42 सूरए शूरा -चौथा रूकू

42 सूरए शूरा -चौथा रूकू

وَمَا أَصَابَكُم مِّن مُّصِيبَةٍ فَبِمَا كَسَبَتْ أَيْدِيكُمْ وَيَعْفُو عَن كَثِيرٍ
وَمَا أَنتُم بِمُعْجِزِينَ فِي الْأَرْضِ ۖ وَمَا لَكُم مِّن دُونِ اللَّهِ مِن وَلِيٍّ وَلَا نَصِيرٍ
وَمِنْ آيَاتِهِ الْجَوَارِ فِي الْبَحْرِ كَالْأَعْلَامِ
إِن يَشَأْ يُسْكِنِ الرِّيحَ فَيَظْلَلْنَ رَوَاكِدَ عَلَىٰ ظَهْرِهِ ۚ إِنَّ فِي ذَٰلِكَ لَآيَاتٍ لِّكُلِّ صَبَّارٍ شَكُورٍ
أَوْ يُوبِقْهُنَّ بِمَا كَسَبُوا وَيَعْفُ عَن كَثِيرٍ
وَيَعْلَمَ الَّذِينَ يُجَادِلُونَ فِي آيَاتِنَا مَا لَهُم مِّن مَّحِيصٍ
فَمَا أُوتِيتُم مِّن شَيْءٍ فَمَتَاعُ الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۖ وَمَا عِندَ اللَّهِ خَيْرٌ وَأَبْقَىٰ لِلَّذِينَ آمَنُوا وَعَلَىٰ رَبِّهِمْ يَتَوَكَّلُونَ
وَالَّذِينَ يَجْتَنِبُونَ كَبَائِرَ الْإِثْمِ وَالْفَوَاحِشَ وَإِذَا مَا غَضِبُوا هُمْ يَغْفِرُونَ
وَالَّذِينَ اسْتَجَابُوا لِرَبِّهِمْ وَأَقَامُوا الصَّلَاةَ وَأَمْرُهُمْ شُورَىٰ بَيْنَهُمْ وَمِمَّا رَزَقْنَاهُمْ يُنفِقُونَ
وَالَّذِينَ إِذَا أَصَابَهُمُ الْبَغْيُ هُمْ يَنتَصِرُونَ
وَجَزَاءُ سَيِّئَةٍ سَيِّئَةٌ مِّثْلُهَا ۖ فَمَنْ عَفَا وَأَصْلَحَ فَأَجْرُهُ عَلَى اللَّهِ ۚ إِنَّهُ لَا يُحِبُّ الظَّالِمِينَ
وَلَمَنِ انتَصَرَ بَعْدَ ظُلْمِهِ فَأُولَٰئِكَ مَا عَلَيْهِم مِّن سَبِيلٍ
إِنَّمَا السَّبِيلُ عَلَى الَّذِينَ يَظْلِمُونَ النَّاسَ وَيَبْغُونَ فِي الْأَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّ ۚ أُولَٰئِكَ لَهُمْ عَذَابٌ أَلِيمٌ
وَلَمَن صَبَرَ وَغَفَرَ إِنَّ ذَٰلِكَ لَمِنْ عَزْمِ الْأُمُورِ

और तुम्हें जो मुसीबत पहुंची वह इसके कारण से है जो तुम्हारे हाथों ने कमाया(1)
(1) यह ख़िताब आक़िल बालिग़ मूमिनों से हैं जिनसे गुनाह सरज़द होते हैं. मुराद यह है कि दुनिया में जो तकलीफ़ें और मुसीबतें ईमान वालों को पहुंचती हैं, अक्सर उनका कारण उनके गुनाह होते हैं. उन तकलीफ़ों को अल्लाह तआला उनके गुनाहों का कफ़्फ़ारा कर देता है और कभी ईमान वाले की तकलीफ़ उसके दर्जों की बलन्दी के लिये होती है. जैसा कि बुख़ारी और मुस्लिम की हदीस में आया है. नबी जो गुनाहों से पाक होते हैं और छोटे बच्चे जो नासमझ होते हैं इस आयत के घेरे में नहीं आते. कुछ गुमराह फ़िर्के जो आवागवन को मानते हैं इस आयत से साबित करने की कोशिश करते हैं कि छोटे बच्चों को जो तकलीफ़ पहुंचती है इस आयत से साबित होता है कि वह उनके गुनाहों का नतीजा हो और अभी तक उनसे कोई गुनाह हुआ नहीं तो लाज़िम आया कि इस ज़िन्दगी से पहले कोई और ज़िन्दगी हो जिसमें गुनाह हों. यह बात बातिल है क्योंकि यह कलाम बच्चों से कहा ही नहीं गया है. जैसा आम तौर पर सारा संबोधन आक़िल बालिग़ से होता है. इसलिये आवागवन वालों की दलील झूठी हु्ई.

और बहुत कुछ तो माफ़ फ़रमा देता है {30} और तुम ज़मीन में क़ाबू से नहीं निकल सकते(2)
(2) जो मुसीबतें तुम्हारे लिये लिखी जा चुकी हैं उनसे कहीं भाग नहीं सकते. बच नहीं सकते.

और न अल्लाह के मुक़ाबले तुम्हारा कोई दोस्त न मददगार (3) {31}
(3) कि उसकी मर्ज़ी के विरूद्ध तुम्हें मुसीबत और तकलीफ़ से बचा सके.

