42 सूरए शूरा -पांचवाँ रूकू

42 सूरए शूरा -पांचवाँ रूकू

وَمَن يُضْلِلِ اللَّهُ فَمَا لَهُ مِن وَلِيٍّ مِّن بَعْدِهِ ۗ وَتَرَى الظَّالِمِينَ لَمَّا رَأَوُا الْعَذَابَ يَقُولُونَ هَلْ إِلَىٰ مَرَدٍّ مِّن سَبِيلٍ
وَتَرَاهُمْ يُعْرَضُونَ عَلَيْهَا خَاشِعِينَ مِنَ الذُّلِّ يَنظُرُونَ مِن طَرْفٍ خَفِيٍّ ۗ وَقَالَ الَّذِينَ آمَنُوا إِنَّ الْخَاسِرِينَ الَّذِينَ خَسِرُوا أَنفُسَهُمْ وَأَهْلِيهِمْ يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۗ أَلَا إِنَّ الظَّالِمِينَ فِي عَذَابٍ مُّقِيمٍ
وَمَا كَانَ لَهُم مِّنْ أَوْلِيَاءَ يَنصُرُونَهُم مِّن دُونِ اللَّهِ ۗ وَمَن يُضْلِلِ اللَّهُ فَمَا لَهُ مِن سَبِيلٍ
اسْتَجِيبُوا لِرَبِّكُم مِّن قَبْلِ أَن يَأْتِيَ يَوْمٌ لَّا مَرَدَّ لَهُ مِنَ اللَّهِ ۚ مَا لَكُم مِّن مَّلْجَإٍ يَوْمَئِذٍ وَمَا لَكُم مِّن نَّكِيرٍ
فَإِنْ أَعْرَضُوا فَمَا أَرْسَلْنَاكَ عَلَيْهِمْ حَفِيظًا ۖ إِنْ عَلَيْكَ إِلَّا الْبَلَاغُ ۗ وَإِنَّا إِذَا أَذَقْنَا الْإِنسَانَ مِنَّا رَحْمَةً فَرِحَ بِهَا ۖ وَإِن تُصِبْهُمْ سَيِّئَةٌ بِمَا قَدَّمَتْ أَيْدِيهِمْ فَإِنَّ الْإِنسَانَ كَفُورٌ
لِّلَّهِ مُلْكُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ يَخْلُقُ مَا يَشَاءُ ۚ يَهَبُ لِمَن يَشَاءُ إِنَاثًا وَيَهَبُ لِمَن يَشَاءُ الذُّكُورَ
أَوْ يُزَوِّجُهُمْ ذُكْرَانًا وَإِنَاثًا ۖ وَيَجْعَلُ مَن يَشَاءُ عَقِيمًا ۚ إِنَّهُ عَلِيمٌ قَدِيرٌ
۞ وَمَا كَانَ لِبَشَرٍ أَن يُكَلِّمَهُ اللَّهُ إِلَّا وَحْيًا أَوْ مِن وَرَاءِ حِجَابٍ أَوْ يُرْسِلَ رَسُولًا فَيُوحِيَ بِإِذْنِهِ مَا يَشَاءُ ۚ إِنَّهُ عَلِيٌّ حَكِيمٌ
وَكَذَٰلِكَ أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ رُوحًا مِّنْ أَمْرِنَا ۚ مَا كُنتَ تَدْرِي مَا الْكِتَابُ وَلَا الْإِيمَانُ وَلَٰكِن جَعَلْنَاهُ نُورًا نَّهْدِي بِهِ مَن نَّشَاءُ مِنْ عِبَادِنَا ۚ وَإِنَّكَ لَتَهْدِي إِلَىٰ صِرَاطٍ مُّسْتَقِيمٍ
صِرَاطِ اللَّهِ الَّذِي لَهُ مَا فِي السَّمَاوَاتِ وَمَا فِي الْأَرْضِ ۗ أَلَا إِلَى اللَّهِ تَصِيرُ الْأُمُورُ

और जिसे अल्लाह गुमराह करे उसका कोई दोस्त नहीं अल्लाह के मुक़ाबिल(1)
(1) कि उसे अज़ाब से बचा सके.

और तुम ज़ालिमों को देखोगे कि जब अज़ाब देखेंगे(2)
(2) क़यामत के दिन.

