अपने उस तौहीदी कलिमें को जो फ़रमाया था कि मैं बेज़ार हूँ तुम्हारे मअबूदों से सिवाय उसके जिसने मुझे पैदा किया.

अपनी नस्ल में बाक़ी कलाम रखा(2)
(2)  तो आपकी औलाद में एक अल्लाह को मानने वाले तौहीद के दावेदार हमेशा रहेंगे.

कि कहीं वो बाज़ आएं(3) {28}
(3) शिर्क से और ये सच्चा दीन क़ुबूल करें. यहाँ हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम का ज़िक्र फ़रमाने में चेतावनी है कि ऐ मक्का वालो अगर तुम्हें अपने बाप दादा का अनुकरण करना ही है तो तुम्हारे बाप दादा में जो सब से बेहतर हैं हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम, उनका अनुकरण करो और शिर्क छोड़ दो और यह भी देखो कि उन्हों ने अपने बाप और अपनी क़ौम को सीधी राह पर नहीं पाया तो उनसे बेज़ारी का ऐलान फ़रमा दिया. इससे मालूम  हुआ कि जो बाप दादा सीधी राह पर हों, सच्चा दीन रखते हों, उनका अनुकरण किया जाए और जो बातिल पर हों, गुमराही में हों उनके तरीक़े से बेज़ारी का इज़हार किया जाए.

बल्कि मैं ने उन्हें (4)
(4) यानी मक्का के काफ़िरों को.

और उनके बाप दादा को दुनिया के फ़ायदे दिये  (5)
(5) लम्बी उम्रें अता फ़रमाई और उनके कुफ़्र के कारण उनपर अज़ाब उतारने में जल्दी न की.

यहाँ तक कि उनके पास हक़(6)
(6) यानी क़ुरआन शरीफ़.

और साफ़ बताने वाला रसूल तशरीफ़ लाया (7){29}
(7) यानी सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम सबसे ज़्यादा रौशन आयतों और चमत्कारों के साथ तशरीफ़ लाए और अपनी शरीअत के अहकाम खुले तौर पर बयान फ़रमा दिये और हमारे इस इनाम का हक़ यह था कि उस रसूले मुकर्रम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की बात मानते लेकिन उन्होंने ऐसा न किया.

और जब उनके पास हक़ (सत्य) आया बोले यह जादू है और हम इसके इन्कारी हैं {30} और बोले क्यों न उतारा गया ये क़ुरआन इन दो शहरों (8)
(8) मक्कए मुकर्रमा और ताइफ़.

के किसी बड़े आदमी पर (9){31}
(9) जो मालदार जत्थेदार हो, जैसे कि मक्कए मुकर्रमा में वलदर बिन मुग़ीरह और ताइफ़ में अर्वा बिन मसऊद सक़फ़ी. अल्लाह तआला उनकी इस बात का रद फ़रमाता है.

क्या तुम्हारे रब की रहमत वो बाँटते हैं, (10)
(10) यानी क्या नबुव्वत की कुंजियाँ उनके हाथ में हैं कि जिसको चाहे दे दें. कितनी जिहालत वाली बात कहते हैं.

हमने उनमें उनकी ज़िन्दगी का सामान दुनिया की ज़िन्दगी में बाँटा (11)
(11) तो किसी को मालदार किया. किसी को फ़कीर, किसी को ताक़तवर किया, किसी को कमज़ोर. मख़लूक़ में कोई हमारे हुक्म को बदलने और हमारे लिखे से बाहर निकलने की ताक़त नहीं रखता. तो जब दुनिया जैसी साधारण चीज़ में किसी को ऐतिराज़ की ताक़त नहीं तो नबुव्वत जैसी ऊंची उपाधि में किसी को दम मारने का क्या मौक़ा है? हम जिसे चाहते हैं ग़नी करते हैं, जिसे चाहते हैं ख़ादिम बनाते हैं. जिसे चाहते हैं नबी बनाते हैं जिसे चाहते हैं उम्मती बनाते हैं. अमीर क्या कोई अपनी योग्यता से हो जाता है? हमारी अता है जिसे जो चाहे करें.

