41 सूरए हामीम सज्दा-दूसरा रूकू

41 सूरए हामीम सज्दा-दूसरा रूकू

۞ قُلْ أَئِنَّكُمْ لَتَكْفُرُونَ بِالَّذِي خَلَقَ الْأَرْضَ فِي يَوْمَيْنِ وَتَجْعَلُونَ لَهُ أَندَادًا ۚ ذَٰلِكَ رَبُّ الْعَالَمِينَ
وَجَعَلَ فِيهَا رَوَاسِيَ مِن فَوْقِهَا وَبَارَكَ فِيهَا وَقَدَّرَ فِيهَا أَقْوَاتَهَا فِي أَرْبَعَةِ أَيَّامٍ سَوَاءً لِّلسَّائِلِينَ
ثُمَّ اسْتَوَىٰ إِلَى السَّمَاءِ وَهِيَ دُخَانٌ فَقَالَ لَهَا وَلِلْأَرْضِ ائْتِيَا طَوْعًا أَوْ كَرْهًا قَالَتَا أَتَيْنَا طَائِعِينَ
فَقَضَاهُنَّ سَبْعَ سَمَاوَاتٍ فِي يَوْمَيْنِ وَأَوْحَىٰ فِي كُلِّ سَمَاءٍ أَمْرَهَا ۚ وَزَيَّنَّا السَّمَاءَ الدُّنْيَا بِمَصَابِيحَ وَحِفْظًا ۚ ذَٰلِكَ تَقْدِيرُ الْعَزِيزِ الْعَلِيمِ
فَإِنْ أَعْرَضُوا فَقُلْ أَنذَرْتُكُمْ صَاعِقَةً مِّثْلَ صَاعِقَةِ عَادٍ وَثَمُودَ
إِذْ جَاءَتْهُمُ الرُّسُلُ مِن بَيْنِ أَيْدِيهِمْ وَمِنْ خَلْفِهِمْ أَلَّا تَعْبُدُوا إِلَّا اللَّهَ ۖ قَالُوا لَوْ شَاءَ رَبُّنَا لَأَنزَلَ مَلَائِكَةً فَإِنَّا بِمَا أُرْسِلْتُم بِهِ كَافِرُونَ
فَأَمَّا عَادٌ فَاسْتَكْبَرُوا فِي الْأَرْضِ بِغَيْرِ الْحَقِّ وَقَالُوا مَنْ أَشَدُّ مِنَّا قُوَّةً ۖ أَوَلَمْ يَرَوْا أَنَّ اللَّهَ الَّذِي خَلَقَهُمْ هُوَ أَشَدُّ مِنْهُمْ قُوَّةً ۖ وَكَانُوا بِآيَاتِنَا يَجْحَدُونَ
فَأَرْسَلْنَا عَلَيْهِمْ رِيحًا صَرْصَرًا فِي أَيَّامٍ نَّحِسَاتٍ لِّنُذِيقَهُمْ عَذَابَ الْخِزْيِ فِي الْحَيَاةِ الدُّنْيَا ۖ وَلَعَذَابُ الْآخِرَةِ أَخْزَىٰ ۖ وَهُمْ لَا يُنصَرُونَ
وَأَمَّا ثَمُودُ فَهَدَيْنَاهُمْ فَاسْتَحَبُّوا الْعَمَىٰ عَلَى الْهُدَىٰ فَأَخَذَتْهُمْ صَاعِقَةُ الْعَذَابِ الْهُونِ بِمَا كَانُوا يَكْسِبُونَ
وَنَجَّيْنَا الَّذِينَ آمَنُوا وَكَانُوا يَتَّقُونَ

तुम फ़रमाओ क्या तुम लोग उसका इन्कार रखते हो जिसने दो दिन में ज़मीन बनाई(1)
(1) उसकी ऐसी भरपूर क़ुदरत है, और चाहता तो एक पल  से भी कम में बना देता.

और उसके हमसर ठहराते हो(2)
(2) यानी शरीक.