कहेंगे क्या वापस जाने का कोई रास्ता है(3) {44}
(3) यानी दुनिया में, ताकि वहाँ जाकर ईमान ले आएं.

और तुम उन्हें देखोगे कि आग पर पेश किये जाते हैं ज़िल्लत से दबे लचे छुपी निगाहों देखते हैं(4)
(4) यानी ज़िल्लत और ख़ौफ़ के कारण आग को ऐसी तेज़ नज़रों से देखेंगे जैसे कोई क़त्ल होने वाला अपने क़त्ल के वक़्त जल्लाद की तलवार तेज़ निगाह से देखता है.

और ईमान वाले कहेंगे बेशक हार में वो हैं जो अपनी जानें और अपने घर वाले हार बैठे क़यामत के दिन(5)
(5) जानों का हारना तो यह है कि वो कुफ़्र इख़्तियार करके जहन्नम के हमेशगी के अज़ाब में गिरफ़्तार हुए और घर वालों का हारना यह है कि ईमान लाने की सूरत में जन्नत की जो हूरें उनके लिये रखी गई थीं, उनसे मेहरूम हो गए.

सुनते हो बेशक ज़ालिम (6)
(6) यानी काफ़िर.

हमेशा के अज़ाब में हैं {45} और उनके कोई दोस्त न हुए कि अल्लाह के मुक़ाबिल उनकी मदद करते(7)
(7) और उनके अज़ाब से बचा सकते.

और जिसे अल्लाह गुमराह करे उसके लिये कहीं रास्ता नहीं (8){46}
(8) ख़ैर का, न वो दुनिया में हक़ तक पहुंच सके, न आख़िरत में जन्नत तक.

अपने रब का हुक्म मानो(9)
(9) और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की फ़रमाँबरदारी करके तौहीद और अल्लाह की इबादत इख़्तियार करे.

उस दिन के आने से पहले जो अल्लाह की तरफ़ से टलने वाला नहीं(10)
(10) इससे मुराद या मौत का दिन है, या क़यामत का.

उस दिन तुम्हें कोई पनाह न होगी और न तुम्हें इन्कार करते बने(11) {47}
(11) अपने गुनाहों का, यानी उस दिन कोई रिहाई की सूरत नहीं. न अज़ाब से बच सकते हो न अपने  बुरे कर्मों  का इन्कार कर सकते हो जो तुम्हारे आमाल नामों में दर्ज हैं.

तो अगर वो मुंह फेरें(12)
(12) ईमान लाने और फ़रमाँबरदारी करने से.

तो हमने तुम्हें उनपर निगहबान बनाकर नहीं भेजा(13)
(13) कि तुम पर उनके कर्मों की हिफ़ाज़त अनिवार्य हो.

तुम पर तो नहीं मगर पहुंचा देना(14)
(14)और वह तुमने अदा कर दिया.

और जब हम आदमी को अपनी तरफ़ से किसी रहमत का मज़ा देते हैं उस पर ख़ुश हो जाता है, (15)
(15) चाहे वह दौलत और जायदाद हो या सेहत व आफ़ियत या अम्न व सलामती या शान व शौकत.

और अगर उन्हें कोई बुराई पहुंचे (16)
(16) या और कोई मुसीबत और बला जैसे दुष्काल, बीमारी, ग़रीबी वग़ैरह सामने आए.

बदला उसका जो उनके हाथों ने आगे भेजा(17)
(17) यानी उनकी नाफ़रमानियों और गुमराहियों के कारण.

तो इन्सान बड़ नाशुक्रा है (18) {48}
(18) नेअमतों को भूल जाता है.

अल्लाह ही के लिये है आसमानों और ज़मीन की सल्तनत   (19)
(19) जैसे चाहता है, उपयोग में लाता है, कोई दख़्ल देने और ऐतिराज़ करने की मजाल नहीं रखता.

पैदा करता है जो चाहे, जिसे चाहे बेटियां अता करे(20)
(20) बेटा न दे.

और जिसे चाहे बेटे दे(21){49}
(21) बेटी न दे.

