42 सूरए शूरा -तीसरा रूकू

42 सूरए शूरा -तीसरा रूकू

مَن كَانَ يُرِيدُ حَرْثَ الْآخِرَةِ نَزِدْ لَهُ فِي حَرْثِهِ ۖ وَمَن كَانَ يُرِيدُ حَرْثَ الدُّنْيَا نُؤْتِهِ مِنْهَا وَمَا لَهُ فِي الْآخِرَةِ مِن نَّصِيبٍ
أَمْ لَهُمْ شُرَكَاءُ شَرَعُوا لَهُم مِّنَ الدِّينِ مَا لَمْ يَأْذَن بِهِ اللَّهُ ۚ وَلَوْلَا كَلِمَةُ الْفَصْلِ لَقُضِيَ بَيْنَهُمْ ۗ وَإِنَّ الظَّالِمِينَ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
تَرَى الظَّالِمِينَ مُشْفِقِينَ مِمَّا كَسَبُوا وَهُوَ وَاقِعٌ بِهِمْ ۗ وَالَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ فِي رَوْضَاتِ الْجَنَّاتِ ۖ لَهُم مَّا يَشَاءُونَ عِندَ رَبِّهِمْ ۚ ذَٰلِكَ هُوَ الْفَضْلُ الْكَبِيرُ
ذَٰلِكَ الَّذِي يُبَشِّرُ اللَّهُ عِبَادَهُ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ ۗ قُل لَّا أَسْأَلُكُمْ عَلَيْهِ أَجْرًا إِلَّا الْمَوَدَّةَ فِي الْقُرْبَىٰ ۗ وَمَن يَقْتَرِفْ حَسَنَةً نَّزِدْ لَهُ فِيهَا حُسْنًا ۚ إِنَّ اللَّهَ غَفُورٌ شَكُورٌ
أَمْ يَقُولُونَ افْتَرَىٰ عَلَى اللَّهِ كَذِبًا ۖ فَإِن يَشَإِ اللَّهُ يَخْتِمْ عَلَىٰ قَلْبِكَ ۗ وَيَمْحُ اللَّهُ الْبَاطِلَ وَيُحِقُّ الْحَقَّ بِكَلِمَاتِهِ ۚ إِنَّهُ عَلِيمٌ بِذَاتِ الصُّدُورِ
وَهُوَ الَّذِي يَقْبَلُ التَّوْبَةَ عَنْ عِبَادِهِ وَيَعْفُو عَنِ السَّيِّئَاتِ وَيَعْلَمُ مَا تَفْعَلُونَ
وَيَسْتَجِيبُ الَّذِينَ آمَنُوا وَعَمِلُوا الصَّالِحَاتِ وَيَزِيدُهُم مِّن فَضْلِهِ ۚ وَالْكَافِرُونَ لَهُمْ عَذَابٌ شَدِيدٌ
۞ وَلَوْ بَسَطَ اللَّهُ الرِّزْقَ لِعِبَادِهِ لَبَغَوْا فِي الْأَرْضِ وَلَٰكِن يُنَزِّلُ بِقَدَرٍ مَّا يَشَاءُ ۚ إِنَّهُ بِعِبَادِهِ خَبِيرٌ بَصِيرٌ
وَهُوَ الَّذِي يُنَزِّلُ الْغَيْثَ مِن بَعْدِ مَا قَنَطُوا وَيَنشُرُ رَحْمَتَهُ ۚ وَهُوَ الْوَلِيُّ الْحَمِيدُ
وَمِنْ آيَاتِهِ خَلْقُ السَّمَاوَاتِ وَالْأَرْضِ وَمَا بَثَّ فِيهِمَا مِن دَابَّةٍ ۚ وَهُوَ عَلَىٰ جَمْعِهِمْ إِذَا يَشَاءُ قَدِيرٌ

जो आख़िरत की खेती चाहे(1)
(1) यानी जिसको अपने कर्मों से आख़िरत का नफ़ा चाहिये.

हम उसके लिये उसकी खेती बढ़ाएं(2)
(2) उसको नेकियों की तौफ़ीक़ देकर और उनके लिये ख़ैरात और ताअतों की राहें सरल करके और उसकी नेकियों का सवाब बढाकर.

और जो दुनिया की खेती चाहे(3)
(3) यानी जिसका अमल केवल दुनिया हासिल करने के लिये हो और वह आख़िरत पर ईमान न रखता हो. (मदारिक)

हम उसे उसमें से कुछ देंगे(4)
(4) यानी दुनिया में जितना उसके लिये मुक़द्दर किया है.

