40 सूरए मूमिन

40 सूरए मूमिन

بِسْمِ اللَّهِ الرَّحْمَٰنِ الرَّحِيمِ حم
تَنزِيلُ الْكِتَابِ مِنَ اللَّهِ الْعَزِيزِ الْعَلِيمِ
غَافِرِ الذَّنبِ وَقَابِلِ التَّوْبِ شَدِيدِ الْعِقَابِ ذِي الطَّوْلِ ۖ لَا إِلَٰهَ إِلَّا هُوَ ۖ إِلَيْهِ الْمَصِيرُ
مَا يُجَادِلُ فِي آيَاتِ اللَّهِ إِلَّا الَّذِينَ كَفَرُوا فَلَا يَغْرُرْكَ تَقَلُّبُهُمْ فِي الْبِلَادِ
كَذَّبَتْ قَبْلَهُمْ قَوْمُ نُوحٍ وَالْأَحْزَابُ مِن بَعْدِهِمْ ۖ وَهَمَّتْ كُلُّ أُمَّةٍ بِرَسُولِهِمْ لِيَأْخُذُوهُ ۖ وَجَادَلُوا بِالْبَاطِلِ لِيُدْحِضُوا بِهِ الْحَقَّ فَأَخَذْتُهُمْ ۖ فَكَيْفَ كَانَ عِقَابِ
وَكَذَٰلِكَ حَقَّتْ كَلِمَتُ رَبِّكَ عَلَى الَّذِينَ كَفَرُوا أَنَّهُمْ أَصْحَابُ النَّارِ
الَّذِينَ يَحْمِلُونَ الْعَرْشَ وَمَنْ حَوْلَهُ يُسَبِّحُونَ بِحَمْدِ رَبِّهِمْ وَيُؤْمِنُونَ بِهِ وَيَسْتَغْفِرُونَ لِلَّذِينَ آمَنُوا رَبَّنَا وَسِعْتَ كُلَّ شَيْءٍ رَّحْمَةً وَعِلْمًا فَاغْفِرْ لِلَّذِينَ تَابُوا وَاتَّبَعُوا سَبِيلَكَ وَقِهِمْ عَذَابَ الْجَحِيمِ
رَبَّنَا وَأَدْخِلْهُمْ جَنَّاتِ عَدْنٍ الَّتِي وَعَدتَّهُمْ وَمَن صَلَحَ مِنْ آبَائِهِمْ وَأَزْوَاجِهِمْ وَذُرِّيَّاتِهِمْ ۚ إِنَّكَ أَنتَ الْعَزِيزُ الْحَكِيمُ
وَقِهِمُ السَّيِّئَاتِ ۚ وَمَن تَقِ السَّيِّئَاتِ يَوْمَئِذٍ فَقَدْ رَحِمْتَهُ ۚ وَذَٰلِكَ هُوَ الْفَوْزُ الْعَظِيمُ

सूरए मूमिन मक्का में उतरी, इसमें 85 आयतें, नौ रूकू हैं.
-पहला रूकू

अल्लाह के नाम से शुरू जो बहुत मेहरबान रहमत वाला(1)
(1)सूरए मूमिन का नाम सूरए ग़ाफ़िर भी है. यह सूरत मक्के में उतरी सिवाय दो आयतों के जो “अल्लज़ीना युजादिलूना फ़ी आयातिल्लाहे” से शुरू होती हैं. इस सूरत में नौ रूकू, पचासी आयतें, एक हज़ार एक सौ निनानवे कलिमे और चार हज़ार नौ सौ साठ अक्षर हैं.

हा मीम {1} यह किताब उतारना है अल्लाह की तरफ़ से जो इज़्ज़त वाला इल्म वाला {2} गुनाह बख़्शने वाला और तौबह क़ुबूल करने वाला(2)
(2)ईमानदारों की.

सख़्त अज़ाब करने वाला(3)
(3) काफ़िरों पर.

बड़े इनाम वाला (4)
(4) आरिफ़ों यानी अल्लाह को पहचानने वालों पर.

उसके सिवा कोई मअबूद नहीं, उसी की तरफ़ फिरना हैं (5){3}
(5) बन्दों को, आख़िरत में.

अल्लाह की आयतों में झगड़ा नहीं करते मगर काफ़िर (6)
(6) यानी क़ुरआने पाक में झगड़ा करना काफ़िर के सिवा मूमिन का काम नहीं. अबू दाऊद की हदीस में है सैयदे आलम सल्लल्लाहो अलैहे वसल्लम ने फ़रमाया कि क़ुरआन में झगड़ा करना कुफ़्र है. झगड़े और जिदाल से मुराद अल्लाह की आयतों में तअने करना और तकज़ीब (झुटलाने) और इन्कार के साथ पेश आना है. और मुश्किलों को सुलझाने और गहराई का पता चलाने के लिये इल्म और उसूल की बहसें झगड़ा नहीं बल्कि महानताअतों में से हैं. काफ़िरों का झगड़ा करना आयतों में यह था कि वो कभी क़ुरआन शरीफ़ को जादू कहते, कभी काव्य, कभी तांत्रिक विद्या, कभी क़िस्से कहानियाँ.

