42 सूरए शूरा -दूसरा रूकू

42 सूरए शूरा -दूसरा रूकू

وَمَا اخْتَلَفْتُمْ فِيهِ مِن شَيْءٍ فَحُكْمُهُ إِلَى اللَّهِ ۚ ذَٰلِكُمُ اللَّهُ رَبِّي عَلَيْهِ تَوَكَّلْتُ وَإِلَيْهِ أُنِيبُ
فَاطِرُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۚ جَعَلَ لَكُم مِّنْ أَنفُسِكُمْ أَزْوَاجًا وَمِنَ الْأَنْعَامِ أَزْوَاجًا ۖ يَذْرَؤُكُمْ فِيهِ ۚ لَيْسَ كَمِثْلِهِ شَيْءٌ ۖ وَهُوَ السَّمِيعُ الْبَصِيرُ
لَهُ مَقَالِيدُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ ۖ يَبْسُطُ الرِّزْقَ لِمَن يَشَاءُ وَيَقْدِرُ ۚ إِنَّهُ بِكُلِّ شَيْءٍ عَلِيمٌ
۞ شَرَعَ لَكُم مِّنَ الدِّينِ مَا وَصَّىٰ بِهِ نُوحًا وَالَّذِي أَوْحَيْنَا إِلَيْكَ وَمَا وَصَّيْنَا بِهِ إِبْرَاهِيمَ وَمُوسَىٰ وَعِيسَىٰ ۖ أَنْ أَقِيمُوا الدِّينَ وَلَا تَتَفَرَّقُوا فِيهِ ۚ كَبُرَ عَلَى الْمُشْرِكِينَ مَا تَدْعُوهُمْ إِلَيْهِ ۚ اللَّهُ يَجْتَبِي إِلَيْهِ مَن يَشَاءُ وَيَهْدِي إِلَيْهِ مَن يُنِيبُ
وَمَا تَفَرَّقُوا إِلَّا مِن بَعْدِ مَا جَاءَهُمُ الْعِلْمُ بَغْيًا بَيْنَهُمْ ۚ وَلَوْلَا كَلِمَةٌ سَبَقَتْ مِن رَّبِّكَ إِلَىٰ أَجَلٍ مُّسَمًّى لَّقُضِيَ بَيْنَهُمْ ۚ وَإِنَّ الَّذِينَ أُورِثُوا الْكِتَابَ مِن بَعْدِهِمْ لَفِي شَكٍّ مِّنْهُ مُرِيبٍ
فَلِذَٰلِكَ فَادْعُ ۖ وَاسْتَقِمْ كَمَا أُمِرْتَ ۖ وَلَا تَتَّبِعْ أَهْوَاءَهُمْ ۖ وَقُلْ آمَنتُ بِمَا أَنزَلَ اللَّهُ مِن كِتَابٍ ۖ وَأُمِرْتُ لِأَعْدِلَ بَيْنَكُمُ ۖ اللَّهُ رَبُّنَا وَرَبُّكُمْ ۖ لَنَا أَعْمَالُنَا وَلَكُمْ أَعْمَالُكُمْ ۖ لَا حُجَّةَ بَيْنَنَا وَبَيْنَكُمُ ۖ اللَّهُ يَجْمَعُ بَيْنَنَا ۖ وَإِلَيْهِ الْمَصِيرُ
وَالَّذِينَ يُحَاجُّونَ فِي اللَّهِ مِن بَعْدِ مَا اسْتُجِيبَ لَهُ حُجَّتُهُمْ دَاحِضَةٌ عِندَ رَبِّهِمْ وَعَلَيْهِمْ غَضَبٌ وَلَهُمْ عَذَابٌ شَدِيدٌ
اللَّهُ الَّذِي أَنزَلَ الْكِتَابَ بِالْحَقِّ وَالْمِيزَانَ ۗ وَمَا يُدْرِيكَ لَعَلَّ السَّاعَةَ قَرِيبٌ
يَسْتَعْجِلُ بِهَا الَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ بِهَا ۖ وَالَّذِينَ آمَنُوا مُشْفِقُونَ مِنْهَا وَيَعْلَمُونَ أَنَّهَا الْحَقُّ ۗ أَلَا إِنَّ الَّذِينَ يُمَارُونَ فِي السَّاعَةِ لَفِي ضَلَالٍ بَعِيدٍ
اللَّهُ لَطِيفٌ بِعِبَادِهِ يَرْزُقُ مَن يَشَاءُ ۖ وَهُوَ الْقَوِيُّ الْعَزِيزُ

तुम जिस बात में(1)
(1) दीन की बातों में से, काफ़िरों के साथ.

इख़्तिलाफ़ करो तो उसका फ़ैसला अल्लाह के सुपुर्द है (2)
(2) क़यामत के रोज़ तुम्हारे बीच फ़ैसला फ़रमाएगा, तुम उनसे कहो.

