41 सूरए हामीम सज्दा-पांचवाँ रूकू

41 सूरए हामीम सज्दा-पांचवाँ रूकू

وَمَنْ أَحْسَنُ قَوْلًا مِّمَّن دَعَا إِلَى اللَّهِ وَعَمِلَ صَالِحًا وَقَالَ إِنَّنِي مِنَ الْمُسْلِمِينَ
وَلَا تَسْتَوِي الْحَسَنَةُ وَلَا السَّيِّئَةُ ۚ ادْفَعْ بِالَّتِي هِيَ أَحْسَنُ فَإِذَا الَّذِي بَيْنَكَ وَبَيْنَهُ عَدَاوَةٌ كَأَنَّهُ وَلِيٌّ حَمِيمٌ
وَمَا يُلَقَّاهَا إِلَّا الَّذِينَ صَبَرُوا وَمَا يُلَقَّاهَا إِلَّا ذُو حَظٍّ عَظِيمٍ
وَإِمَّا يَنزَغَنَّكَ مِنَ الشَّيْطَانِ نَزْغٌ فَاسْتَعِذْ بِاللَّهِ ۖ إِنَّهُ هُوَ السَّمِيعُ الْعَلِيمُ
وَمِنْ آيَاتِهِ اللَّيْلُ وَالنَّهَارُ وَالشَّمْسُ وَالْقَمَرُ ۚ لَا تَسْجُدُوا لِلشَّمْسِ وَلَا لِلْقَمَرِ وَاسْجُدُوا لِلَّهِ الَّذِي خَلَقَهُنَّ إِن كُنتُمْ إِيَّاهُ تَعْبُدُونَ
فَإِنِ اسْتَكْبَرُوا فَالَّذِينَ عِندَ رَبِّكَ يُسَبِّحُونَ لَهُ بِاللَّيْلِ وَالنَّهَارِ وَهُمْ لَا يَسْأَمُونَ ۩
وَمِنْ آيَاتِهِ أَنَّكَ تَرَى الْأَرْضَ خَاشِعَةً فَإِذَا أَنزَلْنَا عَلَيْهَا الْمَاءَ اهْتَزَّتْ وَرَبَتْ ۚ إِنَّ الَّذِي أَحْيَاهَا لَمُحْيِي الْمَوْتَىٰ ۚ إِنَّهُ عَلَىٰ كُلِّ شَيْءٍ قَدِيرٌ
إِنَّ الَّذِينَ يُلْحِدُونَ فِي آيَاتِنَا لَا يَخْفَوْنَ عَلَيْنَا ۗ أَفَمَن يُلْقَىٰ فِي النَّارِ خَيْرٌ أَم مَّن يَأْتِي آمِنًا يَوْمَ الْقِيَامَةِ ۚ اعْمَلُوا مَا شِئْتُمْ ۖ إِنَّهُ بِمَا تَعْمَلُونَ بَصِيرٌ
إِنَّ الَّذِينَ كَفَرُوا بِالذِّكْرِ لَمَّا جَاءَهُمْ ۖ وَإِنَّهُ لَكِتَابٌ عَزِيزٌ
لَّا يَأْتِيهِ الْبَاطِلُ مِن بَيْنِ يَدَيْهِ وَلَا مِنْ خَلْفِهِ ۖ تَنزِيلٌ مِّنْ حَكِيمٍ حَمِيدٍ
مَّا يُقَالُ لَكَ إِلَّا مَا قَدْ قِيلَ لِلرُّسُلِ مِن قَبْلِكَ ۚ إِنَّ رَبَّكَ لَذُو مَغْفِرَةٍ وَذُو عِقَابٍ أَلِيمٍ
وَلَوْ جَعَلْنَاهُ قُرْآنًا أَعْجَمِيًّا لَّقَالُوا لَوْلَا فُصِّلَتْ آيَاتُهُ ۖ أَأَعْجَمِيٌّ وَعَرَبِيٌّ ۗ قُلْ هُوَ لِلَّذِينَ آمَنُوا هُدًى وَشِفَاءٌ ۖ وَالَّذِينَ لَا يُؤْمِنُونَ فِي آذَانِهِمْ وَقْرٌ وَهُوَ عَلَيْهِمْ عَمًى ۚ أُولَٰئِكَ يُنَادَوْنَ مِن مَّكَانٍ بَعِيدٍ

और उससे ज़्यादा किसकी बात अच्छी जो अल्लाह की तरफ़ बुलाए(1)
(1) उसकी तौहीद और इबादत की तरफ़. कहा गया हे कि इस दावत देने वाले से मुराद हुज़ूर सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम हैं और यह भी कहा गया है कि वह मूमिन मुराद है जिसने नबी अलैहिस्सलातो वसल्लाम की दावत को क़ुबूल किया और दूसरों को नेकी की दावत दी.