तो ऐ सुनने वाले तुझे धोखा न दे उनका शहरों में अहले गहले (इतराते) फिरना(7){4}
(7) यानी काफ़िरों का सेहत व सलामती के साथ मुल्क मुल्क तिजारतें करते फिरना और नफ़ा पाना तुम्हारे लिये चिंता का विषय न हो कि यह कुफ़्र जैसा महान जुर्म करने के बाद भी अज़ाब से अम्न में रहे, क्योंकि उनका अन्त ख़्वारी और अज़ाब है. पहली उम्मतों में भी ऐसे हालात गुज़र चुके हैं.

उनसे पहले नूह की क़ौम और उनके बाद के गिरोहों(8)
(8) आद व समूद व क़ौमे लूत वग़ैरह.

ने झुटलाया और हर उम्मत ने यह क़स्द किया कि अपने रसूल को पकड़ लें(9)
(9) और उन्हें क़त्ल और हलाक कर दें.

और बातिल (असत्य) के साथ झगड़े कि उससे हक़ को टाल दें(10)
(10) जिसको नबी लाए हैं.

तो मैं ने उन्हें पकड़ा, फिर कैसा हुआ मेरा अज़ाब(11) {5}
(11) क्या उनमें का कोई उससे बच सका.

और यूंही तुम्हारे रब की बात काफ़िरों पर साबित हो चुकी है कि वो दोज़ख़ी हैं {6} वो जो अर्श उठाते हैं(12)
(12) यानी अर्श उठाने वाले फ़रिश्ते जो क़ुर्ब वालों और फ़रिश्तों में बुज़ुर्गी व इज़्ज़त वाले हैं.

और जो उसके गिर्द हैं(13)
(13) यानी जो फ़रिश्ते कि अर्श की परिक्रमा करने वाले हैं, उन्हें करूबी कहते हैं और ये फ़रिश्तों में सरदारी पाए हुए हैं.

अपने रब की तअरीफ़ के साथ उसकी पाकी बोलते(14)
(14) और सुब्हानल्लाहे व बिहम्दिही कहते.

और उसपर ईमान लाते(15)
(15) और उसके एक होने की पुष्टि करते. शहर बिन होशब ने कहा कि अर्श उठाने वाले फ़रिश्ते आठ हैं उनमें से चार की तस्बीह यह है  : “सुब्हानकल्लाहुम्मा व बिहम्दिका लकल हम्दो अला हिल्मिका बअदा इल्मिका”और चार की यह :”सुब्हानकल्लाहुम्मा व बिहम्दिका लकल हम्दो अला अफ़विका बअदा क़ुदरतिका”.

और मुसलमानों की मग़फ़िरत माँगते हैं(16)
(16) और अल्लाह की बारगाह में इस तरह अर्ज़ करते हैं.

ऐ रब हमारे तेरी रहमत व इल्म में हर चीज़ की समाई है(17)
(17) यानी तेरी रेहमत और तेरा इल्म हर चीज़ को वसीअ है. दुआ से पहले प्रशंसा के शब्द कहने से मालूम हुआ कि दुआ के संस्कारों में से यह है कि पहले अल्लाह तआला की स्तुति और तारीफ़ की जाए फिर अपनी मुराद अर्ज़ की जाए.

तो उन्हें बख़्श दे जिन्होंने तौबह की और तेरी राह पर चले (18)
(18) यानी दीने इस्लाम पर.

और उन्हें दोज़ख़ के अज़ाब से बचा ले{7} ऐ हमारे रब और उन्हें बसने के बाग़ों में दाख़िल कर जिनका तू ने उनसे वादा फ़रमाया है और उनको जो नेक हों उनके बाप दादा और बीबियों और औलाद में (19)
(19) उन्हें भी दाख़िल कर.
बेशक तूही इज़्ज़त व हिकमत वाला है {8} और उन्हें गुनाहों की शामत से बचा ले और जिसे तू उस दिन गुनाहों की शामत से बचाए तो बेशक तू ने उसपर रहम फ़रमाया, और यही बड़ी कामयाबी है{9}

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One Response

  1. Salam… can i get the full pdf of Kalamur Rahman translation of kanzuliman in hindi language?????? need it badly

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