यह है अल्लाह मेरा रब मैं ने उसपर भरोसा किया और मैं उसकी तरफ़ रूजू लाता हूँ (3){10}
(3) हर बात हर काम में.

आसमानों और ज़मीन का बनाने वाला, तुम्हारे लिये तुम्हीं में से (4)
(4) यानी तुम्हारी जिन्स में से.

जोड़े बनाए और नर मादा चौपाए, इससे (5)
(5) यानी इस जोड़ी से. (ख़ाज़िन)

तुम्हारी नस्ल फैलाता है, उस जैसा कोई नहीं और वही सुनता देखता है{11} उसी के लिये हैं आसमानों और ज़मीन की कुंजियां(6)
(6) मुराद यह है कि आसमान ज़मीन के सारे ख़जानों की कुंजियाँ चाहे मेंह के ख़ज़ाने हो या रिज़्क़ के.

रोज़ी वसीअ करता है जिस के लिये चाहे और तंग फ़रमाता है(7)
(7) जिसके लिये चाहे. वह मालिक है. रिज़्क़ की कुंजियाँ उसके दस्ते क़ुदरत में हैं.

बेशक वह सब कुछ जानता है {12} तुम्हारे लिये दीन की वह राह डाली जिसका हुक्म उसने नूह को दिया(8)
(8) नूह अलैहिस्सलाम शरीअत वाले नबियों में सबसे पहले नबी हैं.

और जो हमने तुम्हारी तरफ़ वही की(9)
(9) ऐ नबियों के सरदार मुहम्मदे मुस्तफ़ा सल्लल्लाहो अलैका वसल्लम.

और जिसका हुक्म हमने इब्राहीम और मूसा और ईसा को दिया(10)
(10) मानी ये हैं कि हज़रत नूह अलैहिस्सलाम से आप तक ऐ सैयदे अम्बिया जितने नबी हुए सबके लिये हमने दीन की एक ही राह निर्धारित की है जिसमें वो सब सहमत हैं. वह राह यह है.

कि दीन ठीक रखो(11)
(11) दीन से मुराद इस्लाम है. मानी ये हैं कि अल्लाह तौहीद और उसकी फ़रमाँबरदारी और उसपर उसके रसूलों पर और उसकी किताबों पर और बदले के दिन पर और बाक़ी दीन की तमाम ज़रूरतों पर ईमान लाना वाजिब करे, कि ये बातें सारे नबियों की उम्मतों के लिये एक सी ज़रूरी हैं.

और उसमें फूट न डालो(12)
(12) हज़रत अली मु्र्तज़ा रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया कि जमाअत रहमत और फ़ुर्क़त अज़ाब है. ख़ुलासा यह है कि दीन के उसूलों में तमाम मुसलमान चाहे वो किसी एहद या किसी उम्मत के हों, एक बराबर हैं उनमें कोई मतभेद या विरोध नहीं, अलबत्ता आदेशों में उम्मतें अपने हालों और विशेषताओं के ऐतिबार से अलग अलग हैं. चुनांन्चे अल्लाह तआला ने फ़रमाया “लिकुल्लिन जअलना मिनकुम शिरअतौं व मिन्हाजन” यानी हमने सबके लिये एक एक शरीअत और रास्ता रखा. (सूरए माइदह, आयत 48)

मुश्रिकों पर बहुत ही भारी है वह (13)
(13)यानी बुतों को छोड़ना और तौहीद इख़्तियार करना.

जिसकी तरफ़ तुम उन्हें बुलाते हो, और अल्लाह अपने क़रीब के लिये चुन लेता है जिसे चाहे(14)
(14) अपने बन्दों में से उसी को तौफ़ीक़ देता है.

और अपनी तरफ़ राह देता है उसे जो रूजू लाए (15) {13}
(15) और उसकी इताअत क़ुबूल करे.

और उन्होंने फूट न डाली मगर बाद इसके कि उन्हें इल्म आ चुका था(16)
(16) यानी एहले किताब ने अपने नबियों के बाद जो दीन में इख़्तिलाफ़ डाला कि किसी ने तौहीद इख़्तियार की, कोई काफ़िर हो गया. वो इससे पहले जान चुके थे कि इस तरह इख़्तिलाफ़ करना और सम्प्रदायों में बट जाना गुमराही है, फिर भी उन्होंने यह सब कुछ किया.

आपस के हसद से(17)
(17) और रियासत और नाहक़ की हुकूमत के शौक़ में.

और अगर तुम्हारे रब की एक बात न गुज़र चुकी होती (18)
(18) अज़ाब में देरी फ़रमाने की.

एक निश्चित मीआद तक (19)
(19) यानी क़यामत के दिन तक.

तो कब का उनमें फैसला कर दिया होता(20)
(20) काफ़िरों पर, दुनिया में अज़ाब उतार कर.

और बेशक वो जो उनके बाद किताब के वारिस हुए (21)
(21) यानी यहूदी और ईसाई.