वह है सारे जगत का रब (3) {9}
(3) और वही इबादत का मुस्तहक़ है उसके सिवा कोई पूजे जाने के लायक़ नहीं. सब उसकी ममलूक और मख़लूक़ हैं. इसके बाद फिर उसकी क़ुदरत का बयान फ़रमाया जाता है.

और उसमें (4)
(4) यानी ज़मीन में.

उसके ऊपर से लंगर डाले (5)
(5) पहाड़ों के.

और उसमें बरकत रखी(6)
(6) नदी और नेहरें और दरख़्त और फल और तरह तरह के जानदार वग़ैरह पैदा करके.

और उसमें उसके बसने वालों की रोज़ियाँ मुक़र्रर कीं यह सब मिलाकर चार दिन में(7),
(7) यानी दो दिन ज़मीन की पैदायश और दो दिन में ये सब.

ठीक जवाब पूछने वालों को {10} फिर आसमान की तरफ़ क़स्द फ़रमाया और वह धुंआ था(8)
(8) यानी बुख़ार(भाप)बलन्द होने वाला.

तो उससे और ज़मीन से फ़रमाया कि दोनो हाज़िर हो ख़ुशी से चाहे नाख़ुशी से, दोनो ने अर्ज़ की कि हम रग़बत के साथ हाज़िर हुए {11} तो उन्होंने पूरे सात आसमान कर दिया दो दिन में(9)
(9) ये कुल छ दिन हुए, इनमें सबसे पिछला जुमुआ (शुक्रवार)है.

और हर आसमान में उसी के काम के अहकाम भेजे(10)
(10) वहाँ के रहने वालों को ताअतों और इबादतों और, यह करो वह न करो, के आदेशों के.

और हमने नीचे के आसमान को (11)
(11) जो ज़मीन से क़रीब हे.

चिराग़ों से आरास्ता किया(12)
(12) यानी रौशन सितारों से.

और निगहबानी के लिये(13),
(13) चुराने वाले शैतानों से.

यह उस इज़्ज़त वाले इल्म वाले का ठहराया हुआ है{12} फिर अगर वो मुंह फेरें  (14)
(14) यानी अगर ये मुश्रिक लोग इस बयान के बाद भी ईमान लाने से मुंह फेरे.

तो तुम फ़रमाओ कि मैं तुम्हें डराता हूँ एक कड़क से जैसी कड़क आद और समूद पर आई थी(15) {13}
(15) यानी हलाकत वाले अज़ाब से, जैसा उन पर आया था.

जब रसूल उनके आगे पीछे फिरते थे (16)
(16) यानी आद व समूद क़ौमों के रसूल हर तरफ़ से आते थे और उनकी हिदायत की हर तदबीर अमल में लाते थे और उन्हें हर तरह नसीहत करते थे.

कि अल्लाह के सिवा किसी को न पूजो, बोले(17)
(17) उनकी क़ौम के काफ़िर उनके जवाब में कि—

हमारा रब चाहता तो फ़रिश्ते उतारता  (18)
(18) तुम्हारे बजाय, तुम तो हमारी तरह आदमी हो,