या दोनों मिला दे बेटे और बेटियाँ, और जिसे चाहे बांझ कर दे(22)
(22) कि उसके औलाद ही नहो. वह मालिक है अपनी नेअमत को जिस तरह चाहे तक़सीम करे, जिसे जो चाहे दे, नबियों में भी ये सूरतें पाई जाती हैं. हज़रत लूत और हज़रत शूऐब अलैहिस्सलाम के सिर्फ़ बेटियाँ थीं, कोई बेटा न था और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम के सिर्फ़ बेटे थे, कोई बेटी हुई ही नहीं. और नबियों के सरदार अल्लाह के हबीब मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम को अल्लाह तआला ने चार बेटे अता फ़रमाए और चार बेटियाँ. और हज़रत यहया और हज़रत ईसा अलैहिस्सलाम के कोई औलाद ही नहीं.

बेशक वह इल्म व क़ुदरत वाला है {50} और किसी आदमी को नहीं पहुंचता कि अल्लाह उससे कलाम फ़रमाए मगर वही के तौर पर (23)
(23) यानी बेवास्ता उसके दिल में इल्क़ा फ़रमाकर और इल्हाम करके, जागते में या सपने में, इसमें वही की प्राप्ति कानों के माध्यम यानी सुनने के बग़ैर है और आयत में इल्ला वहयन से यही मुराद है. इसमें यह क़ैद नहीं कि इस हाल में सुनने वाला बोलने वाले को देखता हो या न देखता हो. मुजाहिद ने नक़्ल किया कि अल्लाह तआला ने हज़रत दाऊद अलैहिस्सलाम के सीने में ज़बूर की वही फ़रमाई और हज़रत इब्राहीम अलैहिस्सलाम को बेटे के ज़िब्ह की ख़्वाब में वही फ़रमाई. और सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से मेअराज में इसी तरह की वही फ़रमाई. जिसका “फ़ औहा इला अब्दिही मा औहा” में बयान है. यह सब इसी क़िस्म में दाख़िल हैं. नबियों के ख़्वाब सच्चे होते हैं जैसा कि हदीस शरीफ़ में आया है कि अम्बिया के ख़्वाब वही हैं. (तफ़सीर अबू सऊद व कबीर व मदारिक व ज़रक़ानी अलल मवाहिब वगै़रह)

या यूं कि वह बशर महानता के पर्दे के उधर हो (24)
(24) यानी रसूल पर्दे के पीछे से उसका कलाम सुने. वही के इस तरीक़े में भी कोई वास्ता नहीं मगर सुनने वाले को इस हाल में बोलने वाले का दर्शन नहीं होता. हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम इसी तरह के कलाम से बुज़ुर्गी दिये गए. यहूदियों ने हुज़ूर पुरनूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कहा था कि अगर आप नबी हैं तो अल्लाह तआला से कलाम करते वक़्त उसको क्यों नहीं देखते जैसा कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम देखते थे. हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने जवाब दिया कि हज़रत मूसा अलैहिस्सलाम नहीं देखते थे और अल्लाह तआला ने यह आयत उतारी. अल्लाह तआला इससे पाक है कि उसके लिये कोई ऐसा पर्दा हो जैसा जिस्मानियात के लिये होता है. इस पर्दे से मुराद सुनने वाले का दुनिया में दर्शन से मेहजूब होना है.

या कोई फ़रिश्ता भेजे कि वह उसके हुक्म से वही करे जो वह चाहे(25)
(25) वही के इस तरीक़े में रसूल की तरफ़ फ़रिश्ते की वसातत है.

बेशक वह बलन्दी व हिकमत (बोध) वाला है {51} और यूंही हमने तुम्हें वही भेजी(26)
(26) ऐ नबियों के सरदार सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम.

एक जाँफ़ज़ा चीज़(27)
(27) यानी क़ुरआने पाक, जो दिलों में ज़िन्दगी पैदा करता है.

अपने हुक्म से, इससे पहले न तुम किताब जानते थे न शरीअत के आदेशों की तफ़सील हाँ हमने उसे (28)
(28) यानी दीने इस्लाम.

नूर किया जिससे हम राह दिखाते हैं अपने बन्दों से जिसे चाहते हैं, और बेशक तुम ज़रूर सीधी राह बताते हो(29) {52}
(29)

अल्लाह की राह(30) कि उसी का है जो कुछ आसमानों में है और जो कुछ ज़मीन में, सुनते हो सब काम अल्लाह ही की तरफ़ फिरते हैं {53}
(30) जो अल्लाह तआला ने अपने बन्दों के लिये मुक़र्रर फ़रमाई.

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