और उसकी निशानियों से हैं (4)
(4) बड़ी बड़ी किश्तियाँ.

दरिया में चलने वालियां जैसे पहाड़ियां {32} वह चाहे तो हवा थमा दे (5)
(5) जो किश्तियों को चलाती है.

कि उसकी पीठ पर(6)
(6) यानी दरिया के ऊपर.

ठहरी रह जाएं (7)
(7) चलने न पाएं.

बेशक इसमें ज़रूर निशानियां हैं हर बड़े सब्र करने शुक्र करने वाले को(8){33}
(8) सब्र और शुक्र वालों से मुराद सच्चा ईमान वाला है जो सख़्ती और तकलीफ़ में सब्र करता है और राहत व ख़ुशहाली में शुक्र.

या उन्हें तबाह कर दे(9)
(9) यानी किश्तियों को डुबा दे.

लोगों के गुनाहों के कारण(10)
(10) जो उसमें सवार हैं.

और बहुत कुछ माफ़ फ़रमा दे(11) {34}
(11) गुनाहों में से कि उनपर अज़ाब न करे.

और जान जाएं वो जो हमारी आयतों में झगड़ते हैं कि उन्हें (12)
(12) हमारे अज़ाब से.

कहीं भागने की जगह नहीं  {35} तुम्हें जो कुछ मिला है (13)
(13) दुनियावी माल असबाब.

वह जीती दुनिया में बरतने का है (14)
(14) सिर्फ़ कुछ रोज़, उसको हमेशगी नहीं.

और वह जो अल्लाह के पास है(15)
(15) यानी सवाब देने वाला.

बेहतर है और ज़्यादा बाक़ी रहने वाला उनके लिये जो ईमान लाए और अपने रब पर भरोसा करते हैं(16) {36}
(16) यह आयत हज़रत अबू बक्र सिद्दीक़ रदियल्लाहो अन्हो के हक़ में उतरी जब आपने कुल माल सदक़ा कर दिया और उसपर अरब के लोगों ने आपको बुरा भला कहा.

और वो जो बड़े बड़े गुनाहों और बेहयाइयों से बचते हैं और जब ग़ुस्सा आए माफ़ कर देते हैं {37} और वो जिन्होंने अपने रब का हुक्म माना (17)
(17) यह आयत अन्सार के हक़ में उतरी जिन्होंने अपने रब की दावत क़ुबूल करके ईमान और फ़रमाँबरदारी को अपनाया.

और नमाज़ क़ायम रखी (18)
(18) उसपर डटे रहे.

और उनका काम उनके आपस की सलाह से है (19)
(19) वो जल्दी और अहंकार में फ़ैसले नहीं करते. हज़रत हसन रदियल्लाहो अन्हो ने फ़रमाया. जो क़ौम मशवरा करती है वह सही राह पर पहुचंती है.

और हमारे दिये से कुछ हमारी राह में ख़र्च करते हैं {38} और वो कि जब उन्हें बग़ावत पंहुचे बदला लेते हैं(20){39}
(20) यानी जब उनपर कोई ज़ुल्म करे तो इन्साफ़ से बदला लेते हैं और बदले में हद से आगे नहीं बढ़ते. इब्ने ज़ैद का क़ौल है कि मूमिन दो तरह के हैं, एक जो ज़ुल्म को माफ़ करते हैं. पहली आयत में उनका ज़ि क्र फ़रमाया गया. दूसरे वो जो ज़ालिम से बदला लेते हैं. उनका इस आयत में ज़ि क्र है. अता ने कहा कि ये वो मूमिनीन हैं जिन्हें काफ़िरों ने मक्कए मुकर्रमा से नि काला और उनपर ज़ुल्म किया. फिर अल्लाह तआला ने उन्हें उस सरज़मीन पर क़ब्ज़ा दिया और उन्हों ने ज़ालिमों से बदला लिया.

और बुराई का बदला उसी की बराबर बुराई है(21)
(21) मानी ये हैं कि बदला बराबर का होना चाहिये उसमें ज़ियादती या अन्याय  न हो. और बदले को बुराई कहना मजाज़ है कि देखने में एक सो होने के कारण कहा जाता है और जिसको वह बदला दिया जाए उसे बुरा मालूम होता है और बदले को बुराई के साथ ताबीर करने में यह भी इशारा है कि अगरचे बदला लेना जायज़ है लेकिन माफ़ कर देना उससे बेहतर है.

तो जिसने माफ़ किया और काम संवारा तो उसका अज्र अल्लाह पर है, बेशक वह दोस्त नहीं रखता ज़ालिमों को (22){40}
(22) हज़रत इब्ने अब्बास रदियल्लाहो अन्हुमा ने फ़रमाया कि ज़ालिमों से वो मुराद हैं जो ज़ुल्म की शुरूआत करे.

और बेशक जिसने अपनी मज़लूमी पर बदला लिया उनपर कुछ मुअख़िज़े की राह नहीं{41} मुआख़िज़ा तो उन्हीं पर है जो (23)
(23) शुरू में.

लोगों पर ज़ुल्म करते हैं और ज़मीन में नाहक़ सरकशी फैलाते हैं(24)
(24) घमण्ड और गुनाहों का शि कार होकर.

उनके लिये दर्दनाक अज़ाब है {42} और बेशक जिसने सब्र किया  (25)
(25) ज़ुल्म और तकलीफ़ पर, और बदला न लिया.
और बख़्श दिया तो वह ज़रूर हिम्मत के काम हैं {43}

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