और नेकी करे(2)
(2) हज़रत आयशा रदियल्लाहो अन्हा ने फ़रमाया, मेरे नज़्दीक़ यह आयत मुअज़्ज़िनों के हक़ में उतरी और एक क़ौल यह भी है कि जो कोई किसी तरीक़े पर भी अल्लाह तआला की तरफ़ दावत दे, वह इसमें दाख़िल हैं अल्लाह तआला की तरफ़ दावत के कई दर्जे हैं. अव्वल नबियों की दावत, चमत्कारों और हुज्जतों और दलीलों और तलवार के साथ. यह दर्जा नबियों के साथ ख़ास है. दूसरी दावत उलमा की, फ़क़त हुज्जतों और प्रमाणों के साथ. और उलमा कई तरह के हैं एक आलिम बिल्लाह, दूसरे आलिम बिसिफ़ातिल्लाह, तीसरे आलिम बिअहकामिल्लाह. तीसरा दर्जा मुजाहिदीन की दावत का है, यह काफ़िरों को तलवार के साथ होती है. यहाँ तक कि वो दीन में दाख़िल हों और ताअत क़ुबूल कर लें. चौथा दर्जा मुअज़्ज़िनों की दावत नमाज़ के लिये. नेक कर्मों की दो क़िस्म है एक वह जो दिल से हो, वह मअरिफ़ते इलाही है. दूसरे जो शरीर से हो, वो तमाम ताअतें हैं.

और कहे मैं मुसलमान हूँ (3) {33}
(3) और यह फ़क़त क़ौल न हो बल्कि इस्लाम को दिल से मान कर कहे कि सच्चा कहना यही है.

और नेकी और बदी बराबर न हो जाएंगी ऐ सुनने वाले, बुराई को भलाई से टाल (4)
(4) मिसाल के तौर पर ग़ुस्से को सब्र से और जिहालत को हिल्म से और दुर्व्यवहार को माफ़ी से, कि अगर तेरे साथ कोई बुराई करे तो तू माफ़ कर.

जभी वह कि तुझ में और उसमें दुश्मनी थी ऐसा हो जाएगा जैसा कि गहरा दोस्त (5){34}
(5) यानी इस ख़सलत का नतीजा यह होगा कि दुश्मन दोस्तों की तरह महब्बत करने लगेंगे. कहा गया है कि यह आयत अबू सुफ़ियान के हक़ में उतरी कि उनकी दुश्मनी की सख़्ती के बावुजूद नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने उनके साथ नेक व्यवहार किया. उनकी साहिबज़ादी को अपने निकाह में लिया. इसका नतीजा यह हुआ कि वह महब्बत में सच्चे और जाँ निसार हो गए.

और यह दौलत (6)
(6) यानी बदियों को नेकियों से दफ़ा करने की ख़सलत.

नहीं मिलती मगर साबिरों को, और इसे नहीं पाता मगर बड़े नसीब वाला {35} और अगर तुझे शैतान का कोई कौंचा (तकलीफ़) पहुंचे(7)
(7) यानी शैतान तुझ को बुराइयों पर उभारे और इस नेक ख़सलत से और इसके अलावा और नेकियों से फेर दे.

तो अल्लाह की पनाह मांग(8)
(8) उसके शर से और अपनी नेकियों पर क़ायम रह, शैतान की राह न इख़्तियार कर, अल्लाह तआला तेरी मदद फ़रमाएगा.

बेशक वही सुनता जानता है {36} और उसकी निशानियाँ में से हैं रात और दिन और सूरज और चांद (9)
(9) जो उसकी क़ुदरत और हिकमत और उसके रब होने और एक होने को प्रमाणित करते हैं.

सज्दा न करो सूरज को और न चांद को(10)
(10)  क्योंकि वो मख़लूक़ हैं और ख़ालिक़ के हुक्म के तहत हैं  और जो ऐसा हो वह इबादत का मुस्तहिक़ नहीं हो सकता.

और अल्लाह को सज्दा करो जिसने उन्हें पैदा किया(11)
(11) वही सज्दा और इबादत का मुस्तहिक़ है.

अगर तुम उसके बन्दे हो {37} तो अगर ये घमण्ड करें (12)
(12) सिर्फ़ अल्लाह को सज्दा करने से.

तो वो जो तुम्हारे रब के पास हैं(13)
(13) फ़रिश्ते वो.