और आख़िरत में उसका कुछ हिस्सा नहीं (5){20}
(5) क्योंकि उसने आख़िरत के लिये अमल किया ही नहीं.

या उनके लिये कुछ शरीक हैं(6)
(6) मानी ये हैं कि क्या मक्के के काफ़िर उस दिन को क़ुबूल करते हैं जो अल्लाह तआला ने उनके लिये मुक़र्रर फ़रमाया या उनके कुछ ऐसे साथी हैं शैतान वग़ैरह.

जिन्हों ने उनके लिये(7)
(7) कुफ़्री दीनों में से.

वह दीन निकाल दिया है(8)
(8) जो शिर्क और दोबारा उठाए जाने के इनकार पर आधारित है.

कि अल्लाह ने उसकी इजाज़त न दी(9)
(9) यानी वह अल्लाह के दीन के ख़िलाफ़ है.

और अगर एक फ़ैसले का वादा न होता(10)
(10) और जज़ा के लिये क़यामत का दिन निश्चित न फ़रमा दिया गया होता.

तो यहीं उनमें फ़ैसला कर दिया जाता(11)
(11) और दुनिया ही में झुटलाने वालों को अज़ाब में जकड़ दिया जाता.

और बेशक ज़ालिमों के लिये दर्दनाक अज़ाब है(12) {21}
(12) आख़िरत में, और ज़ालिमों से मुराद यहाँ काफ़िर हैं.

तुम ज़ालिमों को देखोगे कि अपनी कमाइयों से सहमे हुए होंगे(13)
(13) यानी कुफ़्र और बुरे कर्मों से जो उन्होंने दुनिया में कमाए थे, इस अन्देशे से कि अब उनकी सज़ा मिलने वाली है.

और वो उनपर पड़ कर रहेगी(14)
(14) ज़रूर उनसे किसी तरह बच नहीं सकते. डरें या न डरें.

और जो ईमान लाए और अच्छे काम किये वो जन्नत की फुलवारियों में हैं, उनके लिये उनके रब के पास है जो चाहें यही बड़ा फ़ज़्ल है {22} यह है वह जिसकी ख़ुशख़बरी देता है अल्लाह अपने बन्दों को जो ईमान लाए और अच्छे काम किये, तुम फ़रमाओ मैं इस (15)
(15) रिसालत की तबलीग़ और हिदायत व उपदेश.

पर तुम से कुछ उजरत नहीं मांगता(16)
(16) और सारे नबियों का यही तरीक़ा है. हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा से रिवायत है कि जब नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम मदीनए तैय्यिबह तशरीफ़ फ़रमा हुए और अन्सार ने देखा कि हुज़ूर अलैहिस्सलातो वस्सलाम के ज़िम्मे ख़र्चे बहुत हैं और माल कुछ भी नहीं है तो उन्होने आपस में सलाह की और हुज़ूर के अधिकार और एहसान याद करके हुज़ूर की ख़िदमत में पेश करने के लिये बहुत सा माल जमा किया और उसको लेकर ख़िदमते अक़दस में हाज़िर हुए और अर्ज़ किया कि हुज़ूर की बदौलत हमें हिदायत हुई, हम ने गुमराही से निजात पाई. हम देखते हैं कि हुज़ूर के ख़र्चे बहुत ज़्यादा हैं इसलिये हम ये माल सरकार की ख़िदमत में भेंट के लिये लाए हैं, क़ुबूल फ़रमाकर हमारी इज़्ज़त बढ़ाई जाए. इस पर यह आयत उतरी और हुज़ूर ने वो माल वापस फ़रमा दिये.