और उनमें एक दूसरे पर दर्जो बलन्दी दी(12)
(12) क़ुव्वत व दौलत वग़ैरह दुनियावी नेअमत में.

कि उनमें एक दूसरे की हंसी बनाए,(13)
(13) यानी मालदार फ़क़ीर की हंसी करे, यह क़रतबी की तफ़सीर के मुताबिक है और दूसरे मुफ़स्सिरों ने हंसी बनाने के मानी में नहीं लिया है बल्कि अअमाल व अशग़ाल के मुसख़्ख़र बनाने के मानी में लिया है. उस सूरत में मानी ये होंगे कि हमने दौलत और माल में लोगों को अलग किया ताकि एक दूसरे से माल के ज़रिये ख़िदमत लें और दुनिया का निज़ाम मज़बूत हो. ग़रीब को रोज़ी का साधन हाथ आए और मालदार को काम करने वाले उपलब्ध हों. तो इसपर कौन ऐतिराज़ कर सकता है कि इस आदमी को क्यों मालदार किया और उसको फ़क़ीर. और जब दुनिया के कामों में कोई व्यक्ति दम नहीं मार सकता तो नबुव्वत जैसे ऊंचे रूत्बे में किसी को ज़बान खोलने की क्या ताक़त और ऐतिराज़ का क्या हक़. उसकी मर्ज़ी जिसको चाहे सरफ़राज़ फ़रमाए.

और तुम्हारे रब की रहमत(14)
(14) यानी जन्नत.

उनकी जमा जथा से बेहतर (15) {32}
(15) यानी उस माल से बेहतर है जिसको दुनिया में काफ़िर जमा कर के रखते हैं.

और अगर यह न होता कि सब लोग एक दीन पर हो जाएं (16)
(16) यानी अगर इसका लिहाज़ न होता कि काफ़िरों को ख़ुशहाली में देखकर सब लोग काफ़िर हो जाएंगे.

तो हम ज़रूर रहमान का इन्कार करने वालों के लिये चांदी की छतें और सीढ़ियाँ बनाते जिनपर चढ़ते {33} और उनके घरो कें लिये चांदी के दरवाज़ें और चांदी के तख़्त जिन पर तकिया लगाते {34} और तरह तरह की आरायश, (17)
(17) क्योंकि दुनिया और उसके सामान की हमारे नज़्दीक कुछ क़ीमत नहीं. वह पतनशील है, जल्दी ख़त्म हो जाने वाला है.

और यह जो कुछ है जीती दुनिया ही का सामान है, और आख़िरत तुम्हारे रब के पास परहेज़गारों के लिये है(18) {35}
(18) जिन्हें दुनिया की चाहत नहीं. तिरमिज़ी की हदीस में है कि अगर अल्लाह तआला के नज़्दीक दुनिया मच्छर के घर के बराबर भी क़ीमत रखती तो काफ़िर को उससे एक घूंट पानी न देता, दूसरी हदीस में है कि सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम नियाज़मन्दों की एक जमाअत के साथ तशरीफ़ ले जाते थे. रास्ते में एक मुर्दा बकरी देखी फ़रमाया देखते हो इसके मालिकों ने इसे बहुत बेक़दरी से फ़ैंक दिया. दुनिया की अल्लाह तआला के नज़्दीक इतनी भी क़दर नहीं जितनी बकरी वालों के नज़्दीक इस मरी बकरी की हो. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि जब अल्लाह तआला अपने किसी बन्दे पर मेहरबानी फ़रमाता है तो उसे दुनिया से ऐसा बचाता है जैसा तुम अपने बीमार को पानी से बचाओ. हदीस में है दुनिया मूमिन के लिये क़ैद ख़ाना और काफ़िर के लिये जन्नत है.

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