रात दिन उसकी पाकी बोलते हैं और उकताते नहीं {38} और उसकी निशानियों से हैं कि तू ज़मीन को देखे बेक़द्र पड़ी (14)
(14) सूखी कि उसमें सब्ज़े का नामों निशान नहीं.

फिर जब हमने उसपर पानी उतारा (15)
(15)बारिश उतारी.

तरो ताज़ा हुई और बढ़ चली, बेशक जिसने उसे जिलाया ज़रूर मुर्दे जिलाएगा, बेशक वह सब कुछ कर सकता है {39} बेशक वों जो हमारी आयतों में टेढ़े चलते हैं (16)
(16)और आयतों की व्याख्या में सेहत व इस्तिक़ामत से मुंह फेरते हैं.

हम से छुपे नहीं, (17)
(17)हम उन्हें इसकी सज़ा देंगे.

तो क्या आग में डाला जाएगा  (18)
(18) यानी काफ़िर, अल्लाह को न मानने वाले.

वह भला या जो क़यामत में अमान से आएगा  (19)
(19)सच्चे अक़ीदे और ईमान वाला, बेशक वही बेहतर है.

जो जी में आए करो बेशक वह तुम्हारे काम देख रहा है {40} बेशक जो ज़िक्र से मुन्किर हुए(20)
(20) यानी क़ुरआने करीम से और उन्हों ने उसमें बुराइयाँ निकालीं.

जब वह उनके पास आया उनकी ख़राबी का कुछ हाल न पूछ और बेशक यह इज़्ज़त वाली किताब है(21){41}
(21) बेमिसाल और अद्वितीय, जिसकी एक सूरत की तरह बनाने से सारी सृष्टि लाचार है.

बातिल को उसकी तरफ़ राह नहीं न उसके आगे से न उसके पीछे से(22)
(22) यानी किसी तरह और किसी तरीक़े से भी बातिल उस तक राह नहीं पा सकता. वह परिवर्तन और कमी बेशी से मेहफ़ूज़ है. शैतान उसमें बढ़ाने घटाने की क़ुदरत नहीं रखता.

उतारा हुआ है हिकमत (बोध) वाले सब ख़ूबियों सराहे का {42} तुम से न फ़रमाया जाएगा (23)
(23) अल्लाह तआला की तरफ़ से.

मगर वही जो तुम से अगले रसूलों को फ़रमाया गया, कि बेशक तुम्हारा रब बख़्शिश वाला(24)
(24) अपने नबियों के लिये और उन पर ईमान लाने वालों के लिये.

और दर्दनाक अज़ाब वाला है(25) {43}
(25) नबियों के दुश्मनों और झुटलाने वालों के लिये.

और अगर हम इसे अजमी ज़बान का क़ुरआन करते (26)
(26) जैसा कि काफ़िर ऐतिराज़ के तौर पर कहते हैं कि यह क़ुरआन अजमी ज़बान में क्यों न उतरा.

तो ज़रूर कहते कि इसकी आयतें क्यों न खोली गई(27)
(27) और अरबी ज़बान में बयान न की गई कि हम समझ सकते.

क्या किताब अजमी और नबी अरबी(28)
(28) यानी किताब नबी की ज़बान के ख़िलाफ़ क्यों उतरी. हासिल यह है कि क़ुरआने पाक अजमी ज़बान में होता तो ऐतिराज़ करते, अरबी में आया तो ऐतिराज़ करने लगे. बात यह है कि बुरी ख़सलत वाले के लिये हज़ार बहाने. ऐसे ऐतिराज़ सच्चाई की तलब करने वाले की शान के लायक़ नहीं.

तुम फ़रमाओ वह(29)
(29) क़ुरआन शरीफ़.

ईमान वालों के लिये हिदायत और शिफ़ा है(30)
(30) कि हक़ की राह बताता है, गुमराही से बचाता है, जिहालत और शक वग़ैरह दिल की बीमारियों से शिफ़ा देता है और शारीरिक रोगों के लिये भी इसका पढ़कर दम करना बीमारी के लिये असर कारक है.

और वो जो ईमान नहीं लाते उनके कानों में टैंट (रूई) है (31)
(31) कि वो क़ुरआने पाक सुनने की नेअमत से मेहरूम हैं.

और वह उनपर अन्धापन है(32)
(32) कि शक और शुबह की अंधेरियों में जकड़े हुए हैं.

मानो वो दूर जगह से पुकारे जाते हैं(33) {44}
(33) यानी वो अपने इन्कार से इस हालत को पहुंच गए हैं जैसा कि किसी को दूर से पुकारा जाए तो वह पुकारने वाले की बात न सुने, न समझे.

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