वो उससे एक धोखा डालने वाले शक में (22){14}
(22) यानी अपनी किताब पर मज़बूत ईमान नहीं रखते. या ये मानी हैं कि वो क़ुरआन की तरफ़ से या सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की तरफ़ से शक में पड़े हैं.

तो उसी लिये बुलाओ (23)
(23) यानी उन काफ़िरों के इस इख़्तिलाफ़ और बिख़र जाने की वजह से उन्हें तौहीद और मिल्लते हनीफ़िया पर सहमत होने की दावत दी.

और डटे रहो (24)
(24) दीन पर और दीन की दावत देने पर.

जैसा तुम्हें हुक्म हुआ है, और उनकी ख़्वाहिशों पर न चलो, और कहो कि मैं ईमान लाया उसपर जो कोई किताब अल्लाह ने उतारी(25)
(25) यानी अल्लाह तआला की तमाम किताबों पर क्योंकि विरोधी कुछ पर ईमान लाते थे और कुछ से इन्कार करते थे.

और मुझे हुक्म है कि मैं तुम में इन्साफ़ करूं (26)
(26) सारी चीज़ों में, और सारे हालात में, और हर फ़ैसले में.

अल्लाह हमारा तुम्हारा सब का रब है(27)
(27) और हम सब उसके बन्दे.

हमारे लिये हमारा अमल और तुम्हारे लिये तुम्हारा किया(28)
(28) हर एक अपने अमल की जज़ा पाएगा.

कोई हुज्जत नहीं हममें और तुममें (29)
(29) क्योंकि सच्चाई ज़ाहिर हो चुकी.

अल्लाह हम सब को जमा करेगा(30)
(30) क़यामत के दिन.

और उसी की तरफ़ फिरना है {15} और वो जो अल्लाह के बारे में झगड़ते हैं बाद इसके कि मुसलमान उसकी दावत क़ुबूल कर चुके हैं(31)
(31) मुराद उन झगड़ने वालों से यहूदी हैं. वो चाहते थे कि मुसलमानों को फिर कुफ़्र की तरफ़ लौटाएं. इसलिये झगड़ा करते थे और कहते थे कि हमारा दीन पुराना, हमारी किताब पुरानी, नबी पहले, हम तुमसे बेहतर हैं.

उनकी दलील मेहज़ बेसबात है उनके रब के पास और उनपर ग़ज़ब है(32)
(32) उनके कुफ़्र के कारण.

और उनके लिये सख़्त अज़ाब है(33) {16}
(33) आख़िरत में.

अल्लाह है जिसने हक़ के साथ किताब उतारी (34)
(34) यानी क़ुरआने पाक, जो तरह तरह की दलीलों और आदेशों पर आधारित है.

और इन्साफ़ की तराज़ू (35)
(35) यानी उसने अपनी उतारी हुई किताबों में न्याय का निर्देश दिया है. कुछ मुफ़स्सिरों ने कहा है कि मीज़ान से मुराद सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की पवित्र ज़ात है.

और तुम क्या जानो शायद क़यामत क़रीब ही हो(36) {17}
(36) नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने क़यामत का ज़िक्र फ़रमाया तो मुश्रिकों ने झुटलाने के अन्दाज़ में कहा कि क़यामत कब होगी. इसके जवाब में यह आयत उतरी.

इसकी जल्दी मचाते रहे हैं वो जो उस पर ईमान नहीं रखते(37)
(37)बेशुमार एहसान करता है, नेकियों पर भी और बदियों पर भी, यहाँ तक कि बन्दे गुनाहों में मश्ग़ूल रहते हैं और वह उन्हें भूख़ से हलाक नहीं करता.

और जिन्हें उसपर ईमान है वो उसे से डर रहे हैं और जानते हैं कि बेशक वह हक़ है, सुनते हो बेशक जो क़यामत में शक करते हैं ज़रूर दूर की गुमराही में हैं {18} अल्लाह अपने बन्दों पर लुत्फ़ (कृपा) फ़रमाता है (38)
(38) और ऐश की फ़राख़ी अता फ़रमाता है, मूमिन को भी और काफ़िर को भी, अपनी हिकमत के तकाज़े के मुताबिक़. हदीस शरीफ़ में है अल्लाह तआला फ़रमाता है मेरे कुछ बन्दे ऐसे हैं कि तवनगरी उनकी क़ुव्वत और ईमान का कारण है, अगर मैं उन्हें फ़कीर मोहताज़ कर दूं तो उनके अक़ीदे फ़ासिद हो जाएं और कुछ बन्दे ऐसे हैं कि तंगी और मोहताजी उनके ईमान की क़ुव्वत का कारण हैं, अगर मैं उन्हें ग़नी मालदार कर दूं तो उनके अक़ीदे ख़राब हो जाएं.
जिसे चाहे रोज़ी देता है (39)और वही क़ुव्वत व इज़्ज़त वाला है {19}

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