तो जो कुछ तुम लेकर भेजे गए हम उसे नहीं मानते(19) {14}
(19) यह ख़िताब उनका हज़रत हूद और हज़रत सालेह और सारे नबियों से था जिन्होंने ईमान की दावत दी. इमाम बग़वी ने सअलबी की सनद से हज़रत जाबिर से रिवायत की कि क़ुरैश की जमाअत ने, जिसमें अबू जहल वग़ैरह सरदार भी थे, यह प्रस्ताव रखा कि कोई ऐसा व्यक्ति, जो शायरी और तंत्र विद्या में माहिर हो, नबीये करीम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से कलाम करने के लिये भेजा जाए. चुंनान्चे उतबा बिन रबीआ का चुनाव हुआ. उतबा ने सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम से आकर कहा कि आप बेहतर हैं या हाशिम, आप बेहतर हैं या अब्दुल मुत्तलिब, आप बेहतर हैं या अब्दुल्लाह, आप क्यों हमारे मअबूदों को बुरा कहते हैं, क्यों हमारे बाप दादा को गुमराह बताते हैं, हुकूमत का शौक़ हो तो हम आपको बादशाह मान लें, आपके परचम उड़ाएं, औरतों का शौक़ हो तो क़ुरैश की जिन लड़कियों में से आप पसन्द करें हम दस आपके अक़्द में दें, माल की ख़्वाहिश हो तो इतना जमा कर दें जो आपकी नस्लों से भी बच रहे. सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ये तमाम बातें खामोशी से सुनते रहे. जब उतबा अपनी तक़रीर करके चुप हुआ तो हुज़ूरे अनवर अलैहिस्सलातों वस्सलाम ने यही सूरत हामीम सज्दा पढ़ी जब आप आयत “फ़ इन अअरदू फ़क़ुल अन्ज़रतुकुम साइक़तन मिस्ला साइक़ते आदिंव व समूदा” पर पहुंचे तो उतबा ने जल्दी से अपना हाथ हुज़ूर के दहने मुबारक पर रख दिया और आपको रिश्ते और क़राबत के वास्ते से क़सम दिलाई और डर कर अपने घर भाग गया. जब क़ुरैश उसके मकान पर पहुंचे तो उसने तमाम हाल बयान करके कहा कि ख़ुदा की क़सम मुहम्मद (सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम) जो कहते हैं न वह शेअर है न जादू है न तांत्रिक विद्या है, मैं इन चीज़ों को ख़ूब जानता हूँ मैं ने उनका कलाम सुना जब उन्होंने आयत “फ़इन अअरदू” पढ़ी तो मैं ने उनके मुंह पर हाथ रख दिया और उन्हें क़सम दी कि बस करें और तुम जानते ही हो कि वो जो कुछ फ़रमाते हैं वही हो जाता है उनकी बात कभी झूटी नहीं होती. मुझे अन्देशा हो गया कि कहीं तुम पर अज़ाब न उतरने लगे.

तो वो जो आद थे उन्होंने ज़मीन में नाहक़ घमण्ड किया  (20)
(20) क़ौमे आद के लोग बड़े मज़बूत और शहज़ोर थे जब हूद अलैहिस्सलाम ने उन्हें अल्लाह के अज़ाब से डराया तो उन्हों ने कहा कि हम अपनी ताक़त से अज़ाब को हटा सकते हैं.

और बोले हम से ज़्यादा किस का ज़ोर और क्या उन्होंने न जाना कि अल्लाह जिसने उन्हें बनाया उनसे ज़्यादा क़वी (शक्तिशाली) है, और हमारी आयतों का इन्कार करते थे {15} तो हमने उनपर एक आंधी भेजी सख़्त गरज की(21)
(21) निहायत ठण्डी बग़ैर बारिश के.

उनकी शामत के दिनों में कि हम उन्हें रूस्वाई का अज़ाब चखाएं दुनिया की ज़िन्दगी में और बेशक आख़िरत के अज़ाब में सबसे बड़ी रूस्वाई है और उनकी मदद न होगी {16} और रहे समूद उन्हें हमने राह दिखाई(22)
(22) और नेकी और बदी के तरीक़े उनपर ज़ाहिर फ़रमाए-

तो उन्होंने सूझने पर अंधे होने को पसन्द किया(23)
(23) और ईमान के मुक़ाबले में कुफ़्र इख़्तियार किया.

तो उन्हें ज़िल्लत के अज़ाब की कड़क ने आ लिया(24)
(24) और हौलनाक आवाज़ के अज़ाब से हलाक किये गए.

सज़ा उनके किये की(25) {17}
(25) यानी उनके शिर्क और नबी को झुटलाने और गुनाहों की.

और हमने (26)
(26) साइक़ा यानी कड़क के उस ज़िल्लत वाले अज़ाब से.

उन्हें बचा लिया जो ईमान लाए (27)
(27) हज़रत सालेह अलैहिस्सलाम पर.

और डरते थे (28) {18}
(28) शिर्क और बुरे कर्मों से.

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