मगर क़राबत की महब्बत, (17)
(17) तुम पर लाज़िम है, क्योंकि मुसलामनों के बीच भाईचारा, प्रेम वाजिब है जैसा कि अल्लाह तआला ने फ़रमाया “अल मूमिनूना वलमूमिनातो बअदुहुम औलियाओ बअदिन” यानी और मुसलमान मर्द और मुसलमान औरतें एक दूसरे के रफ़ीक़ हैं. (सूरए तौबह, आयत 71) और हदीस शरीफ़ में है कि मुसलमान एक इमारत की तरह है जिसका हर एक हिस्सा दूसरे हिस्से को क़ुव्वत और मदद पहुंचाता है. जब मुसलमानों में आपस में एक दूसरे के साथ महब्बत वाजिब हुई तो सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम के साथ किस क़द्र महब्बत फ़र्ज़ होगी. मानी ये हैं कि मैं हिदायत और उपदेश पर कुछ वेतन नहीं चाहता लेकिन रिश्तेदारी के हक़ तो तुम पर वाजिब हैं, उनका लिहाज़ करो और मेरे रिश्तेदार तुम्हारे भी रिश्तेदार है, उन्हें तकलीफ़ न दो. हज़रत सईद बिन जुबैर से रिवायत है कि रिश्तेदारो से मुराद हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की आले पाक है. (बुख़ारी) रिश्तेदारों से कौन कौन मुराद हैं इसमें कई क़ौल हैं. एक तो यह कि मुराद इससे हज़रत अली व हज़रत फ़ातिमा व हज़रत इमामे हसन और हज़रत इमामे हुसैन रदियल्लाहो अन्हुम हैं. एक क़ौल यह है कि आले अली, और आले अक़ील व आले जअफ़र व आले अब्बास मुराद हैं. और एक क़ौल यह है कि हुज़ूर के वो रिश्तेदार मुराद हैं जिन पर सदक़ा हराम है और वो बनी हाशिम और बनी मुत्तिलब हैं. हुज़ूर की पाक पवित्र बीबियाँ हुज़ूर के एहले बैत में दाख़िल हैं. हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की महब्बत और हुज़ूर के रिश्तेदारों की महब्बत दीन के फ़र्ज़ों में से है. (जुमल व ख़ाज़िन वग़ैरह)

और जो नेक काम करे (18)
(18) यहाँ नेक काम से मुराद या रसूले करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की आले पाक से महब्बत है, या तमाम नेक काम.

हम उसके लिये उसमें और ख़ूबी बढ़ाएं, बेशक अल्लाह बख़्शने वाला क़द्र फ़रमाने वाला है{23} या (19)
(19) सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम की निस्बत, मक्के के काफ़िर.

ये कहते हैं कि उन्होंने अल्लाह पर झूट बांध लिया(20)
(20) नबुव्वत का दावा करके, या क़ुरआने करीम को अल्लाह की किताब बताकर.

और अल्लाह चाहे तो तुम्हारे दिल पर अपनी रहमत व हिफ़ाज़त की मोहर फ़रमा दे(21)
(21) कि आपको उनके बुरा भला कहने से तकलीफ़ न हो.

और मिटाता है बातिल को(22)
(22) जो काफ़िर कहते हैं.

और हक़ को साबित फ़रमाता है अपनी बातों से (23)
(23) जो अपने नबी सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम पर उतारीं, चुनांन्वे ऐसा ही किया कि उनके बातिल को मिटाया और इस्लाम के कलिमे को ग़ालिब किया.

बेशक वह दिलों की बातें जानता है {24} और वही है जो अपने बन्दों की तौबह क़ुबूल फ़रमाता है और गुनाहों से दरगुज़र (क्षमा) फ़रमाता है(24)
(24) तोबह हर एक गुनाह से वाजिब है और तौबह की हक़ीक़त यह है कि आदमी बुराई और गुनाह से बाज़ आए और जो गुनाह उससे हो उस पर शर्मिन्दा हो और हमेशा गुनाह से दूर रहने का पक्का निश्चय करे और अगर गुनाह में किसी बन्दे का हक़ मारा गया था तो उसकी बहाली की कोशिश करे.

और जानता है जो कुछ तुम करते हो{25} और दुआ क़ुबूल फ़रमाता है उनकी जो ईमान लाए और अच्छे काम किये और उन्हें अपने फ़ज़्ल से और इनआम देता है (25)
(25) यानी जितना दुआ मांगने वाले ने तलब किया था उससे ज़्यादा अता फ़रमाता है.

और काफ़िरों के लिये सख़्त अज़ाब है {26} और अगर अल्लाह अपने सब बन्दों का रिज़्क़ वसीअ कर देता तो ज़रूर ज़मीन में फ़साद फैलाते(26)
(26) घमण्ड में गिरफ़तार है.

लेकिन वह अन्दाज़े से उतारता है जितना चाहे, बेशक वह अपने बन्दों से ख़बरदार है(27){27}
(27) जिसके लिये जितना उसकी हिकमत का तक़ाज़ा है, उसको उतना अता फ़रमाता है.

उन्हें देखता है और वही है कि मेंह उतारता है उनके नाउम्मीद होने पर और अपनी रहमत फैलाता है(28)
(28) और मेंह (वर्षा) से नफ़ा देता है. और क़हत को दफ़ा फ़रमाता है.

और वही काम बनाने वाला सब ख़ूबियों सराहा {28} और उसकी निशानियों से है आसमानों और ज़मीन की पैदायश और जो चलने वाले उनमें फैलाए, और वह उनके इकट्ठा करने पर (29) जब चाहे क़ादिर है {29}
(29) हश्र के लिये

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